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ABVP वालों के चोट को फ़र्ज़ी बताने वाला डॉक्टर निकला कॉन्ग्रेस नेता, ‘रावण’ से लिंक, न्यूज़लॉन्ड्री की खुली पोल

एक नाम है- डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी। बताया गया है कि ये ईएमएस का डॉक्टर है और इसके बयान के आधार पर एबीवीपी को जेएनयू में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। ये क्या है, इसकी पड़ताल तो हम करेंगे ही लेकिन सबसे पहले जानिए कि मामला क्या है? जैसा कि हमें पता है, जेएनयू में नकाबपोश वामपंथी गुंडों ने जम पर उत्पात मचाया। एबीवीपी की छात्र-छात्राओं की पिटाई की गई। सिक्योरिटी गार्ड्स और प्रोफेसरों तक को नहीं बख्शा गया। एबीवीपी के कई छात्रों को हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा। कई वायरल वीडियो से पता चला कि वामपंथियों ने पूरी हिंसा को अंजाम दिया है। हालाँकि, न्यूज़लॉन्ड्री जैसे प्रोपेगंडा पोर्टल्स ने कुछ और ही दिखाने का प्रयास कर के झूठ फैलाया।

प्रोपेगंडा पोर्टल न्यूज़लॉन्ड्री ने झूठ फैलाने के लिए डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी के बयान का सहारा लिया। प्रोपेगंडा पोर्टल ने लिखा कि भट्टी एम्स के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हैं और एम्स में घायल छात्रों के भर्ती होने की बात सुनते ही वो भागे-भागे पहुँचे। बताया गया कि जेएनयू से 15 घायल छात्रों को ट्रामा सेंटर में लाया गया है, जिन्हें गंभीर चोटें आई हैं। न्यूज़लॉन्ड्री ने डॉक्टर भट्टी के हवाले से बताया- “एक प्रोफेसर घायल हुए हैं। जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष के सिर में गंभीर चोटें आई हैं। उन्हें ‘रेड एरिया’ में शिफ्ट कर दिया गया है। एक छात्र की आँखों को नुकसान पहुँचा है। कई छात्रों को शरीर में अलग-अलग हिस्सों में चोटें आई हैं।

न्यूज़लॉन्ड्री के अनुसार, डॉक्टर भट्टी ने एबीवीपी के दावों को मानने से इनकार कर दिया। डॉक्टर भट्टी ने दावा किया कि एबीवीपी के छात्रों को जो भी चोटें आई हैं, वो दिखावटी हैं। ऑपइंडिया के कई लेख में आप देख सकते हैं, जिसमें छात्रा वेलेंटिना की उँगलियों में चोटें आई हैं और उनकी मरहम-पट्टी हुई है। इसी तरह एबीवीपी नेता मनीष का हाथ टूट गया है। तो क्या ये माना जाए कि दिखावटी चोट के कारण एम्स ने उनका उपचार कर दिया और मरहम-पट्टी कर दी? इससे ही डॉक्टर भट्टी के बयान की पोल खुल जाती है। न्यूज़लॉन्ड्री ने उसी डॉक्टर भट्टी के बयान को प्राथमिकता दी है, जिन्होंने एबीवीपी के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाया है।

अब सवाल ये उठता है कि ये डॉक्टर भट्टी हैं कौन? इसके लिए नीचे ‘यूथ कॉन्ग्रेस’ के इस ट्वीट को देखिए। ये ट्वीट फ़रवरी 15, 2019 का है। लगभग एक वर्ष पहले का। इसमें कॉन्ग्रेस ने सूचित किया है कि डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी को ‘ऑल इंडिया मेडिकल सेल’ का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है। साथ ही कॉन्ग्रेस ने भट्टी को शुभकामनाएँ भी दी हैं। इससे क्या पता चलता है? डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी काफ़ी पहले से कॉन्ग्रेस से जुड़े रहे हैं और पार्टी के पदाधिकारी भी हैं। क्या ऐसे व्यक्ति के बयान को आधार बना कर कोई निष्पक्ष दावा किया जा सकता है? इसका जवाब है- नहीं।

जब आप डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी का फेसबुक प्रोफाइल खँगालेंगे तो आपको पता चलेगा कि वो मोदी-विरोधी हैं और सीएए के विरोध में उन्होंने भीड़ जुटाई थी। उनके 4 फेसबुक पोस्ट्स से आप समझ सकते हैं कि कैसे वो अक्सर मोदी और भाजपा के ख़िलाफ़ ज़हर उगलता रहता है। डॉक्टर भट्टी ने एक फेसबुक पोस्ट में जामिया के डॉक्टरों द्वारा सीएए के विरोध में लगातार 6 दिन प्रदर्शन करने की बात कही है। उसने दावा किया था कि यूपी पुलिस ने डॉक्टरों को पीटा, उनपर गोली चलाई और उनके साथ बर्बरता की। जबकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है। ऑपइंडिया ने एएमयू थाने से संपर्क किया तो उन्होंने डॉक्टरों पर गोली चलाने या उन्हें पीटने की बात से इनकार किया।

अब आते हैं डॉक्टर भट्टी के दूसरे फेसबुक पोस्ट पर। अपने दूसरे फेसबुक पोस्ट में उसने दावा किया कि यूपी पुलिस ने सीएए के विरोध में बोलने पर आईएएस कन्नन गोपीनाथन को हिरासत में ले लिया है। उसने दावा किया कि सभी डॉक्टर सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ है। उसका एक और फेसबुक पोस्ट है, जिसमें उसने दावा किया है कि पुलिस ने जेएनयू के डॉक्टरों व नर्सों की पिटाई की है। डॉक्टर भट्टी ने भारत में क़ानून का राज ख़त्म होने और अराजकता फैलने की बातें की। बता दें कि कट्टर विपक्षी नेतागण भी ऐसी ही बातें कर के भाजपा और पीएम मोदी पर हमला करते हैं। उसने लिखा कि उसका संगठन ‘पुलिस के हमले’ की निंदा करता है।

अब बात डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी के चौथे फेसबुक पोस्ट की, जिसमे उसने लिखा है कि मोदी और शाह ने 2019 कें जनादेश का अपमान किया है और जनता के साथ वादाखिलाफ़ी की है। उसने लिखा है कि अगर मोदी-शाह ऐसा ही करते रहे तो पूरे देश में दंगे होंगे। इन चार फेसबुक पोस्ट्स से पता चल जाता है कि डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी वही सब कर रहा है, जो मोदी के अंधविरोध में विपक्ष और मीडिया का वामपंथी-कॉन्ग्रेसी गुट कर रहा है। यानी, मोदी-शाह के ख़िलाफ़ भीड़ जुटाने और ज़हर उगलने वाले व्यक्ति के राजनीतिक बयान को न्यूज़लॉन्ड्री ने ‘डॉक्टर का बयान’ बता कर पेश कर दिया।

क्या एक अंधविरोध से ग्रस्त राजनीतिक व्यक्ति का बयान ‘एक्सपर्ट ओपिनियन’ के रूप में प्रयोग किया जा सकता है? मान लीजिए अगर प्रियंका गाँधी बोलती हैं कि पीएम मोदी अगला चुनाव हार जाएँगे, तो ये लिखा जा सकता है कि ‘राजनीतिक विश्लेषक’ प्रियंका गाँधी ने फलाँ बयान दिया है। नहीं, उन्हें ‘कॉन्ग्रेस महासचिव’ प्रियंका गाँधी ही लिखा जाएगा। न्यूज़लॉन्ड्री ने डॉक्टर भट्टी के बयान के साथ यही खेल खेला है। सवाल ये उठता है कि क्या डॉक्टर भट्टी एम्स की तरफ़ से बयान दे रहा था? आख़िर प्रोपेगंडा पोर्टल न्यूज़लॉन्ड्री ने उनके बयान को एम्स के डॉक्टर का बयान बता कर क्यों पेश किया? क्या पी चिदंबरम के मोदी के ख़िलाफ़ दिए बयान को ‘लीगल एक्सपर्ट’ के बयान के रूप में दिखाया जाएगा या फिर कॉन्ग्रेस के पूर्व मंत्री के बयान के रूप में?

मोदी विरोधी कॉन्ग्रेस समर्थक के बयान के आधार पर न्यूज़लॉन्ड्री ने दावा कर दिया कि एबीवीपी ने हिंसा की है और वामपंथी दंगाई निर्दोष हैं। ये ज़हरीला प्रोपेगंडा लोगों तक पहुँचाया गया। दरअसल, एम्स के वेबसाइट पर डॉक्टर भट्टी को ‘Alumna’ के रूप में दिखाया गया है। अगर ऐसा है तो फिर और भी कई सवाल उठते हैं। वो एम्स के वार्ड में कैसे घुसा और उसने एम्स की तरफ़ से मीडिया को बयान क्यों दिया? अगर वो अधिकृत ही नहीं है तो उसने छात्रों को लगी चोटों और उनके इलाज को लेकर एम्स की तरफ़ से टिप्पणी क्यों की? क्या उसे एम्स के वार्डस में जाने की अनुमति है या फिर उसे एम्स ने प्रवक्ता बनाया है? जाहिर है, ऐसा कुछ भी नहीं है।

असलियत क्या है? असलियत ये है कि डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद का डॉक्टर है। उसने एक के बाद एक ट्वीट कर के दावा किया था कि चंद्रशेखर बीमार है और उसे हार्ट अटैक आ सकता है। हालाँकि, पुलिस ने उसके दावों को नकार दिया था। ‘स्क्रॉल’ सहित कई मीडिया संस्थानों ने भट्टी को ‘चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण’ का डॉक्टर बताया था और कहा था कि अगर उसे जेल से हॉस्पिटल में नहीं शिफ्ट किया गया तो उसकी जान जा सकती है। ‘रावण’ को दरियागंज में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था।

तो क्या ‘रावण’ के डॉक्टर को न्यूज़लॉन्ड्री ने एम्स के मेडिकल एक्सपर्ट का बयान बता कर पेश किया? तो क्या भट्टी भी एक ‘फ्रीलान्स प्रोटेस्टर’ है, जो मोदी-शाह के ख़िलाफ़ हर मुद्दे पर ज़हर उगलने के लिए कहीं भी पहुँच जाता है। डॉक्टर भट्टी के बारे में एम्स की वेबसाइट पर लिखा हुआ था कि वो मणिपाल हॉस्पिटल में कार्यरत है। जब मणिपाल हॉस्पिटल को कॉल किया गया तो पता चला कि इस नाम का कोई डॉक्टर वहाँ है ही नहीं। मणिपाल की वेबसाइट पर भी सर्च करने पर उसका नाम नहीं मिलता है। कुल मिला कर डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी के बारे में एक-एक चीज संदिग्ध है और न्यूज़लॉन्ड्री ने उसके बयान के आधार पर झूठा दावा कर दिया।

(इस लेख को स्वाति गोयल शर्मा और अभिजीत अय्यर मित्रा के रीसर्च के आधार पर तैयार किया गया है)

JNU हिंसा के दो चेहरे: जानिए कौन हैं नकाबपोशों का नेतृत्व करने वाली आइशी घोष और गीता कुमारी

जेएनयू में हुई हिंसा में ऐसे तो कई वामपंथी छात्र नेताओं के नाम सामने आए हैं लेकिन दो ऐसी महिला नेताएँ हैं, जिन्होंने मास्क पहने हिंसक भीड़ के नेतृत्व किया। दो अलग-अलग वायरल वीडियो में इन दोनों को देखा जा सकता है। एक महिला होकर महिला छात्रों पर ही अत्याचार करना, ये कहाँ तक जायज है? अव्वल तो ये कि बाद में यही वामपंथी महिलाधिकार के नाम पर धरना देते हैं, प्रदर्शन करते हैं और कैंडल लेकर निकलते हैं। जेएनयू की हिंसा की पहली किरदार हैं जेएनयूएसयू की वर्तमान अध्यक्ष आइशी घोष। वहीं इसकी दूसरी किरदार हैं- गीता कुमारी, जेएनयूएसयू की पूर्व अध्यक्ष।

आइशी और गीता, ये दोनों ही वामपंथी छात्रों का नेतृत्व करती रही हैं। सबसे पहले बात आइशी घोष की। अभी वो मीडिया के सामने बड़े-बड़े बयान देने में लगी हुई हैं। वो न हारने और न डरने की बातें करते हुए दावा कर रही हैं कि एबीवीपी ने उन पर हमला किया। लेकिन, वायरल वीडियो कुछ और स्थिति बताते हैं। एक वायरल वीडियो में आइशी घोष कुछ नकाबपोश लोगों के साथ जाती दिख रही हैं। वैसे तो उन्होंने पूरी सतर्कता बरती लेकिन वीडियो फुटेज ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। एक व्यक्ति ने ऊपर से अपने फोन से वीडियो लिया, जिससे आइशी की पोल खुल गई।

ये वीडियो सूर्यास्त के पहले का है, जिससे पता चल जाता है कि हमले किसने किए। आइशी नकाबपोशों को दिशा दिखा रही हैं कि उन्हें किधर जाना है। जेएनयूएसयू ने भी पुष्टि की है कि वो आइशी ही है लेकिन उसका कहना है कि वो एबीवीपी के लोगों को हॉस्टल से भगाने के लिए अंदर गई थी। जेएनयू छात्र संगठन अपने ही बयान में फँस गया। आइशी घोष सितंबर 2019 में सीपीएम के समर्थन से जेएनयूएसयू की अध्यक्ष बनी थीं। आइशी ने जीतने के बाद कहा था कि वो वामपंथ से प्रेरित हैं क्योंकि वामपंथ ही एक ऐसी विचारधारा है जो चुनाव पर चुनाव हारने के बावजूद लोगों से जुड़े मुद्दे उठाती है।

आइशी घोष के बारे में कहा जा रहा है कि उन्हें भी चोटें आई हैं। हालाँकि, जब वो हॉस्टल में घुसती दिख रही हैं, तब उन्हें चोट नहीं आई थी। इससे सवाल उठता है कि जब वो हिंसा करने वाले नकाबपोशों के साथ थीं तो फिर उन्हें चोट कैसे आ गई? मीडिया को भी सम्बोधित करने वो सिर में मरहम-पट्टी लगा कर आईं। हालाँकि, वामपंथी इससे पहले भी हिजाब और जैकेट के ऊपर से पट्टी बाँधने का नाटक कर चुके हैं। अगर आइशी को सच में किसी एबीवीपी वाले ने पीटा है तो फिर उसका कोई वीडियो और फोटो क्यों नहीं है? आइशी ने ही दावा किया था कि जब उनपर हमला हुआ, तब वहाँ उनके कई साथी मौजूद थे।

ये वही आइशी घोष हैं, जिन्होंने जेएनयू हॉस्टल फी बढ़ाने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। उस दौरान छात्रों ने पुलिस पर पत्थरबाजी भी की थी। आइशी ने दिल्ली पुलिस पर छात्राओं के साथ अभद्रता करने का गंभीर आरोप लगाया था। अभी भी आइशी हिंसा के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहरा रही हैं जबकि जेएनयू के चुनावों में आरएसएस हिस्सा लेता ही नहीं है और न ही वो एक राजनीतिक पार्टी है। इस प्रोपेगंडा में आइशी घोष के परिवार का भी बयान लाया जा रहा है, जिसमें उनके पिता कहते दिख रहे हैं कि आज उनकी बेटी पर हमला हुआ है, कल को उनपर भी हो सकता है।

ये वामपंथी मीडिया का सबसे बड़ा प्रोपेगंडा रहा है। जब भी उनके गुट के किसी व्यक्ति पर कुछ आरोप लगते हैं या उसकी पोल खुलती नज़र आती है तो मीडिया उसके घर जाकर माता-पिता का इंटरव्यू लेता है और सहानुभूति की लहर तैयार करता है। न सिर्फ़ बुरहान वानी जैसे आतंकियों, बल्कि हैदराबाद के बलात्कारियों के साथ भी ऐसा ही किया गया। वामपंथी अक्सर महिलाओं, छात्रों और दिव्यांगों को आगे कर के अपनी लड़ाई लड़ते हैं। वो बार-बार दलितों और मुस्लिमों का नाम आगे करते हैं ताकि ऐसा लगे कि वो उनके हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं। इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय पब्लिसिटी मिलती है।

हिंसक भीड़ का नेतृत्व कर रही दूसरी महिला का नाम है गीता कुमारी। गीता को सितम्बर 2017 में जेएनयूएसयू का अध्यक्ष चुना गया था। गीता ने जब चुनाव जीता था, तब उन्होंने कहा था कि उनके माता-पिता पहले चाहते थे कि वो पढ़ाई पर अपना ध्यान केंद्रित करें। हालाँकि, उनका कहना था कि बाद में उनके घरवालों ने उनका समर्थन किया। जैसी कि वामपंथ की प्रकृति है, वो घरवालों के ख़िलाफ़ बगावत करने और माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जाने को क्रांति के रूप में देखते हैं। जामिया हिंसा मामले में जब चंदा यादव नामक युवती की ब्रांडिंग का प्रयास किया गया था, तब उसके बारे में भी यही प्रचारित किया गया था। कहा गया था कि चंदा के माता-पिता को लगता था कि जामिया में वो मुस्लिमों के बीच कैसे रहेगी, लेकिन उसने परिवार के विरुद्ध जाकर वहाँ दाखिला लिया।

गीता कुमारी को एक वीडियो में हॉस्टल में बैठ कर नकाबपोशों से बातचीत करते देखा जा सकता है। उन्हें एक व्यक्ति आग्रह कर रहा होता है कि वो लोग जो भी करें वो 100 मीटर से दूर रह कर। इस वीडियो में वो उस व्यक्ति की बातों को अनसुनी कर हिंसा की योजना बनाते दिख रही हैं। उनके साथ नकाबपोश दिख रहे हैं, जिन्होंने एबीवीपी के कार्यकर्ताओं की पिटाई की। गीता के चुनाव के दौरान न सिर्फ़ जम्मू कश्मीर और फिलिस्तीन की ‘आज़ादी’ का मुद्दा उछाला गया था, बल्कि नजीब को लेकर पीएम मोदी से सवाल पूछे गए थे।

गीता इससे पहले भी उपद्रव कर चुकी हैं। उन्होंने दर्जनों छात्रों के साथ जेएनयू में डीन के दफ्तर में हंगामा किया था। प्रोफेसर उमेश कदम ने बताया था कि गीता और उनके साथियों ने उनके दफ्तर में घुस कर उन पर हमला कर दिया। प्रोफेसर कदम को गीता और उनके साथियों ने मिल कर बँधक बना लिया था। बाद में सिक्योरिटी गार्ड्स की मदद से उन्हें बाहर निकाला गया। गीता और उनके साथियों पर वीसी को गाली देने का भी आरोप लगाया था। उन्होंने वीसी के मंच के पास जाकर उपद्रव किया था। गीता भी एक ‘फ्रीलान्स प्रोटेस्टर’ की तरह हैं। इन दोनों महिला नेताओं ने जेएनयू की हिंसा में अहम किरदार निभाया, ऐसा कई प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया है और कई वीडियो से भी खुलासा हुआ है।

जब ऑपइंडिया ने जेएनयू के कुछ छात्रों से गीता और आइशी के बारे में जानना चाहा तो पता चला कि ये दोनों ही भाजपा के ख़िलाफ़ घृणा लेकर घूमती हैं और अक्सर ब्राह्मणों के बारे में भली-बुरी बातें बोलती हुई पाई जाती हैं। इससे पता चलता है कि ये दोनों और इनका छात्र संगठन जातिवादी ज़हर बोने के भी प्रयास करता रहता है। गीता के बारे में कहा जाता है कि वो अक्सर अपने विरोधियों को चुप कराने के लिए अपने पिता के सेना में होने की बात बोलती है। बता दें कि ट्रोल गुरमेहर कौर भी विरोधियों को चुप कराने के लिए अपने पिता के बलिदानी होने की बात उठाती आई हैं।

लेफ्ट इकोसिस्टम ने पहले ही रच ली थी JNU हिंसा की साज़िश: वामपंथियों की बौखलाहट का पूरा खाका

जेएनयू में वामपंथियों द्वारा आतंक का तांडव मचाने के पीछे एक बहुत बड़ी साज़िश है। यहाँ हम इस घटना के पीछे जितने भी कारक हैं, उनके बारे में बात करेंगे। हिंसा को लेकर बहुत कुछ मीडिया में आया भी है और आगे भी हम इसके बारे में बात करेंगे। लेकिन, सबसे पहले ये जानते हैं कि वामपंथी छात्रों ने ऐसा क्यों किया? इसके लिए सबसे पहले जेएनयू प्रशासन के बयान को देखते हैं। जनवरी 1, 2020 से जेएनयू का विंटर सेशन रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ। इसके लिए रजिस्ट्रेशन का काम चल रहा था। सालों भर उपद्रव, प्रदर्शन और दंगों में व्यस्त रहने वाले छात्रों को पठन-पाठन का कार्य मंजूर नहीं था और अकादमिक कैलेंडर के हिसाब से कार्य चल रहे थे, इससे वो ख़ासे चिंतित थे।

जेएनयू हिंसा के पीछे असली कारण

शुक्रवार (जनवरी 3, 2020) को अचानक से कुछ छात्र जेएनयू के ‘कम्युनिकेशन एंड इनफार्मेशन सेंटर (CIS)’ में घुस गए और उन्होंने वहाँ मौजूद कर्मचारियों को भगा दिया। इसके बाद इंटरनेट सर्विस को बाधित कर दिया गया। ये छात्र रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया का विरोध कर रहे थे। जेएनयू प्रशासन ने बताया कि इन छात्रों की इस करतूत के कारण उस दिन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया ठप्प रही। जेएनयू प्रशासन ने इस मामले की पुलिस कंप्लेंट भी की। अगले दिन सीआईएस फिर से चालू किया गया और कर्मचारी आम दिनों की तरह अपना काम करने लगे। हज़ारों छात्रों ने रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में हिस्सा लिया और फी भरी।

इसके बाद वो उपद्रवी छात्र फिर से लौट आए, जिन्होंने सीआईएस को ठप्प किया था। उन्होंने फिर से कर्मचारियों को भगा कर इंटरनेट सर्विस रोकने का प्रयास किया। वो ये देख कर बौखला गए थे कि हज़ारों की संख्या में छात्र रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में हिस्सा ले रहे हैं। दंगाई छात्रों ने बिजली सप्लाई सिस्टम को तोड़फोड़ डाला। उन्होंने ऑप्टिकल फाइबर को नुक़सान पहुँचाया। जेएनयू ने इसे ‘आपराधिक साज़िश’ बताते हुए फिर से पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। जेएनयू ने बताया है कि उपद्रवी छात्रों का ये गुट लगातार ऐसे छात्रों को परेशान कर रहा है, जो पढ़ाई के काम में लगे हैं।

उन्होंने कई कॉलेजों के गेट बंद कर दिए, छात्रों को क्लास जाने से रोका और कर्मचारियों व प्रोफेसरों के साथ बदतमीजी की। कई छात्रों ने जब रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में हिस्सा लेना चाहा तो उन्हें मारा-पीटा गया। हॉस्टलों में भी उन छात्रों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया, जो रजिस्ट्रेशन कराना चाहते थे और जो अकादमिक कैलेंडर के हिसाब से चलना चाहते थे। शाम को ‘पेरियार’ हॉस्टल में दंगाई छात्र घुस गए और उन्होंने एबीवीपी से जुड़े छात्रों की पिटाई की। जैसा कि कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने ऑपइंडिया को बताया है, शॉल में पत्थर छिपा कर लाए कम से कम 500 दंगाइयों ने लाठी-डंडों से छात्रों पर हमला किया।

जेएनयू प्रशासन का बयान तस्वीर साफ़ कर देता है

आतंक का ये तांडव 8 घंटों तक चला। महिला छात्रों को भी नहीं बख्शा गया। रजिस्ट्रेशन कराने गए छात्रों की पिटाई की गई। एबीवीपी के छात्रों के रूम का गेट तोड़ कर उनपर हमला किया गया। किसी की गर्दन में चोटें आई हैं तो किसी का हाथ टूट गया है। जब कैम्पस में पुलिस पहुँची तो पुलिस के ख़िलाफ़ भी ‘गो बैक’ के नारे लगाए गए। छात्रों को घेर-घेर कर पीटा गया। एबीवीपी की एक छात्रा शाम्भवी की वेशभूषा में एक वामपंथी छात्रा ने हमले किए ताकि इसमें संगठन का नाम बदनाम हो। बाद में पता चला शाम्भवी ख़ुद घायल हुई हैं और वामपंथी गुंडों की पोल खुल गई।

इसकी पटकथा पिछले कुछ सप्ताह से लिखी जा रही थी। इन दंगाई छात्रों ने एडमिन ब्लॉक में जम कर तोड़फोड़ मचाई थी। यहाँ तक कि कुलपति के दफ़्तर को भी नहीं छोड़ा गया। वहाँ भी तोड़फोड़ मचाई गई। जेएनयू प्रशासन का पूछना है कि क्या ये दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि कुछ उपद्रवियों के कारण उन छात्रों को ख़ासी परेशानी हो रही है, जो सचमुच पढ़ाई करने के लिए वहाँ आए हैं। जेएनयू के बयान और रजिस्ट्रेशन रोकने की वामपंथियों की बौखलाहट से काफ़ी-कुछ स्पष्ट हो जाता है। यहाँ सोचने वाली बात ये है कि वामपंथी विश्वविद्यालय में अध्ययन संबंधी कार्य क्यों नहीं होने देना चाहते?

कुछ अन्य मुद्दे, जो वामपंथियों की बौखलाहट का कारण बने

सीएए को लेकर दंगा किया गया। पूरे देश को आगजनी में झोंकने का प्रयास किया गया। विदेशी मीडिया संस्थानों में लेख लिख कर भारत की छवि ख़राब करने की कोशिश की गई। जामिया में आयशा और लदीदा नामक दो जिहादियों को छात्र नेता बता कर पेश किया गया। उनके लिए पूरा का पूरा ड्रामा रचा गया, ताकि ऐसा लगे कि वो ‘पुलिस बर्बरता’ के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रही हैं। एएमयू में हिंसा भड़काई गई। सीएए विरोध के नाम पर हज़ारों मुस्लिमों की भीड़ ने ट्रेनों को जलाया और यात्रियों पर पत्थरबाजी की। लेकिन, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक फ़ैसले ने वामपंथियों के इस खेल को बदल दिया।

सीएम योगी ने स्पष्ट कहा कि सीसीटीवी व प्रत्यक्षदर्शियों की मदद से दोषियों को चिह्नित किया जाएगा और जिसने भी सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाया है, उसकी संपत्ति बेच कर इसकी भरपाई की जाएगी। एक-एक दंगाई को चिह्नित किया जाने लगा और पोल खुलने लगी कि इसमें कौन-कौन लोग शामिल हैं? बौखलाए वामपंथियों को तब करारा झटका लगा, जब सद्गुरु सरीखी हस्ती ने सीएए को लेकर अपनी राय साझा की और जनता को भ्रम में न पड़ने की सलाह दी। भाजपा ने सीएए के समर्थन में मिस्ड कॉल अभियान शुरू किया और उसे तगड़ा समर्थन मिला। वामपंथी आकाओं ने सोशल मीडिया पर चिंता जाहिर करनी शुरू कर दी कि मिस्ड कॉल के आँकड़े आएँगे तो मीडिया उन्हें जम कर चलाएगा।

उनका ये ‘डर’ तब और बढ़ गया, जब भाजपा ने 3 जनवरी से 3 करोड़ घरों में सीधे दस्तक देकर सीएए के फ़ायदे समझाने शुरू कर दिए। भाजपा के दोनों अध्यक्षों से लेकर साधारण कार्यकर्ताओं तक, सभी ने इस अभियान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। खेल बदल चुका था। जिस मसले को वामपंथियों ने बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया, वो इतना अच्छा क़ानून था कि उसके बारे में जनता को समझा कर भाजपा को ही फ़ायदा होने लगा। वामपंथियों ने अंत में शाहीन बाग़ में ड्रामा खेल कर अपना सबकुछ झोंक दिया। 90 वर्ष की बूढी महिलाओं से लेकर मात्र 20 दिन तक की बच्ची को विरोध प्रदर्शन का चेहरा बनाया गया।

एनडीटीवी सरीखे चैनलों ने इन चेहरों को ख़ासी तवज्जो दी लेकिन सबकुछ विफल रहा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जोधपुर में स्पष्ट कर दिया कि विपक्षी जो करना है कर लें, सरकार सीएए पर एक इंच भी पीछे नहीं हटेगी और जनता को घर-घर जाकर इसके बारे में समझाएगी। दिल्ली पुलिस को बदनाम करने की लाख कोशिश की गई लेकिन उससे भी कुछ फ़ायदा नहीं हुआ। जामिया की जिहादिनों से लेकर शाहीन बाग़ के ड्रामे तक, सब फेल होने के बाद वामपंथियों ने अपना अंतिम हथियार निकाला और अपने छात्र संगठन का इस्तेमाल कर के हिंसा और दंगे को अंजाम दिया।

वामपंथी इकोसिस्टम की गहरी साज़िश का पर्दाफाश

अब आते हैं उपद्रवियों व दंगाइयों के आकाओं पर। ये वो लोग हैं, जो जनता को भड़काते हैं, बरगलाते हैं और उनके भीतर ‘डर’ बैठा कर उनका इस्तेमाल करते हैं। इनमें हर क्षेत्र में अच्छा नाम कमा चुके लोगों से लेकर बेरोज़गारी का दौर देख रहे लोगों तक शामिल हैं। राजनीति, साहित्य, सिनेमा और पत्रकारिता- ये चार ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ इन लोगों की बड़ी पैठ है। जेएनयू में हिंसा की ख़बर आते ही स्वरा भास्कर ने तुरंत एक वीडियो शूट किया और लोगों से भारी संख्या में जेएनयू मेन गेट के पास आने की अपील की। ये अपील आम जनता से नहीं बल्कि वामपंथ से सहानुभूति रखने वाले लोगों से थी।

पुणे स्थित एफटीआईआई में छात्रों ने एक विशाल बैनर लगा कर जेएनयू के समर्थन में रैली निकाली। इतनी जल्दी, इतना बड़ा बैनर कैसे तैयार हो गया? इससे तो ऐसा लगता है कि पहले से सारी साज़िशें रच ली गई थीं। अनुराग कश्यप का ट्वीट तुरंत आ गया, जिसमें उन्होंने भाजपा, एबीवीपी, पीएम मोदी और शाह- सबको आतंकवादी बता दिया। बरखा दत्त सरीखे पत्रकारों ने तुरंत एबीवीपी को हिंसा के लिए ज़िम्मेदार ठहराने के लिए अफवाहें फैलानी शुरू कर दी। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी कुछ पत्रकारों से अंग्रेजी में ट्वीट करवाया गया कि छात्रों पर अत्याचार हो रहा है। भारत सरकार की छवि बिगाड़ने की कोशिश की गई।

अरविन्द केजरीवाल ने तुरंत ट्वीट कर के लिखा कि वो हिंसा की निंदा करते हैं। ये एक बहुत बड़ी चालाकी होती है। ‘हिंसा की निंदा’ करते समय वो न तो पीड़ित न नाम बताते हैं और न ही उनलोगों के बारे में कुछ बताते हैं, जिन्होंने हिंसा की। सीधा ‘हिंसा की निंदा’ कर देने से और बाकी सारी चीजें छिपा लेने से नकारात्मकता का माहौल तो बनता ही है और साथ ही इससे सरकार पर निशाना साधने में भी आसानी होती है। आख़िर इतनी जल्दी पूरा का पूरा लेफ्ट इकोसिस्टम हरकत में कैसे आ गया? इतनी जल्दी पोस्टर-बैनर कैसे बन गए? इतनी जल्दी बड़ी संख्या में लोगों को प्रदर्शन के लिए इकठ्ठा कैसे कर लिया गया? क्यों न माना जाए कि ये सबकुछ पूर्व-नियोजित साज़िश के तहत क्रमबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया।

सुबह होने से पहले ही रात के 2 बजे ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ पर वामपंथियों की एक बड़ी भीड़ जुट गई। ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ जैसे नारे लगाने की ख़बरें आईं, जिनकी पुष्टि होनी अभी बाकी है। अगर गुस्सा जेएनयू हिंसा को लेकर था तो हिंसा करने वाले वामपंथियों के ख़िलाफ़ किसी ने भी कुछ क्यों नहीं लिखा? इसमें हिन्दू, ब्राह्मण और भाजपा कैसे घुस गए? याद कीजिए, सीएए के समय भी मजहबी नारेबाजी की गई थी, हिन्दू प्रतीक चिह्नों का अपमान किया गया था और देवी-देवताओं का मज़ाक बनाया गया था। इससे पता चलता है कि लेफ्ट इकोसिस्टम सीएए और जेएनयू के बहाने हिंदुत्व के ख़िलाफ़ अपनी घृणा को एक मुखौटा पहनाना चाहता है।

झूठ फैलाने की सारी हदें पार कर दी गईं

सबसे पहले बात बरखा दत्त की। बरखा ने एक व्हाट्सप्प ग्रुप में हुए चैट का स्क्रीनशॉट शेयर किया। इसमें दावा किया गया कि ‘यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट’ नामक ग्रुप में हिंसा की साज़िश रची जा रही है। ग्रुप का नाम ऐसा रखा गया है, जिससे प्रतीत होता है कि ये एबीवीपी का ग्रुप है। लेकिन, ये दाँव उलटा पड़ गया। जब लोगों ने उस नंबर को खँगाला तो उसका कॉन्ग्रेस कनेक्शन सामने आया। ‘ट्रू कॉलर’ नामक ऐप कर भी उसका नाम ‘आईएनसी’ से ही सेव था। इसके बाद कॉन्ग्रेस ने ट्वीट कर के सफ़ाई देते हुए कहा कि उसने पूर्व में ऐसे कई नंबरों की सेवा ली थी, जिनका अब पार्टी से कोई नाता नहीं है। हालाँकि, तब तक उनकी पोल खुल चुकी थी।

इसी तरह एबीवीपी की कार्यकर्ता की वेशभूषा में एक वामपंथी महिला को तैयार किया गया, जिसकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं। उनके इस प्रोपेगेंडा की भी पोल खुल गई। वामपंथी छात्र संगठन के चैट का स्क्रीनशॉट वायरल हुआ, जिससे पता चला कि योजना बना कर हमले किए गए थे। इस ग्रुप में ‘संघी गुंडों की पिटाई’ और ‘ये तो ट्रेलर है, पिक्चर अभी बाकी है’ जैसे मैसेजों का आदान-प्रदान हुआ। इस ग्रुप से ही पता चला कि वामपंथियों ने पहले ही योजना बना ली थी कि वो लोहे के रॉड और डंडों से हमला करेंगे। जामिया से भी गुंडों को बुलाने की बातें की गईं। इस चैट को नीचे देखें:

वामपंथी ग्रुप का वायरल चैट: हमले की प्लानिंग

जेएनयूएसयू की पूर्व अध्यक्ष और वामपंथी नेता आइशा घोष को नकाबपोश गुंडों के नेतृत्व करते हुए देखा गया। जेएनयूएसयू की पूर्व अध्यक्ष गीता कुमारी को नकाब पहने दंगाइयों के साथ हमले की साजिश रचते हुए देखा गया। इन सबके वीडियो वायरल हुए, जिसके बाद वामपंथी गैंग की पोल खुली। राणा अयूब जैसे पत्रकारों ने अफवाह पर अफवाह फैला कर अपने मकसद को अंजाम देने का प्रयास किया। जबकि सच्चाई क्या है, ये घायल छात्रों ने ऑपइंडिया को बताया। घायल छात्रा वेलेंटिना ने बताया कि हॉस्टल रूम से लेकर मेस तक घुस कर एबीवीपी वालों को पीटा गया। महिलाओं के साथ बदतमीजी करने से लेकर प्रोफेसरों के साथ धक्का-मुक्की तक, वामपंथी गुंडों ने लगातार हमले किए।

जेएनयू में लगातार हो रहे विवाद, हिंसा व दंगों का निदान क्या?

जेएनयू पिछली बार कब किसी अच्छे कारण से सुर्ख़ियों में आया था, ये दिमाग पर लाख ज़ोर देने के बावजूद याद नहीं आता। वहाँ कई लोग हैं जो अच्छा कार्य कर रहे हैं लेकिन वो वामपंथियों द्वारा फैलाई जा रही हिंसा और छात्रों के गुटों के बीच लगातार होते टकराव के कारण छिप जाते हैं। हमने देखा कि जो पढ़ना चाहते हैं, उन्हें भी पढ़ने नहीं दिया जा रहा। कई ऐसे छात्र हैं, जो ग्रामीण परिवेश से आए हैं और उनके व उनके परिवार की पूरी उम्मीद फ़र्ज़ी राजनीति पर नहीं, जेएनयू के अकादमिक कैलेण्डर पर टिकी है। उनका क्या होगा? सबसे पहले उपाय ये है कि जेएनयू में छात्र राजनीति पर कुछ सालों के लिए लगाम लगाई जाए।

वाराणसी के बीएचयू में भी एबीवीपी से लेकर सभी छात्र संगठनों की उपस्थिति है। वहाँ छात्र संघ के चुनाव नहीं होते लेकिन तब भी वहाँ छात्र अपनी माँगें रखते हैं, विरोध प्रदर्शन करते हैं और देशहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा भी करते हैं। क्या राजनीति और चुनाव होने से ही एक यूनिवर्सिटी की पहचान बनती है? अगले कुछ वर्षों के लिए जेएनयूए में चुनाव व राजनीति सम्बन्धी गतिविधियों पर लगाम लगा कर यहाँ लगातार हो रहे विवाद को थामा जा सकता है। अगर ऐसे कोई क्रियाकलाप होते भी हैं तो इसे पूर्ण पुलिसिया संरक्षण में कराया जाना चाहिए। ऐसी सुरक्षा हो, जहाँ एक व्यक्ति को भी हिंसा करने की इजाजत न हो।

जहाँ वामपंथियों की अच्छी-खासी उपस्थिति है, वहीं राजनीतिक हिंसा की वारदातें ज्यादा क्यों होती हैं? केरल में संघ व भाजपा कार्यकर्ताओं का ख़ून बहाया जाता है। पश्चिम बंगाल में कभी तृणमूल के कार्यकर्ताओं के साथ यही किया गया था। ये अलग बात है कि आज तृणमूल की भी यही नीति है। त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने से पहले तक लगातार कत्लेआम मचाया गया। इन सभी राज्यों में वामपंथियों के सबसे अच्छे दौर में ऐसी वारदातें हुईं। जैसे ही उनकी उपस्थिति कमज़ोर पड़ी, उनके कार्यकर्ताओं ने हिंसा करनी भी शुरू कर दी। अब वो इसी फॉर्मूले को जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में आजमा रहे हैं। छात्रों को आगे कर के अस्तित्व की लड़ाई लड़ी जा रही है।

प्रियंका-कॉन्ग्रेस आग बुझाने का काम करती हैं और ये आग लगाने का, मोदी-शाह दंगों के एक्सपर्ट: राशिद अल्वी

मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया में कॉन्ग्रेस के नेता और उनके समर्थक JNU में हुई हिंसा के लिए केंद्र सरकार पर दोष मढ़ने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय मंत्री अमित शाह को खलनायक के तौर पर चित्रित करने का भी काम कर रहे हैं।

Zee News की ख़बर के अनुसार, कॉन्ग्रेस नेता राशिद अल्वी ने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को “Experts in Roiting” यानी “दंगों का एक्सपर्ट” तक कह डाला। अमरोहा में, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता ने प्रियंका गाँधी और कॉन्ग्रेस को ‘आग बुझाने वाला’ और दो बीजेपी सुप्रीमों को ‘आग लगाने वाले लोग’ बताया।

कॉन्ग्रेस नेता ने कहा, “अमित शाह और नरेंद्र मोदी का इतिहास पूरे देश में विख्यात है। यह दोनों दंगे कराने में विशेषज्ञ रहे हैं। अमेरिका ने उन्हें वीज़ा देने से मना कर दिया था, देश के लोग उनके इतिहास को अच्छी तरह से जानते हैं।”

राशिद अल्वी ने कहा, “प्रियंका गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी आग बुझाने का काम करती हैं और ये लोग (मोदी-शाह) आग लगाने जा रहे हैं।” इसके आगे कॉन्ग्रेस नेता ने आरोप लगाते हुए कहा कि मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान दोनों एक दूसरे की मदद कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी और इमरान खान एक साथ हैं और यही कारण है कि यह सब हो रहा है।”

राशिद अल्वी ने पीएम मोदी के ख़िलाफ़ ऐसा पहली बार मोर्चा नहीं खोला है। इससे पहले, 2013 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, अल्वी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘यमराज’ कहा था। यह बड़ी विचित्र बात है कि कॉन्ग्रेस नेता जिस मुद्दे के लिए मोदी और शाह को ‘दंगों का विशेषज्ञ’ कह रहे हैं, उसमें उन्हीं के पार्टी के सदस्यों का हाथ होने की ख़बर सामने आई है।

रविवार (5 जनवरी) को JNU परिसर में नक़ाबपोश गुंडों ने दंगा किया और छात्रों को मारा-पीटा। इस दंगे को ABVP के सिर मढ़ने के लिए जिस व्हाट्सअप ग्रुप का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर JNU छात्र संगठन की पूर्व अध्यक्ष गीता ने शेयर किया उसका कनेक्शन वामपंथियों से था। इस ग्रुप में शामिल कई लोगों के नंबर साफ़तौर पर नज़र आए। इन नंबर्स की जब पड़ताल की गई तो पता चला कि उसमें एक नंबर अमन सिन्हा नाम के छात्र का था।

बता दें कि यह वहीं अमन सिन्हा था जिसका संबंध भाजपा से नहीं बल्कि कन्हैया कुमार, उमर खालिद जैसे वामपंथियों और कट्टरवादियों से था। इतना ही नहीं अमन सिन्हा की वॉल पर, उसके द्वारा शेयर की गई तस्वीरों से यह साफ पता चलता है कि इस पूरे कारनामे को सुनियोजित ढंग से अंजाम देने के लिए किसने अपनी भूमिका निभाई। ऐसे में कॉन्ग्रेस नेता राशिद अल्वी का मोदी और शाह को लेकर दिया गया बयान आधारहीन ही नहीं बल्कि मनगढ़ंत भी है।

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एनडीटीवी एक ऐसा नाम है, जो किसी भी मसले की रिपोर्टिंग इस आधार पर करता है कि उसमें भाजपा, मोदी-शाह अथवा हिंदुत्व का नाम घसीटा जा सके। जहाँ इनका नाम आने की सम्भावना नहीं रहती, वहाँ एनडीटीवी ऐसा कुछ नहीं करता। मुस्लिम फ़क़ीर को काला जादू वाले तांत्रिक बना कर पेश करने वाला एनडीटीवी अरविन्द केजरीवाल को चुनावी फायदा पहुँचाने के लिए एक इंटरव्यू किया, जिसमें आप कार्यकर्ताओं को ‘आम आदमी’ बता कर उनसे केजरीवाल की तारीफ करवाई गई। ख़ासकर जब मामला भाजपा व दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़ा हो, एनडीटीवी उसमें उनके किरदार को नकारात्मकता के साथ पेश करेगा, ऐसा तय होता है।

लेकिन, अबकी नकारात्मकता फैलाने वाले एनडीटीवी ने भी वामपंथियों को धोखा दे दिया है। एनडीटीवी ने स्वीकार किया है कि जेएनयू में हिंसा की वारदात शुरू करने में वामपंथियों का हाथ था। वामपंथी संगठन आइसा ने हिंसा की शुरुआत की। यानी, एनडीटीवी ने माना है कि इस पूरे फसाद की जड़ वामपंथी उपद्रवी हैं। पहला हमला लेफ्ट छात्रों की ओर से हुआ। एनडीटीवी की इस ख़बर से उन वामपंथियों को झटका लगना तय है, इनकी सारी उम्मीदें इस चैनल पर टिकी हुई थीं। उन्हें अप्रत्याशित तरीके से धोखा मिला है। वो शायद ही एनडीटीवी को माफ़ कर पाएँ।

एनडीटीवी ने माना है कि जब वामपंथी छात्रों ने हॉस्टल में हमला किया, तब वहाँ एबीवीपी के काफ़ी कम छात्र थे। इससे पता चल जाता है एबीवीपी से जुड़े छात्रों को किस कदर पीटा गया होगा। एनडीटीवी ने अपनी रिपोर्ट में ये भी माना है कि वामपंथियों ने वहाँ मौजूद 10 पुलिसकर्मियों से भी हाथापाई की। इसपर चुटकी लेते हुए एक ट्विटर यूजर ने लिखा- “लाजिमी है, अब वो एनडीटीवी नहीं देखेंगे!” इस पंक्ति से फैज़, एनडीटीवी और वामपंथी- तीनों पर ही निशाना साधा गया।

यहाँ तक कि एनडीटीवी की इस सूचना को एबीवीपी वालों ने भी शेयर किया। एबीवीपी ने कहा कि अब तो एनडीटीवी ने भी मान लिया है कि सारे फसाद की जड़ वामपंथी हैं। एनडीटीवी भी मान रहा है कि वामपंथियों ने एबीवीपी के कार्यकर्ताओं पर हमले करने शुरू किए। एबीवीपी ने इस ख़बर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अगर शांति स्थापित करनी है तो ये वामपंथी संगठनों को प्रतिबंधित करने का सबसे सही समय है। इससे देश के सभी विश्वविद्यालयों में शांति आएगी। एबीवीपी की राष्ट्रीय महासचिव निधि त्रिपाठी ने इस ख़बर पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा:

“अब तो एनडीटीवी भी स्वीकार कर चुका है कि हिंसा का स्रोत कम्यूनिस्ट हैं। ऐसे में, फिल्म जगत और बौद्धिक जगत के भ्रमित तथाकथित लिबरल्स को भी स्वीकार करने में कोई संकोच नही करना चाहिए कि वामपंथियों ने हिंसा की है। एबीवीपी के विषय में कल से सोशल मीडिया में जो भी भ्रामक प्रचार हुआ, एनडीटीवी की ख़बर के साथ ही उसका अंत हो चुका है।”

हालाँकि, एनडीटीवी को जल्द ही समझ में आ गया गया कि उसे क्या प्रोपेगंडा फैलाना है और उसने कई ऐसे न्यूज़ रिपोर्ट्स किए, जिसमें एबीवीपी को इस हमले के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। एबीवीपी ने संदिग्ध स्क्रीनशॉट्स के माध्यम से ऐसा दावा किया। ऐसे ही एक स्क्रीनशॉट को बरखा दत्त ने शेयर किया था। बाद में पता चला कि वो जिसे एबीवीपी का कार्यकर्ता बता कर हिंसा की साज़िश रचने का आरोप लगा रही थी, वो कॉन्ग्रेस का निकला। वो नंबर कॉन्ग्रेस से जुड़ा हुआ है, पार्टी ने भी ऐसा स्वीकार किया है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने कहा कि अब वो उस नंबर की सेवाएँ नहीं ले रहा है।

दिल्ली पुलिस ने बताया है कि कई नकाबपोशों की शिनाख्त हो गई है और क्राइम ब्रांच को मामला सौंप दिया गया है। एनडीटीवी ने पत्थरबाजी के बहाने एबीवीपी पर आरोप लगाया है। एक प्रोफेसर का बयान प्रकाशित किया गया है, जिसमें उसने कहा है कि बड़े-बड़े पत्थरों से उपद्रवियों ने हमला किया। जबकि, ऑपइंडिया से बातचीत में घायल छात्रा वेलेंटिना ने बताया कि उपद्रवी शॉल के नीचे पत्थर छिपा कर लाए थे और वो सभी वामपंथी थे। ऐसे में एनडीटीवी की ख़बर को ही आधार बनाएँ और उसे वेलेंटिना के बयान से जोड़ कर देखें तो पता चलता है कि प्रोफेसरों पर भी वामपंथियों ने ही हमला किया।

एनडीटीवी ने दावा किया है कि जब ये हमला हुआ, तब जेएनयू के सारे स्ट्रीट लाइट्स को ऑफ कर दिया गया था। वैसे, ये पहली बार नहीं है जब जेएनयू के उपद्रवियों के प्रदर्शन के दौरान स्ट्रीट लाइट्स ऑफ किया गया हो। जब हॉस्टल फी बढ़ाने को लेकर उन्होंने विरोध प्रदर्शन शुरू किया था, तब भी स्ट्रीट लाइट्स ऑफ कर दिए गए थे। इसके बाद जेएनयू के छात्रों द्वारा पुलिस पर पत्थरबाजी करने की सूचना मिली थी। हालाँकि, जेएनयू के छात्रों ने कहा था कि पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया। क्या ऐसा संभव नहीं कि दंगाई वामपंथियों ने पकड़े जाने के डर से स्ट्रीट लाइट्स ऑफ कर दिए हों?

हालाँकि, एनडीटीवी अब भले ही वामपंथियों को ख़ुश करने के लिए भाजपा व एबीवीपी को इस हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए 1000 लेख लिखे, डैमेज हो चुका है। वो कहते हैं न, सच छिपाए नहीं छिपता। शायद एनडीटीवी पर यही कहावत फिट बैठती है। एक लाइन की ख़बर ने वामपंथियों को इतना निराश किया है कि वो ‘अपने’ टीवी चैनल पर भी भरोसा करने से पहले शायद कई बार सोचें। वैसे, एनडीटीवी ने बड़ी चालाकी से एबीवीपी छात्रों द्वारा लगाए गए आरोपों व जारी किए गए सबूतों को छिपा लिया।

एनडीटीवी ने अपने एक भी लेख में उन स्क्रीनशॉट्स और वीडियो का जिक्र नहीं किया, जिसमें वामपंथियों द्वारा हमले करने की बात पता चलती है। शुक्रवार (जनवरी 3, 2020) को दोपहर में वामपंथी गुंडों ने रजिस्ट्रेशन कराने आए छात्रों की खुलेआम पिटाई की। प्रसार भारती सहित कई बड़े मीडिया संस्थानों ने अपने ट्विटर हैंडल से इस वीडियो को शेयर किया। लेकिन, एनडीटीवी ने एक बार भी इस वीडियो का जिक्र तक नहीं किया। हाँ, उसने ‘सूत्र’ के हवाले से दावा किया कि जेएनयू में पहले हमला लेफ्ट वालों ने किया।

फाइनेंशियल टाइम्स को केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने लगाई लताड़, लिखा था- हिंसक भीड़ को ‘राष्ट्रवादी’

जेएनयू में रविवार (जनवरी 6, 2020) की रात हुई हिंसा के बाद कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इस मामले पर अपनी रिपोर्टिंग की। लेकिन, इसी बीच फाइनेंशियल टाइम्स ने इस मामले को कवर करते हुए अपनी खबर को नया एंगल देने का प्रयास किया और हेडलाइन में दंगा करने वालों के लिए उपद्रवी भीड़ (Rowdy Mob), हिंसक भीड़ (Violent MOB), दंगाइयों (Rioters) की भीड़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने की बजाय ‘उत्पातियों’ को ‘राष्ट्रवादियों (nationalist)’ की भीड़ बताया।

फाइनेंशियल टाइन्स की खबर की हेडलाइन

हालाँकि, सोशल मीडिया पर एक विदेशी मीडिया द्वारा ‘राष्ट्रवादी’ शब्द का अपमान होता देख कई भारतीयों ने फाइनेंशियल टाइम्स को खरी खोटी सुनाई। लेकिन इसी दौरान भारत सरकार में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी फाइनेंशियल टाइम्स को जमकर लताड़ा।

उन्होंने नकाबपोश दंगाईयों को, जिन्होंने छात्रों और शिक्षकों पर हमला किया, उन्हें राष्ट्रवादी कहने पर विदेशी मीडिया को टैग करते हुए व्यंगात्मक लहजे में लिखा कि दुनिया भर के टैकनोलजिस्ट उस तकनीक का इस्तेमाल करने के लिए उत्सुक हैं, जिसका इस्तेमाल करके फाइनेंशियल टाइम्स ने मुँह पर नकाब ढके लोगों को ‘राष्ट्रवादी’ करार दिया।

गौरतलब है कि अपने इस ट्वीट में केंद्रीय मंत्री ने फाइनेंशियल टाइम्स को जवाब देते हुए ये भी लिखा कि भारत में हर विश्वविद्यालय और संस्थान धर्मनिरपेक्ष हैं। बता दें उन्होंने ऐसा इसलिए लिखा क्योंकि फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी हेडलाइन में लिखा था कि राष्ट्रवादियों की भीड़ ने दिल्ली स्थित सेकुलर विश्वविद्यालय पर हमला बोला।

अपने ट्वीट में फाइनेंशियल टाइम्स को लताड़ लगाते हुए प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, “मैं जानता हूँ कि तुम्हारे लिए भारत को समझना थोड़ा मुश्किल हैं। लेकिन ये एक कोशिश हैं। हर मौक़ा मिलने पर देश के टुकड़े होने की भविष्यवाणी करना बंद करो। भारत विविधतापूर्ण लोकतंत्र है और सभी मतभेदों को समाहित कर हमेशा सशक्‍त होकर उभरा है।”

इसके बाद प्रकाश जावड़ेकर ने अपने अगले ट्वीट में ही फाइनेंशियल टाइम्स की एक पुरानी रिपोर्ट की फोटो को साझा किया। साथ ही भारत के प्रति उनकी समझ और उनकी रिपोर्टिंग को निम्न स्तर का करार दिया।

बता दें, सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इसी तरह फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्टिंग की आलोचना की है और इस तरह के लेखों को बरगलाने वाला बताया है। लोगों का कहना है कि फाइनेंशियल टाइम्स जैसे मीडिया सिर्फ़ आग में घी डालने का काम करते हैं, आखिर उन्हें कैसे पता कि नकाबपोश राष्ट्रवादी थे? ऐसे संस्थानों के ख़िलाफ़ एक्शन लिया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि 5 जनवरी की शाम जेएनयू में हुई घटना के बाद और विदेशी मीडिया को जवाब देने से पहले, भाजपा नेता ने विपक्ष के हमलों का भी जवाब दिया था। जहाँ उन्होंने पूरे प्रकरण की निंदा की थी। साथ ही विपक्ष के आरोपों पर कहा था कि कॉन्ग्रेस, कम्युनिस्ट, आम आदमी पार्टी के साथ कुछ तत्व जानबूझकर देश भर में और खासकर विश्वविद्यालयों में हिंसा का माहौल तैयार करना चाहते हैं, इसलिए इसकी जाँच अच्छे से होनी चाहिए।

‘CAA के खिलाफ प्रदर्शन में मारे गए लोग शहीद की तरह, सपा की सरकार बनी तो देंगे पेंशन’

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में मारे गए लोगों के परिजनों को 5-5 लाख रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की है। अखिलेश यादव रविवार (जनवरी 5, 2019) को नागरिकता कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में मारे गए मोहम्मद वकील अहमद के परिजनों से मिलने पहुँचे और संवेदना व्यक्त की।

मोहम्मद वकील के परिजन से मुलाकात के बाद अखिलेश ने कहा कि यूपी में सीएए के खिलाफ प्रदर्शन में जान गँवाने वाले सभी लोगों की मौत पुलिस की गोली लगने से ही हुई। उनकी पार्टी हिंसा में मारे गए सभी लोगों के परिवार को 5-5 लाख रुपए का मुआवजा देगी। इस बारे में ट्वीट करते हुए अखिलेश यादव लिखा, “उत्तर प्रदेश में पुलिस की गोली का शिकार हुए मृतक मोहम्मद वकील के परिजनों का दुख-दर्द बाँटकर व परिवार को 5 लाख की आर्थिक सहायता देकर हमने मदद के हाथ बढ़ाए हैं और हमेशा बढ़ाते रहेंगे।”

अखिलेश ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि बीजेपी नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में जो कैंपेन चला रही है, वह लोगों को गुमराह करने वाला है। अखिलेश ने आरोप लगाते हुए कहा कि लखनऊ में प्रदर्शन के दौरान जान गँवाने वाले मोहम्मद वकील की मौत कैसे हुई, इसकी जाँच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मोहम्मद वकील किसी प्रदर्शन का हिस्सा नहीं था, ऐसे में उसकी मौत किसकी गोली से हुई इसकी जाँच होनी चाहिए।

अखिलेश यादव का कहना है कि मोहम्मद वकील के पिता और पत्नी को सरकार की तरफ से मदद और आवास दोनों दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवार के एक सदस्य को नौकरी के अलावा 25 लाख रूपए की आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश विधान सभा के नेता प्रतिपक्ष और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोविंद चौधरी ने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों को पेंशन देने का वादा किया है। उन्होंने कहा कि सपा की सरकार आई तो मृतकों के परिजनों को पेंशन भी दी जा सकती है। यह शहीद की तरह हैं।

अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि देश का हर इंसान नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में है। जब आधार कार्ड में सारी डिटेल्स पहले ही ली जा चुकी हैं तो एनपीआर और एनआरसी जैसी चीजों की जरूरत क्या है। अखिलेश ने कहा कि बीजेपी भी यह जानती है कि उनके द्वारा बनाया गया कानून असंवैधानिक है। 

गौरतलब है कि नागरिकता कानून के खिलाफ उत्तर प्रदेश में हिंसक प्रदर्शन हुए थे और इस दौरान हिंसा भड़कने से 19 लोगों की मौत हो गई थी। इन हिंसक प्रदर्शनों में कई पुलिसकर्मियों भी जख्मी हुए। प्रदर्शनकारियों ने इन प्रदर्शनों के दौरान सरकारी संपत्ति को काफी नुकसान पहुँचाया था।

जीवन का सबसे बुरा समय था: शेफ अतुल कोचर ने बताया कि कैसे इस्लामी-वामपंथियों ने उनका जीवन नर्क बना दिया

अक्सर वामपंथी लिबरल्स, ‘दक्षिणपंथी ट्रोल्स’ द्वारा ‘ऑनलाइन उत्पीड़न’ का शिकार होने की शिकायत करते रहते हैं, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है और सच्चाई यह है कि वामपंथी-लिबरल्स गिरोह उन लोगों के जीवन और करियर को बर्बाद करने का दमखम रखता है, जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपना विचार रखते हैं। ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं। हमने वामपंथी-लिबरलों द्वारा बुद्धिजीवियों और पत्रकारों को एक साधारण सोशल मीडिया पोस्ट के लिए निकाल दिए जाने के कई उदाहरण देखे हैं। इस लिस्ट में एक नया नाम जुड़ा है और वो नाम है- भारतीय मूल के सेलिब्रिटी शेफ अतुल कोचर का।

बता दें कि शेफ अतुल कोचर को जून 2018 में दुबई के JW Marriott Marqui होटल से बर्खास्त कर दिया गया था। दरअसल इस्लामियों और वामपंथी लिबरलों ने एक ट्वीट के लिए उन्हें निशाना बनाया था। हालाँकि कोचर ने बिना शर्त माफी भी जारी कर दी थी, लेकिन इस्लाम परस्तों की तृप्ति के लिए यह पर्याप्त नहीं था। जब दुबई के होटल ने अतुल कोचर के साथ कॉन्ट्रैक्ट समाप्त कर लिया तब जाकर वामपंथियों के कलेजे को ठंडक मिली।

शेफ अतुल कोचर का ट्वीट

शेफ अतुल कोचर को बर्खास्त किए जाने के बाद वामपंथियों का काम खत्म हो गया। वो इसे भूलकर अपने अगले टारगेट के लिए निकल पड़े, लेकिन यह घटना कोचर के लिए काफी मुश्किल भरा समय रहा। पिछले साल अगस्त में प्रकाशित एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें और उनके परिवार को उनके एक ट्वीट की वजह से मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ा था।

अतुल कोचर को इस्लामी-वामपंथियों ने कुछ विवादास्पद कहने के लिए नहीं, बल्कि एक चिर-परिचित सच्चाई बताने के लिए निशाना बनाया। दरअसल अतुल कोचर ने अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के एक ट्वीट का जवाब देते हुए लिखा था, “यह देखकर दुख होता है कि आपने उन हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान नहीं किया है जो 2000 वर्षों से इस्लाम से आतंकित हैं। शेम ऑन यू।”

प्रियंका चोपड़ा द्वारा अपने हॉलीवुड टीवी शो क्वांटिको के एक एपिसोड के खिलाफ किए गए हमले के बाद माफी माँगने के एक ट्वीट के जवाब में यह ट्वीट किया था। प्रियंका के शो में दिखाया गया था कि भारतीय राष्ट्रवादियों ने पाकिस्तानी आतंकवादियों को पकड़ने के लिए मैनहट्टन में परमाणु हमला किया था। इसके बाद से प्रियंका चोपड़ा को निशाना बनाया गया था। शो में दिखाए गए इस फिक्शनल प्लॉट ने कई भारतीयों को नाराज किया, क्योंकि यह सच्चाई से कोसों दूर था और अतुल कोचर भी उन भारतीयों में से एक था जिन्होंने इस पर नाखुशी जाहिर की थी।

बता दें कि न सिर्फ अतुल कोचर को ही वामपंथियों के ऑनलाइन बैकलेश का सामना करना पड़ा, बल्कि उनके दो स्कूल जाते बच्चे भी इसके शिकार हुए। उन्हें भी इस दौरान काफी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। जिसके बाद अतुल कोचर ने कुछ दिनों के लिए अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजा। उन्होंने बताया कि उनकी इस परिस्थिति का लाभ उनके बिजनेस प्रतिद्वंदियों ने भी उठाया, जो कि उन्हें बिजनेस से निकालना चाहते थे। वो लोग भी उनके खिलाफ गिरोह में शामिल हो गए थे। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि यह मेरे जीवन का सबसे बुरा समय था।”

अतुल कोचर ने कहा कि वह इस घटना के बाद डिप्रेशन में चले गए थे। जिससे उबरने के लिए वह और उनका परिवार कुछ समय के लिए भारत वापस आए थे। अपने इंटरव्यू के दौरान अतुल ने इस बात पर जोर डाला कि उनका ट्वीट एक मूर्खतापूर्ण गलती थी, और वास्तव में इसका मतलब वह नहीं था। 

वह यह भी कहते हैं कि उस कठिन समय के दौरान उनके मुस्लिम दोस्त उनका सबसे अधिक सपोर्ट करते थे। उन्होंने कहा कि लखनऊ के पास शाहजहाँपुर में पला-बढ़ा होने के कारण उनके कई मुस्लिम मित्र थे। साथ ही उन्होंने कहा कि अपने प्रोफेशनल करियर के दौरान उन्होंने कई अनाथ बच्चों को आर्थिक मदद देकर उनकी शिक्षा पूरी करवाई और वो सभी बच्चे मुस्लिम थे।

इस तरह के धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति होने के बावजूद, अतुल कोचर को इस्लामी-वामपंथी गिरोह ने शिकार बनाया। उन्हें सच बोलने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी, हालाँकि वह जोर देकर कहते हैं कि यह एक मूर्खतापूर्ण गलती थी और उन्हें उस संदेश को ट्वीट नहीं करना चाहिए था।

‘हिन्दुओं से आजादी’ का नारा रात के 2.15 बजे? मुंबई पुलिस की साइबर सेल ने शुरू की जाँच

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया के सामने सोमवार की आधी रात को विरोध के नाम पर जो किया गया, उस पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। कुछ का आरोप है कि वहाँ ‘हिंदुओं से आजादी’ के नारे लगे, तो कुछ का कहना है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। दोनों पक्ष अपने-अपने वीडियो शेयर कर रहे हैं। नीचे जो वीडियो है, वो सोमवार (जनवरी 6, 2019) की मध्य रात्रि 2.15 बजे की है।

बीजेपी नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने इस वीडियो को शेयर करते हुए कहा, “मुस्लिम और वामपंथी ‘हिंदुओं से आजादी’ का नारा लगा रहे हैं लेकिन इस बार यह जामिया या जेएनयू कैंपस में नहीं हुआ है बल्कि उन्होंने मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया पर यह नारा लगाया है। क्या मुंबई पुलिस और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इसके खिलाफ कोई एक्शन लेंगे या चुपचाप वो भी इन गुंडों का समर्थन करेंगे?” इस पर एक ट्विटर यूजर ने प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “बग्गा भाई, किस से एक्शन की उम्मीद कर रहे हो, जिन्होंने अपना जमीर कॉन्ग्रेस के पास गिरवी रख दिया।”

बहरहाल बताया जा रहा है कि मुंबई पुलिस ने वीडियो की जाँच-पड़ताल शुरू कर दी है। इस मामले में मुंबई पुलिस साइबर सेल वीडियो की जाँच करेगी। इस बारे में बात करते हुए डीसीपी प्रणय अशोक ने कहा, “मामले की जाँच शुरू हो गई है। मुंबई पुलिस की साइबर सेल ने घटना की जाँच शुरू कर दी है।” पुलिस की जाँच के बाद ही वीडियो की सच्चाई सामने आएगी।

वैसे ‘हिंदुओं से आजादी’ का नारा पहली बार लगा हो, ऐसा नहीं है। इससे पहले भी कई बार JNU, AMU समेत कई जगहों पर हिन्दुओं से आजादी के नारे लग चुके हैं। हैरानी की बात है कि भारत में रह कर इन लोगों को हिंदुओं से ही आजादी चाहिए। वीडियो के सामने आने पर लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं और हिन्दुओं की भावना को आहत करने के लिए इनके खिलाफ ठोस कार्रवाई की माँग की गई। रोहित भारद्वाज नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि हिन्दुओं की भावना को ठेस पहुँचाने के लिए इन्हें गिरफ्तार कर लेना चाहिए। एक यूजर ने लिखा, “ये जेहादी नक्सल इनको आजादी नहीं हिंदुओ से दिक्कत है। ये स्टूडेंट्स नहीं हैं ये राजनीतिक पार्टियों के दलाली करने वाले गुंडे हैं।”

वहीं एक यूजर ने लिखा, “मुझे लगता है कि उमर, स्वरा, कन्हैया को क्राउड मैनेजमेंट और स्लोगन क्रिएटर्स का बिजनेस शुरू कर देना चाहिए।” नेशन फर्स्ट के एक पत्रकार ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि ये सारे देशद्रोही और अर्बन नक्सल को बदला और आजादी के अलावा और कुछ नहीं दिखता है। इनमें और पाकिस्तानी जिहादियों में कोई फर्क नहीं लगता। तो वहीं देवेंद्र पटेल नाम के एक यूजर ने लिखा कि इसका विरोध कोई कॉन्ग्रेसी, लेफ्टिस, बॉलीवुड, गद्दार, गुलाम और अनपढ़ गँवार नही करेंगे।

एक यूजर ने लिखा, “कितनी शर्म की बात है कि ये अपने अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर ऐसे नारे लगाते हैं। ये उस देश में हैं, जहाँ पूरी दुनिया को स्वीकार किया गया, और इसे बताने की जरूरत नहीं, ये जिससे आजादी माँग रहे, ये उन्हीं की भूमि है और हमेशा रहेगी, आप खुद सोचिए जाना कहाँ है!”

उल्लेखनीय है कि इससे पहले कई स्थानों पर जिहादी हिन्दुओं को मिटाने के भी नारे लगते हैं, AMU में ये नारे भी लगे, “हिन्दुओं की कब्र खुदेगी AMU की छाती पर।”

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने जेएनयू में हुई हिंसा पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस पूरे वाकये को 26/11 मुंबई हमले की तरह बताया है। उद्धव का कहना है कि रविवार (कल) को जो कुछ हुआ, वह कुछ ऐसा था, जिसे हम 26/11 के बाद देख रहे हैं। सभी को पता होना चाहिए कि नकाब के पीछे कौन थे। आज के युवाओं को विश्वास में लेने की जरूरत है। युवा आज आत्मविश्वास खो रहा है।

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मीडिया से बात करते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा, “देश के छात्रों में भय का माहौल है। हम सभी को एक साथ आने की जरूरत है और छात्रों में आत्मविश्वास पैदा किए जाने की जरूरत है।”

गौरतलब है कि उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने भी इस पर अपना बयान दिया है और नकाबपोशों को आतंकवादी कहने की वकालत की है। उन्होंने कहा कि इन हमलों की वजह से देश की छवि पूरी दुनिया में खराब हो रही है। इन गुंडों को आंतकवादी कहना चाहिए, क्योंकि वे भी मुँह छिपाकर ही आते हैं। इस पर तय समय के अंदर कार्रवाई होनी चाहिए, वरना विदेश के छात्र यहाँ पढ़ने नहीं आएँगे।

इधर, महाराष्ट्र के लोक निर्माण और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक चव्हाण ने भी इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया दी और उद्धव ठाकरे से मिलता-जुलता बयान दिया। अशोक चव्हाण ने कहा कि 26/11 को जो हुआ था, वो आतंकवाद था। लेकिन जेएनयू में जो हुआ, वो आतंकित करने की कोशिश थी। उनके अनुसार 26/11 के आतंकवादी बाहर से आए थे और कल वाले यहाँ के रहने वाले हैं और आतंक फैला रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि इस घटना के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के दिग्गज नेताओं ने मोदी सरकार पर हमला बोलने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में कॉन्ग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने बयान दिया हैं। सोनिया गाँधी ने अपने एक बयान में कहा, “भारत के युवाओं और छात्रों की आवाज हर दिन दबाई जा रही है। भारत के युवाओं पर भयावह एवं अप्रत्याशित ढंग से हिंसा की गई और ऐसे करने वाले गुंडों को सत्तारूढ़ मोदी सरकार की ओर से उकसाया गया है। यह हिंसा निंदनीय और अस्वीकार्य है।”

सोनिया गाँधी ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा, “पूरे भारत में शैक्षणिक परिसरों और कॉलेजों पर भाजपा सरकार से सहयोग पाने वाले तत्व एवं पुलिस रोजाना हमले कर रही है। हम इसकी निंदा करते हैं और स्वतंत्र न्यायिक जाँच की माँग करते हैं।”

वहीं, इस मामले पर राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने कहा कि जेएनयू के छात्रों और शिक्षकों पर हुआ कायराना हमला सुनियोजित था। हिंसा का इस्तेमाल करने का मतलब लोकतांत्रिक मूल्यों को दबाने का प्रयास करना है। लेकिन वे इसमें कभी सफल नहीं हो पाएँगे। इस बीच, राकांपा के वरिष्ठ नेता और मंत्री जितेंद्र आव्हाण मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया पर जेएनयू हिंसा के विरोध में जारी प्रदर्शन में शामिल हुए।