Home Blog Page 5149

जब कॉन्ग्रेस की भरी सभा में हुआ बीमार सुभाष चंद्र बोस का अपमान, नेहरू-गाँधी ने छोड़ दिया था साथ

1939 में आज (जनवरी 29) के दिन ही सुभाष चंद्र बोस को दुबारा कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था। प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी बोस का कॉन्ग्रेस में कोई तोड़ न था और जैसे ही उन्होंने दुबारा अपनी उम्मीदवारी घोषित थी, गाँधीजी सहित उनके खेमे के कई नेताओं में हलचल सी मच गई। गाँधीजी कई कारणों से बोस को दुबारा कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के रूप में नहीं देखना चाहते थे। बोस-गाँधी आजीवन एक-दूसरे का सम्मान करते रहे लेकिन 1938-39 का यह वो दौर था, जब गाँधीजी और सुभाष- दो अलग-अलग गुट में थे, वैचारिक तौर पर दो अलग-अलग धुरी पर थे। पर हाँ, लक्ष्य दोनों के एक ही थे- भारत की आज़ादी।

इस आज़ादी की कई कीमतें चुकाई गई हैं और उन में से एक है बोस का कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देना। इसके पीछे की कहानी शुरू होती है 1938 में बोस द्वारा कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित करने के साथ। जवाहरलाल नेहरू उस समय छुट्टियाँ मनाने यूरोप के लम्बे दौरे पर गए हुए थे। इस दौरान उन्होंने स्पेन का भी दौरा किया था। नवंबर में नेहरू के छुट्टियों से वापस लौटने के बाद गाँधीजी ने उन्हें सुभाष के ख़िलाफ़ मैदान में उतरने को कहा लेकिन नेहरू ने मना कर दिया। जवाहरलाल नेहरू अपने पिता की तरह ही, इस से पहले दो बार कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रह चुके थे।

सुभाष चंद्र बोस भी यह दिखा देना चाहते थे कि वो भी नेहरू पिता-पुत्र (मोतीलाल-जवाहरलाल) की तरह दुबारा कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बन सकते हैं। यह चुनाव अब उनके लिए प्रतिष्ठा का विषय भी बन चुका था। बोस गाँधीजी का इतना सम्मान करते थे कि उन्हें देश का सबसे बड़ा नेता मानते थे। गाँधी खेमे के विरोध से व्यथित बोस के उस समय के बयानों से यह भी प्रतीत होता है कि वह चाहते थे कि चुनाव हार जाएँ। अपनी पत्नी एमिली शेंकल को भेजे गए पत्र में बोस ने लिखा है:

“यद्दपि अध्यक्ष के रूप में मेरे दुबारा चुने जाने की एक बहुत ही सामान्य इच्छा है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं दुबारा अध्यक्ष बन जाऊँगा। एक तरह से मेरा दुबारा अध्यक्ष न चुना जाना बेहतर रहेगा। क्योंकि, तब मैं अधिक स्वतंत्र रहूँगा और मेरे पास स्वयं के लिए अधिक समय होगा।”

बोस के इस पत्र से यह साफ़ प्रतीत होता है कि एक तरह से उनके अध्यक्ष बनने की इच्छा मर चुकी थी। लोग मानते हैं कि गाँधी खेमे के विरोध की व्यथा इसके पीछे का कारण थी। यह पत्र 4 जनवरी, 1939 को लिखा गया था। उसी वर्ष आज (जनवरी 29) के ही दिन परिणाम आए। मतगणना पूर्ण होने के बाद यह तय हो गया कि कॉन्ग्रेस के अगले अध्यक्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस होंगे। गांधीजी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैय्या को हार का सामना करना पड़ा। नेताजी को 1,580 मत पड़े, वहीं पट्टाभि को 1,377 मत मिले। जीत का अंतर कम था लेकिन विजय साफ़ थी। मत पूरे देश में एकरूपता से बँटे हुए थे और नेताजी साफ़-साफ़ विजेता के तौर पर चुन कर आए।

जनवरी 29, 1939 को नेताजी दुबारा कॉन्ग्रेस अध्यक्ष चुने गए। पट्टाभि एवं नेताजी ने एक-दूसरे को टेलीग्राफ भेजकर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया। पट्टाभि ने नेताजी को उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। लेकिन शायद चुनाव के दौरान हुए विरोध को नेताजी भूल नहीं पा रहे थे। अव्वल तो यह, कि गाँधीजी ने पट्टाभि की हार व्यक्तिगत झटके के तौर पर ले लिया था और उन्होंने इसे अपनी व्यक्तिगत हार कहा था। गाँधीजी ने बोस की जीत पर भावनात्मक टिप्पणी करते हुए अपने बयान में कहा:

“मैं उसके तथ्यों और घोषणापत्र में दी गई दलीलों (सुभाष के) को नहीं मानता। फिर भी, मैं उनकी जीत से प्रसन्न हूँ। अगर मैं निश्चित सिद्धांतों और नीतियों का प्रतिनिधित्व नहीं करता, तो मैं कुछ भी नहीं हूँ। इसीलिए मेरे लिए यह स्पष्ट है कि डेलीगेट्स उन सिद्धांतों का अनुमोदन नहीं करते, जिनके लिए मैं खड़ा हूँ।”

गाँधीजी ने तो यहाँ तक कहा कि कॉन्ग्रेस अब ‘भ्रष्ट’ होते जा रही है। 30 से भी अधिक पुस्तकें लिख चुके मिहिर बोस बताते हैं कि गाँधीजी ने एक तरह से युद्ध की घोषणा कर दी थी। अहिंसा के पुजारी ने हर एक राजनीतिक अस्त्र का उपयोग किया, जिस से उनकी सत्ता हिलाने वाले बोस को परास्त किया जा सके।

सुभाष गाँधीजी की काफ़ी इज्ज़त करते थे। अगर ऐसा नहीं होता, तो वह गाँधीजी से मिलने वर्धा नहीं जाते। रूठे गाँधी को मनाने के लिए बोस ने एक बार फिर वर्धा जाने का मन बनाया लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंज़ूर थी। कॉन्ग्रेस के अंदर चल रहे विरोध और गॉँधीजी के गुस्से के काऱण बोस जीत कर भी ख़ुश नहीं थे। प्रसिद्ध लेखक नीरद चौधरी बताते हैं कि बोस की बीमारी का कारण तनाव था। वह तनाव, जो उन्हें तल्कालिन राजनीतिक परिस्थितियों ने दिया था। यह वो तनाव था, जो एक मज़बूत नेता के जीतने के बाद कॉन्ग्रेस की राजनीतिक अस्थिरता ने उन्हें दिया था। नेताजी को पहले से ही कुछ छोटी-मोती बीमारियाँ थीं, जो अक्सर अपना सर उठाया करती थीं। लेकिन, ताजा हालात ने आग में घी का काम किया।

नेताजी को उनकी जीत के 2 सप्ताह बाद, यानी 16 फरवरी, 1939 को बीमारियों ने घेरा था। वह कोलकाता लौट गए, लेकिन बीमारियों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उन्हें काफ़ी सरदर्द (Splitting Headache) होते। शाम होते-होते उनका बुख़ार बढ़ने लगता और 6 बजते ही अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता। इसके बाद उन्हें तेज़ पसीना चलता और धीरे-धीरे बुख़ार उतर जाता। डॉक्टर्स को भी कुछ ख़ास पता नहीं चल पा रहा था। वो एक-दो दिन के लिए ठीक भी होते, लेकिन फिर उनकी हालत जस की तस हो जाती। बाद में कई जॉंच के बाद पता चला था कि उन्हें लिवर में Bronchia-Pneumonia नामक बीमारी हो गई थी। साथ ही, उनके आँत में भी संक्रमण हो गया था।

नेताजी की बीमारी के दौरान आने वाली शुभकामनाओं, पत्रों और टेलीग्राम्स ने उन्हें अभिभूत कर दिया था। एक संस्कृत का प्रोफ़ेसर जब उनका हालचाल लेने आया, तो उन्हें कहा कि नेताजी पर किसी ने ‘मरण क्रिया’ नामक तंत्र विद्या का प्रयोग किया है। बोस आधुनिक सोच रखते थे और अंधविश्वासी तो बिलकुल ही न थे, लेकिन लोगों का प्यार ऐसा था कि उन्हें ताबीज़ पहनने को भी मज़बूर होना पड़ा। ‘मरण क्रिया’ वाली बात सुन कर बोस को एक पल के लिए ‘डरावने विचार’ भी महसूस हुए, ऐसा उन्होंने ख़ुद कहा था।

जवाहरलाल नेहरू इस पूरे मामले में निष्पक्ष बने रहे। उन्होंने वर्धा जाकर गाँधीजी से मुलाक़ात की और उन्हें समझाने-बुझाने की कोशिश की, लेकिन सब बेकार। गाँधीजी के कहने पर चुने गए सारे डेलीगेट्स ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया। नेहरू ने इंतज़ार करना उचित समझा, लेकिन बाद में उन्होंने भी इस्तीफ़ा दे दिया। नेहरू के अलावे बाकियों ने सामूहिक तौर पर इस्तीफ़ा दिया था। उस वक़्त नेशनल हेराल्ड में लिखे एक लेख में नेहरू ने अपने इस्तीफ़े की बात एक तरह से सच और एक तरह से झूठ बताया था।

22 फरवरी के दिन त्रिपुर में कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक तय थी। बीमार बोस ने सरदार पटेल को टेलीग्राम भेज कर बैठक की तारीख़ आगे बढ़ाने का निवेदन किया। उन्होंने सरदार को अन्य नेताओं से बात कर इस बारे में विचार करने को कहा। इसके बाद जो घटनाक्रम शुरू हुआ, उसने देश के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक को पदच्युत कर दिया। 11 डेलीगेट्स ने महात्मा गाँधी के कहने पर अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया। उनके बयान ख़ुद गाँधीजी ने ड्राफ्ट किए थे। वर्किंग कमिटी के सदस्यों में गाँधीजी के अनुयायियों को नेताजी ने ‘निम्न बौद्धिक स्तर’ वाला लोग कहा था।

वर्किंग कमेटी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनके भाई शरत चंद्र बोस अकेले रह गए। कॉन्ग्रेस की बैठक स्थगित नहीं हुई, सो अलग। बीमारी की हालत में नेताजी को त्रिपुर आना पड़ा। स्ट्रेचर पर उन्हें कॉन्ग्रेस के सेशन में लाया गया। उनकी हालत उस समय यह थी कि एक व्यक्ति उन्हें पंखा झेल रहा था तो दूसरा उनके सर पर ‘आइस क्यूब्स’ डाल रहा था। ऊपर से कॉन्ग्रेस की हवा इतनी ज़हरीली हो चुकी थी कि कुछ कार्यकर्ताओं ने बीमार नेताजी का भी अपमान किया। जब उन्हें स्ट्रेचर पर लाया जा रहा था, तब एक कॉन्ग्रेसी ने चीख कर कहा-“आप इस बात की जाँच क्यों नहीं करते कि कहीं उन्होंने अपने बगल में प्याज तो नहीं दबा रखा है? प्याज शरीर का तापमान बढ़ा देते हैं।”

महात्मा गाँधी ने इतना होने के बावज़ूद त्रिपुर जाना उचित नहीं समझा और हज़ारों मील दूर राजकोट में ही रहे। अव्वल तो ये, कि उन्होंने इस राजनैतिक संकट का हल ढूँढने के लिए ‘आमरण अनशन’ की घोषणा कर दी। गाँधीजी की इस घोषणा का अर्थ था, मीडिया और पब्लिक ओपिनियन का डाइवर्ट हो जाना। गाँधीजी स्वयं तो त्रिपुर में न थे, लेकिन उनके प्यादों ने सुभाष बाबू को नीचे दिखाने के हरसंभव प्रयास किए। 2 लाख लोगों की उपस्थिति में बोस को अपने राजनैतिक जीवन का पहला झटका लगा। उस घटना ने भारतीय राजनीति की दशा एवं दिशा- दोनों को बदल कर रख दिया।

बोस भाषण देने की हालत में भी नहीं थे। उनका भाषण उनके भाई शरत ने पढ़ा। उस भाषण में भी अंग्रेजों के लिए ललकार था, गाँधीजी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना थी। एक प्रस्ताव लाकर बोस को गाँधीजी की इच्छानुसार वर्किंग कमेटी बनाने को कहा गया। कॉन्ग्रेसी नेताओं ने बोस पर विश्वास करने को एक टूटी नाव में नर्मदा नदी को पार करने के समान बताया। ऐसी परिस्थितियों में नेताजी ने इस्तीफ़ा देना उचित समझा। अपमान सह कर पद पर बने रहना उनके सिद्धांतों में न था। गाँधीजी जैसे नेता को नाराज़ रख कर भी वह कॉन्ग्रेस की सत्ता की धुरी नहीं बने रहना चाहते थे।

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी से नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इस्तीफ़ा देना पड़ा। ये शायद देश का नुक़सान था, कॉन्ग्रेस पार्टी का नुक़सान था। उसके बाद की कहानी अधिकतर लोगों को पता है। फ़िल्मों में दिखाया जा चुका है, कई पुस्तकों में लिखा जा चुका है, कई लेखों में वर्णित हो चुका है। लेकिन, हमने आपको परतंत्र भारत के एक ऐसे अध्याय से परिचय कराने का प्रयास किया है, जिसका भारतीय राजनीति में आज भी प्रभाव है।

References:

  1. Raj, Secrets, Revolution: A Life of Subhas Chandra Bose (By Mihir Bose)
  2. The Bose Brothers and Indian Independence: An Insider’s Account (By Madhuri Bose)
  3. Letters To Emilie Schenkl 1934-1942 (By Subhas Chandra Bose)

मंच पर बैठे कॉन्ग्रेस MLA की कुर्सी के नीचे फटा बम, विधायक के बेटे मोहम्मद नलपड का गंभीर आरोप

बेंगलुरु के विवेक नगर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुए ब्लास्ट के कारण विधायक एनए हरीश घायल हो गए। उनके पाँव में ख़ासी चोट आई है। ये हादसा एक प्राइवेट कार्यक्रम के दौरान हुआ। बुधवार (जनवरी 22, 2020) को ये हादसा सुबह 8:30 में हुआ, जब विधायक मंच पर मौजूद थे। इस घटना में 4 अन्य लोग भी घायल हुए हैं, जिन्हें बेंगलुरु के फिलोमेना हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। 53 वर्षीय कॉन्ग्रेस विधायक जब मंच पर थे, तभी उनके बगल में कुछ आकर गिरा और ब्लास्ट हो गया

पुलिस को आशंका है कि वो कोई पटाखा हो सकता है। आगे की जाँच की जा रही है। घटना के तुरंत बाद एसीपी और डीसीपी ने घटनास्थल का दौरा किया। फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स ने क्षेत्र का जायजा लिया, जिसके बाद पुलिस ने पूरे क्षेत्र में तलाशी ली। वहीं विधायक के बेटे मोहम्मद नलपड ने आरोप लगाया कि उनके पिता की कुर्सी के नीचे कोई संदिग्ध वस्तु रख दी गई थी। उन्होंने जानकारी दी कि उनके पिता के पाँव में चोट आई है, वहीं उनके एक मित्र के हाथ में चोट पहुँची है। इस बारे में किसी ने कुछ नहीं बताया है कि इस घटना के पीछे किसका हाथ हो सकता है?

वहीं पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि ये पटाखे से हुए ब्लास्ट था। डीसीपी ने कहा कि कार्यक्रम में कुछ पटाखे ख़राब हो गए थे, जो बाद में ब्लास्ट हो गए। डीसीपी ने विधायक से मुलाक़ात के बाद मीडिया से बातचीत की। शांतिनगर क्षेत्र में विधायक हरीश लीजेंडरी तमिल अभिनेता व तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजीआर की जन्म शताब्दी समारोह में हिस्सा ले रहे थे।

पुलिस ने मंगलुरु एयरपोर्ट से एक जिन्दा बम बरामद किया था, जिससे वहाँ के लोगों अभी भी डरे हुए हैं। गणतंत्र दिवस के कारण पुलिस पहले से ही सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्क है और ख़ासकर बेंगलुरु में विशेष एहतियात बरती जा रही है।

वर्ष 2008 से लेकर अब तक हरीश 3 बार शांतिनगर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। 2018 विधानसभा चुनाव के बाद उन्होंने बेंगलुरु मेट्रोपोलिटन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया था। हाल ही में विधायक तनवीर सैत पर भी मैसूर में एक शादी समारोह के दौरान हमला किया गया था। उनकी गर्दन पर चाकू से वार किया गया था। उस मामले में 8 लोग गिरफ़्तार किए गए थे।

मैं CAA पर अमित शाह के साथ बहस करूँगी: कागज़ देख कर भाषण देने वाली मायावती की चुनौती

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अमित शाह को चुनौती दी है कि वो नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ बहस करेंगी। जहाँ एक तरफ़ शाह पूरी तैयारी के साथ संसद में जाते हैं और हर एक सांसद के सवालों के जवाब देते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ मायावती प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर रैलियों तक, अपना भाषण कागज़ देख कर पढ़ने के लिए जानी जाती हैं।

मायावती के इस बयान का लाखों ने सोशल मीडिया पर ख़ूब मखौल उड़ाया। बसपा सुप्रीमो ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार पूरे देश भर में चल रहे आन्दोलनों के कारण परेशान हो गई है। बकौल मायावती, पूरे देश में महिला और युवा इस क़ानून के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं।

लखनऊ के रामकथा पार्क में सीएए के समर्थन में आयोजित रैली को संबोधित करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर निशाना साधा था। सीएए का विरोध करने वाले इन सभी नेताओं को उन्होंने ललकारा कि यदि इस कानून की कोई भी धारा से किसी की नागरिकता छीनी जा सकती है तो वह मुझे दिखाइये।

उन्हें चुनौती दी कि यदि उनमें हिम्मत है तो इस कानून पर बहस करने के लिए सार्वजनिक मंच ढूँढे। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने कहा कि वो बहस के जरिए सीएए विरोधी नेताओं के साथ मुकाबला करने के लिए तैयार हैं।

महिला आयोग पहुँची पीड़िता बोली- ‘शौहर ने कहा- अब्बा जवान है, सहयोग करो, उन्हें खुश रखना तुम्हारा फर्ज’

बिहार राज्य महिला आयोग में पहुँची एक पीड़िता मुस्लिम महिला ने बताया कि उसका शौहर उसे ससुर का सहयोग करने के लिए कहता है। वह कहता है कि अब्बा जवान हैं, उनका सहयोग करो, नहीं तो तलाक दे देंगे। ऐसा नहीं करने पर वह मेरे साथ मारपीट करते हैं। इससे परेशान मुस्लिम महिला ने अपने शौहर और ससुर के ख़िलाफ महिला आयोग में शिकायत की है।

बुधवार को बिहार राज्य महिला आयोग पहुँची पटना सिटी की नौशाबा खातून ने अपने शौहर और ससुर के खिलाफ शिकायत की। आयोग की सदस्य प्रतिमा के सामने पटना सिटी की रहने वाली पीड़िता ने बताया कि उसका निकाह 2012 में मुजफ्फरपुर के निवासी मोहम्मद जाफर के साथ हुआ था, जो कि दरभंगा में ही फ्रीज बनाने का काम करता है। निकाह के बाद पीड़िता नौशाबा अपने शौहर के साथ दरभंगा में रहने लगी है, लेकिन सास के इंतकाल के बाद पति उसे ससुराल लेकर गया, जहाँ वो कुछ दिनों तक रह कर वापस आ गई है।

पीड़िता के मुताबिक, वापस आने के बाद शौहर के बर्ताव में काफी बदलाव आया और वो हमेशा उसे ससुराल जाकर रहने को कहने लगा। इतना ही नहीं मना करने पर मार-पीट भी करने लगा। इस दौरान बीते साल ईद के त्यौहार पर ससुराल गई, तो पति ने उसे वहीं छोड़ दिया। उस वक्त ससुर पीड़िता को अकेला देखकर कभी देर रात रूम पर आ जाते, तो कभी बाथरूम में कपड़े धोते वक्त पीछे खड़े रहते। इतना ही नहीं ससुर मुझे अपना जूठा खाना खाने को कहते औऱ बोलते थे कि मेरा जूठा खाओगी तो मुझसे मुहब्बत हो जाएगी।

पीड़िता ने इस बात की शिकायत अपने शौहर से की तो उसने पहले तो मोबाईल छीन लिया और कहा कि मेरा अब्बा जवान है उनका सहयोग करो, अब्बा को खुश रखना तुम्हारा फर्ज है। वरना तुमको तलाक दे देंगे। इसके बाद किसी तरह से पीड़िता अपने मायके और वहाँ से राज्य महिला आयोग को दोनों के खि़लाफ लिखित में शिकायत देकर न्याय की गुहार लगाई। पीड़िता ने यह भी बताया कि मेरे ससुर का दो निकाह हुआ था और उनकी दोनों पत्नियाँ ही अल्लाह को प्यारी हो गयी।

‘माँ’ की दुकानदारी, शायरी से कट्टरपंथियों को उकसाने वाले मुनव्वर के भीतर की घृणा कुछ ऐसी है

‘माँ’ की शायरी करने वाले मुनव्वर राना वास्तविक रूप में महिलाओं की कितनी इज्जत करते हैं, ये उनके ताज़ा व्यवहार से पता चलता है। शायर मुनव्वर राना ने ‘न्यूज़ नेशन’ पर बात करते हुए सरकार से पूछा कि आप कितने मुनव्वर राना को अंदर करेंगे, कई और मुनव्वर राना पैदा हो जाएँगे। आश्चर्य की बात तो ये है कि मुनव्वर राना कई सालों से मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मुखर रहे हैं। मुनव्वर राना ख़ुद को फ़क़ीर बताते हैं और कहते हैं कि सरकार उनकी बेटियों को जेल भेजना चाहती है।

क्या क़ानून तोड़ने की इजाजत किसी को दी जा सकती है? इस सवाल पर मुनव्वर राना ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिमों के ख़िलाफ़ फैसला दिया तो समुदाय विशेष वाले चुप रहे और बगावत नहीं की। मुनव्वर राना दरअसल एहसान जताना चाहते हैं कि देखो राम मंदिर के पक्ष में फ़ैसला आया, फिर भी हमने उत्पात नहीं मचाया। एंकर ने जब मुनव्वर राना से सवाल पूछा तो उन्होंने उसे भाजपा का सदस्य बता दिया और कहा कि ये बुरी बात है। न्यूज़ एंकर हिमानी नैथानी को मुनव्वर राना ने लगातार अपमानित किया।

मुनव्वर ने एंकर की सवालों का जवाब देते हुए आरोप लगाया कि हिमानी पढ़ी-लिखी नहीं हैं और उन्हें चीखने के लिए रुपए मिलते हैं। मुनव्वर राना ने महिलाओं के साथ आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग करते हुए कहा- “मैं आप जैसी हज़ारों लड़कियों को पढ़ाता हूँ।” हिमानी ने सवाल उठाया कि ख़ुद की बेटियों पर एफआईआर के लिए सरकार को कोसने वाले मुनव्वर एक दूसरी लड़की के साथ इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो ग़लत है। मुनव्वर राना बार-बार पूछने पर भी ये नहीं बता पाए कि ‘तुम्हारे जैसी लड़की’ से उनका क्या अभिप्राय था और उन्होंने उन्हें ‘भाजपा का एजेंट’ क्यों कहा?

मुनव्वर राना ने हिमानी की शिक्षा और समझ पर सवाल उठाते हुए कहा कि वो किसी सीनियर को उनके साथ बहस के लिए भेजें क्योंकि वो उनके साथ बहस नहीं करेंगे। बाद में मुनव्वर राना ने एंकर को ही ‘बेहूदगी’ करने वाली बता दिया और कहा कि उनका चैनल जो करना चाहता है, कर ले। बाद में मुनव्वर राना डिबेट से भाग गए और फिर ‘दलाल’ शब्द का प्रयोग किया।

UP में नहीं चलेगा कश्मीर की आज़ादी वाला नारा, महिलाओं को सड़क पर छोड़ रजाई में सो रहे प्रदर्शनकारी: CM योगी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करके लोगों को परेशानी में डालने वालों पर करारा हमला बोला है। उनका इशारा उन लोगों पर था, जो महिलाओं व बच्चों को आगे करके ख़ुद घर में आराम कर रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कटाक्ष करते हुए कहा कि ये लोग इतने निकम्मे हो गए हैं कि ख़ुद घर में रजाई में सो रहे हैं और महिलाओं को सड़क पर बैठने के लिए छोड़ दे रहे हैं। उन्होंने ये बात कानपुर में सीएए के समर्थन में आयोजित एक रैली में कही। नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में उन्होंने एक बड़ी भीड़ को सम्बोधित किया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का इशारा शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों की ओर था, जिनके कारण इलाक़े के हज़ारों-लाखों लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी हो रही है और दफ्तर जाने वाले लोगों को अतिरिक्त चार घंटे लग जा रहे हैं। स्थिति ये है कि आश्रम से होकर जाने वाली सड़कों पर गाड़ियों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। इसी तर्ज पर लखनऊ में भी प्रदर्शन किया जा रहा है लेकिन वहाँ पुलिस ने उपद्रवियों को चेता दिया है कि क़ानून-व्यवस्था में किसी भी प्रकार का खलल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

सीएए को लेकर मुख्यमंत्री ने कहा कि शरण में आए लोगों की रक्षा करना भारत की परम्परा रही है। सीएम ने कहा कि प्रदर्शनकारी महिलाओं से पूछने पर वो पोल खोलती हैं कि उनके घर के पुरुष कहते हैं कि अब वो विरोध प्रदर्शन में सक्षम नहीं हैं, इसीलिए आप धरने पर जाकर बैठो। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि सीएए विरोधियों के लिए हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिखों का कोई महत्व नहीं है। सीएम योगी ने कहा कि कॉन्ग्रेस के लिए अब ईसाईयों का भी कोई महत्व नहीं है। उन्होंने आगे कहा:

“लोकतंत्र में शांति से धरना प्रदर्शन करने का सबका अधिकार है लेकिन कोई सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान करेगा तो वसूली होगी। उत्तर प्रदेश की धरती पर कश्मीर वाले आजादी के नारे लगाने पर देशद्रोह का केस लगेगा। आज विपक्ष दुश्मनों की भाषा बोल रहा है। जब पीएम ने कह दिया है कि सीएए का एनआरसी से संबंध नहीं है, फिर भी लोग अपनी महिलाओं और बच्चों को आगे भेज रहे हैं।”

मुख्यमंत्री योगी ने इस दौरान महाभारत का भी उदाहरण दिया। भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण वाली घटना का जिक्र करते हुए सीएम ने कहा कि उसके लिए वहाँ उपस्थित हर कोई बराबर का दोषी था। उन्होंने कहा कि अपराध में सहयोग करने वाला भी बराबर का दोषी होता है, इसीलिए अब मौन त्याग कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन का वक़्त आ गया है।

आपने पूरी ज़िदगी जिन पदार्थों का सेवन किया उनका असर है: ‘फ्रस्ट्रेटेड’ नसीर को अनुपम खेर ने दिया दो-टूक जवाब

नसीरुद्दीन शाह ने अपने हालिया इंटरव्यू में अनुपम खेर को मनोरोगी, सिरफिरा से लेकर कई बातें कही तो अनुपम खेर ने शाह को करारा जवाब देते हुए कहा कि आपने अपनी पूरी ज़िदगी फ्रस्टेशन में गुजारी है, इतना ही नहीं हम सब वर्षों से जानते हैं कि आप जिन पदार्थों का सेवन करते हैं, उसके चलते आप निर्णय नहीं कर पाते कि देश में क्या सही है और कहा ग़लत है।

गौरतलब बीते दिनों एक पोर्टल को दिए साक्षात्कार में वरिष्ट अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने अभिनेता अनुपम खेर पर निशाना साधते हुए कई व्यक्तिगत टिप्पणियाँ भी की थीं। जिसके बाद बुधवार को फ़िल्म अभिनेता अनुपम खेर ने ट्विटर पर अपना एक वीडियो बयान शेयर करते हुए शाह को जवाब दिया, “मैं आपकी बातों को गंभीरता से नहीं लेता, लेकिन कई बार कुछ बातों का दो टूक जवाब देना जरूरी हो जाता है। आपने अपनी पूरी ज़िदगी इतनी कामयाबी मिलने के बाद भी फ्रस्टेशन में गुजारी, आप दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, शाहरुख ख़ान, विराट कोहली जैसे महान चेहरों की आलोचना कर सकते हैं, तो मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि मैं सही संगत में हूँ। यह तो तब है कि जब इन्होंने कभी आपको गंभीरता से नहीं लिया।”

खेर ने अपने जवाब में आगे शाह पर तीखा टिप्पणी करते हुए कहा, “हम सब जानते हैं आप वर्षों से जिन पदार्थों का सेवन करते हैं, उनकी वजह से क्या सही है और क्या ग़लत है, आपको इसका अंतर ही पता नहीं लगता। मेरी बुराई करके आप एक-दो दिन सुर्खियों में आ सकते हैं, तो मैं आपको ये खुशी भेंट करता हूँ। आप नहीं जानते मेरे ख़ून में क्या है? मेरे ख़ून में है हिंदुस्तान, इसे समझ जाइए बस, जय हो।”

बता दें कि वरिष्ठ फ़िल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कहा था कि अगर उनका 70 साल भारत में रहना और यहाँ अपने मन मुताबिक़ वो सभी काम करना जिससे वो प्यार करते हैं- ये सब अगर उनके यहाँ के होने की निशानी नहीं है तो फिर क्या है? नसीरुद्दीन शाह ने इस दौरान भारत के बड़े फ़िल्मी सितारों पर सीएए को लेकर चुप्पी साधने का भी आरोप लगाया।

प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ को दिए गए इंटरव्यू में नशीरुद्दीन शाह ने फ़िल्म अभिनेता अनुपम खेर पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए कहा था कि एनएसडी से अनुपम खेर के साथ पढ़ा कोई भी व्यक्ति इस बात की पुष्टि कर सकता है कि वो एक मनोरोगी हैं और उनके ख़ून में ही मनोरोगी वाली प्रकृति है। इतना ही नहीं शाह ने आगे इंटरव्यू में कहा कि अनुपम खेर एक जोकर हैं और उन्हें गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है।

बता दें कि अनुपम खेर अक्सर वामपंथी गैंग की ख़बर लेते रहते हैं, जिसके कारण शाह जैसे लोग उनसे नाराज़ रहते हैं। एफटीआईआई के अध्यक्ष रहे अनुपम खेर भारत व विदेश की कई भाषाओं की मनोरंजन इंडस्ट्री में काम कर चुके हैं और आज भी वो अपने काम में खासे व्यस्त रहते हैं। इतना ही नहीं खेर अब तक 500 से भी अधिक फ़िल्मों में विभिन्न प्रकार के किरदार अदा कर चुके हैं।

जहाँ तक बात करें नसीरुद्दीन शाह की, तो वे मोदी सरकार के ख़िलाफ़ कई बार अनाप-शनाप बयान दे चुके हैं। नसरुद्दीन ने इस दौरान जेएनयू जाकर पब्लिसिटी स्टंट करने वाली अभिनेत्री दीपिका पादुकोण की ख़ूब तारीफ की। उन्होंने कहा कि आवाज़ उठाने के लिए दीपिका जैसी हिम्मत चाहिए।

शाहीन बाग की औरतें: कब माँगेंगी हलाला से, माहवारी आते ही निकाह कर देने की रवायत से आजादी

भारत में मुस्लिमों में निरक्षरता की दर सबसे अधिक है। करीब 43 प्रतिशत। उससे भी दयनीय स्थिति है मुस्लिम महिलाओं की। दो दशक पहले तक भारत में मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता का दर 5 प्रतिशत से भी कम था। आज बदलते वातावरण ने और सरकार के प्रयासों ने इन्हें करीब 30 प्रतिशत के लगभग पहुँचाया है। हालाँकि, ये पर्याप्त नहीं हैं। लेकिन फिर भी सराहनीय है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक स्थिति पर बात हमेशा रूढ़िवादी मजहबी पैरोकारों द्वारा तय किए पैमानों के आधार पर की जाती है और मुस्लिम महिलाएँ इसे ही अपना हकूक समझती हैं। इस्लामिक पैरोकार उनके लिए जिन चीजों की परिभाषा तय करते हैं, वो उसी के आधार पर अपने सपने बुनती हैं। उसी की जमीन पर अपनी सीमा तय करती हैं। और, उसी की सीमा में रहकर आवाज़ उठाती हैं। मेरी इस बात का ताजा उदाहरण शाहीन बाग पर बैठीं 500 से अधिक महिलाएँ हैं।

शाहीन बाग में 700-800 मीटर के अच्छे-खासे दायरे में पिछले डेढ़ महीने से 500 से अधिक मुस्लिम महिलाएँ एक प्रदर्शन कर रही है। वो भी सीएए/एनआरसी के ख़िलाफ। एक ऐसे कानून के ख़िलाफ़ जिससे वास्तविकता में उनका या उनके समुदाय के किसी भी वर्ग का कोई सरोकार ही नहीं है। लेकिन फिर भी वे बैठी हैं। यहाँ मुस्लिम समुदाय की छोटी बच्ची से लेकर बुजुर्ग महिला तक कड़ाके की ठंड में अपने घर से सारे कामकाज़, पढ़ाई-लिखाई छोड़ उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। और इस प्रदर्शन को वो अपने अधिकारों और औचित्य को बनाए रखने की लड़ाई बता रही हैं। खैर! मुझे किसी वर्ग द्वारा अधिकारों के नाम पर उठाई जा रही आवाजों से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन शाहीन बाग पर बैठीं महिलाओं से कुछ सवाल जरूर हैं।

सवाल- उन मामलों से जुड़े हैं, जिनपर वो हमेशा चुप रहीं। सवाल उन मुद्दों से जुड़े हैं, जिनपर मुस्लिम महिलाओं को सदियों से प्रताड़ित किया जाता रहा। सवाल भारत में मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति, राजनैतिक स्थिति से जुड़े हैं। सवाल तीन तलाक से जुड़े हैं, हलाला से जुड़े हैं, बहुविवाह से जुड़े हैं और, साथ ही माहवारी आते ही निकाह कर देने की रवायत से जुड़े हैं। जिसके आधार पर कोर्ट को भी चुनौती दी गई

आज शाहीन बाग पर 15 दिसंबर से धरने पर बैठी मुस्लिम महिलाएँ इस प्रदर्शन को अपनी ताकत और अखंडता का पर्याय बता रही हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि सदियों से हजारों बंदिशों में जकड़ी मुस्लिम महिलाओं को कभी अपने अधिकारों के बारे में सोचने की फुरसत नहीं मिली। उन्हें यही नहीं पता चला कि ये उनका अधिकार कि वो शिक्षा प्राप्त करें। अपनी जरूरत के मुताबिक संपति अर्जित करें। अपने राय अभिव्यक्त करें। हिजाब से आजादी पाएँ। हलाला के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ। और शरिया के अनुरूप नहीं, बल्कि संविधान के मुताबिक जीवन का गुजर बसर करें।

ऐसा शायद इसलिए क्योंकि यदि वे अपने समुदाय के पैरोकारों से इन अधिकारों की माँग करती हैं, तो मजहबी उलेमा और उनके खुद के घरवाले उनके ख़िलाफ़ हो जाते हैं। घर की महिलाएँ ही महिलाओं को उनके लिए बने नियम-कानून बताने लगती हैं। उन्हें निकाह के लिए दबाव बनाया जाता है। निकाह के बाद तीन तलाक आम बताया जाता है। और तलाक के बाद हलाला को केवल अपने शौहर के पास दोबारा लौटने की एक प्रक्रिया।

अभी तक मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में शाहीन बाग का आंदोलन जारी है। लेकिन इसी बीच एक मुस्लिम महिला को उसके शौहर ने तलाक दे दिया। उसके ससुर ने उसका बलात्कार कर दिया। उसका हलाला करवाया गया, उसे मारने की धमकी मिली। लेकिन अधिकारों की दुहाई देने वाली किसी महिला को उसका दर्द नहीं दिखा। अगर मान लिया जाए, कि मुस्लिम महिलाओं का विवेक उनके अधिकारों के लिए सीएए बनने के बाद जागा। तो भी ये घटना बाद की है। क्या डेढ़ महीने से ज्यादा एनडीए सरकार पर आरोप मढ़ने वाली इन महिलाओं को एक भी बार ये मामला आवाज़ उठाने वाला नहीं लगा? या इससे पहले अनेकों बार हुई मजहबी बर्बरता पर इनका दिल नहीं पसीजा?

भाजपा सरकार के केंद्र में आने के बाद तीन तलाक कानून अस्त्तिव में आया। यूपी समेत देश की कई महिलाओं ने इसके लिए नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की इसके लिए तारीफ की। जाहिर है, इस प्रथा के लिए मुस्लिम महिलाओं में कहीं टीस थी। लेकिन बिना आवाज़ के ये टीस दबी थी। जैसे ही तीन तलाक कानून बना, पीड़िताओं में खुशी की लहर दौड़ गई।

इसी तरह हलाला, बहुविवाह जैसी प्रथाएँ भी हैं। गाँव कनेक्शन की एक रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम महिलाओं के हित में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन की अध्यक्षा ने नाम न छापने की शर्त पर बताया था कि सहारनपुर जिले में महिलाओं का हलाला करवाने के लिए मदरसों में लड़कों को रखा जाता है। यही नहीं, उम्र और सुन्दरता के अनुसार वो महिलाओं के हलाला का पैसा लेते हैं। अब सोचिए, इनकी स्थिति कितनी बदतर हैं। लेकिन फिर भी आवाज़ उसपर उठानी है, जिसपर इनका समुदाय इजाजत दे।

मैं जामिया की उन पढ़ी-लिखी लड़कियों से इन बातों को समझने की उम्मीद नहीं करती। जिन्होंने ऊँची शिक्षा हासिल करने के बाद भी हिजाब और बुर्के को मॉय लाइफ-मॉय रूल्स का हिस्सा बताया। बल्कि मैं उन औरतों से अपनी बात समझने को कह रही हूँ, जिन्हें आज भी हलाला का नाम सुनकर गुस्सा आता है और इसका समर्थन करने वालों से घृणा होती है। जिन्हें संविधान में मिला अपना शिक्षा का अधिकार एक लोकतांत्रिक अधिकार लगता है। 18 साल से कम उम्र में शादी गैरकानूनी लगती है। जो माहवारी होते ही खुद को निकाह करने का सामान नहीं समझतीं। जिसके पीछे कट्टरपंथियों की दकियानूसी सोच, कठमुल्लों के दबाव और मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट-1937 बहुत बड़ी वजह हैं।

हलाला

आज अपने मजहब को ‘हलाला’ जैसे गंभीर रोग से पीड़ित देखने के बावजूद शाहीन बाग पर बैठी महिलाएँ चुप हैं और एक बिन सिर-पैर के विषय पर नारे बुलंद कर रही हैं। बड़े-बड़े लेखक उन्हें नई क्रांति लिखने वाला करार दे रहे हैं। महिलाओं की आजादी और नारी सशक्तिकरण पर बात करने वाले बुद्धिजीवि इन महिलाओं का समर्थन कर रहे हैं। उनके हिजाब को उनकी पहचान बता रहे हैं। इसलिए ये हलाला से जुड़े कुछ बयान, जो शायद किसी के भी प्रोपगेंडा को ध्वस्त करें और समझने में मदद करें कि मुस्लिम महिलाओं के पास अपने लिए सही विषय पर आवाज उठाने की भी आजादी नहीं है। नीचे दिए बयान बता रहे हैं कि वास्तविकता में हलाला क्या है?

लखनऊ के चौक में रहने वाली फिरदोस (27 वर्ष) बताती हैं, “बीवी से मन भर गया या कोई दूसरी औरत पसन्द आ जाए तो पहली बीवी को तलाक दे दो। जब पहली औरत की कमी महसूस होने लगे तो हलाला करवा दो और निकाह कर लो। औरतें मजबूरी में या अपने बच्चों के कारण हलाला करवाने के लिए तैयार हो जाती हैं।”

पीसीएस अधिकारी रहे और पूर्व विशेष सचिव गृह मोहम्मद इदरीस अम्बर बहराइची के मुताबिक “मेरे गाँव में मेरा एक दोस्त है जिसकी बीवी बहुत सुन्दर है। कई लोगों ने उसकी बीवी की तारीफ कर दी तो गुस्से में आकर तलाक दे दिया। उसके बाद अफसोस करने लगे। लेकिन तलाक दे चुके थे। बीवी सुन्दर थी इसलिए हलाला करवाने में डर था कि कही दूसरे आदमी ने निकाह के बाद तलाक न दिया तो क्या करेंगे। इसलिए उसने हलाल के लिए अपने बहनोई को तैयार किया। लेकिन उसकी बीवी ने हम बिस्तर होने से मना कर दिया।”

बिजनौर की रहने वाली 40 वर्ष की एक महिला ने बताया, “मेरे पति ने शराब की हालात मुझे तलाक दे दिया और उसी रात वो मेरे साथ सोये, सुबह मुझे मायके छोड़ आए और बोले, तेरा मेरा कोई रिश्ता नहीं, न जिस्मानी, न जुबानी। मैंने अपने ससुराल और मायके में सब कुछ साफ-साफ बता दिया तो बोले ये तलाक नहीं माना जाएगा। क्योंकि दुबारा सोये थे। लेकिन काज़ी ने इसे तलाक मान लिया। मेरे पति बोले एक शर्त पर साथ रखेंगे जब ये हलाला करवा ले। हमने अपने बच्चों के खातिर हलाला करवा लिया, मगर मैं अपने को कभी माफ नहीं कर पाई। यह औरत की इज्ज़त के साथ खिलवाड़ करना है। यह वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देना है।”

नोट: हलाला पर उपरोक्त बयान गाँव कनेक्शन की रिपोर्ट से लिए गए हैं।

सरकार के 100 दिन पूरे होने पर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे जाएँगे अयोध्या: संजय राउत

सामना के संपादक और शिवसेना सांसद संजय राउत ने ट्वीट कर जानकारी दी है कि सरकार के 100 दिन पूरे होने पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अयोध्या जाएँगे और वहाँ भगवान श्रीराम के दर्शन करेंगे। इससे पहले भी उद्धव अपने पार्टी के विजयी सांसदों के साथ अयोध्या दौरे पर जाना चाहते थे, लेकिन आख़िरी समय में उद्धव का यह दौरा रद्द हो गया था।

एएनआई के ट्वीट के मुताबिक सांसद संजय राउत ने कहा कि सीएम उद्धव ठाकरे सत्ता में 100 दिन पूरे होने पर अयोध्या जाएँगे और वहाँ दर्शन कर भगवान श्रीराम से आशीर्वाद लेंगे। वहीं उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि इसके लिए हमारे गठबंधन के नेताओं को भी साथ आना चाहिए। इतना ही नहीं राउत ने आगे ये भी कहा कि राहुल गाँधी पहले से ही मंदिरों में जाते भी हैं।

महाराष्ट्र से शिवसेना सांसद संजय राउत ने अपने ट्वीट में लिखा, ‘चलो अयोध्या’ सीएम उद्धव ठाकरे सत्ता में 100 दिन पूरे होने पर अयोध्या जाएँगे। इसके बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स ने उनको अपने निशाने पर ले लिया।

एक ट्विटर यूजर ने संजय राउत के ट्वीट पर रीट्वीट करते उन्हें गद्दा करार दे दिया और आगे लिखते हुए कहा कि किस मुँह से अयोध्या आओगे, उत्तर प्रदेश की जनता गद्दारों का स्वागत नहीं करती, जिस पार्टी ने राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था। उससे दोस्ती करके और उससे गठबंधन करके आप किस झूठी आस्था के साथ प्रभु श्रीराम के दर्शन करेंगे।

आपको बता दें कि उद्धव ठाकरे ने पिछले वर्ष जून माह में अपने 18 सांसदों और बेटे आदित्य ठाकरे के साथ अयोध्या जाकर भगवान राम के दर्शन किए थे। इस दौरान पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उद्धव ठाकरे का एयरपोर्ट पर जोरदार स्वागत किया था। उद्धव ठाकरे के इस अयोध्या दौरे को राम मंदिर निर्माण के लिए केंद्र की मोदी सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने के रूप में देखा गया था। इसके बाद राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले भी शिवसेना प्रमुख अयोध्या का दौरा करना चाहते थे, उनका 24 नवंबर को अयोध्या दौरे का कार्यक्रम भी बन चुका था लेकिन यह आख़िरी समय में रद्द हो गया था।

गगनयान से पहले अंतरिक्ष में जाएगा बिना पैरों वाला ‘व्योममित्र’, परीक्षण कर इसरो को भेजेगा रिपोर्ट

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (ISRO) ने बुधवार को हाफ ह्यूमनॉइड ‘व्योममित्र’ को दुनिया के सामने पेश किया। महिला जैसी दिखने वाला ‘व्योममित्र’ अंतरिक्ष से रिपोर्ट भेजेगा। वह गगनयान की उड़ान से ठीक पहले अंतरिक्ष में जाएगा और वहॉं मानव शरीर के क्रियाकलापों का अध्‍ययन करेगा।

दरअसल 2022 में इसरो मानव मिशन गगनयान लॉन्च करेगा। इसमें 3 क्रू मेंबर शामिल होंगे। ऐसे में मानव मिशन से पहले मानव रहित मिशन के लिए इसरो ने महिला की शक्ल वाला हाफ ह्यूमनॉइड तैयार किया है, जिसे व्योममित्र नाम दिया गया है। इसरो के चेयरमैन के. सिवन ने कहा कि हाफ ह्यूमनॉइड करीब-करीब पूरी तरह से तैयार है। हम चाहते हैं कि हमारी क्षमताओं को दिखाने के साथ-साथ यह मिशन अपना मकसद पूरा करे। मानव मिशन पर भेजें जाएँ और उन्हें सुरक्षित वापस लाया जाए।

बता दें कि हाफ ह्यूमनॉइड एक तरह का रोबोट है जो इंसान की तरह चल-फिर सकता है और मानवीय हाव-भाव भी समझ सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रोग्रामिंग के जरिए हाफ ह्यूमनॉइड सवालों के जवाब भी दे सकता है। इसरो के वैज्ञानिक सैम दयाल ने कहा, “व्‍योमम‍ित्र अंतरिक्ष में एक मानव शरीर के क्रियाकलापों का अध्‍ययन करेगा और हमारे पास र‍िपोर्ट भेजेगा। हम इसे एक परीक्षण के रूप में अंजाम दे रहे हैं।” व्‍योमम‍ित्र ने ‘हाय, मैं हाफ ह्यूमनॉइड (इंसानी) का पहला प्रोटोटाइप हूॅं’ कह कर लोगों का अभिवादन किया। दयाल ने बताया इस रोबोट के पैर नहीं है। इसके कारण इसे ह्यूमनॉइड कहा जा रहा है। व्योममित्र केवल आगे और बगल में झुक सकता है। यह अंतरिक्ष में कुछ परीक्षण करेगा और इसरो के कमांड सेंटर से संपर्क में रहेगा।

इसके अलावा गगनयान मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों की सेहत के देखरेख के लिए भारतीय फ्लाइट सर्जनों की भी ट्रेनिंग शुरू हो गई है। यह प्रक्रिया फ्रांस में जारी है। इसरो चीफ सिवन ने गगनयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “4 अंतरिक्षयात्रियों को इसके लिए चुना गया है और वे इस महीने के अंत तक ट्रेनिंग के लिए रूस जाएँगे। 1984 में राकेश शर्मा रूसी मॉड्यूल के जरिए चंद्रमा पर गए थे, लेकिन इस बार भारतीय अंतरिक्ष यात्री भारत के अंतरिक्ष यान में बैठकर स्पेस में जाएँगे।”

उन्होंने आगे कहा, हम गगनयान के जरिए सिर्फ इंसानों को अंतरिक्ष में नहीं भेजना चाहते। इसके जरिए हम दीर्घकालिक स्तर पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के अवसर पैदा करना चाहते हैं। ये कई एजेंसियों, भारतीय वायुसेना और इसरो के बीच सहयोग की मिसाल है।

वहीं जब इसरो चीफ से सवाल किया गया कि क्‍या इसरो चंद्रमा पर मानव युक्‍त मिशन भेजने पर विचार कर रहा है? तो उन्‍होंने जवाब देते हुए कहा, “अभी नहीं पर ऐसा एक दिन अवश्‍य आएगा।”

साथ ही उन्‍होंने बताया कि चंद्रयान-3 पर काम पूरी गति से शुरू हो गया है। इसरो चीफ ने गगनयान को लेकर बात करते हुए कहा कि यह मिशन हमें आगे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग जुटाने में मदद करेगा। उन्होंने कहा, “हम जानते हैं कि वैज्ञानिक खोज, आर्थिक विकास, शिक्षा, तकनीकी विकास और युवाओं को प्रेरणा देना सभी देशों का लक्ष्य है। किसी भारतीय द्वारा अंतरिक्ष की यात्रा इन सभी प्रेरणाओं के लिए सबसे बेहतरीन प्लेटफॉर्म है।”

इसरो का 50वाँ लॉन्च: ख़ुफ़िया सैटेलाइट कक्षा में, सेना को एयर स्ट्राइक में नहीं होगी अब समस्या

इसरो ने लॉन्च किए 13 अमेरिकी नैनो-सैटेलाइट, उच्चतम इमेज गुणवत्ता वाला कॉर्टोसैट-3 भी हुआ लॉन्च

इसरो ने जारी की Chandrayaan-2 द्वारा ली गई पृथ्वी की बेहद खूबसूरत तस्वीरें