Home Blog Page 5127

ऐसे कैसे चलेगा खान साहब… पुलिस का ये अंदाज देख भौंचक रह गए लोग

पुलिस वाले भी हमारी आप की तरह हाड़-मांस के ही बने होते हैं। फिर भी अमूमन उनका ह्यूमर खाकी के पीछे छिप जाता है। लेकिन, पुणे पुलिस ने अपने ह्यूमर से सोशल मीडिया यूजर्स को चौंका दिया है। वैसे पुणे पुलिस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर हमेशा कुछ न कुछ ऐसे ट्वीट आते हैं कि जिन्हें पढ़कर यूजर खुद ही रीट्वीट करने पर मजबूर हो जाए। पुणे पुलिस यूजर्स से उनकी भाषा में बात करने के लिए मशहूर है। अभी ये हालिया उदाहरण देखिए। एक ट्विटर यूजर ने ट्वीट के जरिए उनसे एक बाइक चालक की शिकायत की। यूजर ने अपने ट्वीट में लिखा कि खान साहब बिना हेलमेट के फैंसी नंबर प्लेट लगा कर गाड़ी चला रहे हैं, इन पर जरूरी कार्रवाई की जाए।

लेकिन, यहाँ इस शिकायत पर अन्य शहरों की पुलिस की तरह पुणे पुलिस ने यूजर को केवल इस मामले पर संज्ञान लेने का आश्वासन ही नहीं दिया। पुणे पुलिस ने अलग ही अंदाज में जवाब दिया। पुणे पुलिस यूजर्स की शिकायत पर लिखती है, “खान साहब को कूल भी बनना है, खान साहब को हेयर स्टाइल भी दिखाना है, खान साहब को हीरो वाली बाइक भी चलाना है, पर खान साहब को ट्रैफिक रूल्स फॉलो नहीं करना, ऐसे कैसे चलेगा खान साहब।”

देखते ही देखते पुणे पुलिस का ये पोस्ट वायरल हो गया। अभी तक पुणे पुलिस के इस ट्वीट पर 5.6k रीट्वीट्स हैं, जबकि 20.4K लाइक आ चुके हैं। पुणे सिटी के पुलिस कमिश्नर के आधिकारिक हैंडल से भी इसे रिट्वीट किया गया है।

एक यूजर लिखता है, “मेरी तो हँसी नहीं रुक रही है, वैसे कितने का चालान काटा है सर, ये भी ट्वीट करना चाहिए था। बेचारा नवाब बन रहा था पूरी नवाबी तो एक फोटो अपलोड होने से निकाल गई।”

पुणे पुलिस के इस ट्वीट के बाद लोग अन्य बाइकों की भी फोटो डालने लगे और उन लोगों को भी सबक सिखाने को कहा। कुछ इसे सीएए और एनआसी से जोड़कर चुटकी लेने लगे कि अगर खान साहब कागज़ नहीं दिखाएँगे तो कितने का जुर्माना लगेगा।

बता दें, सोशल मीडिया पर युवक की शिकायत के बाद पुलिस ने इस मामले में एक्शन ले लिया है। जिसके लिए उन्होंने यूजर को बकायादा चालान नंबर बताते हुए सूचित भी किया है।

गोरखपुर का डॉ. कफील खान मुंबई से गिरफ्तार, AMU में दिया था भड़काऊ भाषण

उत्तर प्रदेश की स्पेशल टास्क फोर्स ने बुधवार (जनवरी 29, 2020) को गोरखपुर के डॉक्टर कफील खान को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भड़काऊ भाषण देने के आरोप में मुंबई से गिरफ्तार किया। डॉ. कफील ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ 12 दिसंबर को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में भड़काऊ भाषण दिया था। 13 दिसंबर को उसके खिलाफ अलीगढ़ के सिविल लाइन्स पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 153-A के तहत केस दर्ज किया गया और अब इसी मामले में उसकी गिरफ्तारी हुई है।

कफील खान गुरुवार को एक प्रदर्शन में शामिल होने के लिए मुंबई गया था। लेकिन, मुंबई पहुँचते ही उसे UPSTF ने उसे गिरफ्तार कर लिया। जानकारी के अनुसार, STF की टीम उसे लखनऊ लेकर आ चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एएमयू में 12 दिसंबर को बाब-ए-सैयद गेट पर करीब 600 छात्रों को संबोधित करने के दौरान डॉ. खान ने बिना नाम लिए कहा कि मोटाभाई’ सबको हिंदू या मुस्लिम बनना सिखा रहे हैं, लेकिन इंसान बनना नहीं। उन्होंने आगे कहा कि जब से आरएसएस का अस्तित्व हुआ है, उन्हें संविधान में भरोसा नहीं रह गया। खान ने कहा था कि CAA मुस्लिमों को सेकेंड क्लास सिटिजन बनाता है और एनआरसी लागू होने के साथ ही लोगों को परेशान किया जाएगा। उसने भीड़ को उकसाते हुए कहा था कि यह हमारे अस्तित्व की लड़ाई है। हमें लड़ना होगा।

इसके अतिरिक्त खान ने यह भी आरोप लगाया कि आरएसएस के स्कूलों में बच्चों को बताया जाता है कि दाढ़ी रखने वाले लोग आतंकवादी होते हैं। उसने कहा कि CAA लाकर सरकार यह दिखाना चाहती है कि भारत एक देश नहीं है। एफआईआर में कहा गया कि खान ने शांतिपूर्ण माहौल को भंग करने की कोशिश की।

डॉक्टर कफील खान 2017 में गोरखपुर के राजकीय बीआरडी अस्पताल में बच्चों की मौत के बाद चर्चा में आया था। इस मामले में वह सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था और करीब 7 महीने तक जेल में भी रहा। अप्रैल 2018 में हाई कोर्ट ने उसे जमानत दी थी। अपने निलंबन को लेकर चल रही जॉंच को भी उसने कोर्ट में चुनौती दी थी।

‘जंग की मशाल उठाकर करो प्रदर्शन’ – AMU में भड़काऊ स्पीच देने पर डॉ कफील खान हिरासत में

CAA और NRC पर फरहान गैंग के हर झूठ का पर्दाफाश: साज़िश का जवाब देने के लिए जानिए सच्चाई

गोडसे का डर दिखाने वालों ने हाई कोर्ट में नहीं लगने दी गाँधी की प्रतिमा, देखती रही कॉन्ग्रेस

नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मँजूरी के बाद बीते 12 दिसंबर को कानून यानी CAA बना था। लेकिन 30 जनवरी के केंद्र महात्मा गॉंधी और नाथूराम गोडसे पर सियासत गरम नवंबर के अंत में ही हो गई थी। CAA ने गॉंधी को लेकर बहस को और गरमा दिया। जहाँ समर्थकों का कहना है कि CAA के जरिए मोदी सरकार ने गॉंधी के वादे को पूरा किया है, वहीं विरोधी इसे गॉंधी के विचारों की हत्या के तौर पर पेश कर रहे हैं। हिंसक प्रदर्शनों के बाद CAA विरोधियों ने गॉंधी के पोस्टर भी थाम लिए हैं। खासकर, कट्टर मजहबी मंसूबे उजागर होने के बाद से दिल्ली के शाहीन बाग में प्रदर्शनकारी कैमरों को देखते ही गॉंधी से लेकर आंबेडकर तक के पोस्टर लहराने लगते हैं।

तो क्या इनके लिए गॉंधी प्रतीक से ज्यादा कुछ भी नहीं?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सह सरकार्यवाह मनमोहन वैद्य ने ‘साहित्य अमृत’ पत्रिका के गॉंधी विशेषांक में एक लेख लिखा है। शीर्षक है ‘संघ और गॉंधीजी के संबंध’। इसमें वैद्य ने निहित स्वार्थों के लिए गॉंधी के इस्तेमाल की ओर इशारा करते हुए कहा है कि उनके नाम को भुनाने के लिए ऐसे लोग गोडसे (नाथूराम) का नाम बार-बार लेते हैं, जिन लोगों का गॉंधीजी के आचरण, विचारों और नीतियों से कोई सरोकार नहीं है।

वैसे हिंदुओं के प्रति घृणा से भरे मजहबी कट्टरपंथियों के लिए गॉंधी के प्रति नफरत नई नहीं है। इनके करतूतों को हवा देने या उस पर चुप्पी साध लेने की कॉन्ग्रेस की आदत भी पुरानी है। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहे जगमोहन ने अपनी किताब कश्मीर: समस्या और समाधान में एक घटना का विस्तार से जिक्र किया है। इससे आप इस बात को भली-भॉंति समझ सकते हैं।

जगमोहन ने लिखा है कि 1988 में 2 अक्टूबर को यानी गॉंधी जयंती पर श्रीनगर हाई कोर्ट में राष्ट्रपिता की प्रतिमा स्थापित की जानी थी। देश के मुख्य न्यायाधीश आरएस पाठक को प्रतिमा की स्थापना करनी थी। कुछ मुस्लिम वकीलों ने इसका विरोध किया। अव्यवस्था फैलाने की धमकी दी। सरकार झुक गई और कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि यह वही वक्त था जब कश्मीर में कट्टरपंथ और देश विरोधी भावनाएँ गहरे पैठ रही थी। इसकी परिणति हमने 1990 में हिंदुओं के नरसंहार और उनके पलायन के रूप में देखी।

जगमोहन के अनुसार गॉंधी की प्रतिमा स्थापित करने का विरोध कर रहे वकीलों का अगुआ मुहम्मद शफी बट्ट था। शफी बट्ट नेशनल कॉन्फ्रेंस से जुड़ा था। फारूक अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस घटना के अगले ही साल 1989 में हुए आम चुनावों में शफी बट्ट को श्रीनगर से उम्मीदवार भी बनाया और वह निर्विरोध चुन भी लिया गया। हाई कोर्ट में गॉंधी की प्रतिमा लगाए जाने के विरोध पर सियासी फायदे के लिए कॉन्ग्रेस ने भी चुप्पी साध ली। उस वक्त वह सत्ता में साझेदार भी थी। इसका नतीजा क्या निकला? जैसा कि जगमोहन लिखते हैं- धर्मनिरपेक्ष देश के एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की अदालत में गॉंधी की प्रतिमा स्थापित नहीं हो पाई।

अमेरिकी इतिहासकार ग्रेनविल ऑस्टिन ने भारतीय संविधान पर बेहद मशहूर किताब लिखी है, जिसका हिंदी अनुवाद भारतीय संविधान:राष्ट्र की आधारशिला के नाम से उपलब्ध है। ऑस्टिन ने लिखा है कि कॉन्ग्रेस कभी गॉंधीवादी थी ​ही नहीं। नेहरू के हवाले से उन्होंने लिखा है कि कॉन्ग्रेस ने समाज के गॉंधीवादी दृष्टिकोण को ‘अंगीकार’ करने की बात तो दूर उस पर ‘कभी विचार’ तक नहीं किया। ऑस्टिन लिखते हैं- गॉंधी का प्रभाव बहुत व्यापक था। उनकी यह उपलब्धि भी बहुत महती थी कि उन्होंने गॉंव और किसान को भारतीय राजनीति के केंद्र में स्थापित कर दिया था। लेकिन इन सबके बावजूद गॉंधी स्वयं अपनी पार्टी को अपने जीवन आदर्श या शासन आदर्श में दीक्षित नहीं कर सके। चूॅंकि कॉन्ग्रेस ने गॉंधी के बुनियादी आदर्श को स्वीकार ही नहीं किया था, इसलिए उससे यह उम्मीद करना शायद अनुचित था कि वह गॉंधी द्वारा विचारित संस्थाओं को गढ़ने में रुचि लेगी।

जाहिर है, गॉंधी न कभी कट्टरपंथियों के आदर्श रहे और न उनका तुष्टिकरण करने वाली कॉन्ग्रेस के लिए। गोडसे ने भले 30 जनवरी 1948 को गोली मार गॉंधी के शरीर से प्राण निकाले थे, कॉन्ग्रेस ने तो जीते-जी उनके आदर्शों का पिंडदान कर दिया था। कट्टरपंथियों ने तो ‘मेरी लाश पर देश का विभाजन होगा’ कहने वाले गॉंधी के जिंदा रहते ही मजहब के नाम पर बॅंटवारा कर लिया था।

गाँधी को गोली मारने से गोडसे की देशभक्ति गायब हो जाती है? समय है खुली चर्चा का

हृदय से सेक्युलर और गाँधीवादी थे नाथूराम गोडसे

क्या गाँधी की हत्या को रोका जा सकता था? क्यों हो गए थे अपने ही लापरवाह?

देशद्रोह के आरोपित शाहीन बाग़ सरगना शरजील की कोर्ट में पेशी: 5 दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा गया

देशद्रोह के आरोपित शाहीन बाग़ के सरगना शरजील इमाम को गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने कोर्ट में पेश किया, जहाँ से आरोपित शरजील को कोर्ट ने 5 दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया। इसके बाद अब पुलिस दिल्ली क्राइम ब्रांच पूछताछ करेगी।

सुरक्षा कारणों के चलते पुलिस ने शरजील इमाम की पेशी पटियाला हाउस कोर्ट में न करके जज के साकेत काम्प्लेक्स स्थित आवास पर की, यहाँ से जज ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपित को पाँच दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया। अब इसके बाद आरोपित शरजील से दिल्ली क्राइम ब्राँच पूछताछ करेगी। वहीं माना जा रहा है कि पूछताछ के दौरान कुछ नए राज सामने आ सकते हैं। जैसे कि उसके द्वारा दिए गए बयान का वास्तव में क्या अर्थ था या फिर कि उसने यह जानबूझकर दिया, या फिर किसी के कहने पर। पुलिस को पूछताछ में इन सभी सवालों के जवाबों की उम्मीद है।

बता दें कि एएमयू में भड़काऊ और देश को तोड़ने की बात कह कर पुलिस के निशाने पर आए शाहीन बाग़ के सरगना शरजील इमाम को बीते दिन पुलिस ने बिहार के जहानाबाद से गिरफ़्तार किया था। पिछले कई दिनों से पुलिस को उसकी तलाश थी। उसकी तलाश में जहानाबाद स्थित उसके पैतृक आवास पर छापेमारी भी की गई थी, लेकिन वो नहीं मिला था। शरजील के ख़िलाफ़ असम पुलिस से लेकर ईटानगर क्राइम ब्रांच और अलीगढ़ पुलिस भी पड़ी हुई थी। उसने असम को भारत से अलग करने की धमकी थी। अब उसके खिलाफ में देशद्रोह के आरोप के तहत मुकदमा चलाया जाएगा। दरअसल वह नेपाल भागना चाहता था लेकिन उससे पहले ही पुलिस ने उसे धर दबोचा।

दिल्ली पुलिस ने जामिया हिंसा में शामिल 69 संदिग्धों की तस्वीरें जारी कर रखा इनाम

दिल्ली पुलिस ने 69 ऐसे लोगों की तस्वीरें जारी की हैं, जो गत दिसंबर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जामिया नगर में CAA-विरोध को लेकर हुई हिंसा में शामिल हो सकते हैं। पुलिस का कहना है कि यह तस्वीरें CCTV फुटेज और हिंसा के दौरान बनाए गए वीडियो से ली गई हैं, जिसमें ये लोग हिंसा करते दिखाई दे रहे थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस का कहना है कि ये लोग हिंसा में प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे और आम जनता से इनकी जानकारी साझा करने के लिए कहा है। पुलिस ने संभावित आरोपितों के बारे में किसी भी तरह की जानकारी के लिए इनाम भी रखा है।

ज्ञात हो कि गत दिसंबर 15, 2019 को जामिया नगर और नई फ्रेंड्स कॉलोनी में हुई हिंसा में कम से कम पाँच बसें और सौ से ज्यादा निजी वाहनों को नुकसान पहुँचाया गया था। जामिया मिलिया विश्वविद्यालय समेत सौ से ज्यादा लोग इस हिंसा और विरोध प्रदर्शन में शामिल बताए जा रहे हैं।

SIT द्वारा करीब सौ लोगों को अब तक इस सम्बन्ध में पकड़ा जा चुका है। जिनमें से कुछ पर तोड़फोड़ को लेकर केस भी दायर किए गए हैं। पूर्व कॉन्ग्रेस नेता आसिफ मुहम्मद, जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के छात्र चंदन कुमार और स्थानीय नेता आशु खान से इस हिंसा के बारे में गत शुक्रवार को सात घंटों तक पूछताछ की गई थी।

प्रदर्शनकारियों द्वारा फेंके गए पत्थरों, काँच की बोतल और ट्यूबलाइट फेंकने के चलते छात्रों व पुलिस समेत 30 लोग घायल हुए थे। अधिकारियों ने इनके मोबाइल फोन, से डाटा जो कि अब डिलीट कर दी गई जानकारी तलाशने के लिए फोरेंसिक विभाग को भेजे जा रहे हैं, कॉल रिकॉर्ड्स और अन्य जानकारियाँ, जो कि जाँच के लिए जरुरी हैं आदि सीज कर लिए हैं।

शिक्षा पर योगी सरकार के ठोस कदम बनाम केजरीवाल के खोखले दावे

चुनाव दिल्ली में है, लेकिन चर्चा यूपी के स्कूलों की हो रही है। दिल्ली के गिने-चुने स्कूलों की तस्वीर दिखाते हुए उसकी तुलना यूपी से करते AAP नेता आजकल खूब दिखाई देते है। यूपी एक बड़ा राज्य है। इसकी तुलना दिल्ली जैसे छोटे से केन्द्रशासित प्रदेश से करना तर्कसंगत नहीं है।

फिर भी कुछ तथ्य जाने

  1. आर्थिक स्थिति के हिसाब से भी देखें तो दिल्ली में औसतन जितनी बड़ी आबादी व्यापार, नौकरी करता है, टैक्सपेयर की सूची में है, उतना यूपी में नहीं है।
  2. अगर प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो जहाँ यूपी में वर्ष 2018-19 में राष्ट्रीय औसत सवा लाख से 49.1% कम थी, वहीं दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 3 गुनी अधिक थी।

शिक्षा के मसले पर भी दिल्ली और यूपी की तुलना नही हो सकती लेकिन अगर आँकड़ों के आधार पर तुलना करें तो कुछ रोचक तथ्य सामने आते है:

  1. आज दिल्ली सरकार के पास केवल 1030 स्कूल हैं। इन स्कूलों में प्राइमरी और सेकेंडरी दोनों कक्षाएँ लगती है। वहीं यूपी के स्कूलों की बात करें तो राज्य के 75 जिलों में से 70 जिलों में दिल्ली से अधिक संख्या में स्कूल चलते है। कुल स्कूलों की संख्या बात करें तो यूपी में 1 लाख 60 हजार से भी अधिक स्कूल चलते हैं।
  2. दिल्ली की अनुमानित आबादी 2 करोड़ है। लगभग 14 लाख बच्चें ही दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ते है। वहीं यूपी के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या डेढ़ करोड़ से अधिक है।
  3. सरकारी स्कूलों मे पढ़ने वाले बच्चों का औसत दिल्ली की बजाय यूपी में अधिक है।
  4. दिल्ली का पूरा बजट यूपी में केवल शिक्षा के लिए आवंटित होने वाले बजट की राशि से भी कम है। वर्ष 2019-20 में दिल्ली का जहाँ कुल बजट 60 हजार करोड़ रुपए का था, वहीं यूपी में केवल शिक्षा के लिए आवंटित बजट की राशि 62,938 करोड़ थी दिल्ली के शिक्षा मंत्री इस तथ्य पर ही बहस के लपेटे में आ सकते हैं।

बात अगर शिक्षा में हुए बीतें 5 वर्षों के काम की करें तो बात शिक्षा विभाग में नई नौकरी की सबसे पहले आती है:

  1. दिल्ली सरकार के आँकड़ों की मानें तो शिक्षा विभाग के 77305 पदों में से 34970 यानी 45 फीसदी पद खाली है। यूपी में इतने पद खाली नहीं हैं।
  2. दिल्ली में जितने शिक्षक के कुल पद (लगभग 65000) है, उससे अधिक शिक्षकों की बहाली की प्रक्रिया योगी आदित्यनाथ सरकार ने सरकार बनाते ही शुरु कर दी। यूपी में बीते 3 वर्षों में 68000 से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरु हुई है। न्यायिक प्रक्रिया पूरी होते ही ये शिक्षक स्कूलों में पढ़ाने लगेंगे। यही नहीं, यूपी ने लाखों अतिथि शिक्षकों के मसले सुलझाए हैं, जो राजनीतिक और शैक्षिक रूप से बेहद संवेदनशील थे।
  3. दिल्ली में भारी बजट होने और बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली होने के बावजूद स्थाई शिक्षकों के 5% खाली पद भी नही भरे जा सकें है, वही गेस्ट टीचर बहाल कर सकने की शक्ति होने के बावजूद लगभग 15% शिक्षकों के पद खाली है।

बात केवल स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए हुए प्रयासों की ही करे तो:

  1. जब यूपी में नई सरकार 2017 में बनी तो उसने प्रदेश के लगभग दो तिहाई से अधिक यानी 1 लाख 2 हजार स्कूलों के कायाकल्प का बीड़ा उठाया और बीते ढाई सालों में ही 54000 से अधिक स्कूलों के रिनोवेशन अर्थात सजा-सँवार कर बेहतर बना दिया है। एक लाख का लक्ष्य अगले वर्ष तक पूरा हो जाएगा।
  2. दिल्ली में जब सरकार बनी तो केवल 5% अच्छें स्कूलों को छाँटा गया, उन्हीं पर ध्यान दिया गया। एक हजार में से केवल 54 स्कूल चुने गए, उन्हें मॉडल स्कूल का नाम दिया। उपलब्ध आँकड़े बताते है कि 4 वर्ष बाद भी आधे स्कूलों में ही काम पूरा हो सका। इन्हीं में से 2 में स्विमिंग पूल, एक में जिम बनाए गए और बातें ऐसे बनाई गई मानों सभी स्कूलों में क्रांति आ गई हो।

इसके अतिरिक्त अगर कुछ अन्य प्रयासों की बात करें तो:

  1. आर्थिक रूप से गरीब होने के बावजूद यूपी के सभी स्कूलों में न्यूनतम 12500 और अधिकतम डेढ़ लाख तक की राशि दी गई ताकि वे अपने जरूरतों को पूरा कर सकें।
  2. यूपी के 5,000 प्राइमरी और एक हजार अपर प्राइमरी स्कूलों को English Medium Schools के रूप में Convert किया गया है।
  3. शिक्षकों और बच्चो की बेहतरी के लिए DIET के खाली पदों को भरा गया है।
  4. प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए 2009 बैच के IAS अधिकारी विजय किरण आनंद जी को पहला Director-general of school education (DGSE) बनाया गया। कड़क ऑफिसर माने जाने वाले विजय जी की कुंभ के सफ़ल आयोजन में बड़ी भूमिका थी।

यूपी बस विज्ञापनों पर ध्यान दे दे तो अच्छे सरकारी स्कूलों की फोटों की बाढ़ आ जाएगी।

भावी बजट रचेगा इतिहास: 8%+ विकास दर की रखेगा नींव, कुछ बड़े सुधारों की पहल

सोमवार (जनवरी 20, 2020) को वित्त मंत्रालय में पारम्परिक ‘हलवा रस्म’ के साथ ही बजट की अंतिम तैयारियाँ शुरू हो गई। वर्षों से इसी रस्म के बाद बजट की छपाई का काम प्रारम्भ होता है। हमारी संस्कृति है कि कोई भी बड़ा या पवित्र कार्य शुरू करने से पहले कुछ मीठा खाया जाता है। ‘हलवा रस्म’ भी कुछ इसी तरह का है। हालाँकि, इसका कोई पुष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है कि इस रस्म की शुरुआत कब से हुई, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये लम्बे समय से चला आ रहा है। अब प्रश्न तो यही है कि भावी बजट कैसा होगा और ये हमारी उम्मीदों पर कितना खरा उतरेगा?

यहाँ एक बात गौर करने लायक है कि पहले बजट आने से पहले ही इस बात की सुगबुगाहट शुरू हो जाती थी कि कौन सी चीजें सस्ती हो जाएँगी और कौन सी चीजें महँगी। ऐसा जीएसटी के लागू होने से पहले हुआ करता था। जीएसटी के आने के बाद अब बजट का हमारे जीवन पर, हमारी ख़रीददारियों पर उतना असर नहीं पड़ता, जितना पहले हुआ करता था। यही कारण है कि अब बजट को लेकर आपको रोज बड़े-बड़े आर्टिकल्स पढ़ने को नहीं मिलते, जिनमें ताज़ा वित्तीय वर्ष में चीजों के सस्ते या महँगे होने की बातें होती है।

तो फिर हमारे जीवन पर बजट का क्या असर पड़ेगा? व्यक्तिगत इनकम टैक्स रेट्स और कस्टम ड्यूटीज- इन दो चीजों का एक उपभोक्ता पर सीधा प्रभाव पड़ता है। हालाँकि, बड़े स्तर पर देखें तो अर्थव्यवस्था के लिए बजट एक पॉलिसी दस्तावेज है, जिसका प्रभाव हम सब पर पड़ना लाजिमी है। वर्तमान वित्तीय वर्ष की दूसरी चौमाही में विकास दर 8% से घट कर 4.5% पर आ गया है, जो चिंता की बात है। इसमें कोई शक नहीं है कि गड़बड़ियाँ हुई हैं और इस पर लगातार चर्चा हो रही है कि क्या ग़लत हो गया? लेकिन, एक बात स्पष्ट है कि भावी बजट सारी समस्याओं के समाधान की दिशा में अहम साबित हो सकता है। ये एक मौक़ा है, एक बड़ा मौका- चीजों को ठीक करने का।

ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ नहीं कर रही। केंद्र सरकार ने अगस्त 2019 से ही कई ऐसे क़दम उठाए हैं, जिनसे बाजार में सकारात्मकता आई है और उम्मीद बंधी है कि सत्ता अर्थव्यवस्था को ठीक करने की दिशा में पहल कर रही है। साफ़ है कि बजट इस क्रम में इन प्रयासों की अगली कड़ी होगा। ये सरकार की उन नीतियों को आगे लेकर जाएगा, जिन्हें सरकार ने गिरती आर्थिक विकास दर को संभालने के लिए आजमाया है।

प्रत्येक अर्थशास्त्री, नीति विशेषज्ञ और पब्लिक पॉलिसी पर नज़र रखने वाले लोगों ने बजट को लेकर अपनी-अपनी उम्मीदों की पोटली तैयार की है। चूँकि ये बजट गिरती आर्थिक विकास दर और डगमगाती अर्थव्यवस्था के बीच आ रहा है, कड़े निर्णय लेने का ये सबसे सही समय है क्योंकि सामान्य समय में ऐसे फ़ैसले लेना मुश्किल हो जाता है। पहला क़दम ये होना चाहिए कि ड्यूटीज को न बढ़ाया जाए ताकि घरेलू उद्योगों को आगे बढ़ने का मौक़ा मिले। 1991 से पहले इसे आजमाया गया था और देश ने देखा था कि कैसे ‘नेहरुवियन इम्पोर्ट सब्स्टीट्यूट पॉलिसी’ धड़ाम से गिरी थी।

1991 के बाद जिस तरह से भारत का आर्थिक विकास दर तेज़ी से बढ़ा, उसी रफ़्तार से ग़रीबी भी कम होती गई। हालाँकि, इम्पोर्ट को लेकर एक बात समझने की ज़रूरत है। भारत इम्पोर्ट इसीलिए करता है ताकि खपत हो। इम्पोर्ट्स बढ़ा देने का अर्थ ये नहीं हो जाता कि भारतीय प्रोडक्ट्स के दाम घट जाएँगे। उदाहरण के तौर पर कार इंडस्ट्री को लीजिए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ये एक प्रतिस्पर्धी इंडस्ट्री है। मान लीजिए, अगर स्टील और रबर पर टैरिफ को बढ़ा दिया जाता है तो क्या इससे ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में कम्पटीशन कम नहीं हो जाएगा? ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।

सरकार को ट्रेड पॉलिसी को ठीक से देखना पड़ेगा और इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को ठीक करना पड़ेगा। हमें ज़रूरत है विदेशी निवेशकों को ये समझाने की कि हम ग्लोबल सप्लाई चैन का सम्मान करते हुए वैल्यू चैन को आकर्षित करने में सक्षम हैं। कृषि क्षेत्र में सरप्लस लेबर है और हमें एक ऐसा क्षेत्र चाहिए, जहाँ उनका उपयोग किया जा सके।

कर सुधार और डायरेक्ट टैक्स कोड की दिशा में एक और अहम क़दम ये है कि ‘Tax Regime’ को सिम्प्लीफाई किया जा सके। इसके लिए ‘लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स (LTCGT)’ को हटाना पड़ेगा। टैक्स रेट्स और टैक्स स्लैब्स का रेशनलाइजेशन करना होगा। काफ़ी लोग ये कहते हैं कि टैक्स दरों में कटौती से बेहतर है कि मनरेगा जैसी योजनाओं व इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यक्रमों को बढ़ाया जाए। जहाँ एक तरफ टैक्स रेट्स में कटौती का भारत की जनसंख्या के एक छोटे हिस्से पर असर पड़ेगा, वहीं दूसरी तरफ़ ये भी ध्यान रखना होगा कि इस जनसंख्या की खपत का अनुपात बेमेल है।

अब बात उठती है राजस्व टारगेट की। क्या वो इस वित्त वर्ष में पूरा हो पाएगा, अगर हम उपर्युक्त सुधार करते हैं तो? देखा जाए तो वैसे भी किसी को उम्मीद नहीं है कि हम इस वित्तीय वर्ष अपने राजस्व लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। कई विशेषज्ञों का जोर है कि अगले कुछ वर्षों में राजस्व लक्ष्य को उतनी महत्ता न देकर आर्थिक सुधारों पर जोर दिया जाए।

ये इस दशक का पहला बजट होगा और इस दशक में हमारा देश 8% की आर्थिक विकास दर को पार कर जाएगा, ये तय है। और हाँ, इसकी नींव आगामी बजट ही रखेगा- बजट 2020-21, जो आने ही वाला है। कुछ ही महीनों पहले सितम्बर 20, 2019 को वित्त मंत्री ने 21वीं सदी के सबसे बड़े कॉर्पोरेट टैक्स कट्स की ऐतिहासिक घोषणा कर के आर्थिक सुधारों की दिशा में बड़ा क़दम उठाया था।

गणतंत्र दिवस पर रोड़ जाम करने वाले 600 AMU छात्रों के ख़िलाफ अलीगढ़ पुलिस ने दर्ज किया मुकदमा

सीएए के खिलाफ AMU में चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच यूपी पुलिस ने भी उपद्रवी छात्रों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। 26 जनवरी को अपनी माँगों को लेकर आंदोलनकारी छात्रों द्वारा रोड को जाम करने वाले 600 छात्रों के खिलाफ यूपी पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है, जिसके बाद से पुलिस सीसीटीवी कैमरों की मदद से छात्रों की पहचान करने में जुट गई है।

गणतंत्र दिवस के दिन आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुँचे विश्वविद्यालय के वीसी तारिक मंसूर के खिलाफ सीएए के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारी छात्रों ने ‘गो बेक गो’ के नारे लगाते हुए उन्हें काले झंडे दिखाए थे। इस दौरान प्रॉक्टर टीम ने कार्रवाई करते हुए चार छात्रों को हिरासत में ले लिया। इसके बाद गुस्साए छात्रों ने चारों छात्रों को छोड़ने की माँग करते हुए मुरादाबाद रोड के एटा चुंगी रोड को जाम कर दिया था। वहीं छात्रों द्वारा किए जा रहे हंगामे को देखते हुए एएमयू प्रशासन ने तीन छात्रों को छोड़ दिया, लेकिन एक छात्र के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसे जेल भेज दिया था।

अब रोड जाम करने की घटना को गंभीरता से लेते हुए यूपी पुलिस ने 600 एएमयू छात्रों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है। वहीं अलीगढ़ पुलिस ने आगे की कार्रवाई करते हुए घटनास्थल के आस-पास के सभी सीसीटीवी कैमरों को खंगालना शुरू कर दिया है। सीओ सिविल लाईन अनिल समानियां के मुताबिक जाँच के आधार पर जो भी नाम सामने आएँगे उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि जिस एक छात्र को जेल भेजा गया था, उसे कोर्ट से जमानत मिल गई है, जिसे जेल से रिहा कर दिया गया है।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम CAA-विरोधी छात्रों के हंगामे की भेंट चढ़ गया था। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में 71वें गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान कुछ छात्रों ने परिसर में हंगामा कर व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश की थी। इस दौरान हंगामा कर रहे छात्रों ने कुलपति वापस जाओ (VC Go Back) के नारे लगाए और उन्हें अपना भाषण देने से रोका था। इसके बाद वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उपद्रवी छात्रों को पकड़कर समारोह स्थल से बाहर कर दिया और कुछ को हिरासत में ले लिया था। जिसके बाद आंदोलनकारी छात्रों ने उग्र होकर हिरासत में लिए गए छात्रों की रिहाई की माँग करते हुए रोड को जाम कर दिया था।


मैनफोर्स कंडोम ने बताया ‘कमरा’ और ‘कामरा’ के लिए कौन से ‘प्रिवेंशन’ अपनाएँ

सोशल मीडिया पर हर घटना के लिए क्रिएटिविटी के अलग तरीके देखने को मिलते हैं। एक ओर जहाँ आम आदमी घटना का लुत्फ़ लेते हैं वहीं, ब्रांड्स इन मुद्दों को अपने प्रोमोशन के लिए भुनाना नहीं भूलते।

कल ही कथित कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा जर्नलिस्ट अर्णब गोस्वामी के साथ इंडिगो फ्लाइट में बदतमीजी करने की घटना के बाद सोशल मीडिया पर अनेक प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं। इन्हीं में से एक है गर्भनिरोधक कंडोम निर्माता कम्पनी मैनफोर्स। मैनफोर्स ने ट्विटर पर एक पोस्टर शेयर करते हुए दिखाया है कि ‘कमरा’ और ‘कामरा’ के लिए किस तरह से सुरक्षा अपनाई जानी चाहिए। ज्ञात हो कि कंडोम का प्रयोग यौन रोगों से बचाव के लिए भी आवश्यक होता है।

दरअसल, फ्लाइट के दौरान जब कुणाल कामरा अर्णब गोस्वामी को परेशान कर रहे थे, तो बदले में अर्नब गोस्वामी ने कुछ ना कहते हुए अपने सन ग्लासेज़ और कानों में एयरफ़ोन लगाकर रखे और कुणाल कामरा को मुँह नहीं लगाया। मैनफोर्स ने इसी घटना को भुनाते हुए अपने प्रमोशनल पोस्टर बनाते हुए लिखा है कि कमरे में सुरक्षा के लिए ‘मैनफोर्स’ अपनाएँ और ‘कामरा’ से सुरक्षा के लिए अर्णब वाला तरीका यानी, कानों में एयरफ़ोन और आँखों में सन ग्लासेज़ लगाकर रखें।

सोशल मीडिया पर कुणाल कामरा द्वारा की गई हरकत का खूब मजाक बन रहा है –

इसी विषय पर ऑपइंडिया पर पढ़िए तीखी मिर्ची –

कामरा शुरू करेगा निजी विमान सेवा अर्णब-Go, सस्ते चुटकुलों पर हँसने वालों के लिए टिकट मुफ्त

ममता के बंगाल में मेरी किसी भी दिन की जा सकती है हत्या: पद्म पुरस्कार विजेता काजी मासूम अख्तर

हाल ही में बंगाल के पाँच पद्म पुरस्कार विजेताओं में से एक मुस्लिम शिक्षक ने अपने जीवन को लेकर डर ज़ाहिर किया है। उन्होंने कहा कि बंगाल में मेरी किसी भी समय हत्या की जा सकती है, क्योंकि राजनीतिक तुष्टीकरण की नीति के कारण आरोपित खुले आम घूम रहे हैं।

हाल ही में मोदी सरकार ने बंगाल के पाँच लोगों को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया है, जिसमें से बंगाल के काजी मासूम अख्तर को साहित्य व शिक्षा के लिए भारत के चौथे बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। अख्तर ने कहा कि पद्म श्री मिलना एक नैतिक जीत है, लेकिन मैं आज भी अदालत में हमले का मुकदमा लड़ रहा हूँ और ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार की तुष्टिकरण की नीतियों के कारण मेरा उत्पीड़न करने वाले आरोपित स्वतंत्र रूप से घूम रहे हैं और यही कारण है कि मुझे न्याय नहीं मिल रहा है। इसीलिए मुझे अभी भी अपने जीवन को लेकर डर है और किसी भी दिन मेरी हत्या की जा सकती है, लेकिन मैं सच बोलना जारी रखूँगा

अख्तर ने बंगाल और देश के कई हिस्सों में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर बोलते हुए कहा कि इसके बारे में भारतीय मुस्लिमों को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इस कानून को संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया है। राज्यसभा में भाजपा के पास बहुमत नहीं था, तो गैर-भाजपा दलों ने उनका समर्थन किया, लेकिन वही पार्टियाँ अब अपने निहित राजनीतिक हितों के लिए सीएए के खिलाफ हो रहे विरोध को हवा दे रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि मुझे बहुत आश्चर्य होता है जब मैं उन्हीं लोगों को देखता हूँ, जिन्होंने मेरे छात्रों को राष्ट्रगान गाने के लिए कहने पर लाठी-डंडों से मारा, अब वही लोग राष्ट्रीय झंडे के साथ प्रदर्शन स्थलों पर बैठे हैं और वही राष्ट्रगान गा रहे हैं। यह एक मज़ाक है। अख्तर ने आरोप लगाते हुए कहा कि राजनीतिक दल मेरे समुदाय को पीछे धकेल रहे हैं और उनका उपयोग केवल राजनीतिक प्यादे के रूप में कर रहे हैं। उनका पूरी तरह से ब्रेनवॉश कर उन्हें सार्वजनिक संपत्ति को आग लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और फिर राष्ट्रगान गाने के लिए कहा जाता है।

द प्रिंट की खबर के मुताबिक 49 वर्षीय शिक्षक मासूम अख्तर द्वारा मदरसे के बच्चों को राष्ट्रगान गाने के लिए कहने को लेकर 26 मार्च 2015 को कुछ कट्टरपंथियों द्वारा लाठी और डंडों से हमला किया गया था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अस्पताल में भी उनके साथ फिर से मारपीट की गई और गँभीर रूप से घायल कर दिया गया। अख्तर का कहना है कि उन्होंने घटना के तुरंत बाद 26 मार्च 2015 को राजाबगान पुलिस स्टेशन में एक प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिस पर पुलिस द्वारा आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

काजी मासूम अख्तर द्वारा थाने में कराई गई FIRकी कॉपी (साभार- द प्रिंट)

अख्तर ने बताया कि पिछले पाँच वर्षों में मैंने अलीपुर अदालत में तीन याचिकाएँ दायर की हैं। अदालत ने जाँच अधिकारियों से मेरे मामले में कार्रवाई करने के लिए भी कहा, लेकिन पुलिस ने एक रिपोर्ट दर्ज की और कहा कि आरोपित व्यक्ति फरार थे। हालाँकि 10 जनवरी को अदालत ने दोषियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था।

वैसे शिक्षक मासूम अख्तर कई बार कट्टरपंथियों के निशाने पर आए। 2018 में काजी मासूम अख्तर ने मुस्लिम महिलाओं के लिए ट्रिपल तलाक़ के खिलाफ एक लाख लोगों के हस्ताक्षर लेकर सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा था, ताकि ट्रिपल तलाक़ कानून से हो रहे महिलाओं के ऊपर अत्याचार को रोका जाए, लेकिन दिल्ली से लौटने के बाद मुस्लिम कट्टरपँथी ने उनके और उनके पिता को यह कहते हुए जान से मारने की धमकी दे डाली कि आप शरिया के खिलाफ काम कर रहे हैं। इसके बाद आज तक मासूम अख्तर अपने घर नहीं जा सके।

इसके बाद अख्तर को मदरसे में प्रधानाध्यापक के पद से हाथ धोना पड़ा था। मुस्लिम मौलवियों के एक वर्ग ने उनके खिलाफ याचिका दायर की जिसमें कहा गया था कि वह छात्रों को गुमराह करने का प्रयास कर रहे थे और राष्ट्रगान गाकर और ‘इस्लाम विरोधी’ अखबार और किताबें, गीत लिखकर धर्म का अपमान कर रहे थे। आपको बता दें कि अपने समुदाय से बहिष्कृत अख्तर अभी जादवपुर में एक सरकारी स्कूल के हेडमास्टर हैं। विडम्बना यह है कि वही ममता बनर्जी सरकार जिस पर वो हमलावरों की रक्षा करने का आरोप लगाते हैं उसने ही उन्हें 2017 में ‘सर्वश्रेष्ठ शिक्षक’ का पुरस्कार दिया था।

काजी मासूम अख्तर को ‘सर्वश्रेष्ठ शिक्षक’ पुरस्कार से सम्मानित करतीं सीएम ममता बनर्जी