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‘मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं’ – नजमा हेपतुल्ला की तब की बात… और अब संविधान के रास्ते मजहबी कट्टरता!

आजादी के बाद से ही भारत में मुस्लिम और कथित बुद्धिजिवी अक्सर अल्पसंख्यकों के अधिकारों का रोना रोते रहे हैं। हालाँकि, संविधान कभी धार्मिक आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव की इजाजत नहीं देता। संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़े जाने के बाद तो किसी के धार्मिक अधिकारों पर चर्चा होनी ही नहीं चाहिए, लेकिन फिर भी यह समय-समय पर चर्चा का विषय बन ही जाता है।

संविधान में अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को विधि के समक्ष समता का आश्वासन देता है। लेकिन हम यह देखते आए हैं कि विधि की समता के सामने हर समय कई प्रकार के धार्मिक दुराग्रह खड़े हो जाते हैं। सवाल मुस्लिमों की अल्पसंख्यक बने रहने में रूचि को लेकर है। इसका एक कारण कॉन्ग्रेस और वामपंथियों की तुष्टिकरण की नीति रही है। साथ ही अल्पसंख्यक बने रहने में वास्तविक मारा-मारी पीड़ित और शोषित के भाव की है। किसी देश में अल्पसंख्यक होना, उस देश की कृपा और मेहरबानी पर आश्रित होने जैसा भाव देता है। बावजूद इसके भारत में अल्पसंख्यक होना एक अवसर माना जाता रहा है।

पहला सवाल तो देश के मुस्लिमों को खुद से ही करना चाहिए कि क्या वो संविधान लिखे जाने के इतने वर्ष बाद भी स्वयं को संविधान की शर्तों से मंजूर मानते हैं? आज़ादी माँगने वाले मुस्लिम क्या 21वीं सदी के आज़ादी के विचारों से सहमत हैं? हाल ही में नागरिकता संशोधन कानून के बहाने शाहीन बाग़ में जो कुछ चल रहा है, वह किसी से भी छुपा नहीं है।

जब धर्मनिरपेक्षता को संविधान का मौलिक हिस्सा माना गया, तब सुप्रीम कोर्ट ने ये तय किया कि संसद इसे किसी भी तरह से कमजोर करने में सक्षम नहीं है, बल्कि इसे मजबूत बनाने के लिए जरूरी कदम उठा सकती है। लेकिन धर्मनिरपेक्षता शब्द के बावजूद भी भारत का मुस्लिम आज भी मुख्यधारा से जुड़ने में इतना असहज क्यों रहता है? इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत का मुस्लिम आज भी कई आधारभूत क्षेत्रों में अन्य धर्म के लोगों की तुलना में पिछड़े हुए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि ऐसे उदाहरण हैं, जिसमें मुस्लिम आज भी समय से बहुत पीछे खड़ा है।

जब तक स्वयं मुस्लिम अपनी मजहबी कट्टरता के आवरण को नहीं त्याग देते, तब तक इस समाज के पुनर्जागरण की उम्मीद करनी फिजूल है। मुस्लिम समाज को खुद अपनी बुनियादी बदलावों के लिए लक्ष्य बनाने होंगे और समय सीमा तय करनी होगी। इसका सबसे ताजा और सटीक उदाहरण तीन तलाक का गैर कानूनी होना है। सरकार को इस कानून को पारित करने के लिए एक बड़े वोट बैंक से खिलाफत का जोखिम उठाना पड़ा। हाल ही में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने नागरिकता संशोधन कानून को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।

मुस्लिमों के पिछड़ेपन में सबसे बड़ा हाथ अगर धार्मिक कट्टरता के बाद किसी का रहा है तो वो कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दल ही हैं। नागरिकता संशोधन कानून, यानी CAA और NRC ने एक नई बहस को भी छेड़ दिया है। यह बहस है पूरे देशभर में संविधान के ही भाग-4, अनुच्छेद- 44 (DPSP) में वर्णित यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने की बात। इसमें संविधान निर्माताओं द्वारा नीति-निर्देश दिया गया है कि समान नागरिक कानून (UCC) लागू करना हमारा लक्ष्य होगा।

लेकिन भारत जैसी विविधता वाले देश में UCC को लागू करना कितना आसान हो सकता है? महज तीन तलाक को ही गैर कानूनी घोषित करने पर कई तरह के फतवे और विरोध देखने को मिले। मुस्लिमों के ‘नए राजनीतिक धर्म गुरु’ और AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी जैसे पढ़े-लिखे लोग भी यह कहते हुए देखे गए कि तीन तलाक उनके धर्म का विषय है और सरकार को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

अब, जबकि समाज और सभ्यता, दोनों ही राजनीति और धर्म से बाहर आना चाह रही है, ऐसे में अगर धार्मिक अधिकार ही आपके मूल अधिकारों पर भारी पड़ जाए तो आप किसे चुनेंगे? सत्य अपाच्य जरूर है, लेकिन मुस्लिम आज भी खुद को अल्पसंख्यक कहकर अलग किस्म के नशे में मशगूल है। लेकिन बहुत ही कम लोग इस बात से वाकिफ़ हैं कि अल्पसंख्यक होने का मतलब मुस्लिम होने से नहीं है।

वर्ष 2014 में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का प्रभार संभालने के तुरंत बाद नजमा हेपतुल्ला ने मुस्लिमों के अल्पसंख्यक दर्ज़े को लेकर बयान दिया था कि यह मुस्लिम मामलों का मंत्रालय नहीं बल्कि यह अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय है। नजमा हेपतुल्ला ने जोर देते हुए कहा था कि मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं।

इस बयान के पीछे देश में परम्परागत चली आ रही ‘हिन्दू बहुसंख्यक बनाम मुस्लिम अल्पसंख्यक’ चर्चा की पोल खुल जाती है। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत के संविधान में अल्पसंख्यक वर्ग की परिकल्पना एक खुली श्रेणी के रूप में धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट विभिन्न वर्गों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से की गई है। इसलिए स्पष्ट है कि भारत के संविधान में एक स्थाई अल्पसंख्यक वर्ग के रूप में सिर्फ मुस्लिमों के होने की ही संभावना शून्य है। संविधान में ‘धार्मिक अल्पसंख्यक’ भी कोई नहीं है।

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शाहीन बाग के बनने के पीछे का इतिहास यही है कि जामिया में दंगे हुए, बसें जलाई गईं। पुलिस ने दंगाइयों को पकड़ा। बाद में पता चला कि वहाँ 750 फर्जी आई कार्ड बरामद हुए। जामिया नगर इलाके में इस्लामी कट्टरपंथी संगठन पीएफआई के 150 दंगाई छुपे हुए थे। गोलियाँ चलाई गईं, जमकर पत्थरबाजी की गई, जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज कर स्थति को नियंत्रण में लाया।

शाहीन बाग काफी समय से मुस्लिमों के मन में बैठा घृणा है। राम मंदिर, तीन तलाक पर फैसला आने और कश्मीर से 370 हटाकर केंद्र-शासित प्रदेश बनाने से आहतसमुदाय विशेष वाले इसे हिन्दू-मुस्लिम का ऐंगल दे रहे हैं। कट्टरपंथियों ने अयोध्या में हिन्दुओं के आराध्य राम की मंदिर तोड़कर उसके पिलर पर बाबरी मस्जिद बनाई। शाहीन बाग में हिन्दुओं के पवित्र चिन्ह स्वास्तिक के साथ खिलवाड़ किया गया। हिन्दू महिलाओं को हिजाब में दिखाया गया, इस्लामिक नारे लगाए गए। यानी पूरा हिन्दूफोबिक एजेंडा चलाया गया।

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें

निर्दोष अफजल गुरु को फाँसी किसने दी? राम मंदिर कौन बनवा रहा? – SC के खिलाफ JNU महिला नेता ने उगला जहर

एक ओर जहाँ वामपंथी गुंडे CAA विरोध की आड़ में शाहीन बाग़ में इस्लामिक नारे लगा रहे हैं, वहीं JNU में सत्ता और संस्थाओं के खिलाफ दुष्प्रचार का एजेंडा निरंतर प्रगति पर है। सोशल मीडिया पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की ही एक छात्र नेता आफरीन फातिमा का ऐसा वीडियो सामने आया है, जिसमें वो सरकार और सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ जहर उगलती हुई देखी जा रही है।

इस वीडियो में आफरीन फातिमा देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट और सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए देखी जा रही है। वीडियो में आफरीन फातिमा सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम मंदिर और अफजल गुरु की फाँसी के फैसलों पर संदेह जताते हुए देखी जा सकती है।

45 सेकंड के इस वीडियो में आफरीन फातिमा कह रही है कि CAA विरोध के दौरान उसने यह देख लिया है कि वो ना ही सरकार और ना ही सुप्रीम कोर्ट पर विश्वास कर सकती है। संसद भवन पर हमले के आरोपित आतंकवादी अफजल गुरु की फाँसी दिए जाने के फैसले पर आफरीन फातिमा कह रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष अफजल गुरु को फाँसी की सजा सुनाई थी। वीडियो में वो यह भी कहते सुनी जा सकती है कि अफजल गुरु का संसद हमलों में कोई हाथ नहीं था।

आफरीन फातिमा इतने में ही नहीं रुकी। उसने अयोध्या में राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के दिए हुए निर्णय को भी गलत बता दिया। उसने कहा कि यह वही सुप्रीम कोर्ट है, जिसने एक समय इस बात से मना किया था कि बाबरी मस्जिद के नीचे राम मंदिर का कोई सबूत है और बाद में राम मंदिर निर्माण की इजाजत दे दी।

दिलचस्प बात यह है कि यह वही आफरीन फातिमा है, जिसने कुछ समय पहले ही मुस्लिमों से कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर पर इसलिए हमला करने की सिफ़ारिश की थी क्योंकि उन्होंने CAA विरोध प्रदर्शन को सांप्रदायिक बनाने की बात कही थी। ट्विटर पर 12 जनवरी को फातिमा ने शाशि थरूर को ‘ला इलाह इलल्लाह’ के नारों के साथ ‘इस्लामॉफ़ोबिक’ बताते हुए मुस्लिमों से थरूर पर हमला करने को कहा था।

आफ़रीन फातिमा के ‘ला इलाह इलल्लाह’ के नारों से शशि थरूर को घेरने की घोषणा के बाद जब शशि थरूर CAA विरोध के समर्थन में खड़े होने जामिया मिलिया इस्लामिया गए थे, तब मुस्लिम भीड़ द्वारा उनको घेरकर इस्लामिक नारे ‘ला इलाहा इलल्लाह’ (अल्लाह को छोड़कर पूजा के योग्य कुछ भी नहीं है) लगाए गए थे।

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क्या बदला जा सकता है संविधान? लोकतंत्र की मर्यादा पुनर्स्थापित करने वाला केस

भारत के संविधान के बारे में अक्सर कहा जाता है कि ये उधार का संविधान है। साथ ही आजकल ये आरोप भी शुरू हो गए हैं कि मोदी सरकार संविधान को बदल देगी। ये दोनों ही आरोप काफ़ी ज़्यादा घिस चुके हैं। यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि हमें बेशक एक ऐसा संविधान मिला, जिसमें कई देशों के संविधान की उन अच्छी चीजों को शामिल किया गया, जो यहाँ लागू किए जा सकते थे। ये अच्छी बात है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने दुनिया भर के संविधान का अध्ययन किया, उनकी समीक्षा की, उनके अच्छे-बुरे पहलुओं को समझा और फिर इस पर विस्तृत बहस किया कि भारत में उसे कैसे लागू किया जाए। ज़रूरी बदलावों पर भी विस्तृत बहस हुई।

संविधान की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर करता रहा है। जब भी संविधान के किसी हिस्से को लेकर टकराव की स्थिति बनी है, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी व्याख्या के जरिए इसे सुलझाया है। आरोप लगाया जाता है कि मोदी सरकार संविधान को बदल देगी। असल में संविधान को बदलने की कोशिश की गई थी और ऐसा आपातकाल के वक़्त तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने किया था। इसके लिए हमें 42वें संविधान संशोधन को समझना पड़ेगा। देखा जाए तो ये अब तक का सबसे विवादित संविधान संशोधन रहा है। इसे कई लोगों ने ‘मिनी कांस्टीट्यूशन’ कहा था तो कइयों ने ‘इंदिरा का संविधान’ नाम दिया था।

इसी संविधान संशोधन में नागरिकों की ‘फंडामेंटल ड्यूटीज’ को परिभाषित किया गया। साथ ही ‘सेक्युलर’ शब्द संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया। दरअसल, इंदिरा गाँधी की इच्छा थी कि न्यायपालिका की शक्ति को कमज़ोर कर दिया जाए और इसलिए उन्होंने संविधान का संशोधन किया था। हालाँकि, बाद में ‘केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार‘ वाले ऐतिहासिक केस ने संविधान की मर्यादा को पुनर्स्थापित किया। इसे भारतीय न्यायपालिका का सबसे ‘लैंडमार्क फ़ैसला’ कहा जाता है। एक ऐसा निर्णय, जिसने लोकतंत्र की मर्यादा और संविधान की अक्षुण्णता को बरक़रार रखा।

सवाल एक था, जिसके लिए 71 देशों के संविधान को पढ़ना पड़ा। प्रश्न था कि क्या संसद इतनी शक्तिशाली है कि वो संविधान के किसी भी हिस्से को जब, जहाँ, जैसे चाहे संशोधित कर सकती है? क्या संसद नागरिकों के मूलभूत अधिकारों के साथ छेड़छाड़ कर सकती है? 703 पेज का जजमेंट देने वाली पीठ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश भी शामिल थे। 13 सदस्यीय पीठ ने 7-6 से जजमेंट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान में संशोधन किया जा सकता है लेकिन इसकी मूल भावना के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता।

यहाँ ये सवाल उठता है कि संविधान की मूल भावना क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समय-समय पर इसकी व्याख्या न्यायपालिका द्वारा की जाती रहेगी। संविधान के ‘बेसिक स्ट्रक्चर’, अर्थात ‘मूल ढाँचा’ को नहीं बदला जा सकता, ये कोर्ट ने स्पष्ट किया है। इसलिए ये सारे आरोप बेमानी हैं कि मोदी संविधान बदल देगा, भाजपा संघ के संविधान लागू कर देगी और हिन्दू राष्ट्र का अलग संविधान हो जाएगा।

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कॉन्ग्रेसी नेताओं ने झंडा फहराने को लेकर किया हाथ-लात का प्रयोग, जमकर चले रैपट-कंटाप, देखें Video

मध्य प्रदेश के इंदौर में सीएम कमलनाथ के झंडा वंदन प्रोग्राम के वक़्त माहौल तब बदल गया जब कॉन्ग्रेसी नेता आपस में भिड़ पड़े और एक दूसरे पर थप्पड़ बरसाने लगे। इस दौरान कॉन्ग्रेसी नेता चंदू कुंजीर ने देवेंद्र सिंह यादव को जमकर थप्पड़ रसीद दिए।

मध्य प्रदेश में यह निंदनीय घटना ऐसे समय में सामने आई है जब पूरा देश 71वें गणतंत्र दिवस के जश्न में डूबा हुआ है। जब राजपथ पर दुनिया भारत को देख रही है, ऐसे समय में कॉन्ग्रेस के नेता झंडा फहराने को लेकर आपस में भिड़ गए। यहीं नहीं, दोनों नेताओं के बीच जमकर हाथापाई भी हुई।

कॉन्ग्रेसी नेताओं के बीच मारपीट की यह दुखद घटना मध्य प्रदेश के इंदौर में कॉन्ग्रेस के कार्यालय में हुई। दरअसल, गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान ध्वजारोहण का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। तभी दो नेताओं के बीच झंडा फहराने को लेकर विवाद हो गया और वो एक-दूसरे से उलझ पड़े।

वीडियो में देखने से पता चलता है कि देखते ही देखते दोनों कॉन्ग्रेस के नेता, देवेंद्र सिंह यादव और चंदू कुंजीर के बीच जमकर हाथ-पैर चलने लगे। बाद में वहाँ मौजूद पुलिस द्वारा बीच-बचाव के बाद ही यह मामला शांत हुआ।

मास्टरमाइंड शरजील के नंगे हो जाने के बाद शाहीन बाग वाले जोर-शोर से अपनी देशभक्ति जताने में जुटे

शाहीन बाग़ विरोध-प्रदर्शन के मुख्य साज़िशकर्ता शरजील इमाम के ताज़ा बयानों ने जाहिर कर दिया है कि यह नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध नहीं है। देश के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की मंशा रखने वालों का यह घटिया उपक्रम है। इसके जरिए वे क़ानून-व्यवस्था में खलल डाल देश को अराजकता के माहौल में ढकेलना चाहते हैं। पोल खुलने का बाद एक तबका ख़ुद को शरजील इमाम से अलग दिखाने में लगा है, वहीं कट्टरवादी इस्लामी तबका शरजील के समर्थन में उतर आया है। भले ही वो दो गुटों में बँट गए हों, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य एक ही है।

शाहीन बाग़ में रविवार (जनवरी 26, 2020) को गणतंत्र दिवस के मौके पर बड़ी संख्या लोग तिरंगा लहराते देखे गए। इसकी ज़रूरत भी है क्योंकि वे जितनी बड़ी संख्या में तिरंगा लहराएँगे, वामपंथी मीडिया गिरोह उतनी ही तेज़ी से शरजील इमाम के दाग धोएगा और शाहीन बाग़ को फिर से ‘जन आंदोलन’ के रूप में प्रचारित करेगा। इसलिए, देशभक्ति दिखाने की होड़ मची है और शाहीन बाग़ के उपद्रवी लगातार तिरंगे और संविधान की बातें कर रहे हैं।

लेकिन, किस संविधान की? उस संविधान की, जिसके बारे में शरजील इमाम कहता है कि मुस्लिमों को उसका सहारा तो लेना चाहिए, लेकिन उससे उम्मीदें नहीं पालनी चाहिए क्योंकि आज़ादी के बाद से न्यायपालिका मुस्लिमों की दुश्मन बन गई है और अंग्रेज़ उतने पक्षपाती नहीं थे। देश, देश की न्यायपालिका और राष्ट्र के संविधान के प्रति ऐसा सोचने वाले ने जब इस पूरे उपद्रव की रूप-रेखा तैयार की है तो इसमें शामिल होने वाले लोगों की सोच कैसी होगी, इसे मालूम करना कठिन नहीं होना चाहिए। उनका एक ही उद्देश्य है- भारत के टुकड़े-टुकड़े करना।

दाग धोने के लिए संविधान का पाठ करना पड़ेगा। तिरंगा उठा कर देशभक्ति दिखानी होगी। शरजील से ख़ुद को अलग करने के लिए या फिर ऐसा दिखाने के लिए गाँधी-नेहरू की बात करनी पड़ेगी। यही तो हो रहा है शाहीन बाग़ में। वे जितने ज्यादा जोर से ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ बोलेंगे, वामपंथी मीडिया का दिल उतना ही ज्यादा द्रवित होगा और कोई रवीश कुमार टीवी स्टूडियो में बैठ कर कहेगा- “क्या तिरंगा हाथ में लेकर राष्ट्रगान गाने वाले और संविधान का पाठ करने वाले देश के टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्य हो सकते हैं? नहीं न।” बस, इतना काफ़ी है महिमामंडन के लिए।

क्या हाफिज सईद भारत में गरीबी ख़त्म करने की बात करे तो मुंबई हमले में 165 से भी अधिक लोगों की हत्या का दोष मिट जाएगा? उसके आतंकी गुनाह माफ़ हो जाएँगे? देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात करने वाले, लोगों को आरजकता के लिए भड़काने वाले और पूरे भारत में चक्का जाम करने के मंसूबे पालने वाला गिरोह इसी कोशिश में है। हाथों में तिरंगा थाम वह अपने गुनाहों को दबाना चाहता है।

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शाहीन बाग़ के मुख्य साज़िशकर्ता शरजील इमाम को देश भर से कई कट्टरवादी मुस्लिमों का साथ मिल रहा है। भारत के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की बात करने वाले शरजील ने उत्तर-पूर्वी भारत और शेष भारत के बीच का संपर्क तोड़ कर असम को देश से अलग-थलग करने की बात की थी। उसने महात्मा गाँधी को सबसे बड़ा फासिस्ट नेता बताया था और कहा था कि ‘राम राज्य’ की बात करने वाला कभी मुस्लिमों के हित की नहीं सोच सकता। शरजील पर यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया है। असम में भी उसके ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया है। इसके बावजूद कट्टरपंथी इस्लामी उसके समर्थन में कूद पड़े हैं।

शरजील इमाम वामपंथियों के प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ में कॉलम भी लिखता है। एक अन्य प्रोपेगंडा पोर्टल न्यूजलॉन्ड्री के शरजील उस्मानी ने इमाम के उस बयान का समर्थन किया है, जिसमें उसने असम को शेष भारत से काट कर अलग करने की बात कही थी। सिलीगुड़ी कॉरिडोर को ‘चिकेन्स नेक’ भी कहते हैं, जिसे ठप्प करने की बात इमाम कर रहा था। ये शेष भारत को नॉथ-ईस्ट भारत से जोड़ता है। भारतीय सेना, असम राइफल्स, बीएसएफ और बंगाल पुलिस इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए यहाँ पैनी नज़र रखते हैं।

उस्मानी ने इमाम का समर्थन करते हुए फेसबुक पर लिखा कि क्या चक्का-जाम की बात करना राष्ट्रद्रोह के अंतर्गत आता है? उसने लोगों को भड़काते हुए लिखा कि इमाम का साथ देने के लिए सबकुछ किया जाना चाहिए, नहीं तो एक और मुस्लिम युवा जेल में होगा। उस्मानी ने आरोप लगाया कि इन आंदोलन को शुरू करने वाले हज़ारों युवाओं को बदनाम किया जा रहा है और अपराधी बताया जा रहा है लेकिन ये लड़ाई जारी रहेगी। उसने कुछ मुस्लिमों को भी धमकाया और उन्हें ‘सरकारी मुस्लिम’ बताते हुए पूछा कि वो उछल-उछल कर अपनी देशभक्ति साबित करने में क्यों लगे हैं?

उस्मानी ने किया शरजील का खुला समर्थन

जेएनयू छात्र संघ की काउंसलर आफरीन फातिमा ने भी इमाम का समर्थन करते हुए लिखा कि सरकार उससे डर गई है। उसने भारत सरकार पर इस्लाम के प्रति घृणा रखने का आरोप लगाया और कहा कि शरजील इस सरकार को निशाना बना रहे हैं, इसीलिए सरकार बौखला गई है। इसी तरह नाज़िल शफ़ीक़ नामक कथित एक्टिविस्ट ने इमाम का बचाव करते हुए उसके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई को ‘विच हंटिंग’ करार दिया। उसने आह्वान किया कि मुस्लिमों को इमाम का साथ बनाए रखना चाहिए।

अली सोहराब को हाल ही में हिंदूवादी नेता कमलेश तिवारी की हत्या के बाद घृणा फैलाते हुए गिरफ़्तार किया गया था। उसने भी शरजील इमाम का समर्थन किया है। उसने इमाम को शाहीन बाग़ विरोध प्रदर्शन का योजनाकार और इस आंदोलन के लिए प्रेरणा बताया है। जामिया में मीडिया द्वारा ब्रांडिंग की गई लदीदा फरज़ाना ने भी कहा कि वो इमाम के साथ है।

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ममता ने कहा- ये उमर को क्या हो गया, लोगों ने पूछा- पच नहीं रहे हँसते हुए अब्दुल्ला

जम्मू-मुख्यमंत्री कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की एक तस्वीर वायरल हुई है, जिसमें उनकी दाढ़ी काफ़ी बढ़ी हुई दिख रही है। उमर अब्दुल्ला की इस तस्वीर को देख कर लोगों ने इसे ‘370 इफ़ेक्ट’ बताया। ऐसा नहीं है कि अब्दुल्ला को हिरासत में शेव नहीं करने दिया जा रहा है, उन्होंने अपने मन से दाढ़ी बढ़ा ली है। सोशल मीडिया पर लोगों ने तंज कसते हुए कहा कि उमर अब्दुल्ला बढ़ी हुई दाढ़ी में बिलकुल पहचान में नहीं आ रहे हैं। वहीं अब नेताओं ने भी इस तस्वीर पर प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उमर अब्दुल्ला की ताज़ा वायरल तस्वीर पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा- “मैं तो इस तस्वीर में उमर अब्दुल्ला को पहचान ही नहीं पा रही हूँ। मुझे काफ़ी दुख महसूस हो रहा है। मैं उदास हूँ। ये काफ़ी दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे लोकतांत्रिक राष्ट्र में ऐसा हो रहा है। ये सब आख़िर कब थमेगा?” ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया पर उमर अब्दुल्ला की फोटो ट्वीट करते हुए ये बातें लिखीं। कई लोगों ने तृणमूल कॉन्ग्रेस की सुप्रीमो को ध्यान दिलाया कि इस फोटो में उमर अब्दुल्ला हँसते हुए दिख रहे हैं। कुछ ने पूछा कि क्या हँसते हुए अब्दुल्लाह आपको पच नहीं रहे?

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने भी इस तस्वीर को लेकर इमोशनल ट्वीट किया। मुफ़्ती ने लिखा कि उमर अब्दुल्ला पिछले 6 महीनों से अपने परिजनों से दूर ‘अवैध रूप से’ हिरासत में रखे गए हैं। हालाँकि, सरकार ने स्पष्ट कहा था कि हिरासत में रखे गए नेताओं को उनके परिजनों से मुलाक़ात को लेकर कोई पाबन्दी नहीं लगाई गई है और नियमानुसार उन्हें कई सुविधाएँ मुहैया कराई जा रही है। ख़बर आई थी कि अब्दुल्ला ने कई हॉलीवुड फ़िल्मों की सीडी की डिमांड की थी, जो पूरी की गई।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया था कि अब्दुल्ला को सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था। उमर और महबूबा को हिरासत में रखे जाने के सवाल का जवाब देते हुए शाह ने पीएसए वाले नियम के तहत उन्हें हिरासत में रखे जाने की बात बताई थी।

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6 फुट की दीवार कूद कर चिदंबरम को धर दबोचा था, जांबाज CBI अधिकारी को प्रेसिडेंट अवॉर्ड

डीएसपी रामास्वामी पार्थसारथी को प्रेसिडेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। पार्थसारथी उन 28 सीबीआई अधिकारियों में से एक हैं, जिन्हें ये सम्मान मिला। उन्होंने पी चिदंबरम को उनके घर में घुस कर गिरफ़्तार किया था। उन्होंने 6 फुट की दीवाल कूद कर चिदंबरम को गिरफ़्तार किया था। चिदंबरम को आईएनएक्स मीडिया केस में गिरफ़्तार किया गया था। पार्थसारथी के बारे में एक और बात जानने लायक है कि वो काफ़ी नरमी से लोगों से बातें करते हैं, लेकिन जब बात प्रोफेशन की आती है तो वो कड़ा रुख अख्तियार करते हैं।

रामास्वामी पार्थसारथी ने शुरुआत में टीम बतौर डीएसपी ज्वाइन किया था, लेकिन बाद में वो प्रमोट होकर ज्वाइंट डायरेक्टर बने थे। पार्थसारथी ने ही पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम को भी गिरफ़्तार किया था। आईपीएस ऑफिसर धीरेन्द्र शुक्ला को भी प्रेसिडेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। उन्होंने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह ने जुड़े मामले में भी जाँच की थी।

धीरेंद्र शुक्ला ने उस टीम का भी नेतृत्व किया था जो रोशन अंसारी को संयुक्त अरब अमीरात से भारत लाने में सफल भूमिका निभाई थी। रामास्वामी पार्थसारथी और धीरेंद्र शुक्ला के अलावा विनय कुमार, निर्भय कुमार, एसपी मनोज वर्मा, दीपतेंदू भट्टाचार्य, राजेश सिंह, ओम प्रकाश बिश्नोई, संजय कुमार भाट, रबि नारायण त्रिपाठी, मुकेश वर्मा, नितेश कुमार, बरुण कुमार सरकार, नारायण चंद्र साहू, नंद किशोर, नूर अली शेख और रोहिताश कुमार धिनवा को भी विशिष्ट सेवा के लिए पुलिस पदक सम्मान देने की घोषणा की गई है।

स्पेशल क्राइम यूनिट के एसपी निर्भय कुमार ने निठारी मर्डर केस, गाज़ियाबाद पीएफ स्कैम की जाँच की थी। उन्होंने लालू यादव के ख़िलाफ़ आईआरसीटीसी से जुड़े मामले की भी जाँच की थी। दिल्ली के एसीपी राजबीर सिंह की हत्या से जुड़े मामले में भी इन्होने ही छानबीन की थी। उन्होंने मिड-डे मील की भी जाँच की थी।

कटहल के वृक्ष के नीचे प्रकट हुए गुरु ने दिया था ज्ञान, योगी मुमताज़ अली ख़ान को पद्म भूषण

जॉर्ज, जेटली और सुषमा सहित 7 को पद्म विभूषण: 16 को पद्म भूषण, लंगर बाबा समेत 118 को पद्म श्री

4 धमाकों से दहला असम, शरजील इमाम ने दी थी राज्य को भारत से अलग करने की धमकी

गणतंत्र दिवस के दिन असम में एक के बाद एक हुए चार बम धमाकों के कारण दहशत का माहौल बन गया। चारों धमाके शक्तिशाली थे। 3 धमाके डिब्रूगढ़ में हुए और 1 धमाका चेराइडोई जिले में हुआ। ये धमाके तब हुए, जब पूरा देश गणतंत्र दिवस की खुशियाँ मना रहा था। एक धमाका डिब्रूगढ़ में ग्रैहम बाजार में हुआ। वहीं एक अन्य धमाका एटी रोड में स्थित गुरुद्वारे के पास हुआ। दोनों इलाक़े डिब्रूगढ़ पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आते हैं। तेलों का शहर कहे जाने वाली दुलियाजान में हुआ।

वहीं, चैराडोई वाला धमाका सोनारी पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले टोक घाट इलाक़े में हुआ। वरिष्ठ अधिकारियों ने घटनास्थलों का दौरा किया, जिसके बाद उन्होंने बताया कि पुलिस मामले की तह तक पहुँचने का प्रयास कर रही है। ये धमाके तब हुए हैं, जब शाहीन बाग़ विरोध प्रदर्शन के मुख्य साज़िशकर्ता शरजील इमाम ने असम को शेष भारत से काट कर अलग करने की धमकी दी थी। भारत के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की बात करते हुए शरजील ने कहा था कि ‘चिकेन्स नेक’ वाले क्षेत्र को ब्लॉक कर के पूरे उत्तर-पूर्व को शेष भारत से अलग-थलग कर देने का लक्ष्य होना चाहिए।

इसके बाद शाहीन बाग़ व अन्य जगहों पर सीएए के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन के नाम पर उपद्रव कर रहे दंगाइयों के गैंग की असली साज़िश का पर्दाफाश हुआ था। जहाँ शरजील इमाम अब इस मामले में सफाई देने की बातें कह रहा है, शाहीन बाग़ का एक धड़ा उससे ख़ुद को अलग कर के दिखा रहा है। असम में शरजील इमाम के ख़िलाफ़ केस भी दर्ज किया गया है और असम पुलिस इस मामले में कार्रवाई कर रही है। ऐसे में, असम में इन धमाकों का होना देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है।

मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इन बम धमाकों को आतंकी घटना करार दिया है। उन्होंने कहा कि इतने पवित्र दिवस पर हुए इस वारदात की वो निंदा करते हैं। उन्होंने जनता को आश्वासन दिया कि उनकी सरकार दोषियों को पकड़ने के लिए हरसंभव कार्रवाई करेगी। असम के डीजीपी ने भी कहा है कि इस मामले में आगे की जाँच की जा रही है।

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