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शरद पवार की 2 डिमांड पूरी कर देते मोदी-शाह तो उद्धव ठाकरे नहीं बनते महाराष्ट्र के सीएम

महाराष्ट्र में जब से शिवसेना ने कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ मिल कर सरकार बनाई है, तब से ही उसकी उम्र को लेकर अटकलें लग रही है। इस बीच, जो खबरें सामने आ रही है उसके मुताबिक एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने मजबूरी में उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पवार भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहते थे। भाजपा को समर्थन के एवज में उन्होंने दो मॉंगे रखी थी, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष एवं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ठुकरा दिया। मजबूरन, पवार को शिवसेना और कॉन्ग्रेस के साथ सरकार बनानी पड़ी।

जानकारी के मुताबिक पवार की पहली माँग थी कि उनकी सांसद बेटी सुप्रिया सुले को मोदी कैबिनेट में कृषि मंत्री की जिम्मेदारी मिले। उनकी दूसरी माँग थी कि भाजपा देवेंद्र फडणवीस की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाए। मोदी ने उनकी दोनों मॉंगें ठुकरा दी।

न्यूज एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक एनसीपी को कृषि मंत्रालय देने की सूरत में बिहार में बीजेपी की सहयोगी जदयू रेल मंत्रालय मॉंग सकती थी। भाजपा नहीं चाहती थी कि ऐसी कोई भी सूरत पैदा हो जिसमें अपने दम पर बहुमत होने के बावजूद पार्टी के हाथ से दो बड़े मंत्रालय निकल जाए।

पवार की दूसरी माँग पूरी करने के लिए फडणवीस को बदलने पर भी भाजपा राजी नहीं थी। बिना किसी विवाद और आरोप के जिस तरीके से फडणवीस ने पॉंच साल सरकार चलाई उससे पार्टी नेतृत्व काफी प्रभावित था। फडणवीस बीते 47 साल में महाराष्ट्र के पहले ऐसे सीएम थे जिसने पॉंच साल का कार्यकाल पूरा किया।

साथ ही पार्टी ने फडणवीस के चेहरे को प्रोजेक्ट कर ही चुनाव लड़ा था। प्रधानमंत्री ने खुद को 24 अक्टूबर को भाजपा मुख्यालय से पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि सरकार बनने पर फडणवीस ही सीएम होंगे। लिहाजा, पवार की यह मॉंग पूरी करना भी पार्टी नेतृत्व को उचित नहीं लगी।

पवार ने अपनी मॉंगों को लेकर मोदी और शाह को संदेशा भिजवाया था। विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद उन्होंने भाजपा के खिलाफ कोई कड़ी टिप्पणी भी नहीं की है। जब माँगों पर भाजपा की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला तो पवार ने 20 नवंबर को पीएम मोदी के साथ 45-50 मिनट लंबी बैठक भी की। इस बैठक का भी कोई परिणाम नहीं निकला। प्रधानमंत्री एनसीपी की माँगों पर सहमत नहीं हुए।

इसके बाद 22 नवंबर को शरद पवार के भतीजे और एनसीपी विधायक दल के नेता रहे अजित पवार ने भाजपा को समर्थन की पेशकश कर दी। उनकी तरफ से बताया गया कि पार्टी के करीब 30-35 विधायक भाजपा का समर्थन करने को तैयार हैं। उस समय यह भी अनुमान लगाया गया था कि शायद पवार ने अपने भतीजे को इस कदम के लिए अपनी सहमति दी है। लेकिन, बाद में उन्होंने ट्विटर के माध्यम से भाजपा के साथ एनसीपी के गठबंधन को नकार दिया।

बताया जा रहा है कि अजित पवार के कदम से सार्वजनिक तौर पर भले शरद पवार ने दूरी बना रखी थी, लेकिन इसे उनका मौन समर्थन हासिल था। उन्हें उम्मीद थी कि आखिर में भाजपा उनकी शर्तें मान लेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने अजित पवार को पीछे हटने का संदेशा दिया और शिवसेना तथा कॉन्ग्रेस के साथ सरकार बना ली।

आरएसएस के विचारक दिलीप देवधर के हवाले से आईएनएस ने बताया है कि पवार की मॉंग पर संघ परिवार में काफी चर्चा हुई। लेकिन, उससे भी ज्यादा प्रधानमंत्री मोदी के उनके दबाव के आगे नहीं झुकने की रही। उन्होंने कहा कि किसानों का मसला महाराष्ट्र में प्रमुख मुद्दा होने के कारण कृषि मंत्रालय राजनीतिक रूप से काफी मुफीद रहता। पवार खुद भी केंद्र में कृषि मंत्री रह चुके हैं।

देवधर ने बताया, “मुख्यमंत्री पद के लिए फडणवीस मोदी की ही खोज रहे हैं। ऐसे में उन्हें किनारे करने का सवाल ही नहीं उठता। जब शरद पवार लगा कि भाजपा उनकी मॉंगों को नहीं मानने वाली है, तो उन्होंने आखिरकार कॉन्ग्रेस-शिवसेना के साथ पहले से सरकार बनाने को लेकर चल रही बातचीत को ही मुकाम पर पहुॅंचाने का फैसला किया।”

मस्जिद के उर्स समारोह के बाद दोस्त के साथ घूमने गई 14 साल की लड़की का गैंगरेप, आरोपितों के स्कैच जारी

गुजरात के वडोदरा में 14 साल की नाबालिग लड़की का गुरुवार (28 नवंबर) की रात को नवलखी कम्पाउंड में दो व्यक्तियों द्वारा सामूहिक बलात्कार की ख़बर सामने आई है। पीड़ित लड़की अपने एक 16 साल के दोस्त के साथ कंपाउंड के अंदर घूम रही थी कि उसे नकली पुलिस बने दो लोगों ने घसीटा और उसके साथ मारपीट की, लड़के को भगाया और फिर नाबालिग का रेप किया।

दरअसल, लड़की और उसका दोस्त डांडिया बाज़ार की एक मस्जिद में उर्स समारोह में शामिल होने गए थे। वहाँ से, वे लगभग 8 बजे अपनी बाइक पर नवलाखी परिसर में घूमने गए। उनके पहुँचने के कुछ ही मिनटों बाद, दो लोग पैदल आए और उन्होंने दोनों को अपना परिचय पुलिसकर्मी के तौर पर दिया। उन्होंने लड़की और उसके दोस्त से पूछताछ शुरू की और उन्हें दूर भगाने की कोशिश की। जब लड़की और उसका दोस्त वहाँ से दूर जाने लगे, तो दोनों ने लड़की को पकड़ लिया और लड़के की पिटाई की। जब लड़का भागने लगा, तो उन्होंने लड़की को एक अलग स्थान पर खींच लिया। उन्होंने उससे पूछा कि क्या उसके पास कोई स्वर्ण आभूषण या मोबाइल फोन है। जब लड़की ने मना किया, तो वे उसके साथ बलात्कार करने की मंशा से ले गए।

दूसरी ओर लड़की का दोस्त भागते हुए अकोटा-डांडिया बाज़ार के मुख्य सड़क पर चला गया। उसने दावा किया कि उसने पहले पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया और फिर अपने दोस्त का फोन नंबर डायल किया। इस संबंध में संदीप चौधरी, पुलिस उपायुक्त (अपराध), जोन II ने बताया,

“जैसे ही हमें लड़की के अपहरण के बारे में पता चला, हमने पुलिसकर्मियों की कई टीमों को घटनास्थल पर भेजा। हमारे दस्ते घनी झाड़ियों में खोजने लगे। लगभग डेढ़ घंटे की खोज के बाद, पुलिस ने आख़िरकार लड़की को नवलखी कंपाउंड के पश्चिमी छोर पर स्थित एक क्रिकेट ग्राउंड के पास स्पॉट किया।”

चौधरी ने कहा, “चिकित्सीय जाँच में पुष्टि हुई है कि उसके साथ कई बार बलात्कार किया गया और उसके निजी अंगों में चोटें भी आईं हैं।” फ़िलहाल पुलिस नाबालिग लड़की को इलाज के लिए सयाजी अस्पताल ले गई है।

शहर के पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलौत ने बताया, “बलात्कार पीड़िता उत्तर प्रदेश के एक रिक्शा चालक की बेटी है जो पुराने शहर के इलाक़े में रहता है। लड़की के विवरण के आधार पर, हमने आरोपितों के स्कैच बनाए हैं और सभी पुलिस स्टेशनों में इसे प्रसारित किया है।”

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PM मोदी के नाम धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों ने लिखा पत्र: कुलपति की निकाली शवयात्रा, आज ग्राम देवता पूजन

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के छात्रों द्वारा फिरोज खान की नियुक्ति के विरोध में किया जा रहा आंदोलन जारी है। छात्र कक्षाओं और परीक्षाओं के बहिष्कार पर अंतिम समाधान तक कायम हैं। प्रशासन द्वारा छात्रों से माँगी गई 10 दिन की मोहलत समाप्ति के अंतिम चरण में है।

एक तरफ छात्रों को मिलने वाला समर्थन बढ़ता जा रहा है। काशी के साथ ही, हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए संकल्पित तमाम आचार्यों, शंकराचार्य, काशी विद्वत परिषद, धर्मसंघ शिक्षामंडल, पूर्व प्रोफ़ेसर-गुरुओं के साथ-साथ अयोध्या के संत और राम जन्म भूमि से जुड़े स्वामी राघवाचार्य, कई महंत और संस्कृत और सनातन की रक्षा को समर्पित कई विद्यालय भी इस आंदोलन में साथ हैं और सड़क पर उतरने को तैयार भी।

दूसरी तरफ प्रशासन का क्या निर्णय है, यह अभी छात्रों को नहीं बताया गया है। लेकिन खबर है कि डॉ. फिरोज खान का BHU के ही दूसरे संस्कृत विभागों में इंटरव्यू जारी है। कल (29 नवम्बर 2019) को आयुर्वेद के संस्कृत विभाग में असोसिएट प्रोफ़ेसर के लिए डॉ. खान का इंटरव्यू हुआ। जिसे छात्रों के विरोध से बचाने के लिए होल्कर भवन की जगह VC गेस्ट हाउस में कराया गया। प्रशासन ने डॉ. खान को मीडिया और छात्रों की नज़रों से बचाने के लिए अपनी सुरक्षा में उनका इंटरव्यू कराकर अपने साथ ले गया। डॉ. फिरोज का कला संकाय में इंटरव्यू भी 4 दिसंबर को है।

कला संकाय के संस्कृत विभाग की लिस्ट

बता दें कि इस पूरे मामले को संज्ञान में लेने वाली कार्यकारिणी की बैठक 7 दिसंबर को, छात्र इस पूरे मामले के शांतिपूर्ण समाधान के लिए आशान्वित हैं। लेकिन प्रशासन को अपने तरफ से कोई ढील नहीं देना चाहते, इसीलिए प्रशासन के मनाने के बाद 15 दिन तक चले धरना समाप्त करने के बाद भी आंदोलन जारी है और अब तो खुलकर दूसरे संकाय के छात्र भी संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों के समर्थन में आ गए हैं।

इसी कड़ी में कल मृत हो चुकी प्रशासन के विवेक को जगाने के लिए प्रतीकात्मक रूप से कला संकाय के बिरला छात्रावास के छात्रों ने प्रशासन की शव यात्रा निकाल कर अपना मुखर विरोध दर्ज कराया। कला संकाय के छात्र अभिषेक सिंह ने ऑपइंडिया को बताया, “महामना के मूल्यों के रक्षा के लिए तथा सनातन परम्परा के विरुद्ध धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों के आंदोलन को समर्थन देने के लिए हम बिरला छात्रावास के छात्र कुलपति की शव यात्रा निकाल रहे हैं।” उत्कर्ष, मृत्युंजय तिवारी सहित सैकड़ों छात्रों के साथ SVDV के शुभम तिवारी,आनन्द मोहन झा, शशिकांत मिश्र आदि शामिल हुए लेकिन बेहद शांतिपूर्ण और शास्त्रीय आंदोलन के समर्थक धर्म विज्ञान संकाय के छात्र इससे दूरी बनाए रखे।

डॉ. मुनीश मिश्र ने कहा, “हमारे विरोध की भी एक पद्धति है लेकिन दूसरे संकाय के छात्र हैं जो हमारे समर्थन में सड़कों पर हैं तो हम उनकी भावना का भी सम्मान करते हैं। तरीका चाहे जो हो पर सभी का उद्देश्य एक है धर्म और मालवीय जी के मूल्यों की रक्षा।”

इससे पहले 29 नवम्बर को ही महामना के मूल्यों, सनातन परम्परा की रक्षा और फिरोज खान की नियुक्ति की उच्च स्तरीय जाँच के लिए तथा सनातन धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों ने प्रधानमंत्री मोदी और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पत्र लिखा। इससे पहले भी कई आचार्यों और गणमान्य नागरिक, प्रोफ़ेसर आदि भी विश्वविद्यालय के विजिटर महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिख कर पूरे मामले के निष्तारण के लिए आवश्यक हस्तक्षेप के लिए अनुरोध कर चुके हैं। पूर्व आचार्यों सहित वर्तमान प्रोफेसरों की चिंता किसी भी तरह से इस मामले का हल ढूँढ BHU के बदनामी को रोक लेने की है।

मीडिया द्वारा फैलाए जा रहे है तमाम झूठों और भ्रमों से आहत डॉ. फिरोज की तरफ से विश्विद्यालय प्रशासन ने उनका अधिकारिक बयान जारी किया है। जिसमें उन्होंने मालवीय मूल्यों को अपनाने, BHU की सेवा करने और अपने बारे में मीडिया द्वारा झूठ न फैलाने का उन्होंने अनुरोध किया।

आज (30 नवंबर) BHU में आंदोलन की कड़ी में पूछे जाने पर शशिकांत मिश्र ने ऑपइंडिया को बताया, “आज परिसर स्थित ग्राम देवताओं की SVDV के छात्रों द्वारा माल्यार्पण और पूजा करने का कार्यक्रम है। जिसकी शुरुआत रुइया छात्रावास के शिव मंदिर से होगा।”

गौरतलब है कि छात्रों का आंदोलन जारी है। अपनी माँग डॉ. फिरोज खान का स्थानांतरण संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय से किसी और विभाग में करने तक छात्र आंदोलन से पीछे नहीं हटेंगे, ऐसा ज़्यादातर छात्रों का कहना है। साथ ही साथ उन्होंने बताया कि यदि प्रशासन अपनी बात से पलटता है तो समय आने पर हम इससे भी बड़े आंदोलन के लिए तैयार हैं।

कला संकाय के छात्रों द्वारा SVDV के समर्थन में निकाली गई शवयात्रा

छात्रों के विरोध के बीच डॉ. फिरोज ने दिया BHU आयुर्वेद संकाय में गुपचुप तरीके से इंटरव्यू

BHU में मशाल जुलूस के बाद आज भिक्षाटन कर ‘धर्म विज्ञान संकाय’ के छात्रों ने फिरोज की नियुक्ति का किया विरोध

फिरोज खान काण्ड पर तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा उठाए गए हर प्रश्न का BHU के विद्वानों ने दिया उत्तर

अगर वीसी ने धर्म संकाय में नियुक्ति नियमों का ध्यान रखा होता तो BHU की बदनामी नहीं होती: प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी

झारखंड: कॉन्ग्रेस कैंडिडेट ने बूथ के बाहर लहराए हथियार, समर्थकों ने पत्रकारों को पीटा

झारखंड में विधानसभा चुनाव के पहले चरण की 13 सीटों पर शनिवार (30 नवंबर) को वोट पड़े। डाल्टनगंज के एक बूथ के बाहर कॉन्ग्रेस प्रत्याशी केएन त्रिपाठी का हथियार लहराते वीडियो सामने आया है। उनके समर्थकों और भाजपा प्रत्याशी आलोक चौरसिया के समर्थकों के बीच झड़प की खबर भी है। मीडिया ​रिपोर्टों के मुताबिक घटना को कैमरे में कैद कर रहे पत्रकारों की पिटाई भी त्रिपाठी समर्थकों ने की।

घटना कोशियारा गॉंव के बूथ की है। चुनाव आयोग ने इस घटना को लेकर जिला प्रशासन से रिपोर्ट मॉंगी है। हथियार जब्त कर त्रिपाठी को हिरासत में लिया गया। हालॉंकि पूछताछ के बाद उन्हें छोड़ दिया गया।

त्रिपाठी का दावा है कि उन्होंने आत्मरक्षा में हथियार लहराया था। उन्होंने कहा, “ग्रामीणों ने बूथ लूटने के लिए मुझ पर हमला किया, तो मैंने आत्मरक्षा के लिए पिस्टल निकाल ली।” त्रिपाठी का कहना है कि बूथ लूटने की सूचना मिलने पर वे वहॉं पहुॅंचे थे और भाजपा समर्थकों ने उन्हें बूथ के अंदर नहीं जाने दिया। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी आलोक चौरसिया और उनके समर्थकों पर बूथ लूटने का आरोप लगाया। भाजपा प्रत्याशी आलोक चौरसिया ने बूथ लूटने के आरोप को बेबुनियाद बताया है। उन्होंने कहा कि केएन त्रिपाठी अपने समर्थकों के साथ बूथ के पास हथियार लेकर घूम रहे थे, वे समर्थकों के साथ चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे।

दैनिक जागरण की खबर के अनुसार डाल्टनगंज के पुरबडीहा मतदान केंद्र पर भाजपा कार्यकर्ताओं को पीटा भी गया। यहॉं वीडियो बना रहे पत्रकार भी त्रिपाठी समर्थकों के निशाने पर थे। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पूर्वडीहा गॉंव में त्रिपाठी के समर्थकों ने निजी चैनल के पत्रकार और कैमरामैन को पीट डाला। उनका कैमरा भी तोड़ दिया।

कॉन्ग्रेस की ही पैदाइश है शिवसेना: मजूदरों को कुचलने के लिए पैसे भी दिए थे

इस बात की अक्सर चर्चा होती रहती है कि शिवसेना के पैदा होने के पीछे कॉन्ग्रेस का हाथ था। महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस की गठबंधन सरकार बनने के बाद से इस बात का प्रचार भी किया जा रहा है। यह प्रचार विपक्षी खेमे से कम सत्ताधारी गठबंधन के नेताओं की ओर से ज्यादा हो रहा है। इसी कड़ी में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने उन दिनों को याद किया है, जब कॉन्ग्रेस ने शिवसेना की स्थापना में मदद की और वामपंथी ट्रेड यूनियनों से निपटने के लिए उसे फलने-फूलने दिया।

रमेश ने इंडिया टुडे से बातचीत के दौरान दावा किया है कि उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस ने ही शिवसेना की स्थापना की थी। ऐसा कर उन्होंने उन चर्चाओं पर मुहर लगा दी है जिनमें कहा जाता है कि कॉन्ग्रेस ने ही बाल ठाकरे को शिवसेना की स्थापना के लिए कहा था और इसमें मदद भी की थी।

शिवसेना की स्थापना जून 1966 में हुई थी। साठ के दशक में मुंबई में ट्रेड यूनियंस का बोलबाला था। ट्रेड यूनियनों के समर्थन से ही उम्मीदवारों की जीत-हार तय होती थी। जयराम रमेश ने बताया कि उस समय ट्रेड यूनियनों पर शिकंजा कसने के लिए ही कॉन्ग्रेस ने शिवसेना की स्थापना की। जयराम रमेश ने कहा कि भले ही शिवसेना और कॉन्ग्रेस वैचारिक रूप से हमेश एक-दूसरे के धुर-विरोधी रहे, लेकिन कॉन्ग्रेस के दो बड़े नेताओं ने ही शिवसेना के गठन में सबसे अहम किरदार निभाया था।

जयराम रमेश ने जिन दो नेताओं का नाम लिया, वो हैं एसके पाटिल और दूसरे वीपी नाइक। एसके पाटिल कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता था, जिन्हें मुंबई का बेताज बादशाह कहा जाता था। वो 3 बार मुंबई के मेयर चुने गए थे। वहीं वीपी नाइक 1963 से लेकर 1975 तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। जब शिवसेना की स्थापना हुई, तब मुंबई में हर काम इन्हीं दोनों नेताओं के इशारे पर होता था। जयराम रमेश ने याद दिलाया कि 1980 में अब्दुल रहमान अंतुले को मुख्यमंत्री बनाने को लेकर सबसे पहले समर्थन देने वाले नेताओं में बाल ठाकरे ही थे। अंतुले राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे। रमेश ने यह भी याद दिलाया कि शिवसेना ने 2007 में प्रतिभा पाटिल और 2012 में प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में समर्थन किया था। दोनों ही चुनावों में उन्होंने राजग से अलग रुख अपनाया था।

सुजाता आनंदन ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दू ह्रदय सम्राट’ में लिखा है कि 60 के दशक में मुंबई में कम्युनिस्टों का राज़ चलता था और ट्रेड यूनियन सरकार की नाक में दम किए रहते थे। कॉन्ग्रेस समर्थित ट्रेड यूनियन भी थे, लेकिन वामपंथी ट्रेड यूनियनों के प्रभाव के सामने वे बेअसर थे। उस समय कॉन्ग्रेस के लिए ये वामपंथी ट्रेड यूनियन एक बड़ी चुनौती थे। मुंबई के बड़े उद्योगपति भी इन ट्रेड यूनियनों की दादागिरी से परेशान थे। लिहाजा उनसे निपटने के लिए कॉन्ग्रेस ने शिवसेना को पूरी वित्तीय मदद दी। इस दौरान शिवसैनिकों ने क़ानून तोड़ा तो उनके साथ नरमी बरती गई। 80 के दशक तक दोनों दल एक-दूसरे के काफ़ी क़रीब रहे।

अब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे कॉन्ग्रेस और एनसीपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बने हैं। कॉन्ग्रेस भी लोगों को याद दिलाने में लगी है कि कैसे शिवसेना के उसके साथ पुराने सम्बन्ध रहे हैं। यह भी कहा जाता रहा है कि शिवसेना की स्थापना के समय कॉन्ग्रेस नेता मंच पर मौजूद थे। अब लोगों इस नज़रें इस पर टिकी हैं कि ये गठबंधन कितने दिनों तक चल पता है?

क्या पलटेगी महाराष्ट्र की बाजी? फ्लोर टेस्ट से पहले BJP सांसद से मिले अजित पवार

महाराष्‍ट्र की राजनीति लगातार करवट बदल रही है। विधानसभा में उद्धव सरकार के फ्लोर टेस्ट से पहले राष्‍ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्‍ठ नेता और पूर्व उपमुख्‍यमंत्री अजित पवार ने मंबई स्थित अपने आवास पर नांदेड़ से बीजेपी सांसद प्रतापराव चिखलीकर ने मुलाकात की है। इस मुलाकात को लेकर प्रदेश के सियासी गलियारों में अटकलबाजियों का दौर एक बार फिर से शुरू हो गया है। बता दें कि प्रतापराव चिखलीकर ने लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेसी दिग्‍गज अशोक चह्वाण को उनके गढ़ में शिकस्त दी थी।

उद्धव सरकार को दोपहर बाद विधानसभा में बहुमत साबित करना है। ऐसे में बीजेपी सांसद और अजित पवार के बीच हुई मुलाकात के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि अजित पवार की नाराजगी बरकरार है या दूर हो गई है। वैसे उद्धव के साथ जिन लोगों ने शपथ ली उनमें अजित पवार का नाम शामिल नहीं था।

हालाँकि अजित पावर ने बीजेपी सांसद से मुलाकात के बाद कहा कि यह सिर्फ एक शिष्टाचार मुलाकात थी। उन्होंने कहा कि भले ही वो अलग-अलग पार्टियों से हैं लेकिन सभी एक-दूसरे के साथ संबंध रखते हैं। उनका कहना था कि इस मुलाकात के दौरान फ्लोर टेस्ट पर कोई चर्चा नहीं हुई। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि संजय राउत ने 170 का जो आँकड़ा (विधायकों की संख्‍या) बताई है, वहाँ तक उनका गठबंधन जरूर पहुँचेगा।

उल्लेखनीय है कि अजित पवार ने पार्टी के खिलाफ बगावत करते हुए भाजपा सरकार में उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। अजित पवार एनसीपी के सभी 54 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए भाजपा खेमे में शामिल हो गए थे। बाद में 51 पार्टी विधायक शरद पवार के खेमे में चले गए और अजित सिर्फ दो विधायकों के साथ रह गए थे। इसके बाद अजित पवार ने उमुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और फिर देवेंद्र फडणवीस ने भी सीएम के पद से इस्तीफा दे दिया। अजित पवार के एनसीपी में लौट आने के बाद से उनके समर्थक उन्हें शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी की सरकार में डिप्टी सीएम के रूप में देखना चाहते हैं।

कॉन्ग्रेस ने तोड़ा संजय राउत का गोवा ड्रीम, कहा- भाजपा सरकार गिरने की संभावना नहीं

महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस, शिवसेना और एनसीपी की गठबंधन सरकार बनने के बाद शिवसेना सांसद नेता संजय राउत ने गोवा में जल्द एंटी बीजेपी सरकार बनाने का दावा किया था। कॉन्ग्रेस ने उनके इस दावे को ख़ारिज करते हुए कहा है कि भाजपा सरकार के गिरने की कोई संभावना नहीं है।

राउत ने कहा था कि शिवसेना कि नजर अब गोवा की राजनीति पर है। गोवा के पूर्व डिप्टी सीएम विजय सरदेसाई शिवसेना के साथ गठबंधन कर रहे हैं। राउत ने कहा था, “गोवा फॉरवर्ड पार्टी के अध्यक्ष और गोवा के पूर्व उप-मुख्यमंत्री विजय सरदेसाई तीन विधायकों सहित शिवसेना के साथ गठबंधन कर रहे हैं। गोवा में एक नया राजनीतिक फ्रंट आकार ले रहा है जैसा कि महाराष्ट्र में हुआ। जल्द ही गोवा में भी आपको चमत्कार दिखाई देगा।” साथ ही राउत ने गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत पर भी निशाना साधा था। उन्होंने कहा कि बीजेपी ने गोवा में सरकार बनाने के लिए हर तरह की जोड़-तोड़ की।

उन्होंने कहा कि सावंत ने कॉन्ग्रेस के सबसे भ्रष्ट नेताओं को साथ मिलाकर सरकार बनाई, जो कि गोवा की जनता को पसंद नहीं है। राउत ने यह भी दवा किया कि महाराष्ट्र के बाद गोवा और उसके बाद शिवसेना अन्य राज्यों का भी रुख करेगी ताकि देश में बीजेपी विरोधी फ्रंट बने।

लेकिन राउत के इन दावों को कॉन्ग्रेस ने सिरे से नकार दिया है। गोवा कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष गिरीश चोडांकर ने कहा उनकी पार्टी सरकार बनाने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त करने की बजाए विपक्ष में बैठना पसंद करेगी। उन्होंने कहा, “गोवा में भाजपा सरकार गिरने पर मुझे ख़ुशी होगी। लेकिन ऐसी कोई संभावना नहीं है। भाजपा के पास 30 विधायकों का समर्थन है। मैं सरकार गिराने की बजाए विपक्ष में बैठना ज्यादा पसंद करूँगा।”

वहीं, शिवसेना सांसद के बयान पर गोवा बीजेपी चीफ विनय तेंदुलकर ने तंज कसते हुए कहा है कि राउत, ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ की तरह दिन में ख्वाब देख रहे हैं। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी पार्टी महाराष्ट्र की जनता से किए गए वादे पूरे करे, जहाँ उसने कॉन्ग्रेस और एनसीपी की मदद से सरकार बनाई है।

1984 सिख विरोधी दंगों पर SIT की जाँच पूरी, सीलबंद रिपोर्ट SC में: फँस सकते हैं कई कॉन्ग्रेसी नेता!

केंद्र सरकार द्व्रारा दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगों के 186 मामलों की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर गठित विशेष जाँच दल (SIT) ने अपनी जाँच पूरी कर ली है। इस बात की जानकारी केंद्र ने शुक्रवार (29 नवंबर) को सुप्रीम कोर्ट को दी।

केन्द्र की वरिष्ठ क़ानून अधिकारी पिंकी आनंद ने विशेष टीम की रिपोर्ट को शीर्ष अदालत को एक सीलबंद कवर में सौंप दिया और अनुरोध किया कि सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली टीम को छुट्टी दे दी जाए।

अदालत ने रिकॉर्ड पर रिपोर्ट ले ली है और मामले को दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया है। SIT का गठन जनवरी 2018 में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में एक दंगाई पीड़ित गुरलाद सिंह काहलो द्वारा दायर याचिका पर किया गया था।

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसएन ढींगरा की अध्यक्षता वाली SIT के तीन सदस्य होने थे। लेकिन, बाद में दो सदस्यों के साथ काम करने की अनुमति दी गई थी। तब सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी राजदीप सिंह ने इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था। जस्टिस ढींगरा के अलावा IPS अधिकारी अभिषेक दुलार दूसरे सदस्य थे।

इससे पहले कि अदालत SIT रिपोर्ट की जाँच करे, वरिष्ठ वकील एचएस फूलका ने पीड़ितों के लिए अपील करते हुए SIT को भंग करने के अनुरोध का विरोध किया था। उन्होंने कोर्ट में पेश की जाने वाली रिपोर्ट की एक प्रति भी माँगी थी। इसके जवाब में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने कहा कि रिपोर्ट सीलबंद कवर में है और केवल अदालत के लिए है।

1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिख विरोधी दंगे भड़क गए थे। दंगों में सिख समुदाय के हज़ारों लोग मारे गए थे। कुछ वरिष्ठ राजनेताओं, जिनमें से कई कॉन्ग्रेस पार्टी से थे, उन पर हिंसा भड़काने और तनावपूर्ण हमले का आरोप लगाया गया था।

दिसंबर 2018 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को दंगों में उनकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उनकी अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

10 किलो वजन कम हो गया है, जमानत दे दीजिए: सिख नरसंहार के गुनहगार सज्जन कुमार ने SC में लगाई गुहार

‘रवीश कुमार के फैन’ ने दी सिखों के नरसंहार की धमकी, मोदी समर्थक महिलाओं को करता है प्रताड़ित

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‘पूरी तरह जली या नहीं’ – स्कूटर से बॉडी को वापस देखने आए थे आरोपित: ‘प्रीति’ रेड्डी केस में नया खुलासा

हैदराबाद में पशु चिकित्सक प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) का रेप और निर्मम हत्या के मामले एक और बात सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि प्रीति के शव को आग लगाने के बाद आरोपित ये पता लगाने के लिए वापस आए कि शरीर पूरी तरह से जला है या नहीं। जानकारी के मुताबिक 2 से 2.30 बजे के बीच शादनगर के चटनपल्ली में पुलिया के नीचे शव को आग लगाने के बाद आरोपित मरवीन, केशवा और रिवा (सभी नाम बदले हुए, क्योंकि इनमें से कोई एक नाबालिग होने की संभावना है) ट्रक और स्कूटर से अपराध स्थल से निकल गए। आरिफ और
मरवीन ट्रक से वहाँ से निकले, जबकि केशवा और रिवा स्कूटर पर निकले। लेकिन कुछ देर बाद मरवीन और रिवा यह देखने के लिए वापस अपराध स्थल पर आए कि प्रीति का शरीर पूरी तरह से जला है या नहीं।

साइबराबाद के पुलिस कमिश्नर वी सी सज्जनर ने कहा कि आरोपित ये देखने के लिए मौके पर वापस आए थे कि शरीर पूरी तरह से तो जल गया है न, जिससे कि पहचान में न आए। इसके बाद फिर उन्होंने स्कूटर पर सवार होकर पुलिया से लगभग 11 किलोमीटर दूर जाकर कोथुर में स्कूटर को छोड़ दिया और फिर चारों ट्रक से आरामगढ़ चौराहे पर गए। वहाँ से मरवीन, केशवा और रिवा अपने घरों के लिए रवाना हुए, जबकि आरिफ शहर में ट्रक अनलोड करने चला गया।

वहीं प्रीति रेड्डी की निर्मम हत्या में मुख्य आरोपित के पिता ने कहा कि दोषी पाए जाने पर उनके बेटे को दंडित किया जाना चाहिए। उन्होंनें कहा कि वे पूरी तरह से जानते थे कि उनके बेटे का आपराधिक स्वभाव है।

मुख्य आरोपित के माता-पिता ने मीडिया को बताया कि वह शुक्रवार (नवंबर 29, 2019) को लगभग 1 बजे घर लौटा था। आते के साथ ही उसने स्कूटर के साथ दुर्घटना होने की बात कही और फिर वो सोने के लिए चला गया। 3 बजे के आसपास पुलिस उनके घर आई और उसे हिरासत में ले लिया। उसकी माँ ने कहा कि वो लोग इससे हैरान थे क्योंकि उन्हें कुछ भी पता नहीं था कि उनके बेटे ने क्या किया है।

इसके साथ ही मुख्य आरोपित माँ ने यह भी कहा कि जब उनका बेटा घर पर होता था तो अन्य तीन आरोपित भी उनके घर आया करते थे। उन्होंने बताया कि वो तीनों पड़ोसी गाँव के रहने वाले हैं। वहीं उसके पिता ने कहा कि उनका मानना था कि उनका बेटा एक सामान्य और अच्छा व्यक्ति था, लेकिन अगर उसने यह किया है और यह सच है तो यह पहली बार होगा जब उसने कोई अपराध किया है। आगे उन्होंने कहा कि अगर वह दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

बता दें कि हैदराबाद के बाहरी इलाके शमसाबाद में 26 वर्षीय महिला डॉक्टर प्रीति रेड्डी की जली हुई लाश मिली। पुलिस ने जाँच की और अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। प्रीति के पोस्टमॉर्टम में पता चला है कि उनके साथ बलात्कार ही नहीं हुआ बल्कि उन्हें गला दबाकर हत्या करने के पहले बुरी तरह टॉर्चर भी किया गया था। और इसके बाद उन्हें जला दिया गया था। इस जघन्य अपराध के मुख्य आरोपित का नाम मो. पाशा है जबकि बाकि तीन हैं– मरवीन, केशवा और रिवा।

चारो आरोपितों को शनिवार (नवंबर 30, 2019) को कोर्ट के समक्ष पेश किया जाएगा। पुलिस ने कहा कि सभी आरोपितों ने अपराध कबूल कर लिया है। उन्होंने कहा कि आरोपितों को अधिकतम सजा देने के लिए महबूबनगर में फास्ट-ट्रैक कोर्ट में मामला सौंपने का अनुरोध किया जाएगा। पुलिस कमिश्नर वी सी सज्जनर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था कि गिरफ्तार आरोपित मोहम्मद आरिफ और अन्य तीन काफी दिनों से प्रीति के साथ बलात्कार करने की योजना बना रहे थे और टोल प्लाजा पर खड़ी पीड़िता की स्कूटी को भी उन्होंने जानबूझकर पंचर किया था।

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रेप आरोपित रिज़वान की SC से जमानत रद्द, पीड़िता ‘सेक्स की आदी’ तर्क पर हाई कोर्ट से मिली था बेल

बलात्कार के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के ज़मानत देने के फ़ैसले को पलटते हुए शुक्रवार (29 नवंबर) को आरोपित की ज़मानत तत्काल प्रभाव से रद्द करने का फ़ैसला सुनाया। इस मामले में डॉक्टर्स की एक रिपोर्ट को आधार बनाया गया था, जिसमें कहा गया था कि 16 साल की लड़की ‘सेक्स की आदी’ थी।

ख़बर के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा बलात्कार के आरोपित रिज़वान को ज़मानत देने वाले फ़ैसले पर कड़ी आपत्ति दर्ज की। CJI की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि कथित घटना के लिए रिज़वान को 3 अप्रैल, 2018 को दी गई ज़मानत को रद्द कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपित को चार सप्ताह के भीतर मुज़फ़्फ़रनगर अदालत में आत्मसमर्पण करने के लिए कहा है।

हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, लड़की के पिता की शिक़ायत पर यूपी पुलिस द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा-376 और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण का 3/4 अधिनियम (POCSO) अधिनियम के तहत FIR दर्ज की गई थी। डॉक्टरों ने लड़की की जाँच की – जो रेडियोलॉजिकल परीक्षण के मुताबिक लड़की की उम्र 16 साल थी।

मजिस्ट्रेट के सामने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा-164 के तहत अपने बयान में, लड़की ने दावा किया कि रिज़वान ने बंदूक की नोक पर उसका यौन उत्पीड़न किया। उसने कहा कि जब उसने शोर मचाया तब उसके पिता तुरंत मौक़े पर पहुँचे और रिज़वान को रंगे हाथों पकड़ लिया। इसके बाद उन्होंने FIR दर्ज करवाई।

हाईकोर्ट ने 3 अप्रैल, 2018 के अपने आदेश में रिज़वान के वकील के सबमिशन दर्ज किए। इसके अनुसार,“मेडिकल जाँच रिपोर्ट से पता चलता है कि अभियोजन पक्ष ने पीड़िता को कोई आंतरिक या बाहरी चोट नहीं पहुँचाई… डॉक्टर द्वारा यह भी कहा गया कि उसे सेक्स करने की आदत थी।” आरोपित के वकील ने कहा कि FIR इसलिए दर्ज की गई क्योंकि लड़की के पिता ने घटना को स्वयं देखा। आरोपित 8 दिसंबर, 2017 से जेल में था।”

हाईकोर्ट ने “अपराध की प्रकृति, साक्ष्य, अभियुक्त की जटिलता” को ध्यान में रखा और कहा कि यह ज़मानत देने के लिए एक उपयुक्त मामला था। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत के आदेश को “सेक्स करने की आदत” के रूप में पाया और रिज़वान को दी गई ज़मानत को रद्द करने में दो मिनट नहीं लगाए।

ज़मानत देने के लिए एक आधार के रूप में ‘सेक्स की आदत’ की मेडिकल रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में किसी तरह की कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए। इससे पहले 1991 में, बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले को उलटते हुए (एक पुलिस अधिकारी और एक सेक्स वर्कर मामला) सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “केवल इसलिए कि वह सरलता से प्राप्त हो जाने वाली महिला हैं, उनके सबूतों को ख़त्म नहीं किया जा सकता है।”

कोर्ट का कहना था कि इस तरह की महिलाओं को भी निजता का अधिकार है, उनकी पसंद के अनुसार उनकी गोपनीयता पर आक्रमण नहीं किया जा सकता। यदि उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ होता है तो वो उक्त व्यक्ति से अपना बचाव करने की हक़दार हैं। उन्हें भी क़ानून की सुरक्षा पाने का एकसमान अधिकार प्राप्त है।

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