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वामपंथियों और कॉन्ग्रेसी सरकारों की सिब्बल ने खोली पोल, कहा- CAA लागू करने से मना नहीं कर सकते राज्य

कॉन्ग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के सन्दर्भ में कहा है कि संसद से पारित हो चुके इस क़ानून को लागू करने से कोई राज्य किसी भी तरह से इनकार नहीं कर सकता और ऐसा करना असंवैधानिक होगा। बता दें कि पहले केरल की वामपंथी सरकार और फिर पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार ने विधानसभा में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास किया था। लेकिन, कॉन्ग्रेस के ही दो बड़े नेताओं के बयान से ज़ाहिर है कि यह केवल राजनीतिक नौटंकी है। इसका कोई महत्व नहीं है।

पूर्व कानून एवं न्याय मंत्री ने केरल साहित्य उत्सव के तीसरे दिन कहा, “जब CAA पारित हो चुका है तो कोई भी राज्य यह नहीं कह सकता कि मैं उसे लागू नहीं करूँगा। यह संभव नहीं है और असंवैधानिक है। आप उसका विरोध कर सकते हैं, विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर सकते हैं और केंद्र सरकार से (कानून) वापस लेने की माँग कर सकते हैं, लेकिन संवैधानिक रूप से यह कहना कि मैं इसे लागू नहीं करूँगा, अधिक परेशानियाँ पैदा कर सकता है।”

कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने समझाया कि जब राज्य यह कहते हैं कि वह CAA को लागू नहीं करेंगे तो उनका क्या मंतव्य होता है और वह ऐसा कैसे करेंगे। उन्होंने कहा कि राज्यों का कहना है कि वे राज्य के अधिकारियों को भारत संघ के साथ सहयोग नहीं करने देंगे। उन्होंने कहा, “एनआरसी, एनपीआर पर आधारित है और एनपीआर को स्थानीय रजिस्ट्रार लागू करेंगे। अब गणना जिस समुदाय में होनी है वहाँ से स्थानीय रजिस्ट्रार नियुक्त किए जाने हैं और वे राज्य स्तर के अधिकारी होंगे।”

वहीं, दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि CAA की संवैधानिक स्थिति संदेहास्पद है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया तो वो क़ानून की किताब में क़ायम रहेगा और अगर क़ानून की किताब में है तो उसे सभी को मानना होगा।   

गौरतलब है कि केरल, राजस्थान, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों ने CAA के अलावा राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी (एनपीआर) का विरोध किया है।केरल पहला राज्य हो गया जिसने विधानसभा से नागरिकता क़ानून के खिलाफ प्रस्ताव पास करके लागू करने से मना कर दिया है। वहीं, पंजाब विधानसभा ने यह कहते हुए प्रस्ताव पास किया कि नागरिकता क़ानून से देश की धर्मनिरपेक्षता को चोट पहुँची है। यह क़ानून समानता के अधिकार का हनन करता है।

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कश्मीर घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए 19 जनवरी प्रलय का दिन माना जाता है, क्योंकि वर्ष 1990 में हालात बिगड़ने के कारण इसी तारीख में कश्मीरी पंडित समुदाय ने कश्मीर घाटी से पलायन करना शुरू कर दिया था। मई 1990 तक करीब पाँच लाख कश्मीरी पंडित जान बचाने के लिए अपनी मातृभूमि को छोड़ कश्मीर से पलायन कर चुके थे, जो स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा पलायन माना जाता है। इसी के चलते हर वर्ष 19 जनवरी को जहां कहीं भी कश्मीरी पंडित रहते हैं, वहाँ वह इस तारीख को ‘होलोकॉस्ट/एक्सोडस डे’ (प्रलय/बड़ी संख्या में पलायन की तारीख) के तौर पर मनाते हैं।

देश-दुनिया में बसे विस्थापित कश्मीरी पंडितों के संगठन कश्मीर में वापसी के लिए 30 साल से आंदोलनरत हैं। उन्होंने सरकार से इस दिशा में सकारात्मक क़दम उठाने की माँग की। कश्मीर समिति दिल्ली के अध्यक्ष समीर चंगू का कहना है कि हमारा तो सबकुछ लुट गया। परिवार-रिश्तेदार और पड़ोसी सब। पीड़ा तो थी ही ज़बरदस्त गुस्सा भी था। लेकिन, हम उनकी तरह जवाब नहीं दे सकते थे। हमने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। हमेशा संविधान के दायरे में रहकर ही बात की।

कश्मीरी समिति दिल्ली का इतिहास कश्मीरी सहायक समिति के तौर पर आज़ादी के कुछ साल बाद का है। एमएन कौल और हृदय नाथ कुंजरू भी इससे जुड़े हुए थे। ऑल इंडिया कश्मीरी समाज इसी संगठन से निकला है। संगठन कोशुर समाचार नाम से मासिक पत्रिका भी निकालता है।

19 जनवरी को जनसंहार के विरोध में हर साल जंतर-मंतर पर होलोकॉस्ट डे मनाया जाता है। दिल्ली-एनसीआर के सैकड़ों कश्मीरी पंडित यहाँ जुटते हैं और अपना दर्द बयाँ करते हैं। वह दुनिया को बताते हैं कि आखिर उस रात धरती का जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के साथ कैसा अत्याचार हुआ।

यह स्मरण रहे कि सन ’65 का युद्ध जम्मू कश्मीर राज्य को पूरी तरह पाकिस्तान में मिलाने के उद्देश्य से लड़ा गया था किंतु पाकिस्तान इस उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया था क्योंकि तब तक कश्मीर में पाकिस्तान परस्ती और अलगाववाद का बीज नहीं बोया जा सका था। इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अगस्त 1965 में अमानुल्लाह खान और मकबूल बट ने पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर में ‘नेशनल लिबरेशन फ्रंट’ नामक अलगाववादी आतंकी संगठन बनाया था।

इस संगठन ने जून 1966 में मकबूल बट को ट्रेनिंग देकर नियन्त्रण रेखा के इस पार भेजा। छह सप्ताह बाद ही पुलिस से हुई एक मुठभेड़ में मकबूल बट ने सी० आई० डी० सब इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या कर दी। दो वर्ष बाद अगस्त 1968 में मकबूल बट को तत्कालीन सेशन जज नीलकंठ गंजू ने फाँसी की सजा सुनाई। किन्तु उसी वर्ष दिसम्बर में मकबूल बट अपने एक साथी के साथ जेल तोड़कर नियन्त्रण रेखा के उस पार भाग गया। वह 1976 में लौटा और इस बार उसने कुपवाड़ा में बैंक डकैती का असफल प्रयास किया और पकड़ा गया।

डकैती के प्रयास में उसने बैंक मैनेजर की हत्या की जिसके लिए उसे पुनः फाँसी की सजा हुई। मकबूल बट के पकड़े जाने के बाद उसके साथी आतंकवादी इंग्लैंड चले गये जहाँ उन्होंने 1977 में ‘जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ (JKLF) नामक संगठन बनाया। इसी संगठन से संबद्ध ‘नेशनल लिबरेशन आर्मी’ ने मकबूल बट को जेल से छुड़ाने के लिए फरवरी 1984 में भारतीय उच्चायुक्त रवीन्द्र म्हात्रे का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी। इस घटना के पश्चात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने तत्काल मकबूल बट को तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी थी।

मकबूल बट को फाँसी दिए जाने के बाद के घटनाक्रम

सन 1984 में जिस दिन मकबूल बट को फाँसी दी गई थी उस दिन कश्मीर घाटी के लोगों पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की स्थापना को अभी एक दशक भी पूरा नहीं हुआ था। इस संगठन को अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते घाटी के लोगों में अपनी पैठ बनाने की आवश्यकता महसूस हुई। मकबूल बट को फाँसी दिए जाने के दो वर्ष पश्चात् सन 1986 में फारुख अब्दुल्लाह को हटाकर गुलाम मोहम्मद शाह जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बनाये गए।

शाह ने अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते हुए जम्मू स्थित न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक प्राचीन मन्दिर परिसर के भीतर मस्जिद बनाने की अनुमति दे दी ताकि मुस्लिम कर्मचारी नमाज पढ़ सकें। इस विचित्र निर्णय के विरुद्ध जम्मू के लोग सड़क पर उतर आये जिसके फलस्वरूप दंगे भड़क गये। अनंतनाग में पंडितों पर भीषण अत्याचार किया गया, उन्हें बेरहमी से मारा गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया और उनकी संपत्ति व मकान तोड़ डाले गये। सन 1987 से जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की गतिविधियों में तेजी आई।

बाद के सालों में अलगाववादियों की दुष्प्रचार मशीनरी ने एक सुनियोजित षड्यंत्र रचकर पंडितों के विरुद्ध वैमनस्य फैलाना प्रारंभ कर दिया। यही कारण था कि जिस मकबूल बट को 1984 में कोई जानता नहीं था फरवरी 1989 में उसका ‘शहादत दिवस’ मनाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आये थे। विश्वभर में सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘सैटेनिक वर्सेज़’ का विरोध चरम पर था जिसकी आग कश्मीर तक भी पहुँची। परिणामस्वरूप 13 फरवरी को श्रीनगर में दंगे हुए जिसमें कश्मीरी पंडितों को बेरहमी से मारा गया।

पंडित टिकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या का उद्देश्य

पं० टिकालाल टपलू पेशे से वकील और जम्मू कश्मीर बीजेपी के अध्यक्ष थे। पं० टपलू आरंभ से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे तथा उदारमना व्यक्ति थे। पं० टपलू ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई की थी परंतु पैसे कमाने के लिए उन्होंने इस पेशे का कभी दुरुपयोग नहीं किया। वकालत से वे जो कुछ भी कमाते उसे विधवाओं और उनके बच्चों के कल्याण हेतु दान दे देते थे। उन्होंने कई मुस्लिम लड़कियों की शादियाँ भी करवाई थीं। पूरे हब्बाकदल निर्वाचन क्षेत्र में दोनों ही समुदाय के लोग पं टपलू का सम्मान करते थे तथा उन्हें ‘लाला’ अर्थात बड़ा भाई कह कर सम्बोधित करते थे।

उनकी यह छवि अलगाववादी गुटों की आँखों का काँटा थी क्योंकि पं० टिकालाल टपलू उस समय कश्मीरी पंडितों के सर्वमान्य और सबसे बड़े नेता थे। वास्तव में अलगाववादियों को घाटी में अपनी राजनैतिक पैठ बनाने के लिए कश्मीरी पंडितों के समुदाय को हटाना जरुरी था जो किसी भी कीमत पर पाकिस्तान का समर्थन नहीं करते। इसीलिए जम्मू कश्मीर लिबेरशन फ्रंट ने पंडितों के विरुद्ध दुष्प्रचार के विविध हथकंडे अपनाये। कश्मीर घाटी के कुछ लोकल अखबारों ने पंडित टिकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू समेत कई प्रतिष्ठित पंडितों के विरुद्ध दुष्प्रचार सामग्री प्रकाशित करना आरंभ कर दिया था।

आतंकियों ने पं० टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या की रणनीति बनाई। पं० टपलू को आभास हो चुका था कि उनकी हत्या का प्रयास हो सकता है इसीलिए उन्होंने अपने परिवार को सुरक्षित दिल्ली पहुँचा दिया और 8 सितम्बर 1989 को कश्मीर लौट आये। चार दिन बाद चिंक्राल मोहल्ले में स्थित उनके आवास पर हमला किया गया। यह हमला उन्हें सचेत करने के लिए था किंतु वे भागे नहीं और डटे रहे। महज दो दिन बाद 14 सितम्बर को सुबह पं० टिकालाल टपलू अपने आवास से बाहर निकले तो उन्होंने पड़ोसी की बच्ची को रोते हुए देखा। पूछने पर उसकी माँ ने बताया कि स्कूल में कोई फंक्शन है और बच्ची के पास पैसे नहीं हैं।

पं० टपलू ने बच्ची को गोद में उठाया, उसे पाँच रुपये दिए और पुचकार कर चुप करा दिया। इसके बाद उन्होंने सड़क पर कुछ कदम ही आगे बढ़ाये होंगे कि आतंकवादियों ने उनकी छाती कलाशनिकोव की गोलियों से छलनी कर दी। सन 1989-90 के दौरान कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करने पर मजबूर करने के लिए की गयी यह पहली हत्या थी। पंडितों के सर्वमान्य नेता को मार कर अलगाववादियों ने स्पष्ट संकेत दे दिया था कि अब कश्मीर घाटी में ‘निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा’ ही चलेगा।

टिकालाल टपलू की हत्या के बाद काशीनाथ पंडिता ने कश्मीर टाइम्स में एक लेख लिखा और अलगाववादियों से पूछा कि वे आखिर चाहते क्या हैं। अगले दिन इसका जवाब जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने यह लिख कर दिया कि या तो कश्मीरी पंडित भारत राज्य को समर्थन देना बंद करें और अलगाववादी आन्दोलन का साथ दें अथवा कश्मीर छोड़ दें।

पं टपलू की हत्या के मात्र सात सप्ताह बाद जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गयी। सन 1989 तक पं० नीलकंठ गंजू- जिन्होंने मकबूल बट को फांसी की सजा सुनाई थी- हाई कोर्ट के जज बन चुके थे। वे 4 नवंबर 1989 को दिल्ली से लौटे थे और उसी दिन श्रीनगर के हरि सिंह हाई स्ट्रीट मार्केट के समीप स्थित उच्च न्यायालय के पास ही आतंकियों ने उन्हें गोली मार दी थी। इस वारदात से डर कर आसपास के दूकानदार और पुलिसकर्मी भाग खड़े हुए और खून से लथपथ जस्टिस गंजू के पास दो घंटे तक कोई नहीं आया।

कुछ दिनों बाद अमिराकदल के पास स्थानीय लड़के जस्टिस गंजू की हत्या का जश्न मनाते दिखाई दिए। आतंकियों ने जस्टिस गंजू से मकबूल बट की फाँसी का प्रतिशोध लिया था। साथ ही मस्जिदों से लगते नारों ने कश्मीर के लोगों को यह भी बता दिया था कि ‘ज़लज़ला आ गया है कुफ़्र के मैदान में, लो मुजाहिद आ गये हैं मैदान में।’ अर्थात अब अलगाववादियों के अंदर भारतीय न्याय, शासन और दंड प्रणाली का भय नहीं रह गया था।

पं० टिकालाल टपलू और जस्टिस गंजू की हत्या के बाद भी कई कश्मीरी पंडितों को मारा गया परन्तु तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्लाह कोरा दिलासा मात्र देते रहे और मार्तण्ड सूर्य मन्दिर के भग्नावशेष पर सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते रहे।   

दिसंबर 8, 1989 को मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बाद पंद्रह दिनों तक ड्रामा चला था जिसके बाद वी पी सिंह सरकार द्वारा अब्दुल हमीद शेख़, शेर खान, नूर मोहम्मद कलवल, अल्ताफ अहमद और जावेद अहमद जरगर नामक आतंकियों को जेल से छोड़ा गया था। चौदह साल बाद जेकेएलएफ के जावेद मीर ने रुबैया सईद के अपहरण की बात कबूल की थी। अगले साल जनवरी 25 जनवरी 1990 को जेकेएलएफ ने भारतीय वायु सेना के पाँच अधिकारियों की हत्या कर दी थी। खुद यासीन मलिक ने भी बीबीसी को दिए इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि उसने ड्यूटी पर जा रहे 40 वायुसैनिकों पर गोलियाँ चलाई थीं। यासीन मलिक और जेकेएलएफ को आज भी उनके किए की सज़ा नहीं मिल पाई है। हाँ, आज यह खबर आई कि सीबीआई ने वो केस फिर से खोला है।

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हमें हिंदू औरतें चाहिए… कश्मीर की हर मस्जिद से 19/1/1990 की रात आ रही थी यही आवाज

90 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं पर हुआ हत्याचार एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जिसे चाहकर भी भुला पाना असंभव है। रातों-रात खुद को बचाने के लिए कश्मीर में अपना घर, संपत्ति छोड़कर भागे लोगों के मन में आज भी उस रात की टीस बाकी है, जब उन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथी का शिकार होते अपनी आँखों के सामने बर्बरता से अपने लोगों को जिंदा जलते-मरते देखा और जिन्हें इंसाफ की लड़ाई लड़ते-लड़ते 30 साल हो गए।

बीते साल 14 नवंबर 2019 को ऐसी ही अनगिनत कहानियों को अपने दिल में समेट कर भारतीय स्तंभकार सुनंदा वशिष्ठ टॉम लैंटॉस एचआर द्वारा आयोजित यूएस कॉन्ग्रेस की बैठक के लिए वॉशिंगटन डीसी पहुँचीं थीं। हालाँकि वहाँ जाने से पहले ही उन्होंने ट्वीट कर इस बात की जानकारी दे दी थी कि आयोजन में वह सिर्फ़ कश्मीर से जुड़ी उन कहानियों के बारे में बात करने वाली हैं, जिन्हें लोगों ने कभी नहीं सुना होगा या फिर जिन्हें बताने से हमेशा बचा गया। लेकिन जब उन्होंने वहाँ बोलना शुरू किया और कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचारों की आवाज बनीं… तो मानो जैसे सब सिहर गए।

बतौर कश्मीर के हालातों की चश्मदीद, उन्होंने आयोजन में बोलना प्रारंभ किया। इस दौरान घाटी में पसरे इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण उन्होंने कश्मीर की तुलना सीरिया से की। उन्होंने 30 साल पहले का समय याद करते हुए कहा कि उन लोगों ने ISIS के स्तर की दहशत और बर्बता कश्मीर में झेली है। इसलिए उन्हें खुशी है कि आज इस तरह मानवाधिकारों की बैठक यहाँ हो रही हैं, क्योंकि जब मेरे जैसों ने अपने घर और अपनी जिंदगी सब गँवा दी थी, तब पूरा विश्व शांत था।

अपना गुस्सा जाहिर करते हुए सुनंदा वशिष्ठ ने लोगों से पूछा कि आखिर तब मानवाधिकार के वकील कहाँ थे, जब हमारे अधिकार हमसे छीने गए।

“कहाँ थे वो लोग जब 19 जनवरी 1990 की रात घाटी के हर मस्जिद से एक ही आवाज आ रही थी कि हमें कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए, लेकिन बिना किसी हिंदू मर्द के।”

उस रात की पीड़ा को जाहिर करते हुए सुनंदा ने आगे पूछा, “इंसानियत के रखवाले उस समय कहाँ थे जब मेरे दादाजी रसोई की चाकू और जंग लगी कुल्हाड़ी लेकर हमें मारने के लिए हमारे सामने केवल इसलिए खड़े थे, ताकि वो हमें उस बर्बरता से बचा सकें, जो जिंदा रहने पर हमारा आगे इंतजार कर रही थी।”

बैठक में उन्होंने बताया था कि उनके लोगों को आतंकियों ने उस रात केवल 3 विकल्प दिए थे। या तो वे कश्मीर छोड़कर भाग जाएँ, या फिर धर्मांतरण कर लें या फिर उसी रात मर जाएँ। सुनंदा वशिष्ठ के अनुसार उस रात करीब 4 लाख कश्मीरी हिंदुओं ने दहशत में आकर अपनी घर- संपत्ति सब जस का तस छोड़ दिया और खुद को बचाने के लिए वहाँ से भाग निकले।

उनके मुताबिक, आज 30 साल बाद भी वह कश्मीर स्थित उनके घर नहीं जा पाती। क्योंकि वहाँ उनका स्वागत ही नहीं होता। उन्हें आज भी वहाँ अपनी आस्था मानने की आजादी नहीं है। उनके घर को दूसरे समुदाय के लोगों ने घेर लिया है और घरों पर सिर्फ कब्जा नहीं हुआ बल्कि उन्हें जलाया जा चुका है।

कश्मीर पर बात करते हुए उन्होंने उस अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल को भी याद किया, जिसका मजहब इस्लाम न होने के कारण ISIS ने उसका सिर कलम कर दिया था, लेकिन फिर भी उसके आखिरी शब्द थे- “मेरे पिता एक यहूदी थे, मेरी माता एक यहूदी थी और मैं भी एक यहूदी ही हूँ।”

इस दौरान अपनी तुलना डेनियल पर्ल से करते हुए सुनंदा ने उनके आखिरी शब्दों को अपनी स्थिति बयान करने के लिए इस्तेमाल किया और कहा, “मेरे पिता एक कश्मीरी हैं, मेरी माता कश्मीरी हिंदू हैं और मैं भी एक कश्मीरी हिंदू ही हूँ। ”

इस बैठक में आपबीती सुनाते हुए भारतीय स्तंभकार ने दावा किया कि कश्मीर में उनका और उनके लोगों का पूरा जीवन कट्टरपंथ इस्लाम के कारण बर्बाद कर दिया गया। वे इस दौरान गिरिजा टिक्कू जैसी औरतों का भी जिक्र करती नजर आईं, जिनका अपहरण करके क्रूरता के साथ मार दिया। जिनके साथ सामूहिक बलात्कार हुए और जिन्हें टुकड़ों में काटकर फेंक दिया गया। उन्होंने बीके गंजू जैसे लोगों के बारे में भी बात की। जिन्हें अपने पड़ोसियों पर विश्वास करने के बदले सिर्फ़ विश्वासघात मिला। जिन्हें कंटेनर में ही गोली मार दी गई और उनकी पत्नी को खून से सने चावल (वो भी पति के ही खून से सने) खाने को मजबूर किया गया।

बता दें कि सुनंदा द्वारा यूएस कॉन्ग्रेस की बैठक में कही गई इन बातों के लिए उन्हें खूब सराहा गया था। स्वयं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उनके वीडियो को शेयर कर उन्हें शाबाशी दी थी। उन्होंने लिखा था कि ये वो आवाज है, जो सुनी जानी चाहिए।

50 से ज्यादा धमाकों में शामिल रहे जलीस से पहले भी कानपुर से पकड़े जा चुके हैं आतंकी

उत्तर प्रदेश का कानपुर देश की आज़ादी के समय क्रांतिकारियों का गढ़ रहा। लेकिन, बीते कुछ सालों में इस शहर से कई आतंकी पकड़े जा चुके हैं। शुक्रवार को ही कानपुर की ही एक मस्जिद से मुम्बई बम धमाकों के मास्टर माइंड डॉक्टर जलीस अंसारी को यूपी पुलिस ने गिरफ़्तार किया। 50 से ज्यादा धमाकों में शामिल रहा यह आतंकी परोल पर जेल से बाहर आया था। परोल खत्म होने से पहले ही वह मुंबई से गायब हो गया और अगले दिन कानपुर में पकड़ा गया।

उसने पुलिस को बताया कि अपने 30 वर्ष पुराने दोस्तों से मदद लेने के लिए वह कानपुर आया था। इसमें से एक की मौत हो गई थी और दूसरा अब कानपुर में नहीं रहता। कानपुर से पकड़ा गया जलीस पहला आतंकी नहीं है। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी के एजेंट भी यहॉं से पकड़े जा चुके हैं। आतंकी संगठनों के लिए फंड इकट्ठा करने वाले रमेश शाह के तार भी इस शहर से जुड़े थे।

दैनिक जागरण के कानपुर संस्करण में 18 जनवरी 2020 को प्रकाशित खबर

सात मार्च 2017 को कानपुर में आइएस के खुरासान मॉड्यूल की गतिविधियाँ पुलिस के सामने आई थी। उसी दिन भोपाल-उज्जैन पैसेंजर ट्रेन में धमाका हुआ था और जाजमऊ के गिरोह का नाम सामने आया था। जाँच में इस गिरोह के सदस्य आइएस के खुरासान मॉड्यूल के एजेंट निकले। दो दिन बाद ही एटीएस ने इनमें से एक आतंकी सैफुल्लाह को लखनऊ में मुठभेड़ में मार गिराया था।

इससे पहले सितंबर 2009 को आइएसआइ एजेंट इम्तियाज सचेंडी से पकड़ा गया था। सितंबर 2009 में बिठूर से आइएसआइ एजेंट वकास गिरफ्तार किया गया। सितंबर 2011 को आइएसआइ एजेंट फैसल रहमान उर्फ गुड्डू को एटीएस ने रेलबाजार से गिरफ्तार किया। जुलाई 2012 में सेंट्रल स्टेशन से फिरोज पकड़ा गया। अप्रैल 2014 में पटना में विस्फोट के एक संदिग्ध को पनकी स्टेशन के पास एटीएस ने पकड़ा।

कानपुर शहर से पकड़े गए इन आतंकियों से एक बात तो साफ़ है कि आतंकियों को शहर में पनाह ही नहीं, बल्कि वैचारिक और आर्थिक रूप से सपोर्ट भी मिल रहा है। बीते दिनों शहर में सीएए के विरोध के नाम पर पुलिस पर पत्थर और पेट्रोल बम फेंके गए थे।

मुंबई से नमाज पढ़ने निकला था ‘डॉ. बम’, कानपुर की मस्जिद से निकलते धराया

हिंदू बनकर छिपा था दाऊद इब्राहिम का शूटर एजाज, आधार कार्ड बनवाने जा रहा था दरभंगा

CAA-विरोध की आड़ में आंतकी कनेक्शन का खुलासा: घुसे इंडियन मुजाहिदीन और सिमी के आतंकी

370 हटाने के बाद J&K में नहीं हुई एक भी मौत: PDP नेता अल्ताफ बुखारी

जम्मू-कश्मीर में 6 महीनों के बाद राजनीतिक गतिविधियाँ अब जोर पकड़ने लगी हैं। पिछले तीन हफ़्तों में पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस (NCP) के 17 बड़े नेताओं को भी रिहा कर दिया गया है। इसी बीच जम्मू-कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री और पीडीपी नेता सैय्यद अल्ताफ बुखारी का बयान आया है। बुखारी ने केंद्र सरकार की तारीफ करते हुए कहा है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटने के बाद एक भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई है। इसका श्रेय उन्होंने राज्य की जनता और केंद्र सरकार को दिया है। उन्होंने कहा कि मैं दोनों को बधाई देना चाहता हूँ।

गौरतलब है कि अनुछेद 370 हटने और राज्य के ​यूनियन टेरिटरी बनने के बाद कश्मीर में राजनीतिक गतविधियाँ थम गईं थीं। क्योंकि माहौल खराब होने से बचाने के लिए जम्मू-कश्मीर के कई बड़े नेताओं को या तो हिरासत में लिया गया था या फिर घरों में नज़रबंद कर दिया गया था।

वर्तमान में 36 केंद्रीय मंत्रियों का दल 6 दिवसीय जम्मू-कश्मीर के दौरे पर है। राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर सभी मंत्री अनुच्छेद 370 हटाने के फायदे बताएँगें। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से पिछले वर्ष 05 अगस्त को अनुच्छेद 370 निरस्त कर दिया था। साथ ही राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बॉंट दिया गया था।

साध्वी प्रज्ञा को धमकी देने वाले अब्दुल रहमान ने अफसरों से कहा था- आतंकियों के संपर्क में हैं माँ और भाई

मध्य प्रदेश के भोपाल से बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर को धमकी भरा खत भेजने वाला शख्स गिरफ्तार हो गया है। उसकी पहचान 35 वर्षीय डॉक्टर सैयद अब्दुल रहमान खान के तौर पर हुई है। मध्य प्रदेश के आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) ने उसे महाराष्ट्र के नांदेड जिले से पकड़ा। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक वह 3 महीने से एटीएस की रडार पर था। उसने अधिकारियों को पत्र लिखकर कहा था कि उसकी मॉं और भाई आतंकियों के संपर्क में हैं।

पुलिस ने बताया कि आरोपित अब्दुल रहमान खान ने भोपाल की सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर को अक्टूबर में कथित तौर पर संदिग्ध लिफाफा और धमकी भरा पत्र भेजा था। 13 जनवरी की रात इसे खोला गया और पुलिस को इसके बारे में जानकारी दी गई।

इस चिट्ठी के बारे में प्रज्ञा ठाकुर ने कहा था, “एक भारी लिफाफा आया जिसमें एक पाउच था। मैंने अपने पीए से कहा कि ये पाउच है, इसे तत्काल फेंक दो। उसने फेंक भी दिया। लेकिन उसमें कुछ फोटो दिखे, जिसे देखने से स्पष्ट नजर आ रहा है कि पाउच के अंदर एक पत्र था। पत्र उर्दू में है लेकिन उसके साथ और भी कई पेपर्स लगे हुए हैं। उसमें मेरा एक फोटो है जिसे क्रॉस किया गया है।”

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह खत पढ़ने के बाद साध्वी प्रज्ञा ने भोपाल पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्हें किसी ने कुछ लिफाफे और पत्र भेजे हैं, जिसमें जहरीला रसायनिक पदार्थ है। पाउडर के साथ उर्दू में लिखा हुआ जो खत मिला था, उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और प्रज्ञा ठाकुर के फोटो पर क्रॉस बना हुआ था। साध्वी के स्टाफ ने पत्र को संदिग्ध देखते हुए पुलिस को सूचना दी थी।

पुलिस ने बीजेपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर के आवास से तीन लिफाफे बरामद किए थे। जिसमें से कुछ लिफाफों में उर्दू में लिखे हुए पत्र थे। नांदेड के इतवारा पुलिस थाने के निरीक्षक प्रदीप ककाडे ने बताया कि जाँच के दौरान मध्यप्रदेश एटीएस ने यह पाया कि यहाँ के धनगाँव इलाके के डॉक्टर सैयद अब्दुल रहमान खान ने यह संदिग्ध लिफाफे प्रज्ञा ठाकुर को भेजे हैं। डॉक्टर खान इस इलाके में अपना क्लीनिक चलाता है। प्रदीप ककाडे ने बताया, “पुलिस उसके मोबाइल फोन की लोकेशन के जरिए उस पर नजर रख रही थी। लेकिन वह मोबाइल फोन घर पर ही छोड़ कर इन पत्रों को डालने औरंगाबाद, नागपुर और अन्य स्थानों पर जाता था।”

ककाडे ने बताया, “खान तीन माह से पुलिस के रडार पर था। उसने पहले भी कुछ अधिकारियों को पत्र लिखे थे। इसमें दावा किया था कि उसकी मॉं और भाई के आतंकवादियों से संपर्क हैं और उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए।” पुलिस ने बताया कि ऐसे पत्र लिखने के लिए खान को पहले भी गिरफ्तार किया जा चुका है।

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राहुल गाँधी की 10 पुश्तें भी नहीं कर पाएँगी सावरकर के साहस की बराबरी: स्मृति ईरानी

वीर सावरकर पर सियासत फिर से गरमा गई है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस और उसके पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी को जमकर लताड़ लगाई है। स्मृति ईरानी ने कहा है कि राहुल गाँधी की दस पुश्तें भी वीर सावरकर के साहस का मुकाबला नहीं कर पाएगी। राहुल गाँधी ने कुछ दिनों पहले कहा था कि वे वो माफी नहीं माँगेंगे क्योंकि उनका नाम राहुल गाँधी है, राहुल सावरकर नहीं।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में शनिवार को संशोधित नागरिकता कानून (CAA) के समर्थन में BJP की जनसभा हुई। सभा को स्मृति ईरानी के अलावा यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने भी संबोधित किया।

स्मृति ईरानी ने कहा, “राहुल गॉंधी ने हाल में कहा था कि मैं माफी नहीं मॉंगूॅंगा। मैं राहुल सावरकर नहीं हूॅं। मैं आज उनसे कहना चाहती हूॅं कि आपके बाद की 10 पुश्तें भी सावरकर के हौसले का मुकाबला नहीं कर पाएँगी।” केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ये वही कॉन्ग्रेस पार्टी है, जिन्होंने इमरजेंसी में अटल बिहारी वाजपेयी को कारावास में बंद किया। चौधरी चरण सिंह को कारावास में बंद किया, जेपी को कारावास में बंद किया और मुंबई में स्मगलर करीम लाला को खुला छोड़ दिया।

इससे पहले शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी वीर सावरकर को लेकर कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा कि जो लोग वीर सावरकर का विरोध करते हैं वे किसी भी विचारधारा या पार्टी से हों, उन्हें दो दिन के लिए अंडमान के सेल्यूलर जेल में भेज दो, जहाँ सावरकर को बंधक बनाया गया था। तब उन्हें उनके बलिदान और उनके योगदान का एहसास होगा। बता दें कि कॉन्ग्रेस के सीनियर नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने एक दिन पहले ही यह बयान दिया था कि सावरकर के अंग्रेजों से माफी माँगने की बात मिटाई नहीं जा सकती है। ऐसे में अगर नरेंद्र मोदी सरकार सावरकर को भारत रत्न देती है तो पार्टी इसका विरोध करेगी

रामचंद्र गुहा पर टूट पड़ी गालीबाज ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी, राहुल गाँधी के समर्थन में धड़ाधड़ दागे ट्वीट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कटु आलोचकों में से एक रामचंद्र गुहा ने केरल साहित्य महोत्सव में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी की खिंचाई की। इसके बाद कॉन्ग्रेस के कुछ फुल टाइम गालीबाज ट्रोल पत्रकार मैदान में आकर राहुल गाँधी की ओर से बैटिंग करने लगे। इन्हीं में से एक नाम है स्वाति चतुर्वेदी।

रामचंद्र गुहा के बयान से बौखलाई स्वाति चतुर्वेदी ने अपने ट्विटर अकाउंट से एक के बाद एक जहरीले ट्वीट करने शुरू किए। स्वाति चतुर्वेदी ने रामचंद्र गुहा को रीट्वीट करते हुए लिखा, “मेरे लिए यह विश्वास करना मुश्किल है कि मीडिया सहित किसी को भी मोदी के बारे में कोई भ्रम था। मुझे अभी तक समझ में नहीं आ रहा है कि शिक्षाविद, नीति निर्माता और मीडिया किस तरह से मोदी मिथक में पड़ गए?”

इसके साथ ही स्वाति चतुर्वेदी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक झाँसा देने वाला व्यक्ति बताया है।

केरल में राहुल गाँधी के चुने जाने को भयावह बताने वाले गुहा के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए स्वाति चतुर्वेदी ने लिखा है कि रामचंद्र गुहा राहुल गाँधी के बारे में भ्रमित नजर आ रहे हैं। इसके बाद स्वाति चतुर्वेदी ने राहुल गाँधी की तारीफ करते हुए लिखा है कि आप रामचंद्र गुहा की तरह चाहे राहुल गाँधी से नफरत करें या उनकी आलोचना करिए, लेकिन वह संघ के लिए एक चुनौती की तरह काम कर रहे हैं। जिस तरह से मोदी और आईटी सेल उनके विरुद्ध झूठ से आक्रमण करता है, उनके अंदर बहुत साहस भी है।

स्वाति चतुर्वेदी ने अगले ट्वीट में लिखा कि इससे पहले कि आप राहुल गाँधी को रिटायर होने की सलाह दें, मुझे बताइए कि उन्होंने किस बड़े हत्यारे को पछाड़ा है?

स्वाति चतुर्वेदी इसके बाद रामचंद्र गुहा के मुद्दे को पीछे छोड़कर वापस अपने चिरपरिचित अंदाज में लोगों को ट्वीट में जवाब देती रहीं और उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके CV में सिर्फ 2002 की हत्याओं का ही जिक्र है।

गौरतलब है कि गुहा ने कहा था कि लोकसभा चुनाव में वायनाड से राहुल गाँधी को चुनकर केरल के लोगों ने विनाशकारी काम किया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने राहुल गाँधी का कोई भविष्य नहीं है। केरल साहित्य महोत्सव के दूसरे दिन शुक्रवार (17 जनवरी, 2019) को ‘राष्ट्र भक्ति बनाम अंधराष्ट्रीयता’ विषय पर बोल रहे रामचंद्र गुहा के सुर बदले-बदले से रहे। उन्होंने कहा कि ‘खानदान की पाँचवी पीढ़ी’ के राहुल गाँधी के पास भारतीय राजनीति में ‘कठोर परिश्रमी और खुद मुकाम बनाने वाले’ नरेंद्र मोदी के सामने कोई मौका नहीं है।

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कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचारों के तीस साल: ट्रेंड कर रहा ‘हम वापस आएँगे’

कश्मीरी पंडितों पर वर्ष 1990 में अपने ही देश में हुए अत्याचारों को आज 30 वर्ष गुजर चुके हैं। लेकिन कश्मीरी पंडितों के दिलों में वह याद आज भी ताजा हैं। आज उन दिनों को याद कर किसी पीड़ित की आँखों में आँसू हैं तो किसी पीड़ित की आँखों में एक आस कि “हम वापस आएँगे।”

अपने ही देश में शरणार्थी बन कर रहे कश्मीरी पंडितों को अपनी दास्तां सुनाते-सुनाते आज पूरे तीस साल गुजर चुके हैं। आज ही के दिन कश्मीर में पंडितों पर हुए नरसंहार के वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर याद कर रहे हैं और आने वाली फ़िल्म शिकारा के डायलॉग ‘हम आएँगे अपने वतन’ के जरिए अपनी भावना व्यक्त कर रहे हैं।
इस फ़िल्म को विधु विनोद चोपड़ा ने लेखक राहुल पंडिता की किताब ‘Our Moon Has Clots’ पर बनाया है। ट्विटर पर हम वापस आएँगे (#HumWapasAyenge) ट्रेंड कर रहा है।

आगामी 7 फरवरी को रिलीज़ होने वाली फ़िल्म शिकारा में कश्मीरी पंडित पलायन की भयावह घटनाओं को दिखाया गया है, जो 19 जनवरी 1990 को हुई थी। जब इस्लामिक आतंकवादियों ने नरसंहार की धमकी देकर लाखों कश्मीरी पंडितों को घाटी स्थित अपने घरों से भागने के लिए मजबूर कर दिया था।

प्रसिद्ध राजनीतिक टिप्पणीकार #HumWapasAayenge के साथ अपने बचपन की एक फ़ोटो साझा करते हुए लिखा है कि मेरे पास अपने बचपन की कई तस्वीरें नहीं हैं। जीवन और फैमिली एलबम के बीच चयन करने में कोई विकल्प नहीं है। जान बचाने के दौरान फैमली एलबम पीछे छूट गए। 30 साल हो गए। घर वापस जाने का संकल्प केवल मजबूत हुआ है।

पत्रकार राहुल पंडिता ने एक वीडियो ट्वीट करते हुए कश्मीर वापस लौटने की इच्छा व्यक्त की। इसमें उन्होंने कहा है, “हम आएँगे अपने वतन हाजी साहब औऱ यहीं दिल लगाएँगे। यहीं पर मरेंगे और यहीं के पानी में हमारी राख बहाई जाएगी।

पंडिता के इस वीडियो के जरिए कई अन्य पीड़ितों ने भी कश्मीर लौटने का अपना इरादा जताया है।

ट्विटर पर चलाए गए इस अभियान को बहुत से लोगों ने अपने-अपने करीक़े से अपना समर्थन दिया। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जुलाई 2019 में घोषणा की थी कि केंद्र सरकार कश्मीरी पंडितों को घाटी में वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध है। इतना ही नहीं शाह ने कश्मीरी पंडितों को भरोसा दिलाया था कि एक समय आएगा कि जब वे प्रसिद्ध खीर भवानी मंदिर में प्रार्थना करेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ह्यूस्टन में कश्मीरी पंडितों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करते हुए कहा था, ”आपको बहुत नुकसान हुआ है और नए कश्मीर के निर्माण की ओर बढ़ने का समय आ गया है।”

शबाना आज़मी का एक्सिडेंट, साथ में बैठे थे जावेद अख्तर: गंभीर हालत में ले जाया गया अस्पताल

गीतकार और लेखक जावेद अख़्तर की पत्नी और अभिनेत्री शबाना आज़मी सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गई हैं। खालापुर टोल प्लाज़ा के पास पुणे-मुंबई एक्सप्रेस पर उनकी कार ट्रक से टकरा गई। इसके बाद उन्हें एमजीएम हॉस्पिटल पनवेल में भर्ती कराया गया। बता दें कि जिस वक्त यह हादसा हुआ उस समय कार में उनके पति जावेद अख़्तर भी बैठे हुए थे। हालाँकि, उन्हें कोई चोट नहीं आई है।

मुंबई मिरर ने प्रारंभिक जानकारी के अनुसार लिखा कि दोपहर क़रीब 3:30 बजे खालापुर टोल प्लाज़ा के पास उनकी कार और ट्रक में टक्कर हो गई। इस हादसे में उनका ड्राइवर भी घायल हो गया है, उसे भी इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

सड़क हादसे में शबाना आज़मी गंभीर रूप से घायल हुईं (तस्वीर साभार: मुंबई मिरर)

इस सड़क हादसे की ख़बर जैसे-जैसे लोगों तक पहुँची, वैसी ही जावेद अख़्तर और शबाना आज़मी के जल्द ठीक होने की दुआएँ की जाने लगी। राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट कर उनके जल्द ठीक होने की कामना की।

मुंबई में कल रात (17 जनवरी) अभिनेत्री शबाना आज़मी ने अपने पति जावेद अख़्तर का 75 वां जन्मदिन मनाया था। फ़िलहाल, इस बात का पता नहीं चल सका है कि जन्मदिन मनाने वो कहाँ गए थे।

अस्पताल के बाहर खड़े जावेद अख़्तर (तस्वीर साभार: मुंबई मिरर)

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