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पाकिस्तान में अल्पसंख्यक नहीं लड़ पाएँगे चुनाव, उम्मीदवारों को इस्लाम में आस्था की लेनी होगी शपथ

जहाँ एक तरफ भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के नाम पर ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ के नारे लगते हैं, उसी जिन्ना के पाकिस्तान में ऐसा प्रस्ताव पास किया गया है जिससे वहाँ के अल्पसंख्यकों की स्थिति का अंदाज़ा हो जाता है। पाकिस्तान में एक ऐसा प्रस्ताव पास किया है, जिसके बाद वहाँ ग़ैर-मुस्लिम बार काउंसिल के चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकेंगे। मुल्तान बार एसोसिएशन ने ‘तहफूज़-ए-ख़त्म-ए-नबुव्वत’ नामक प्रस्ताव पास किया, जिसमें इस प्रावधान पर मुहर लगाई गई है।

न सिर्फ़ हिन्दू, ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन और पारसी जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों, बल्कि अहमदिया मुस्लिमों के भी चुनाव में हिस्सा लेने पर रोक लगा दी गई है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में चेनाब नदी के तट पर स्थित मुल्तान से आई ये ख़बर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे भीषण अत्याचार की एक बानगी भर है। वहाँ हिन्दू लड़कियों के अपहरण और उनका जबरन इस्लामी धर्मान्तरण कराए जाने की ख़बरें अक्सर आती रहती हैं। यूएन ने भी अपनी रिपोर्ट में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार पर चिंता जताई थी।

पाकिस्तानी मीडिया संस्थान ‘नया दौर’ की ख़बर के अनुसार, मुल्तान के डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन ने फ़ैसला लिया है कि जो भी वकील बार काउंसिल का चुनाव लड़ेगा, उसे एक एफिडेविट देना होगा। इस एफिडेविट के माध्यम से उम्मीदवारों को इस्लाम के प्रति अपनी आस्था की शपथ लेनी होगी। उन्हें इस बात की शपथ लेनी होगी कि वे पैगम्बर मुहम्मद और उनके सिद्धांतों में आस्था रखते हैं। जिस कार्यक्रम में ये प्रस्ताव पास किया गया, उसमें सभी वकीलों को पैगम्बर मुहम्मद पर आधारित पुस्तकें वितरित की गईं।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान में ऐसा कोई प्रस्ताव पास किया गया हो जिसमें अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया गया हो। इससे पहले पाकिस्तान सरकार ने ईशनिंदा क़ानून पास किया था। तब से इस क़ानून का दुरुपयोग कर के अल्पसंख्यकों को फँसाया जा चुका है।

हाल ही में पाकिस्तान के ननकाना साहिब में मुस्लिम भीड़ ने गुरुद्वारे पर हमला कर दिया था। एक पाकिस्तानी युवक ने एक सिख युवती का अपहरण कर के उसका जबरन इस्लामी धर्मान्तरण करा दिया था। बाद में उलटा उसके ही परिजनों ने भीड़ के साथ गुरुद्वारे पर हमला कर दिया।

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JNU में बाहरियों की खैर नहीं, हॉस्टल में मिले तो वसंत कुंज थाने में जमा होंगे

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में पाँच जनवरी को हुई हिंसा की जाँच के लिए वीसी ने पाँच सदस्यीय जाँच समिति का गठन किया है। अब विश्वविद्यालय के डीन ने नोटिस जारी करते हुए सभी वार्डन को निर्देश दिया है कि इस बात को सुनिश्चित करें कि विश्वविद्यालय के हॉस्टल में कोई बाहरी व्यक्ति मौजूद न हो।

अगर कोई बाहरी शख़्स/अनधिकृत छात्र/अतिथि कमरे में (JNU में किसी भी छात्रावास में) रहता पाया गया, तो प्रशासन के नियमों के अनुसार, हॉस्टल का रूम जिसे अलॉट किया गया है, उस छात्र के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। डीन ए क़दम ने सीनियर वॉर्डन को इस संबंध में निर्देश दिए हैं। इसके मुताबिक़ वसंत कुंज थाने की तरफ़ से 7 जनवरी को पत्र प्राप्त हुआ था। इसमें रजिस्ट्रार को यह सुझाव दिया गया है कि वो इस बात का ऑडिट कराएँ कि हॉस्टल में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं रह रहा हो और ऐसा पाए जाने पर तत्काल थाना प्रभारी को सूचित किया जाए। निर्देशानुसार, ऐसे अतिथि/ बाहरी व्यक्ति का विवरण नई दिल्ली स्थित स्टेशन हाउस अधिकारी, वसंत कुंज पुलिस स्टेशन को भेजा जाएगा।

ग़ौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में रविवार (5 जनवरी) को साबरमती हॉस्टल में नक़ाबपोश बदमाशों की हिंसा के कारणों का पता लगाने के लिए कुलपति एम जगदीश कुमार ने पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया था। इस समिति में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी टीचर्स फेडरेशन (JNUTF) के सदस्यों को शामिल किया गया है। इनमें, प्रोफ़ेसर सुशांत मिश्रा, मज़हर आसिफ़, सुधीर प्रताप सिंह, संतोष शुक्ला और भसवती दास शामिल हैं।

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तानाजी की वीरता से वामपंथी पोर्टल मूर्छित, खुन्नस में देश के अस्तित्व को ही नकारा

अजय देवगन की फ़िल्म ‘तान्हाजी’ शुक्रवार (जनवरी 11, 2020) को बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हुई। फ़िल्म को अधिकतर समीक्षकों और दर्शकों का प्यार मिला। लेकिन मीडिया का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसने इसे लेकर नकारात्मकता फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फ़िल्म ने पहले दिन भारत में 16 करोड़ रुपए नेट ग्रॉस का कारोबार कर ‘छपाक’ के प्रमोशन में जुटे प्रोपेगेंडा पोर्टलों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। दीपिका पादुकोण की फ़िल्म पहले दिन महज 4.75 करोड़ रुपए का ही कारोबार कर सकी। आप ‘तन्हाजी’ की ऑपइंडिया द्वारा की गई समीक्षा को यहाँ पढ़ सकते हैं। अब बात करते हैं प्रोपेगंडा पोर्टलों की, जो ‘तन्हाजी’ से खार खाए बैठे हैं।

मुस्लिमों को आक्रांता बताने पर ‘न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ की आपत्ति

‘न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ अपनी समीक्षा में यह याद दिलाना नहीं भूला है कि हाल ही में आई आशुतोष गोवारिकर की ‘पानीपत’ में भी ‘हर-हर महादेव’ की गूँज सुनाई दी थी और ये अब मराठा पर आधारित फ़िल्मों का ट्रेंड बन गया है। इसने ‘भगवा ध्वज’ और ‘देश प्रेम’ जैसे डायलॉग्स पर आपत्ति जताने के अंदाज़ में चर्चा की है। इस समीक्षा में क्रूर इस्लामी शासकों को बाहरी आक्रांता बताए जाने पर भी आपत्ति जताई गई है। पहाड़ों पर चढ़ते मराठा सैनिकों के बारे में भी ‘न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ पूछता है कि ये कैसे संभव है?

अंत में इस समीक्षा में फ़िल्म को सपाट बता दिया गया है। इस समीक्षा में ये दर्द साफ़-साफ़ दिखता है कि आखिर औरंगज़ेब, गद्दार उदयभान और अन्य मुस्लिम आक्रांताओं की असलियत क्यों दिखाई गई है? साथ ही एक तरह से यह सवाल भी उठाया गया है कि मराठा इतने भी वीर थे क्या? शायद अजय देवगन ने पूरा फैक्ट्स जाने बिना जेएनयू हिंसा पर टिप्पणी नहीं की, इससे वामपंथियों को जो गुस्सा आया है, उसकी बानगी इस समीक्षा में दिखती है। अगर अजय देवगन ने हिंसक वामपंथियों के बचाव में अनुराग कश्यप की तरह गालियाँ बकी होतीं तो उन्हें 5 स्टार दिए जा सकते थे।

‘स्क्रॉल’ ने अँग्रेजों के आने से पहले भारत के अस्तित्व को ही नकारा

‘स्क्रॉल’ तो अपनी समीक्षा में पहले ही घोषित कर देता है कि इतिहास में जैसा पढ़ा गया है, ये फ़िल्म वैसी नहीं है। बता दें कि ‘तान्हाजी’ फ़िल्म शुरू होते समय कई इतिहासकारों को उनके नाम के साथ क्रेडिट दिया गया है, जिनकी सलाह फ़िल्म निर्माण के दौरान ली गई थी। ‘स्क्रॉल’ लिखता है कि तानाजी की मजबूत सत्यनिष्ठा अथवा ईमानदारी बर्दाश्त से बाहर हो जाती है, सच्ची नहीं लगती। ‘स्क्रॉल’ को तानाजी और उनकी पत्नी की बातचीत भी ‘धार्मिक उपदेश’ ही लगती है। ‘स्क्रॉल’ फ़िल्म के लेखक को लेकर आपत्ति जताता है, क्योंकि मुगलों को लुटेरा दिखाया गया है, जो लोगों पर अत्याचार करते हैं।

‘स्क्रॉल’ ने अपनी समीक्षा में ये भी पाया है कि फ़िल्म में औरंगज़ेब विदेशी जैसा दिख रहा है। आश्चर्य की बात ये है कि एक-एक ख़बर को पूर्वाग्रह के साथ लिखने वाली ‘स्क्रॉल’ का कहना है कि ‘तान्हाजी’ की कहानी आज की राजनीति और पूर्वाग्रह से प्रेरित है। ‘स्क्रॉल’ ने झूठा दावा किया है कि ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ तो वर्षों बाद आया, फिर फ़िल्म में ‘स्वराज’ की बात दिखाना सही नहीं है। शायद ‘स्क्रॉल’ ये भूल गया कि भारत अथवा भारतवर्ष हज़ारों वर्षों से अस्तित्व में है और अंग्रेजों के आने से हमें अपनी पहचान नहीं मिली।

मराठा वीरों की प्रशंसा में कवियों ने ‘बलाड’ लिखे हैं। ‘स्क्रॉल’ मानता है कि इस फ़िल्म को भी कुछ उसी तरह बनाया है? क्या भारतवर्ष के हिन्दू वीरों की बहादुरी को दिखाना ग़लत है? ‘स्क्रॉल’ ने ‘छपाक’ की प्रशंसा में कसीदे पढ़े हैं। शायद इसलिए, क्योंकि दीपिका पादुकोण ने जेएनयू जाकर वामपंथियों के सरकार-विरोधी प्रदर्शन में हिस्सा लिया। दीपिका से ख़ुश वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टलों ने उनकी फ़िल्म को अच्छी समीक्षा दी है, क्योंकि वामपंथियों के समर्थन में जो भी खड़ा होगा, वामपंथी मीडिया उसके पाँवों में लोटेगा।

‘द वायर’ को ॐ, जय श्री राम, भगवा, हर-हर महादेव और जय भवानी पर आपत्ति

सबसे ज़हरीली समीक्षा तो ‘द वायर’ ने की है। उसने बताया है कि इस फ़िल्म को भावनाओं की जगह ‘भगवाओं’ में बह कर बनाया गया है, जो ‘हिन्दू राष्ट्र’ को समर्थन देता है। ‘तान्हाजी’ से सबसे ज़्यादा इसी पोर्टल की सुलगी हुई है। इसने इस बात पर आपत्ति जताई है कि शिवाजी के राज्य को ‘हिन्दू साम्राज्य’ और औरंगज़ेब को ‘बाहरी आक्रांता’ क्यों बताया गया है? ‘द वायर’ ने भी अपने सौतेले भाई ‘स्क्रॉल’ की तरह भारत को कुछ राज्यों का टुकड़ा बता कर इसे एक देश के रूप में देखने से इनकार कर दिया है। अब इन्हें कौन बताए कि इस घटना से 2000 वर्ष पहले से भी पुराने समय में चाणक्य ने सम्पूर्ण भारतवर्ष की परिकल्पना की थी और इसे साकार भी किया था।

इन प्रोपेगंडा पोर्टलों का इतिहास मुगलों से शुरू होकर मुगलों पर ही ख़त्म हो जाता है। ‘द वायर’ को ‘ॐ’, ‘भगवा’, ‘हर हर महादेव’ और ‘जय श्री राम’, इन सभी चीजों से परेशानी है। क्या इन प्रोपेगेंडा पोर्टलों के लिए छत्रपति शिवाजी के ‘जय भवानी’ को ‘अल्लाहु अकबर’ कर दिया जाए? ‘द वायर’ ने अपनी समीक्षा में नरेंद्र मोदी और सीएए प्रोटेस्ट को भी घुसेड़ा है, जबकि ‘तान्हाजी’ के प्री-प्रोडक्शन का कार्य जुलाई 2017 से ही शुरू हो गया था, जब कैब या सीएए ख़बरों में भी नहीं आया था। सबसे हास्यास्पद बात तो ये है कि अंत में ‘द वायर’ ने इस फ़िल्म को मोदी-शाह के विचारों की उपज करार दिया है।

‘द क्विंट’ ने फ़िल्म को बताया मुस्लिमों से घृणा करने वाला

‘द क्विंट’ ने इस फ़िल्म को इस्लामोफोबिक करार दिया है। अर्थात इस्लाम के प्रति घृणा में बह कर बनाई गई फ़िल्म। क्या ‘हल्ला बोल’ में समीर ख़ान नामक सुपरस्टार का किरदार निभाने वाले अजय देवगन अब मुस्लिमों से घृणा करते हैं? उनकी आने वाली फ़िल्म में भी वो भारत के पहले फुटबॉल कोच सैयद अब्दुल रहीम का किरदार अदा करेंगे। ऐसे में, प्रोपेगंडा पोर्टलों के ये दावे हास्यास्पद हैं। तानाजी तिलक क्यों लगाते हैं? युद्ध में हिन्दू राजा बनाम मुस्लिम शासक क्यों दिखाया गया है? गानों में ‘माँ भवानी’ और ‘शंकरा से शंकरा’ जैसे शब्दों का प्रयोग क्यों किया गया है? ‘द क्विंट’ को इस सभी चीजों से आपत्ति है।

ज़हरीले पोर्टल ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए ट्विटर ट्रोल और फ़िल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर के बयान का सहारा लिया है, जिन्होंने कुछ दिनों पहले कहा था कि बॉलीवुड हिंदुत्व को बढ़ावा दे रहा है। इससे ही पता चल जाता है कि ये समीक्षा कितनी प्रासंगिक है? प्रोपेगेंडा पोर्टल ने इस पर भी आपत्ति जताई है कि इस्लामी आक्रांताओं को बुरा क्यों दिखाया गया है और स्वराज के लिए लड़ने वाले हिन्दू राजाओं को एकदम अच्छा क्यों दिखाया गया है? ‘द क्विंट’ को ये भी डर है कि कहीं इस फ़िल्म को सर्जिकल स्ट्राइक को हाइलाइट करने के लिए तो नहीं बनाया गया है?

तानाजी अच्छे क्यों हैं, गंगा-जमुनी को क्यों नहीं बढ़ावा दिया: NDTV

एनडीटीवी पहले ही लिखता है कि ये फ़िल्म आपके दिमाग के लिए सही नहीं है। एनडीटीवी लिखता है कि मुख्य किरदारों की वैधता से छेड़छाड़ की गई है। उसे जानना चाहिए कि ये एक डॉक्यूमेंट्री नहीं है, फ़िल्म है। उसे इस बात से भी आपत्ति है कि तानाजी इतने वीर और साहसी क्यों दिखाए गए हैं और ओरंगजेब की तरफ़ से लड़ने वाले उदयभान को बुरा क्यों दिखाया गया है? साथ ही आपत्ति जताई गई है कि भगवा को फ़िल्म में क्यों हाइलाइट किया गया है? एनडीटीवी को आपत्ति है कि तानाजी को नैतिक रूप से इतना सत्यनिष्ठ क्यों दिखाया गया है और गंगा-जमुनी तहजीब की बात क्यों नहीं दी गई है?

कुल मिला कर बात ये है कि वामपंथी समीक्षकों ने ‘तान्हाजी’ के जरिए अपनी भड़ास मिटाई है, क्योंकि वे चाहते हैं कि कथित गंगा-जमुनी तहजीब के लिए इतिहास से छेड़छाड़ की जाए, इस्लामी आक्रांताओं को बुरा नहीं दिखाया जाए और हमारे देशभक्त योद्धाओं का गुणगान न किया जाए। अगर इतिहास में हुए वीर भारतीय योद्धाओं के बारे में कुछ अच्छा दिखाया जाता है तो इन वामपंथी समीक्षकों को इससे आपत्ति होती है। साथ ही सभी प्रोपेगेंडा पोर्टलों ने माना है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत का कोई अस्तित्व ही नहीं था।

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3 बार असम के सीएम रहे तरुण गोगोई ने माना कॉन्ग्रेस में नहीं BJP से लड़ने का दम

तीन बार असम के मुख्यमंत्री रहे वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता तरुण गोगोई का अपनी ही पार्टी से भरोसा उठता दिख रहा है। उनकी मानें तो असम की सत्ता से भाजपा को बेदखल करने के लिए राज्य में एक वैकल्पिक राजनीतिक दल की जरूरत है। गोगोई ने शुक्रवार (जनवरी 10, 2019) को कहा कि भाजपा को असम से बाहर करने के लिए वैकल्पिक राजनीतिक पार्टी समय की आवश्यकता हो गई है। ऐसा वह निजी हितों को साधने के लिए नहीं कह रहे। नया राजनीतिक दल उनकी पार्टी को भी कुछ नुकसान पहुँचा सकता है। लेकिन, असम के लोगों की हितों की रक्षा के लिए यह जरूरी है।

बता दें कि बीजेपी को राज्य से बाहर करने के लिए एक नए राजनीतिक दल के आह्वान के बाद ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (Aasu) ने हाल ही में इस तरह का प्रस्ताव रखा है। इस बीच असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सुरक्षा में कटौती की गई है। उनके सुरक्षा कवर को Z प्लस से घटाकर Z कर दिया गया है। मुख्यमंत्री रहते गोगोई को एनएसजी की सुरक्षा मिली हुई थी। लेकिन 2016 में जब बीजेपी असम में सत्ता में आई तो उनका एनएसजी कवर हटा लिया गया। इसके बाद उन्हें जेड प्लस सुरक्षा दी गई थी, लेकिन अब उनकी जेड प्लस सुरक्षा भी हटा ली गई है।

बता दें कि तरुण गोगोई ने इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत का “हिंदू जिन्ना” करार देते हुए उन पर पाकिस्तान के “दो-राष्ट्र सिद्धांत” का पालन करने का आरोप लगाया था। प्रधानमंत्री मोदी पर बड़ा हमला करते हुए गोगोई ने कहा था, “प्रधानमंत्री हम (कॉन्ग्रेस) पर आरोप लगाते हैं कि हम पाकिस्तान की भाषा में बात कर रहे हैं, लेकिन यही वो शख्स हैं, जिन्होंने खुद को पड़ोसी देश के स्तर तक गिरा लिया है। वह मोहम्मद अली जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत का पालन कर रहे है और भारत के हिंदू जिन्ना के रूप में उभरे हैं।”

साथ ही गोगोई ने मोदी सरकार के तरीकों को अहंकारी करार देते हुए दावा किया कि यह नए नागरिकता कानून को लागू करने के लिए किसी भी हद तक जाएँगे। उन्होंने कहा कि असम समेत देश भर के लोगों ने संशोधित नागरिकता कानून का विरोध किया है, क्योंकि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार लोगों को धर्म, भाषा और संस्कृति के आधार पर बाँटने की कोशिश कर रही है। 

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हमारे कैमरे की सेटिंग ख़राब थी: इंडिया टुडे की JNU हिंसा के फर्जी स्टिंग पर सफाई

दिल्ली पुलिस द्वारा JNU हिंसा में शामिल अपराधियों की पहचान कर लिए जाने के बाद इंडिया टुडे समूह के पत्रकार राहुल कंवल ने एक ‘मेगा इन्वेस्टिगेशन’ स्टिंग वीडियो जारी करते हुए कहा था कि उन्होंने इस हिंसा के मुख्य आरोपितों को पकड़ लिया है। इंडिया टुडे समूह ने दावा किया कि उनके द्वारा किए गए इस खोजी स्टिंग में अक्षत अवस्थी नाम के किसी ABVP कार्यकर्ता ने स्वयं स्वीकारा है कि वह हिंसा में शामिल थास।

इंडिया टुडे के इस वीडियो पर काफी लोगों ने आपत्ति जताते हुए कहा कि यह वीडियो फेक है। यहाँ तक कि खुद ABVP ने भी किसी अक्षत अवस्थी के ABVP से जुड़े होने की खबर से साफ़ इनकार कर दिया। इंडिया टुडे इन्वेस्टिगेशन के फैक्ट चेक से जो बात सामने आई, उसके कारण इस वीडियो की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा हो गया है।

इस पर इंडिया टुडे समूह ने एक ट्वीट के माध्यम से स्पष्टीकरण देते हुए लिखा है कि उनके कैमरा की सेटिंग अपडेट न होने की वजह से ही 5 जनवरी को रिकॉर्ड किया गया वीडियो अक्टूबर 2019 दिखा रहा है।

इंडिया टुडे समूह ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए लिखा है- “हमारी #JNU टेप्स कवरेज से जुड़ी एक क्लिप में दिख रही पुरानी तारीख के संबंध में हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि उस कैमरे की सेटिंग्स (उस विशेष क्लिप को रिकॉर्ड करते समय) अपडेटेड नहीं थीं। इससे जो ग़लतफहमी पैदा हुई है, उसके लिए हमें खेद है।”

स्पष्टीकरण के दूसरे एवं अंतिम भाग में इंडिया टुडे ने लिखा है- “साथ ही, किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले इस तथ्य को ध्यान में रखा जाए कि अक्टूबर 2019 में जेएनयू में ऐसी कोई स्थिति नहीं थी, जिसे लेकर इस तरह की जोखिम भरी रिपोर्टिंग की जाती।”

इंडिया टुडे के जासूस पत्रकार जमशेद खान ने ‘पैदा किया’ ABVP छात्र नेता, ABVP ने किया इंकार

JNUSU कार्यकर्ता को ABVP का बता डाला… राहुल कंवल ने स्टिंग के नाम पर ऐसे किया गड़बड़झाला

पूर्व कॉन्ग्रेसी अब्दुल करीम लड़ेगा पार्षदी का चुनाव, दलित की दिनदहाड़े हत्या में था शामिल

तेलंगाना के मिरियालगुडा का पूर्व कॉन्ग्रेसी नेता अब्दुल करीम जिस पर एक दलित पेरुमला प्रणय की हत्या में सहयोग करने का आरोप लगा था, उसने पार्षद के रूप में चुनाव में लड़ने के लिए शुक्रवार को नामांकन-पत्र दाखिल किया। बता दें कि पेरुमला की हत्या का कारण एक सवर्ण महिला से शादी करना था।

हालाँकि, पार्टी ने करीम को निलंबित कर दिया था और बी-फॉर्म जारी नहीं किया गया था, फिर भी उसने कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल किया। प्रणय की हत्या करने वालों में पाँचवा नाम अब्दुल करीम का था। प्रणय की हत्या दो साल पहले दिन-दहाड़े कर दी गई थी। जाति-अपराध में, करीम पर आरोप लगाया गया था कि उसने मुख्य आरोपित मारुति राव को सुविधा मुहैया कराई थी।

ख़बर के अनुसार, हत्या की वारदात में उसकी भूमिका सामने आने के बाद, कॉन्ग्रेस पार्टी ने उसे तुरंत निलंबित कर दिया था, जिसके बाद उसे गिरफ़्तार भी कर लिया गया था। लेकिन, ऐसा लगता है कि करीम और मारुति राव, जो फ़िलहाल ज़मानत पर बाहर हैं, उन्हें अपने शहर में सार्वजनिक तौर पर लोगों का समर्थन मिल रहा है।

पिछले साल अक्टूबर में, मिरियालागुडा के विधायक एन भास्कर राव और तेलंगाना विधान परिषद के अध्यक्ष गुट्टा सुखेंदर रेड्डी ने दशहरा समारोह में मारुति राव के साथ मंच साझा किया था। मरुति राव दशहरा समारोह समिति का महासचिव था, जिसने मिरयालगुडा में उत्सव का आयोजन किया था।

प्रणय अपनी गर्भवती पत्नी अमृता के साथ 14 सितंबर को मिरयालगुडा के एक निजी अस्पताल से बाहर आ रहे थे कि तभी अचानक प्रणय पर चाकू से हमला किया गया, इससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। आरोपित की पहचान सुभाष शर्मा के रूप में हुई थी। यह पूरी घटना सीसीटीवी कैमरे में क़ैद हो गई और जातिगत-हत्या की ख़बर  पूरे राज्य में इस आग की तरह फैल गई।

नलगोंडा पुलिस ने हत्या के मामले में जून में 1600 पन्नों की चार्जशीट दायर की थी। इसमें प्रणय की हत्या करने की योजना के पूरे घटनाक्रम को बताया गया था। लेकिन, इस मामले में कोई मुक़दमा शुरू नहीं हुआ।

प्रणय की हत्या के कुछ समय बाद, ‘Thalli Thandrula Parirakshana Vedika’ (अभिभावक संरक्षण मंच) के बैनर तले एक समूह, जिसमें आर्य वैश्य संघ के सदस्य शामिल थे और वो मारुति राव की जाति के सदस्य थे, उन्होंने अपना पक्ष आरोपितों के समर्थन में रखा। इतना ही नहीं उन्होंने मिरियालगुडा में उनके लिए न सिर्फ़ एक रैली निकाली, बल्कि आरोपितों से जेल में मुलाक़ात भी की। सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए उन्हें (आरोपितों) नायक की उपाधि तक दी गई।

‘ऊपर’ से अनुमति के बिना कुछ नहीं, एनकाउंटर का क्रेडिट CM को: तेलंगाना के मंत्री का विवादित बयान

तेलंगाना के सबसे बड़े मंदिर को मिला नया ‘भगवान’: उकेरी गई KCR की तस्वीरें, TRS का चुनाव चिह्न

‘भगवान ने किया न्याय, हैदराबाद समेत पूरे देश में खुशी’ – इनकाउंटर में 4 की मौत के बाद तेलंगाना के कानून मंत्री

AMU के वीसी तारिक मंसूर को जान का खतरा, DGP से लगाई सुरक्षा की गुहार

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में बीते 15 दिसंबर को छात्रों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद से बंद कैंपस अब दोबारा खुलने को तैयार है। इस बीच यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर तारिक मंसूर ने अपनी जान का खतरा बताते हुए प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी को चिट्ठी लिखी है। इसमें उन्होंने अपनी और परिवार की सुरक्षा की बात कही है। अलीगढ़ एसएसपी आकाश कुलहरि ने कहा कि एएमयू के वाइस चांसलर को सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी।

आकाश कुलहरि ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हमें एएमयू वीसी का पत्र मिला है जिसमें उन्होंने कहा है कि कुछ असामाजिक तत्वों ने उनके और रजिस्ट्रार के खिलाफ पोस्टर लगाए हैं। उन्होंने अतिरिक्त सुरक्षा की माँग की है। हम वीसी और रजिस्ट्रार को अतिरिक्त सुरक्षा दे रहे हैं। मैं आज शाम डीएम, वीसी और रजिस्ट्रार से मिलूँगा।”

बता दें कि विश्वविद्यालय 13 जनवरी को खुलने वाला है। इससे पहले वाइस चांसलर ने खुद के और अपने परिवार के ऊपर जान का खतरा बताते हुए कैंपस में फिर से हिंसा की आशंका जताई है। उनका कहना है कि 13 जनवरी को विश्विद्यालय के खुलने के बाद असामाजिक तत्व या फिर वो छात्र जिन्हें, निष्कासित कर दिया गया है, वो माहौल खराब करने के लिए हिंसा या उपद्रव जैसे वारदात को अंजाम दे सकते हैं। वीसी ने पुलिस प्रशासन से समय रहते सतर्क रहने के लिए कहा है, ताकि इस तरह की हिंसक कार्रवाई से बचा जा सके।

एएमयू वीसी ने शुक्रवार (जनवरी 10, 2019) को प्रदेश के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी, डीएम, एसएसपी को लिखे पत्र में कहा है कि 13 जनवरी को एएमयू खुलने के बाद असामाजिक व गुंडा तत्व कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। ये लोग उन्हें व उनके परिवार को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं। विश्विद्यालय के वीसी ने पत्र के साथ सोशल मीडिया पर उनको लेकर फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का स्क्रीन शॉट भी अटैच किया है। इसमें उन्हें संघ व भाजपा का समर्थक बताते हुए आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं।

अलीगढ़ के डीएम चंद्रभूषण सिंह ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि एएमयू वीसी द्वारा लिखे गए पत्र में एसएसपी को यूनिवर्सिटी खुलने पर पर्याप्त सुरक्षा के इंतजाम करने को कहा गया है। बता दें कि नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध के नाम पर बीते दिसंबर में AMU ने अपने नारों से देश को चौंका दिया था। प्रदर्शनकारी छात्रों ने “हिन्दुत्व की क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर” जैसे नारे लगाए थे। AMU के इन नफरती नारों को लेकर देशभर में आक्रोश देखा गया। इस घटना पर संज्ञान लेते हुए पुलिस ने 50-60 छात्रों के ख़िलाफ़ धारा-153 ए के तहत मुक़दमा दर्ज किया है।

नफरती नारों में AMU ने JNU को पछाड़ा, हिन्दुत्व के बाद मोदी और योगी की भी कब्र खोदी

AMU में दंगा करने वाले 12 की हुई पहचान: लगेगा गुंडा एक्ट, 6 महीने के लिए होंगे तड़ीपार

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‘जिन्ना वाली आज़ादी’ बेटी ने भी नहीं की कबूल, अपने ही Pak में बुरी मौत मरा ‘कायदे आजम’

दिल्ली के शाहीन बाग़ में एक नारा लगता है- जिन्ना वाली आज़ादी। जिन्ना वो शख्स था, जिसने देश को दो हिस्सों में बाँटने के लिए मुहिम चलाई और ख़ुद कहीं का न रहा। मोहम्मद अली जिन्ना ने मजहब के आधार पर पाकिस्तान तो ले लिया, लेकिन उसी पाकिस्तान में ‘क़ायदे आज़म’ एक भिखारी से भी बदतर मौत मरा। वो सितम्बर 11, 1948 का दिन था, पाकिस्तान के जन्म के एक साल बाद का समय। क्वेटा से एक प्लेन पाकिस्तान की तत्कालीन राजधानी कराची पहुँचा। उस फ्लाइट में एक टीबी का मरीज पड़ा हुआ था। वही मोहम्मद अली जिन्ना था, जिसे अपने ही बनाए मुल्क़ में किसी नेता ने पूछा तक नहीं।

उसे डॉक्टरों ने क्वेटा की पहाड़ियों में भेजा था, ताकि वहाँ के मौसम से स्मोकिंग के आदी रहे जिन्ना को टीबी से कुछ राहत मिले। जब वहाँ भी उसकी बीमारी ठीक नहीं हुई तो उसे कराची भेज दिया गया। अबकी डॉक्टरों को लगा कि समुद्र किनारे हवाओं में नमी होने के कारण उसकी हालत ठीक हो जाए। इस बारे में एयर मार्शल असगर ख़ान की बातें गौर करने लायक है। जब वो एक बार अपनी पत्नी के साथ सड़क पार कर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि एक ख़राब एम्बुलेंस में जिन्ना का मृत शरीर पड़ा हुआ है और उसकी बहन फातिमा भी बैठी हुई है।

उन दोनों ने जिन्ना के बहन की मदद करनी चाही लेकिन ब्रिटिश सिक्योरिटी वालों के कारण ऐसा नहीं कर पाए। यहाँ तक कि मरने के बाद जिन्ना को वापस ले जाने के लिए एक बैकअप एम्बुलेंस की व्यवस्था भी नहीं की गई। वो भी उस पाकिस्तान में, जिसकी नींव उसने ही रखी थी। बाद में एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी ने आकर जिन्ना के मृत शरीर को दूसरे एम्बुलेंस में शिफ्ट किया। यहाँ भारत में जो लोग ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ जैसे नारे लगाते हैं और एएमयू में जिन्ना की तस्वीर लगाने की वकालत करते हैं, क्या उन्हें पता भी है कि जिन्ना के पाकिस्तान में जिन्ना की मौत गुमनामी में हुई थी।

इन वामपंथी उपद्रवियों को ये पता नहीं है कि जब पाकिस्तान अपने मुल्क़ के ‘क़ायदे आज़म’ को ही उचित सम्मान नहीं दे पाया। अगर जिन्ना के पाकिस्तान में ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ होती तो जिन्ना का परिवार भारत में आकर न रहता। जिन्ना की बेटी दीना वाडिया की शादी मुंबई के एक पारसी खानदान में हुई। जिन्ना की एकमात्र संतान ने अपनी बाकी ज़िंदगी भारत में गुजारी और उनका पूरा परिवार भी आज भारत में ही व्यापार कर रहा है। दीना के पोते नेस वाडिया का कारोबार मुंबई से लेकर ब्रिटेन तक फैला हुआ है और आईपीएल टीम ‘किंग्स इलेवन पंजाब’ में भी उनका मालिकाना हिस्सा है।

वाडिया परिवार मूलतः सूरत का है, जो कारोबार के सिलसिले में मुंबई में ही जा बसा। टेक्सटाइल, शिपिंग, आभूषण और कई अन्य कारोबार में धाक रखने वाले वाडिया परिवार के लोग राजनीति और प्रशासन से भी जुड़े हुए हैं। दीना जिन्ना के बेटे नुस्ली वाडिया ने अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया। नेस वाडिया उनके ही बेटे हैं। इस तरह से जिन्ना, नुस्ली के नाना हुए। वाडिया परिवार सदियों से गुजरात और महाराष्ट्र में एक प्रभावशाली उद्योगपति खानदान रहा है। सत्रहवीं शताब्दी से ही उनके व्यापार लगातार फलते-फूलते रहे हैं।

ऐसे में इस सवाल का उठना जायज है कि अगर जिन्ना के पाकिस्तान में सच में आज़ादी रहती तो क्या उनका परिवार वहाँ जाकर अपने कारोबार नहीं चलाता? अगर जिन्ना के पाकिस्तान में ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ होती तो क्या उनकी बहन की वहाँ संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होती। फातिमा जिन्ना ने 1965 में तानाशाह जनरल अयूब ख़ान के ख़िलाफ़ चुनावी ताल ठोकी थी। फातिमा की मौत के बाद परिवार ने जाँच की लाख माँग की, पाकिस्तान सरकार ने सब ठुकरा दिया। जिन्ना के पाकिस्तान में तो उनकी बहन ‘मदर-ई-मिल्लत’ को ही इंसाफ नहीं मिला, आज़ादी ख़ाक मिलेगी।

जिस व्यक्ति ने ‘डायरेक्ट एक्शन’ की बात कर के इस देश को दो हिस्सों में बाँट दिया, उस व्यक्ति का नाम लेकर आज़ादी की माँग करने वालों को समझना चाहिए कि अगर उन्हें ऐसी ‘आज़ादी’ मिल गई तो वो उससे अच्छा भारत के किसी क़ैदख़ाने में ज़िंदगी बिताना ज़्यादा सुरक्षित महसूस करेंगे। आप सोचिए, किसी महिला के पिता एक पूरे के पूरे मुल्क़ के ‘बाबा-ए-क़ौम’ अर्थात राष्ट्रपिता कहे जाते हैं, संस्थापक हैं, फिर भी वो महिला या उसका परिवार पाकिस्तान नहीं जाता। क्यों?

ऐसा इसीलिए, क्योंकि उन्हें पाकिस्तान जाने का अंजाम पता है। बँटवारे के बाद जहाँ एक तरफ़ जिन्ना ये कहते रहे कि पाकिस्तान में सभी मजहब के लोगों का स्वागत है, वहाँ से लाखों हिन्दुओं व सिखों को भगा दिया गया। महिलाओं के साथ बलात्कार हुए, लोगों की हत्या की गई और कत्लेआम मचाया गया। वहीं भारत में विभिन्न शिविरों में घूम-घूम कर जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आज़ाद मुस्लिमों को समझाते रहे कि उन्हें देश नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि भारत में उनके पास वही सारे अधिकार होंगे, जो किसी अन्य धर्म के लोगों के पास होंगे।

जहाँ ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ के नारे लगते हों, वहाँ ‘जिन्ना से आज़ादी’ वाली बात तो छोटी सी ही है। जिनलोगों को सच में जिन्ना वाली आज़ादी चाहिए, वो दिखावा न करें और एक बार जिन्ना के बनाए पाकिस्तान में जाकर देखें। वो जिन्ना की बहन के बारे में पढ़ें। उनकी बेटी के बारे में पढ़ें। जिन्ना की बेटी के परिवार के बारे में पढ़ें। इतिहास पढ़ें, वर्तमान देखें। यूएन की रिपोर्ट पढ़ें, जिसमें पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में बताया गया है। उन्हें पता चल जाएगा कि ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ का क्या परिणाम निकलता है?

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‘पोस्टर से जुटाओ बड़े हिंदू नेता की जानकारी, फिर हमला कर मार दो’ – पकड़ाए 3 आतंकियों का खुलासा

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आईएसआईएस के तीन संदिग्ध आतंकियों को धर दबोचा। अब खुफिया एजेंसियों से पूछताछ में इन्होंने गुरुवार (जनवरी 9, 2019) को चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। इन गिरफ्तार आतंकियों को लोकप्रिय हिंदू नेताओं की हत्या करने की ‘सुपारी’ दी गई थी। इसके साथ ही इनसे सेना और पुलिस के अधिकारियों को भी अपने निशाने पर रखने को कहा गया था।

पकड़े गए तीन संदिग्ध आईएसआईएस आतंकियों में से जफर नाम के आतंकी ने पूछताछ में बताया कि वो कई बड़े हिंदू नेताओं की हत्या करने के मकसद से आया था। उसने खुलासा किया कि उसे इन हत्याओं के बाद अपनी शहादत देनी थी। उसने खुलासा किया कि उसे बड़े और नामी हिंदू नेताओं के मर्डर का लक्ष्य दिया गया था। 

इन आतंकियों को टास्क दिया गया था कि बड़े नेताओं की जानकारी उसे शहर की दीवारों पर लगे पोस्टरों से जुटानी थी। इसके बाद पूरी योजना के साथ उनके ऊपर हमला किया जाता। साथ ही उन्हें उनके आकाओं (हैंडलर) से कहा गया था कि यदि कोई वर्दी पहने हुए बड़ा अधिकारी दिखे तो उसकी हत्या कर दो।

जाँच एजेंसी के मुताबिक तीनों आतंकियों की योजना देश के विभिन्न शहरों में बड़े हमले करने की थी। उनके निशाने पर आरएसएस के कई बड़े नेता भी हैं। पकड़े गए आईएसआईएस आतंकवादियों की योजना में यूपी में भी कई बड़े हमले की साजिश शामिल थी। साथ ही खुफिया एजेंसी द्वारा किए गए पूछताछ में यह भी खुलासा हुआ है कि ये तीनों आतंकी आपस में बातचीत करने के लिए ऐसे ऐप का इस्तेमाल करते थे, जिसमें कम्युनिकेशन खत्म होते ही टेक्स्ट अपने-आप डिलीट हो जाते थे।

गौरतलब है कि गिरफ्तार तीनों तमिलनाडु से फरार चल रहे थे। जिनमें से दो संदिग्ध को प्रसिद्ध हिंदू मुनानी नेता केपी सुरेश कुमार की हत्‍या मामले में कोर्ट से बेल मिली हुई है। बेल के बाद यह लोग तमिलनाडु से नेपाल भाग गए और वहाँ से फिर दिल्‍ली आए। इसके बाद यहाँ से फिर नेपाल और वहाँ से पाकिस्‍तान जाने की फिराक में थे। तीनों आतंकियों पर आरोप है कि ये दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में टेरर स्ट्राइक करने वाले थे। ये आतंकी संगठन आईएसआईए से प्रभावित थे। इन्‍हें पकड़ने के लिए स्‍पेशल सेल की टीम को लगाया गया था।

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शेखी बघारने के लिए ख़ुद को बताया ABVP का सदस्य: इंडिया टुडे को दिए बयान से पलटा JNU छात्र अक्षत

दिल्ली पुलिस ने जेएनयू हिंसा मामले में चार वामपंथी संगठनों का नाम लिया था, जिनमें SFI, AISA, AISF और DFI शामिल थे। वहीं 9 आरोपियों की ज़ारी तस्वीर में से जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आईशा घोष को भी दिल्ली पुलिस ने नामजद किया था। लेकिन, इस बीच इंडिया टुडे द्वारा किए गए एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद जेएनयू छात्र अक्षत अपने ही बयान से पलट गया है। उसने कहा है कि मैंने शेखी बघारने के लिए झूठ बोला था और खुद को ABVP का सदस्य बताया था।

दरअसल 5 जनवरी को इंडिया टुडे ने अपने चैनल पर एक “स्टिंग ऑपरेशन” प्रसारित किया था। इसमें 5 जनवरी को जेएनयू परिसर में हुई बड़े पैमाने पर हिंसा में शामिल गुंडों को बेपर्दा करने का दावा भी किया गया था। इंडिया टुडे ने दावा किया था कि बिना मास्क पहने जेएनयू के साबरमती हॉस्टल में हिंसा कर रहा छात्र एबीवीपी का कार्यकर्ता है। उधर स्टिंग में अक्षत अवस्थी ने दावा किया कि वह एक एबीवीपी का कार्यकर्ता है और उसने जेएनयू में हुई हिंसा के बाद पेरियार छात्रावास में वामपंथियों को करारा जवाब देने के लिए अन्य एबीवीपी कार्यकर्ताओं को एकत्र किया था।

हालाँकि, राहुल कँवल ने ट्विटर पर यह साबित करने की कोशिश की कि अक्षत वास्तव में एक एबीवीपी कार्यकर्ता है। लेकिन, ऑपइंडिया के फैक्ट चैक में यह दावा फेल हो गया और अक्षत अवस्थी ने अपने बयान को वापस लेते हुए साफ़ कर दिया कि उसने शेखी बघारने के़ लिए झूठ बोला था। अक्षय अवस्थी ने अब दावा किया है कि इंडिया टुडे के रिपोर्टर को जो भी बताया वे सब झूठे थे। बस दिखावा करने के लिए मैंने वे बातें कही थी।

अब अक्षत अवस्थी ने इंडिया टुडे और ‘आज तक’ के ‘स्टिंग ऑपरेशन’ में दिए गए अपने ही बयान से पलटी मारते हुए कहा है कि वह एबीवीपी से जुड़ा हुआ नहीं है। अवस्थी ने कहा है कि वह एबीवीपी का सदस्य भी नहीं है।

इंडिया टुडे ने अपने ‘स्टिंग ऑपरेशन’ में जेएनयू हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस से पहले ही केस सॉल्व करने का दावा करते हुए अपनी पीठ थपथपाई थी। साथ ही चैनल ने इसे 2020 का सबसे बड़ा खुलासा बताया था। दिल्ली पुलिस ने जेएनयू हिंसा मामले में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर 9 संदिग्धों के नाम उजागर किए थे। इसके एक घंटे बाद ही स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारण किया गया। इसमें शामिल किए गए 9 संदिग्धों में, 7 वामपंथी संगठनों के और 2 एबीवीपी के संगठन थे।

पुलिस ने यह भी कहा था कि जेएनयू के पेरियार छात्रावास में चुनिंदा कमरों को चिन्हित किया था। दिलचस्प बात यह है कि पेरियार छात्रावास के अधिकांश घायल छात्र एबीवीपी के ही थे।

अब तक तीन मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनकी जाँच दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही है। हालाँकि, नौ आरोपितों में से अब तक किसी को भी हिरासत में नहीं लिया गया है। दिल्ली पुलिस ने अब सभी आरोपितों को नोटिस जारी करने का फैसला किया है।

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