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लिंगलहरी कन्हैया को फ़ोर्ब्स ने 20 प्रभावशाली व्यक्तियों में किया शामिल, गिराई अपनी साख

हाल ही में ‘फोर्ब्स इंडिया’ की एक सूची आई, जिसमें ऐसे 20 लोगों के बारे में बताया गया, जिन पर 2020 में नज़र रहेगी। ऐसे 20 लोग, जो इस साल ख़बरों में रहेंगे और इस वर्ष काफ़ी कुछ उन पर निर्भर करेगा। इस सूची के बारे में बता दूँ कि ये केवल भारतीय लोगों की सूची नहीं है, इसमें सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी हैं। ये युवाओं की भी नहीं है क्योंकि इसमें 55 वर्षीय बोरिस जॉनसन भी शामिल हैं। इस सूची को केवल और केवल दक्षिणपंथ को नीचा दिखाने और वामपंथी हस्तियों को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है। ये काफ़ी ‘कन्फ्यूज्ड’ लिस्ट है, जिसका आधार ही नहीं पता।

सबसे पहले तो ‘फ़ोर्ब्स इंडिया’ ने बताया ही नहीं है कि इस सूची को तय करने का आधार क्या है और इसमें शामिल लोगों को उनके किन विशेषताओं के आधार पर तैयार किया गया है? अगर इसे मीडिया में स्पेस पाने वालों की सूची कहा जाए तो इसमें शेफ गरिमा अरोड़ा नहीं होतीं। इसमें मोहम्मद बिन सलमान को देख कर लगता है कि ये दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों की सूची हो सकती है लेकिन फिर प्रशांत किशोर और दुष्यंत चौटाला सरीखे नेताओं को देख कर लगता नहीं कि इसका अंतरराष्ट्रीय राजनीति से कोई लेना-देना है।

इस सूची को अगर इस आधार पर तैयार किया है कि इसमें केवल ‘Underrated’ लोग ही शामिल हों, अर्थात ऐसे लोग जिन्हें मीडिया स्पेस और चर्चा ज्यादा नहीं मिली, तो भी ये त्रुटिपूर्ण है। अगर ऐसा होता तो इसमें सालों भर मीडिया में बनी रहने वाली ग्रेटा थन्बर्ग और अमेरिका की सोशल मीडिया में लोकप्रिय नेता एलेक्जेंड्रिया (AOC) नहीं होतीं। अगर ये नेताओं की सूची है तो इसमें आदित्य मित्तल और गोदरेज परिवार को जगह नहीं मिलती। आइए, अब आपको बताते हैं कि इस सूची को किस आधार पर तैयार किया गया है? इसका एक ही आधार है- दक्षिणपंथ का विरोध।

इस सूची में कन्हैया कुमार क्यों हैं? फोर्ब्स इंडिया ने भी उनके चुनाव हारने का जिक्र किया है। भाजपा के फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह ने उन्हें 4.22 लाख मतों से हराया। ये सब तब हुआ, जब कन्हैया के लिए गुजरात के नेता जिग्नेश मेवानी ने कई दिनों तक कैम्प किया था। उनके लिए बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने प्रचार किया था। कन्हैया के लिए जावेद अख्तर और शबाना आज़मी जैसी हस्तियों ने काफ़ी प्रचार किया था। इन सबके बावजूद कन्हैया को 34% मतों से बुरी हार मिली। फिर भी उन्हें इस सूची में जगह क्यों दी गई?

फोर्ब्स इंडिया का एक अजीबोगरीब तर्क ये है कि हारने के बावजूद कन्हैया कुमार 22.03% वोट पाने में कामयाब रहे। क्या यही वो काबिलियत है, जो किसी व्यक्ति को उस सूची में शामिल कर दे, जिसमें सऊदी अरब, न्यूजीलैंड और यूके के राष्ट्राध्यक्ष हैं? भारत की 543 संसदीय क्षेत्रों में एक में हारने वाले व्यक्ति को मोहम्मद बिन सलमान जैसे शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय नेता के साथ एक ही सूची में डाला गया। कन्हैया कुमार को 22.03% वोट मिले ये तो बताया गया है लेकिन उनके हार का अंतर इसके डेढ़ गुना से भी ज़्यादा अर्थात 34.45% था, ये बड़ी चालाकी से छिपा लिया गया है।

इसके बाद फोर्ब्स इंडिया ने ‘राजनीतिक विश्लेषकों’ के हवाले से कन्हैया कुमार को लेकर बड़े दावे किए हैं। वो सरकार के ख़िलाफ़ बोलते हैं, सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं और पूरे देश में लगातार अपने विचार रखते रहते हैं- ये वो तीन काबिलियत की चीजें हैं, जिन्होंने कन्हैया को इस सूची में डाल दिया। इन काबिलियतों का जिक्र फोर्ब्स ने भी किया है। अगर ये तीनों विशेषताएँ ही फोर्ब्स की सूची में जगह पाने के लिए चाहिए, तब तो स्वरा भास्कर, अनुराग कश्यप, उदित राज, फरहान अख्तर, सीताराम येचुरी, रामचंद्र गुहा और यशवंत सिन्हा के साथ तो बड़ी नाइंसाफी हुई है।

कन्हैया कुमार का प्रभाव अब इतना ही रह गया है कि ख़ुद सीपीआई उनसे प्रचार नहीं करवाती। वो ‘फ्रीलान्स प्रचारक’ बन कर दूसरे दलों के लिए प्रचार करते फिरते हैं। वो सीपीआई की ही बड़ी बैठकों और आन्दोलनों में नहीं देखे जाते हैं। जिस व्यक्ति को उसकी अपनी पार्टी भी नहीं पूछ रही है, उसे फ़ोर्ब्स इंडिया ने इतनी बड़ी सूची में लाकर रख दिया। इस हिसाब से तो वामपंथी पोलित ब्यूरो के सभी सदस्य इस सूची में आ जाने चाहिए थे। फोर्ब्स इंडिया लिखता है कि कन्हैया अच्छा बोलते हैं। अगर ‘अच्छा बोलना’ ही वो काबिलियत है तो फिर कुमार विश्वास और राहत इंदौरी को इस सूची में टॉप-5 में होना चाहिए था।

अब आइए बताते हैं कि इस सूची को कैसे तैयार किया गया। फोर्ब्स इंडिया के पैनल ने भाँग में ताड़ी मिला कर पी लिया और फिर वो इसे तैयार करने बैठे। इसमें जितने भी भारतीय हैं, उन्हें क्यों शामिल किया गया, आइए हम बताते हैं।

  • गोदरेज परिवार: बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के प्रस्तावित रास्ते में अपना इंफ़्रास्ट्रक्चर आने से गोदरेज समूह ने इसमें अड़ंगा लगाया। जुलाई 2019 में आदि गोदरेज ने बयान दिया था कि देश में हेट क्राइम बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा था कि असहिष्णुता के कारण आर्थिक विकास पर असर पड़ रहा है। मोदी के ख़िलाफ़ लगातार बयान देने के कारण गोदरेज परिवार को इस सूची में शामिल किया गया।
  • हसन मिन्हाज: कॉमेडियन हसन ने दावा किया था कि इन्हें अमेरिका में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में जाने से रोक दिया गया था। वो अक्सर पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का मज़ाक बनाने के लिए जाने जाते हैं। इसीलिए, इन्हें शामिल किया गया।
  • कन्हैया कुमार: मोदी के ख़िलाफ़ ट्वीट करना और हिंदुत्व को लेकर ज़हरीले बयान देने वाले कन्हैया को इस सूची में सीलिए शामिल किया गया, क्योंकि वामपंथ नेताओं की कमी से जूझ रहा है। कहावत है न- अँधों में काना राजा।
  • महुआ मोइत्रा: कॉन्ग्रेस से तृणमूल में गई महुआ संसद में सरकार के ख़िलाफ़ मुखर रहती हैं। उन्होंने मोदी सरकार पर फासिज्म का आरोप लगाते हुए 7 पॉइंट्स गिनाए थे। उनकी इसी ‘फासिज्म स्पीच’ के कारण फोर्ब्स ने उन्हें जगह दी है।
  • गरिमा अरोड़ा: इस सूची में एक ऐसा नाम डाल दिया गया है, जिनके बारे में बहुतों को नहीं पता। गरिमा एक काफ़ी टैलेंटेड शेफ हैं लेकिन कन्हैया जैसों के साथ उन्हें इस सूची में डाला गया है ताकि लिस्ट विश्वसनीय लगे। इसे ‘न्यूट्रल’ दिखाने के लिए ऐसा किया गया है।
  • प्रशांत किशोर: इनकी कम्पनी अरविन्द केजरीवाल, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी जैसों का चुनावी कामकाज देख रही है। ऐसे में, उनका इस सूची में होना आश्चर्य पैदा नहीं करता क्योंकि अंदरखाने से मोदी विरोध की रणनीति तैयार करने वालों में वो अव्वल हैं।
  • दुष्यंत चौटाला: हरियाणा में किंगमेकर बन कर उभरे हैं और भाजपा सरकार का हिस्सा हैं। लोगों को लगता है कि वो किसी भी तरफ़ जा सकते हैं, इसीलिए मोदी-विरोधियों को उनसे उम्मीदें हैं। उन्हें हरियाणा का ‘नीतीश कुमार’ बना कर पेश करने का प्रयास चल रहा है।
  • आदित्य मित्तल: दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपतियों में से एक है, जो सुर्ख़ियों में रहना पसंद नहीं करते। 43 वर्षीय मित्तल को इस सूची में डाला गया है। वो लक्ष्मी निवास मित्तल के उत्तराधिकारी हैं।

हमने देखा कि भारतीय अथवा भारतीय मूल के 8 लोगों में से 4 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर आलोचक हैं। एक उद्योगपति हैं, जिन्होंने मोदी के ख़िलाफ़ लगातार बयान दिया है। 2 मीडिया में चर्चित न रहने वाले चेहरे हैं और 1 ऐसा चेहरा है, जिससे उम्मीदें हैं कि वो मोदी के ख़िलाफ़ जा सकता है। दक्षिण में भाजपा का युवा चेहरा बन कर उभर रहे तेजस्वी सूर्या, कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष को उनके ही गढ़ में हराने वाली स्मृति ईरानी और ओडिशा के ग़रीब परिवार से आने वाले केन्दीय मंत्री प्रताप सारंगी जैसे सैंकड़ों चेहरे हैं, जिन्होंने इस वर्ष कमाल किया और अगले वर्ष भी उनसे उम्मीदें रहेंगी। लेकिन, फोर्ब्स इंडिया ने एक भी, एक भी ऐसे व्यक्ति को इसमें जगह नहीं दी- जो दक्षिणपंथ से जुड़ा हो।

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JNU हिंसा: ABVP नहीं, कॉन्ग्रेस का इकोसिस्टम आया सामने, चैट वायरल होने के बाद सबसे बड़ा खुलासा

रविवार शाम नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में नकाबपोश गुंडों की भीड़ ने ताबड़तोड़ लाठी, डंडे, रॉड चलाए जिससे परिसर में हिंसा के बीच अफरातफरी का माहौल रहा। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से जारी एक बयान के मुताबिक शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पंजीकरण कराने आए छात्रों को विरोध करने वाले प्रदर्शनकारी छात्रों के समूह ने उन्हें रजिस्ट्रशन करने से रोका तथा यहाँ कार्यरत कर्मचारियों को जबरन बाहर निकाल दिया था और इसी के साथ सर्वर को निष्क्रिय कर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को बाधित किया था।

दरअसल इस साल अक्टूबर से जेएनयू में कुछ छात्र हॉस्टल फीस में वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। जो कि आखिर में आंशिक रूप से वापस हो गया था। लेकिन इसके बाद भी छात्रों ने तभी से कक्षाओं को चलने नहीं दिया है। वहीं 1 जनवरी से विश्वविद्यालय ने शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पंजीकरण करना शुरू कर दिया था। लेकिन ज़्यादातर वामपंथी छात्रों द्वारा लगातार हो रहे हिंसक प्रदर्शनों को देखकर लगता है कि आंदोलनकारी छात्र विश्वविद्यालय में सामान्य स्थिति में वापस आने से बहुत खुश नहीं थे। जिससे विश्वविद्यालय का माहौल जल्द ही हिंसक रूप ले लिया। जिसमें लेफ्ट और ABVP एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे।

हिंसा भड़कने के तुरंत बाद व्हाट्सएप पर हुई बातचीत के स्क्रीनशॉट्स का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर गोलबंदी शुरू करने के लिए बखूबी किया गया। इस बातचीत के एक हिस्से को विवादित पत्रकार बरखा दत्त ने रविवार देर रात ट्वीट करके सोशल मीडिया पर साझा किया। जिसमें यूजर आनंद को ग्रुप के अन्य सदस्यों से पूछते हुए देखा गया कि जेएनयू के समर्थन में कुछ लोग मुख्य द्वार पर आ रहे हैं क्या हमें वहाँ कुछ करना है?

यह मैसेज ‘यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट’ नामक ग्रुप का था। जिसका अर्थ था कि संदेश भेजने वाला लेफ्ट के खिलाफ था। इसलिए माना गया कि इस पर एबीवीपी और राष्ट्रीय सेवा संघ के छात्रों का हाथ है। वास्तव में जेएनयू में हिंसा भड़कने के बाद से कुछ छात्र यह प्रचार करने और शोर मचाने में व्यस्त रहे कि हिंसा करने वाले एबीवीपी के गुंडे थे।

यहाँ यह बताना बेहद जरूरी है कि दिसंबर 2019 के आखिरी सप्ताह में लिबरल, वामपंथी-कॉन्ग्रेसी गुट ने सीएए के ख़िलाफ दंगाइयों को मास्क पहन कर पहचान छुपाने के तरीके सुझाए थे। ताकि पुलिस द्वारा उनकी सही और आसानी से पहचान न हो सके। यही कारण था कि रविवार की रात जेएनयू कैंपस के अंदर हिंसा में शामिल अधिकांश हथियार धारी गुंड़ों ने अपनी पहचान को छुपाने के लिए नकाब पहन कर खुद को ढक रखा था।

‘Thequint’ ने बाकायदा इस पर पूरा मार्गदर्शन किया था दंगाईयों और हिंसा करने वालों का, जिसे आप उनके लेख में देख सकते हैं। यहाँ तक की फेसिअल रिकग्निशन सॉफ्टवेयर से बचने के भी टिप्स दिए गए हैं।

वहीं बरखा दत्त ने अनजाने में ट्विटर पर जो मोबाइल नंबर साझा किया वह आनंद मंगनाले की थी। उस नंबर की जब जाँच पड़ताल की गई तो पता चला कि यह वही मोबाइल नंबर थी जिसे कॉन्ग्रेस ने क्राउडफण्डिंग के लिए इस्तेमाल किया था।

हालाँकि, इस पेज को बंद कर दिया गया। वैसे आपको बता दें कि आनंद मंगनाले ने पहले जेडीयू के प्रशांत किशोर के साथ काम किया था। वहीं उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा चुनाव से पहले यानि कि वर्ष 2016 में पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के लिए भी रणनीतिकार के रूप में काम किया था। हालाँकि, यह साफ़ नहीं हो सका कि राहुल गाँधी के इमेज मेकओवर के लिए मंगनाले टीम का हिस्सा रहा या नहीं।


Anand Mangnale saying how the VC is ‘ours’

व्हाट्सएप पर बातचीत के ऐसे और भी कई स्क्रीनशॉट सामने आए जहाँ आनंद ने ‘भारत माता की जय’ जैसै कोटेशन को अपने नाम के साथ जोड़ा था ताकि यह दिखाई दे कि वह दक्षिणपंथ का समर्थन करता है।

आनंद ने व्हाट्सएप ग्रुप ‘यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट के सदस्यों से पूछा था कि ‘गेट पर क्या किया जाना चाहिए क्योंकि मन में था कि कुछ किया जाना चाहिए’। जेएनयू हिंसा के बाद शुरुआत में ही कॉन्ग्रेस का लिंक सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस ने जल्द ही आनंद से अपने को अलग करने की कोशिश की और अपने साथी को एक झटके में त्याग दिया और आनन-फानन में कॉन्ग्रेस द्वारा देर रात एक ट्वीट करके कहा गया कि यह संख्या एक निजी वेंडर की है जिसे उन्होंने लोकसभा चुनाव के लिए काम पर रखा था लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया था।

हालाँकि यह पहले ही हमने बताया था कि कॉन्ग्रेस ने आनंद के नंबर का इस्तेमाल क्राउडफंडिंग के लिए किया था। यहाँ तक कि आनंद अभी भी कॉन्ग्रेस और कॉन्ग्रेस के नेताओं के लिए क्राउडफंडिंग का ही एक हिस्सा हैं। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव वल्लभ के लिए धन की डिमांड करने वाला यह ट्वीट नवंबर वर्ष 2019 का है।

हालाँकि, जेएनयू हिंसा के समन्वय समूह में कॉन्ग्रेस के साथ आनंद के संबंध सामने आने के बाद आनंद ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से स्पष्टीकरण भी दिया। अपने बचाव में, आनंद ने दावा किया कि उसने और जानकारी जुटाने के लिए कई “दक्षिणपंथी ग्रुप में घुसपैठ” की है। वाह…। कॉन्ग्रेस के क्राउडफंडिंग के प्रचारक भी एसीपी प्रद्युम्न की दोहरी भूमिका में आ गया है।

आनंद ने दावा किया कि जब ग्रुप में थोड़ी शांति हुई तो उसने यह पूछकर उसने उन्हें भड़काने की कोशिश की कि मुख्य द्वार पर क्या होना है क्योंकि वह जानना चाहता था कि लोग कहाँ हैं और उनकी योजना क्या है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि मंगनाले न तो जेएनयू का छात्र है और न ही कोई जाँच अधिकारी।

उसके द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण यह बताता है कि ग्रुप वास्तव में एबीवीपी और दक्षिणपंथी छात्रों द्वारा कैंपस में होने वाली हिंसा रोकने के लिए बनाया गया था। हालाँकि ऐसा लगता नहीं है।

एक ट्विटर यूजर ‘Gujju_Er’ ने एक ही व्हाट्सएप ग्रुप के कई स्क्रीनशॉट्स को पोस्ट किया जिसमें अत्यधिक डरा देने वाले तथ्य सामने आए। दरअसल व्हाट्सएप में एक सुविधा है जहाँ कोई भी व्यक्ति एक लिंक भेजकर ग्रुप में शामिल होने के लिए सार्वजनिक तौर पर आमंत्रित कर सकता है। कुछ ऐसा ही दूसरे स्क्रीनशॉट में देखा गया कि आनंद ने शामिल होने के लिए आमंत्रित लिंक पर क्लिक करके व्हाट्सएप ग्रुप में शामिल नहीं हुआ। लेकिन जब इस ग्रुप को बनाया गया था तो उसे ग्रुप के एडमिन द्वारा जोड़ा गया था।

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इसका मतलब है कि आनंद ने ‘दक्षिणपंथी गतिविधियों’ पर नज़र रखने के लिए ग्रुप में घुसपैठ नहीं की बल्कि उसे एक ऐसे ग्रुप का हिस्सा बनाया गया था। जिसे ‘लेफ्ट-विरोधी’ के रूप में पेश किया गया था। इसीलिए उन्होंने लेफ्ट-विरोधी संदेशों को हिंसा भड़काने के लिए पोस्ट किया था ताकि जब स्क्रीनशॉट चुनिंदा रूप से जारी किए जाएँ तो यह ‘राइट विंग’ और एबीवीपी के छात्रों द्वारा सुनियोजित हिंसा की तरह दिखाई दे।

गुज्जू_ईआर द्वारा साझा किए गए तीसरे स्क्रीनशॉट में, एक कॉन्ग्रेस का आनंद, उबैद और एक बुल्ला आदिल के बीच बातचीत देख सकते हैं, जो चर्चा कर रहे हैं कि मुख्य द्वार पर क्या किया जा सकता है जहाँ जेएनयू समर्थक आने वाले थे। अब “उबैद” और “बुल्ला आदिल” एबीवीपी के कार्यकर्ता तो हो नहीं सकते। इससे पहले कि उनके कॉन्ग्रेस कनेक्शन सामने आते आनंद जेएनयू परिसर के अंदर से ही लाइव अपडेट ट्वीट करते रहे। जबकि उस समय जेएनयू में हिंसा हो रही थी।

यदि वह छात्र नहीं है या फिर सुरक्षा एजेंसियों के साथ नहीं है, तो फिर कॉन्ग्रेस का क्राउडफंडिंग अभियान समन्वयक क्या था? जो हिंसा फैलने पर कैंपस में ‘अपनी गतिविधियों पर नजर रखने’ के लिए ‘दक्षिणपंथी व्हाट्सएप ग्रुपों’ में घुसपैठ भी कर रहा था? खासकर जब उनकी खुद की बातचीत हिंसा भड़काने जैसी हो रही हो। आनंद आगे टी पॉइंट के बारे में कहता है कि जहाँ छात्र सुरक्षित महसूस करने के लिए एकत्र हुए थे। अब यह ‘टी पॉइंट’ कहीं और ही दिखाई देता है।

जेएनयू के छात्र, द वायर और द क्विंट के स्तंभकार ने फेसबुक पर कहा था कि लगभग 8 बजे उसने और उसके सहयोगियों ने हेलमेट पहना और गुंडों का पता लगाने के लिए हॉस्टल के पास घूमने लगे। उसका कहना है कि मुख्य गेट के पास पुलिस का नियंत्रण था। पुलिस छात्रों को हॉस्टल में वापस जाने के लिए कहती है इस बात को इमाम ने अपनी पोस्ट में लिखा है। इसलिए ध्यान में आता है कि इमाम और मंगनाले लगभग एक ही समय पर साबरमती हॉस्टल के टी-पॉइंट पर थे।


Sharjeel Imam, The Wire columnist and JNU student who was one of the organisers of Shaheen Bagh anti-CAA protests and had called for a ‘chakkajam’ in north Indian cities by Muslims.

शर्जील इमाम वही व्यक्ति है जो जेएनयू में संविधान को जलाना चाहता था और राम जन्मभूमि के फैसले के बाद कैंपस में ‘संविधान जलाने का समारोह‘ करना चाहता था। वह नई दिल्ली के शाहीन बाग में सड़क को जाम करने वाले लोगों में से भी एक था। यहीं सीएए के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने धरना दिया था। इमाम ने शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शनों को ‘हांगकांग शैली’ में आयोजित किया था। दरअसल हांगकांग के प्रदर्शनकारी हांगकांग सरकार द्वारा भगोड़े अपराधियों के संशोधन बिल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। यहाँ भी प्रदर्शनकारियों ने बड़े पैमाने पर मुखौटे, हेलमेट का उपयोग खुद को आंसू गैस के गोलों से और साथ ही अपने चेहरे को छिपाने के लिए किया था।


Hong Kong protestors wearing masks (image: vox.com)

JNU हिंसा में शामिल गुंडों ने भी क्विंट के बताए रास्ते पर चलते हुए वैसे ही मास्क पहना है।

JNU हिंसा में वैसे ही मास्क पहने हुए गुंडे

जेएनयू हिंसा में कॉन्ग्रेस कैसे शामिल है? इस पर एक नज़र डालें तो कॉन्ग्रेस की छात्र शाखा, एनएसयूआई पहले से ही सीएए विरोधी प्रदर्शनों को आयोजित करने में शामिल थी जो कि बाद में हिंसक हो गई थी। व्हाट्सएप ग्रुप का नाम ‘यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट’ रखा जाता है। और बातचीत में शामिल लोग कॉन्ग्रेस से जुड़े हैं। इस बात का अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं कि क्या “उबैद” और “बुल्ला आदिल” कभी एबीवीपी ग्रुप का हिस्सा हो सकते हैं।

यदि ये फर्जी ग्रुप हैं जो आपस की बातचीत के स्क्रीनशॉट को साझा करने के लिए बनाए गए हैं, जो कि जेएनयू हिंसा को अंजाम देने की वास्तविक बातचीत का दिखावा तो खुद करते हैं और दोष ABVP पर डालते हैं। निश्चित रूप से इस हिंसा से एबीवीपी को तो कोई फायदा नहीं है। किसको है ये आप सभी को पता है? कौन है जो देश में अराजकता, हिंसा और दंगे की स्थिति पैदा करना चाहता है? अब देखना यह होगा कि भारत में अराजकता पैदा करने के लिए कॉन्ग्रेस और वामपंथियों का यह इकोसिस्टम कितनी दूर तक जाएगा?

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उस रात लुटियन मीडिया होती तो हत्या खबर न होती, सरदार की गालियों पर प्राइम टाइम होता

वाजपेयी की सत्ता से विदाई को दो साल से ज्यादा हो गए थे। केंद्र में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार ​थी। उस राज्य की सत्ता पर भी पिछले दरवाजे से कॉन्ग्रेस आ गई थी। मुख्यमंत्री एक निर्दलीय हुआ करता था। उस शहर से तीन बड़े हिंदी अखबारों के संस्करण निकलते थे। शहर से बाहर निकलते ही रेड कॉरिडोर शुरू हो जाता था। उन दिनों करीब-करीब पूरा राज्य ही रेड कॉरिडोर था।

रात के करीब 9 बज रहे थे। वह रिपोर्टर अपनी खबरें फाइल कर निकलने की तैयारी में था। संपादक ने इशारों से केबिन में बुलाया। एक गाँव का नाम बताया। कहा सूचना मिली है कि नक्सलियों ने मुखबिरी के आरोप में एक ग्रामीण का गला रेत लाश टाँग दिया है। रात हो गई है इसलिए पुलिस सुबह जाएगी। यह खबर किसी के पास नहीं है (छोटे शहरों में जब जोखिम वाले मोर्चे पर रिपोर्टरों को लगाया जाता है तो कान में संपादक यही मंत्र फूँकता है। चंद हजार रुपए पाने वाला रिपोर्टर यह सुनते ही बड़ा पत्रकार बनने के सपने देखने लगता है)। तुरंत निकलिए। 2 बजे तक लौट आइएगा। सिटी एडिशन का लीड यही है। फिर फोटोग्राफर बुलाया जाता है। उसे निकलने का हुक्म मिलता है। संपादक जी अपनी एंबेसडर कार और ड्राइवर के साथ दोनों को भेजते हैं।

करीब डेढ़ किमी एंबेसडर चलती है तो हाइवे आ जाता। कार उस मशहूर ढाबे के पास रुकती है। अंदर घुसते ही रिपोर्टर की नजर एक टेबल पर बैठे प्रतिद्वंद्वी अखबार के रिपोर्टर पर पड़ती है। रिपोर्टर और फोटोग्राफर उनसे नजरें बचाकर टेबल खोजते हैं। जल्दी-जल्दी खाना निपटाकर बाहर निकलते हैं। पान की दुकान पर पहुँचते हैं। वहाँ पहले से ही वे मौजूद होते हैं जिनसे रिपोर्टर होटल में छिप रहा था। अब कहाँ भागे? इतनी देर में तीसरे अखबार के रिपोर्टर और फोटोग्राफर भी न जाने कहाँ से वहीं धमक पड़ते हैं।

5-10 मिनट के टालमटोल के बाद तीनों रिपोर्टर फूट पड़ते हैं। पता चलता है सब एक ही मोर्चे पर ​जा रहे हैं। संपादक ने फिर से ले ली है। बड़े पत्रकार बनने का सपना टूट जाता है। अब चर्चा इस बात पर होती है कि हम कहाँ जा रहे हैं। कितने जोखिम में जा रहे हैं। फिर तीनों अखबार की गाडियाँ साथ चलती हैं। हाइवे पर कुछ किमी चल गाड़ियाँ नीचे उतरती हैं। घुप्प अंधेरा। सर्द रात। तीन गाड़ियाँ। 9 सवार। कहीं कोई आहट नहीं।

रास्ते में अर्धसैनिक बल का एक कैंप होता है। उन्हें दूर से ही शायद दिख गया था कि तीन गाड़ियाँ एक साथ आ रही है। वे पहले से तैयार थे। गाड़ियॉं करीब आते ही तेज रोशनी के बीच चारों तरफ से संगीनों से घेर लेते हैं। गाड़ी से ही फोटोग्राफर कैमरा बाहर निकालकर हिलाता है। जवान जब हर तरीके से संतुष्ट हो जाते हैं तो सबको बाहर निकलने को कहा जाता है। उनका एक अधिकारी सामने आता है। वे थे सरदार जी। उन्होंने न कुछ पूछा, न कुछ जाना। नॉन स्टॉप गालियों की बौछार। माँ-बहन की। ठेठ पंजाबी में। फिर इतनी रात आने का कारण जाना। एक राउंड और गालियों की बौछार चली। फिर इस धमकी के साथ आगे बढ़ने को कहा- सालों खुद तो मरने आते ही हो किसी दिन हम सबको भी लेकर मरना। लौटते वक्त इस रास्ते से न आना। अगली बार पूछूँगा नहीं, सीधे ठोकूँगा।

गाड़ियॉं आगे बढ़ती हैं। गॉंव में पहुँचती हैं। एक पेड़ के पास पेट्रोमेक्स जलाकर कुछ लोग बैठे हैं। लाश टँगी है। वहाँ बैठे लोग सुबह का इंतजार कर रहे हैं। पुलिस आएगी तो लाश उतरेगी। पहले उतार लिया तो कल पुलिस अलग से पेलेगी। रिपोर्टर गाड़ी से उतरते हैं। वहाँ बैठे लोगों से मरने वाले का नाम वगैरह पूछते हैं। मोटी-मोटी जानकारी लेते हैं। फोटोग्राफर तेजी से तस्वीरें लेने लगते हैं। सब जल्दी में। फटाफट निपटे काम और भागे यहाँ से। जल्दबाजी में गाड़ी बैक करते समय एंबेसडर का फ्यूल टैंक वहाँ रखे किसी पत्थर से रगड़ खाता है। फ्यूल रिसने लगता है। ड्राइवर को पता भी नहीं चलता। उसे इसकी भनक रास्ते में लगती है। तय किया गया कि गाड़ी लेकर ड्राइवर अर्धसैनिक बल के कैंप के पास रुक जाएगा। रिपोर्टर और फोटोग्राफर दूसरे अखबार की गाड़ी से निकल लेंगे। ड्राइवर सुबह गाड़ी ठीक करवाएगा और लौटेगा।

लेकिन, कैंप के पास जैसे ही गाड़ियॉं पहुँचती हैं फिर तेज रोशनी और संगीनों से ही स्वागत होता है। इस बार, सरदार जी फट पड़ते हैं। एक फोटोग्राफर को (उसे होशियारी का सबसे ज्यादा भ्रम था) दो-चार जड़ देते हैं। एंबेसडर पार्क नहीं करने देते। बोलते हैं इसके साथ ही तुम लोगों को भी फूँक दूँगा। गालियों का ऐसा राउंड जो लिख नहीं सकता। पिट-पिटाकर कर तीनों गाड़ियाँ आगे बढ़ती हैं। पर कुछेक सौ मीटर के बाद एंबेसडर आगे बढ़ने से इनकार कर देती है। एंबेसडर में सवार तीनों फटाक से बाहर निकलते हैं और दूसरी गाड़ी में सवार हो जाते हैं। कोई पीछे मुड़कर नहीं देखता है। खौफ की जवानों ने रुका देखा तो अब गोली ही मारेंगे।

अगली सुबह तीनों अखबार के सिटी एडिशन की लीड होती है यह खबर। किसी को पता भी नहीं चलता कि खबर किसकी है। असल में रिपोर्टरों के लौट आने के बाद संपादकों को पता चल गया होता है कि दूसरे के आदमी भी वहॉं थे। अब संपादक जी बाइलाइन देने से तो रहे। उन्हें अब यह पता करना है कि उनकी एक्सक्लूसिव सूचना रिपोर्टर और फोटोग्राफर में से किसने लीक की।

जेएनयू में उपद्रव के बाद से ही कुछ साथियों को लगातार सोशल मीडिया में लिखते देख रहा हूँ कि मुझे देशद्रोही कहा। मेरा मोबाइल छीन लिया। फोटो डिलीट करवा दी। पुलिस देखती रही। पुलिस ने कुछ नहीं किया। एक तरह से खुद को विक्टिम दिखाना। पुलिस-प्रशासन को विलेन बताना। असल में हालात कुछ ऐसे होते हैं कि कभी-कभी प्रशासन भी मजबूर हो जाता है। उन सरदार जी की बौखलाहट समझी जा सकती है। ऐसी ही गाड़ियों में नक्सली भी आते होंगे। घात लगाकर जवानों को मार जाते होंगे।

ये घटना केवल इसलिए बताई कि आप जान सकें कि महानगरों के बड़े पत्रकार जिन चीजों पर इतना शोर मचा लेते हैं, वे छोटे शहरों के पत्रकारों की आपबीती के सामने कुछ भी नहीं होते। लेकिन, वहाँ इन घटनाओं को लेकर इतना विलाप नहीं होता। कभी-कभी सोचने लगता हूँ कि उस रात ये सब होते थे तो उस ग्रामीण की लाश टँगी तस्वीर न छपी होती। छपती उस सरदार और उसके जवानों की फोटू! नक्सलियों द्वारा ग्रामीण का गला रेतना अखबार के किसी भीतरी पन्ने पर दबा होता है। लीड होती वे गालियाँ और उन रिपोर्टरों की चाशनी में लिपटा प्रोपेगेंडा।

पर क्या तब भी मनमोहन-सोनिया को उतनी ही गाली पड़ रही होती, जिस तरह आज मोदी-शाह की जोड़ी को गिरोह ने निशाने पर ले रखा है! शायद नहीं। क्योंकि छोटे शहरों के उन खबरनवीसों को खुद को खबर बनाकर बेचने की कला नहीं आती थी। ये खबरनवीस उन्हीं अखबारों में काम करते हैं, खबर निकालते हैं, जिन्हें पढ़ने के लिए आपको रवीश कुमार रोकते हैं।

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₹7.73 करोड़ के लैंड डील मामले में जूनियर चिदंबरम दम्पति को कोर्ट से राहत नहीं, IT विभाग करेगा कार्रवाई

चेन्नई की विशेष अदालत ने पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम को राहत देने से इनकार कर दिया है। कार्ति और उनकी पत्नी श्रीनिधि ने चेन्नई में ‘सांसदों एवं विधायकों के लिए विशेष अदालत’ में याचिका दायर कर के उन्हें इनकम टैक्स विभाग की जाँच में राहत दिलाने की अपील की थी। वित्तीय वर्ष 2015-16 में जूनियर चिदंबरम दम्पति ने अपनी कुल आय छिपाई थी और टैक्स देने से बचने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए थे। मुत्तुकादु में एक ज़मीन की बिक्री के बाद कार्ति को 6.38 करोड़ रुपए और उनकी पत्नी श्रीनिधि को 1.35 करोड़ रुपए कैश में प्राप्त हुए थे।

चेन्नई की स्पेशल कोर्ट ने जूनियर चिदंबरम दम्पति के ख़िलाफ़ चल रही इनकम टैक्स विभाग की जाँच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इस आदेश के साथ ही आईटी डिपार्टमेंट अपनी जाँच जारी रखेगा और दोषी पाए जाने पर कार्ति व श्रीनिधि के ख़िलाफ़ कार्रवाई का रास्ता साफ़ हो जाएगा। ये मामला ‘एडवांटेज स्ट्रेटेजिक कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड’ से जुड़ा है। आईटी विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने तलाशी के दौरान कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जब्त किया था। उन उपकरणों और उनसे मिले डेटा को दोनों जाँच एजेंसियों ने कोर्ट में पेश किया था।

कॉन्ग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम के पिता पी चिदंबरम हाल ही में साढ़े तीन महीने से भी अधिक जेल में समय बिता कर बाहर निकले हैं। तिहाड़ में उनसे मिलने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से लेकर कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी तक पहुँचे थे। कार्ति और उनकी पत्नी के ख़िलाफ़ सितम्बर 2018 में मामला दर्ज किया गया था। इस मामले को विशेष अदालत को स्थान्तरित कर दिया गया था। अभी इस मामले में ट्रायल चल रही है। कुल मिला कर ये मामला 7.73 करोड़ रुपए का है। कार्ति आईएनएक्स मीडिया केस और एयरसेल-मैक्सिस केस में भी अपने पिता के साथ आरोपित हैं।

कई मामलों में कोर्ट की कार्यवाही का सामना कर रहे कार्ति जेएनयू और सीएए पर मोदी सरकार को घेरने में जुटे हुए हैं। उन्होंने जेएनयू में वामपंथी गुंडों की हिंसा के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए इसकी तुलना 1938 के नाजी अत्याचार से की, जिसमें यहूदियों का नरसंहार किया गया था। ‘क्रिस्टल नाईट ऑफ ब्रोकन ग्लास’ प्रोग्राम में क़रीब 100 यहूदियों को मार डाला गया था। कार्ति ने आरोप लगाया कि पूरी दुनिया में फासिस्ट और तानाशाही ताक़तें दक्षिणपंथी संगठनों के माध्यम से अपने आलोचकों पर अत्याचार करती है।

उन्होंने दावा किया कि जेएनयू में हिंसा करने वाले नकाबपोश भाजपा द्वारा भेजे गए थे। उन्होंने कहा कि जो लोग भाजपा का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें वास्तविकता का भान नहीं है। उन्होंने ‘सरकार समर्थिक गुंडों’ द्वारा आतंक फैलाने जाने का दावा किया। बता दें कि जेएनयू हिंसा में वामपंथी गुंडों का हाथ होने के कई वीडियो और फोटोज सोशल मीडिया में वायरल हो रहे हैं, बावजूद इसके कई वामपंथी व विपक्षी नेता उन्हें बचाने के प्रयास में लगे हुए हैं।

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‘रुक मादर…’ वाले वामपंथी गुंडों से ABVP के शिवम ने ऐसे बचाई जान, शेयर किया Video Viral

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रविवार को हुई घटना के बाद सोशल मीडिया पर जोर-शोर से आरएसएस के छात्र संघ एबीवीपी को पूरे वाकये के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। हर ओर से भाजपा, आरएसएस, एबीवीपी की आलोचना हुई। लेकिन अगली ही सुबह लेफ्ट की करतूतों का पर्दाफाश करती कई वीडियोज और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं। इसी क्रम में एबीवीपी ने भी कल देर रात एक वीडियो जारी किया और दावा किया कि जेएनयू कैंपस में छात्रों एवं कार्यकर्ताओं के साथ लेफ्ट के लोग बदसलूकी करते हैं, मारपीट करते हैं।

एबीवीपी द्वारा वीडियो जारी करते हुए लेफ्ट पर आरोप लगाए गए कि वीडियो में एबीवीपी कार्यकर्ता शिवम को पहले दौड़ाकर उसका पीछा किया गया, फिर उन पर बर्बरता से हमला हुआ। एबीवीपी के मुताबिक अगर जेएनयू में कोई छात्र अधिकारों के लिए खड़ा होता है, तो वामपंथी यही सब करते हैं।

इस वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर एबीवीपी की ओर से हमले में घायल हुए शिवम की कुछ तस्वीरें भी शेयर की गईं। जिनमें दावा किया गया कि वामपंथी गुंडो द्वारा किए गए हमले में शिवम के सिर पर, गले पर चोटें आई हैं।

बता दें कि एबीवीपी की तरह इस वीडियो को एबीवीपी की राष्ट्रीय सचिव निधी त्रिपाठी ने भी शेयर किया है। जिन्होंने अपने ट्वीट में शिवम के साथ हुई घटना पर जानकारी दी है। उनके मुताबिक शिवम को कन्यूनिस्टों ने रविवार की दोपहर दौड़ाकर मारा। निधी के अनुसार, शिवम इस दौरान अपनी जान बचाने के लिए एक जूस की दुकान में घुसे। लेकिन,कम्यूनिस्टों ने उन्हें पकड़ने के लिए पहले दुकान में तोड़फोड़ कर दी और फिर उनकी वहाँ मॉब लिंचिंग करने की कोशिश हुई। इस हमले में उनका सिर फट गया। इस बात की जानकारी खुद चश्मदीदों ने दी।

गौरतलब है कि इन तस्वीरों को साझा करते हुए एबीवीपी द्वारा वामपंथी संगठनों को बैन करने की भी माँग उठाई गई। एबीवीपी ने कहा कि वामपंथी संगठनों को बंद करने से परिसर हिंसा-मुक्त हो जाएगा। साथ ही बच्चे अपनी शिक्षा और समग्र विकास पर ध्यान केंद्रित कर पाएँगे।

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‘हिंदू जिन्ना’ बन गए हैं PM मोदी, चल रहे हैं दो राष्ट्र सिद्धांत पर: कॉन्ग्रेसी नेता और पूर्व CM का विवादित बयान

कॉन्ग्रेस नेता और असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत का “हिंदू जिन्ना” करार देते हुए उन पर पाकिस्तान के “दो-राष्ट्र सिद्धांत” का पालन करने का आरोप लगाया। गोगोई ने प्रधानमंत्री पर जिन्ना की राह पर चलने का आरोप लगाया और कहा कि केंद्र नागरिकता कानून लागू कर ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की कोशिश कर रहा है जो लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।

कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता ने जेएनयू के छात्रों पर रविवार रात हुए हमले की निंदा करते हुए कहा कि भाजपा की यह ‘दमन की नीति’ देश के लिए और अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और प्रस्तावित एनआरसी के खिलाफ बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय वह हिंदुत्व नहीं चाहते हैं, जो भाजपा और आरएसएस देश में लाना चाहते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी पर बड़ा हमला करते हुए गोगोई ने कहा, “प्रधानमंत्री हम (कॉन्ग्रेस) पर आरोप लगाते हैं कि हम पाकिस्तान की भाषा में बात कर रहे हैं, लेकिन यही वो शख्स हैं, जिन्होंने खुद को पड़ोसी देश के स्तर तक गिरा लिया है। वह देश को धर्म के आधार पर मोहम्मद अली जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत का पालन कर रहे है और भारत के हिंदू जिन्ना के रूप में उभरे हैं।”

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गोगोई ने कहा, “हम हिंदू हैं, लेकिन हम नहीं चाहते हैं कि हमारा देश हिंदू राष्ट्र बने। विरोध प्रदर्शन करने वाले अधिकांश लोग हिंदू हैं। वे वह हिंदुत्व नहीं चाहते कि जिसका प्रचार-प्रसार भाजपा और आरएसएस कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि रविवार रात जेएनयू में जिस तरह की हिंसा हुई, उससे देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा हो गया। 

साथ ही गोगोई ने मोदी सरकार के तरीकों को अहंकारी करार देते हुए दावा किया कि यह नए नागरिकता कानून को लागू करने के लिए किसी भी हद तक जाएँगे। उन्होंने कहा कि असम समेत देश भर के लोगों ने संशोधित नागरिकता कानून का विरोध किया है क्योंकि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार लोगों को धर्म, भाषा और संस्कृति के आधार पर बाँटने की कोशिश कर रही है।  

झारखंड में हाल ही में एक चुनावी रैली में की गई टिप्पणी के लिए मोदी पर निशाना साधते हुए गोगोई ने आरोप लगाया कि मोदी ‘‘जिन्ना भक्त’’ हैं। बता दें कि प्रधानमंत्री ने झारखंड में कहा था कि कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी नागरिकता कानून को लेकर आग लगा रहे हैं और उनका रुख दिखाता है कि संसद में यह विधेयक पारित करने का फैसला 1000 प्रतिशत सही था।

गोगोई ने कहा कि पीएम मोदी बाबा साहेब आंबेडकर, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू के आदर्शों और सिद्धांतों की परवाह नहीं करते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘जैसे जिन्ना ने मुस्लिमों के लिए अलग देश बनाया वैसे ही मोदी भी ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के उनके रास्ते पर चल रहे हैं।’’

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JNU प्रेसिडेंट आइशी घोष सहित 19 के खिलाफ FIR: मारपीट और संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का आरोप

दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार और शनिवार को जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) प्रशासन की ओर से शिकायत मिलने के बाद दो एफआईआर दर्ज की हैं। इन एफआईआर में जेएनयू छात्र संघ प्रेसिडेंट आइशी घोष के साथ ही 19 अन्य छात्रों के नाम शामिल हैं। पुलिस जल्द ही इन छात्रों को पूछताछ के लिए बुलाएगी।

FIR की कॉपी

बता दें कि शुक्रवार और शनिवार (3 और 4 जनवरी को) को भी छात्रों ने जेएनयू परिसर में हंगामा किया था। छात्रों ने सर्वर रूम ठप कर लोगों को बंधक बनाने के साथ संपत्ति को नुकसान पहुँचाया था। जेएनयू प्रशासन ने हंगामा करने वाले इन छात्रों के खिलाफ नामजद शिकायत दी थी।

पुलिस ने बताया कि हॉस्टल में मारपीट के दौरान जेएनयू प्रशासन की तरफ से पुलिस को पत्र लिखकर परिसर में हो रही हिंसा और कानून व्यवस्था को काबू करने के लिए आग्रह किया गया। इसके बाद पुलिस ने परिसर में अतिरिक्त पुलिस बल को बुलाया और स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की गई।

जेएनयू में पिछले कई दिनों से फीस बढ़ोतरी का मुद्दा गर्माया हुआ है। रविवार रात कुछ नकाबपोश बदमाशों ने छात्रों और शिक्षकों को बुरी तरह पीट दिया था और कैंपस में तोड़फोड़ की थी। नकाबपोश गुंडे हाथों में रॉड और डंडे लेकर मारपीट और तोड़फोड़ कर रहे थे। इस मामले में जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन और एबीवीपी एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। दोनों ही गुट खुद को पीड़ित बता रहे हैं। हालाँकि कई वीडियो सामने आए हैं, जिसमें साफ तौर पर दिख रहा है कि जेएनयू छात्र संघ प्रेसिडेंट आइशी घोष नकाबपोश गुंडों को रास्ता दिखाती नजर आ रही हैं।

जेएनयू में आतंक का ये तांडव लगभग 8 घंटों तक चला। इस दौरान महिला छात्रों को भी नहीं बख्शा गया। रजिस्ट्रेशन कराने गए छात्रों की पिटाई की गई। मीनाक्षी लेखी ने बताया कि महिला छात्रों के प्राइवेट पार्ट्स पर हमला किया गया और साथ ही बाथरूम में ले जाकर भी उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया।

एबीवीपी के छात्रों के रूम का गेट तोड़ कर उन पर हमला किया गया। किसी की गर्दन में चोटें आई हैं तो किसी का हाथ टूट गया है। जब कैम्पस में पुलिस पहुँची तो पुलिस के ख़िलाफ़ भी ‘गो बैक’ के नारे लगाए गए। छात्रों को घेर-घेर कर पीटा गया। एबीवीपी की एक छात्रा शाम्भवी की वेशभूषा में एक वामपंथी छात्रा ने हमले किए ताकि इसमें संगठन का नाम बदनाम हो। बाद में पता चला शाम्भवी ख़ुद घायल हुई हैं और वामपंथी गुंडों की पोल खुल गई।

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आजाद मैदान में वॉशरूम-पानी की व्यवस्था, इसलिए प्रदर्शनकारियों को किया वहाँ शिफ्ट: मुंबई पुलिस

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुई हिंसा के विरोध में मुम्बई स्थिति गेटवे ऑफ इंडिया के बाहर सोमवार को रात भर प्रदर्शन किया गया। पुलिस का कहना है कि अब प्रदर्शनकारियों को गेटवे ऑफ इंडिया से हटाकर आजाद मैदान भेज दिया गया है। बता दें कि रविवार आधी रात को दक्षिण मुम्बई के कोलाबा में गेटवे ऑफ इंडिया के सामने छात्रों और महिलाओं सहित बड़ी संख्या में लोग जमा हुए थे। बाद में अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर और विशाल ददलानी जैसी बॉलीवुड हस्तियाँ भी यहाँ पहुँचीं। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने  ‘फ्री कश्मीर’ लिखे पोस्टर भी लहराए।

इस बारे में बात करते हुए डीसीपी संग्रामसिंह निशंदर ने कहा कि इन प्रदर्शनकारियों की वजह से सड़कें अवरुद्ध हो रही थीं और आम लोगों एवं पर्यटकों को परेशानी हो रही थी। उन्होंने कहा, “हमने प्रदर्शनकारियों से बाहर निकलने के लिए कई बार अपील की थी। हमने अब उन्हें आजाद मैदान में स्थानांतरित कर दिया है।” 

डीसीपी संग्रामसिंह के बयान का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें वो कहते हुए नजर आ रहे हैं कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को हटाया नहीं है, बल्कि सिर्फ रीलोकेट किया है। क्योंकि वहाँ पर शौचालय और पानी की बेहतर व्यवस्था है, जबकि गेटवे ऑफ इंडिया के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं थी। 

आपको बता दें कि इससे पहले प्रदर्शनकारियों ने गेटवे ऑफ इंडिया से सटे ताज पैलेस होटल के वॉशरुम इस्तेमाल नहीं करने देने पर सवाल दागे थे। सोनिया मरियम नाम की महिला ने ताज होटल को ट्वीट करके प्रदर्शनकारियों को वॉशरूम इस्तेमाल न करने देने का कारण पूछा था।

उन्होंने ताज होटल को टैग करते हुए पूछा, “क्या कोई कारण है कि आप प्रदर्शनकारियों को वॉशरूम का उपयोग नहीं करने दे रहे हैं? इस भेदभावपूर्ण व्यवहार का क्या मतलब है?” इसके साथ ही एक अन्य ट्वीट में वो ‘मानवाधिकार’ की बात करती नजर आईं। उन्होंने लिखा, “वाशरूम का उपयोग करने और एक प्रतिष्ठान से पानी माँगना मानवीय अधिकार है। सभी सार्वजनिक टॉयलेट में सैनिटरी सुविधा नहीं होती है, इससे मदद के बजाय नुकसान ही होता है।”

ताज होटल से इस तरह की माँग करना मूर्खतापूर्ण होने के साथ ही हास्यास्पद भी लगता है। एक यूजर ने तो इस प्रतिक्रिया देते हुए लिख भी दिया कि प्रदर्शन तो रोड पर होते हैं, फिर चाहे धूप हो, बारिश हो, या फिर कुछ और… लेकिन इनको वॉशरूम इस्तेमाल करने के लिए ताज चाहिए… और ये भेदभाव की बात करते हैं… हास्यास्पद।

वहीं एक यूजर ने लिखा, “कल को आप कहेंगे कि आपको फिर से विरोध प्रदर्शन पर उतरने से पहले थोड़ी देर के लिए आराम करने का अधिकार है, और इसलिए ताज से कमरे, कॉफी और शॉवर का उपयोग करने देने के लिए कहा जाए। इसके बाद आप इन अधिकारों के लिए भी एक और विरोध प्रदर्शन शुरू करने का सुझाव देंगे।”

गौरतलब है कि रविवार की शाम को हॉकी स्टिक और लोहे की छड़ों लैस नकाबपोश गुंडों ने दिल्ली के जेएनयू कैंपस में धावा बोला और हॉस्टल के छात्रों को निशाना बनाया। लाठी, पत्थरों और लोहे की छड़ों के साथ गुंडों ने हाथापाई, मारपीट और खिड़कियों, फर्नीचर सामानों की तोड़फोड़ की। उन्होंने एक महिला छात्रावास पर भी हमला किया। इस दौरान हिंसा में कम से कम 34 लोग घायल हुए।

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जेएनयू में रविवार (जनवरी 5, 2020) की रात हुई हिंसा के ख़िलाफ़ मुंबई में विरोध प्रदर्शन के दौरान देश विरोधी नारेबाजी का मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मंगलवार (जनवरी 7,2020) की तड़के तक गेटवे ऑफ इंडिया पर जारी प्रदर्शन में एक छात्रा के हाथ में ‘फ्री कश्मीर’ का पोस्टर देखा गया। जिसके बाद महाराष्ट्र की सत्ताधारी पार्टी शिवसेना पर न केवल विपक्षी पार्टी (भाजपा) ने निशाना साधा बल्कि गठबंधन में उनकी सहयोगी पार्टी कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता भी इस पर सवाल उठाने से नहीं चूके।

विरोध प्रदर्शन में ‘फ्री कश्मीर’ के पोस्टर पर महाराष्ट्र के पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार को कटघरे में खड़ा कर सवाल किया। फडणवीस ने सीएम उद्धव ठाकरे से पूछा कि क्या उन्हें फ्री कश्मीर भारत विरोधी अभियान बर्दाश्त है। देवेंद्र फडणवीस ने ‘फ्री कश्मीर’के पोस्टर वाले वीडियो ट्वीट कर लिखा, “यह किस बात का प्रदर्शन है? फ्री कश्मीर के नारे क्यों लगाए जा रहे हैं? हम मुंबई में इस तरह के अलगाववादी तत्वों को कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं?”

पूर्व सीएम फडणवीस ने आगे लिखा, “सीएम कार्यालय से 2 किलोमीटर की दूरी पर आजादी गैंग ने फ्री कश्मीर के नारे लगाए। उद्धव जी आप अपनी नाक के नीचे फ्री कश्मीर एंटी इंडियन कैंपेन को बर्दाश्त कर रहे हैं।”

गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा ध्यान आकर्षित करवाने के बाद भी उद्धव ठाकरे जहाँ इस मामले पर शांत रहे। वहीं उन्हीं की सहयोगी पार्टी कॉन्ग्रेस के नेता संजय निरुपम ने भी इस ‘फ्री कश्मीर’ के पोस्टर पर आपत्ति जताई।

संजय निरुपम ने ट्वीट कर कहा कि ऐसे पोस्टर देश भर में चल रहे छात्र आंदोलन को बदनाम कर सकते हैं। निरुपम ने कहा कि आंदोलनकारियों को सावधानी बरतनी पड़ेगी। जेएनयू हिंसा का कश्मीर की आजादी से क्या मतलब है।

संजय निरुपम ने ट्वीट किया, “ऐसे पोस्टर देश भर में चल रहे छात्र आंदोलन को बदनाम कर सकते हैं। आंदोलन गुमराह हो सकता है। आंदोलनकारियों को सावधानी बरतनी पड़ेगी। #JNUVoilence का कश्मीर की आज़ादी से क्या रिश्ता ? कौन हैं ये लोग ? किसने गेटवे पर भेजा इन्हें ? बेहतर होगा,सरकार इसकी जाँच कराए।”

मुख्यमंत्री भले अब तक शांत हैं लेकिन उनके ‘संजय’ ने मुँह खोल दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और सामना के संपादक संजय राउत ने FREE KASHMIR बैनर को लेकर सफाई दी है। उनका कहना है कि जिन्होंने यह बैनर थामा था, उनका मकसद कश्मीर में फ्री इंटरनेट, फ्री मोबाइल सर्विसेज और अन्य प्रतिबंधों से है। हालाँकि आखिर में उन्होंने यह जोड़ा कि जो लोग भारत से कश्मीर की आजादी की बात करते हैं, उन्हें बर्दाशत नहीं किया जाएगा।

गौरतलब है कि सोमवार को जेएनयू हिंसा के ख़िलाफ़ मुंबाई के हुतात्मा चौक से गेटवे ऑफ इंडिया तक मार्च निकाला गया था। इसी मार्च में एक छात्रा के हाथ में फ्री कश्मीर का पोस्टर दिखा। जिसके बाद सोशल मीडिया पर भाजपा पार्टी और कॉन्ग्रेस पार्टी के दिग्गज नेताओं ने उद्धव ठाकरे पर निशाना साधा।

बता दें कि गेटवे ऑफ इंडिया तक निकाले गए मार्च में आईआईटी बॉम्बे, टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के अलावा कई दूसरे शैक्षणिक संस्थानों के स्टूडेंट्स शामिल हुए। विरोध-प्रदर्शनों में दीया मिर्जा, जोया अख्तर, राहुल बोस, विशाल भारद्वाज, तापसी पन्नू जैसी फिल्‍मी हस्तियाँ भी नजर आईं। प्रदर्शन में शामिल स्टूडेंट्स ने कहा कि आज यह जेएनयू के साथ हुआ, कल किसी और के साथ होगा और फिर हमारे साथ भी हो सकता है। ऐसे में इसके खिलाफ आवाज उठानी जरूरी है। रैली के दौरान ‘हमें चाहिए आज़ादी‘ और ‘तानाशाही नहीं चलेगी’ के नारे लगाए गए।

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न्यूजलॉन्ड्री और अजेंडाबाज अभिनंदन: हीनभाव से ग्रस्त, नक्सल हिमायती जो साइट से हिन्दूघृणा बाँटता है

न्यूज़लॉन्ड्री स्वघोषित रूप से ‘मीडिया की आलोचना करने वाला, खबर और समसामयिक विषयों की वेबसाइट’ है। हालाँकि, एक सरसरी निगाह डालने से पता चल जाता है कि हर टुटपुँजिए ‘वानाबी ऑल्टरनेटिव जर्नलिज्म पोर्टल’ की तरह इसमें अपने नाम के अलावा और किसी बात पर ढंग का काम नहीं किया गया है। नाम में लॉन्ड्री रखने भर से खबरों की धुलाई नहीं हो जाती, लेकिन ये बात ज़रूर है कि वामपंथी लम्पटों के समाज में स्वीकार्यता अवश्य बढ़ जाती है। कायदे से इसका नाम न्यूज़लौंडी या न्यूज़लौंडा होना चाहिए था क्योंकि जमीर बेच कर पत्रकारिता के नाम पर जो वैचारिक दोगलापन इस साइट पर दिखता है, उससे लॉन्ड्री शब्द का अपमान होता है।

लिबरलों और वामपंथियों के नाजायज मेल से विचित्र तरह की वक्र वैचारिक संतानों ने भारतीय मीडिया लैंडस्केप में जन्म लिया है, जिनका एकसूत्री अजेंडा एक तरह के प्रोपेगेंडा पर ज़हर उगलते रहना है। हिन्दुओं से एक अलग स्तर की घृणा की आग फैलाने वाले ‘न्यूजलौंडी’ टाइप के डिजिटल जिहादियों ने इंटरनेट के फ्री होने का फायदा उठाते हुए एक खास विचारधारा, अलग विचार, एवम् हिन्दू धर्म के प्रति जो नफ़रत फैलाई है, उसके लिए इसके सीईओ अभिनंनदन सेखरी, सिकड़ी, सिक-री (या जो भी नाम है) का गिलहरी योगदान आने वाले समय में याद रखा जा सकता है। ‘जा सकता है’ इसलिए क्योंकि वामपंथियों की आदत रही है अपने काम के लिए अपने ही कार्यकर्ताओं को निपटाते रहने का।

न्यूजलॉन्ड्री जब अस्तित्व में आई थी तो इसको लेकर खासा उत्साह था क्योंकि राडिया टेप आदि प्रकरण को ले कर आम जनता को लगा था कि सही में खबरों को धोने-सुखाने वाले लोग आए हैं। न्यूजलॉन्ड्री के शुरुआती दिनों में आनंद रंगनाथन जैसे विद्वान इससे जुड़े थे और रिपोर्टिंग एवम् विश्लेषण एक-आयामी नहीं था। तब के दिनों में हर वो मीडिया संस्थान या वैचारिक स्तम्भ लिखने वाले पत्रकार आदि इनके निशाने पर रहते थे जो पत्रकारिता का चोला ओढ़े अजेंडाबाजी में व्यस्त रहते थे।

समय बदला और फिर नक्सली विचारधारा और आतंकियों के हिमायतियों के हाथ में इसका नियंत्रण गया। अभिनंदन सेखरी जैसे नक्सल सिंपेथाइजर ने उस नक्सली की बातों का मजाक उड़ाया, जो छत्तीसगढ़ में 18 साल तक नक्सली रहने के बाद आत्मसमर्पण कर ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए आज के कई शहरी नक्सलियों के नाम लेता पाया गया। अभिनंदन सेखरी आखिर इस बात का मखौल क्यों करेगा जहाँ कोई हार्डकोर नक्सली किसी दूसरे नक्सली का नाम ले रहा हो? क्योंकि वो नाम सुधा भारद्वाज और अरुण फरेरा जैसे लोगों के थे, जिन पर आज कल भीमा कोरेगाँव की हिंसा भड़काने और प्रधानमंत्री की हत्या की योजना के मामले अदालतों में चल रहे हैं।

जब जड़ में ही सड़न घुस चुकी हो तो पत्ते हरे कैसे होंगे? अभिनंदन सेखरी के प्रभाव ने कई ढंग के लोगों को छोड़ने को विवश किया, जिसमें आनंद रंगनाथन भी एक थे, और, कुछ लोगों के अनुसार, हाल के दिनों में मधु त्रेहान का अलग होना भी न्यूजलॉन्ड्री के रेबीज़ग्रस्त रिपोर्टिंग और विश्लेषण को ही बताया जाता है। लोग कहते हैं मधु त्रेहान ने काफी हद तक इस एकतरफा जाती गाड़ी को संतुलित बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन आत्ममुग्ध अभिनंदन सेखरी की नक्सली विचारधारा और अंतर्निहित हिन्दूघृणा ने न्यूजलॉन्ड्री को उसी शब्द के दायरे में बाँध दिया जिसे प्रेस्या या प्रेस्टीट्यूट कहा जाता है।

इसी शृंखला में तहलका प्रकरण पर इनकी रिपोर्टिंग से अचम्भा हुआ जब निरुपमा सेखरी ने ‘विक्टिम शेमिंग’ के नए कीर्तिमान स्थापित किए। उस रिपोर्ट को पढ़ने, और फिर यह जानने के बाद कि एक महिला ने यह खबर की है, आप मुँह में वमन कर देंगे और फेंकने को सिवाय ऐसे पत्रकार के नाम के, कोई जगह नहीं मिलेगी। इस रिपोर्ट में तरुण तेजपाल का पूरा पक्ष लेते हुए, वामपंथियों की दोगली शैली में (पहले लिखो कि मैं तरुण तेजपाल को बचा नहीं रही, और पूरा लेख यही साबित करने में लगे रहो कि वो बुद्ध का अवतार है) पीड़िता पर ऐसे सवाल किए जैसे उसने इस शारीरिक शोषण के बारे में बोल कर मानवता के खिलाफ अपराध किया हो।

मीडिया वाचडॉग यानी पत्रकारिता की धारा पर पैनी निगाह जमा कर लोगों तक उनके झूठ और प्रपंच को पकड़ने की बात कहने वाला न्यूज़लॉन्ड्री, आज भी अपने ‘अबाउट अस’ में ‘मीडिया क्रिटिक’ ही लिखता है, जबकि जिन बातों पर आक्रमणकारी हो कर यह पोर्टल अस्तित्व में आया था, आज वही सारे तिकड़म खुद करता है: एक पार्टी की गोद में लैपडान्स करना (आम आदमी पार्टी), एकतरफा रिपोर्टिंग जहाँ भाजपा सरकारों ने आज तक एक भी ढंग का काम नहीं किया है, फूहड़ लौंडों को सदी के विचारकों की तरह स्थापित करने के लिए विडियो/इंटरव्यू (राठी, बनर्जी, कामरा आदि), लगातार मुसलमानों को पीड़ित दिखाना और हिन्दुओं को एक सामान्यीकृत शोषक बताते रहना, घृणा से भरी हुई सेलेक्टिव तरीके के विश्लेषण जहाँ अपवादों को उदाहरण के तौर पर दिखाया जाता है। इन सारी बातों के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं, न ही मैं कोई हायपरलिंक दूँगा। आप इनकी साइट पर जा कर किसी भी रैंडम जगह से दस लेख पढ़ लीजिए, समझ में आ जाएगा।

न्यूजलौंडी का अपना अजेंडाबाज: अभिनंदन सेखरी

अभिनंदन सेखरी के बारे में आप यह कह सकते हैं कि इस लम्मट ने अपनी अन्तश्चेतना बेच कर वामपंथी गिरोह के भीतरी कक्ष में प्रवृष्टि ली और मतिसुन्न हो कर, जमीर गिरवी रख कर न्यूजलॉन्ड्री की फंडिंग पाई। दूसरों पर तमाम तरह के आरोप मढ़ने वाले इस न्यूजलौंडी पर थोड़ा गौर करेंगे तो आप पाएँगे कि अर्णब गोस्वामी और रिपब्लिक टीवी से इसे और इसके कुछ कर्मचारियों को फेटिश की हद तक का प्रेम है, लेकिन हाँ कोई रवीश कुमार पर कुछ भी लिखे तो उसके व्यंग्यों को भी बेचारे फैक्टचेक कर देते हैं। (ख़ैर, व्यंग्य-कटाक्ष सबको समझ में नहीं आते, खास कर तब जब आपके वैचारिक पिता की लुंगी उतार दी गई हो तब तो आँख मूँदनी ही पड़ती है।)

ऑपइंडिया पर हिट जॉब

हाल ही में, न्यूजलौंडी ने ऑपइंडिया हिन्दी को ले कर एक तथाकथित प्रोफाइल करने की कोशिश की थी, जिसका एक ही उद्देश्य था ऑपइंडिया को ले कर अपने पूर्वग्रहों का विषवमन करना। इनके रिपोर्टर ने मुझसे फोन पर बात करते हुए ‘एथिक्स’ आदि का भी ज्ञान दिया था, और कहा था कि छापने से पहले मुझे मेरे फोन कॉल की रिकॉर्डिंग भी भेजेगा। ख़ैर, रिपोर्ट छपी न्यूजलौंडी हिन्दी पर, किसी ने देखा नहीं तीन दिन तक। फिर अचानक रवीश कुमार ने अपने पेज पर इसे जगह दे दी। ध्यान रहे कि रवीश कुमार के प्रपंचों के ऑपइंडिया एक अरसे से तथ्यों और तर्कों से काटता रहा है। इस रिपोर्ट में रवीश कुमार को ले कर ऑपइंडिया पर कई पन्ने समर्पित थे कि ऑपइंडिया ये करता है, वो करता है, ऐसे करता है, और वैसे भी करता है।

बाद में पता चला कि पूरी रिपोर्ट रवीश कुमार ने न सिर्फ छापने का विचार न्यूजलौंडी को दिया था, बल्कि उसका पूरा ड्राफ्ट पढ़ा, कुछ हिस्से लिखे और सोचा कि उनके नाम पर हो रहे ‘हमले’ के कारण लोग पढ़ लेंगे और ऑपइंडिया की थू-थू होगी। हुआ कुछ नहीं, तो फिर अपने पेज की रीच का इस्तेमाल करना चाहा। वहाँ इस रिपोर्ट को ले कर कमेंट में इतनी गालियाँ पड़ी हैं कि उस दिन से लगभग हर दिन (आप चाहें तो चेक कर लें) रवीश कुमार कम से कम एक पोस्ट में ‘आईटी सेल वाले नौजवानों की भाषा आप कमेंट में पढ़ लीजिए’ की बात अवश्य करते हैं।

ये हिट जॉब न तो रवीश के हिसाब से चल रहा था, न अभिनंदन सिक-री के, तो फिर इसका अनुवाद कराया गया अंग्रेजी में और फिर अपने इकोसिस्टम के सामूहिक फैंटेसी के उपभोग हेतु ट्विटर पर इसकी बिकवाली शुरू हुई। हालाँकि, इस पूरे रिपोर्ट पर मैंने एक विडियो में न्यूजलौंडी का घाघरा अच्छे से उतारा था, लेकिन अभिनंदन का मन नहीं भरा था, इसलिए अनुवाद करवाया। लेकिन इस रिपोर्ट के आने से एक अजीब बात हो गई, जिस कारण यह पूरा लेख लिखा जा रहा है।

इस लेख को पढ़ने के बाद न्यूजलॉन्ड्री के एक पूर्व पत्रकार ने हमसे सम्पर्क किया और कहा कि उसके पास अभिनंदन सेखरी के बारे में बहुत सारी बातें हैं कहने को। यूँ तो सेखरी की करतूतों को देखने के बाद आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये किस तरह का आवारा नक्सली है, लेकिन फिर भी किसी से फर्स्टहैंड सूचना मिल जाए तो सुनने में कोई बुराई नहीं। उसके बाद इस झबरे बालों वाले अभिनंदन के बारे में जो बातें सामने आईं वो न्यूज़लौंडी की दिशा, दशा और सेखरी के निम्न स्तर के अजेंडाबाज होने की पुष्टि करता है। यहाँ निम्न स्तर का या घटिया होने का मतलब वह अपने उद्देश्य में मनसा-वाचा-कर्मणा लगा हुआ है।

न्यूजलौंडी के अभिनंदन: हीनभावना से ग्रस्त, गालीबाज, नक्सल हिमायती

खैर, इस एक्स-न्यूजलॉन्ड्री पत्रकार ने, जो कि अभी एक राष्ट्रीय स्तर के पोर्टल के लिए काम करते हैं, अभिनंदन शेखरी के बारे में बताने से पहले नाम न छापने की अपील की। यूँ तो ये एक सामान्य अपील है, लेकिन पूछने पर जो बात पता चली वो अभिनंदन के बारे में काफी कुछ कहती है।

उसने कहा, “मैं नाम इसलिए नहीं बता सकता क्योंकि पहले भी मेरे एक सहकर्मी ने अभिनंदन के व्यवहार से दुखी हो कर नौकरी छोड़नी चाही, तो अभिनंदन ने अपनी पहुँच का इस्तेमाल करते हुए उसकी नौकरी एक लम्बे समय तक कहीं लगने ही नहीं दी। इनका एक नेक्सस है और ये खुल कर मेरे सामने बोल रहे थे कि ‘साले का करियर बर्बाद कर दूँगा’। अगर मेरा नाम आप लिखेंगे तो हो सकता है कि वो आर्टिकल के छपने के अगले दिन मुझे यहाँ की नौकरी से बाहर करा दे।”

मीडिया उद्योग में होने से इस बात की पुष्टि मैं भी कर सकता हूँ कि आपका वामपंथी बॉस अगर आपके पीछे पड़ जाए तो वो आपका करियर वाकई में बर्बाद कर सकता है। क्योंकि हर बड़े मीडिया हाउस में इनके जान-पहचान के लोग होते हैं, जिनके साथ या उनके नीचे इन्होंने काम किया होता है, चाटुकारिता से सीढ़ियाँ चढ़ी हुई होती हैं, तो ऐसे संबंधों का फायदा उठा कर करियर चौपट करना बहुत आसान है।

हमने उसे आश्वस्त किया तो आगे न्यूजलॉन्ड्री के वर्क कल्चर पर बताते हुए पूर्व न्यूजलॉन्ड्री पत्रकार ने दावा किया, “वर्क कल्चर वही है जो टिपिकल वामपंथी पोर्टलों का है। अभिनंदन की वैचारिक लाइन क्लियर है जहाँ वो हिन्दुओं पर हो रहे अपराधों को आम तौर पर इग्नोर कहता है, और गलती से भी कोई मुसलमान सामाजिक अपराध का भी शिकार हुआ है तो उसमें उसे किसी भी तरह हिन्दू-मुसलमान एंगल चाहिए ही। इसे आप अभिनंदन का SoP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर) कह सकते हैं। जैसे कि मान लीजिए कमलेश तिवारी की हत्या हुई। जिस तरह से हुई उससे साफ है कि मुसलमानों ने की, और क्यों की। लेकिन अभिनंदन की पहली प्रतिक्रिया यह होगी कि ‘साले संघियों ने कराया होगा ताकि इसका फायदा उठा सकें’। फिर वो किसी भी ऐसी अफवाह, एक भी सोशल मीडिया पोस्ट, या छोटे से लोकल फेसबुक पेज पर ‘पुलिस तलाश रही है प्रेम का एंगल’ को भी प्रमुखता से छाप सकता है। या फिर वो इन मौकों पर पूरी तरह से चुप रह जाएगा। अंग्रेजी में वो यहाँ तक कह देगा कि ऐसी बातों को जगह देने से सेकुलर फ्रैब्रिक टूटेगा, लोग उन्मादी हो जाएँगे।”

पुष्टि के लिए जब हमने ‘कमलेश तिवारी’ खोजने की कोशिश की, तो न हिन्दी, न अंग्रेजी में, एक भी लेख मिला जो इस हत्याकांड पर अपना वैचारिक पक्ष रख रहा हो। इसी तरह कई मौकों पर, जहाँ अपराधी मुसलमान हो तो उसकी गरीबी ऐसे खींच कर ले आएँगे जैसे कि गरीब दंगाइयों को पुलिस गरीबी देख कर छोड़ दे। हाल ही में जब उत्तर प्रदेश पुलिस ने दंगाइयों से आगजनी, पत्थरबाजी, कट्टा चलाने आदि से हुई क्षति के लिए पैसा वसूलने की बात करते हुए उनके परिवारों को नोटिस भेजा तो न्यूजलौंडी के अभिनंदन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि गरीब लोग पैसा कहाँ से देंगे! ये तो इन गरीब दंगाइयों को घर से पेट्रोल और माचिस ले कर निकलने से पहले सोचना था न?

कुछ और रिपोर्ट जहाँ मुसलमान प्रेम फफक कर बाहर आता है

इसी शृंखला में एक और रिपोर्ट जामिया में हुए दंगों के बाद पुलिस द्वारा दंगाइयों को नियंत्रित करने की कोशिश को ‘आतंक की रात’ कह कर छापा। आप यह जान लीजिए कि दंगों के दूसरे ही दिन दस हार्डकोर अपराधी पुलिस द्वारा पकड़े गए, वहाँ 750 फर्जी आईकार्ड के मिलने की पुष्टि जामिया मिलिया ने ही की, और PFI के 150 इस्लामी कट्टरपंथियों के दंगे के दो दिन पहले से उसी इलाके में होने की पुष्टि पुलिस कर चुकी है। हाँ, जामिया के ‘हिन्दुओं से आजादी’, ‘गलियों में निकलने का वक्त आ गया है’, ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और ‘नारा ए तकबीर’ के नारों पर न्यूजलौंडी चुप है।

इसी तरह अलीगढ़ में पुलिस द्वारा जारी किए विडियो में छात्रों द्वारा गेट तोड़ने, आग लगाने की खबरों को दरकिनार करते हुए, वहाँ की दीवारों पर हिन्दुओं को कैलाश भेजने, खिलाफत 2.0 लिखने और कैंटीन के सामने ख़िलाफ़त के समर्थन में तख्तियाँ ले कर इकट्ठे छात्रों और ‘हिन्दुत्व की कबर खुदेगी, AMU की धरती पर’, के बावजूद न्यूजलौंडी के अजेंडाबाजों ने क्या छापा है? ‘जख्मी, पिटे, स्टन ग्रेनेड से हमले के बाद अलीगढ़ के विद्यार्थियों द्वारा ख़ौफ़नाक रात का वर्णन’! यहाँ भी एकतरफा पुलिस द्वारा नियंत्रण की कोशिश को ‘पुलिस की बर्बरता’ कह कर वामपंथी नैरेटिव को हवा देने की नाकाम चाल।

और तो और, इन्होंने अयोध्या मामले पर टीवी पर आने वाले साधुओं पर एक पूरा लेख लिखा है जिसके शीर्षक से ही हिन्दूघृणा का पहला स्वाद आप तक पहुँच जाएगा। हालाँकि, बहुत खोजने पर भी कमलेश तिवारी की हत्या को जायज ठहराने वाले कठमुल्लों या आम मुसलमान पैनलिस्टों पर कोई लेख नहीं मिला। अगर बात चीखने की ही है तो मेंहदी लगाए दाढ़ी और टोपीधारी मुल्लों पर न्यूजलौंडी अपने किसी रिपोर्टर को क्यों नहीं भेज पाता? क्योंकि इससे अभिनंदन के वैचारिक चाचा-मामा के बारे में कई बातें बाहर आ जातीं!

न्यूजलॉन्ड्री से पहले जुड़े पत्रकार ने बताया, “सेखरी का फंडा सीधा और सपाट है कि मुसलमानों को, नक्सलियों को, आतंकियों तक को, विक्टिम बना कर दिखाना है। ये लोग कभी भी मुसलमानों के अपराधों पर मुखर हो कर नहीं लिखते। मीडिया क्रिटिक बनने के नाम पर इनका काम बस राइट विंग वाले लोगों को टार्गेट करना है, बाकी का काम इकोसिस्टम कर देता है। मुझे घिन आती है इस आदमी से कि यह सीधे चेहरे के साथ सहकर्मियों को ऐसा लिखने को कैसे कहता है!”

आगे उसने कहा, “अभिनंदन वाकई में एक इन्सिक्योर इंसान है। वो हीनभावना से भरा हुआ है लेकिन हमेशा अपने सीईओ होने के घमंड में भरा रहता है। हर दूसरे बात पर माँ-बहन की गालियाँ देना… कुछ गालियाँ इतनी खराब की मैं बता नहीं सकता! इसके साथ कोई भी ढंग का व्यक्ति ज्यादा दिन काम नहीं कर सकता। मधु मैम ने भी शायद उसकी इन्हीं हरकतों के कारण किनारा कर लिया। कई अच्छे लोग यहाँ इसलिए नहीं टिक पाए क्योंकि अभिनंदन एक ऐसहोल है। हाँ, मैं यही कहूँगा क्योंकि उसे लगता है अंग्रेजी में गालियाँ देना कूल है।”

न्यूजलौंडी पर क्या है, किस तरह का है, यह जानने के लिए आपको किसी शोध की आवश्यकता नहीं है। साइट पर जाइए, स्क्रॉल कीजिए (क्योंकि पढ़ने लायक कुछ होता नहीं), आपको पता चल जाएगा कि अभिनन्दन शेखरी अरविंद केजरीवाल का पिट्ठू है। आम आदमी पार्टी ने जनता का रिपोर्टर जैसी वेबसाइट और अंकित लाल जैसे लोगों में पैसा क्यों खर्च किया, जबकि अभिनंदन शेखरी और न्यूज़लॉन्ड्री पब्लिक से ‘खबरें देना जनता की सेवा है’ के नाम पर पैसे उठा कर आम आदमी के समर्थन और भाजपा के विरोध में प्रचार करती ही है, यह आश्चर्य की बात है।

पूर्व कर्मचारी ने इस पर भी बताया, “मैं ये तो नहीं जानता कि आम आदमी पार्टी इन लोगों को पैसे देती है, लेकिन जिस तरह के लोगों को ये प्रमोट करते हैं जैसे कि आकाश बनर्जी, ध्रुव राठी आदि हैं, सीधे तौर पर एक राजनैतिक अजेंडे को बढ़ाने जैसा है। भाजपा को लेकर इनकी मंशा विरोध तक ही सीमित नहीं, अभिनंदन तो कहता है कि अगर तुम भाजपा के समर्थन में हो तो तुम्हें मानव नहीं कहा जा सकता। किसी पत्रकार के द्वारा इस तरह की अतिवादी सोच पर मुझे आश्चर्य होता था। लेकिन मेरे जाने के बाद ये लोग यही काम दिल्ली चुनावों को देखते हुए, और भी सक्रिय रूप से कर रहे हैं।”

प्रपंच पोर्टल की खबरों के शीर्षक देखिए, समझ जाएँगे

न्यूजलौंडी पर जिस तरह की खबरें हैं, जिन लोगों के इंटरव्यू हैं, जैसे सवाल पूछे जाते हैं, उसे देख कर पूर्व कर्मचारी की बात पर सवाल उठाना मुश्किल ही है। ये जानने के लिए हमें किसी स्वघोषित मीडिया क्रिटिक के पास जाने की आवश्यकता नहीं है कि न्यूजलॉन्ड्री इस तरह की एकतरफा, हिन्दूफोबिक, तल्ख और गैरवामपंथी विचारों के लिए अंतर्निहित घृणा से सनी पत्रकारिता क्यों करता है।

मोदी के सरकार में आने से, और तत्पश्चात् भाजपा की लगातार बनती राज्य सरकारों ने एक वैसी विचाराधारा को उभरने का मौका दिया जिन्हें एक लाइन में खारिज कर दिया जाता था। सोशल मीडिया के आने से उनकी अभिव्यक्ति को भी बल मिला है। रक्तरंजित वामपंथी विचारधारा और आतंकियों को हिमायती पत्रकारों, पोर्टलों पर लोगों ने सवाल उठाने शुरू किए तो एक तरह की घृणा से इंधन पाने वाले नितम्ब चिपका कर एक हो गए और अपने पाठकों को बरगलाना शुरू किया।

इसी कारण आपको वामपंथी पाठकों में फ्लैक्सिबिलिटी का अभाव दिखेगा। वो नाम के उदारवादी हैं, जबकि वैचारिक लोच का पूर्ण अभाव है इनके भीतर। न्यूजलौंडी जैसे पोर्टलों ने इसी जहरीले विचार को पकड़ा और अपने पाठकों को इकट्ठा करना शुरू किया। ये कुछ वैसे ही जैसे अकबरुद्दीन ओवैसी मुसलमान वोटों को इकट्ठा करने के लिए पंद्रह मिनट पुलिस हटाने की धमकी देता है। अभिनंदन सेखरी, अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे दंगाइयों का परिष्कृत संस्करण है, जिसे अंग्रेजी बोलनी आती है और वो मोदी को मोदी ही कहता है, मुडी या मोडी नहीं।

कमाल की बात यह है कि सिक-री के न्यूजलौंडी लेखक पेज पर उसके परिचय में एक लाइन लिखी हुई है, जिसका अनुवाद यह है: न्यूजट्रैक के लिए शोध करने वाले अभिनंदन बाद में ऐसे रिपोर्टर बने, जिन्होंने वैसी खबरों को किया जो बाकी छोड़ देते थे। पहली नजर में आपको ये सकारात्मक लगेगा लेकिन ये अभिनंदन की सच्चाई है कि जिन खबरों में कुछ नहीं होता, वहाँ ये हिन्दू-मुसलमान ले आता है, इसे गुरुद्वारे में सिख-मुस्लिम सद्भाव दिखता है, लेकिन पूरे भारत में हिन्दू-मुसलमान का सौहार्द नहीं दिखता। इसे तबरेज दिखता है, जुनैद दिखता है, अखलाक दिखता है, लेकिन भारत यादव, अंकित सक्सेना, ध्रुव त्यागी नहीं दिखते।

अभिनंदन के इसी टैलेंट की बात करते हुए पूर्व सहकर्मी ने बताया, “अगर कोई खबर आए, जो राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बन चुका हो, हमें लगता है कि करना चाहिए और उसमें अपराधी मुसलमान हो, तो सेखरी अलग लाइन ले लेता है: यू नो… दे आर आलरेडी लिविंग इन फियर, द फासिस्ट संघीज़ आर पुशिंग देम टू वाल एवरीव्हेयर… इन दिस एटमोस्फियर, वी जस्ट कान्ट डू दीज काइन्ड्स ऑफ स्टोरीज़! (तुम लोग समझते नहीं कि वो बेचारे किस तरह के डर में जीते हैं, ये फासीवादी संघी उन्हें हर जगह सता रहे हैं… ऐसे माहौल में हम इस तरह की खबरें नहीं कर सकते।) ऐसी स्थिति में आप कुछ नहीं कर सकते। ये आपको हर दिन सहना होता है ताकि किसी नकली डर से डरे हुए मुसलमान के अपराध की चर्चा तक न हो न्यूजलॉन्ड्री पर। हमेशा ‘कीप डिगिंग’ (खोजते रहो) कह कर कुछ ऐसा खोजने को कहा जाता है जहाँ किसी नक्सली, आतंकी या मुसलमान अपराधी का कोई मानवीय दृष्टिकोण सामने लाया जा सके। जैसे कि वो गरीब है, उसके जेल जाने से घरवालों को कौन खिलाएगा, उसकी बहन कैसे पढ़ेगी, बाप भजन गाता था… या कुछ भी इस तरह का। कभी-कभी आप अभिनंदन के ‘इविल जीनियस’ को अडमायर करने लगते हैं कि जो भी कहो, बंदा इस मामले में टैलेंटेड तो है ही!”

न्यूजलौंडी के कुछ नायाब कारनामे

वामपंथियों पर अगर किसी ने आलोचनात्मक लेख लिखा तो न्यूजलौंडी तुरंत उस पर सीधे लेख लिख कर धावा बोलती है, या फिर अपने गिरोह के द्वारा ऐसे लोगों की डिजिटल लिंचिंग में शरीक हो जाती है। अपने ही लिखे हुए लेखों को मिटाना, किसी खास पत्रकार को बचाना, उसकी साख पर किसी भी तरह की आँच न आने देना आदि आम बात है। मधु त्रेहान ने स्वयं क्लिप को हटाने की बात को स्वीकारा जहाँ जितेन्द्र सिंह नामक व्यक्ति ने सवाल उठाए कि राजदीप सरदेसाई के पास ₹52 करोड़ का बंग्ला कैसे है? उसी तरह समर हलरंकर पर न्यूजलौंडी ने एक लेख लिखा जिसमें उसने हिन्दुस्तान टाइम्स में कोई लेख लिखा था, जिस पर चोरी का आरोप लगा था। न्यूजलौंडी ‘फैक्ट्स’ को बाहर लाने की बात कर रही थी, आज आप वो लेख खोजने जाएँगे, तो हेडलाइन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।

ख़ैर, लिस्ट लम्बी है। हाल ही में, चाँदनी चौक के हौजकाजी इलाके में मुसलमानों की एक भीड़ ने हिन्दू अल्पसंख्यकों के मंदिर पर पत्थबाजी की, मूर्तियाँ खंडित की, मंदिर को क्षति पहुँचाई। हमारी अंग्रेजी की एडिटर नुपुर शर्मा ने वहाँ जा कर ग्राउंड रिपोर्ट लिखी। उसी मामले में वहाँ एक सत्रह वर्ष के बच्चे को कथित तौर पर मुसलमानों की भीड़ द्वारा मस्जिद में खींच कर ले जाने की बात सामने आई। उसके माता-पिता अपनी बात किसी के द्वारा न सुने जाने पर सड़क पर, हताशा में, आत्महत्या करने की बात कर रहे थे। नुपुर की रिपोर्ट पहली (और शायद आखिरी थी) उस बच्चे के बारे में। चार दिन बाद बच्चा किसी तरह वापस आया। अब न्यूजलौंडी जगा और कहने लगा कि बच्चा जब वापस आ गया तो इस रिपोर्ट को करने की क्या ज़रूरत थी!

मतलब, हमें चार दिन पहले पता चल जाना चाहिए था कि वो बच्चा वापस आ जाएगा। जैसे कि नजीब अहमद आज तक वापस नहीं आया, तो उसकी रिपोर्टिंग बंद हो जानी चाहिए! ये नमूने विचित्र हैं बिलकुल! इसी तरह, सीईओ सेखरी ने, जो कि केजरीवाल का पुराना साथी भी है, स्वराज्य मैग्जीन की स्वाति गोयल शर्मा को उन्मादी कह बैठा क्योंकि उन्होंने गुरुग्राम के टोपी कांड की सच्चाई बाहर लाई थी। याद हो कि मोदी के दूसरी बार सत्ता में आने के तुरंत बाद ‘जय श्री राम’ को ले कर एक फर्जी खबरों का प्रचलन दिखा था, उसी क्रम में गुरुग्राम में मोहम्मद बरकत आलम के ‘टोपी कांड’ को मुख्यधारा के मीडिया गिरोह ने ‘हेट क्राइम’ कह कर छापा था। जब न्यूजलौंडी का झूठ नाम ले कर पकड़ लिया गया तो सीईओ सेखरी अंग्रेजी में गाली-गलौज करने लगा।

आयुष्मान भारत पर इन्होंने अर्धसत्य और लम्बे-लम्बे झूठ छापे ताकि इस योजना की साख गिरे। वहाँ इन्होंने पूरा प्रोपेगेंडा पेला कि इन लोगों को बाहर रखा जाएगा, उन्हें बाहर रखा जाएगा और हमने जाँच की तो पाया न्यूजलौंडी वही कर रहा था, जिसके लिए आज कल जाना जाता है: भावहीन चेहरे के साथ प्रपंच फैलाना। इनकी हिन्दूघृणा खुल कर सामने आ गई जब इन्होंने राष्ट्रपति कोविंद और उनकी धर्मपत्नी द्वारा जगन्नाथ मंदिर में ‘पुजारियों द्वारा जातिगत भेदभाव के कारण बुरे बर्ताव’ की बात खबरों में छापी। न्यूजलौंडी ने इस खबर को बाद में बेशर्मी के साथ हटा दिया।

साथ ही, इनके अनेक ऐसे कांडों में साइट पर या अपने स्तम्भकारों की मदद से प्रधानमंत्री मोदी के बारे वैचारिक जहर उगलने से ले कर सीधे-सीधे झूठ फैलाने की बातें सामने आईं कि गुजरात चुनावों के समय वो अजमेर शरीफ में एक मुसलमान चिश्ती से मिल रहे थे ताकि मुस्लिम तुष्टीकरण से फायदा हो। जबकि वो विडियो पुरानी थी। इसी तरह, प्रधानमंत्री की बातों को संदर्भ से बाहर ले कर न्यूजलौंडी ने लिखा कि नरेन्द्र मोदी ने ‘दलित विरोधी’ बात कही है। जबकि, इसके उलट जो बात कही गई वो यह थी कि मीडिया को हर खबर में दलित-सवर्ण जैसी बात लाने से बचना चाहिए।

अगर कल वाली (जनवरी 5, 2020) JNU हिंसा की बात करें तो न्यूजलौंडी के बिके जमीर की बात और निखर कर सामने आती है। पूर्वग्रह से ग्रस्त, आम जनता द्वारा लगातार नंगे किए जाने के बावजूद, अंतिम साँस की हुकहुकी पर चलते इस वामपंथी पोर्टल ने इस हिंसा के लिए ABVP को जिम्मेदार ठहराने का मन बना लिया था। इस कारण, जब इस पार्टी के बच्चे AIIMS में चिकित्सा के लिए पहुँचे तो इन्होंने एक डॉक्टर भट्टी को कहीं से निकाला और उनसे कहलवाया कि ‘ABVP वालों की चोटें फर्जी लग रही थीं।’ चूँकि खबर न्यूजलौंडी की थी तो पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने इस पर पड़ताल की। पता चला कि डॉक्टर साहब, डॉक्टर कम अजेंडाबाजी और राजनीति में ज्यादा सक्रिय हैं। डॉक्टर साहब CAA-NRC प्रदर्शनों के लिए प्रदर्शनकारी जुटाने के काम में अपने फेसबुक पेज पर व्यस्त पाए गए हैं। और अगर इतना ही काम नहीं था तो पता चला कि डॉ भट्टी कॉन्ग्रेस के मेडिकल सेल के नेशनल कन्वीनर हैं।

2018 की जनवरी में प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ की एक महिला पत्रकार, दमयंती धर, ने यह शिकायत अपने एडिटर से की कि जब वो एक डॉक्टर का इंटरव्यू ले रही थीं, तब एक कथित दलित एक्टिविस्ट केवल राठौड़ और कई अन्य लोगों ने उनके साथ न सिर्फ धक्का-मुक्की की, बल्कि गालियाँ दी, मोबाइल छीने, विडियो डिलीट किया और उनके साथ जो हुआ वो रिकॉर्ड करते रहे। एडिटर ने कहा ‘जाने दो, ये सब तो पत्रकारिता में चलता रहता है’। दमयंती ने तब लिखा था कि उन्हें उस दिन समझ में आया कि वामपंथी एडिटरों का दोगलापन कैसा होता है। अब असली बात, न्यूजलौंडी जो खुद को मीडिया पर नजर रखने वाला कुत्ता कहता है, वो कुत्तपनी कर गया और उसने इस पर कोई रिपोर्ट नहीं की। ये जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि इनकी बिरादरी के पत्रकारों पर अगर कोई जोर से चिल्लाता भी है, तो झबरा अभिनंदन झाऊँ-झाऊँ करते हुए 360° देखने लगता है कि कहीं कोई भगवा रंग तो नहीं दिख रहा।

ये तो कुछ ऐसी खबरें हैं जो बताती हैं कि इनसे गलतियाँ नहीं होतीं, बल्कि सोच-समझ कर, योजनाबद्ध तरीके से न्यूजलौंडी इस तरह के ‘हिट जॉब’ में शामिल रहता है। नैरेटिव बना कर चुनाव की पूर्व संध्या पर वैचारिक लेखों के माध्यम से गैरभाजपा पार्टियों के लिए न्यूजरूम कैम्पेनिंग से ले कर, लोगों में हिन्दू-मुस्लिम घृणा फैलाने की बातें करना इनके कई अजेंडे में से एक है। ईकोसिस्टम के सहयोग से एक ही तरह की खबरें, वैचारिक स्तंभों के नाम पर, ‘हम तो निष्पक्ष हैं’ के चोले में, न्यूज़लौंडी और अभिनंदन सेखरी ने लगातार लिखी हैं, लिखवाई हैं।

न्यूजलौंडी पर विषयों का चयन भी उसकी विचारधारा के हिसाब से होता है, आम आदमी पार्टी की विचारधारा के हिसाब से होता है, और इस बात से होता है कि पाठकों का ध्रुवीकरण करने के लिए किस एंगल से, क्या बातें कहना उचित रहेगा। वैचारिक दंगाई, या विचारों का दोगलापन जैसे वाक्यांश अगर भौतिक शरीर पा जाते तो उनकी शक्ल अभिनंदन सेखरी से मिलती और बाल झबरा कुत्ते से। इसकी फर्जी, प्रपंची पत्रकारिता कैसी है, वो बताने के लिए मैं (दोबारा) यहाँ कोई हायपरलिंक नहीं दूँगा क्योंकि ऐसे पोर्टलों पर आपका एक विजिट भी उस पाप में आपका योगदान होगा, जो इस राष्ट्र को तोड़ रहा है।