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NDTV के पत्रकार को ननकाना साहिब पर कट्टरपंथियों के हमले से दिक्कत नहीं, CAA समर्थकों को मुद्दा मिलने की चिंता

पाकिस्तान में ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर कट्टरपंथियों की भीड़ के हमले की दुनिया भर में निंदा हो रही है। शुक्रवार (जनवरी 3, 2019) को मुस्लिमों की दंगाई भीड़ ने गुरुद्वारे को घेर लिया और ‘या अल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारे लगाते हुए गुरुद्वारे को तहस-नहस करने की धमकी दी। पत्थरबाजी भी की गई। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक सिख पहले से ही जबरन धर्मान्तरण और प्रताड़ना के शिकार रहे हैं।

वहीं एनडीटीवी सरीखे चैनलों को इस बात से कोई दिक्कत नहीं है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथियों ने एक गुरुद्वारे को घेर कर भड़काऊ नारेबाजी की। गुरु नानक के जन्मस्थल को क्षतिग्रस्त करने की धमकी दे रहा था। एनडीटीवी व उसके पत्रकारों को इस बात से परेशानी है कि कहीं इस घटना का इस्तेमाल सीएए के पक्ष में न कर लिया जाए। एनडीटीवी ने पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने सिखों के ख़िलाफ़ मुस्लिम भीड़ के उपद्रव पर टिप्पणी करते हुए लिखा:

“ये काफ़ी बुरी ख़बर है। आशा कीजिए कि इसका इस्तेमाल नागरिकता संशोधन बिल के पक्ष में चलाए जा रहे प्रोपेगेंडा के पक्ष में न किया जाए। बता दूँ कि सीएए में दिसंबर 2014 का कट-ऑफ डेट रखा गया है। इसीलिए, इसका पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों से कुछ भी लेना-देना नहीं है।”

ये दिखाता है कि एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन को इससे कोई मतलब नहीं है कि मोहम्मद हसन नामक युवक ने एक सिख लड़की जगजीत कौर का अपहरण कर लिया और जबरन उससे इस्लाम कबूल करवाया। इससे भी एनडीटीवी को कोई दिक्कत नहीं है कि आरोपित हसन के समर्थन में मुस्लिम भीड़ ने ‘उलटा चोर कोतवाल को डाँटे’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए गुरु नानक के पवित्र जन्मस्थान को निशाना बनाया। एनडीटीवी को ये डर सता रहा है कि कहीं सीएए के पक्ष में इस घटना का इस्तेमाल न किया जाए।

श्रीनिवासन जैन को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की निंदा करनी चाहिए, जो बांग्लादेश का फेक वीडियो शेयर कर के भारत में ‘अल्पसंख्यकों पर पुलिस के अत्याचार’ की बात करते हैं और फजीहत होने पर वीडियो डिलीट कर लेते हैं। श्रीनिवासन जैन को सीएए का स्वागत करना चाहिए, जिसके कारण सिखों सहित पाकिस्तान के कई प्रताड़ित अल्पसंख्यक शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलने का रास्ता साफ़ हुआ है। लेकिन, श्रीनिवासन लिखते हैं कि इसका कट-ऑफ डेट दिसंबर 2014 है, इसीलिए फ़िलहाल पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों को इससे फ़ायदा नहीं है।

श्रीनिवासन जैन से एक सवाल- अगर सीएए से वहाँ पहले रह रहे अल्पसंख्यकों को फ़ायदा हुआ है तो फिर इसका विरोध क्यों? वो ख़ुद मान रहे हैं कि इस क़ानून को अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए लाया गया है। फिर वे सीएए के पक्ष में माहौल बनने से चिंतित क्यों हैं? जिस चैनल में रवीश कुमार कार्यरत हों, वहाँ के पत्रकारों से ऐसा ही अपेक्षित भी है।

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उद्धव ठाकरे सरकार में खींचतान शुरू: शिवसेना के मंत्री अब्दुल सत्तार ने दिया इस्तीफ़ा

महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार में खींचतान शुरू हो गई है, इसलिए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद से ही लगातार मंत्री पद न मिलने पर विधायकों की नाराज़गी की ख़बरें सामने आ रही थीं। इस बीच, औरंगाबाद से शिवसेना के विधायक और राज्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले अब्दुल सत्तार ने शनिवार (4 जनवरी) को अपने मंत्रिपद से इस्तीफ़ा दे दिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि उन्हें कैबिनेट मंत्री पद नहीं मिला था इस बात से वो ख़ासा नाराज़ थे। अपनी माँग पूरी न होने पर उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। हालाँकि, विधायक के पद पर वह अभी भी बने हुए हैं।

महाराष्ट्र की राजनीति में कद्दावर नेता माने जाने वाले अब्दुल सत्तार का इस्तीफा उद्धव सरकार के लिए एक बड़ा झटका है। आपको बता दें कि सत्तार पहले कॉन्ग्रेस में थे और उन्होंने विधानसभा चुनावों से कुछ पहले ही शिवसेना का दामन थामा था। 

जानकारी के अनुसार, शिवसेना ने पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में 1994 में प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में अब्दुल सत्तार को दाऊद का क़रीबी बताया था। 25 साल पुरानी सामना की यह रिपोर्ट अब सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रही है और शिवसेना के नेताओं को इसका जवाब देते नहीं बन रहा है। सामना ने 11 जून, 1994 को ‘शेख सत्तार के दाऊद गिरोह से क़रीबी संबंध’ शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की थी। तब अब्दुल सत्तार कॉन्ग्रेस में थे और उन्होंने शिवसेना के पार्षद को चुनाव में हराया था। 

इसके अलावा, 1993 के मुंबई विस्फोट मामले में मौत की सज़ा पाए याकूब मेमन के लिए दया का अनुरोध करने वाले विधायकों में भी सत्तार शामिल थे। लेकिन, आज की तस्वीर यह है कि मंत्रालयों के बँटवारे को लेकर एनसीपी और कॉन्ग्रेस में अब ठन गई है।

एनसीपी और शिवसेना अपने कोटे से एक भी मंत्री पद कॉन्ग्रेस से अदला-बदली करने के लिए तैयार नहीं है। एनसीपी और कॉन्ग्रेस नेताओं के बीच जारी घमासान के चलते दोनों दलों के नेता बैठक बीच में ही छोड़कर वहाँ से चलते बने। दोनों पार्टियों के आपसी विवाद के कारण मंत्रियों के विभागों का बँटवारा एक टेढ़ी खीर बनी हुई है।

अब्दुल सत्तार के इस्तीफ़ा दिए जाने के बाद से उद्धव ठाकरे की मुसीबत बढ़ गई, इसलिए उन्होंने शिवसेना के नेता को उन्हें मनाने के लिए भेज दिया है। ग़ौरतलब है कि 30 दिसंबर को 36 नए मंत्रियों की शपथ के साथ महाराष्ट्र में मंत्रिपरिषद के सदस्यों की संख्या अब 43 हो गई है, लेकिन नए मंत्रियों को उद्धव ठाकरे ने अभी तक विभागों का आवंटन नहीं किया है।

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लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी निसार अहमद डार श्रीनगर से गिरफ़्तार: कश्मीर में बड़े हमले की रच रहा था साज़िश

श्रीनगर पुलिस ने सुरक्षा बल के साथ एक ज्वाइंट ऑपरेशन में शुक्रवार देर रात आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के खूंखार आतंकवादी को धर-दबोचा है। पुलिस ने बताया कि यह आतंकी श्रीनगर में तैनात सुरक्षा बल के जवानों पर हमला करने की साज़िश रच रहा था। उन्होंने जानकारी दी कि गिरफ़्तार किए गए आतंकी के पास से बड़ी मात्रा में गोला-बारूद बरामद किया गया है।

बड़ी तादाद में बरामद हुए गोला-बारूद से इस बात का अंदाज़ा लगाया जाा सकता है कि वो किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की फ़िराक में था। ख़बर के अनुसार, एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस के ‘स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप’ ने उत्तर कश्मीर के बांदीपोरा ज़िले में हाजिन इलाक़े के निवासी निसार अहमद डार को शहर के श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल से गिरफ़्तार किया।

पूछताछ के दौरान पता चला है कि 23 वर्षीय आतंकवादी निसार अहमद डार हाजिन के वहाब पर्रे का रहने वाला है। इस बात का भी पता चला है कि वो पिछले कुछ समय से आतंकियों को हथियार सप्लाई करता था। आतंकी निसार के ख़िलाफ़ 2017 से लेकर 2019 तक आठ FIR दर्ज की जा चुकी है।

ख़बर के अनुसार, आतंकी निसार का स्थानीय आतंकी मोहम्मद सलीम पर्रे से गहरा रिश्ता था। उत्तरी कश्मीर में जब सुरक्षा बल और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हुई थी, तब निसार वहाँ से भाग निकला था। गिरफ़्तारी के बाद से ही पुलिस निसार से पूछताछ में जुटी हुई है। बता दें कि दो दिन पहले ही गादरबंद ज़िले से लश्कर के एक भूमिगत कार्यकर्ता रईस अहमद लोन को गिरफ़्तार किया गया था। उसके बारे में पता चला था कि उसने गुंड ज़िले में सक्रिय लश्कर के आतंकवादियों के लिए कई कार्ड पंजीकृत कराए थे।

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फैज़ अहमद फैज़: उनकी नज़्म और वामपंथियों का फर्जी नैरेटिव ‘हम देखेंगे’

फैज़ से मेरी मुलाकात लगभग 20 साल पहले हुई थी या यूँ कहिए मैंने फैज़ को वर्षों पहले, करीब 18-19 साल पहले खोजा था। मेरी पीढ़ी के और नवयुवको की तरह मैं भी उन दिनों संगीत और कविता में अपनी रुचि तलाश रहा था और इन सब का एक मात्र कारण थे जगजीत सिंह, जिनकी ग़ज़लों का चयन सरल और समझने में बेहद आसान था। इन ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने अपनी सहज गायन शैली और मखमली आवाज से और भी आसान बना दिया था। और शायद ऐसा हर किसी के साथ ही होता है इस पीढ़ी में कि ग़ज़लों को जानने, समझने की यात्रा जगजीत सिंह द्वारा आरंभ करने के बाद, आप गुलाम अली और मेहंदी हसन जैसे अन्य गायकों ढूँढना शुरू करते हैं, और अंत में, आप उन रचनाकारों तक भी पहुँच ही जाते हैं जिन्होंने उन सुंदर, ज्यादातर रोमांटिक, ग़ज़लों को लिखा था।

मुझे मेहंदी हसन की आवाज़ में “गुलों में रंग भरे” बेहद पसंद था, हालाँकि यह फ़ैज़ को जानने के लिए पर्याप्त नहीं था। जब मैंने फैज़ के बारे में आगे पढ़ना शुरू किया तो मेरे एक संगीत में रूचि रखने वाले मित्र ने मुझे बताया था कि प्रसिद्ध क्लासिक बॉलीवुड गीत “तेरी आँखों को सिवा दुनिया में रखा क्या है” असल में फैज़ द्वारा लिखित एक नज़्म से ली गई एक लाइन थी।

दोनों “गुलों में रंग भरे” (जिसे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ द्वारा लिखा गया है) और “तेरी आँखों के सिवा” (जिसे मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा लिखा गया है) संजीदा रोमांटिक कविताएँ हैं, लेकिन जब आप फ़ैज़ की नज़्म – “मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना माँग” पढ़ते हैं, जिसके बाद वाली लाइन से मजरूह साहब प्रेरित हुए थे, वहाँ आपकी मुलाक़ात एक नए फैज़ से होती है या यूँ कहिए कि आप अपने सामने “क्रांतिकारी” कवि फैज़ को पाते हैं या आधुनिक भाषा में, ‘वोक’ फ़ैज़ , जी हाँ वही ‘वोक मानुस’ जिसे आप जागा हुआ इन्सान कह सकते हैं।

मुझे ये नए वाले जागे हुए ‘जागृत फैज़’ अधिक आकर्षक दिखाई दिए। मुझे उनकी ये नज़्म बेहद पसंद थी और मैं उसमें बसे हुए जूनून से प्यार करने लगा था। मुझे उनकी अन्य नज़्में भी पसंद थीं, जैसे “चंद रोज़ और मेरी जान”, “बोल के लब आज़ाद हैं तेरे, और फिर उनकी सबसे शानदार नज्म, ‘हम देखेंगे’ को मैं दिल से लगा कर रखता था। अगस्त 1947 में जब भारत और पाकिस्तान को आज़ादी के बाद विभाजन मिला, तो उन्होंने सुबह-ए-आज़ादी नाम से भी एक नज़्म लिखी थी जिसमें कहा गया था, “वो इंतज़ार था जिसका यह वो सहर तो नहीं” जो ये दर्शाता था कि धर्म के आधार पर विभाजन फैज़ को पसंद नहीं था।

मुझे मेरे एक मित्र ने बताया था कि फैज़ ज़िया के पाकिस्तान से खुश नहीं थे, और ज़िया द्वारा सैन्य तख्तापलट के माध्यम से सत्ता पर कब्जा करने के बाद वो भारत वापिस आने की फ़िराक में थे। हालाँकि बाद में, उन्होंने लेबनान को शरण के लिए चुना था क्योंकि उन्हें पता था कि अगर उन्होंने भारत में शरण ली तो उनके बाकी “क्रांतिकारी” कवियों या रिश्तेदारों को ज़िया शासन द्वारा तंग किया जा सकता था और फिर ऐसा भी माना जा सकता था कि, फैज़ भारत को, जो की पाकितान का जानी दुष्मन है, दिल ही दिल से चाहते थे।

ऐसी पृष्ठभूमि और इतिहास के साथ, जब आईआईटी कानपुर कैंपस में ‘हम देखेंगे‘ के गायन को लेकर विवाद खड़ा हुआ, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया “लिबरल्स” की तरह ही थी। मेरे दिमाग में सबसे पहले यही आया कि ये बात ठीक नहीं है और मैंने नूपुर, जो कि Opindia की संपादक हैं, को साफ़ साफ़ कहा था कि फैज़ या उनकी कविता को किसी इस्लामिक प्रोजेक्ट के रूप में चित्रित करके नुपुर अपने को हंसी का पात्र न बनाए। वो बात दीगर है कि मैं ट्विटर पर लगातार तथाकथित लिबरल्स के मज़े ले रहा था और क्यूँ न लेता एक वही तो मेरा फेवरिट टाइम पास है।

इतना होने बावजूद भी मैंने इस विषय पर कोई वीटो नहीं लगाया था। क्योंकि इससे पहले, बी एच यू विवाद के दौरान, जब कई राईट विन्गर्स छात्रों को मुस्लिम शिक्षक का कथित रूप से विरोध करने के लिए प्रेरित कर रहे थे, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि शायद छात्र कुछ ज्यादा ही ओवर रियेक्ट कर रहे हैं। दिल से कहूँ तो इस मुद्दे पर ऑपइंडिया की रिपोर्टिंग वास्तव में अच्छी थी और उस एक लेख ने मुझे अपना शुरुआती रुख बदलने पर मजबूर कर दिया था। मूल रूप से, मैं गलत साबित हुआ था, और जब आई आई टी वाला मामला सामने आया तो मैंने सोचा कि अगर मैं फैज़ के बारे में फिर से गलत हुआ तो क्या होगा?

और आज करीब दो सप्ताह के बाद, क्या अब मुझे लगता है कि मैं फैज़ के बारे में गलत था? क्या अब मुझे लगता है कि वह एक इस्लामवादी थे? अगर कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो आईआईटी कानपुर में उस एक पैनल का गठन स्पष्ट रूप से यह तय करने के लिए किया गया था कि क्या फैज़ हिंदू विरोधी थे?

सबसे पहली बात तो ये कि वह फर्जी खबर है किआईआईटी कानपुर में पैनल का गठन उन प्रशासनिक मुद्दों की जाँच के लिए किया गया है जहाँ फैज़ की कविता पाठ का आयोजन किया गया था। सच ये है कि पैनल इस बात का विश्लेषण करेगा कि क्या इस आयोजन की उचित अनुमति ली गई थी या कुछ आयोजकों या प्रतिभागियों द्वारा नियमों की अवहेलना की गयी थी। और अगर कुछ तोड़ फोड़ या कुछ अनुशासनहीनता हुई भी थी तो उस  कुछ कार्रवाई करने की आवश्यकता है या नहीं, आदि इत्यादि।  इस पैनल का गठन फ़ैज़ या फैज़ की शायरी के मनोविश्लेषण के लिए तो कतई नहीं किया गया है।

आइए क्यों न हम वास्तव में “असली लिबरल” बने और लंबे समय से आयोजित मान्यताओं पर सवाल उठाना शुरू करें? यही तो होती है सच्चे लिबरल की पहचान?  क्यूँ नहीं हम फैज़ के बारे में उनकी शायरी से आगे जाने की कोशिश करें?

क्या थी फैज़ की राजनीति?

शुरुआत से ही फैज़ को एक खालिस मार्क्सवादी और गहन वामपंथी कवि माना जाता रहा है जिसे ‘लेनिन शांति पुरस्कार’ से नवाज़ा गया था। जी हाँ ये वही पुरस्कार है जिसे सोवियत रूस, जो कि उन दिनों एक साम्यवादी महाशक्ति था, द्वारा फैज़ को प्रदान किया गया था। असल में हम भारतीय, भारतीय मार्क्सवादियों और वामपंथियों को उनकी विचारधारा और प्रोपेगेंडा के कारण आमतौर पर हिन्दू विरोधी ही मानते हैं। फैज़ को वामपंथी मानने के बाद आमतौर पर ऐसा ही मान जाएगा कि फ़ैज़ हिंदू विरोधी थे, क्योंकि भारत में कम्युनिस्ट वास्तव में हिंदू विरोधी ही होते हैं। लेकिन देखने वाली बात ये है जनाब कि फ़ैज़ पाकिस्तानी सेटअप में वामपंथी थे, भारतीय सेटअप में नहीं तो इसका मतल तो उल्टा ही निकालता है न? लेकिन अगर सच कहें तो वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह साबित कर सके कि फैज़ हिंदू विरोधी थे।

देखा जाए तो वामपंथी रुल के मुताबिक इस्लामी समाज में तो एक वामपंथी को हिंदुओं के प्रति सहानुभूति ही होनी चाहिए, क्योंकि हिन्दू वहाँ के हाशिए पर हैं और उत्पीड़ित समुदाय हैं। उदाहरण के लिए पाकिस्तान में जन्मे लेखक और कमेंटेटर तारिक फतह को ले लीजिए। फतह एक पाकिस्तानी सेटअप में वामपंथी है और वह हिंदू विरोधी नहीं है। यहाँ तक कि आज जब  “तथाकथित भारतीय धर्मनिरपेक्ष सेक्युलर गैंग”  नागरिक संशोधन बिल के खिलाफ सड़कों पर दंगे कर रहा है, वहाँ पाकिस्तान में कई वामपंथी कार्यकर्ता और पत्रकार पाकिस्तानी हिंदुओं की दुर्दशा को उजागर कर रहे हैं।

सच कहूँ तो मुझे आजतक फैज़ द्वारा पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदुओं के समर्थन में किसी भी आन्दोलन के बारे में कोई खबर नहीं है। मुझे नहीं लगता कि फैज़ ने अल्पसंख्यक हिंदुओं की दुर्दशा को उजागर करते हुए कुछ भी, कभी भी, कहीं भी क्रांतिकारी लिखा हो। आप मुझे अगर गलत साबित कर दें तो मुझे बेहद खुशी होगी, लेकिन “महान-क्रांतिकारी” फैज़ इस मामले में थोड़े नहीं, बेहद कमज़ोर नज़र आते हैं। चलिए एक पल के लिए हिंदुओं को भूल जाते हैं , किन्तु एक मुस्लिम संप्रदाय अहमदिया के समर्थन में भी फैज द्वारा कभी कुछ नहीं किया गया। मान लेते हैं कि कविताओं के लिए उनकी स्याही सूख गयी होगी लेकिन कम से कम कोई एक अवार्ड तो लौटाया ही जा सकता था या एक छोटे-मोटे धरने पर तो बैठा ही जा सकता था लेकिन अफ़सोस कि आपको इतिहास के किसी भी पन्ने पर ऐसा कुछ नहीं मिलेगा।

माना ये जाता है कि अहमदिया संप्रदाय को सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक द्वारा गैर-मुस्लिम घोषित किया गया था जबकि सच ये है कि ये कारनामा वास्तव में जुल्फिकार अली भुट्टो की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार द्वारा किया गया था। ये भुट्टो ही थे जिन्होंने ने 1974 में एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से अहमदियों को गैर-मुस्लिम घोषित किया था। और फिर सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक ने 10 साल बाद एक अध्यादेश के माध्यम से संवैधानिक संशोधन कर अहमदियों के जीवन को बद से बदतर बना दिया। असली पाप के हक़दार तो जनाब ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो थे और ये जानकार आपके पैरों तले ज़मीन सरक जाएगी कि महान क्रन्तिकारी और वामपंथी विचारधारा वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ असल में इन्ही भुट्टो के ख़ास सहयोगी थे। फैज़ काफी समय तक भुट्टो सरकार में विभिन्न मंत्रालयों में सलाहकार और वरिष्ठ भूमिकाओं में काम करते रहे लेकिन भुट्टो ने अहमदियों के साथ जो किया उसका विरोध करने के लिए उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया।

एक क्रांतिकारी कवि को कम से कम ऐसा तो करना चाहिए था कि नहीं?

अल्पसंख्यकों के विरुद्ध पाकिस्तान सरकार द्वारा किसी भी कार्रवाई में फैज़ की कोई भी सक्रियता आपको कहीं भी नहीं दिखाई देगी। उस दौरान भी नहीं जब पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में भयानक जनसंहार कर डाला था। 2018 में प्रकाशित द हिंदू के एक लेख में तर्क दिया गया है कि फ़ैज़ युद्ध में इस तरह से सक्रिय थे, इस तरह से योगदान दे रहे थे कि उन्होंने  “पाकिस्तानी सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए ‘देशभक्ति’ कविताएँ लिखने से इनकार कर दिया था। हद ही है, आप किसी को इतना कैसे संदेह का लाभ दे सकते हैं? असल में क्रांतिकारी कारनामा तो वो होता जब फैज़ वास्तव में सेना के अन्याय के खिलाफ कविताएँ लिख रहे होते जो कि भले ही आपकी अपनी सेना द्वारा किया गया हो।

फैज़ के “जागृत” प्रशंसको को इस बात से कभी तकलीफ नहीं होती है कि फैज़ ने भारतीय सेना के बारे में क्या-क्या नहीं लिखा है लेकिन वो उस बात से खुश होते हैं कि लाखों लोगों को मारने और बलात्कार करने वाली सेना पर फैज़ ने कुछ नहीं लिखा। उनकी एक “ना” उनको एक क्रांतिकारी बना देती है जबकि असल में वो एक डरे हुए कवि थे जो “हाँ” कहने में डर गए थे ।

आप पाएँगे कि फ़ैज़ की सारी क्रांति ज़िया-उल-हक़ के विरोध से शुरू होती हैं और वहीं खत्म हो जाती है। इसके पीछे भी उनका स्वार्थ ही कहा जा सकता है क्योंकि ज़िया ने फ़ैज़ के एक दोस्त और अन्नदाता भुट्टो को सत्ता से बाहर कर दिया था। यदि फैज़ इस्लामवाद के विरोधी थे, तो उन्हें अपने मित्र भुट्टो को अहमदियों के खिलाफ कानून के लिए विरोध करना चाहिए था और यदि वे सत्ताधारी पार्टी का विरोध करते थे, तो उन्हें तब विरोध करना चाहिए था जब पूर्वी पाकिस्तान में लोगों के साथ भयानक अत्याचार किया जा रहा था। आज तक मुझे इन दोनों मोर्चों पर उनके द्वारा सक्रिय या मुखर विरोध का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है और रही पाकिस्तान के हिंदुओं के लिए किया गया उनका कोई भी आन्दोलन तो उसको तो आप भूल ही जाइए।

इन सब कारिस्तानियों के बाद भी फ़ैज़ को हिंदू विरोधी नहीं कह सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा उन पर ये आरोप लगाया जा सकता है कि वो पाकिस्तान में हिन्दुओं की हो रही दुर्दशा की तरफ आँख मूँदे रहे लेकिन आज लोग “हम देखेंगे” का विरोध इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि ये गीत उन सभी रूपकों का प्रयोग करता है जिसमें इस्लाम की मूर्तिपूजा के खिलाफ मान्यताओं को एक बल मिलता है जिसे वो एक क्रांति मानते है।

कवि की कविता का रिश्ता क्या?

ऐसा माना जाता है कि कोई भी कविता एक समय गुज़र जाने के साथ कवि के नाम से स्वतंत्र हो जाती है। और यही वो बात है जो ये लोग नहीं जानते जो फैज़ को न जानने के “अनपढ़ संघियों” पर ताना मार रहे हैं। और फिर ये भी वही लोग हैं जो भारतीयों द्वारा अल्लामा इकबाल की कविता को अपनाने को सही ठहराते हैं, भले ही इकबाल एक कट्टर इस्लामवादी थे और पाकिस्तान के निर्माण की दिशा में काम करने वाले एक प्रमुख व्यक्ति थे।

जनाब इक़बाल वही थे जिनकी शुरुआत हुई थी “हिंदी है हम, वतन है हिंदुस्तान हमारा” और पकिस्तान पहुँचते  पहुँचते ये बदल कर हो गयी थी  “मुस्लिम है हम, वतन है सारा जहाँ हमारा” लेकिन इस कारण ये कविता अर्थहीन नहीं हो जाती है। ये उन सभी द्वारा गाई जाती है जो इस कविता के मायने और इस कविता की भावना से सरोकार रखते हैं।

1994 की Il Postino (द पोस्टमैन) नामक एक इतालवी भाषा की फिल्म थी जिसका एक संवाद है जो इस मान्यता को कि “एक कविता एक समय गुज़र जाने के साथ कवि के नाम से स्वतंत्र हो जाती है” खूबसूरती से व्यक्त करता है। फिल्म एक काल्पनिक कहानी है जहाँ एक युवा डाकिया कवि पाब्लो नेरुदा से नियमित रूप से मिलता है और उनकी कविता से प्रभावित हो जाता है। बाद में वही डाकिया एक स्थानीय लड़की, जिससे वह प्यार करता है और शादी करना चाहता है, को प्रभावित करने के लिए नेरुदा की कुछ कविताओं को अपने नाम से उसे भेंट करता है। जब नेरूदा को इसका पता चलता है तो वे डाकिया से नारजगी ज़ाहिर करते हैं। जवान डाकिया यह कहते हुए अपने काम को सही ठहराता है कि “कविता उन लोगों की नहीं है जो इसे लिखते हैं, यह उन लोगों के हैं जिन्हें इसकी आवश्यकता है।”

बात में तो दम है क्यूंकि जब इक़बाल कहते हैं, “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” तो ये एक लाइन अब सिर्फ इकबाल की नहीं रह जाती है, क्योंकि वो बाद में फैज़ का चरित्र उस रूप में परिवर्तित हो गया था जिसे हिंदुस्तान के अस्तित्व की परवाह ही नहीं थी है। आज उन्ही इकबाल की ये एक छोटी सी लाइन कि “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” हर एक भारतीय को आश्वासन देती है कि उनका देश सभी बाधाओं के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखेगा।

अगर देखा जाए तो इस्लामवादी इकबाल के शब्दों का इस्तेमाल एक “संघी” द्वारा खुद को आश्वस्त करने के लिए किया जा सकता है कि हिंदुस्तान, हिन्दुओं की जन्मभूमि, आज भी जिंदा है जबकि समकालीन सभ्यताएं लुप्त हो गई हैं। और वहीं दूसरी तरफ, एक ’क्रांतिकारी’ फैज़ के शब्दों का उपयोग इस्लामवादी खुद को राहत देने के लिए कर सकते हैं कि ग़ज़वा-ए-हिंद बस होने ही वाला है।

फैज़ के “देखेंगे” में इस्तेमाल किए गए शब्द, मूर्तिपूजा के विरोध में इस्लाम की प्रचलित मान्यताओं के रूपक मात्र हैं और काबा में पूर्व-इस्लामिक मूर्तियों के नष्ट होने और अल्लाह के वर्चस्व की स्थापना की कल्पना का परिवेश पैदा करते हैं।

लेकिन जनाब अब ज़रा ये बताइए कि “वे” शब्द नागरिक संशोधन कानून के विरोध में कैसे उपयुक्त हो सकते हैं? याद है ना आपको कि इस तरह के विरोध प्रदर्शनों में जो भीड़ देखी गई थी वो क्या नारे लगा रही थी?

ये नारे थे ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या, ला इलाही इल्लल्लाह’ और ‘काफिरों से आजादी’ और साथ में अगर आपको याद हो तो पटना में भगवान हनुमान की एक मूर्ति को नष्ट भी कर दिया गया था।

अब आप यह तर्क दे सकते है कि यह कविता आईआईटी कानपुर में पढ़ी गई थी, जहाँ भीड़ ने इस तरह के नारे नहीं लगाए थे। लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि इन दिनों अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल (APSC) जैसे गैंग इन संस्थानों में पैर जमा रहे हैं। वे रामायण महोत्सव मनाने जैसी घटनाओं का विरोध सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ये उनकी भावनाओं के लिए अपमानजनक है बावजूद इसके कि जो लोग महोत्सव मना रहे हैं वो इन से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं।

दशानन दहन भी बुराई पर अच्छाई की जीत का रूपक है और इसे काबा से हटाई जा रही मूर्तियों के रूपक के समान माना जा सकता है। लेकिन APSC जैसे समूह इस विचारधारा का विरोध करते हैं। उनके विचार में, रावण एक द्रविड़ / दलित राजा था और उसका जलाया जाना बुराई पर अच्छाई की जीत नहीं बल्कि आर्यों / उच्च जातियों के दलित और पिछड़ी जातियों पर वर्चस्व के बारे में है और फिर वे क्या करते हैं? वे इस विरोध में राम का पुतला जलाते हैं। उनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रावण के पतन का जश्न मनाने वाले लोग उसे द्रविड़ या दलित जैसा कुछ नहीं मानते हैं, बल्कि उसे सिर्फ और सिर्फ एक खलनायक के रूप में देखते हैं।

इस सार्वभौमिक धार्मिक विचारधारा के विरोध का पूरा समर्थन लिब्रल्स और “जागृत” पीढ़ी करती है। इन्हीं बे सिर-पैर के तर्कों के सहारे जेएनयू जैसे परिसरों में महिषासुर की पूजा का आयोजन किया जाता है और दुर्गा पूजा का विरोध किया जाता है और हमारे तथाकथित लिबरल्स इसे “वैकल्पिक इतिहास” का नाम देते है। उनका ये समर्थन इस “वैकल्पिक इतिहास” को एक सामान्य घटना दिखाने के लिए किया जाता है बिना ये जाने हुए कि ऐसा करने से उन भावनाओं का क्या होगा जो महोत्सवों के विरोध में हुई घटनाओ से क्षुब्द हैं।

और फिर अगर ऐसा ही है तो फैज़ की शायरी का विरोध करने वालों को इस बात की परवाह क्यों कर होनी चाहिए कि इस कविता का मतलब क्या है या फैज़ उन लोगों का कौन था जो इस कार्यक्रम का आयोजन कर रहे थे?

सिर्फ मूर्तियों को नष्ट किए जाने की कल्पना मात्र और केवल अल्लाह का नाम ही इस दुनिया में रहना चाहिए, ये सोच मात्र ही इस कविता का विरोध करने के लिए काफी होना चाहिए ना? या फिर लिबरल्स को ये लगता है कि उनकी भावनाएँ दूसरों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हैं?

यह बेहद दुखद है कि फैज़ को इस सब में घसीटा गया है, लेकिन जान लीजिए कि यह फैज़ के खिलाफ लड़ाई नहीं है। यह एक पुरानी उलझी हुई कट्टर परम्परा के खिलाफ लड़ाई है, जो माँग करती है कि ‘जहिल’ लोगों को पूरी तरह से सर झुका कर मानना होगा कि वो क्या पढ़ें, क्या सोचे, बिना आज्ञा के कोई कार्य न करें, और इन सब बातों के खिलाफ कभी आवाज़ ना उठाएँ।

लेकिन उन्हें इस बात का एहसास नहीं है कि जाहिलों ने अब मन बना लिया है और बोलने का फैसला किया है और उनके “लब भी आज़ाद हैं”। उन्होंने अब दीवार से पीठ सटा कर खड़े होने से इनकार कर दिया है और पत्थर का जवाब चट्टान से देने का ठान लिया है। उन्हें अब अपनी ‘जाहिलियत‘ पर शर्म नहीं आती या फैज़ के शब्दों में कहें तो जाहिलों ने ऐलान कर दिया है कि:

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

नोट: राहुल रौशन द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे इस लेख का अनुवाद मनीष श्रीवास्तव द्वारा किया गया है।

JNU में नक़ाबपोश छात्रों ने लाइट बंद कर किया हंगामा: टेक्निकल स्टाफ को किया बाहर, रजिस्ट्रेशन में डाला व्यवधान

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में विवादों का सिलसिला अभी थमा नहीं है। दरअसल, एक ख़बर सामने आई थी कि विश्वविद्यालय के सूचना केंद्र मे छात्रों के एक ग्रुप ने हमला बोल दिया, इस वजह से रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया प्रभावित हो गई। JNU प्रशासन का कहना है कि शुक्रवार (3 जनवरी) को दोपहर के क़रीब 1 बजे, छात्रों का एक समूह जो अपना चेहरा ढके हुए थे वो सूचना प्रणाली के केंद्र में जबरन घुसे और उन्होंने बिजली की सप्लाई को भी बंद कर दिया। सभी तकनीकी कर्मचारियों को जबरन बाहर निकाल दिया और सर्वर को बंद कर दिया।

इस मामले पर विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि छात्रों के इस हमले से रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हुई और छात्रों के लिए अपना रजिस्ट्रेशन प्रोसेस पूरा करना असंभव हो गया। प्रशासन ने चेतावनी देते हुए बताया कि उन सभी हुड़दंगियों के ख़िलाफ़ विश्वविद्यालय प्रशासन सख़्त कार्रवाई करेगी, जिन्होंने रजिस्ट्रेशन करने वाले हज़ारों छात्रों को परेशान किया।

इससे पहले भी ऐसी कई ख़बरें आ चुकी हैं जिनमें JNU के छात्रों ने प्रोफेसर्स और वैज्ञानिकों को न सिर्फ़ बंधक बनाया बल्कि उनके साथ बदतमीज़ी करते हुए उन्हें गालियाँ भी दी। इनमें वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन जैसे नाम शामिल हैं जिन्हें उन्हीं की लैब में नहीं जाने दिया गया था। जेएनयू के छात्रों की गुंडागर्दी से आहत रंगनाथन ने कहा था कि पता नहीं इस देश में विज्ञान कैसे आगे बढ़ेगा।

इसी तरह, प्रोफेसर गोवर्धन दास को एक इंटरनेशनल ग्रांट प्रपोजल पर काम करना था, जो संभव नहीं हो सका। उन्हें एक निश्चित समय सीमा के भीतर अपना काम ख़त्म करना था, लेकिन लैब में तालाबंदी कर छात्रों ने उन्हें परेशान किया। इस दौरान उनके साथ धक्का-मुक्की की गई, उनका मोबाइल छीना गया और उन्हें 40 छात्रों की भीड़ ने गालियाँ दी। इन दोनों के अलावा वैज्ञानिक शैलजा सिंह भी लैब में नहीं जा सकीं। 

ग़ौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हॉस्टल शुल्क में वृद्धि 11 नवंबर 2019 को की गई थी, जिसके बाद से ही विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे। इस दौरान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हज़ारों छात्र पुलिस के साथ भिड़ गए। इससे मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में छह घंटे से अधिक समय तक फँसे रहे।

12 प्रोफेसरों और वैज्ञानिकों को बनाया बंधक: लैब में JNU के छात्रों की गुंडई, फोन व कागजात छीने

JNU के छात्रों पर है ₹3 करोड़ का बकाया, फ़ीस बढ़ाने को लेकर चलाया जा रहा है झूठा अभियान

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कोई सिख नहीं रहेगा यहाँ, नाम होगा गुलाम-ए-मुस्तफा: ननकाना साहिब में पत्थरबाजी, मारपीट पर भारत ने जताई कड़ी आपत्ति

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रहे ज़ुल्म थमने का नाम नहीं ले रहा है। शुक्रवार (3 जनवरी) को सिखों के पवित्र धर्मस्थल ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर मुस्लिम भीड़ ने पत्थरबाज़ी की, सिखों के साथ मारपीट की और उनके घरों में भी पत्थरबाज़ी की। मुस्लिम भीड़ का उत्पात इस क़दर बढ़ गया कि वहाँ भारी पुलिस बल की तैनाती करनी पड़ी, लेकिन फिर भी हालात तनावपूर्ण ही बने रहे।

पिछले साल ज्ञानी भगवान सिंह की बेटी जगजीत कौर का अपहरण कर उसका धर्मातरण करवाने वाले मोहम्मद हसन के रिश्तेदार राणा मंसूर ने मुस्लिम भीड़ को उकसाया और ननकाना साहिब के गेट पर पत्थरबाज़ी की। इस घटना को अंजाम तब दिया गया, जब मुस्लिम समुदाय के लोग जुमे की नमाज अता कर अपने घर लौट रहे थे। ननकाना साहिब में रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों ने ननकाना साहिब के मुख्य बाजार में धरना भी दिया। धरने का नेतृत्व राणा मंसूर ने किया।

पाकिस्तान में सिखों के साथ हुई हिंसा पर भारत ने कड़ा रुख़ अख़्तियार किया है। विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “पवित्र गुरुद्वारा में अभद्रता करने वाले और अल्पसंख्यक सिख समुदाय के सदस्यों पर हमला करने वाले उपद्रवियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके अलावा, पाकिस्तान सरकार पवित्र ननकाना साहिब गुरुद्वारा की पवित्रता की रक्षा और संरक्षण के लिए सभी उपाय करने के आदेश दे।”

ट्विटर पर बीबीसी के पत्रकार रविंद्र सिंह रॉबिन ने इस घटना से जुड़े कई वीडियो पोस्ट किए। उनके द्वारा पोस्ट किए गए एक वीडियो में दंगाई यह कहते हुए नज़र आ रहे थे कि वे ननकाना साहिब में एक भी सिख को नहीं रहने देंगे और गुरुद्वारे का नाम बदलकर गुलाम-ए-मुस्तफा कर देंगे।

पाकिस्तान में ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर हमले को लेकर के पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ट्वीट करके पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से इस मामले में कड़ी कार्रवाई करने और साथ ही गुरुद्वारे में फँसे हुए श्रद्धालुओं को सुरक्षित बाहर निकालने की अपील की।

पाकिस्तान में गुरुद्वारा में हमले के बाद बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कॉन्ग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी को आड़े हाथ लिया। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि पाकिस्तान में हमारे सिख भाइयों को धमकी दी जा रही है।

वहीं, दिल्ली के राजौरी गार्डन से विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने ट्विटर पर हमले का वीडियो शेयर करते हुए पाकिस्तान के पीएम इमरान खान से तत्काल कार्रवाई की माँग की और लिखा कि ऐसे ही लोगों के कारण पाकिस्तान में सिखों हिन्दुओं की बेटियों का ज़बरन धर्म परिवर्तन हो रहा है! आपने अगर ननकाना साहिब की बेअदबी करने वाले लोगों पर आज एक्शन नहीं लिया तो दुनिया आपको कभी माफ़ नहीं करेगी।

अपने एक अन्य ट्वीट में सिरसा ने कहा कि गुरुद्वारे पर हमले के बाद पूरे पाकिस्तान में सिख समुदाय के बीच दहशत का माहौल है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “पाकिस्तान में मजहबी नफरत का आलम देखिए- ये उग्र भीड़ सिखों को पाकिस्तान से बाहर निकालने के नारे लगा रही है और चिल्ला चिल्लाकर कह रही है कि ननकाना साहब का नाम बदलकर गुलाम-ए-मुस्तफा रख देंगे।”

इनके अलावा, केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने अल्पसंख्यकों पर हो रहे ज़ुल्म और ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर हुए हमले को पाकिस्तान का असली चेहरा बताते हुए कॉन्ग्रेस पर तंज कसा।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के अध्यक्ष गोबिंद सिंह लोंगोवाल ने कहा कि वह सिखों को दबाने की कोशिश बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने सिखों के ख़िलाफ़ की गई नफ़रत भरी बयानबाजी, पत्थरबाज़ी और नारेबाज़ी की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान सरकार दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त क़ानूनी कार्रवाई करे।

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पाक ने फिर की भारत को बदनाम करने की साजिश: इमरान ने पोस्‍ट किया फर्जी वीडियो, फजीहत के बाद किया डिलीट

भारत के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार की मुहिम में पाकिस्तान हर सीमा लाँघने में लगा हुआ है। पाकिस्‍तान एक बार फिर अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर भारत को बदनाम करने के चक्‍कर में खुद की फजीहत करा बैठा है। इस बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान नियाजी ने बांग्लादेश का एक वीडियो जारी किया और इसे भारत का बताया। इस वीडियो में उत्तर प्रदेश पुलिस को मुस्लिम युवकों की पिटाई करते हुए दिखाया गया था। भारत की ओर से झूठे वीडियो को लेकर इमरान खान नियाजी को माकूल जवाब दिया गया। सोशल मीडिया साइट पर भी ट्रोल हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लेकिन पाकिस्तान के लिए इसमें कोई नई बात नहीं है। बस अंतर इतना है कि उनके मंत्री तो ऐसा करते ही थे लेकिन अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी खुलकर ख़ुद फेक न्यूज फैला रहे हैं। वैसे पहले भी इमरान खान ऐसा कर चुके हैं।

कहा जा रहा है कि ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर भीड़ के हमले की घटना से दुनिया का ध्यान हटाने के लिए इमरान खान ने शुक्रवार (3 जनवरी) की रात को एक के बाद एक कई वीडियो ट्वीट कर ‘भारत में मुस्लिमों पर पुलिस के अत्याचार’ का झूठा दावा किया।

जिस समय ननकाना साहिब में कट्टरपंथियों की भीड़ सिखों को शहर से भगाने की धमकी दे रही थी, उसी वक्त इमरान खान भारत में संशोधित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन का हवाला देते हुए ट्विटर पर फेक न्यूज फैला रहे थे। ऐसे ही एक ट्वीट में इमरान खान ने बांग्लादेश का वीडियो शेयर करते हुए दावा किया कि भारतीय पुलिस यूपी में मुस्लिमों पर बर्बरता कर रही है।

वीडियो में इमरान जिन्हें यूपी पुलिस के जवान के तौर पर बता रहे थे, जबकि सच्चाई यह है कि उनकी वर्दी पर बड़े-बड़े अक्षरों में साफ-साफ RAB लिखा हुआ था। RAB यानी रैपिड ऐक्शन बटैलियन जो कि बांग्लादेश पुलिस की ऐंटी-टेररिज्म यूनिट है। इमरान ने जिस वीडियो को ट्वीट किया, वही वीडियो यू-ट्यूब पर 10 सितंबर 2013 को अपलोड किया गया था। वीडियो बांग्लादेश का है। वीडियो के बारे में दावा किया गया है कि हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम रैली पर बांग्लादेशी पुलिस ने बर्बरता की है।

बांग्लादेश के लगभग 7 साल पुराने वीडियो को ट्वीट कर इमरान ने दावा किया कि भारतीय पुलिस मुस्लिमों पर अत्याचार कर रही है। वहीं, यूपी पुलिस ने भी साफ़ कर दिया है कि ये वीडियो फर्जी हैं और उनकी ओर से इस तरह की कोई कार्रवाई नहीं की गई है। बुरी तरह ट्रोल होने के बाद इमरान ने ये वीडियो हटा लिया।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने भी इमरान खान को लताड़ लगाते हुए हुए कहा कि पाकिस्तान की झूठ फ़ैलाने की पुरानी आदत है बड़ी मुश्किल से जाती है।

बता दें कि शुक्रवार (3 जनवरी) को सौ से ज्यादा मुस्लिमों की आक्रोशित भीड़ ने गुरुद्वारे को घेरकर उस पर पत्थरबाज़ी की। ट्विटर पर बीबीसी के पत्रकार रविंद्र सिंह रॉबिन ने इस घटना की वीडियो अपलोड किया। अपने ट्वीट में जानकारी देते हुए रॉबिन ने बताया था कि वीडियो में नजर आ रही मुस्लिम भीड़ का नेतृत्व सिख लड़की जगजीत कौर का अपहरण कर उसे इस्लाम क़बूल करवाने वाले मोहम्मद हसन के परिजनों ने किया था। उनके ट्वीट्स के मुताबिक़ इस हमले के कारण ननकाना साहिब में करीब 30 सिख फँसे हुए थे। दरअसल, पिछले साल जिस जगजीत कौर का जबरन धर्मांतरण हुआ था, वह ननकाना साहिब गुरुद्वारे के ही ग्रंथी की बेटी हैं।

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कॉन्ग्रेस से गठबंधन के चलते CM उद्धव के पास वीर सावरकर के लिए समय नहीं, रंजीत सावरकर लौटे खाली हाथ

कॉन्ग्रेस सेवादल द्वारा वीर सावरकर पर विवादित बुकलेट का मुद्दा गर्माने के बाद सावरकर के पोते रंजीत सावरकर ने इस पर अपना विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने माँग की है कि इस मामले के संबंध में राहुल गाँधी समेत कॉन्ग्रेस के कई लोगों पर मामला दर्ज होना चाहिए।

एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा, “सावरकर जी पर लगाए आरोपों के मामले में राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस सेवा दल समेत कई लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज होना चाहिए।”

गौरतलब है कि शिवसेना के साथ महाराष्ट्र में गठबंधन की सहयोगी पार्टी कॉन्ग्रेस द्वारा की गई सावरकर पर ओछी हरकत के खिलाफ़ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए रंजीत सावरकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मिलने पहुँचे थे। लेकिन मुख्यमंत्री ने उन्हें एक मिनट बात करने का समय तक भी नहीं दिया।

मीडिया से बात करते हुए रंजीत सावरकर ने कहा,“मैं यहाँ मुख्यमंत्री से मिलने आया। मैंने उनसे मिलने हेतु अपॉइंटमेंट के लिए कई गुजारिश की। लेकिन मैं उनसे नहीं मिल सका। सावरकर जी की इज्जत का मामला होने के बाद भी उनके (मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे) पास मुझसे बात करने के लिए एक मिनट का समय नहीं हैं। मैं बहुत आहत हूँ। ये सावरकर जी का अपमान है। “

उल्लेखनीय है कि वीर सावरकर के पोते रंजीत सावरकर ने इस विवादित पुस्तिका पर रोक लगाने की माँग की है। साथ ही रंजीत ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से अपील की है कि वह राज्य में इस किताब पर बैन लगा दें। रंजीत सावरकर ने अपील की है कि इस मामले में सेक्शन 120, 500, 503, 504, 505 और 506 के तहत केस दर्ज किया जाना चाहिए।

उनका कहना है कि महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे को भी इस मामले में दखल देना चाहिए और एक्शन लिया जाना चाहिए। रंजीत सावरकर ने कहा कि मध्य प्रदेश में ऐसी किताबें कॉन्ग्रेस ही बाँट रही है, उनकी ओर से सावरकर को बदनाम करने का लगातार इस तरह का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में शिवसेना को कॉन्ग्रेस के सामने आपत्ति दर्ज करानी चाहिए।

ननकाना साहेब गुरुद्वारे पर मुस्लिमों का हमला, कहा- कोई सिख नहीं रहेगा यहाँ, नाम होगा गुलाम-ए-मुस्तफा

पाकिस्तान से एक बार फिर अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थल को निशाना बनाने की खबर आ रही है। मामला ननकाना साहेब गुरुद्वारे का है। जहाँ आज यानी शुक्रवार को सौ से ज्यादा मुस्लिमों की आक्रोशित भीड़ गुरुद्वारे को घेरकर उसपर पत्थरबाजी कर रही है। ट्विटर पर बीबीसी के पत्रकार रविंद्र सिंह रॉबिन ने इस घटना की वीडियो डाली है। वे लगातार इस मामले पर जानकारी दे रहे हैं।

अपने ट्वीट में जानकारी देते हुए रॉबिन ने बताया कि वीडियो में नजर आ रही मुस्लिम भीड़ का नेतृत्व सिख लड़की जगजीत कौर का अपहरण कर उसे इस्लाम कबूल करवाने वाले मोहम्मद हसन के परिजनों ने किया है। उनके ट्विट्स के मुताबिक इस हमले के कारण ननकाना साहिब में करीब 30 सिख फँसे हुए हैं।

गौरतलब है कि ट्विटर पर पत्रकार ने इस संबंध में मुस्लिम भीड़ की एक वी़डियो भी जारी की है। जिसमें दंगाई कहते नजर आ रहे हैं कि वे ननकाना साहिब में एक भी सिख को नहीं रहने देंगे और गुरुद्वारे का नाम बदलकर गुलाम-ए-मुस्तफा कर देंगे।

बता दें, पत्रकार द्वारा जारी वीडियो में देखा जा सकता है कि ननकाना साहिब में मुस्लिम भीड़ कितनी उग्र है। जिसमें एक मुस्लिम युवक सिख लड़की (जगजीत कौर) का अपहरण कर उसे इस्लाम कबूल करवाकर निकाह करने के मामले पर खुलेआम बातें कर रहा है और बाकी मुस्लिम पीछे उसके नारे लगा रहे हैं।

इनका आरोप है कि ‘अपनी मर्जी से इस्लाम कबूलने’ और ‘शादी करने वाली’ लड़कियों को लेकर सिख समुदाय बेवजह हंगामा खड़ा करता है। बता दें कि पिछले साल जिस जगजीत कौर का जबरन धर्मांतरण हुआ था, वह ननकाना साहिब गुरुद्वारे के ही ग्रंथी की बेटी हैं।

ताजा जानकारी के अनुसार इस उग्र भीड़ ने शाम होते-होते भी ननकाना साहिब गुरुद्वारे को घेर रखा है। वहीं, पुलिस-प्रशासन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। लोग बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर अंदर छिपे हुए हैं।

अगवा सिख लड़की पहुँची घर, हाफ़िज़ सईद के आतंकी संगठन के मो. हसन से करवाया गया था निकाह

शिवसेना के आदित्य ठाकरे करेंगे ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ उमर खालिद के साथ CAA-NRC विरोधी आयोजन में शिरकत

हिंदूहृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे ने शिवसेना की नींव हिंदुत्व के आधार पर रखी थी। लेकिन आज कुर्सी के लोभ में कॉन्ग्रेस-एनसीपी से गठबंधन कर न केवल पार्टी और उसके नेता उस बिंदु से भटक गए। बल्कि बालासाहेब का खुद का पोता आदित्य ठाकरे भी राजनीति करते-करते, टुकड़े-टुकड़े गैंग के उमर खालिद जैसे कई सदस्यों के साथ मंच साझा करने के लिए तैयार हो गया है।

दरअसल, सोशल मीडिया पर छात्र भारती विद्यार्थी संगठन द्वारा आय़ोजित किए जाने वाले कार्यक्रम का एक पोस्टर सामने आया है। जिसके ऊपर CAA, NRC विरोधी छात्र परिषद लिखा हुआ है। और नीचे पोस्टर में उमर खालिद, ऋचा सिंह, AMUSU अध्यक्ष सलमान इम्तियाज, जावेद अख्तर, जामिया छात्र नेता हम्मादुररहमान, सादिया शेख जैसे लोगों के साथ शिवसेना से आदित्य ठाकरे का नाम भी शामिल है।

हालाँकि, इस सूची में टुकड़े-टुकड़े गैंग का मुख्य चेहरा रहे उमर खालिद के अलावा AMUSU अध्यक्ष सलमान इम्तियाज, जावेद अख्तर, जामिया छात्र नेता हम्मादुररहमान का नाम हैरानी की बात नहीं है। क्योंकि इनमें जावेद अख्तर जैसे लोग वो चेहरा हैं जो अफजल गुरु की दया याचिका तक पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। लेकिन यहाँ पर आदित्य ठाकरे की उपस्थिति किसी अचंभे से कम नहीं है।

आदित्य ठाकरे एक ऐसे शख्स के पोते हैं। जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदुत्व के नाम पर जिया और हमेशा कट्टर हिंदू के रूप में पहचाने जाते रहे। मगर, अब उनकी गैर-उपस्थिति में उनकी पार्टी, उनका बेटा और उनका पोता सब उनके दिखाए रास्ते से भटक गए हैं। जो खुद को सेकुलर दिखाने के लिए वामपंथियों द्वारा आयोजित मंच को देश विरोधी नारे लगाने वालों के साथ साझा करने को तैयार हैं।

छात्र भारती का फेसबुक पोस्ट

याद दिला दें, अभी बीते अक्टूबर में विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना ने सत्ता पाने के लिए लंबे समय से चले आ रहे गठबंधन को भाजपा के साथ तोड़ लिया था और एनसीपी-कॉन्ग्रेस के साथ गठजोड़ किया था। शिवसेना के इस कदम को मतदाताओं को दिए धोखे के रूप में परखा गया था।

मगर, शिवसेना द्वारा सरकार बनाने के बाद उम्मीद की गई थी कि जिस तरह पार्टी ने भाजपा को धोखा दिया, वे उस तरह हिंदुत्व यानी पार्टी की विचारधारा के साथ बेईमानी न करें। लेकिन अब आदित्य ठाकरे के ऐसे समारोह में शामिल होने की खबर देखकर लग रहा है कि शिवसेना अपनी मूल विचारधारा पर भी पानी फेरने को तैयार है।

बता दें छात्र भारती द्वारा करवाया जा रहा ये कार्यक्रम यशवंत राव चवन सेंटर में 5 जनवरी को मुंबई में आयोजित होगा। जिसमें अलग-अलग संगठन और संस्थान से आए मुस्लिम युवा नेताओं के साथ वामपंथी लोग शामिल होंगे। पोस्टर में प्रकाशित जानकारी के अनुसार इस कार्यक्रम को एसएफआई जैसे वामपंथी संगठनों का सहयोग प्राप्त हैं।