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करीम लाला पर उद्धव सरकार में खींचतान, कॉन्ग्रेसी मंत्री ने कहा- ईंट का जवाब पत्थर से देना जानते हैं

मुद्दा चाहे जो हो महाराष्ट्र की महाविकास अघाड़ी सरकार के साझेदार दलों के मतभेद सामने आ ही जाते हैं। अब डॉन करीम लाला के मसले पर शिवसेना और कॉन्ग्रेस आमने-सामने हैं। उद्धव ठाकरे की सरकार में कॉन्ग्रेस कोटे से मंत्री नितिन राउत ने शिवसेना को चेतावनी देते हुए कहा है कि वे ईंट का जवाब पत्थर से देना जानते हैं।

असल में शिवसेना सांसद संजय राउत ने अंडरवर्ल्ड से इंदिरा गॉंधी की नजदीकियों की ओर इशारा करते हुए कहा था कि वह करीम लाला से मिलती थीं। हालॉंकि विवाद बढ़ने के बाद राउत ने बयान से किनारा करते हुए कहा कि वे गॉंधी परिवार का सम्मान करते हैं। लेकिन, इससे विवाद ठंडा होता नहीं दिख रहा। मंत्री नितिन राउत ने कहा है, “इंदिरा गॉंधी हमारी नेता और आदर्श हैं। बीजेपी के साथ रहते हुए भी संजय राउत उनके खिलाफ टिप्पणियॉं करते थे। अब सरकार में होने के बाद भी वे इससे बाज नहीं आ रहे। यदि वे सोचते हैं कि हम चुपचाप सुनते रहेंगे तो हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम ईंट का जवाब पत्थर से देना जानते हैं।”

एक दिन पहले संजय राउत ने एक कार्यक्रम में बयान दिया था कि इंदिरा गाँधी मुंबई में अंडरवर्ड के डॉन करीम लाला से मुलाकात करती थीं। शिवसेना नेता संजय राउत के इस बयान से तूफान मच गया और कॉन्ग्रेस ने उनसे बयान वापस लेने को कहा जिसके बाद आज संजय राउत ने अपना बयान वापस भी ले लिया।

शिवसेना सांसद संजय राउत ने बुधवार (15  जनवरी) को एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि करीम लाला, मस्तान मिर्जा उर्फ़ हाजी मस्तान और वरदराजन मुदलियार मुंबई के टॉप माफ़िया सरगनाओं में से एक थे, जो 1960 से लेकर अस्सी के दशक तक सक्रिय रहे।

शिवसेना सांसद संजय राउत ने इंदिरा गाँधी और अंडरवर्ल्ड डॉन करीम लाला को लेकर दिए अपने कल के बयान से पीछे हटते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा गाँधी परिवार का सम्मान किया है। अगला पैंतरा चलते हुए उन्होंने अंडरवर्ल्ड डॉन करीम लाला की तुलना अब्दुल गफ्फार खान से कर दी। राउत का कहना है कि उनके दोस्तों (कॉन्ग्रेस) को दुखी होने की जरूरत नहीं है।

करीम लाला से मिलने जाती थीं इंदिरा गाँधी वाले बयान पर संजय राउत ने कहा कि कॉन्ग्रेस में हमारे मित्रों को आहत होने की जरूरत नहीं है। यदि किसी को लगता है कि उनके बयान से इंदिरा गाँधी की छवि को धक्का पहुँचा है या इससे किसी की भावनाएँ आहत हुई हैं तो वो अपना बयान वापस लेते हैं।

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जैश के 5 आतंकी: कोई चलाता था गाड़ी तो कोई लगाता था ठेला, 26 जनवरी पर बड़े हमले की थी साजिश

गणतंत्र दिवस से पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस को एक बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने बृहस्पतिवार (जनवरी 16, 2020) की शाम श्रीनगर से जैश-ए-मोहम्मद के पाँच आतंकियों को गिरफ्तार किया। पुलिस के मुताबिक यह सभी आतंकी 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के दिन कश्मीर घाटी में आतंकी हमला करने की साजिश रच रहे थे।

पुलिस ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद द्वारा गणतंत्र दिवस पर एक बड़े आत्मघाती हमले की रची जा रही साजिश को नाकाम कर दिया है। पुलिस ने जैश के पाँच सदस्यीय मॉड्यूल को नेस्तनाबूद करते हुए विस्फोटकों से लैस एक जैकेट और रिमोट ट्रिगल वाला बायोफेंग वॉकी-टॉकी भी बरामद किया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस को सूत्रों ने श्रीनगर में आतंकियों के छिपे होने की सूचना दी थी। जिसके बाद पुलिस फोर्स ने घेराबंदी करके आतंकियों को गिरफ्तार कर लिया। सभी आतंकी हजरतबल इलाके के रहने वाले हैं। आतंकियों के पास से पुलिस ने भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक बरामद किया है।

आतंकियों की पहचान एजाज अहमद शेख, उमर हमीद शेख, इम्तियाज अहमद, साहिल फारूख और नसीर अहमद मीर के रूप में हुई है। एजाज पेशे से वाहन चालक है जबकि उमर ठेला लगाता है। इमरान की खेल सामग्री की दुकान है, नसीर का अपना कारोबार है और साहिल एक प्राईवेट फर्म में नौकरी करता है।

पुलिस ने हथियार और विस्फोटक सामाग्री जब्त करके कार्रवाई शुरू कर दी है। पुलिस ने बताया कि बीते साल नवंबर में कश्मीर यूनिवर्सिटी के बाहर हुए ग्रेनेड हमले में भी यही आतंकी शामिल थे। अब वे 26 जनवरी को घाटी में एक बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने की फिराक में थे।

सुरक्षाबलों ने घाटी में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। अभी बीते बुधवार को भी सुरक्षाबलों ने डोडा में एनकाउंटर के दौरान हिज्बुल मुजाहिदीन के एक आतंकी को मार गिराया था। आतंकी की पहचान हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर हारून वानी के रूप में हुई थी। जेके पुलिस ने बताया कि पिछले महीने किश्तवाड़ में हुए राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं की हत्या सहित सुरक्षाबलों से हथियार छीनने जैसी वारदातों में भी आतंकी हारून शामिल था। सुरक्षाबल गणतंत्र दिवस की सुरक्षा को लेकर चौकन्नी है।  

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पत्नी की हत्या कर लाश फेंकने गया था सपा नेता, बीच धारा में नाव पलटी और खुद भी डूब गया

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले से मंगलवार को सपा नेता भरत दिवाकर के रहस्यमय तरीके से गायब होने की खबर आई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सपा नेता अपनी पत्नी की हत्या कर लाश फेंकने गया था, लेकिन खुद ही बरुआ बॉंध में डूब गया। उसकी पत्नी मीनू का शव बरामद कर लिया गया है। सपा नेता दिवाकर की तलाश जारी है।

पूरे मामले से पर्दा तब उठा जब पुलिस ने एक नाविक रामसेवक से कड़ाई से पूछताछ की। दिवाकर को आखिरी बार रामसेवक के साथ ही देखा गया था। रिपोर्टों के अनुसार दिवाकर ने 2015 में मीनू से प्रेम विवाह किया था। दोनों की एक बेटी भी है। बताया जाता है कि दिवाकर को मीनू के चरित्र पर शक था। इसके कारण दोनों के बीच अक्सर लड़ाई होती रहती थी। मंगलवार को बहस के बाद दिवाकर ने मीनू की हत्या कर दी। फिर उसके शव बॉंध में फेंकने पहुॅंचा।

लाश ठिकाने लगाने के लिए उसने एक नाव किराए पर ली। लेकिन, बीच धारा में पहुॅंचने पर नाव पलट गई और दिवाकर डूब गया। नाविक रामसेवक किसी तरह तैर कर बाहर निकल आया। हिन्दुस्तान ने पुलिस अधीक्षक अंकित मित्तल के हवाले से बताया है, “नाविक रामसेवक ने पुलिस को सूचना दी कि मंगलवार रात सपा नेता भरत दिवाकर (42) अपनी स्कॉर्पियो कार में एक महिला का शव लेकर बरुआ बाँध आया और जबरन उसकी नाव में शव रखकर बीच जलधारा में ले गया। शव फेंकते समय अचानक नाव पलट गई और शव के साथ वह भी पानी में चला गया।”

बताया जा रहा है कि दिवाकर ने पत्नी की हत्या की योजना पहले से ही बना रखी थी। उसने बेटी को भी ननिहाल भेज दिया था। पूर्व ब्लॉक प्रमुख दसोदिया देवी का बेटा दिवाकर ठेकेदारी करता था। बरुआ बॉंध में मछली पालन का ठेका भी उसी के पास था। लापता होने के बाद बुधवार की सबुह पुलिस को उसकी कार बरुआ बॉंध के पास मिली थी। उसके पकड़े और जूते भी मिले थे। कार में उसकी पत्नी की चप्पल भी थी।

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इमाम की बेगम निकली मर्द: निकाह के बाद पड़ोसी ने किया खुलासा, तो उड़ गए होश

प्यार में धोख़ा वाली कहावत और हक़ीकत आपने दोनों ही जरूर देखे होंगे, लेकिन युगांडा से एक ऐसी ख़बर सामने आई जहाँ एक इमाम को प्यार में नहीं बल्कि शादी में धोख़ा मिल गया। इस बात की जानकारी जब इमाम को हुई तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

आए दिन कहीं न कहीं से प्यार में दिल टूटते तो कभी प्यार में रिश्तों को बदलते हुए आपने जरूर देखा या इस तरह की ख़बरों को सुना होगा, लेकिन युगांडा से आई एक ख़बर ने पीड़ित इमाम को ही नहीं बल्कि हर एक उस शख्स को चौंका दिया, जिसने भी इस खबर को सुना या फ़िर घटनाक्रम को अपनी ही आँखों से देखा। दरअसल अफ्रीकी देश युगांडा के इमाम शेख़ मोहम्मद मुतुम्बा ने क़रीब दो हफ्ते पहले ही स्वबुल्लाह नबुकेरा नामक (शादी के बाद बदला हुआ नाम) महिला से शादी की। इसके बाद दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध नहीं बन सके। ऐसा इसलिए कि नकली महिला ने इमाम को बताया था कि वह इन दिनों पीरिएड्स से पीड़ित है।

इसी बीच पड़ोस की एक महिला ने इमाम पर आरोप लगाया कि उसकी पत्नी ने दीवार कूदकर उसके घर से टीवी और कुछ सामान चोरी किया है। पड़ोसी ने संदेह जताते हुए यह भी आरोप लगाया कि उसकी पत्नी कोई महिला नहीं बल्कि एक पुरुष है। इसके बाद पड़ोसी ने चोरी की शिकायत पुलिस को दी। शिकायत पर पुलिस ने ईमाम के साथ उसकी पत्नी को थाने बुलाया । जहाँ से उसे जेल भेजने से पहले एक महिला पुलिसकर्मी द्वारा जाँच कराई गई, क्यों कि उसने सैंडल और हिजाब पहना हुआ था, लेकिन जाँच के दौरान महिला पुलिसकर्मी दंग रह गई। उसने तत्काल इमाम को बताया और कहा कि उसकी पत्नी कोई महिला नहीं बल्कि एक मर्द है।

यह बात जानकर इमाम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। इसके बाद उसे मस्जिद के इमाम पद से सिर्फ इसलिए निलंबित कर दिया गया कि उसकी पत्नी एक पुरुष निकली। इस खुलासे के बाद इमाम ने किसी से भी बात करना ठीक नहीं समझा और कहा कि इस समय मुझे परामर्श की आवश्यकता है।

पुलिस पूछताछ में आरोपी युवक ने अपना नाम रिचर्ड तुमुशाबे हा बताया और कहा कि उसने इमाम से शादी पैसे चुराने के लिए की थी और उसके पुरुष होने की हक़ीकत इमाम को न पता चले इसके लिए उसने शारीरिक सम्बन्ध न बनाने के लिए एक नहीं बल्कि कई बहाने बनाए। इतना ही नहीं उसने सोते समय चार दिन तक सोते समय कपड़े तक नहीं उतारे। आरोपी ने यह भी बताया कि वह कोई मुस्लिम नहीं बल्कि इस ईसाई है

दरअसल पिछले काफ़ी समय से इमाम को नई दुल्हन की तलाश थी। इस बीच इमाम की एक मस्जिद में आरोपित से मुलाक़ात होती है, जिसने सैंडल और हिजाब पहना हुआ था, जिसे देखकर इमाम ने शादी के लिए प्रपोज कर दिया और आरोपी ने भी इमाम को शादी के लिए तुरन्त ही हाँ कर दी। हालाँकि, आरोपी ने एक शर्त भी रखी थी कि जब तक वह शादी नहीं करेंगे तब तक हमारे बीच कोई शारीरिक सम्बन्ध नहीं बन सकते, जिसे इमाम ने स्वीकार कर लिया था।

MP में वीर सावरकर की फ़ोटो वाली कॉपियाँ बच्चों को बाँटने पर प्रधानाचार्य निलंबित, BJP ने कॉन्ग्रेस को घेरा

इन दिनों देश में वीर सावरकार का नाम आते ही घमासान शुरू हो जाता है, खास तौर पर देश की राजनीति में तो समझो भू-चाल आ जाता है। कुछ ऐसा ही हुआ बीते दिनों मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले में। जहाँ के एक प्राइमरी स्कूल में एक सामाजिक संस्था द्वारा बच्चों को वीर सावरकर के फ़ोटो छपी कॉपियाँ बाँटने पर वहाँ के प्रिंसीपल को निलंबित कर दिया गया। इसे लेकर बीजेपी ने कमलनाथ सरकार पर निशाना साधा है। साथ ही स्कूल के विद्यार्थियों ने विरोध मार्च निकालकर प्रिंसीपल को वापस बुलाने की माँग की है।

वीर सावरकर को लेकर कॉन्ग्रेस सेवादल में बाँटी गई किताब पर राजनीतिक जंग समाप्त नहीं हुई कि बीते दिनों मध्य प्रदेश के ही रतलाम ज़िले से सावरकर को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया। दरअसल, रतलाम के सरकारी हाईस्कूल, मलसाहा में वीर सावरकर की छपी फ़ोटो वाली कॉपियाँ स्कूली बच्चों को वितरित की गई। इस बात की जानकारी जैसे ही विभागीय अधिकारियों को हुई तो उन्होंने तत्काल विभागीय कार्रवाई करते हुए प्रिंसीपल को निलंबित कर दिया औऱ कहा कि इस सम्बन्ध में विभाग को न तो पूर्व में सूचना दी गई और न ही इसके लिए कोई अनुमति माँगी गई।

शिक्षा विभाग द्वारा स्कूल के प्रिंसीपल को निलंबित करने से नाराज़ स्कूली छात्र-छात्राओं ने अपने अभिवावकों के साथ एक विरोध मार्च निकाला और अधिकारियों से प्रिंसीपल का निलंबन रद्द करने की माँग की। मामले पर प्रिंसीपल आरएन केरावत ने कहा कि मैंने जो भी किया वह छात्र हित में किया है और इसीलिए मैंने इन कॉपियों को बच्चों में बँटवाया। साथ ही समिति की सचिव सधु शडोरकर ने कहा कि यदि बच्चों को नि:शुल्क कॉपियाँ बाँटना गुनाह है तो इसकी सजा हमें दी जाए, लेकिन इसकी सज़ा प्रिंसीपल को क्यों दी गई। आपको बता दें कि स्कूल के प्रिंसीपल को शतप्रतिशत परिणाम देने के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

दरअसल इन कॉपियों को हितार्थ जनकल्याण समिति द्वारा प्रिंसीपल की मौजूदगी में बच्चों को नि:शुल्क बाँटा गया था। इतनी ही नहीं समिति ने 4 नवंबर को रतलाम ज़िले के कई स्कूलों में जाकर कक्षा 9 और 10 के क़रीब 500 छात्र-छात्राओं को वीर सावरकर के फ़ोटो छपी कॉपियों को वितरित किया गया था। इन कॉपियों के ऊपर वीर सावरकर की फ़ोटो और जीवनी के साथ समिति के पदाधिकारियों के भी फ़ोटो लगे हुए थे।

स्कूल में बच्चों को बाँटी गई वीर सावरकर के फ़ोटो छपी कॉपी (साभार- पत्रिका)

यह मामला तब सामने आया कि जब समिति द्वारा बाँटी गई कॉपियों के कार्यक्रम को फ़ोटो सहित सोशल मीडिया पर अपलोड किया गया। इसके बाद सक्रीय हुए कॉन्ग्रेस आईटी सेल ने रतलाम के डीएम को शिकायत दर्ज कराई। इस शिकायत को विभाग ने गंभीरता से लेते हुए बीते दिनों ज़िला शिक्षा अधिकारी ने स्कूल के प्रिंसीपल को निलंबित कर दिया।

वहीं इस मामले में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कमलनाथ सरकार पर निशाना साधते हुए ट्विटर पर ट्वीट किया कि “कमलनाथ जी, यदि देश की इस महान विभूति और स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के बारे में काश पढ़ लिया होता, तो आप ऐसा निकृष्टतम कृत्य ना करते। मैं समिति से आग्रह करता हूँ कि एक कॉपी आपको भी भेजें, ताकि इस महान विभूति द्वारा राष्ट्र के लिए किए योगदान को आप जान सकें।”

2 बच्चों की माँ जो पाकिस्तान में पैदा हुईं, सितंबर में भारत की नागरिक बनी और अब लड़ रहीं चुनाव

पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता का मार्ग प्रशस्त करने वाले नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर वर्ग विशेष के विरोध और विपक्षी दलों की अफवाहों से आप परिचित हैं। सीएए के छिटपुट विरोध के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जो बताती है कि नागरिकता से कैसे इनका जीवन बदल सकता है।

भारत आने के 18 साल बाद नीता कंवर को पिछले साल सितंबर में नागरिकता मिली थी। वह 2001 में अपनी बड़ी बहन अंजना सोढा के साथ पाकिस्तान के सिंध के मीरपुर-खास से राजस्थान के जोधपुर आई थीं। दो बच्चों की मॉं नीता अब राजस्थान के पंचायत चुनावों में अपनी किस्मत आजमा रही हैं।

36 साल की नीता ने 17 जनवरी को नामांकन दाखिल किया। उनका कहना है कि सीएए के जरिए भारत में अच्छा जीवन-यापन करने और अच्छी शिक्षा हासिल करने में मदद मिलेगी। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि वह टोंक जिले की नटवारा ग्राम पंचायत का सरपंच बनने के लिए चुनाव लड़ रही हैं। अजमेर के सोफिया गर्ल्स कॉलेज की ग्रेजुएट नीता के हवाले से टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया है, “मुझे पिछले साल सितंबर में टोंक कलेक्टर कार्यालय में नागरिकता प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया था। अब मैं पंचायत चुनाव लड़ रही हूॅं।”

नीता जिस सीट से मैदान में हैं उस पर तीन बार उनके ससुर का कब्जा रहा है। वह टोंक जिले के उपखंड निवाई की पंचायत नटवाड़ा के एक राजपूत परिवार की बहू हैं। दैनिक भास्कर ने नीता के हवाले से बताया है की 2011 में उनकी शादी पुण्य प्रताप करण से हुई थी। उनके ससुराल की पृष्ठभूमि राजनीतिक रही है। राजनीति में आने की प्रेरणा उन्हें ससुर ठाकुर लक्ष्मण करण से मिली।

नीता ने बताया, “मैं एक सामान्य सीट पर चुनाव लड़ रही हूॅं। लेकिन यह महिलाओं के लिए आरक्षित है। मैं लैंगिक समानता, महिला सशक्तिकरण, सभी लड़कियों के लिए शिक्षा और उचित चिकित्सा सुविधाओं के लिए काम करना चाहती हूॅं। मुझे बहुत समर्थन मिल रहा है।” मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नीता जमकर प्रचार कर रही हैं। वोट मॉंगने के लिए जब वह घरों में जाती हैं तो राजस्थानी परंपरा के अनुसार गॉंव की महिलाएँ शगुन वगैरह का रस्म निभाती हैं।

इस उन्माद, मजहबी नारों के पीछे साजिश गहरी… क्योंकि CAA से न जयंती का लेना है और न जोया का देना

CAA पर बवाल के बीच… Pak से प्रताड़ना का शिकार होकर भागे 7 शरणार्थियों को मिली नागरिकता

CAA को लेकर 9 बड़े प्रश्न और उनके उत्तर: वामपंथियों के हर प्रपंची सवाल का जवाब जानें यहाँ

शाहीन बाग वालों ने पोस्टर से मंशा बता दी: हिन्दू स्त्रियों पर है इनका ध्यान, पहले कन्वर्जन फिर…

कुछ पोस्टर महज पोस्टर ही नहीं होते। वो विचारधारा का अंतिम पन्ना हो सकते हैं, किसी दबी हुई मंशा के सांकेतिक दस्तक का रूप ले सकते हैं, किसी खूनी मजहबी उन्माद के कुछ मंसूबों की कहानी हो सकते हैं। शाहीन बाग में यूँ तो नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और अदृश्य राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) को ले कर विरोध हो रहा है, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, इसका कुरूप चेहरा अपने बुर्के से बाहर आता दिख रहा है।

एक कपड़ा आपके कई ऐब छुपा लेता है। जैसे कि तिरंगा भी कुछ लोगों के लिए महज कपड़ा ही है। संविधान कुछ लोगों के लिए यूँ तो एक बेकार सी किताब है, और राष्ट्रगीत एक वैकल्पिक गीत, लेकिन समय आने पर ऐसे लोग तिरंगे को तिरंगा कहने लगते हैं, संविधान को संविधान मानने लगते हैं, और राष्ट्रगीत इतने जोर से गा देते हैं कि आम आदमी को अपनी राष्ट्रभक्ति पर संदेह होने लगता है।

ऐसे लोगों का एक समूह जिस इलाके में अभी शिफ्ट बदल कर, और कुछ अपुष्ट खबरों के अनुसार 5-700 रुपए ले कर, प्रदर्शन के नाम की नौटंकी कर रहा है वहाँ तिरंगा भी दिखता है, वंदे मातरम् भी और संविधान की कसमें ऐसे खाई जा रही हैं जैसे बाबा साहब ने पर्सनली इनको गिफ्ट किया था और कहा था कि इसकी हिफाजत करना, मैं तो चला।

इसी संविधान की कसमें खाने वाले यह भी लिख कर खड़े हैं कि हिन्दू भारत माँ को अपनी माता मानते हैं, और उस लिहाज से संविधान इनका बाप हुआ, तो वो उनकी माता को विधवा नहीं होने देंगे। लेकिन हिन्दू ये सब पढ़ कर चिल्ड आउट रहता है। हिन्दू अमूमन चिल्ड आउट ही रहता है। वो तब भी चुप था जब हनुमान के पोस्टर को ‘एंग्री हनुमान’ कह कर मिलिटेंट हिन्दुइज्म बोला गया, वो त्रिशूल पर कंडोम चढ़ाने पर भी चुप था, वो शिवलिंग को विद्रूपित करके पुरुष शिश्न की तस्वीर बना कर वहाँ त्रिपुंड लगाने पर भी चुप रहा। क्योंकि हिन्दुओं को सैकड़ों सालों से फर्क ही नहीं पड़ा।

तो, शाहीन बाग में संविधान की कसमें खाने वाली महिलाओं से सवाल यह है कि जब जामिया में तुम्हारे लाड़लों ने बसों में आग लगाई तब संविधान की किताब के पन्नों की याद नहीं आई या कहा था कि जा बेटा, माचिस की तीली बुझ सकती है, किताब के पन्ने में आग लगा कर बस पर फेंक देना? क्या हिजाब से बाहर की दुनिया को झाँकती इन सुर्खरू नवयौवनाओं के वालिदैन बता पाएँगे कि इनके भाई जब हाथों में पत्थर ले कर पुलिस पर हमला बोल रहे थे तब उन्हें संविधान के मूल अधिकारों वाले पन्ने पर ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ का ध्यान आया था या नहीं?

ये पोस्टर कैसे हैं, क्या मतलब है इनका

आज सबा नकवी ने एक ट्वीट साझा किया जिसमें एक पोस्टर दिखा। उस पोस्ट में तीन महिलाओं की आकृतियाँ हैं, जिनका पूरा शरीर काले टेंट में हैं और चेहरा हिजाब में। उस हिजाब से जो चेहरा दिख रहा है, उसके माथे पर बिंदी है। बिंदी हिन्दू स्त्रियों का शृंगार है। समुदाय विशेष की लड़कियाँ भी लगाती होंगी, लेकिन जब हम समुदाय विशेष की लड़की की परिकल्पना करते हैं तो वो या तो वो बिंदी लगाए नहीं दिखती।

जब आप एक राजनैतिक प्रदर्शन में, मजहबी नारेबाजी के साथ, आजादी के नारों की बात करते हुए, यह पोस्टर ले कर आते हैं, और नीचे हिन्दुओं के स्वास्तिक चिह्न के टुकड़े होते हैं, तो मूर्ख व्यक्ति भी समझ सकता है कि मंशा क्या है। साथ ही, ये पोस्टर अचानक से नहीं आया है। ये पोस्टर पहला नहीं है। ये तस्वीर पहली नहीं है। ध्यान रहे कि ऐसे ही एक प्रदर्शन में हिन्दुओं की माता आदिशक्ति देवी काली माँ की तस्वीर हिजाब में दिखाई गई थी।

हिन्दुओं ने उस पर भी कुछ नहीं बोला क्योंकि वो तस्वीर तो जीभ निकाले किसी भी लड़की की हो सकती है। वैसे ही क्यूट हिन्दू शाहीन बाग के भाड़े पर आने वाली प्रदर्शनकारी भीड़ के इस पोस्टर को ‘बिन्दी हिन्दुओं में ही थोड़े ही होता है’ कह कर नकार देगा। लेकिन यहाँ आप यह सोचिए कि यह असाधारण बात है, यह असामान्य है। विशेष मजहब वालों की लड़ाई शुरु से ही धरती को ख़िलाफ़त और शरिया के नीचे लाने की रही है। ये पोस्टर उसी के कई चरणों में से एक है।

बिन्दी वाली स्त्री हिजाब में क्यों है? क्योंकि ऐसे कट्टरपंथी इस्लाम की यही चाहत है कि हर स्त्री बुर्के में चली जाए, हर लड़की हिजाब में ही निकले, और धरती की हर स्त्री मुस्लिम हो जाए। कट्टरपंथियों के लिए यह बात कल्पनातीत है कि लड़कियाँ स्वच्छंद घूम सकती हैं, वो स्कर्ट पहन सकती हैं, लड़कों का हाथ पकड़ सकती हैं, बाजार और मॉलों में जा सकती हैं। आज शाहीन बाग की स्त्रियाँ भले ही कहने को प्रदर्शन कर रही हैं, लेकिन वो मन ही मन इस समय को धन्यवाद दे रही होंगी कि उनके शौहरों ने उन्हें सड़क पर बैठने की अनुमति तो दी!

ये जो बिन्दी वाली लड़की हिजाब में है, और वो जो माँ काली की तस्वीर हिजाब में थी, एक अनुमानित प्रगमन है। पहले टेस्टिंग हुई कि इस पर हो-हल्ला तो नहीं होगा। फिर देखा कि दस-पचास लोगों के अलावा किसी हिन्दू को फर्क नहीं पड़ा, तो उन्होंने अब आम हिन्दू स्त्री को हिजाब में दिखाया, बिन्दी के साथ। संदेश साफ है कि हिन्दुओं के प्रतीकों को तोड़ा जाएगा, उनकी स्त्रियों को कन्वर्ट करा दिया जाएगा, और फिर उन्हें इसी काले बोरे में निकलना होगा।

ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कट्टरपंथी इस्लाम का यही इतिहास है। कश्मीर में मस्जिदों से जो आवाजें आ रही थीं, वो कह रही थीं कि हिन्दू मर्दों को छोड़ो, औरतों और बच्चियों को पकड़ो। उसके बाद उनका रेप हुआ, हरम में रखा गया और भगवान जाने उन्हें क्या-क्या सहना पड़ा। तो अभी ये पोस्टर में दिख रहा है, बाद में इसे जमीनी बनाने में ये क्या पीछे हट जाएँगे? पाकिस्तान और बंग्लादेश समेत, एक इस्लामी मुल्क दिखा दीजिए जहाँ अल्पसंख्यक अपने धर्म के हिसाब से स्वच्छंद जीवन जी रहे हैं। क्योंकि मजहबी उन्माद का राष्ट्रीयकरण गैरइस्लामी नागरिकों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ता।

दूसरी बात, अगर CAA/NRC मजहब विशेष के लिए किसी मूर्खतापूर्ण तर्क के हिसाब से ही, उनके अस्तित्व की लड़ाई है, तो इसमें हिन्दू महिला को हिजाब पहनाने, उसे मुस्लिम बनाने की क़वायद किस तर्क से जायज है? तुम्हारे अस्तित्व की लड़ाई है अगर, तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास (सालों से पढ़ने-लिखने, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने, यहीं पैदा होने के बावजूद) कागजात नहीं हैं, और ये तक कि तुम्हें तीन लोग भी नहीं जानते कि तुम यहाँ से हो, तो भी इसमें काली माता को हिजाब पहनाने, बिन्दी वाली हिन्दू स्त्री को बुरके में दिखाने के पीछे क्या मंशा है?

मंशा साफ है कि तुम्हारी लड़ाई कभी भी बराबरी की, तुष्टीकरण से परे, साथ रहने, साथ होने की नहीं है, तुम्हारी लड़ाई तो वही है जो तुम हर जगह काले झंडों पर मजहबी नारे लिख कर लड़ रहे हो। इसमें सिर्फ दाढ़ी बढ़ाए कठमुल्ले ही होते, तो भी समझ में आता, लेकिन यहाँ तो तुम्हारी अगली पौध, जिसमें मात्र एक प्रतिशत ही कॉलेज में पढ़ पा रही है, उसका भी दिमाग इतना बंद है कि इस विरोध में, जामिया में ऐसे पोस्टर घूम रहे हैं जिसमें ‘हिजाब पहन कर आओ हमारा समर्थन करने’ की बातें हैं। आखिर, एक कानून के विरोध में हो रहे प्रदर्शन में हिजाब ड्रेसकोड कैसे बन जाता है?

आखिर आठ साल की बच्चियाँ तुम्हारे अजेंडे के लिए कैसे नारा लगाने लगती है? और हम मान लें कि तुम संविधान बचाने के लिए दुधमुँही उम्मी हबीबा को 122 साल में सबसे ठंढी रात में उस सड़क पर बैठ जाती हो? हम ये मान लें कि तीन बुजुर्ग महिलाओं को NDTV पर तुम जब भेजती हो, तो उसके द्वारा अपनी नौ पुश्तें गिनवा कर, मोदी के नौ पुश्तों के नाम माँगने वाली आसमा को तुमने कोचिंग नहीं दी कि उसे क्या बोलना है? क्योंकि तीन सवाल के बाद वो सीधा इस बात पर आ गई कि गृहमंत्री जो कह रहा है वो झूठ है, वो जो कह रही है, वो सच है।

दोहरी चाल, दो चेहरे, लक्ष्य बस एक

बच्चियों और अशक्त बुजुर्गों को सड़क पर उतारना कुछ विचारधाराओं की पुरानी आदत रही है। क्योंकि इनके लिए स्त्रियों का ‘इस्तेमाल’ एक आम बात है। यूँ तो कबूतरखानों में काले बोरे में बंद रखने की चाह वाले, आईसिस जैसी जगहों पर रात को बलात्कार करने वाले आतंकी भी दिन में रेगिस्तान की गर्मी में इन लड़कियों को ‘बुर्के’ में रहने की नसीहत देते हैं कि ये मजहबी तौर पर गलत है, लेकिन जब लक्ष्य स्कोडा-ए-हिन्द हो, लक्ष्य हर सड़क पर नारा-ए-अदरक-लहसुन सुनने और लगाने का हो, तब तो ये अपनी औरतों को सड़क पर क्या, जलती बसों के सामने भी उतार देंगे। ये तो कॉलेट्रल डैमेज में गिना जाएगा, ये तो उस महान, अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति में जन्नत की ओर जाने वाली बस का टिकट बन जाएगा।

इन दुधमुँही बच्ची का इस्तेमाल, उन आठ साल की लड़कियों से आज़ादी के नारे लगवाना, उन नवयुवतियों से कहना कि विरोध में आ रही हो तो हिजाब में आना, उन अधेड़ महिलाओं की शिफ्ट तय करना और उन बुजुर्गों को किसी खास चैनल के खास पत्रकार के आने पर तैयार रखना बताता है, कि एक चेहरा तुम्हें ऐसा दिखाना है कि इस राजनैतिक लड़ाई में तुम हाशिए पर ढकेले जा चुके हो, इस कानून के आने से भले ही भारतीय मुस्लिमों को कोई समस्या नहीं, लेकिन तुम ये बार-बार कहो कि तुम्हें भगाने के लिए साजिश रची जा रही है। ये चेहरा तुम्हारी मीडिया कवरेज के लिए है।

लेकिन नकाब के नीचे, बुर्के से झाँकती आँखों के सामने की जाली के ऊपर और नीचे के काले पर्दे के भीतर जो चेहरा है, वो चेहरा हिन्दुओं को या तो मुस्लिमबनाना है, या काट देना है। कमाल की बात यह है कि हो न हो ऐसे पोस्टर बनाने वालों के बाप-दादा इन्हीं कट्टरपंथी आतंकियों के डर से अपना धर्म त्याग कर इस मजहब में आ गए होंगे। लेकिन कई पीढ़ियाँ खप जाने पर अरजल को भी अशरफ होने का भ्रम होने लगता है, वो ललकार कर कहने लगता है कि ‘ज्यादा पुराने डॉक्यूमेंट्स मत माँग लेना मोदी, कहीं हम हिन्दुस्तान के मालिक न निकल आएँ’। पता चले कि ये मुगलों के सैनिकों के घोड़ों की लीद साफ करते हों, लेकिन घमंड सीधे हिन्दुस्तान के मालिक होने की है।

जब अरब देशों में कई मुस्लिमों की आपबीती सुनता हूँ कि पाकिस्तान आदि जगहों के मुस्लिमों को वो आज तक कन्वर्ट मान कर, असली मुस्लिम तक नहीं मानते, तब समझ में आता है कि इन कट्टरपंथियों को पैदल सिपाही के रूप में इस्तेमाल करना कितना आसान है। वो जो भारत में गजवा-ए-हिन्द के ख्वाब देखते हैं, वो वही मुस्लिम हैं जो अरबी मुस्लिमों की स्वीकार्यता ढूँढ रहे हैं कि ‘मालिक हमने भारत में तो मजहब के लिए इतने रेप किए, इतने मंदिर तोड़े, काफिरों को मारा, अब तो हमें अपने समकक्ष मान लो’, और अरबी मुस्लिम आज भी कहता है कि जाओ, सैनिकों के घोड़े की लीद साफ करो।

इसलिए, ये जद्दोजहद शाहीनबाग में अपने कई रचनात्मक रूपों में निकल कर आती हैं कि कब हिन्दू बौखलाए और दंगा हो जाए, और इन्हें ओवैसी जैसों के बयानों को प्रतिफलित करने का मौका मिले। लेकिन हिन्दू जो है, वो चिल्ड आउट है कि बनाने दो पोस्टर, क्या फर्क पड़ता है। जिस हिन्दू के सड़क पर नंगी तलवार ले कर मुस्लिमों को भारत से भगाने के पागल सपने वामपंथियों ने 2014 से देखना शुरु किया था, वो फलित ही नहीं हो पा रहा, तो अब ये लोग उन्हें उकसाने के लिए खुल्लमखुल्ला हरामखोरी पर उतर आए हैं।

मंदिरों को आज भी किसी व्हाट्सएप्प के अफवाह पर तोड़ दिया जाता है, काँवरियों पर पत्थरबाजी एक सालाना इस्लामी जलसा है, दुर्गापूजा के पंडालों पर ईंट-पत्थरों से हमला और मूर्तियों को खंडित करना, एक सामान्य घटना हो चुकी है, कहीं कोई इमरान दिल्ली में गाय काट कर दंगे करवाने की कोशिश करता दिखता है, समुदाय विशेष के गौतस्करों ने बस दो सालों में 19 हिन्दुओं की जान ले ली हैं… क्योंकि हिन्दू चिल्ड आउट है कि पत्थरबाजी ही तो है, क्या फर्क पड़ता है।

इसलिए ऐसे पोस्टर अब इतने आम हो गए हैं कि हिन्दूघृणा में ‘फक हिन्दुत्व’ से ले कर ‘ब्राह्मिनिकल टेररिज्म’ लिख दिया जाता है, ‘भगवा जलेगा’ लिख दिया जाता है, ‘स्वास्तिक’ के पवित्र चिह्न को तरह-तरह के कुत्सित तरीकों से दिखाया जाता है, मुस्लिम सड़कों पर ‘मुस्लिम अपना भाई है, बामन साला कसाई है’ लिख कर उतरता है, और किसी को फर्क नहीं पड़ता। उन नारों पर कोई दो लाइन बोलता कि जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों को ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ क्यों चाहिए? अलीगढ़ के टुटपुँजिया लौंडे ‘हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी’ कैसे कह लेते हैं?

वो इसलिए क्योंकि हमें न तो हिजाब पहने काली से फर्क पड़ा, न ही बिंदी वाली लड़की के पोस्टर से। उनका डेटा कलेक्शन जारी है कि कब-कब क्या-क्या करने पर हिन्दू कूल और चिल रहता है। वो पायलट प्रोजेक्ट कर रहे हैं कि हिन्दू सड़कों पर कब आएगा। हिन्दू है कि इतना सहिष्णु है कि वो पोस्टरों से प्रभावित ही नहीं होता।

लेकिन कब तक?

हिन्दुओं को यह सोचना चाहिए कि मुश्किल से हज़ार लोग, कैसे पूरे देश की हर मीडिया को शाहीनबाग पर बात करने को मजबूर कर देते हैं। हिन्दुओं को यह देखना चाहिए कि फीस वृद्धि के नाम पर जुटी भीड़ कैसे, हर बीतते सप्ताह पर CAB, फिर CAA, फिर NRC, फिर VC, फिर दिल्ली पुलिस की हिंसा, फिर संविधान की रक्षा और अंत में खुल्लमखुल्ला हिन्दुओं की स्त्रियों को इस्लामी बुर्के में कैद करने तक पहुँच जाती है?

क्या कदम नहीं गिन रहे तुम? क्या दिखता नहीं कि विरोधों के विषय बदल रहे हैं लेकिन बिरयानी और बर्गर खाती भीड़ किसी भी तरह से मीडिया की चर्चा में अपने आप को विक्टिम बना कर लहरिया लूटना चाहती है? क्या यह भी नहीं दिख रहा कि काली माँ को मुस्लिम बना दिया गया? वो तुम्हारी माँ है, वो हमारी माँ हैं, वो जगतजननी है… और उसे कोई भी मुस्लिम बना देता है!

तुम सवाल तो पूछो इन स्वयंभू लोगों से, मजहबी ठेकेदारों से, सोशल मीडिया पर विषवमन करते मुस्लिम नाम वालों से कि संविधान को बचाने की आड़ में मेरी माँ मुस्लिम कैसे हो जाती है? तुम पूछो तो सही कि हिन्दुओं की बिन्दी के नीचे छिन्न-भिन्न स्वास्तिक को मैं क्रूकेड क्रॉस कैसे मान लूँ? तुम पूछो तो सही कि जिन्होंने हिन्दुओं से आजादी के नारे लगाए हैं, जिन्होंने हिजाब में हिन्दुओं को उकेरा है, वो नाज़ी प्रतीक की आड़ में स्वास्तिक बना कर क्यों तोड़ रहे हैं?

नहीं पूछोगे तो फिर इस पोस्टर से निकली हुई आकृति तुम्हारे घरों में उतरेगी। वो अभी अपनी लड़कियों को बोरे में कैद कर रहे हैं, कल कहेंगे कि हिन्दुओं की लड़कियों को देख कर उनके भीतर की पाशविक वृत्तियाँ जगती हैं, तो हिन्दू लड़कियों को भी काले टेंट में रखो। लेकिन हिन्दू भाइयों, तुम चिल करो क्योंकि क्या फर्क पड़ता है, पोस्टर ही तो है।

मेरी बेटी ने फॉंसी लगा ली, संजय सिंह ने धक्के मार बाहर कर दिया: AAP कैंडिडेट का विरोध कर रही एक माँ

आम आदमी पार्टी (आप) ने जब से 70 सदस्यीय विधानसभा के लिए उम्मीदवारों का ऐलान किया है तब से ही कई नामों पर विवाद शुरू हो गए हैं। इनमें से एक नाम धनवंती चंदेला का है। उन्हें राजौरी गार्डेन से पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है। एक बलात्कार पीड़िता की मॉं ने कहा है कि यदि धनवंती की उम्मीदवारी आप ने वापस नहीं ली तो वह आत्मदाह कर लेंगी। उनका कहना है कि धनवंती उस करण चंदेला की रिश्तेदार हैं जिसने उनकी बेटी का रेप किया था। पीड़िता की मॉं का नाम सिम्मी दत्त हैं। उनके मुताबिक महीनों तक चंदेला का यौन शोषण और ब्लैकमेल झेलने के बाद उनकी बेटी ने बीते साल सितंबर में आत्महत्या कर ली थी।

भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने उनका एक वीडियो शेयर किया है। इसमें दत्त अपनी बेटी के लिए इंसाफ की मॉंग कर रही हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल का उनके बाहर इंतजार करती यह मॉं कह रही है, “मैं एक और मुस्कान नहीं बनने दूँगी।” उनका कहना है कि आरोपित के परिवार के एक सदस्य को दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ने का टिकट नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर चंदेला को टिकट दिया गया, तो मैं ख़ुद को आग लगा लूँगी और ख़ुद को मार लूँगी।”

सिम्मी ने आप के सांसद संजय सिंह पर बदसलूकी का आरोप भी लगाया है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा है, “मुझे आम आदमी पार्टी के आईटीओ ऑफ़िस से संजय सिंह ने धक्का मार कर बाहर कर दिया। कृप्या मेरी मदद करिए।” बकौल सिम्मी उनके साथ यह घटना तब हुई जब वह अपनी बेटी के लिए इंसाफ मॉंगने आप के कार्यालय पहुॅंची थी।

राजनीतिक तौर पर रसूख रखने वाले चंदेला परिवार के खिलाफ दत्त ने जनवरी में केजरीवाल से भी गुहार लगाई थी। जिस धनवंती को टिकट दिया गया है वह आरोपित की चाची हैं। उनके पति कॉन्ग्रेस नेता रहे हैं। केजरीवाल को लिखे एक पत्र में दत्त ने उनसे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को समर्थन नहीं देने की गुहार लगाई है। दत्त का आरोप है कि चंदेला के प्रभाव के कारण पुलिस भी निष्क्रिय है। उन्होंने आप के अन्य नेताओं पर भी उनकी बेटी को इंसाफ दिलाने में मदद नहीं करने का आरोप लगाया है।

सितंबर 2019 में सिम्मी की बेटी मुस्कान ने कथित तौर पर फॉंसी लगाकर ​दिल्ली के तिलक नगर स्थित अपने घर में आत्महत्या कर ली थी। परिवार का आरोप था कि चंदेला उसे ब्लैकमेल कर रहा था। उसके पास मुस्कान की कुछ अनुचित तस्वीरें और वीडियो थे। इस मामले में IPC की धारा-306 (आत्महत्या के लिए अपहरण) के तहत मामला दर्ज किया गया था। लेकिन आरोपित करण चंदेला को गिरफ़्तार नहीं किया गया।

दिसंबर, 2019 में, दत्त ने आरोप लगाया था कि करण के पिता AAP नेता हैं और उनके ख़िलाफ़ 26 आपराधिक मामले दर्ज हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली चुनाव के लिए धनवती चंदेला की उम्मीदवारी के बारे में उन्होंने AAP सांसद संजय सिंह से संपर्क किया था, लेकिन मीडिया के सामने तो उन्होंने मदद की बात कही, लेकिन बाद में उन्होंने कुछ नहीं किया। इसके अलावा, उन्होंने आरोप लगाया कि संजय सिंह ने उनका नंबर तक ब्लॉक कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि AAP सांसद संजय सिंह उनके साथ न्याय न करते हुए चंदेला का पक्ष ले रहे हैं।

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संजय राउत सही, गैंगस्टर करीम लाला से मिलती थीं इंदिरा: डॉन हाजी मस्तान के बेटे का खुलासा

इंदिरा गाँधी और उनके अंडरवर्ड से नजदीकियों पर शिवसेना नेता संजय राउत द्वारा छेड़ी गई बहस रुकने का नाम नहीं ले रही है। हालाँकि, NCP नेता शरद पवार के कहने पर संजय राउत ने इस बहस से किनारा कर लिया है लेकिन अब अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान के गोद लिए हुए पुत्र सुंदर शेखर ने शिवसेना नेता संजय राउत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि संजय राउत सही हैं। उन्होंने कहा कि इंदिरा गाँधी करीम लाला से मिलती थीं। कई अन्य नेता भी आते थे। हाजी मस्तान एक व्यापारी थे। बालासाहेब ठाकरे भी हाजी मस्तान के अच्छे दोस्त थे। 

शिवसेना सांसद संजय राउत ने इंदिरा गाँधी और अंडरवर्ल्ड डॉन करीम लाला को लेकर दिए अपने कल के बयान से पीछे हटते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा गाँधी परिवार का सम्मान किया है। अगला पैंतरा चलते हुए उन्होंने अंडरवर्ल्ड डॉन करीम लाला की तुलना अब्दुल गफ्फार खान से कर दी। राउत का कहना है कि उनके दोस्तों (कॉन्ग्रेस) को दुखी होने की जरूरत नहीं है।

करीम लाला से मिलने जाती थीं इंदिरा गाँधी वाले बयान पर संजय राउत ने कहा कि कॉन्ग्रेस में हमारे मित्रों को आहत होने की जरूरत नहीं है। यदि किसी को लगता है कि उनके बयान से इंदिरा गाँधी की छवि को धक्का पहुँचा है या इससे किसी की भावनाएँ आहत हुई हैं तो वो अपना बयान वापस लेते हैं।

UNSC में कश्मीर पर पाकिस्तान को फिर झेलनी पड़ी शर्मिंदगी, चीन ले सबक: रवीश कुमार

चीन के जरिए कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद UNSC में उठाने की पाकिस्तान की कोशिश नाकाम होने के बाद भारत ने दोनों देशों को नसीहत दी है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने बृहस्पतिवार (जनवरी 16, 2020) को कहा कि पाकिस्तान ने द्विपक्षीय मसले पर चर्चा के लिए UNSC के मंच का दुरुपयोग किया लेकिन उसे एक बार फिर शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि चीन को भी सबक लेना चाहिए और भविष्य में इस तरह के कदम से बचना चाहिए। रवीश कुमार ने कहा, “एक UNSC सदस्य (चीन) के माध्यम से पाकिस्तान द्वारा फिर से द्विपक्षीय मामले पर चर्चा के लिए UN के मंच का दुरुपयोग किया गया। UNSC ने कहा कि यह द्विपक्षीय मसला है। पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिर शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। अनौपचारिक क्लोज्ड डोर मीटिंग बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। जाहिर हो गया है कि पाकिस्तान के बेबुनियाद आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है। उसे स्पष्ट रूप से संदेश गया है कि भारत-पाकिस्तान के बीच कोई लंबित मुद्दा है तो इस पर द्विपक्षीय बातचीत होगी।”

चीन को लेना चाहिए सबक

रवीश कुमार ने कहा कि चीन को वैश्विक आम सहमति के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए और भविष्य में इस तरह की कार्रवाई से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि वैश्विक आम सहमति है कि कश्मीर द्विपक्षीय मुद्दा है। कुमार ने कहा कि यह तो चीन ही बता सकता है कि वह बार-बार ऐसा क्यों कर रहा है। हमारा मानना है कि चीन को सबक लेना चाहिए और भविष्य में इस तरह के कदम से बचना चाहिए।