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प्रदर्शनकारी छात्रों के दवाब में आया AMU इन्तजामियाँ: सभी परीक्षाएँ स्थगित, आम छात्र मायूस

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में वही हुआ, जिसका वहाँ पढ़ने वाले और होनहार छात्रों को डर था। एएमयू इंतजामियाँ ने आंदोलनकारी छात्रों के दवाब में आकर सभी कॉलेजों में होने वाली परीक्षाओं को स्थगित कर दिया है, जिससे उन छात्रों को ज़ोरदार धक्का लगा है, जो विश्वविद्यालय में कक्षाएँ संचालित होते देखना और अपनी परीक्षाएँ समय पर देना चाहते थे। साथ ही इस आदेश से उन आंदोलनकारी छात्रों को बल मिला है, जो CAA के ख़िलाफ बाबे सैयद गेट पर पिछले 31 दिनों से धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं।

एएमयू के जनसंपर्क अधिकारी (PRO) उमर सलीम पीरज़ादा ने बुधवार को अपना बयान ज़ारी करते हुए बताया कि फ़िलहाल विश्वविद्यालय की सभी परीक्षाओं को स्थगित कर दिया गया है और ज़ल्द ही इस संबंध में नई तारीख़ों का ऐलान किया जाएगा। दरअसल शीतकालीन अवकाश के बाद फ़िर से विश्वविद्यालय के ख़ुलने पर इन परीक्षाओं को कराना निर्धारित किया गया था।

गौरतलब है कि 15 दिसंबर को एएमयू में हुई हिंसा के बाद विश्वविद्यालय को 5 जनवरी तक बंद कर दिया गया था, जिसके बाद इंतजामिया ने चरणबद्ध तरीक़े से विश्वविद्यालय को खोलने की तैयारी की थी, जिसके तहत 13 जनवरी को विश्वविद्यालय को पूरी तरह से खोल दिया गया, लेकिन विश्वविद्यालय के खुलते ही आंदोलनकारी छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। विरोध को देखते हुए आंदोलनकारी छात्रों के दवाब में आकर इंतजामिया को आख़िरी समय में यह फैसला लेना पड़ा। आपको बता दें कि 17 जनवरी से एएमयू में परीक्षाएं शुरू होनी थीं।

इस निर्णय को ऐसे समय में लिया गया है कि जब बीते दिनों विश्वविद्यालय के क़रीब 200 छात्र-छात्राओं ने पत्र और ई-मेल के माध्यम से वीसी को अवगत कराया था कि वह विश्वविद्यालय में कक्षाओं को सुचारू रूप से संचालित देखना और अपनी परीक्षाओं को तय समय पर देना चाहते हैं। साथ ही वीसी को ई-मेल करने वाले छात्रों ने एएमयू इंतजामिया को आगाह किया था कि कुछ आंदोलनकारी छात्र फ़िर से JNU की तरह AMU का माहौल ख़राब करने की कोशिश में हैं। इससे गुस्साए आंदोलनकारी छात्रों ने पहले तो छात्रों को तरह-तरह की धमकी दी और फ़िर उन पर दवाब बनाया कि वह सभी कक्षाओं का बहिष्कार करते हुए सोशल मीडिया पर #BoyCottExam चलाएँऔर उनके साथ प्रोटेस्ट में शामिल भी हों।

वहीं CAA के ख़िलाफ बाबे सैयद गेट पर पिछले 31 दिनों से चल रहे धरने पर AMU के आंदोलनकारी छात्रों ने ऐलान किया है कि वह 15 दिसंबर के दिन को हर वर्ष “ब्लैक-डे” के रूप में मनाएँगे।

कॉन्ग्रेसी CM मनमोहन के कानून से खफा, पहुँचे SC: कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI हुआ खुश, मामला आतंक से जुड़ा

एक कट्टरपंथी इस्लामी संगठन है। नाम है – पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI)। इस संगठन के एक राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। उनका नाम है – एम मोहम्मद अली जिन्ना। छत्तीसगढ़ में आजकल कॉन्ग्रेस की सरकार है। और उन्होंने कुछ ऐसा किया है, जिससे PFI खुश हो गई है। इतना खुश कि राज्य सरकार के फैसले का स्वागत करने के लिए प्रेस रिलीज तक जारी कर दी।

किसी राज्य सरकार द्वारा उठाए गए किसी कदम का स्वागत अगर कोई कट्टरपंथी इस्लामी संगठन करता है, मतलब दाल में कुछ काला है। तो खबर यह है कि नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी मतलब NIA के खिलाफ भूपेश बाघेल की सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची है। मुख्यमंत्री का मानना है कि एनआईए कानून संविधान के तहत राज्य को दिए गए अधिकारों का हनन करता है। और इसलिए उन्होंने इसे चुनौती देने का निर्णय किया।

नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) का काम ही था आतंक से संबंधित। इसे लाया ही गया था आतंक से प्रभावी तरीके से लड़ने के लिए। सोचने वाली बात यह है कि ऐसा क्या हो गया कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री को इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ गया। सोचने वाली बात यह भी है कि लोकतांत्रिक तरीके से जीत कर आई किसी राज्य सरकार के लिए गए फैसले पर कोई कट्टरपंथी संगठन (जिस पर आतंक के कई आरोप लगे हैं, जिसकी जड़ें SIMI से जुड़ी हुई हैं) खुशियाँ क्यों मना रहा है!

PFI की प्रेस रिलीज

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने एनआईए एक्ट को संवैधानिक रूप से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के छत्तीसगढ़ सरकार के फैसले का स्वागत किया है। इतना ही नहीं, PFI ने अन्य गैर-बीजेपी सरकारों से भी नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी एक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की अपील की है।

PFI ने जो प्रेस रिलीज जारी किया है, उसके अनुसार यह क़ानून देश के फेडरल चरित्र को कमज़ोर करता है, क्योंकि इसमें केंद्र को इतने ज़्यादा अधिकार दे दिए गए हैं कि वह राज्यों के संवैधानिक अधिकारों में भी हस्तक्षेप कर सकती है। इसीलिए छत्तीसगढ़ सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाकर स्वागतयोग्य कार्य किया है। PFI ने इसी आड़ में केरल सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने को भी एक अच्छी मिसाल कायम बताई है।

NIA और मनमोहन सरकार

2008 में मनमोहन सिंह सरकार ने नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी एक्ट लाकर इसे साकार किया था। यह अमेरिका के FBI के तर्ज पर बनी एजेंसी थी। मतलब इसे इतनी शक्ति दी गई थी कि आतंक संबंधी मामलों पर यह भारत के किसी भी राज्य में जाकर केस दर्ज कर सकती थी और इसके लिए उसे संबंधित राज्य से परमिशन लेने की जरूरत नहीं थी। कुल मिलाकर NIA को CBI से ज्यादा पावरफुल और ज्यादा प्रभावी बनाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति थी यह।

यह इसलिए लाया गया था क्योंकि तब आतंकी गतिविधियाँ अपने चरम पर थीं। तब देश की सामान्य जाँच एजेंसियों में सामन्जस्य की कमी के कारण आतंक-रोधी अभियान बहुत प्रभावी नहीं हो पाता था। सूचनाएँ मिलने के बावजूद समय पर स्थानीय प्रशासन तक इसकी जानकारी पहुँच नहीं पाती थी और आतंकी घटनाएँ आम हो गई थीं। इसे से लड़ने के लिए तब नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी एक्ट लाया गया था। और यह काफी हद तक प्रभावी भी रहा।

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना एक तरह से मनमोहन सरकार के लिए गए फैसले पर प्रश्नचिह्न लगाना हुआ। हास्यास्पद यह कि विरोधी राजनीतिक दल होते हुए भी मोदी सरकार ने इस कानून की अहमियत को समझा और 2019 में इसे और मजबूत बनाया। लेकिन खुद कॉन्ग्रेसी सरकार ही अब इसमें पलीता लगाने का काम कर रही है और उसे हवा दे रही है कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन PFI! यह वही संगठन है, जिस पर खुद बैन लगने की तलवार लटक रही है।

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22 जनवरी को निर्भया के दरिंदों को नहीं होगी फाँसी, कल तय होगी अगली तारीख, ये है पेंच

निर्भया गैंगरेप मामले में चारों दोषियों को 22 जनवरी को फाँसी नहीं होगी। पटियाला हाउस कोर्ट ने निर्भया केस के एक अन्य दोषी मुकेश सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान दोषियों की फाँसी पर आज स्टे लगा दिया । मुकेश सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली के पटियाला कोर्ट ने गुरुवार (जनवरी 16, 2020) को कहा कि दोषियों को 22 जनवरी को फाँसी नहीं दी जा सकती है।

कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अगर ये भी मान लें कि कल परसों में ही राष्ट्रपति दोषियों की दया याचिका को खारिज भी कर देते हैं, तब भी हमको उसके बाद भी 14 दिन का वक़्त देना पड़ेगा ही, इसका मतलब तो यही है कि 22 जनवरी को कानूनन तौर पर फाँसी हो ही नहीं सकती। कोर्ट के मुताबिक दया याचिका लंबित होने के कारण डेथ वॉरंट पर स्वतः ही रोक लग गई है। कोर्ट ने कहा कि नई तारीख क्या होगी, ये जेल अथॉरिटीज के जवाब से तय होगा।

बता दें निर्भया मामले में फाँसी की सजा पाए चारों दोषियों में से एक मुकेश सिंह ने दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) से राहत नहीं मिलने के बाद बुधवार शाम को पटियाला हाउस कोर्ट में डेथ-वारंट पर रोक लगाने की माँग करते हुए याचिका दायर की थी। जिसके बाद कोर्ट ने आज इसपर सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुनाया।

कोर्ट ने कहा कि वे फिलहाल निर्भया के गुनहगारों की फाँसी की तारीख नहीं बढ़ा रहे हैं। लेकिन उन्होंने इस मामले में जेल प्रशासन से रिपोर्ट माँगी है। कोर्ट ने बताया है कि जेल प्रशासन ने इस मामले में उनको पूरी जानकारी नहीं दी है। जेल प्रशासन को कोर्ट के सामने पूरी जानकारी रखनी चाहिए थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट ने जेल अधिकारियों से निर्भया रेप मामले के दोषी अक्षय, विनय और पवन से जुड़े सारे कागजात और रिपोर्ट सौंपने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जेल अथॉरिटी एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करे। अब कोर्ट इस मामले में शुक्रवार को दोबारा सुनवाई करेगा।

गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली सरकार ने बुधवार को अदालत में कहा था कि दोषियों को 22 जनवरी को फाँसी नहीं दी जा सकती क्योंकि दया याचिका दायर की गई है। हालाँकि, दिल्ली सरकार के वकील ने इस दौरान ये भी कहा था कि दोषी मुकेश द्वारा दायर की गई क्षमा याचिका असामयिक है। बुधवार (जनवरी 15, 2020) को आरोपितों की क्षमा याचिका को उपराज्यपाल कार्यालय भेजा गया था। जिसके बाद उपराज्‍यपाल अनिल बैजल ने भी निर्भया के गुनहगार मुकेश की दया याचिका ठुकरा दी थी। अब मुकेश की याचिका गृह मंत्रालय के पास भेजी जाएगी और नियमों के तहत वहाँ से उसे राष्‍ट्रपति के पास भेजा जाएगा। मुकेश की दया याचिका पर अब राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ही अंतिम फैसला लेंगे।

CAA विरोधी प्रदर्शनों में बच्चों का हो रहा इस्तेमाल, NCPCR से शिकायत

सेव चाइल्ड इंडिया NGO ने नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (NCPCR) में इस बात को लेकर अपनी शिक़ायत दर्ज करवाई है कि विरोध-प्रदर्शनों में बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है। NGO का कहना है कि यह बच्चों के अधिकारों का घोर उल्लंघन है और यह बाल शोषण की श्रेणी में आता है। दरअसल, दिल्ली के शाहीनबाग में CAA और NRC के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध-प्रदर्शन में कई बच्चे भड़काऊ नारे लगाते देखे गए हैं। इस तरह की घटना सामने आने पर यह शिक़ायत दर्ज कराई गई।

शिक़ायतकर्ता, सेव चाइल्ड इंडिया NGO ने अपने ट्विटर हैंडल से अभिनव खरे के उस वीडियो को भी शेयर किया। इसके बाद शिक़ायतकर्ता, कुमार श्योद्वाज रत्न, जो कि उक्त NGO के संस्थापक हैं उन्होंने इस मामले को संज्ञान में लिया और शिक़ायत दर्ज करवाई।

इस बात की पुष्टि करने के लिए ऑपइंडिया ने भी शिक़ायतकर्ता से सम्पर्क साधा और यह जानने के प्रयास किया कि बच्चों से भड़काऊ नारे क्या सच में शाहीनबाग के प्रदर्शन में ही लगवाए गए थे। तब पता चला कि उन्होंने (शिक़ायतकर्ता) खरे द्वारा शेयर किए गए वीडियो को देखा था और इस तथ्य को जानकर वो बहुत परेशान हो गए थे। उनका कहना था कि इन अबोध बच्चों को CAA जैसे विषय के बारे में कोई जानकारी नही है, लेकिन मंच पर खड़े होकर जिस तरह से वो भड़काऊ नारे लगा रहे थे उसे देख-सुनकर बड़ी हैरानी होती है। उन्होंने बताया कि इन बच्चों की उम्र 10 या 11 वर्ष से अधिक नहीं होगी, इनका इस्तेमाल राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए किया जा रहा था।

इस वीडियो में बच्चों को आज़ादी के नारे लगाते हुए सुना जा सकता है और वे बेहद परेशान करने वाले नारे भी लगा रहे थे। इस दौरान उन बच्चों ने “जो हिटलर की चाल चलेगा, वो हिटलर की मौत मरेगा” और “जामिया तेरे ख़ून से, इंकलाब आएगा” जैसे नारे लगाए।

रत्न ने कहा, “जब मैंने इन चीजों को देखा, तो यह वास्तव में बहुत निराशाजनक था क्योंकि मैं वास्तव में यह समझ ही नहीं पाया था कि ये बच्चे क्या कर रहे थे। वे आज़ादी की बात कर रहे थे और उनकी उम्र 10 या 11 साल है। वे बच्चे हैं, वो तो अभी अपनी भावनाओं को सही से व्यक्त भी नहीं कर सकते। यह बच्चे ऐसे ठोस मुद्दे पर अपनी विचार रखने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें योजनाबद्ध तरीक़े से उस स्थान पर ले जाया गया।” 

अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने कहा,

“मैंने सोचा कि बच्चों को वहाँ क्यों ले जाया गया… क्या इन बच्चों को किसी स्वार्थ-पूर्ति के लिए ले जाया जा रहा था? मेरे लिए यह बात वाकई दर्दनाक थी। माता-पिता बच्चों को अपनी सम्पत्ति के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे। आप बच्चों को अपनी सम्पत्ति के रूप में कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं?”

इसके अलावा, इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि इस भड़काऊ नारेबाज़ी के लिए बच्चों ने अपनी सहमति नहीं दी थी। जहाँ बच्चे नारे लगा रहे थे वए हिंसाग्रस्त क्षेत्र था, जहाँ किसी भी तरह के सुरक्षा के पर्याप्त इंतज़ाम नहीं थे। शिकायत में कहा गया, “यह विरोध जोखिम भरा हो सकता है और बच्चों को खतरों का भी सामना करना पड़ सकता है। निश्चित रूप से यह गंभीर रूप से चिंता का विषय है कि जो अपराध बच्चों ने किया ही नहीं उसके लिए उन्हें दंडित भी किया जा सकता है।”

बच्चों द्वारा भड़काऊ नारेबाज़ी को शिक़ायतकर्ता ने गंभीर रूप से संज्ञान में लिया। अपनी शिक़ायत में उन्होंने निम्नलिखित सवाल उठाए:

शिकायत में उठाए गए सवाल

शिक़ायत में माँग की गई है कि एक न्यूनतम आयु मानदंड निर्धारित किया जाए जो यह सुनिश्चित करता हो कि एक निश्चित उम्र से कम बच्चे विरोध-प्रदर्शन में भाग नहीं ले सकते। इसके अलावा, यह भी अनुरोध किया गया कि ऐसे ग़ैर-ज़िम्मेदार आचरण में लिप्त माता-पिता को हिरासत में लिया जाए। अंत में, इस मामले में उचित कार्रवाई के लिए उपयुक्त अधिकारियों को निर्देश जारी किए जाने का आग्रह किया गया है।

Video: हिन्दूघृणा से सने वो 30 पोस्टर जो सामने ले आए इस वामपंथी-इस्लामी मानसिकता की असली तस्वीर

नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी का विरोध करने के नाम पर सड़कों पर उतरी भीड़ को बीते दिनों हमने दंगाइयों में बदलते देखा। हमने देखा कि किस तरह संविधान को बचाने के नाम पर तोड़फोड़, आगजनी जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया। पुलिस पर उपद्रवियों द्वारा हमले किए गए। बम फेंकने का प्रयास हुआ। सरेआम गोली चलाई गई। करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट किया गया आदि-आदि। इन सबके अतिरिक्त एक जो चीज़ इन प्रदर्शनों और दंगों में सबसे आम देखने को मिली, वो थी- हिंदुओं के प्रति घृणा।

जामिया मिलिया इस्लामिया हो या जेएनयू; शाहीन बाग हो या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, हर जगह सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों में हिंदूघृणा से लबरेज पोस्टर दिखाई दिए। कहीं हिंदुओं को कैलाश भेजने की बात हुई, कहीं ख़िलाफ़त 2.0 को काली स्याही से दीवार पर लिख दिया गया। जोर-जोर से ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारे लगे और पूरी दुनिया में ‘ऊँ’ के चिन्ह को अपमानित करते हुए पोस्टरों में ‘फक हिंदुत्व’ लिखा गया।

इसके अलावा इन प्रदर्शनों में हिंदू राष्ट्र को रेपिस्ट कहा गया। साथ ही ‘फक हिंदू राष्ट्र’ जैसे नारे लड़कियों के गाल पर लिखे देखे गए। इन प्रदर्शनों में पोस्टरों के जरिए न केवल केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह को निशाना बनाया गया। बल्कि देश की बहुसंख्यक आबादी की धार्मिक भावनाओं को भी ठेस पहुँचाया गया। इन आंदोलनों में इस्लाम के मायने तो समझाए गए, लेकिन हिंदू संस्कृति और सभ्यता का न केवल बुरी तरह मजाक उड़ाया गया, बल्कि हर मुमकिन तरीके से सेकुरलिज्म के नाम पर उसे रौंदा गया।

बता दें, ये केवल चुनिंदा नारे और वाकये थे। बीते दिनों हुए इन प्रदर्शनों में करीब 30 पोस्टर ऐसे दिखाई दिए, जो हिंदूघृणा की खुली किताब थे। जिन्हें देखते ही अंदाजा लग जाएगा कि सेकुलरिज्म बचाने के नाम पर ये हिंदुत्व पर हमला है।

मोदी जी बने रहे, शाहीनबाग सजा रहे: आजादी के मजे ले रही सबा नक़ली और इकतरफा ख़ानम

हिंदुओं से आजादी लेने निकला सुलेमान आजकल घर में बैठा है। बाहर मोर्चे पर समीना चच्ची हैं। इस ठंड में भी। रुबिया भाभी भी बच्चों के साथ डेरा डाले बैठी हैं। नीलोफर ने तो हिजाब उतार लिए हैं। आजकल बिंदी भी लगाती है। कभी-कभी मंगलसूत्र भी पहन लेती है। नीलोफर के रंग इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि रुबीना कहती है- हिंदू-मुस्लिम का फर्क मिटाने के फेर में पगली किसी दिन मॉंग ही न भर ले! तपाक से नीलोफर कहती है- मैं चाहती हूँ कल को कोई भक्त यह न कहे कि विरोध तो वे कर रहे जिनके अब्बा का दस्तावेज बकरा खा गया!

शाहीनबाग के उस टेंट के नीचे विरोध के जैसे रंग मैंने देखे, ऐसा सतरंगी विरोध सबा नक़ली और इकतरफा ख़ानम (डर के माहौल में बदले हुए नाम) ने भी कभी नहीं देखा था। सबा नक़ली के मन की बात जानने से पहले यह जानते हैं कि इस ‘संघर्ष’ ने आखिरकार असली जमीन पकड़ी कैसे। सत्ता के विरोध के नाम पर स्वास्तिक को कुचलने की क्रांति ने घर की सीमाएँ तोड़ी कैसे?

जिस क्रांति ने पहले सड़कों को जलाया। सार्वजानिक धन की व्यापक हानि कर सरकार, तंत्र और टैक्स भरने वालों का खुलकर मजाक बनाया। फिर वामपंथ के रक्तरंजित इतिहास की झलक दिखाई और बात कश्मीर की आजादी तक पहुँची। कानून के विरोध के नाम पर हिंदू विरोधी नारे लगे। कल ही इस विरोध-प्रदर्शन की एक नई तस्वीर शाहीनबाग से आई। एक पोस्टर में कुछ हिजाब पहने महिलाएँ स्वास्तिक के चिह्न को कुचलते हुए दिखाई गई हैं।

सोशल मीडिया पर ही प्रदर्शन कर रहे लोगों द्वारा ‘किट’ (जिसमें सनस्क्रीन से लेकर पेटीज और पिज़्ज़ा बर्गर तक शामिल हैं) और प्रदर्शन का टाइमटेबल शेयर किया जा रहा है। इस ‘किट’ में विरोध-प्रदर्शन में आने वाली मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला हिजाब लाना भी आवश्यक बताया गया है। विरोध कर रहे इन क्रन्तिबीजों के चेहरे पर हिजाब है और जुबान पर इस्लामिक नारे।

लेकिन, इस क्रांति के समानांतर अल्पसंख्यक महिलाओं का जो सशक्तिकरण दिख रहा है वह केवल सबा नक़ली की नंगी आँखें ही देख पाई हैं। चाहे सबा नक़ली की आप बीती हो या इकतरफा ख़ानम, हिजाब में ढकी जिन महिलाओं को घर से बाहर सब्जी लेने के लिए जाने की आजादी नहीं थी वे आज हिंदुत्व से आजादी के नारे भी लगा लेती हैं।

बकौल सबा नक़ली- यह इस्लामिक पुनर्जागरण का नया दौर है। इसमें याद रखा जाएगा कि किस तरह से इस्लामिक चरमपंथियों ने हिंदुत्व और सरकार से संघर्ष में शरीयत से संघर्ष शुरू कर दिया था। 500 रुपए रोजाना की दिहाड़ी पर प्रदर्शन कर रही सबा नक़ली का कहना है कि वो इस सरकार और हिंदुत्व के खिलाफ सिर्फ बाहर से नारेबाज़ी कर रही है। हृदय की गहराइयों में वो इन दोनों ही फासीवादी ताकतों की आभारी हैं।

सबा नक़ली ने बताया कि उनका शौहर तौहमत मुरादाबादी (बदला हुआ नाम), जो उन्हें कचरे वाले की गाड़ी में कचरा डालने तक के लिए बाहर नहीं निकलने देता था, वो उनसे कह रहा है कि कोई छपाक फिल्म आई है जिसे देखते ही सरकार काँप उठेगी और किसी फासीवादी संस्था का नाश हो जाएगा। शौहर तौहमत मुरादाबादी ने सबा नक़ली से यह भी कहा है कि सड़क पर जाना है, घर से बाहर निकलना है, नारे लगाने हैं, गीत गाने हैं, सीटियाँ बजानी हैं… सत्ता रहेगी तो शरीयत भी रहेगी।

सबा नक़ली की मानें तो इस स्टेटस को मुस्लिम औरतें बेहद इंज्वाय कर रही हैं। बिंदी और मंगलसूत्र देख आजकल वे भी ‘वाउ’ कहते हैं। फिर वे कहती हैं- मोदी है तो मुमकिन है। मैं और मेरी बहनें नीलोफर, रुबीना, जमीला किसी को नहीं पता माजरा क्या है। लेकिन, हम सब खुश हैं। लग रहा है कुछ हो रहा है। अच्छे दिन आ रहे हैं। खुली हवा में साँस, PVR-मल्टीप्लेक्स में छपाक। तीन तलाक का खौफ तो मोदी जी ने पहले ही खत्म कर दिया है।

सबा नक़ली कहती हैं- अब बस इतनी दुआ है, मोदी जी बने रहे। शाहीनबाग सजा रहे।

पीछे से रुबीना की आवाज़ आती है- आमीन! और पीछे से हारमोनियम बजाते हुए तौहमत मुरादाबादी की सुरों से सजी आवाज आती है ‘हम भी देखेंगे…’ शाहीनबाग को नजर ना लगे।

(पहचान छिपाने और मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा को देखते हुए सारे नाम बदल दिए गए हैं)

स्वास्तिक से छेड़छाड़: ‘इस्लामी राज्य’ का सपना पाले, हिंदू घृणा से सना है शाहीन बाग का नया पोस्टर

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) संसद में पारित होने के बाद से ही भारत के वामपंथियों और मुस्लिमों के लिए एक विवादित क़ानून बन गया है। देश के कई हिस्सों में हिंसक हुई मुस्लिम भीड़ द्वारा विरोध-प्रदर्शन के नाम पर हिन्दू विरोधी नारे और पोस्टर लगाए जाने से लेकर उग्र प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। ताज़ा मामले में शाहीन बाग का एक और पोस्टर सामने आया है। इसे पत्रकार, सबा नकवी ने शेयर किया है। इस पोस्टर को देखते ही आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यह हिन्दू-विरोधी कल्पना से भरा है।

सबा नकवी द्वारा गर्व के साथ शेयर की गई इमेज में तीन महिलाओं को बुर्क़ा पहने और माथे पर बिंदी लगाए दिखाया गया है। इसके अलावा, पोस्टर के नीचे, फ़ैज़ की कविता ‘हम देखेंगे’ शीर्षक से कुछ पंक्तियाँ भी लिखी हुई हैं। अंत में, हिन्दू स्वस्तिक को खंडित कर उसका विघटित रूप दर्शाया गया।

यह पोस्टर स्पष्ट रूप से हिन्दुओं पर इस्लामी वर्चस्व की स्थापना और हिन्दुओं के घृणा जताने की मंशा से ओत-प्रोत है। इसे CAA विरोधी-प्रदर्शनों का प्रतीक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। और न ही इसे राजनीतिक विरोध मानकर हवा में उड़ाया जा सकता है।

हिजाब पहने और माथे पर बिंदी लगाए महिलाओं के इस पोस्टर को देखकर ऐसा भी लगता है कि मुस्लिम समुदाय हिन्दू महिलाओं को किस नज़रिए से देखता है। पहली नज़र में ऐसा भी प्रतीत होता हो सकता है जैसे यह पोस्टर कश्मीर से है, जहाँ कश्मीरी हिन्दू महिलाओं का बलात्कार इस्लामी ताकतों द्वारा किया गया और फिर उनकी उनकी हत्या कर दी गई। इसके अलावा, यह पोस्टर मुस्लिमों के अत्याचार के उस दौर का भी खुला चित्रण करती है जिसके तहत कश्मीर में हिन्दू पुरुषों को धर्म परिवर्तन, पलायन या मरने के अलावा अपनी महिलाओं को बलात्कार और मुस्लिम बनाने के लिए छोड़ने तक के लिए मजबूर किया गया।

मुस्लिम महिलाओं की इमेज के ठीक नीचे फैज़ की कविता का शीर्षक ‘हम देखेंगे’ तो लिखा था, लेकिन उसके नीचे की पंक्तियों को बदल कर नई पंक्तियों को गढ़ा गया। इसके अनुसार

जब ज़ुल्म-ओ-सितम मोदी-शाह के, 
खाक में मिल जाएँगे, 
जनता के एक इशारे पे,
सब कुर्सी से उतारे जाएँगे, 
लाज़िम है कि हम देखेंगे।    

इस पोस्टर के अंत में, हिन्दुओं के पवित्र स्वास्तिक चिन्ह को खंडित कर उसके विघटित रूप को दिखाया गया था।

एक बात और ध्यान दिला दें कि हिन्दू घृणा से सने शाहीन बाग़ इलाक़े में CAA और NRC के ख़िलाफ़ ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ जैसे नारे लगाए गए थे। इस दौरान ऐसे पोस्टर भी देखे गए जिनमें हिन्दू धर्म की तुलना नाज़ीवाद से और स्वास्तिक का दुरुपयोग करते हुए विखंडित दिखाया गया।

दिलचस्प बात यह है कि CAA विरोधी-प्रदर्शनों में ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के जमकर नारे लगाए गए। पवित्र हिन्दू स्वास्तिक की इमेज को कलंकित किया गया, इसकी तुलना नाज़ी हैकेन क्रुज़ (Nazi Haken Kreuz) से की गई है। बता दें कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का शाब्दिक अर्थ ‘अल्लाह के सिवाय कोई ईश्वर नहीं’ है। जिसका किसी भी राजनीतिक प्रोटेस्ट से कोई लेना-देना नहीं है।

स्वास्तिक को इस्लामवादी हमेशा से ही हिटलर हैकेन क्रुज़ के साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ख़ुद हिटलर ने कभी भी Hast Kreuz के लिए स्वस्तिक शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन आतंकी संगठन ISIS ने ला इलाहा इल्लल्लाह को अपने झंडे में शामिल किया।

ग़ौरतलब है कि बीते दिनों CAA के ख़िलाफ़ हुए दंगों में देश ने मुस्लिमों की भीड़ का एक अलग ही चेहरा देखा गया। ये याद रखने वाली बात है कि खुद को भारत का नागरिक कहने वाले लोग एक तरफ देश में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हैं, वहीं दूसरी तरफ ये लोग हिन्दुओं से आजादी की माँग कर रहे थे। और हिन्दू विरोधी नारों के साथ उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली में हिंसा और दंगा कर रहे थे। ख़िलाफत 2.0 का संदेश दे रहे थे और ला इलाहा इल्लल्लाह के नारे लगा रहे थे।

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दिल्ली में शिक्षा क्रांति के दावे ऊँचे, हकीकत फीकी: 500 स्कूल नहीं खुले, कमरे गिनवा रही केजरीवाल सरकार

दिल्ली में विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र आम आदमी पार्टी (आप) ने केजरीवाल सरकार के कामकाज पर एक रिपोर्ट कार्ड जारी किया है। बीते पाँच सालों में दिल्ली सरकार की प्राथमिकता शिक्षा रही है और यह बात रिपोर्ट कार्ड में उसके पहले स्थान से स्पष्ट होती है। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की जो उपलब्धियाँ बताई गईं हैं, वे झूठ का पुलिंदा मात्र हैं।

कायदे से आप को अपने उन चुनावी वादों का हिसाब-किताब देना चाहिए था, जिसे सामने रखकर वह 2015 में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई थी। लेकिन उन वादों को भूलाकर भ्रमित करने वाले तथ्य जनता के सामने रख रही है। आप ने 2015 के चुनाव के समय 500 नए सरकारी स्कूल खोलने, दिल्ली के सभी निवासियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने, 17,000 शिक्षकों की बहाली करने और शिक्षा के लिए बजट बढ़ाने के वादे किए थे।

2015 विधानसभा चुनाव के समय जारी आप के 70 सूत्री एजेंडा का अंश

बजट छोड़कर एक भी वादा पूरा नहीं हुआ। लेकिन जिस बढ़े शिक्षा बजट को लेकर दिल्ली की आप सरकार सुर्खियाँ बटोर रही है, उसमें भी तथ्यों के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ किया गया है। आप के नेता यह कहते नहीं थकते कि दिल्ली का शिक्षा बजट सबसे अधिक है। ऐसा पहले किसी सरकार में कभी नहीं हुआ। सच्चाई यह है कि दिल्ली इकलौता राज्य नहीं है, जिसने शिक्षा पर अपने बजट का एक चौथाई हिस्सा आवंटित किया है।

बीते एक दशक के आँकड़ों को देखें तो कई ऐसे राज्य हैं जिन्होंने शिक्षा के लिए अपने कुल बजट का 20 से 30 प्रतिशत के बीच शिक्षा के लिए आवंटित किया है। असम ने तो वर्ष 2000-01 में 25.5% शिक्षा के लिए आवंटित किए थे। मेघालय जैसे छोटे से राज्य ने वर्ष 2014-15 में अपनी बजट का 27.8% शिक्षा के लिए रखा था .

वास्तविकता यह है कि दिल्ली में हमेशा शिक्षा के लिए अधिक बजट आवंटित करने का जो ट्रेंड पिछली सरकारों ने शुरू किया, आप सरकार उसी पद चिह्नों पर चल रही है। आँकड़ों को देखें तो दिल्ली का बजट वर्ष 2000 से लेकर अब तक औसतन 15 प्रतिशत से हमेशा अधिक ही रहा है, जो देश के कई राज्यों से काफी अधिक है।

बजट के मामले में यह समझना भी आवश्यक है कि दिल्ली शिक्षा पर इसलिए भी अधिक खर्च कर सकने में समर्थ है क्योंकि इसके पास धन अधिक है और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र होने की वजह से खर्च करने का क्षेत्र सीमित। वर्ष 2018-19 में दिल्ली की प्रति व्यक्ति औसत आय 3,65,529 रुपए है, जो कि राष्ट्रीय औसत 1,25,397 रुपए से तिगुनी है। दिल्ली का राजस्व अधिशेष (रेवेन्यू सरप्लस) भी 2017-18 के दौरान 4,913 करोड़ रुपए था। वहीं देश के कई बड़े राज्य भारी कर्ज में डूबे हैं और उनकी आय से कई गुना अधिक खर्च होता है।

केजरीवाल सरकार ने शिक्षा बजट की राशि को जिस तरह बढ़ता हुआ दिखाया है उसके अनुरूप वह खर्च करने के मामले में हमेशा फिसड्डी रही है। 2008 से 2013 तक के ही आँकड़े देखें तो यह जानकर आश्चर्य होगा कि कॉन्ग्रेस नीत शीला सरकार ने जहाँ आवंटित बजट का औसतन 98 प्रतिशत खर्च किया, वहीं केजरीवाल सरकार किसी भी वित्तीय वर्ष में इस आँकड़े के आस-पास भी नहीं पहुॅंच पाई।

बात केवल शिक्षा की ही करें तो दिल्ली सरकार ने शिक्षा के लिए आवंटित बजट का 2014-15 में 62%, 2015-16 में 57%, 2016-17 में 79% ही खर्च किया। कुछ यही हाल बीते दो वर्षों में भी देखने को मिला है।यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि शिक्षा के लिए आवंटित बजट की कुल राशि में स्कूली शिक्षा के साथ उच्च शिक्षा भी शामिल है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार सामान्य शिक्षा के जुड़ी योजनाओं के लिए वर्ष 2017-18 के बजट में 2,970 करोड़ रुपए खर्च करने का प्रावधान किया गया था, लेकिन वास्तविकता में 2374.75 करोड़ रुपए ही खर्च हुए।

वहीं तकनीकी शिक्षा के लिए जहाँ बजट में 363 करोड़ रुपए आवंटित थे, उसमें से मात्र 193.36 करोड़ रुपए ही खर्च हुए। उच्च शिक्षा की बात केजरीवाल सरकार अमूमन कम करती है, स्कूली शिक्षा में क्रांति के उसके दावे होते हैं। लेकिन जब प्राथमिक शिक्षा के लिए आवंटित बजट की स्थिति देखें तो शिक्षा निदेशालय को जहाँ 2017-18 के बजट में 2,127 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे, खर्च केवल 1,677.46 करोड़ रुपए ही हुए।

ऐसी ही स्थिति उच्च शिक्षा के लिए आवंटित बजट में भी देखने को मिलती है जहाँ आवंटित 483 करोड़ रुपए में से 337.28 करोड़ रुपए ही खर्च हुए। इसके साथ ही बजट प्रस्तुत करते समय बजट अनुमान और संशोधित अनुमान के आँकड़ों में काफी अंतर देखने को मिला है।

दिल्ली के शिक्षा बजट देखने में भले तीन गुना हो गया हो लेकिन सच्चाई तो यही है कि यह राज्य के कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रॉडक्ट यानी जीएसडीपी) का 2 फीसदी भी नहीं है। वर्ष 2018-19 में शिक्षा के लिए आवंटित बजट को ही मानें तो शिक्षा पर जीएसडीपी का मात्र 1.70 फीसदी ही खर्च हो रहा है।अगर इसे पिछले सरकार के आँकड़ों से तुलना करें तो 2013-14 में दिल्ली ने अपने कुल जीएसडीपी का जहाँ 1.29% शिक्षा के लिए आवंटित किया था, वहीं 2018-19 तक केवल 0.41% की ही बढ़ोतरी हुई। यानी दिल्ली की जितनी आर्थिक क्षमता बढ़ी उस हिसाब से शिक्षा के लिए आवंटित यह बजट मात्र आँकड़ों की बाजीगरी से इतर कुछ भी नहीं है।

देश की जीडीपी के 6% शिक्षा पर खर्च करने के पैरोकार अरविंद केजरीवाल और उनके साथी, राज्य के जीएसडीपी के 2 प्रतिशत के भी आँकड़े को नहीं छू सके हैं।

कितने क्लासरूम?

7 मार्च 2017 को विधानसभा में दिए अपने भाषण में शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा था कि 8,000 कमरों का काम लगभग पूरा हो गया है व आगामी वित्तीय वर्ष में 10,000 नए कमरे बनाने का काम शुरू कर लिया जाएगा। लेकिन आप की आधिकारिक वेबसाइट कुछ और हकीक़त बता रही है। लगभग छह माह बाद यानी 7 अक्टूबर 2017 को आम आदमी पार्टी की वेबसाइट द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार दिल्ली के स्कूलों में केवल 5,695 कमरे बने थे। मतलब विधानसभा में भी दिल्ली के शिक्षा मंत्री ने झूठ बोला!

जब 2018-19 का इकॉनोमिक सर्वे आया तो पता लगा 8,095 कमरे ही बने हैं। लेकिन ठीक दो महीने बाद जब लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी ने घोषणापत्र जारी किया तो बनने वाले क्लासरूम की संख्या 8,213 बताए। चलो यहाँ तक ठीक है। 8,000 कमरे बन गए। लेकिन अब रिपोर्ट कार्ड के जरिए ये दावा किया जा रहा है कि सरकार ने 20,000 कमरे बना लिए।

28 जनवरी, 2019 को केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के कोने-कोने में विज्ञापन देकर बताया कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 11,000 नए कमरे बनाने का शिलान्यास हो रहा है तो 1,000 कमरे नए कमरे अलग से बनने की प्रक्रिया कब शुरू हुई? यहाँ यह भूलना उचित नहीं होगा कि इन नए कमरों के निर्माण में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। ऐसा लगता है कि नए कमरे बनाने के नाम पर पर्दे के पीछे खेल चल रहा।

यही नहीं, दिल्ली सरकार ने चार वर्षों में 8,000 नए कमरे बनाए तो यह बताया ही नहीं कि इसमें से बच्चों के बैठने वाले क्लासरूम कितने हैं और बाकी काम के लिए कितने! शक होना लाज़मी है क्योंकि जो सरकार चार साल में 25 फीसदी बजट के बावजूद केवल 8,000 कमरे ही बनवा पाई, वह महज 8 महीने में ही 12,000 और नए बनाने के दावे कर रही है।

सवाल यह भी अनुत्तरित है कि नए कमरे बनाने से 500 नए स्कूल बनाने के वादे से आम आदमी पार्टी क्यों मुकर गई! सरकार की यह मंशा भी बेहद खतरनाक है, जहाँ वो नए स्कूल खोलने की बजाए, नए कमरे बनाकर सुबह और शाम की शिफ्ट में चलने वाले स्कूलों को एक शिफ्ट में करने की योजना पाले आगे बढ़ रही है। यह हुआ तो भीड़ में न तो पढ़ाई होगी, न ही शैक्षिक गुणवत्ता बचेगी। शिक्षकों और प्राचार्यों के पद खत्म तो होंगे ही।

12वीं के परीक्षा परिणाम

आप सरकार और उनके समर्थकों द्वारा एक और झूठ फैलाया जाता है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने पहली बार निजी स्कूलों को भी पछाड़ दिया है। 12वीं के परीक्षा परिणामों का संदर्भ देते ऐसे लोग खूब नज़र आते हैं। रिपोर्ट कार्ड में भी इसका ज़िक्र उपलब्धि बताते हुए प्रस्तुत किया गया है। लेकिन जब बात 10वीं के परीक्षा परिणामों की होती है तो बेतुकी दलीलें देकर सब चुप्पी साध लेते हैं। हालत यह है कि दिल्ली के स्कूलों का परिणाम 2006-07 के अपने सबसे निचले स्तर 77.12 प्रतिशत से भी नीचे है।

बात पहले 12वीं के परिणामों की! पहली बार यह सुनना बहुत अच्छा लगता है कि सरकारी स्कूल प्राइवेट से भी बेहतर परिणाम ला रहे हैं लेकिन दिल्ली के मामले में यह पहली बार नहीं हो रहा है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने पहले भी प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ा है। 2009 और 2010 में सरकारी स्कूलों का 12वीं में प्रदर्शन प्राइवेट स्कूलों से बेहतर था। यह भी कहना अतिरेक है कि परीक्षा परिणाम में सुधार केवल आप की सरकार बनने के बाद हुए। आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली के सरकारी और निजी स्कूलों के परीक्षा परिणामों में अंतर पहले के मुकाबले काफी कम हुआ है।

2005 में सरकारी और निजी स्कूलों के बीच 13 प्रतिशत अंकों का फासला था। तब सरकारी स्कूलों में 12वीं में पढ़ने वाले बच्चों का परिणाम 76.44 प्रतिशत था, वहीं निजी स्कूलों के बच्चों का परिणाम 89.47 प्रतिशत था। कभी 13 प्रतिशत अंक से पिछड़ने वाले दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने निजी स्कूलों की न केवल बराबरी की, बल्कि उसे पछाड़ा भी। बीते तीन साल से यही दोहराया जा रहा है लेकिन सरकारी और निजी के बीच का फासला बहुत अधिक का नहीं है जैसा बीते दशकों में था।

2008-2015 तक दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का परीक्षा परिणाम कभी 85 प्रतिशत से कम नहीं हुआ। पिछले तीन सालों में अगर मामूली बढ़त हुई भी है तो उसी अनुपात में निजी स्कूलों का भी परिणाम सुधरा है। सत्र 2018-19 में सरकारी स्कूलों का आँकड़ा 94 प्रतिशत था तो निजी स्कूलों के आँकड़े भी 90 प्रतिशत से ऊपर थे। एक बेहद चौंकाने वाली बात यह है कि बीते दो दशकों में परीक्षा परिणाम भले ही चाहे जैसे आए, परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या हमेशा बढ़ती रही है। जहाँ 1998-99 में 44,918 बच्चे 12वीं की परीक्षा में बैठे थे, वहीं यह संख्या बढ़ते-बढ़ते 2014 में 1,66,257 बच्चों तक पहुँच गई।

लेकिन जैसे ही आप की सरकार आई, परीक्षा में बैठने वाले विद्यार्थियों की संख्या हर साल घटते गई। हालत यह थी कि वर्ष 2018 में बैठने वाले बच्चों की संख्या 1,12,826 हो गई। ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि जब दिल्ली की जनसंख्या बढ़ रही है, स्कूल वर्ल्ड क्लास बन चुके हैं, फिर बच्चों की संख्या कम क्यों हो रही है?

कहा जाता है कि 12वीं के परीक्षा परिणाम बेहतर करने के लिए हर साल 9वीं एवं 11वीं की परीक्षा में बड़ी संख्या में बच्चों को फेल किया जा रहा है ताकि केवल अच्छे बच्चे ही 12वीं की परीक्षा दे सकें। हर साल परीक्षार्थियों की घटती संख्या इसकी गवाही देते हैं। उपलब्ध आँकड़े बताते हैं कि हर साल लगभग आधे बच्चों को 9वीं में फेल कर दिया जाता है, वहीं 11वीं कक्षा में भी एक तिहाई बच्चों की छॅंटनी कर दी जाती है।

यहाँ यह भी देखना पड़ेगा कि जहाँ सरकारी स्कूलों में बच्चे कम हो रहे हैं, वहीं हर साल निजी स्कूलों में बच्चे बढ़ रहे हैं। निजी स्कूलों में कुल नामांकन का हिस्सा भी दिल्ली में बढ़ता जा रहा है। सरकार द्वारा जारी की गई इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट के आँकड़े इसकी गवाही देते हैं। इसके अनुसार 2014-15 में जहाँ प्राइवेट स्कूलों का शेयर 31 प्रतिशत था, वह 2017-18 में 45.5 प्रतिशत हो गया।

10वीं के ख़राब परिणाम का ठीकरा किसी और पर फोड़कर बड़ी चालाकी से अपनी नाकामी छुपाने में यह सरकार सफल रही है। न तो विपक्ष ने कभी इसे मुद्दा बनाया, न मीडिया ने। हालत यह है कि वर्ष 2018-19 में निजी स्कूलों के मुकाबले दिल्ली के सरकारी स्कूल 21 अंक पीछे रहे हैं। जहाँ दिल्ली के सरकारी स्कूलों का सामूहिक प्रतिशत 71.58 प्रतिशत था, निजी स्कूलों का परिणाम 93.12 प्रतिशत।

पिछले सत्र यानी 2017-18 में 10वीं परिणाम जब आए तो जहाँ सरकारी स्कूलों के 69.32 प्रतिशत बच्चे पास हुए थे, निजी स्कूलों के 89.45 फीसदी बच्चे पास हुए। बीते दो सालों में 10वीं की परीक्षा में दिल्ली के स्कूल राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम परिणाम दे रहा है, इसके बावजूद इसकी जिम्मेवारी लेने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा।

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 10वीं के परिणाम की हालत एक दशक पहले भी ऐसी नहीं थी। इसे ख़राब स्थिति में लाने का श्रेय आप सरकार को जाता है, जहाँ दिल्ली का प्रदर्शन पिछले एक दशक का भी रिकॉर्ड तोड़ अपने सबसे निम्नतम स्तर पर आ गया है।

सरकारी और निजी के बीच के निगेटिव फासले को वर्ष 2001-02 के -45 अंकों से जो सरकार +1.17 में ले आई थी, 2013 में जिसने प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ने का काम किया था, आप सरकार की नीतियाँ उसे दुबारा -21 में ले आई। प्रतिशत और सरकारी के बीच का अंतर पाटने में जो मेहनत दिल्ली के सरकारी स्कूलों में आप की सरकार बनने से पहले हुई थी, उसे चौपट करने की जिम्मेवारी दिल्ली सरकार को लेनी ही चाहिए।

यह हालत तब है जब पिछले चार सालों से लगातार 43 प्रतिशत से अधिक बच्चे 9वीं की परीक्षा में फेल हो रहे थे। यानी बेहतर बच्चे ही अगली कक्षा में भेजे गए फिर भी परिणाम नहीं सुधरा। सबसे बड़ी बात है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में उन बच्चों को दुबारा नामांकन नही लेने दिया जा रहा, जो फेल हो गए थे। पिछले सत्र यानी 2017-18 में ऐसे बच्चों की संख्या 66 प्रतिशत थी।

कहना गलत नहीं होगा कि रिपोर्ट कार्ड के जरिए केजरीवाल सरकार अपनी नाकामी भले छुपा रही है लेकिन इससे यह भी साबित हो रहा है कि पार्टी अपने चुनावी वादे को पूरा करने में असफल रही है। न तो स्कूल खुले, न नामांकन बढ़े, न परिणाम सुधरे, न शिक्षक बहाल हुए। बस गिने-चुने स्कूलों में करोड़ों लुटाकर और उनकी तस्वीरें दिखाकर यह बताने की कोशिश हो रही है कि शिक्षा में क्रांति आ गई है और दिल्ली के सरकारी स्कूलों का कायापलट हो गया है।

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आतंकियों से निपटने के लिए भारत अपनाए अमेरिकी मॉडल, पाकिस्तान को अलग-थलग करना होगा: CDS विपिन रावत

देश के पहले सीडीएस और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने आतंकवाद के खात्मे के लिए भारत को अमेरिकी मॉडल अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि जिस तरह से अमेरिका ने 9/11 के बाद आतंकवादियों के ख़िलाफ कड़ी कार्रवाई की थी उसी तरह से भारत को भी वही तरीक़ा अपनाना होगा। हमें आतंक के खात्मे के लिए इनकी जड़ों तक जाना होगा।

दिल्ली में बुधवार को आयोजित एक कार्यक्रम में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि हमें अग़र आतंक का खात्मा करना है तो आतंकवादियों के ख़िलाफ अमेरिका की तरह से लड़ाई लड़नी होगी। जैसा कि उन्होंने 9/11 के बाद आतंकियों के ख़िलाफ कार्रवाई की थी। साथ ही हमें इनके ख़िलाफ एक लंबी लड़ाई लड़नी होगी, जिसके लिए वैश्विक जंग की आवश्यकता है, जिससे कि इनको विश्व में अलग-थलग किया जा सके।

रावत ने आगे कहा कि हमें आतंकियों के ख़िलाफ लड़ाई को ज़ारी रखना होगा और इसके लिए हमने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से भी अपील की है, जिससे कि आतंक प्रायोजित और उनके लिए फंडिंग करने वाले देशों को कूटनीतिक तरीके से विश्व स्तर पर अलग-थलग किया जा सके। हम आतंक को खत्म करना चाहते हैं तो हमें अमेरिका द्वारा 9/11 के बाद आंतकियों के ख़िलाफ अपनाई गई नीति को अपनाना होगा और इसी तरीके़ से आतंक का खात्मा किया जा सकता है।

इतना ही नहीं जनरल रावत ने पाकिस्तान की ओर इशारा करते हुए कहा कि, जो देश आतंकियों की हर तरह से मदद करते हों वह अपने को आतंक से पीड़ित नहीं बता सक़ते। इसलिए ऐसे देशों को इस वैश्विक जंग में बाहर करना होगा तभी हम इनके ख़िलाफ बेहतर लड़ाई लड़ सकते हैं। आपको बता दें कि बीते साल 15 अगस्त को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से एक ऐलान किया था, जिसमें तीनों सेेनाओं से बेहतर तालमेल के लिए सीडीएस के पद की घोषणा की गई। इस पद पर सबसे पहले जनरल विपिन रावत को बैठाया गया है। इसके लिए उनका कार्यकाल 3 साल के लिए बढ़ाया गया है।