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संभल के जिस दंगे में गन्ने की खोई और टायर का ढेर लगा जला दिए गए 24 हिंदू, उसकी रिपोर्ट योगी सरकार ने माँगी: 184 की हुई थी मौत

उत्तर प्रदेश के संभल में 1978 में हुए दंगों के बारे में जानकारी योगी आदित्यनाथ की सरकार ने तलब की है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य श्रीचंद्र शर्मा के नोटिस पर यह निर्देश दिए गए हैं। करीब 47 साल पहले यह दंगा होली के बाद 29 मार्च को शुरू हुआ था। 184 लोगों की हत्या की गई थी। करीब 30 दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा था।

शरुआती मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि 47 साल बाद इन दंगों की राज्य सरकार दोबारा जाँच के निर्देश दिए हैं। लेकिन संभल के पुलिस अधीक्षक केके बिश्नोई ने इससे इनकार किया है। उन्होंने बताया है कि विधानपरिषद सदस्य श्रीचंद्र शर्मा ने 17 दिसंबर को जो पत्र दिया था, उसके बाद शासन ने एक आख्या माँगी है। इसमें कहा गया है कि 1978 के दंगों से जुड़ी जो भी सूचना है वह उपलब्ध कराएँ। ये सूचनाएँ संकलित की जा रही और इसके बाद सरकार को उपलब्ध करवाया जाएगा।

8 जनवरी 2025 को मुरादाबाद के कमिश्नर अंजनेय सिंह ने संभल के जिलाधिकारी डॉक्टर राजेंद्र पेंसिया को इस दंगे से जुड़े सभी रिकॉर्ड सौंपने को कहा है। सूत्रों के मुताबिक, कुछ लोगों की शिकायतों के आधार पर कई पुराने मामलों की फिर से जाँच की जा सकती है। कमिश्नर अंजनेय सिंह ने इस मामले को लेकर एक बैठक भी बुलाई है।

इससे पहले 7 जनवरी को संभल के एसपी (पुलिस अधीक्षक) केके बिश्नोई ने डीएम पेंसिया को पत्र लिखकर बताया था कि उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य श्रीचंद्र शर्मा ने 1978 के दंगों की नए सिरे से जाँच की माँग की है। शर्मा ने इस संबंध में उत्तर प्रदेश के गृह विभाग के उप सचिव और पुलिस अधीक्षक (मानवाधिकार) से पत्र मिलने का उल्लेख किया था। गृह विभाग के उप सचिव सतेन्द्र प्रताप सिंह ने एक सप्ताह के भीतर इस संबंध में रिपोर्ट माँगी है।

गौरतलब है कि संभल में दंगों का पुराना इतिहास रहा है। इन्हीं दंगों के बल पर संभल नगरपालिका क्षेत्र से धीरे-धीरे हिंदुओं को मिटाया गया। देश की स्वतंत्रता के समय संभल नगरपालिका क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी 45 प्रतिशत थी जो आज घटकर 15-20% रह गई है। उस समय मुस्लिम 55% थे। आज वे बढ़कर 80-85 प्रतिशत हो गए हैं।

इन दंगों पर प्रशासन ने एक इंटरनल रिपोर्ट भी तैयार की है। इसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। इससे पता चलता है कि 1978 में संभल में सबसे बड़ा दंगा हुआ था। इसी दंगे के बाद खग्गूसराय में रहने वाले करीब 100 हिंदू परिवार इस इलाके को छोड़कर चले गए। हालात इतने बदतर थे कि अधिकतर हिंदुओं ने कपड़ों के पुतले बनाकर बृजघाट पर अपनों का अंतिम संस्कार किया था।

हिंदू शिक्षक की बेटी से बलात्कार, पत्नी को किया किडनैप


इसी दंगे के दौरान एक हिंदू शिक्षक की बेटी और पत्नी को मंजर शफी ने उठा लिया था। इस दंगे को भड़काने के पीछे भी शफी की बड़ी भूमिका थी। हिंदू शिक्षक की बेटी को बलात्कार के बाद छोड़ा गया। उनकी पत्नी को हिंदुओं ने बचा लिया था। आज इस शिक्षक परिवार संभल में नहीं रहता है।

बनवारी लाल बोले गोली मार दो, पर दंगाइयों ने काट-काटकर मारा

ऑपइंडिया के पास मौजूद इंटरनल रिपोर्ट बताती है कि दंगे भड़कने की सूचना मिलने पर बनवारी लाल गोयल प्रभावित इलाके में जाने लगे। उनकी पत्नी और बेटे ने उन्हें रोका। लेकिन वे यह कहते हुए दंगा प्रभावित इलाके में चले गए, सारे मुस्लिम मेरे मित्र और भाई जैसे हैं। सब मेरे साथ काम करते हैं। मुझे कुछ नहीं होगा। लेकिन बनवारी लाल गोयल को मुस्लिम दंगाइयों ने पकड़ लिया।

उनसे कहा कि तुम इन पैरों से पैसे लेने आए हो और उनके पैर काट दिए। फिर कहा कि तुम इन हाथों से पैसे लेने आए हो और हाथ भी काट दिए। इसके बाद गर्दन काट कर उनकी हत्या कर दी गई। इस दौरान मुस्लिम दंगाइयों के सामने बनवारी लाल गिड़गिड़ाते रहे कि मुझे काटो मत, गोली मार दो। पर किसी ने नहीं सुनी। इस घटना को हरद्वारी लाल शर्मा और सुभाष चंद्र रस्तोगी ने अपनी आँखों से देखा था। इस कत्लेआम के दौरान दोनों ने एक ड्रम में छिपकर अपनी जान बचाई थी। हाई स्कूल में पढ़ने वाले हरद्वारी लाल के सगे भाई को भी मुस्लिम दंगाइयों ने चाकू से गोदकर इसी दौरान मार डाला था।

शर्मा और रस्तोगी भी इस कत्लेआम के गवाह थे। इरफान, वाजिद, जाहिद, मंजर, शाहिद, कामिल, अच्छन जैसे नाम आरोपित थे। लेकिन 2010 में यह केस बंद करना पड़ा, क्योंकि गवाह ही हाजिर नहीं हुए। जज ने यह टिप्पणी करते हुए केस बंद किया कि मैं सोच भी नहीं सकता कि इनलोगों (आरोपितों) को फाँसी नहीं हो रही है।

गवाहों पर किस तरह का दबाव रहा होगा इसे इस बात से समझा जा सकता है कि बनवारी लाल के बेटे विनीत गोयल के कारोबारी साझेदार रहे प्रदीप अग्रवाल के भाई की वसीम ने गोली मारकर हत्या कर दी। साथ ही धमकी दी कि यदि उसके खिलाफ किसी ने एफआईआर करवाई तो उसकी भी हत्या कर दी जाएगी। उसके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं हुआ।

इंटरनल रिपोर्ट के अनुसार बनवारी लाल के परिवार पर डॉक्टर शफीकुर रहमान बर्क की ओर से भी दबाव डाला गया था। बर्क संभल से समाजवादी पार्टी से सांसद रहे हैं। फिलहाल उनके पोते जियाउर्रहमान बर्क इस सीट से सपा के सांसद हैं। जामा मस्जिद में सर्वे के दौरान हुई हिंसा में जियाउर्रहमान बर्क के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया है। 1995 के आसपास बनवारी लाल गोयल के परिवार ने संभल ही छोड़ दिया।

हाल में इन दंगों की चर्चा शुरू होने के बाद बनवारी लाल गोयल के बेटे विनीत गोयल वापस संभल लौटे थे। उन्होंने बताया था कि उनके पिता समेत अन्य हिंदुओं को हत्या के बाद इस तरह फूँक दिया गया था कि उनकी अस्थियाँ तक नहीं मिल सकी। दंगे के एक माह के बाद उन्होंने फूल-पत्तों पर आटा लपेटकर उनका सांकेतिक दाह संस्कार किया था।

ग्रूमिंग गैंग के खिलाफ जाँच नहीं चाहते ब्रिटिश सांसद, सदन में 364 ने विरोध में दिया वोट: एलन मस्क बोले- PM स्टार्मर को करो बर्खास्त

ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग के खिलाफ जाँच शुरू हो ये ब्रिटेन की सत्ताधारी पार्टी को मंजूर नहीं है। यही वजह है कि ब्रिटिश संसद में जब विधेयक में संशोधन को लेकर ये माँग उठाई गई कि कि ग्रूमिंग गैंग के विरुद्ध राष्ट्रीय जाँच शुरू हो तो ब्रिटेन के सांसदों ने इसके विरुद्ध वोटिंग की।

सामने आई जानकारी के अनुसार केवल 111 सांसदों ने माँग के पक्ष में वोट किया जबकि 364 ने खिलाफ में मतदान किया। इसी के साथ लेबर पार्टी ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वो बच्चों की सुरक्षा और कल्याण विधेयक को खत्म करने का प्रयास कर रहे हैं।

लेबर पार्टी का कहना है कि यह संशोधन बच्चों की सुरक्षा और कल्याण से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधानों को कमजोर करेगा। सांसदों ने चेतावनी दी है कि यदि यह संशोधन पारित होता है, तो इससे बच्चों की शिक्षा और उनके विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

बता दें कि ग्रूमिंग गैंग का मुद्दा पिछले एक हफ्ते से सुर्खियों में खुद दुनिया के सबसे अमीर आदमी इस गैंग का पक्ष लेने वाले लोगों पर कार्रवाई की माँग कर रहे हैं व ब्रिटेन की पुलिस पर सवाल उठा रहे हैं।

वहीं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टार्मर ने इस मुद्दे पर बात रखते हुए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मस्क का नाम लिए बिना कहा कि जो लोग झूठ और गलत सूचनाओं को फैला रहे हैं, उन्हें पीड़ितों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्हें सिर्फ खुद में दिलचस्पी है।

उन्होंने ये भी कहा कि वे 2008 से 2013 के बीच प्रॉसिक्यूशन सर्विस के डायरेक्टर थे तभी ग्रूमिंग गैंग के खिलाफ पहला मामला दर्ज किया गया था। स्टार्मर ने कहा कि उन्होंने जिस भी मामले को हाथ में लिया, वह अदालत तक पहुंचा और उसमें पर्याप्त कार्रवाई हुई।

वहीं मस्क का कहना है कि स्टार्मर जाँच कर रही समिति के अध्यक्ष थे लेकिन फिर भी उन्होंने आरोपितों के खिलाफ केस चलाने की मंजूरी नहीं दी और अब प्रधानमंत्री के रूप में भी स्टार्मर इस घटना पर पर्दा डाल रहे हैं। मस्क ने इस पूरे मामले में ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स से हस्तक्षेप कर स्टार्मर को बर्खास्त करने की अपील की। साथ ही सोशल मीडिया पर पोस्ट के जरिए उन्हें जेल भेजने की माँग की।

भारत में भी ‘तालिबान’ बन रहा अफगानी परिवार, लड़की के हिन्दू परिवार से शादी करने पर दी धमकी: दिल्ली में दर्ज करवाया झूठा मुकदमा, सुरक्षा माँगने बॉम्बे हाई कोर्ट पहुँचे पति-पत्नी

अफगानिस्तान से शरणार्थी के तौर पर भारत आई एक लड़की को हिन्दू लड़के से शादी करने पर परिवार से धमकियाँ मिल रही हैं। लड़की के साथ रहने वाली उसकी बहन को परिवार धमकियाँ दे रहा है। परिवार ने उनके खिलाफ एक फर्जी मामला भी दर्ज करवा दिया। परिवार के खतरे से बचने के लिए अब पति-पत्नी और उसकी बहन ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

बॉम्बे हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 3 जनवरी, 2025 को जस्टिस रेवती मोहिते और जस्टिस नीला गोखले ने की है। उन्होंने सुनवाई के दौरान पाया कि दोनों को पहले ही मुंबई पुलिस सुरक्षा दे रही है। यह सुरक्षा जून, 2024 में उन्हें दी गई थी। यह सुरक्षा अफगानी लड़की के पति के मुंबई पुलिस कमिश्नर को लिखे पत्र के बाद दी गई थी।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ताओं के वकील ने हमें बताया है कि पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा पारित आदेश के पालन में चंडीगढ़ पुलिस ने याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान की है। हमें यह भी बताया गया है कि वर्तमान में मुंबई पुलिस ने भी याचिकाकर्ताओं को पुलिस सुरक्षा प्रदान की है तथा यह तब तक जारी रहेगी जब तक उन पर खतरा बना रहेगा।”

हाई कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में दर्ज केस को लेकर वह जब चाहे तब सही कदम उठा सकती है। यह याचिका एक अफगानी शरणार्थी लड़की, उसके हिन्दू पति और बहन द्वारा दायर की गई थी। लड़की 2017 में अपने परिवार के साथ अफगानिस्तान से भारत में शरण के लिए आई थी। वर्तमान में 20 साल की है। उसके साथ उसकी छोटी बहन भी आई थी।

अफगान युवतियों के पास संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) का कार्ड भी है। बाद में भारत में रहने के दौरान ही अफगानी लड़की को हरियाणा के एक हिन्दू लड़के से प्रेम हो गया और उसने उसके साथ जून, 2024 में हिन्दू रीति-रिवाज से विवाह कर लिया। अफगानी लड़की के परिजनों को यह पसंद नहीं आया और उसे वह धमकियाँ देने लगे।

दोनों लड़कियों के खिलाफ परिजनों ने एक झूठा मुकदमा भी दिल्ली में दर्ज करवा दिया। अफगानी लड़की इसके बाद पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट पहुँची जहाँ से उसे सुरक्षा मिली। उसके साथ उसकी छोटी बहन भी परिवार से अलग रहती है।

लड़की के हिन्दू पति को बाद में कैंसर हो गया जिसके चलते वह मुंबई इलाज करवाने चले गए, यहाँ भी उन्होंने सुरक्षा के लिए याचिका डाली। अफगान परिवार की कट्टरता और तालिबानी रवैये से तीनों नाराज हैं। इस पर अगली सुनवाई 28 जनवरी, 2025 को है।

न्यायपालिका में ना हो रिजर्वेशन, मेरिट बने आधार: SC समुदाय से आने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज CT रविकुमार का बयान, बोले- पद के लिए लोग खुद को लायक बनाएँ

सुप्रीम कोर्ट से हाल ही में रिटायर हुए जज CT रविकुमार ने न्यायपालिका में नियुक्तियाँ मेरिट के आधार पर करने की वकालत की है। उन्होंने आरक्षण के विचार को समर्थन ना देते हुए कहा है कि न्यायपालिका में पहले से ही वह व्यवस्थाएँ मौजूद हैं, जिनसे सबका प्रतिनिधित्व हो। जस्टिस CT रविकुमार अनुसूचित जाति से सम्बन्धित हैं। जस्टिस रविकुमार ने यह बातें हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में कहीं हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने न्यायपालिका में आरक्षण और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर कहा, “मेरा स्पष्ट जवाब यह है कि न्यायपालिका में ऐसा तंत्र मौजूद है और और यह आगे मौजूद भी रहेगा। अगर ऐसा नहीं होता, तो मैं इस पद पर नहीं होता। लेकिन पिछड़े समुदायों के लोगों को खुद को इतना योग्य बनाना चाहिए कि वे इस पद के लिए नियुक्त किए जाने के दायरे में आ सकें। कोई किस पृष्ठभूमि से आता है और उसे किस आधार पर नियुक्त किया गया है, सबको एक ही समान काम करना होता है।”

जस्टिस CT रविकुमार ने कहा कि इस पद के लिए योग्यता और उस व्यक्ति का सक्षम होना बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि SC समुदाय से होने के कारण उन्हें भी इस पद तक पहुँचने के रास्ते में कई कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं। उन्होंने बताया कि वह अपने परिवार में वकालत का पेशा अपनाने वाले पहले व्यक्ति थे इसलिए उन्हें और समस्याएँ हुईं। जस्टिस रविकुमार ने कहा कि न्यायपालिका में ऐसे लोगों को पहचान कर ऊपर लाया जाना चाहिए, जो योग्य हैं। उन्होंने कहा कि अभी न्यापालिका में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व कम है।

जस्टिस रविकुमार ने कहा कि न्यायपालिका कोटा और आरक्षण व्यवस्था पर नहीं चल सकती, इसका काम न्याय देना है। न्यायपालिका की आलोचना को लेकर उन्होंने कहा कि जजों को कोई भी फैसला देते समय काफी सावधानी बरतनी चाहिए औए फैसले के पीछे के तर्कों को साफ़ तौर पर सामने रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि फैसला दिए जाने के बाद उसे सही सिद्ध करने की कोशिश जजों को नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर न्यायपालिका कोई नियम बना रही तो भी उसे काफी सावधान रहना रहना चाहिए।

जस्टिस CT रविकुमार 5 जनवरी, 2025 को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए हैं। यहाँ वह अगस्त, 2021 में नियुक्त किए गए थे। केरल के अलप्पुझा से आने वाले जज CT रविकुमार SC समुदाय से हैं और सुप्रीम कोर्ट से पहले वह केरल हाई कोर्ट में 2009 से लेकर 2021 तक जज रहे थे। केरल हाई कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसले दिए थे। इससे पहले वह सरकारी वकील भी रहे थे। उनकी पत्नी भी तमिलनाडु हाई कोर्ट में वकील हैं।

माना आपकी तरह ‘एलीट’ नहीं था मुकेश चंद्राकर, पर जिसे तड़पा-तड़पाकर मारा गया वह भी पत्रकार ही था… कॉन्ग्रेस की ‘चाटुकारिता’ में अपने ही पेशे का दर्द भूल गए राजदीप सरदेसाई

राजदीप सरदेसाई कौन हैं? पत्रकार। मुकेश चंद्राकर कौन था? पत्रकार। पेशा एक ही होने के बावजूद यह माना जा सकता है कि राजदीप की तरह मुकेश ‘एलीट’ नहीं थे। वे न तो ‘खान मार्केट गैंग’ के प्रिय थे और न ही ‘लुटियन मीडिया’ का हिस्सा। फिर भी हमपेशा होने के कारण राजदीप से यह तो उम्मीद की ही जा सकती थी कि वे पत्रकारों का दर्द समझेंगे। कॉन्ग्रेस के प्रति अपनी वफादारी साबित करने के मौके के तौर पर इस घटना को नहीं लेंगे।

लेकिन जो उम्मीदों पर खरा उतरे, वह राजदीप सरदेसाई कैसा। इंडिया टुडे के इस वरिष्ठ पत्रकार ने अपनी ऊर्जा यह साबित करने में खपाई है कि मुकेश की हत्या में गिरफ्तार सुरेश चंद्राकर का अब कॉन्ग्रेस से कोई संबंध नहीं है।

हत्यारे सुरेश चंद्राकर को भूपेश बघेल की कॉन्ग्रेस सरकार और उसके बाद भी कैसे बड़े पद मिले, यह भी सामने आ चुका है। पत्रकार मुकेश चंद्राकर के हत्यारे पर कड़ी कार्रवाई हो और उसे सजा मिले, इस पर बात ना करके अब राजदीप सरदेसाई कॉन्ग्रेस के बचाव में उतर पड़े हैं।

राजदीप सरदेसाई ने एक्स पर एक ट्वीट में यह दिखाने की कोशिश की कि सुरेश चंद्राकर कॉन्ग्रेस का नेता भले ही था लेकिन बाद में वह भाजपा में शामिल हो गया था। उन्होंने लिखा, “पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या का मुख्य आरोपित सुरेश चंद्राकर कॉन्ग्रेस का सदस्य था। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का दावा है कि वह हाल ही में भाजपा में शामिल हुआ है।”

आगे सरदेसाई ने लिखा, “यह साफ़ है कि हत्या सड़क ठेकों में भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए की गई थी, ये भ्रष्टाचार का एक जाना-पहचाना तरीका है और जो सत्ता के संरक्षण में पनपता है। दोषी किस पार्टी से जुड़ा था, इस पर बहस के बगैर दोषियों को तुरंत सजा मिलनी चाहिए। मुकेश को न्याय मिलना चाहिए।”

राजदीप सरदेसाई इसी तरीके से काम करते हैं। कई ऐसे आधिकारिक दस्तावेज सामने आ चुके हैं, जिनसे साफ़ होता है कि सुरेश चंद्राकर का संबंध कॉन्ग्रेस से था। यह भी साफ़ हो चुका है कि महाराष्ट्र चुनाव तक कॉन्ग्रेस उससे काम ले रही थी और पद भी दे रही थी। लेकिन सिर्फ शक पैदा करने के लिए राजदीप इसमें भाजपा का नाम घसीट लाए।

भाजपा ने मुकेश चंद्राकर की हत्या के बाद बताया था कि हत्यारोपित सुरेश चंद्राकर छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस के SC मोर्चा का उपाध्यक्ष है। उसे महाराष्ट्र चुनाव के दौरान अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर ऑब्जर्वर बना कर भेजा गया था। 2023 में हुए छत्तीसगढ़ चुनाव के दौरान उसे 3 जिलों का प्रभारी बनाया गया था।

यह सब जानकारी होने के बावजूद राजदीप ने यह लिखा कि ‘चाहे वह जिस पार्टी से हो’। भाजपा नेताओं का नाम किसी मामले में आने पर रोना-पीटना मचा देने वाले राजदीप इस बार स्पष्ट तौर पर पार्टी का नाम नहीं लिख पाए। इसके लिए उनको एक दावे का सहारा लेना पड़ गया।

राजदीप ने सिर्फ इतनी ही चोरी नहीं की कि वह भाजपा को इस मामले में घसीटते रहे, बल्कि वह यह बताना भी भूल गए कि सुरेश चंद्राकर को इतना ताकतवर बनाने वाली भी कॉन्ग्रेस ही रही है। 2023 तक कॉन्ग्रेस राज्य में सत्ता में थी।

ना राजदीप ने यह बताया कि कुछ साल पहले तक सामान्य सी पृष्ठभूमि रखने वाला सुरेश चंद्राकर 2021 आते-आते अपनी शादी में हेलीकॉप्टर बुलाने लगा? कैसे वह बीजापुर के स्टेडियम में शादी की दावत देने लगा? कैसे उसे धमाधम एक से एक बड़े ठेके उसको मिले? कैसे 10वीं पास सुरेश चंद्राकर A क्लास का ठेकेदार बन गया?

इन सारी बातों को राजदीप ने नजरअंदाज कर दिया और उनकी सुई एक जगह पर जाकर अटकी कि वह कॉन्ग्रेस का नेता ना होकर भाजपा का था या किसका था, पता नहीं। उल्लेखनीय है कि मुकेश चंद्राकर 1 जनवरी, 2025 को लापता थे। उनका शव ठेकेदार सुरेश चंद्राकर के घर के सेप्टिक टैंक से बरामद हुआ था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उनको तड़पा-तड़पा कर मारा गया था।

अन्ना यूनिवर्सिटी की छात्रा से रेप करने वाले ने मंदिर की 1+ एकड़ जमीन पर कब्जा कर बना रखा है 3 मंजिला मकान, DMK से उसकी नजदीकी CM स्टालिन ने भी कबूली

तमिलनाडु के अन्ना विश्वविद्यालय में एक लड़की के साथ यौन उत्पीड़न करने के आरोेपित ज्ञानशेखरन पर प्रसन्ना वेंकटेश पेरुमल मंदिर की जमीन कब्जाने का आरोप है। तमिलनाडु राजस्व विभाग को पता चला है कि अतिक्रमण की गई मंदिर की जमीन पर 26 इमारतें बनाई गई हैं, जिनमें ज्ञानशेखरन का घर भी शामिल है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने माना है कि ज्ञानशेखरन DMK से सहानुभूति रखता था।

कम्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु की हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग ने राजस्व विभाग के साथ मिलकर DMK पदाधिकारी ज्ञानशेखरन के खिलाफ जाँच शुरू की है। वर्तमान में विभागों द्वारा भूमि का मूल्यांकन किया जा रहा है। दरअसल, यौन उत्पीड़न का जाँच कर रहा विशेष जाँच दल (SIT) की जाँच में इस अतिक्रमण का खुलासा हुआ है।

जाँच के दौरान पता चला कि ज्ञानशेखरन ने मंदिर की अतिक्रमण की गई जमीन पर अवैध तीन मंजिला इमारत बनाई है। इस इमारत में वह अपनी दो पत्नियों के साथ रहता है। रिपोर्ट के अनुसार, गिंडी तहसीलदार मणिमेकलाई के नेतृत्व में किए गए निरीक्षण और भूमि अभिलेखों से पता चला कि अतिक्रमण की गई जमीन 1 एकड़ और 17 सेंट में फैली हुई है।

तहसीलदार थिरुबेनकदम और मंदिर प्रशासन अधिकारी नारायणी सहित मानव संसाधन एवं सीई अधिकारियों द्वारा की गई जाँच में यह भी पता चला कि अतिक्रमण करने वालों में 26 अन्य परिवार भी शामिल हैं। अतिक्रमण हटाने और मंदिर की संपत्ति को खाली कराने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। वहीं, पुलिस ने ज्ञानशेखरन के खिलाफ जाँच शुरू कर दी है।

कोट्टापुरम का रहने वाला ज्ञानशेखरन बिरयानी बेचने का काम करता है और वह एक हिस्ट्रीशीटर है। डकैती, अपहरण और चोरी सहित 20 से अधिक मामलों में पुलिस को उसकी तलाश है। रिपोर्ट के मुताबिक, ज्ञानशेखरन जिसमें रात में चोरी करता था और दिन में राजनीतिक पार्टी के मामलों में भाग लेना था। वहीं, वह दोपहर में बिरयानी की दुकान चलाता था और शाम को छात्राओं का यौन उत्पीड़न करता था।

बता दें कि चेन्नई स्थित अन्ना यूनिवर्सिटी में 23 दिसम्बर 2024 को इंजीनियरिंग की एक 19 वर्षीय छात्रा से ज्ञानशेखरन ने रेप किया था। अपने दोस्त से मिलने गई एक लड़की का उसने पहले वीडियो बनाया और फिर उसके दोस्त को मारपीट कर भगा दिया। इसके बाद उसके साथ रेप किया और लड़की का फोन नम्बर लेकर उससे कहा कि वह जहाँ बुलाए वहाँ वह आ जाए।

लड़की ने जब इस घटना की रिपोर्ट दर्ज करवाई तब यह मामला खुला। घटना का आरोपित ज्ञानशेखरन गिरफ्तार कर लिया गया है। भाजपा ने आरोप लगाया कि ज्ञानशेखरन सत्ताधारी DMK का पदाधिकारी है। उसकी तस्वीरें भी DMK के बड़े नेताओं के साथ मौजूद हैं। DMK सरकार ने ज्ञानशेखरन को बचाने की कोशिश भी की थी। इस पर हाई कोर्ट ने स्टालिन सरकार को लताड़ लगाई थी।

पुलिस ने हिंदुओं को बचाया, मुस्लिमों को फँसाया… कासगंज दंगे के बाद इसी नैरेटिव को गढ़ने में लगे थे अमेरिका-इंग्लैंड के NGO, चंदन गुप्ता के हत्यारों को बचाने के लिए विदेशों से हुई फंडिंग

उत्तर प्रदेश के कासगंज में हिंदू कार्यकर्ता चंदन गुप्ता की हत्या में शामिल मुस्लिम कट्टरपंथियों को बचाने के लिए महंगे वकील किए गए थे और इसका पैसा विदेशों से आता था। यह आरोप चंदन के पिता सुशील गुप्ता ने लगाया है। बता दें कि 26 जनवरी, 2018 को चंदन की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्या में शामिल 28 आरोपितो को NIA की स्पेशल कोर्ट ने उम्रकैद की सजा दी है।

चंदन की हत्या के आरोपितों को बचाने के लिए भारत ही नहीं, अमेरिका और ब्रिटेन से भी पैसे आ रहे थे। ऐसा संकेत बचाव पक्ष के वकील की दलीलों और जज द्वारा एनजीओ की फंडिंग की जाँच के निर्देश में मिलते हैं। जज ने कहा था कि कासगंज में दोषियों को बचाने के लिए इन एनजीओ के क्या हित हो सकते हैं, यह विचार किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि एनजीओ की सामूहिक उद्देश्य क्या हैं और उनकी फंडिंग कहाँ से हो रही है, सरकार को इसके बारे में पता करना चाहिए। इन संगठनों को विदेशी फंडिंग कहाँ से मिल रही है, इसकी जाँच होनी चाहिए। अदालत ने केंद्र सरकार से इसकी जाँच की सिफारिश की थी। जटमेंट की कॉपी केंद्रीय गृहमंत्रालय और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को भेजने के लिए कहा था।

रिपोर्ट के मुताबिक, मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी है। ऐसे में केंद्र सरकार 10 दिन के भीतर एक्शन ले सकती है। दरअसल, सुनवाई के दौरान आरोपितों की ओर से पेश बचाव पक्ष के वकील ने जियाउल जिलानी ने विभिन्न गैर-सरकारी संगठन (NGO) की इस पर कथित रिपोर्ट का भी हवाला दिया था। इन एनजीओ की कथित रिपोर्ट में हिंदुओं को बचाने और मुस्लिमों को फँसाने की बात कही गई।

जिलानी ने अपने तर्क में अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित अलाएंस फॉर जस्टिस एवं अकाउंटिबिलिटी, वॉशिंगटन डीसी स्थित इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल, लंदन स्थित साउथ एशिया सॉलिडरिटी ग्रुप, नई दिल्ली स्थित पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, नई दिल्ली स्थित यूनाइटेड अगेंस्ट हेट, मुंबई स्थित सिटिजन्स फॉर पीस एंड जस्टिस और लखनऊ स्थित रिहाई मंच की कथित रिपोर्ट का हवाला दिया था।

अदालती फैसले के अनुसार, जिलानी ने कहा था कि इन NGO की स्वतंत्र जाँच रिपोर्ट ‘कासगंज का सच- फर्जी पुलिस जाँच ने हिंदुओं को बचाया, मुस्लिमों को फँसाया’ का हवाला दिया। हालाँकि, जिलानी ने इस तथ्य को भी स्वीकार किया कि इन NGO में किसी ने भी घटना की सत्यतता का पता लगाने और जाँच के उद्देश्य से घटनास्थल या इलाके का दौरान नहीं किया था।

इस पर सरकार की ओर से पेश लोक अभियोजकगण ने दलील दी थी कि सिर्फ मुस्लिमों हितों के पैरोकार इन NGO के द्वारा यदि कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाती है तो यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। अभियोजकगण ने दलील दी कि इससे अपराधी तत्वों का मनोबल बढ़ता है। उन्होंने जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के लीगल सेल इंस्टीट्यूट का डेटा भी अदालत के सामने रखा।

दैनिक भास्कर ने NIA के सूत्र को हवाले से अपनी रिपोर्ट में बताया कि चंदन गुप्ता मर्डर केस में जिन संगठनों ने आरोपितों की मदद के लिए पैसा भेजवाए, वे आतंकी संगठन नहीं हैं। ये संस्थाएँ आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ती हैं। ये एक बड़ा मुद्दा है कि कमजोर लोगों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने वाली NGO दंगे भड़काने वाले लोगों को बचाने के लिए केस लड़े।

आरोपियों को फंडिंग करने वाला इंडियन-अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल पहले भी विवादों में रहा है। साल 2021 में इस पर UAPA भी लगाया गया था। अगस्त 2024 में इस संस्था ने अमेरिका में होने वाली इंडिया-डे परेड पर न्यूयॉर्क की गवर्नर कैथी होचुल को चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में उसने राम मंदिर की झाँकी का विरोध किया था। इस प्रमुख राशिद अहमद है।

साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप (SASG) की फाउंडर अमृत विल्सन भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल रही हैं। विल्सन ने नए संसद भवन के उद्घाटन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को नहीं बुलाने को लेकर प्रोपगेंडा फैलाया था। इसके साथ ही हल्द्वानी में मुस्लिम बस्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई पर सरकार की निंदा की थी। इसके बाद सरकार ने विल्सन की OCI यानी भारत के प्रवासी नागरिक का दर्जा रद्द कर दिया था।

साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप की एक सदस्य निर्मला राजसिंघम श्रीलंका के आतंकी संगठन LTTE (लिट्टे) की सदस्य रह चुकी हैं। निर्मला राजसिंघम को साल 1982 में श्रीलंका के आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत हिरासत में लिया गया था। वह हिरासत में ली जाने वाली लिट्टे की पहली महिला सदस्य थीं। रिहाई मंच एवं अन्य NGO का इतिहास भी दागदार है।

बता दें कि चंदन गुप्ता हत्याकांड में कोर्ट ने आसिफ कुरैशी उर्फ हिटलर, असलम, असीम, शबाब, साकिब, मुनाजिर रफी, आमिर रफी, सलीम, वसीम, नसीम, बबलू, अकरम, तौफीक, मोहसिन, राहत, सलमान, आसिफ जिम वाला, निशु, वासिफ, इमरान , शमशाद, जफर, शाकिर, खालिद परवेज, फैजान, इमरान, शाकिर, जाहिद उर्फ जग्गा को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा दी है। वहीं, सबूतों के अभाव में नसरुद्दीन और आरोपी असीम कुरैशी को बरी कर दिया।

कोरोना काल में कतर से केरल के घर लौटा, अपनी ही 13 साल की बेटी से करने लगा रेप; गर्भवती कर भाग गया… बलात्कारी अब्बा को अब दोहरे आजीवन कारावास की सजा

केरल के कन्नूर स्थित कोर्ट ने एक NRI शख्स को दोहरे आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। उस पर ₹15 लाख का जुर्माना भी ठोंका गया है। इस NRI शख्स ने अपनी बेटी का 7 महीने तक रेप किया था और उसे प्रेग्नेंट कर दिया था। वह कतर में एक रेस्टोरेंट चलाता है। मामला खुलने के बाद उसे भारत बुलाकर पुलिस ने पकड़ा और अब इस मामले में कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। इस बीच एक बार रेपिस्ट अब्बा जमानत पाकर गायब हो गया था। इस मामले में बच्ची की अम्मी ने भी बयान बदल लिया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केरल के कन्नूर में 2020 में एक NRI परिवार आया था। कोविड नियमों के चलते शख्स को अलग कमरे में रखा गया था और उसे खाना-पानी देने की जिम्मेदारी उसकी सबसे बड़ी बेटी को दी गई थी। वह 13 साल की थी। जब उसकी बेटी उसे खाने देने गई तो उसके अब्बा ने ही उसका जबरदस्ती रेप किया। यह सिलसिला अगले 7 महीनों तक जारी रहा। लगातार रेप के चलते नाबालिग प्रेग्नेंट हो गई। इसके बाद वह शख्स कतर लौट गया।

बच्ची इसके बाद कुछ बीमार रहने लगी और एक दिन बेहोश हो गई। जब उसको डॉक्टर के पास ले जाया गया तो वह प्रेग्नेंट निकली। इस मामले में पुलिस को अस्पताल ने सूचना दी। पुलिस ने जब पूछताछ की तो बच्ची ने पहले अब्बा का नाम ना लेकर अपने चचेरे भाई को रेप का दोषी बता दिया। नाबालिग ने कहा कि उसका भाई उसे पोर्न दिखाकर उसका रेप करता था। हालाँकि, बाद में उसने अपनी एक आंटी से सारा मामला बताया जिस पर पुलिस ने कार्रवाई चालू की।

बच्ची के अब्बा को बुलाने के लिए बहाना बनाया गया और जब वह भारत आया तो उसे पुलिस ने पकड़ लिया। DNA जाँच से साफ़ हो गया कि गर्भ उसके अब्बा का ही है। इसके बाद उसके खिलाफ मुकदमा चलाया गया। हालाँकि, मुकदमे के दौरान उसे जमानत मिल गई और वह कहीं भाग गया। पहले उसकी अम्मी ने हाई कोर्ट से अनुमति लेकर नाबालिग का गर्भपात करवा दिया था। बाद में गवाही से पलट अम्मी भी गई और अपने शौहर का पक्ष लेने लगी। इसके चलते यह मामला लटक गया और इसका अंतिम फैसला जुलाई, 2023 में नहीं आ सका था।

नाबालिग को इस दौरान अलग जगह संरक्षण केंद्र में रखा गया। 5 जनवरी, 2025 को पुलिस को सूचना मिली दोषी अब्बा अपने घर आया हुआ है और वहीं रह रहा है। इसके बाद पुलिस ने उसे पकड़ लिया और दो दिनों के भीतर ही कोर्ट ने यह फैसला सुना दिया। कोर्ट ने अपनी ही बेटी के रेप दोषी को POCSO क़ानून के तहत 2 आजीवन कारावास और 2 बीस वर्ष की जेल की सजा सुनाई। इसके अलावा 7 वर्ष की सजा और सुनाई। कोर्ट ने उस पर ₹15 लाख का जुर्माना भी लगाया जो उसकी बेटी को दिया जाएगा।

किसी महिला को देखकर ‘मस्त’ कहने की न करें भूल, चल सकता है यौन शोषण का केस: जानिए केरल हाई कोर्ट ने फिगर पर कमेंट को क्यों बताया अपराध

केरल हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान सोमवार (6 जनवरी) को कहा कि एक व्यक्ति द्वारा महिला के शरीर की बनावट को ‘बढ़िया या मस्त’ कहना पहली नजर में यौन रूप से प्रेरित टिप्पणी है। इसके बाद जस्टिस ए बदरुद्दीन ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354A(1)(iv), 509 और केरल पुलिस अधिनियम, 2011 की धारा 120 सहित अपराधों को रद्द करने से इनकार कर दिया।

दरअसल, IPC की धारा 354A कहता है कि यौन रूप से भड़काऊ टिप्पणी करना यौन उत्पीड़न माना जाएगा। वहीं, धारा 509 के प्रावधान में महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने के इरादे से किए गए कृत्यों के बारे में बताया गया है। केरल पुलिस अधिनियम की धारा 120 में उपद्रव करने और सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन करने के लिए दंड का प्रावधान है।

अभियोजन पक्ष (लड़की के वकील) का कहना था कि शिकायतकर्ता लड़की केरल राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड के इलेक्ट्रिकल सेक्शन में काम कर रही थी। उस दौरान आरोपित ने यह कहते हुए यौन रूप से भड़काऊ टिप्पणी और इशारे किए कि उसके शरीर की बनावट ‘बढ़िया’ है। अभियोजन पक्ष ने यह भी आरोप लगाया गया कि आरोपित ने उसके मोबाइल नंबर पर यौन रूप से भड़काऊ संदेश भी भेजे।

वहीं, अपीलकर्ता आरोपित के वकील ने इसका विरोध किया और अदालत में तर्क दिया कि उसने सिर्फ महिला की शारीरिक संरचना के बारे में कहा था। याचिकाकर्ता का कहना था कि किसी व्यक्ति की शारीरिक संरचना अच्छी है कहना आईपीसी की धारा 354A(1)(iv) या धारा 509 या केरल पुलिस अधिनियम के प्रावधानों के दायरे में यौन रूप से संबंधित टिप्पणी नहीं हो सकती।

कोर्ट ने कहा, “किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने या उसकी निजता में दखल देने के इरादे से कोई शब्द बोलना, कोई आवाज़ या इशारा करना या कोई वस्तु प्रदर्शित करना आईपीसी की धारा 509 के तहत अपराध है। अभियोजन पक्ष के आरोपों का विश्लेषण करने पर प्रथम दृष्टया आईपीसी की धारा 509 के तहत अपराध को आकर्षित करने के लिए तत्व सामने आते हैं।”

धारा 35A को लेकर न्यायालय ने कहा कि कोई भी पुरुष जो किसी महिला पर यौन रूप से भड़काऊ टिप्पणी करता है, वह यौन उत्पीड़न के अपराध का दोषी है। इस पर, न्यायालय ने याचिकाकर्ता की दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले के तथ्यों पर गौर करने के बाद यह स्पष्ट है कि मामला विशेष रूप से कथित अपराधों को आकर्षित करने वाला है।

कोर्ट ने कहा, “न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह अन्य परिस्थितियों पर भी गौर करे और यह भी देखे कि क्या ऐसी कोई सामग्री है जो यह संकेत दे कि आपराधिक कार्यवाही में स्पष्ट रूप से दुर्भावना है और कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण तरीके से गुप्त उद्देश्यों से शुरू की गई है। एक बार जब उक्त तथ्य स्थापित हो जाता है तो यह आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का एक अच्छा कारण है।”

ChatGPT बनाने वाले सैम ऑल्टमैन पर बहन ने लगाया यौन शोषण का आरोप: कहा- 3 साल की थी तब करवाते थे ओरल सेक्स, 12 साल की होने तक किया रेप

विश्व भर में AI के मामले में अग्रणी मानी जाने वाली कंपनी OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन की बहन ने उन पर यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। सैम पर आरोप है कि उन्होंने अपनी बहन का यौन शोषण तब से चालू किया जब वह मात्र 3 वर्ष की थीं और यह 12 वर्ष की आयु तक जारी रहा। सैम की बहन एनी ऑल्टमैन इसको लेकर सैम पर एक मुकदमा भी ठोंक दिया है। एनी ऑल्टमैन ने इस मामले में $75000 डॉलर का मुआवजा और मुकदमा चलाने की माँग की है। ऑल्टमैन ने यह सारे आरोप नकारे हैं और अपने परिवार के साथ एक बयान जारी किया है।

एनी ऑल्टमैन ने क्या आरोप लगाए?

एनी ऑल्टमैन ने मिसौरी राज्य में सैम ऑल्टमैन के खिलाफ यह मुकदमा दायर किया है। एनी का दावा है कि जब वह 3 वर्ष की और सैम 12 साल के थे तब यह यौन शोषण का सिलसिला चालू हुआ। एनी ने आरोप लगाया कि तब सैम उनको अपना लिंग छूने को कहते थे और जबरदस्ती उनके साथ ओरल सेक्स करते थे। सैम यह काम 1997 से लेकर 1999 तक करते रहे। एनी तब तक 5 वर्ष की हो चुकी थीं। इसके बाद सैम ऑल्टमैन की हरकतें और भी बढ़ गईं।

एनी ने आरोप लगाया कि 5 वर्ष की आयु के बाद सैम उनके गुप्तांगों में उँगलियाँ डालने जैसे कृत्य करने लगे। इस दौरान वह जबरदस्ती ओरल सेक्स भी करते। वर्ष 2000 आते-आते सैम ने एन के साथ जबरदस्ती सेक्स करने लगे। उन्होंने उनके साथ अप्राकृतिक सेक्स भी किया। यह हरकतें 8-9 वर्ष तक चली। एनी का आरोप है कि सैम उन्हें यह भी विश्वास करवाते रहे कि यह सब वह खुद चाहती हैं। एनी ने आरोप कहा कि उन्हें $75000 डॉलर मुआवजे तौर पर दिया जाए। इसके अलावा सैम के खिलाफ मुकदमा चलाया जाएगा।

सैम ऑल्टमैन ने क्या दिया जवाब?

सैम ऑल्टमैन और उनके परिवार ने बहन एनी के आरोपों पर एक बयान जारी किया है। उन्होंने इस बयान में सारे आरोपों को झुठलाया है। उन्होंने कहा है कि एनी मानसिक तौर पर परेशान रही है। उन्होंने यह भी बताया कि एनी की स्थिति सही हो जाए इसके लिए उन्होंने उसके बिल भरे हैं, उसे पैसा भी भेजा है, एनी को नौकरी दिलाने में सहायता की है और किराया तक चुकाया है। उन्होंने बताया कि उन्होंने एनी के लिए एक घर तक खरीदने का ऑफर दिया था। उन्होंने कहा कि आगे भी एनी को यह सहायता जारी रहेगी।

सैम ने कहा कि एनी हमसे लगातार पैसा माँगती रहती है। उन्होंने कहा कि एनी द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह से झूठे हैं और काफी दुख देने वाले हैं। सैम के परिवार की तरफ से जारी बयान में कहा गया, “हमने उसकी और अपनी निजता के सम्मान के लिए सार्वजनिक रूप से जवाब न देने का फैसला किया है। हालाँकि, उसने अब सैम के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई की है, और हमें लगता है कि हमारे पास इस पर कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।”

इस बयान में आगे कहा गया, “पिछले कुछ सालों में, उसने हमारे परिवार के सदस्यों पर हमारे पिता के 4 लाख डॉलर (लगभग ₹35 करोड़) फंड को रोकने, उसका वाईफाई हैक करने और उसे ChatGPT, ट्विटर समेत बाकी वेबसाइट से ‘शैडोबैन’ करने का आरोप लगाया है। इसमें सबसे खराब आरोप यौन शोषण का है। समय के साथ उसके दावे बदलते रहे हैं बदल गए हैं।”