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केरल में ABVP की बढ़ती लोकप्रियता से कुढ़े SFI के गुंडों ने किया छात्रों पर जानलेवा हमला

वामपंथी आतंकवाद JNU से लेकर केरल तक की शिक्षा संस्थानों में अपने पैर पसार रहा है। कहीं न कहीं इसके पीछे वामपंथ का सिकुड़ता आधार भी बड़ी वजह जो इन वामपंथी संगठनों को हिंसा आदि के जरिए युवाओं पर दबाव बनाकर, उन्हें बरगलाकर अपनी रक्तपात की मानसिकता को बचाए रखना चाहता है।

अभी JNU में ABVP के छात्रों और उनके समर्थकों पर वामपंथी नकाबपोशों के हमले के बाद जिसमें चार प्रमुख वामपंथी संगठन हिंसा के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा आरोपित ठहराए गए हैं। जिस पर अभी आगे जाँच जारी है। ऐसे में ताजा मामला केरल से है जहाँ SFI के गुंडों द्वारा ABVP के कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमला किया गया, जिसमें कई छात्रों और ABVP कार्यकर्ताओं को गहरी चोट आई हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, केरल के वज़ूर NSS कॉलेज में वामपंथी गुंडागर्दी और आतंक के लिए कुख्यात SFI ने ABVP कार्यकर्ताओं पर कायराना हमला किया है। वामपंथी गुट SFI की निरंतर चली आ रही ऐसी हरकतों की वजह से कैम्पस में लगातार माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है। कहा जा रहा है, कैम्पस में ABVP की बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखकर SFI अब हर तरह की गुंडागिर्दी पर उतर आया है।

गौरतलब है कि, केरल के वज़ूर NSS कॉलेज में एबीवीपी ने पिछले बृहस्पतिवार को एकता सम्मेलन का आयोजन किया था जिसमें काफी संख्या में छात्रों की उपस्थिति देखी गई। यह देखकर स्वतन्त्रता और सहिष्णुता का दिखावा करने वाले SFI की, छात्रों के बीच ABVP की बढ़ती लोकप्रियता देखकर चिन्ताएँ इतनी बढ़ गईं कि ये गुंडागर्दी और मारपीट पर उतारू हो गए।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, ABVP की छात्रों के बीच बढ़ती लोकप्रियता से परेशान SFI के गुंडों द्वारा ABVP के कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमला किया गया, जिनमें से कई छात्रों को गहरी चोट आई हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बताया जा रहा है कि ABVP कार्यकर्ताओं के खिलाफ हमले इस एक सप्ताह में बढ़ गए हैं, खासकर समारोह में आई भीड़ के बाद से लगातार ABVP के कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, SFI के इस गुंडागर्दी वाले आक्रामक व्यवहार, उनके मार-काट करने वाली मानसिकता के लिए SFI की आलोचना की जा रही है और आम छात्रों द्वारा केरल कॉलेज, CMS कॉलेज, CUSAT आदि परिसरों में आम छात्रों द्वारा इसका बड़े स्तर पर विरोध किया जा रहा है।

SFI द्वारा बनाए जा रहे इस गुंडागिर्दी के माहौल के कारण छात्रों का शान्ति से पढ़ना भी मुश्किल हो चुका है। पीड़ित छात्र निरंतर SFI की इन हरकतों का विरोध कर रहे हैं।

बता दें कि केरल में बीजेपी कार्यकर्ताओं पर पहले भी हमले होते आए हैं। तब भी केरल में बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता एक बड़ा कारण रही है। हाल ही में, वामपंथी छात्रों की गुंडई का उदाहरण JNU में भी देखने को मिला था।

सिर्फ ‘तीसरे कैंडिडेट’ की भूमिका में है दिल्ली चुनावों में कॉन्ग्रेस, BJP ही लगा सकती है केजरी के झाँसों में सेंध

दिल्ली 2013 और 2015 में हुई ऐतिहासिक चुनावी उठा-पटक के बाद एक बार फिर चुनाव के लिए तैयार है। जंतर-मंतर में ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ जैसे आंदोलन से निकले अरविन्द केजरीवाल में आम आदमी ने अपने चेहरे को देखते हुए 2015 के विधानसभा चुनाव में 70 में से 67 सीटें आम आदमी पार्टी के खाते में डाल दीं।

हालाँकि, एक नाटकीय तरीके से शुरू हुआ यह क्रम जल्द ही जनता के सामने बेनकाब भी होता गया। लेकिन, बावजूद इसके अरविन्द केजरीवाल इन पाँच सालों में कभी राज्यपाल तो कभी दिल्ली सरकार के पास पुलिस और ‘अधिकार’ ना होने का रोना रोकर लगातार राष्ट्रीय चर्चा बने रहने में कामयाब रहे।

इस सबके बीच दिल्ली में आम आदमी की चर्चा में से कॉन्ग्रेस निरंतर गायब ही नजर आई। बात चाहे लोकसभा चुनावों की हो, आम आदमी पार्टी द्वारा किए गए फ्री वाई-फ़ाई और CCTV के अधूरे वादों की हो, या फिर मनोज तिवारी द्वारा दिल्ली में भाजपा को एक चेहरा देने के लिए की गई कोशिशों की हो, कॉन्ग्रेस हर पहलू पर चर्चा से नदारद ही मिली।

सबसे ज्यादा हैरान कर देने वाली बात देश में सबसे लम्बे समय तक इकतरफा सत्ता में रहने वाले कॉन्ग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल का पतन है। यदि मात्र दिल्ली की ही बात करें तो 15 साल सरकार चलाने के बाद 2013 के दिल्ली चुनाव में कॉन्ग्रेस मात्र 8 सीटें जीत सकी। फिर जब 2015 में चुनाव हुए तो यह पार्टी अपना खाता तक खोल पाने में नाकाम रही। हालात यह हैं कि अब 2020 के विधानसभा चुनावों में भी यह पार्टी संघर्ष करती हुई नजर आ रही है।

कैंडिडेट्स की लिस्ट जारी करने में अभी तक सिर्फ आम आदमी पार्टी ही सबसे ज्यादा आत्मविश्वास में नजर आई है। आम आदमी पार्टी ने पहले ही झटके में सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कि, जबकि भाजपा ने भी 57 सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है। हालाँकि, आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल के विरुद्ध एक चेहरा उतारने में भाजपा ने अभी भी कोई जल्द बाजी नहीं दिखाई है। कॉन्ग्रेस ने अभी तक 54 उम्मीदवारों को नामित कर लिया है लेकिन दिल्ली में पार्टी का चेहरा कौन होगा, इस बात पर अभी भी संशय ही है।

एक समय तक दिल्ली में कॉन्ग्रेस का मुख्य चेहरा माने जा रहे अजय माकन इस चुनाव में बहुत उत्साहित नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में अरविंदर सिंह लवली, जो कि दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शिला दीक्षित के करीबी माने जाते रहे, पर ही कॉन्ग्रेस अपना विश्वास जता सकती है। यूँ तो भाजपा के पूर्वांचल के मास्टरस्ट्रोक के खिलाफ कॉन्ग्रेस महाबल मिश्र जैसे चेहरे को सामने ला सकती है, लेकिन कॉन्ग्रेस के इस वरिष्ठ नेता के बेटे विनय मिश्र ने हाल ही में आम आदमी पार्टी से नाता जोड़ लिया है और AAP ने उन्हें द्वारका से टिकट भी दे दिया है। ऐसे में महाबल मिश्र अपने बेटे के ख़िलाफ़ कोई कदम उठाएँगे यह संभव नहीं लगता है।

लेकिन कॉन्ग्रेस के लिए पार्टी का एक चेहरा तलाशने से ज्यादा ज़रूरी इस समय दिल्ली चुनाव में खुद को किसी तरह प्रासंगिक बनाए रखना है। दिल्ली में ही होने के बावजूद कॉन्ग्रेस इस चुनाव में पूरी तरह से उदासीन ही नजर आ रही है। आखिरी बार कॉन्ग्रेस जब वाहवाही बटोरती हुई देखी गयी थी, तब उसने 2013 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को अपना बाहरी समर्थन देकर और लोकपाल के मुद्दे पर किनारा कर अरविन्द केजरीवाल के एजेंडे को बेनकाब करने (न चाहते हुए भी) का काम किया था।

कॉन्ग्रेस आज देश में इतनी पस्त है कि अक्सर वो भाजपा की हार पर खुश होती देखी जा सकती है। कभी जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी जैसे चेहरों वाले कॉन्ग्रेस दल ने आज अपने लक्ष्य इतने सीमित कर दिए हैं कि उसके लिए अपनी जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण भाजपा के हारने की खबरों का इन्तजार रहने लगा है। अक्सर कॉन्ग्रेस के नेता लोगों को भाजपा के खिलाफ एकजुट होने जैसा बयान देते।

हाल ही में पी चिदंबरम ने भी कहा कि लोगों को CAA और NRC के विरोध के जरिए भाजपा के खिलाफ एक मंच पर आना चाहिए। जिसका स्पष्ट अर्थ विरोधी दलों को कॉन्ग्रेस के झंडे के नीचे शरण देने का आह्वाहन था। लेकिन दिल्ली चुनावों में कॉन्ग्रेस किसी और को समर्थन क्या देगी, इस चुनाव में तो अगर कोई सबसे छोटा दल नजर आ रहा है तो वो खुद कॉन्ग्रेस है।

दिल्ली चुनावों में सबसे बेहतरीन बात यह है कि यह आम जनता के मुद्दों पर लड़ा जा रहा है। अरविन्द केजरीवाल ने लोगों को मुफ्त बिजली और पानी देने के बहाने साफ़ पानी, बिजली की निरंतरता, सस्ता इलाज और अच्छी शिक्षा जैसे कई अन्य बुनियादी जरूरतों की ओर ध्यान ही नहीं जाने दिया है। वहीं भाजपा दिल्ली में सरकार बनाने के एक मौके के इन्तजार में है। अरविन्द केजरीवाल जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप और केंद्र सरकार पर बदले की राजनीति करने के आरोप लगाकर पाँच साल काट चुके हों, यह भी हो सकता है कि जनता इसका दीर्घकालीन उपचार कर भाजपा को ही दिल्ली की सत्ता सौंप दे।

अरविन्द केजरीवाल ने अपनी ही पार्टी के कुछ जीते हुए प्रत्याशियों की जगह दल-बदलकर आए हुए नेताओं को प्राथमिकता दी है, जिसका प्रभाव दिल्ली चुनाव परिणामों पर पड़ना तय है। इसके अलावा आम आदमी पार्टी दिल्ली में सिख समुदाय और पूर्वांचल के वोट बैंक को साधने का हर संभव प्रयास करेगी। ऐसे में देखना यह है कि कपिल मिश्रा और मनोज तिवारी आम आदमी पार्टी के साथ अपने एक्सपीरियंस का इस्तेमाल भाजपा के लिए दिल्ली में जगह बनाने के लिए कर पाते हैं या नहीं?

खुद को वोट कटुआ पार्टी कहने वाली कॉन्ग्रेस तब भी कहीं मैदान में नजर नहीं आती है। वैसे भी कॉन्ग्रेस का योगदान इस चुनाव में सिर्फ आम आदमी पार्टी का ‘सेक्युलर’ वोट काटने तक ही सीमित रहने वाला है। आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल से झगड़ा मोल लेकर उनकी विधायक अलका लंबा ने भी कॉन्ग्रेस की डूबती नाँव का सहारा लिया है। चाँदनी चौक विधानसभा इसी वजह से चर्चा का विषय भी बनी रहेगी।

इसके अलावा कालका जी सीट से आतिशी मार्लेना, मॉडल टाउन से कपिल मिश्रा और नई दिल्ली सीट से अरविन्द केजरीवाल इस चुनाव का हॉट टॉपिक रहने वाले हैं। आमिर खान और सलमान खान की एक मशहूर फिल्म अंदाज अपना-अपना में रवीना जी और करिश्मा जी को पाने रेस में एक समय एक ‘तीसरा’ कैंडिडेट भी नजर आया था, कॉन्ग्रेस की हालात आज उस तीसरे कैंडिडेट से भी बद्तर है।

मेंगलुरू एयरपोर्ट पर बैग में IED मिलने से हड़कंप: पुलिस ने जारी की संदिग्ध की तस्वीर

कर्नाटक के मंगलूरू एयरपोर्ट पर एक संदिग्ध बैग में IED मिलने से हड़कंप मच गया। IED से भरा यह बैग केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) को प्राप्त हुआ। घटना की सूचना के बाद एयरपोर्ट पर अफ़रा-तफ़री का माहौल बन गया। CISF के DIG अनिल पांडे ने बताया कि था कि उन्हें मंगलूरू एयरपोर्ट के टिकट काउंटर पर यह बैग मिला, इसमें IED होने के सबूत मिले। इसके बाद पूरे क्षेत्र को खाली कराते हुए बैग को एयरपोर्ट से बाहर निकाल दिया गया। फ़िलहाल अब तक इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है कि यह बैग किसने रखा था।

DIG अनिल पांडे ने बताया कि CCTV फुटेज के अनुसार, मंगलूरू हवाई अड्डे पर एक संदिग्ध व्यक्ति ने बैग रखा था और चेहरा छिपाते हुए वो ऑटो में जाते दिख रहा है। संदिग्ध वस्तु का समय पर पता लगा लिया गया और स्थानीय बम निरोधक टीम निष्क्रिय करने में जुट गई। मंगलूरू पुलिस ने संदिग्ध शख्स और ऑटो की तस्वीर जारी की है।

ख़बर के अनुसार, हवाई अड्डे की सुरक्षा में तैनात केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल ने पूरे क्षेत्र की घेराबंदी कर दी है। मंगलूरू पुलिस आयुक्त पीएस हर्ष भी पुलिस टीम के साथ हवाई अड्डे पर पहुँचे। बम निरोधक दस्ते ने खोजी कुत्तों और मेटल डिटेक्टर्स की मदद से बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान शुरू कर दिया है। एक वीडियो बयान देते हुए पुलिस आयुक्त हर्ष ने कहा कि CISF ने एक संदिग्ध बैग बरामद किया था, सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत हालात पर क़ाबू पा लिया गया और पुलिस नियंत्रण कक्ष को सूचित कर दिया गया है।

इसके अलावा, पुलिस आयुक्त ने बताया था कि नागरिकों को बैग से दूर कर दिया गया और हालात सामान्य रहे। पुलिस सभी सावधानियाँ बरत रही है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार दो लोग एक ऑटो रिक्शा मे आए थे और वो बैग रखकर वहाँ से चले गए। फ़िलहाल मंगलूरू पुलिस मामले की तफ़्तीश में जुटी हुई है।

दिल्ली को दहलाने की साजिश हुई नाकाम: IED के साथ 3 आतंकी इस्लाम, अली और जमाल दबोचे गए

देखें Video: IED बम धमाके से दहली इम्फाल, 5 पुलिस कर्मियों सहित 6 घायल

झारखंड: सरायकेला में नक्सलियों ने किया IED ब्लास्ट, 15 जवान घायल, कुछ की स्थिति गंभीर

कश्मीर में डी-रेडिकलाइज़ेशन केंद्रों की ज़रूरत, इससे भटके हुए लोगों को मिलेगी मदद: डीजीपी दिलबाग सिंह

जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ ज़िले में तीन आतंकियों के ढेर होने की ख़बर सामने आई है। इस सन्दर्भ में जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाग सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेन्स आयोजित कर बताया कि हिज़बुल मुजाहिदीन का एक कमांडर जो 2017 से सक्रिय था उसे मार गिराया गया है। उसके ख़िलाफ़ 19 FIR दर्ज थे और वो 4 नागरिकों समेत 4 पुलिसकर्मियों की हत्या में भी वो शामिल था। मारे गए आतंकियों में दूसरा आतंकी आदिल शेख था और तीसरे की पहचान जहाँगीर के रूप में हुई। इसके अलावा उन्होंने कहा कि हिजबुल मुजाहिदीन दक्षिण-कश्मीर में पूरी तरह से ख़त्म होने की कगार पर है।

प्रेस कॉफ्रेंस में कश्मीर में डी-रेडिकलाइज़ेशन केंद्रों की ज़रूरत के सवाल पर जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि अगर ऐसी कोई सुविधा सामने आती है जो एक अच्छा संकेत होता, तो ऐसा होना चाहिए। यह निश्चित तौर पर लोगों की मदद करेगा, विशेषतौर पर जो लोग भटक गए हैं।

इसके अलावा उन्होंने कहा, “अगर इस तरह की कोई सेंसिबल व्यवस्था की जाए तो सिविल सोसाइटी के लोग और एक्सपर्ट जो धर्म, ऐसे अन्य विषय और प्रासंगिक पहलुओं से निपटते है… उनके लिए आसानी होगी। मुझे लगता है कि यह एक सही कदम होगा। इस तरह की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।”

इससे पहले, बुधवार (15 जनवरी) को आयोजित एक कार्यक्रम में चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (CDS) और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने कहा था कि अगर आतंक का ख़ात्मा करना है तो आतंकवादियों से अमेरिका की तरह लड़ाई लड़नी होगी। जैसा कि उन्होंने 9/11 के बाद आतंकियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की थी। इस दौरान सेनाध्यक्ष ने यह भी कहा था कि आतंकियों के ख़िलाफ़ एक लंबी लड़ाई लड़नी होगी, इसके लिए वैश्विक जंग की आवश्यकता है। ऐसा करके आतंकियों को विश्व में अलग-थलग किया जा सकता है।

इतना ही नहीं जनरल रावत ने पाकिस्तान की ओर इशारा करते हुए कहा था कि, जो देश आतंकियों की हर तरह से मदद करते हों वह अपने को आतंक से पीड़ित नहीं बता सकते। इसलिए ऐसे देशों को इस वैश्विक जंग में बाहर करना होगा तभी हम इनके ख़िलाफ़ बेहतर लड़ाई लड़ी जा सकती है। याद दिला दें कि पिछले साल 15 अगस्त को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल क़िले की प्राचीर से तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल बिठाने के लिएए सीडीएस के पद की घोषणा की थी। इस पद की ज़िम्मेदारी सबसे पहले जनरल विपिन रावत को सौंपी गई है।

SPO से आतंकी बने आदिल, जहाँगीर, वसीम वानी शोपियाँ मुठभेड़ में ढेर, भारी मात्रा में हथियार-गोला बारूद बरामद

आतंकियों से निपटने के लिए भारत अपनाए अमेरिकी मॉडल, पाकिस्तान को अलग-थलग करना होगा: CDS विपिन रावत

देश के पहले CDS होंगे जनरल बिपिन रावत, PM मोदी ने निभाया लाल किले से किया गया बड़ा वादा

‘आज के शिवाजी- नरेंद्र मोदी’ से बौखलाया आशुतोष का सत्यहिंदी, पूछा- क्या शिवाजी को मुस्लिमों से नफ़रत थी?

हिंदू हृदय सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज का साहस और उनकी शूरवीरता विश्वविख्यात है। भारतीय संदर्भ में छत्रपति शिवाजी महाराज को हमेशा एक ऐसे महानायक के तौर पर देखा जाता है, जिन्होंने इस्लामिक आक्रांताओं के दबाव में कभी स्वराज्य का झंडा झुकने नहीं दिया। जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी मराठाओं की शान को बनाए रखा और औरंगजेब जैसे बर्बर मुगल शासक का सामना कर प्रतिपल नए कीर्तिमान रचे। जाहिर है, आज के समय में अगर उनकी विशेषताओं की तुलना किसी व्यक्ति विशेष से की जाए, तो संदर्भ पूरी तरह बदला हुआ होगा। मसलन उस व्यक्ति विशेष के पास भले ही छत्रपति शिवाजी के समय जैसी वेश-भूषा और हथियार नहीं होंगे, लेकिन उसका संकल्प उतना ही दृढ़ और उसके सामने परिस्थियाँ उतनी ही चुनौतीपूर्ण होंगी, जिन्हें देखते-परखते हुए उस शख्स को छत्रपति के समतुल्य रखा गया।

‘आज के शिवाजी- नरेंद्र मोदी’

अभी हाल में जय भगवान गोयल नामक लेखक ने नरेंद्र मोदी पर एक किताब लिखी। जिसका शीर्षक उन्होंने- “आज के शिवाजी नरेंद्र मोदी” दिया। निःसंदेह ही ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें नरेंद्र मोदी में उस समय के छत्रपति के कुछ अंश दिखाई दिए। उन्होंने किताब को लेकर कहा भी, “जिस तरह शिवाजी महाराज मुग़लकाल में अपने स्वाभिमान को बनाए रखते हुए काम करते थे, 70 साल में पहली बार ऐसा कोई प्रधानमंत्री आया है जो उसी तरह काम कर रहा है और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इस किताब के बारे में सोचा।” लेकिन, पत्रकार से राजनेता और फिर राजनेता से पत्रकार बने आशुतोष की ‘सत्य हिंदी’ वेबसाइट को यह रास नहीं आया।

सत्य हिंदी ने उठाए आज के शिवाजी- नरेंद्र मोदी’ पर सवाल

मोदी नीतियों का अपने वेबसाइट के जरिए पुरजोर विरोध करने वाले सत्यहिंदी ने सवाल उठाया कि क्या शिवाजी की तुलना नरेंद्र मोदी से करना तर्क संगत है? क्या एक शासक के रूप में छत्रपति शिवाजी की नीयत और नीतियाँ वैसी ही थीं जैसी मोदी शासन में दिखाई दे रही हैं? धर्म अथवा जाति से संबंधित अनेक विवादित फ़ैसलों को लेकर आज जिस तरह देश में जगह-जगह बेचैनी व विरोध-प्रदर्शन दिखाई दे रहे हैं, क्या शिवाजी के समय भी यही स्थिति थी? क्या शिवाजी की भी मुस्लिमों के प्रति धारणा ऐसी ही थी जैसी आज के सत्ताधारियों की है?

लेख के शीर्षक में ही मढ़ दिया गया नरेंद्र मोदी पर आरोप

सत्यहिंदी पर प्रकाशित इस लेख का शीर्षक “छत्रपति की मोदी से तुलना; क्या शिवाजी को मुस्लिमों से नफ़रत थी?” दिया गया। जिसे लिखने वाले का नाम तनवीर जाफरी है। जाहिर है सत्यहिंदी के इस लेख के शीर्षक के दो मतलब हैं। एक- जो सवाल कर रहा है कि क्या शिवाजी से मोदी की तुलना का ये मतलब है कि वो शिवाजी मुस्लिमों से नफरत करते थे और दूसरा ये जो दावा कर रहा है कि मोदी मुस्लिमों से नफरत करते ही करते हैं। तभी उनकी तुलना जिससे भी होगी उसकी छवि पर सवाल उठेगा ही उठेगा।

तनवीर अपने लेख मे छत्रपति शिवाजी के जीवन से जुड़े कुछ किस्सों और तथ्यों का जिक्र करते हैं और बताने की कोशिश करते हैं कि शिवाजी महाराज में जो विशेषताएँ थी, वो नरेंद्र मोदी में बिलकुल नहीं हैं। तो आखिर कैसे नरेंद्र मोदी की तुलना हो सकती है। वो बताते हैं छत्रपति शिवाजी धर्मनिरपेक्ष शासक थे। जो दूसरे धर्म की महिलाओं की इज्जत करते थे। दूसरे समुदाय के धर्मस्थलों को युद्ध में निशाना नहीं बनाते थे। उनके करीबी मुस्लिम थे और वे अपने शासन काल में कभी पक्षपात नहीं करते थे।

अब हेडलाइन को ध्यान में रखते हुए अगर पूरे लेख को पढ़ा जाए तो समझ आएगा कि छत्रपति शिवाजी की हर विशेषता पर किस्सा सुनाने वाले लेखक शिवाजी के सभी गुणों का उल्लेख कर प्रधानमंत्री के व्यक्त्तिव को उसके उलट बता रहे हैं। लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या वाकई परिस्थियों में और दौर में बदलाव आने के बाद ये सवाल वाजिब है। क्या वाकई तनवीर के सवाल सही है और लेखक जय भगवान गोयल का दृष्टिकोण गलत? शायद नहीं। क्योंकि छत्रपति शिवाजी के समय में जिन उद्देश्यों को लेकर उन्होंने संघर्ष किया और विजय प्राप्त की। आज नरेंद्र मोदी भी देश को बचाए रखने के साथ भारतीय संस्कृति-सभ्यता को संरक्षित रखने के लिए उसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। जिसके कारण उन्हें मीडिया गिरोह की आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।

तनवीर के छिपे सवालों का जवाब

अपने लेख में तनवीर कहते हैं कि मोदी से छत्रपति शिवाजी की तुलना गलत है। क्योंकि छत्रपति धर्मनिरपेक्ष थे। लेकिन, शायद तनवीर भूल रहे हैं कि एक मोदी सरकार को लगातार ऐतिहासिक जीत दिलाकर दूसरी बार सत्ता में बिठाने वाली जनता धर्मनिरपेक्ष देश की जनता है। जिसने लोकतांत्रिक तरीके से नरेंद्र मोदी को अपना प्रतिनिधि चुना।

तनवीर, अपने लेख में छत्रपति शिवाजी से पीएम मोदी की तुलना को गलत साबित करने के लिए मुस्लिम महिला का जिक्र करते हैं। जिसे कैदी बनाकर उनके दरबार में ले आया गया और उन्होंने उस घटना को अपने लिए कलंक कहते हुए लड़की को आजाद किया। लेकिन शायद तनवीर यहाँ भी भूलते हैं कि नरेंद्र मोदी ने ट्रिपल तलाक कानून लाकर उन हजारों महिलाओं को उस घुटन के जीवन से आजादी दिलवाई, जिसे उनपर मजहब के नाम पर थोपा गया और उसके नाम पर प्रताड़ित किया गया।

तनवीर लेख में शिवाजी द्वारा लड़ाई में मस्जिद को नुकसान न पहुँचाए जाने वाले आदेश का जिक्र करते हैं। लेकिन फिर भूल जाते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार ने भी अपने नेतृत्व में मुस्लिमों के लिए हज का कोटा 2 लाख करवाया। क्या ये मुस्लिम समुदाय के लिए तोहफा नहीं हैं?

तनवीर अपने लेख में शिवाजी के विश्वासपात्रों में उनके निजी सचिव मुल्ला हैदर का जिक्र करते हैं। लेकिन मोदी सरकार में अल्पसंख्यक मंत्री मुक्तार अब्बास नकवी और प्रवक्ता शहनवाज हुसैन जैसे लोगों को भूल जाते हैं। जो मुस्लिम होने के बावजूद ईमानदारी के साथ भाजपा से जुड़े हुए और समय-दर समय पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त भी करते हैं।

मोदी सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों का रोडमैप

इन सभी बिंदुओं के अलावा मोदी सरकार ने बहुत से ऐसे काम किए हैं। जो प्रधानमंत्री को भले ही शिवाजी जितना महान न बना पाए। लेकिन एक ऐसी प्रधानमंत्री की छवि जरूर देते है। जिन्होंने वाकई धर्म-जाति-ऊँच-नीच से उठकर देश के लिए काम किया।

उनके नेतृत्व में ही बीते 11 जून को मौलाना आजाद नेशनल एजुकेशन फाउंडेशन की 112वीं गवर्निंग बॉडी की बैठक में केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मोदी सरकार में अल्पसंख्यकों का रोड मैप सामने रखा। जिसमें ड्रॉप-आउट बच्चों को ब्रिज कोर्स करवा कर मेनस्ट्रीम एजुकेशन में लाया जाने की बात उठाई गई। साथ ही मुख्यधारा में लाने के लिए वहाँ हिंदी, इंग्लिश, मैथ्स और साइंस की शिक्षा दिए जाने की बात कही गई। मोदी सरकार के काल में ही अल्पसंख्यक वर्ग के पांच करोड़ छात्रों को अगले 5 साल में छात्रवृत्तियाँ देने की भी योजना तैयार हुई, ताकि अल्पसंख्यक बच्चे इसमें भाग ले पाएँ। इसके अलावा समुदाय विशेष की वक्फ प्रॉपर्टी का विकास करने की योजना भी मोदी सरकार ने ही बनाई।

इतने सबके बावजूद बीते दिनों सीएए-एनआरसी को लेकर विरोध के नाम पर समुदाय विशेष के लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपनी कुंठा और नफरत जमकर निकाली। तनवीर जैसे अन्य कई बुद्धिजीवियों ने सरेआम सड़कों पर उनके पोस्टर जलाए, उनके ख़िलाफ़ नारे लगाए गए, उनके मरने-मारने तक की बातें हुईं। लेकिन किसी ने भी एक बार नरेंद्र मोदी सरकार के उन कार्यों पर नजर नहीं डाली। जिसे प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में वर्तमान सरकार ने सिर्फ़ अल्पसंख्यक समुदाय को समाज में ऊपर उठाने के लिए किया।।।।

कश्मीर के हिन्दू नरसंहार की 20 नृशंस कहानियाँ जो हर हिन्दू को याद होनी चाहिए

कश्मीर का मतलब है वह जमीन जहाँ से पानी को निकाल दिया गया हो। ब्रह्मा के पौत्र और मरीचि के पुत्र कश्यप ऋषि ने इस भूमि से वराहमुला (बारामुल्ला) की पहाड़ियों को काट कर जल को रास्ता दे कर ब्राह्मणों को बसाया था। कश्मीर के मुख्य शहर को कश्यपपुर भी कहा जाता था जिसका रिकॉर्ड हेकेटेइयस और हेरोडोटस के लेखन में क्रमशः कसपेपीरोस और कसपातायरोस, एवम् टोल्मी के समय में ‘कस्पेरिया’ के नाम से मिल जाता है।

यूँ तो कश्मीर में मानवीय सभ्यता आज से लगभग 5,000 वर्ष पूर्व से शुरु हो जाती है, जिसके पौराणिक, वैदिक और प्रागौतिहैसिक प्रमाण उपलब्ध हैं जहाँ वैदिक काल में उत्तर कुरुओं को कश्मीर में बसने का जिक्र आता है। अगर ऐतिहासिक तथ्यों की बात करें तो कल्हण की ‘राजतरंगिनी’ में पौराणिक काल से ले कर बारहवीं शताब्दी तक के शासकों की चर्चा है।

सिकंदर के समकालीन, 326 ईसा पूर्व में अभिसार कश्मीर का राजा था। उसके बाद यह मौर्य साम्राज्य का हिस्सा बना और बौद्ध स्तूप और शिव मंदिरों ने कश्मीर में जगह बनाई। फिर कनिष्क का शासनकाल आया, जब बौद्ध और हिन्दू धर्म की शिक्षा का केन्द्र बन कर कश्मीर की ख्याति चीन तक पहुँच चुकी थी। उसके बाद हूणों ने कश्मीर को जीत लिया, फिर कारकोटा साम्राज्य आया, तत्पश्चात उत्पलों का शासन चला। नवीं से 11वीं शताब्दी तक शैव दर्शन पर यहाँ खूब कार्य हुआ।

उसके बाद लोहार वंश के जनविरोधी शासन के कारण वहाँ पहली बार मुगलों के आगमन का रास्ता खुला। चौदहवीं शताब्दी आते-आते इस्लाम कश्मीर घाटी का बहुसंख्यक मजहब बन चुका था। संस्कृत साहित्य गायब कर दिया गया और सुल्तान सिकंदर ने ‘बुतशिकन’ की उपाधि ले कर इस्लामी आतंक की नींव रख दी थी। फारसी ने आधिकारिक भाषा की जगह ले ली। 16वीं शताब्दी में हुमायूँ के सेनापति ने हमला बोल कर कश्मीर को कब्जे में लिया, लेकिन अकबर के काल तक इसे सीधे तौर पर मुगलों ने शासन में नहीं लिया था। शिया, शाफी और सूफियों की प्रताड़ना का सिलसिला हुमायूँ के दौर में खूब चला। बाद में औरंगजेब ने आतंकी शासकों की परंपरा कायम रखी और मजहबी भेदभाव के साथ-साथ हिन्दुओं और बौद्धों से मुगलिया उगाही जारी रखी।

लगभग चार सौ सालों के इस्लामी शासन के बाद 19वीं शताब्दी में कुछ समय तक कश्मीर सिखों के शासन में रहा जब पंजाब के रंजीत सिंह ने इसे अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाया। 1846-1947 तक डोगरा राजाओं ने कश्मीर पर राज किया। 1901 में कश्मीर घाटी में समुदाय विशेष का प्रतिशत 93.6 था, हिन्दू 5.4% थे। कहने को तो कथित अल्पसंख्यकों का यह प्रतिशत सौ सालों में बहुत बदला नहीं है, जो कि अब 95% से ज्यादा है, लेकिन कश्यप ऋषि के द्वारा वराहमुला की पहाड़ी को काट कर ब्राह्मणों को बसाने वाले कश्मीर में तीस साल पहले जो हुआ, वो धार्मिक नरसंहार हिन्दुओं को भूलना नहीं चाहिए।

तीस साल पहले के कुछ किस्से

25 जून 1990 गिरिजा टिकू नाम की कश्मीरी पंडित की हत्या के बारे में आप जानेंगे तो सिहर जाएँगे। सरकारी स्कूल में लैब असिस्टेंट का काम करती थी। इस्लामी आतंकियों के डर से वो कश्मीर छोड़ कर जम्मू में रहने लगी। एक दिन किसी ने उसे बताया कि स्थिति शांत हो गई है, वो बांदीपुरा आ कर अपनी तनख्वाह ले जाए। वो अपने किसी मुस्लिम सहकर्मी के घर रुकी थी। इस्लामी आतंकी आए, उसे घसीट कर ले गए। वहाँ के स्थानीय मुस्लिम चुप रहे क्योंकि किसी काफ़िर की परिस्थितियों से उन्हें क्या लेना-देना। गिरिजा का सामूहिक बलात्कार किया गया, बढ़ई की आरी से उसे दो भागों में चीर दिया गया, वो भी तब जब वो जिंदा थी। ये खबर कभी अखबारों में नहीं दिखी।

4 नवंबर 1989 को जस्टिस नीलकंठ गंजू को दिनदहाड़े हायकोर्ट के सामने मार दिया गया। उन्होंने आतंकी मकबूल भट्ट को इंस्पेक्टर अमरचंद की हत्या के मामले में फाँसी की सजा सुनाई थी। 1984 में जस्टिज नीलकंठ के घर पर बम से भी हमला किया गया था। उनकी हत्या कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या की शुरुआत थी।

7 मई 1990 को प्रोफेसर के एल गंजू और उनकी पत्नी को मजहबी आंतंकियों ने मार डाला। पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया। 22 मार्च 1990 को अनंतनाग जिले के दुकानदार पी एन कौल की चमड़ी जीवित अवस्था में शरीर से उतार दी गई और मरने को छोड़ दिया गया। तीन दिन बाद उनकी लाश मिली।

उसी दिन श्रीनगर के छोटा बाजार इलाके में बी के गंजू के साथ जो हुआ वो बताता है कि सिर्फ इस्लामी आतंकी ही इस लम्बे चले धार्मिक नरसंहार की चाहत नहीं रखते थे, बल्कि स्थानीय कट्टरपंथियों का पूरा सहयोग उन्हें मिलता रहा। कर्फ्यू हटा था तो बी के गंजू, टेलिकॉम इंजीनियर, अपने घर लौट रहे थे। उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका पीछा किया जा रहा है, हालाँकि घर के पास आने पर उनकी पत्नी ने यह देख लिया। उनके घर में घुसते ही पत्नी ने दरवाजा बंद कर दिया। दोनों ही घर के तीसरे फ्लोर पर चावल के बड़े डब्बों में छुप गए।

आतंकियों ने छान मारा, वो नहीं मिले। जब वो लौटने लगे तो मजहबी पड़ोसियों ने उन मजहबी आतंकियों को वापस बुलाया और बताया कि वो कहाँ छुपे थे। आतंकियों ने उन्हें बाहर निकाला, गोलियाँ मारी, और जब खून चावल में बह कर मिलने लगा, तो जाते हुए आतंकियों ने कहा, “इस चावल में खून को मिल जाने दो, और अपने बच्चों को खाने देना। कितना स्वादिष्ट भोजन होगा वो उनके लिए।”

12 फरवरी 1990 को तेज कृष्ण राजदान को उनके एक पुराने सहकर्मी ने पंजाब से छुट्टियों में उनके श्रीनगर आने पर भेंट की इच्छा जताई। दोनों लाल चौक की एक मिनि बस पर बैठे। रास्ते में मजहबी मित्र ने जेब से पिस्तौल निकाली और छाती में गोली मारी। इतने पर भी वो नहीं रुका, उसने राजदान जी को घसीट कर बाहर किया और लोगों से बोला कि उन्हें लातों से मारें। फिर उनके पार्थिव शरीर को पूरी गली में घसीटा गया और नजदीकी मस्जिद के सामने रख दिया गया ताकि लोग देखें कि हिन्दुओं का क्या हश्र होगा।

24 फरवरी 1990 को अशोक कुमार काज़ी के घुटनों में गोली मारी गई, बाल उखाड़े गए, थूका गया और फिर पेशाब किया गया उनके ऊपर। किसी भी मजहबी दुकानदार ने, जो उन्हें अच्छे से जानते थे, उनके लिए एक शब्द तक नहीं कहा। जब पुलिस का सायरन गूंजा तो भागते हुए उन्होंने बर्फीली सड़क पर उनकी पीड़ा का अंत कर दिया। पाँच दिन बाद नवीन सप्रू को भी इसी तरह बिना किसी मुख्य अंग में गोली मारे, तड़पते हुए छोड़ा गया, मजहबियों ने उनके शरीर के जलने तक जश्न मनाया, नाचते और गाते रहे।

30 अप्रैल 1990 को कश्मीरी कवि और स्कॉलर सर्वानंद कौल प्रेमी और उनके पुत्र वीरेंदर कौल की हत्या बहुत भयावह तरीके से की गई। उन्होंने सोचा था कि ‘सेकुलर’ कश्मीरी उन्हें नहीं भगाएँगे, इसलिए परिवार वालों को लाख समझाने पर भी वो ‘कश्मीरी सेकुलर भाइयों’ के नाम पर रुके रहे। एक दिन तीन ‘सेकुलर’ आतंकी आए, परिवार को एक जगह बिठाया, और कहा कि सारे गहने-जेवर एक खाली सूटकेस में रख दें।

उन्होंने प्रेमी जी को कहा कि वो सूटकेस ले लें, और उनके साथ आएँ। घरवाले जब रोने लगे तो उन्होंने कहा, “अरे! हम प्रेमी जी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। हम उन्हें वापस भेज देंगे।” 27 साल के बेटे वीरेन्द्र ने कहा कि पिता को अँधेरे में वापसी में समस्या होगी, तो वो साथ जाना चाहता है। “आ जाओ, अगर तुम्हारी भी यही इच्छा है तो!” दो दिन बाद दोनों की लाशें मिलीं। तिलक करने की जगह को छील कर चमड़ी हटा दी गई थी। पूरे शरीर पर सिगरेट से जलाने के निशान थे, हड्डियाँ तोड़ दी गईं थीं। पिता-पुत्र की आँखें निकाल ली गईं थीं। फिर दोनों को रस्सी से लटकाया गया था, और उनकी मृत्यु सुनिश्चित हो, इसके लिए गोली भी मारी गई थी।

मुजू और दो अन्य लोगों को मजहबी आतंकियों ने किडनैप किया और कहा कि कुछ लोगों को खून की जरूरत है, तो उन्हें चलना होगा। आतंकियों ने उनके शरीर का सारा खून बहा दिया और उनकी मृत्यु हो गई। 9 जुलाई 1990 को हृदय नाथ और राधा कृष्ण के सर कटे हुए मिले। 26 जून 1990 को बी एल रैना जब अपने परिवार को जम्मू लाने के लिए कश्मीर जा रहे थे, तो आतंकियों ने घेर कर मार दिया। 3 जून को, आतंकियों ने उनके पिता दामोदर सरूप रैना की हत्या घर में घुस कर की थी। उन्होंने पड़ोसियों से मदद माँगी, ‘मजहबी’ ही थे, नहीं आए।

अशोक सूरी के भाई को गलती से मजहबी आतंकियों ने उठा लिया। उसे खूब पीटा, टॉर्चर किया और पूरे शरीर को सिगरेट से जलाने के बाद, अधमरे हो जाने पर, बताया कि वो तो उसके भाई के मारना चाहते थे। उसे छोड़ दिया गया। वो किसी तरह घर पहुँच कर भाई को भाग जाने की सलाह देने लगे। भाई ने सलाह नहीं मानी। आधी रात को वो आतंकी घर में आए, लम्बे चाकू से गर्दन काटी और मरने छोड़ कर चले गए।

सोपोर के चुन्नी लाल शल्ला इंस्पेक्टर थे। कुपवाड़ा में पोस्टिंग होने पर उन्होंने दाढ़ी बढ़ा रखी थी कि उन्हें आतंकी पहचान न सकें। एक दिन आतंकी खोजते हुए आए और उन्हें पहचान नहीं पाए, और वापस जाने लगे। उनके साथ ही एक मजहबी सिपाही भी काम करता था। उसने आतंकियों को वापस बुलाया और बताया कि दाढ़ी वाला ही शल्ला हैं। आतंकी कुछ करते उस से पहले उनके मजहबी सहकर्मी ने छुरा निकाला और पूरा दाहिना गाल चमड़ी सहित छील दिया। चुन्नी लाल अवाक् रह गए। तब मजहबी सिपाही ने कहा, “अबे सूअर! तेरे दूसरे गाल पर भी जमात-ए-इस्लामी वाली दाढ़ी नहीं रखने दूँगा।” फिर छुरे से दूसरी तरफ भी काट दिया गया। उसके बाद आतंकियों के साथ मिल कर चुन्नी लाल के चेहरे पर हॉकी स्टिक से ताबड़तोड़ प्रहार किया गया और फिर आतंकियों ने कहा, “दोगले, तेरे ऊपर गोली बर्बाद नहीं करेंगे हम।” रक्त बहते रहने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

28 अप्रैल 1990 को भूषण लाल रैना के साथ जो हुआ वो मजहबी आतंकियों की क्रूरता सटीक तरीके से बयान करता है। अगले दिन अपनी माँ के साथ घाटी छोड़ने की योजना थी, सामान बाँध रहे थे। मजहबी आतंकियों की एक टोली आई और रैना के सर में नुकीला छड़ घोंप कर हमला किया। उसके बाद उन्हें खींच कर बाहर निकाला गया, कपड़े उतार कर एक पेड़ पर कीलें ठोंक कर लटकाने के बाद वो उन्हें तड़पाते रहे। भूषण बार-बार कहते रहे कि वो उन्हें गोली मार दें, आतंकियों ने इंतजार किया, गोली नहीं मारी।

25 जनवरी 1998 की रात को वन्धामा गाँव के 23 कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या पूर्वनिर्धारित तरीके से की गई। एक बच्चा जो बच गया, उसने बताया कि आतंकी आर्मी की वर्दी में आए, चाय पिया, और अपने वायरलेस सेट पर संदेश का इंतजार करने लगे। जब खबर आ गई कि सारे कश्मीरी पंडितों के परिवार को एक साथ फँसा लिया गया है, तब एक साथ क्लासनिकोव रायफलों से उनकी नृशंस हत्या कर दी गई। उसके बाद हिन्दुओं के मंदिर तोड़ दिए गए और घरों में आग लगा दी गई।

अगर सिक्खों की बात करें तो कई सिक्खों को उनके परिवार के साथ 1990 से 1992 के बीच इसी क्रूरता से मारा गया। इनमें कई जम्मू कश्मीर पुलिस के सिपाही या अफसर भी शामिल थे। ऐसे ही 1989 से 1992 के बीच छः बार ईसाई मिशनरी स्कूलों पर आतंकियों ने बम धमाके किए।

ये कहानियाँ आज क्यों?

इन कहानियों को अभी कहने का मतलब क्या है? इन कहानियों को अभी कहने का मतलब मात्र यह है कि इसमें से 99% कहानियों के पात्रों का नाम आपको याद भी नहीं होगा। इसलिए, इन्हें इनके शीशे की तरह साफ दृष्टिकोण में मैं आपको बताना चाहता हूँ कि शाब्दिक भयावहता जब इतनी क्रूर है तो उनकी सोचिए जिनके साथ ऐसा हुआ होगा। ये किसी फिल्म के दृश्य नहीं हैं जहाँ नाटकीयता के लिए आरी से किसी को काटा जाता है, किसी की खोपड़ी में लोहे का रॉड ठोक दिया जाता है, किसी की आँखें निकाल ली जाती हैं, किसी के दोनों गाल चाकू से चमड़ी सहित छील दिए जाते हैं, किसी के तिलक लगाने वाले ललाट को चाकू से उखाड़ दिया जाता है…

ये सब हुआ है, और लम्बे समय तक हुआ है। इसमें वहाँ के वो मजहबी भी शामिल थे, जो आतंकी नहीं थे, बल्कि किसी के सहकर्मी थे, किसी के पड़ोसी थे, किसी के जानकार थे। सर्वानंद कौल सोचते रहे कि उन्होंने तो हमेशा उदारवादी विचार रखे हैं, उन्हें कैसे कोई हानि पहुँचाएगा, लेकिन पुत्र समेत ऐसी हालत में मरे जिसे सोच कर रीढ़ की हड्डियों में सिहरन दौड़ जाती है।

ये आतंकी बनाम हिन्दू नहीं था, बल्कि ये मुस्लिम बनाम गैर-मुस्लिम था। आतंकी ही होते तो बाजार में घसीटे जा रहे लाश पर कोई मजहबी कुछ बोलता, आतंकियों को घेरता, पत्थर ही फेंक देता। ऐसा नहीं हुआ। चार सौ सालों के इस्लामी शासन के बाद कश्मीर के गैर-मुस्लिम सिमट कर 6% रह गए थे। 1990 की जनवरी से जो धार्मिक नरसंहारों का दौर चला और विभिन्न स्रोतों के मुताबिक तीन से आठ लाख कश्मीरी हिन्दू पलायन को मजबूर हुए।

आज शाहीन बाग के कुछ मजहबी शांतिप्रिय तख्तियाँ लिए उनके प्रति सहानुभूति जता रहे हैं। यह सहानुभूति नहीं है, यह अपने मतलब के लिए तिरंगे से ले कर राष्ट्रगान और संविधान पर थूकने वाले लोगों द्वारा चली गई एक बारीक चाल है। इनकी धूर्तता देखिए कि इनके पोस्टरों में कश्मीरी हिन्दुओं के लिए कथित सहानुभूति तो है, लेकिन जिन्होंने ऐसी नृशंस हत्याएँ की, उन कट्टरपंथियों के लिए एक भी शब्द नहीं?

क्या कश्मीरी हिन्दू किसी उल्कापिंड के गिरने से कश्मीर छोड़ आए थे? क्या उनके मंदिरों पर उत्तरी कोरिया के इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलों के नाभिकीय हथियारों से हमला हुआ था! क्या उनके घर दीवाली की पटाखेबाजी में जल गए थे? क्या उनके सिर में घुसा लोहे का रॉड किसी कश्मीरी भालाफेंक एथलीट का जैवलिन था? क्या भूषण रैना को पेड़ में कीलों से टाँगने की कोशिश रोम के लोगों ने की थी कि यह देखा जाए कि तीन दिन बाद पुनर्जीवित होता है कि नहीं?

तो वो लोग, जो स्वार्थ के कारण, आज कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा बाँटने की कोशिश कर रहे हैं, कम से कम अपने गिरेबान में तो झाँके कि ये सब वो बस इसलिए कर रहे हैं क्योंकि शाहीन बाग से पहले एक खास विचारधारा के लोगों ने देश के कई हिस्सों में तो आगजनी और पत्थरबाजी की है, पेट्रोल बम फेंके हैं और कट्टे चला कर 19 लोगों की जानें ली हैं, उनसे देश का ध्यान हट जाए।

वो जानते हैं कि शाहीन बाग की नौटंकी करते रहने से जामिया नगर के बसों में लगाई गई आग को लोग भूल जाएँगे। लोग यह भी भूल जाएँगे कि वहाँ इस्लामी कट्टरपंथी संगठन PFI के 150 मजहबी लोग घुस आए थे। लोग यह भी भूल जाएँगे कि वहाँ ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ के नारे लगे थे। लेकिन उन्हें भूलना नहीं चाहिए। वो तुम्हें ‘शाहीन बाग में आज ये हुआ’ दिखाते रहेंगे, लेकिन तुम जामिया नगर की आग, उत्तर प्रदेश में 19 मौतें, बंगाल में 250 करोड़ की प्रॉपर्टी के नुकसान, लखनऊ के परिवर्तन चौक की आगजनी, मस्जिदों से बाहर निकल कर पत्थरबाजी और पेट्रोल बम पर सवाल पूछते रहना। नहीं पूछोगे, तो ये वामपंथी मीडिया तुम्हें ही आतंकी बना कर भुना लेगी।

आपको इनकी दोगलई की दाद देनी चाहिए कि कश्मीर के दो-तीन नारे, जो विशुद्ध रूप से हिन्दुओं को भगाने के लिए ही बने थे, वो जामिया में लगते रहे, शाहीन बाग में लगते रहे, और इनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा बाँटने के पोस्टर हाथ में ले लिए! ‘ला इलाहा इल्लिल्लाह’ और ‘आज़ादी‘ तो हिन्दुओं से घृणा दर्शाने के कश्मीरी नारे हैं। तुम वो नारे भी लगा रहे हो, और कश्मीरी हिन्दुओं का दुख बाँटने का भी दावा करते हो?

हम वापस आएँगे

आज हजारों कश्मीरी हिन्दुओं ने ये कहा है कि ‘हम वापस आएँगे’। लेकिन उनके ऐसा कहने भर से उनकी वापसी संभव नहीं हो जाती। वो अगर यह सोच रहे हैं कि शाहीन बाग के धूर्त प्रपंचियों की तरह उनके स्वागत में घाटी के मुस्लिम तख्तियाँ ले कर खड़े मिलेंगे, तो यह उनकी मूर्खता है। सरकार ने कैम्प तो लगाए थे न इन हिन्दुओं के लिए, उस पर पत्थरबाजी किसने की?

ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने पड़ोसी बी के गंजू के चावल के कंटेनर में छिपे होने की बात घर छोड़ कर वापस जाते आतंकियों को बताई थी। और ऐसे पड़ोसियों ने एक बार नहीं, कई बार अपने पड़ोसी होने के इस धर्म को निभाया जब हिन्दुओं की हत्या करने आए आतंकियों को इन्होंने प्रत्यक्ष सहयोग से ले कर, मौन सहमति तक दी। इसलिए आप यह तो भूल ही जाएँ कि इस्लामी शासन के शुरुआत से ही गायब हुए संस्कृत को फारसी से बदल देने वाले लोगों की संतानें ‘स्वागतम्-स्वागतम्’ करती लाल चौक पर आएँगीं।

इनकी वापसी का रास्ता इतना आसान नहीं है। इस्लाम का इतिहास और वर्तमान बड़ा ही स्पष्ट रहा है, जिस भी इलाके में ये बहुसंख्यक हैं, वहाँ अल्पसंख्यकों के लिए इनके पास घृणा के अलावा और कुछ नहीं। अगर सिर्फ मुस्लिम ही रहे, तो भी इसी कश्मीर ने 16वीं शताब्दी में इन्हीं मुस्लिमों को आपस ही में शिया, शाफी, और सूफी को प्रताड़ित करते देखा है। म्याँमार में बौद्धों को वहाँ के कट्टरपंथियों ने हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया! उदाहरण असंख्य हैं, इसलिए 95% से ज़्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाले इस इलाके में हिन्दुओं को पुनर्स्थापित करना लगभग असंभव कार्य है।

अगर ये हिन्दू वापस जा कर, सर्वानंद कौल की तरह ‘सेकुलर’ राग गा कर, ये सोचने लगेंगे कि तीस साल में वहाँ के मुस्लिमों में बदलाव आ गया होगा, और वो उनकी कविताएँ सुन कर भावुक हो जाएँगे, तो वो भूल जाएँ। भूल इसलिए जाएँ कि हिन्दुओं की सहिष्णुता और उदारवाद को इस्लामी आतंकियों ने सदियों से रौंदा है, उसका फायदा उठाया है। जैसा कि के के मुहम्मद कहते हैं कि भारत अगर एक धर्मनिरपेक्ष और शांत समाज है, जिसमें बीस करोड़ मुस्लिम भी हैं, तो ये सिर्फ हिन्दुओं की वजह से है।

हिन्दुओं को वहाँ बसने के लिए पुराने तरीके त्यागने होंगे। उन्हें यह याद रखना होगा कि उनके मंदिरों पर जब लाउडस्पीकर लगे थे, और वहाँ से न सिर्फ इस्लामी शब्द कहे गए थे, बल्कि यह भी गूँज रहा था कि इनके मर्दों को जाने दो, हमें सिर्फ हिन्दू औरतें चाहिए। इन्होंने उन लड़कियों और स्त्रियों के साथ हर बार एक ही दुष्कृत्य किया है, और उसका पाप वहाँ के हर उस मजहबी को ढोना ही पड़ेगा जो इस त्रासदी पर चुप रहता है।

शाहीन बाग की नौटंकीबाज़ मजहबी औरतों को हर उस हिन्दू का नाम, उनकी हत्या की तारीख, उनकी हत्या का पूर्ण विवरण, हत्या का कारण और उनकी बहू-बेटियों की स्थिति के पोस्टर हाथ में ले कर पूरी दिल्ली में फैल जाना चाहिए और कहना चाहिए कि कट्टरपंथियों के इन कुकर्मों के लिए उनका पूरा समुदाय शर्मिंदा है। अगर इससे एक डिग्री कम भी कुछ कर रहे हैं ये लोग, तो ये बस स्टंट है अपने पिछले पापों को छुपाने का।

मैं नहीं जानता कश्मीरी हिन्दू वापस कब जाएँगे, कैसे जाएँगे। लेकिन मैं यह बात अवश्य जानता हूँ कि कश्यप ऋषि की धरती पर, शारदा और शिव की भूमि पर, जबरन बसे हुए कट्टरपंथी इन हिन्दुओं के लिए पलक-पाँवड़े तो नहीं बिछाएँगे। अगर ये सत्ता के संरक्षण में उस धरती पर कदम रख कर, अपने काष्ठगृहों को दोबारा उठाने की कोशिश करेंगे, तो हाथ में पेट्रोल बम और माचिस ले कर घूमते मजहबी आतंकियों का कोई जत्था, उसे जलाने से बिलकुल नहीं हिचकेगा।

उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जब उनकी बेटी को कोई खींच कर ले जाएगा, सामूहिक बलात्कार करने को बाद, बढ़ई की आरी से दो हिस्सों में काट देगा, और लाश दो जगह मिलेगी, तब सेना या पुलिस ये सब होने के बाद मदद को आएगी। क्योंकि सरकारी और न्यायिक प्रक्रिया तो इसी तरह से चलती है। लेकिन ऐसा होने ही न पाए, उसके लिए कश्मीरी हिन्दू क्या करेगा?

तब सवाल यह उठता है कि अगर वो इस बार भी पेट्रोल बम, माचिस, सरिया, क्लासनिकोव, चाकू और बमों से तुम्हारा स्वागत करते हैं, तो हिन्दू इस बार क्या करेगा? मेरे ख्याल से वापस जाने वाले हिन्दुओं को इज़रायल के यहूदियों की कहानी पढ़नी चाहिए। खास कर, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वाली।

JNU में 8500 में से 82% छात्रों ने बढ़ी हुई हॉस्टल फीस के साथ किया रजिस्ट्रेशन: VC जगदीश कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के हॉस्टल फीस में वृद्धि को लेकर लंबे समय से हंगामा हो रहा है। इस बीच JNU के कुलपति एम जगदीश कुमार ने बताया कि 8500 छात्रों में से 82% छात्रों ने नई हॉस्टल फीस भरकर विंटर सेमेस्टर के लिए रजिस्ट्रेशन करा लिया है। उम्मीद जताई जा रही है कि बाक़ी छात्र भी जल्द ही नई हॉस्टल फीस के अनुसार रजिस्ट्रेशन करा लेंगे, क्योंकि अभी विलंब शुल्क के साथ इसका विकल्प उपलब्ध है।

इससे पहले, JNU के कुलपति जगदीश कुमार ने गुरुवार (जनवरी 16, 2019) को बताया था कि 8500 स्टूडेंट्स JNU में पढ़ते हैं और इनमें से 6450 हॉस्टल में रहते हैं, बाकी डे-स्कॉलर्स हैं और 95 प्रतिशत डे स्कॉलर्स ने भी अपनी बकाया सेमेस्टर फीस जमा कर दिया। वीसी जगदीश कुमार ने कहा था, “कैंपस के हॉस्टल में रहने वाले 65% से अधिक छात्रों ने अपने बकाया शुल्क का भुगतान कर दिया है। कुछ छात्र जो इस बीच अपने घर चले गए थे वे भी वापस कैंपस में लौट रहे हैं।” उन्होंने शुल्क का भुगतान करने वाले अन्य छात्रों की संख्या में वृद्धि होने की संभावना जताई थी।

इसके साथ ही प्रशासन ने रजिस्ट्रेशन की आखिरी तारीख को भी दो दिन आगे बढ़ा दिया था। जगदीश कुमार ने अपने बयान में कहा था, “15 जनवरी को विंटर सेमेस्टर के लिए रजिस्ट्रेशन की अंतिम तारीख थी, जिसकी वजह से फीस काउंटर्स पर छात्रों की भारी भीड़ जमा रही। कई स्टूडेंट्स तारीख बढ़ाने की गुजारिश के साथ हमारे पास पहुँचे। जिसके बाद उनकी सुविधा को देखते हुए रजिस्ट्रेशन की तारीख आखिरी बार 2 दिन के लिए बढ़ा दिया गया।”

JNU प्रशासन के अनुसार, सभी स्कूलों और केंद्रों ने अपना टाइम टेबल घोषित कर दिया गया है। JNUSU के नेतृत्व में आंदोलन और बहिष्कार के बारे में बात करते हुए विश्वविद्यालय के वीसी जगदीश कुमार ने कहा था कि सभी स्कूलों और केंद्रों ने अपना टाइम टेबल घोषित कर दिया है और वे उन छात्रों के लिए परीक्षा आयोजित करने पर काम कर रहे हैं, जो पिछला सेमेस्टर पास नहीं कर पाए थे। उन्होंने बताया था कि विश्वविद्यालय छात्रों के शैक्षणिक हितों को देखते हुए वह सभी कोशिशें कर रहा है जिससे कि छात्र अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।

एक भी छात्र न हुआ तब भी दूँगा लेक्चर: आइशी घोष की क्लास बंद करने की धमकी पर JNU प्रोफेसर का बयान

JNU हिंसा: लेफ्ट की पोल खोलते हुए ABVP ने जारी किए 8 वीडियो, दिखी CPI के बड़े नेता की बेटी

प्रोफेसरों व वामपंथी छात्रों ने मिल कर किया प्रताड़ित: JNU के छात्र मनीष ने बताया कैसे ‘मीडिया’ भी है साज़िश में शामिल

जब तेरा बाप सर झुकाकर अंग्रेजों के तलवे चाट रहा था, तब मेरा बाप… : महाराष्ट्र सरकार के मंत्री का विवादित बयान

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर दिल्ली समेत देश के कई शहरों में लगातार विरोध हो रहा है। CAA और NRC को लेकर कई नेताओं के समर्थन और विरोध में बयान सामने आ रहे हैं। इसी बीच राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस नेता (NCP) और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री जितेंद्र आव्हाड ने CAA और NRC को लेकर विवादित बयान दिया है।

एनसीपी नेता ने केंद्र सरकार पर हमला करते हुए कहा, “मैं दिल्ली के तख्त से पूछता हूँ, अब तू माँगेगा मुझसे सबूत मेरे देशवासी होने का, तो सुन, जब तेरा बाप सर झुकाकर अंग्रेजों के तलवे चाट रहा था, तब मेरा बाप फाँसी के तख्त को चूमके इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगा रहा था।”

जितेंद्र के इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो सामने आने के बाद एनसीपी नेता के इस बयान की जमकर आलोचना की जा रही है। उल्लेखनीय है कि विपक्षी पार्टियाँ इस कानून को वापस लेने की माँग कर रही है। साथ ही जहाँ-जहाँ कॉन्ग्रेस की सरकार है, उन राज्यों में इसे लागू नहीं करने का ऐलान किया है। हालाँकि, यह असंवैधानिक है और इस बात को कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने भी माना है।

इससे पहले महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने संशोधित नागरिकता कानून को राज्य में लागू नहीं करने की बात कही थी। उन्होंने कहा था, “महाराष्ट्र में हमारी सरकार है। कई मुस्लिम भाइयों ने कहा था कि बीजेपी उनके लिए सबसे बड़ी दुश्मन है और इसलिए बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए कॉन्ग्रेस को सत्ता में आना होगा। इसी कारण से हमने महाराष्ट्र में सरकार बनाई। जब तक महाराष्ट्र में हमारी सरकार है, हम महाराष्ट्र में सीएए लागू नहीं करेंगे।”

वहीं महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कहा था कि केंद्र सरकार कानून जरूर बना सकती है, लेकिन उसे लागू करने का जिम्मा पूरी तरह राज्य सरकार के पास होता है। देशमुख ने कहा था, “महाराष्ट्र में हमारी सरकार है और केंद्र सरकार कानून जरूर बना सकती है लेकिन इसे लागू करना या नहीं करना राज्य सरकार के हाथ में होता है।”

मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम मामला: ब्रजेश ठाकुर समेत 19 दोषी, श्मशान में खुदाई के दौरान मिली थी हड्डियों की पोटली

बिहार के बहुचर्चित मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम मामले में सोमवार (20 जनवरी) को दिल्ली के साकेत स्थित विशेष कोर्ट ने आरोपितों के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाते हुए उन्हें दोषी करार दिया। कोर्ट ने मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम कांड के मुख्य आरोपित ब्रजेश ठाकुर समेत 19 आरोपितों को दोषी करार दिया, जबकि एक आरोपित को बरी कर दिया। अब दोषियों की सज़ा पर 28 जनवरी को बहस की जाएगी।

सोमवार को फ़ैसले की चौथी तारीख थी। आरोपितों के ख़िलाफ़ यह फ़ैसला अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ कुलश्रेष्ठ की अदालत की तरफ से सुनाया गया। इस मामले में CBI ने 21 आरोपितों के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दाखिल किया था। आरोप-पत्र में आरोपितों के ख़िलाफ़ बलात्कार, आपराधिक साज़िश व बाल यौन शोषण रोकथाम अधिनियम (पॉक्सो) की धारा-6 के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोप सिद्ध होने पर प्रावधान के तहत आरोपितों को कम से कम 10 साल की जेल व अधिकतम उम्रक़ैद की सज़ा हो सकती है।

दोषियों के नाम

  • ब्रजेश ठाकुर (संरक्षक)
  • इंदु कुमारी (अधीक्षिका)
  • मीनू देवी (हाउस मदर) 
  • मंजू देवी (काउंसलर)
  • चंदा देवी (हाउस मदर)
  • नेहा कुमारी (नर्स)
  • किरण कुमारी (हेल्पर) 
  • हेमा मसीह (प्रोबेशनरी अधिकारी) 
  • रवि रोशन (निलंबित सीपीओ- बाल संरक्षण पदाधिकारी) 
  • विकास कुमार (सीडब्लूसी- बाल कल्याण समिति सदस्य) 
  • रोजी रानी (तत्कालीन सहायक निदेशक)
  • विजय कुमार तिवारी (ब्रजेश का ड्राइवर) 
  • गुड्डू कुमार (रसोईया)
  • कृष्णा कुमार राम (सफाईकर्मी) 
  • रामानुज ठाकुर (गेटकीपर)
  • साइस्ता परवीन उर्फ़ मधु (ब्रजेश की क़रीबी) 
  • अश्विनी कुमार (कथित डॉक्टर)
  • दिलीप वर्मा (सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष) 
  • रामाशंकर सिंह उर्फ़ मास्टर साहब

इनके अलावा, विक्की जोकि मधु का भाँजा है, उसे कोर्ट ने बरी कर दिया और प्रेमिला (कथित डॉक्टर) अभी भी फ़रार है।

दरअसल, बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम मामले में 4 मई, 2019 को CBI ने सुप्रीम कोर्ट में 11 लड़कियों के मर्डर की आशंका जताई थी। सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए हलफ़नामे में सीबीआई ने कोर्ट को बताया था कि जाँच के दौरान दर्ज किए गए पीड़ितों के बयान में 11 लड़कियों के नाम सामने आए थे, जिनकी आरोपितों ने कथित रूप से हत्या की थी। जाँच एजेंसी के मुताबिक़ एक आरोपित के कहने पर श्मशान के एक खास स्थान की खुदाई की गई, जहाँ से हड्डियों की पोटली बरामद की गई थी।

ग़ौरतलब है कि बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में एक एनजीओ द्वारा संचालित शेल्टर होम में कई लड़कियों का कथित रूप से बलात्कार और यौन उत्पीड़न किया गया था और टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान की रिपोर्ट के बाद यह मामला सामने आया था। इसके बाद मामले की जाँच सीबीआई को सौंप दी गई थी और एजेंसी ने ब्रजेश ठाकुर समेत 21 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दायर किया था। फ़िलहाल, मुख्य आरोपित ब्रजेश ठाकुर, साइस्ता परवीन उर्फ़ मधु समेत 20 आरोपित जेल में हैं।

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कमलनाथ राज में CAA समर्थकों के साथ मारपीट करने वाली दोनों महिला अधिकारियों पर नहीं होगी FIR

मध्य प्रदेश सरकार राजगढ़ की महिला कलेक्टर निधि निवेदिता और डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं करेगी। प्रदेश के कानून मंत्री पीसी शर्मा ने यह जानकारी दी है। रविवार (जनवरी 19, 2019) को राजगढ़ जिले में महिला कलेक्टर द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं की पिटाई के मामले में कॉन्ग्रेस ने राजनीति करनी शुरू कर दी है।

इस पूरे मामले का एक नया वीडियो सामने आया है, जिसमें भाजपा कार्यकर्ता हाथों में तिरंगा लेकर भारत माता की जय और वंदे मातरम का नारा लगा रहा है। वहीं, राजगढ़ की महिला कलेक्टर निधि निवेदिता उसे रोकने के लिए उसकी कमीज पकड़ कर उसे घसीट रही हैं। इससे पहले एक वीडियो सामने आया था जिसमें डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा ने प्रदर्शनकारियों के साथ हाथापाई शुरू कर दी थी। 

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के समर्थन में निकाली गई रैली में डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा पहुँची और प्रदर्शनकारियों को पीटना शुरू कर दिया। प्रिया वर्मा ने प्रदर्शनकारियों को वहाँ से हटने के लिए कहा। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर एक-दो थप्पड़ भी रसीद दिए, जिसके बाद वहाँ के हालात बदल गए। इसी दौरान किसी ने उनकी चोटी पकड़कर खींच दी। इस मामले में राजगढ़ पुलिस ने 650 लोगों के खिलाफ मामले दर्ज भी कर लिए हैं, लेकिन इन दोनों अधिकारियों के खिलाफ राज्य सरकार कोई एफआईआर नहीं करेगी।

पीसी शर्मा ने इंडिया टुडे से बात करते हुए कहा, “प्रदर्शनकारियों द्वारा हमला किए जाने के बाद दोनों अधिकारी खुद का बचाव कर रहे थे। महिलाओं को अपमानित करना भाजपा और आरएसएस की संस्कृति है। सरकार दोनों अधिकारियों के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं करेगी।”

वहीं, इस मामले में मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने ट्वीट कर महिला अधिकारी की तारीफ की है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “मध्य प्रदेश के राजगढ़ में भाजपा की गुण्डा गर्दी सामने आ गई। महिला जिला कलेक्टर और महिला एसडीएम अधिकारियों को पीटा गया बाल खींचे गए। महिला अधिकारीयों की बहादुरी पर हमें गर्व है।”

इधर, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने कलेक्टर के खिलाफ राजगढ़ जाकर FIR दर्ज कराने की बात कही। उन्होंने ट्वीट किया, “राजगढ़ की घटना ने सिद्ध किया है कि मध्य प्रदेश में अराजकता अब बर्दाश्त के बाहर हो गई है। मैं स्वयं, मेरे साथ पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय व नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव 22 जनवरी को कलेक्टर के खिलाफ FIR दर्ज कराने राजगढ़ जाएँगे।”

नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने भी इस बाबत ट्वीट करते हुए लिखा, “22 जनवरी को कलेक्टर के खिलाफ FIR दर्ज कराने राजगढ़ जाएँगे। कमलनाथ सरकार बीजेपी सरकार के साथ ज्यादती कर रही है। उसे लगता है कि बीजेपी कार्यकर्ता डर के मारे आंदोलन करने बाहर नहीं निकलेगा। हमारा कार्यकर्ता डरने वाला नहीं है।”