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हरियाणा में गोपाल कांडा से समर्थन नहीं लेगी BJP: कहा- न हमने टिकट दिया था, न समर्थन की बात कही

सिरसा की विधानसभा सीट से चुनाव जीतने वाले हरियाणा लोकहित पार्टी के गोपाल कांडा को अभी राजनीतिक रूप से राहत नहीं मिलेगी क्योंकि मीडिया में नाम उछलने के बाद से ही हरियाणा की सत्ता में आने के लिए कोशिशें करती भाजपा ने अब गोपाल कांडा से स्पष्ट दूरी बना ली है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भाजपा ने यह फैसला कर लिया है कि वह गोपाल कांडा को हरियाणा की सरकार में शामिल नहीं करेगी।

बता दें कि यह सब चर्चा में तब आया जब गोपाल कांडा ने खुलेआम भाजपा को समर्थन करने का एलान कर दिया था। कहा जा रहा है कि इस सम्बन्ध में चुनाव नतीजे आने के बाद बातचीत के लिए भाजपा सांसद सुनीता दुग्गल गुरुवार को कांडा और कुछ अन्य निर्वाचित निर्दलीय विधायकों को चार्टर्ड प्लेन से दिल्ली लेकर गई थीं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, बीजेपी के तरफ से गोपाला कांडा के समर्थन की कोई बात मीडिया में नहीं कही गई थी। मीडिया में खबरें आने के बाद गोपाल कांडा के भाजपा में शामिल होने को लेकर मोदी सरकार पर रणदीप सुरजेवाला ने भी निशाना साधा था। अपनी पार्टी को आदर्श बताते हुए उन्होंने दुहाई दी और कहा कि जब मंत्री पद पर बैठे गोपाल कांडा पर आरोप लगे थे तो उनकी कॉन्ग्रेस पार्टी ने नैतिक ज़िम्मेदारी समझते हुए, गोपाल कांडा को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया था। सुरजेवाला ने उस समय मोदी और शाह द्वारा गोपाल कांडा पर दिए गए उनके बयानों का भी ज़िक्र किया। इस दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी की महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष सुष्मिता देव ने ट्वीट करके इस मुद्दे पर अपनी आपत्ति जताई थी।

गौरतलब है कि इस चुनाव में दुष्यंत चौटाला खुदको किंगमेकर समझ रहे थे मगर उनके लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं है कि निर्दलीय विधायकों ने अपना विश्वास भाजपा के साथ जाने में जताया है। बता दें कि भाजपा नेता उमा भारती ने भी इस मसले पर पहले ही पार्टी के गोपाल कांडा से दूर होने के संकेत दिए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विजय गोयल सहित कई नेताओं के बयानों में इस बात का दावा है कि बीजेपी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि गोपाल कांडा से उनकी पार्टी किसी भी तरह का कोई समर्थन नहीं लेगी। रिपोर्ट के अनुसार गोयल ने यह भी कहा कि न हमने उन्हें टिकट दिया था और न ही कही समर्थन की बात। अब जब 90 सीटों वाली हरियाणा विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 40 सीटें मिली हैं। और समर्थन में बहुमत के लिए ज़रूरी 6 की जगज 9 विधायक तैयार हैं तो अगर इसमें से गोपाल कांडा को हटा भी दें तो भी भाजपा आसानी से बहुमत का आँकड़ा पार कर लेगी। ऐसा करना स्वच्छ राजनीति और बीजेपी दोनों के लिए अच्छा है।

अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला: रतुल पुरी की जुडिशियल कस्टडी 2 नवम्बर तक बढ़ी, अब हिरासत में मनेगी दिवाली

दिल्ली की एक अदालत ने आज (शुक्रवार, 25 सितंबर, 2019 को) मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी की न्यायिक हिरासत (जुडिशियल कस्टडी) एक हफ्ते यानि अगले शनिवार (2 नवंबर, 2019) तक के लिए बढ़ा दी है। रतुल पुरी पर अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले की मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होने का आरोप है। यह घोटाला मोदी सरकार की पूर्ववर्ती यूपीए के कार्यकाल के अंतिम दौर में हुआ था।

आर्थिक अपराधों की जाँच करने वाली स्पेशलाइज़्ड जाँच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने रतुल पुरी की हिरासत बढ़ाए जाने के लिए अदालत में अर्ज़ी दायर की थी। ईडी की अर्ज़ी को मंजूर करते हुए विशेष जज अरविन्द कुमार ने पुरी को जेल भेज दिया। इसके पहले 21 अक्टूबर, 2019 को भी अदालत ने तिहाड़ जेल में ईडी को पुरी से पूछताछ के लिए उनकी कस्टडी तीन दिन के लिए बढ़ा दी थी।

रतुल पुरी को ईडी ने पिछले महीने (4 सितंबर, 2019 को) मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में हिरासत में लिया था। यह मुकदमा इटली की रक्षा उपकरण बनाने वाली कम्पनी फिनमैकेनिका की ब्रिटिश सब्सिडरी कम्पनी अगस्ता वेस्टलैंड से 12 हेलीकॉप्टरों की खरीद में कई कथित अनियमितताओं की शिकायतों के चलते किया गया था। इन चॉपरों में अति विशिष्ट श्रेणी के गणमान्य लोगों (वीवीआईपी) को यात्रा करनी थी।

यह रतुल पुरी की पहली गिरफ़्तारी भी नहीं है। इसके पहले वे प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के प्रावधानों के अंतर्गत भी हिरासत में लिए जा चुके हैं। वह भी चॉपर स्कैम से ही जुड़ा मसला था। पहले वे दिल्ली में ईडी के सामने पूछताछ के लिए पेश हुए, उसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया। ईडी ने इसके लिए सीबीआई द्वारा दायर एफआईआर का संज्ञान लिया।

पीएमएलए का इस्तेमाल कर सबसे ताज़ा केस सभी ने दायर किया है। लगभग दो महीने पहले (17 अगस्त, 2019 को) दायर इस मुकदमे में रतुल पुरी के अलावा उनके पिता दीपक पुरी, माँ नीता पुरी (जो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ की बहन भी हैं) और अन्य के खिलाफ शिकायत की गई है। मामला सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा अपने साथ ₹354 करोड़ की धोखाधड़ी (फ्रॉड) किए जाने के आरोप का है।

उनकी अग्रिम जमानत याचिका भी अदालत ने ख़ारिज कर दी थी। इसके अलावा ईडी का यह भी आरोप है कि रतुल पुरी चॉपर घोटाले के मामले में एक गवाह की हत्या के लिए भी जिम्मेदार हैं।

370 के बाद अब J&K से राज्य मानवाधिकार आयोग भी ख़त्म: इसी के ज़रिए बचते थे आतंकी

5 अगस्त 2019 को केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में एक बिल पेश किया जिसके पारित होते ही जम्मू कश्मीर को विशेष अधिकार देने वाला में अनुच्छेद 370 ख़त्म हो गया। पूरे राज्य में सुरक्षा के एहतियात बरतने के चलते सेना को इसकी पूरी ज़िम्मेदारी सौंप दी गई। इस सब के बीच कई लोगों ने इस बात की दलील देते हुए कश्मीर में होने वाली सेना और सरकार की कार्रवाई का विरोध किया था कि कश्मीर घाटी में उठाए जा रहे कदम पूरी तरह से मानवाधिकारों के खिलाफ है।

दरअसल सरकार ने फैसला किया है कि जम्मू-कश्मीर में 31 अक्टूबर से नए कानून लागू हो जाएँगे। बता दें कि देश में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कई ऐसे कानून हैं जो जम्मू-कश्मीर को छोड़कर देश के सभी अन्य भागों में लागू होते थे। इसकी बड़ी वजह थी ‘अनुच्छेद 370’। संविधान से इस अनुच्छेद के हटते ही राज्य में उन सभी कानूनों को लागू करने का रास्ता साफ़ हो गया जो सरकार द्वारा अपने नागरिकों की भलाई के लिए बनाए जाते हैं। इसी क्रम में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने एक अहम् निर्णय लिया है जिसके तहत राज्य में सात आयोग को ख़त्म करने का आदेश जारी किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य से केंद्र शासित प्रदेश बनने वाले जम्मू-कश्मीर को जिन 7 आयोगों को नष्ट करने का निर्णय लिया गया उनमें राज्य का मानवाधिकार आयोग, सूचना-आयोग, उपभोक्ता निवारण आयोग, राज्य विद्युत आयोग, महिला एवं बाल विकास आयोग, दिव्यांगजन के लिए बना आयोग, राज्य पारदर्शिता आयोग शामिल हैं।

बता दें कि जम्मू-कश्मीर 31 अक्टूबर को पूर्णतः एक केंद्र शासित प्रदेश बन जाएगा, लिहाज़ा आने वाले वक़्त में जम्मू-कश्मीर से सम्बंधित सभी कानून सीधे केंद्र द्वारा जारी किए जाएँगे। बता दें कि 5 अगस्त 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सरकार ने जम्मू और कश्मीर को दो भागों में बाँट दिया था। जिसके बाद जम्मू और कश्मीर नाम से पहचाने जाने वाले राज्य को जम्मू और लद्दाख- दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया था। बता दें कि दिल्ली की ही तरह जम्मू एक विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश होगा तो वहीं लद्दाख चंडीगढ़ की तरह पूर्णतः केंद्र सरकार के आधीन रहेगा। उल्लेखनीय है कि राज्य के जो आयोग ख़त्म किए गए हैं वह अब सीधे केंद्र सरकार की देख-रेख में होंगे।

बता दें कि जब कश्मीर में सरकार ने सेना को भेजकर स्थिति नियंत्रण में रखने का फैसला लिया तो कई लोगों ने इसपर अपनी आपत्ति ज़ाहिर की थी। अधिकांश लोगों ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया था। इस तरह की बात करने वाले लोगों में कश्मीर से अपनी सियासत चमकाने वालों से लेकर कई वामपंथी तथाकथित बुद्धिजीवी, मनीषी और चिन्तक शामिल थे जो मानवाधिकार के नाम पर हजारों लोगों की नृशंस हत्या और दंगा फसाद करने वालों को विशेष सुविधाएँ दिए जाने की वकालत करते हैं। उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद भी कुछ ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई थी जब घाटी में स्कूल, मोबाइल, फोन, इन्टरनेट, पर्यटकों की आवाजाही लम्बे समय तक प्रभावित रहे थे।

हरियाणा BJP में ख़ुशी की लहर: बहुमत के लिए चाहिए थे 6 आ गए 9 समर्थन में

हरियाणा में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार में कोई अड़चन नहीं दिख रही है। कल देर रात रानिया सीट से निर्दलीय विधायक और ओमप्रकाश चौटाला के छोटे भाई रणजीत सिंह चौटाला ने समर्थन का ऐलान कर ही दिया था। 4 और विधायक समर्थन में थे ही, सुबह दो और विधायकों ने भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा और हरियाणा बीजेपी के प्रभारी से मुलाकात कर भाजपा को समर्थन देने का आश्वासन दिया, और अब फिर दो और विधायकों ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की सरकार को समर्थन देने का ऐलान किया है

निर्दलीय विधायक गोपाल कांडा को मिलाकर अब भाजपा के पास 49 विधायक हो गए है। 90 सदस्यों वाली हरियाणा विधानसभा में बहुमत का आँकड़ा 46 का है, जिसे विश्वास प्रस्ताव के दौरान छूने में भाजपा को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। हालाँकि, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि बीजेपी गोपाल कांडा से दूरी बनाकर चल रही है। अगर वो न भी हों तो भी बीजेपी सरकार बनाने की शर्तें आराम से पूरी कर पा रही है।

सुबह सात निर्दलीय विधायकों ने भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा और हरियाणा बीजेपी के प्रभारी से मुलाकात कर भाजपा को समर्थन देने का आश्वासन दिया है। इसके अलावा 5 अन्य विधायक कल रात नड्डा और हरियाणा भाजपा के प्रभारी एवं महासचिव अनिल जैन से मिले थे, जिनमें रणजीत सिंह चौटाला भी शामिल थे

अब भाजपा को समर्थन करने वाले 9 विधायकों की सूची कुछ ऐसी है:

1) रणधीर गोलन- पुंडरी

2) बलराज  कुंडू- महम

3) रणजीत सिंह- रानियां

4) राकेश दौलताबाद- बादशाहपुर

5) गोपाल कांडा – सिरसा

6) सोमवीर सांगवान- दादरी

7) धर्मपाल गोंदर- नीलोखेड़ी

8) अभय चौटाला – आईएनएलडी

9) नयनपाल रावत – पृथला

रानिया से जीते रणजीत सिंह 31 साल बाद एक बार फिर से विधानसभा की सीढ़ियाँ चढ़ेंगे। रणजीत सिंह का एक वीडियो सामने आया है। इसमें रणजीत सिंह कहते हैं, “मैं बीजेपी को अपना समर्थन दे रहा हूँ। मैं रानिया विधानसभा से एमएलए चुनकर आया हूँ। मैं मोदी जी की नीतियों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी को अपना समर्थन दे रहा हूँ।”

हरियाणा भाजपा के अध्यक्ष सुभाष बराला ने भी कहा था कि निर्दलीय विधायक बीजेपी के साथ हैं और राज्य में मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में बीजेपी फिर से सरकार बनाने जा रही है। उन्होंने कहा, “जनता का जनादेश बीजेपी को मिला है। हालाँकि इस बात की हम समीक्षा भी करेंगे कि हमें इस बार पिछली बार की तुलना में सात सीटें कम क्यों मिलीं। पार्टी और मुझे स्वयं इस चुनाव के परिणामों से सीखने को मिलेगा। हम राज्य में पार्टी को मजबूत करने के लिए कदम उठाएँगे।” वहीं सरकार बनाने की बात पर उन्होंने कहा, “हरियाणा के निर्दलीय विधायक बीजेपी के साथ हैं। मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में सरकार बनेगी। वो आज चर्चा के लिए दिल्ली आ रहे हैं।”

विपक्ष में बैठे पवार: सत्ता ठुकराई या छीन लिया शिव सेना के CM पद का दिवास्वप्न

राजनीति से तेज़ किसी खेल, किसी फॉर्मेट में गेम पलटता है तो वो केवल क्रिकेट का T-20 है। बाकी राजनीति जिस गति से रंग बदलती हैं उसका कहीं कोई मुकाबला नहीं है। कल शाम तक खट्टर की सत्ता खटाई में थी और दुष्यंत चौटाला किंग और किंगमेकर के बीच अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो करते लग रहे थे। फिर निर्दलीय विधायकों रणजीत सिंह चौटाला और गोपाल कांडा ने क्रमशः कल (24-25 अक्टूबर, 2019) देर रात और आज (25 अक्टूबर, 2019 को) सुबह पलटी मारी, तो खट्टर की सरकार से खतरा हटता दिख रहा है।

कुछ ही घंटे पहले तक ऐसा ही हाल महाराष्ट्र में था। भाजपा खुद बहुमत के लिए ज़रूरी 145 सीटों में से 105 पा कर दम तोड़ चुकी है। कॉन्ग्रेस और राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) दोनों के ही साथ उसके गठबंधन का सवाल पैदा ही नहीं होता (बावजूद इसके कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार को मोदी ने 2017 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया था)। अगर किसी चमत्कार से असदुद्दीन ओवैसी के 2 विधायक, सपा के दो और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का एक विधायक दल बदल कर उसके साथ आ भी जाएँ तो भी वह पूरे ‘अन्य’ के साथ भी 134 पर दम तोड़ देती। यानि उसके दोस्त और दुश्मन, “बड़ा भाई कौन, छोटा भाई कौन” में उलझी बाला साहेब ठाकरे से उद्धव के हाथ में आई शिव सेना अहम थी।

इतनी अहम कि विधानसभा में एक तिहाई से अधिक सीटें अकेले लाने वाली भाजपा को किनारे कर उद्धव ठाकरे अपने बेटे आदित्य ठाकरे के लिए सियासत की ‘ओपनिंग’ ही मुख्यमंत्री पद से करवाने के बारे में सोचने लगे (मीडिया की खबरों के अनुसार)।

समीकरण यह था कि अगर भाजपा को सत्ता से बाहर रखना ही ध्येय है तो शिव सेना के 56, कॉन्ग्रेस के 44 और एनसीपी के 54 विधायकों की सरकार आराम से बहुमत के लिए ज़रूरी 145 के सामने 154 खड़े कर सकती है। इसी उम्मीद को कल्पित करते ही पूरा हुआ समझ कर शिव सेना प्रमुख ने राजग में रहते हुए ही ऐसा सम्पादकीय छाप डाला जैसे किसी विरोधी खेमे के नेता को गरिया रहे हों।

सामना के मुताबिक यह जनादेश कोई “महा जनादेश” नहीं है। यह उनके लिए सबक है जो “सत्ता की मद में चूर” हैं। सामना में शिव सेना ने यह भी कहा है कि इस जनादेश ने वह ग़लतफ़हमी भी दूर कर दी कि चुनाव जीतने का रास्ता दल बदल की इंजीनियरिंग करना और विपक्षी पार्टियों को तोड़ना है। यही नहीं, तस्वीर पूरी तरह साफ़ होने के पहले ही आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने के नारे भी शिव सैनिक लगाने लगे

अगर उद्धव उतनी दूर न भी जाते तो भी वे कम से कम भाजपा से समर्थन का तगड़ा मूल्य वसूलने की स्थिति में तो थे ही। उन्होंने 50-50 फॉर्मूले की बात करनी शुरू कर दी- यानि आधे समय भाजपा का सीएम, बाकी आधे समय शिव सेना का। चूँकि शिव सेना के पास कम लेकिन अहम संख्या थी, इसलिए ज़ाहिर तौर पर वह पहले अपना नंबर लगाती कुर्सी पर।

घबराए फडणवीस ने भी शिव सेना पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पार्टी छोड़ कर गए नाराज़ बागियों को मनाने की कवायद शुरू कर दी थी। हालाँकि, कल ही मोदी ने उन्हें 5 साल का कार्यकाल पूरा कर चुनाव में जाने और फिर जीत कर आने वाले पहले मराठी सीएम होने की बधाई देते हुए एक तरह से ठाकरे को बता दिया था कि वे झुकेंगे नहीं, लेकिन यह साफ़ है कि फडणवीस अपनी ओर से हाथ पैर मारने में कोई कोताही नहीं रहने देना चाहते थे।

और इसी बीच भाजपा के तारणहार बनकर आए शरद ‘राव’ पवार। और उन्होंने अपनी पार्टी के सरकार बनाने की कोशिश की अटकलों से इंकार कर दिया।

और इसी के साथ शिव सेना के भाजपा के बिना सरकार बनाने की उम्मीदें स्वाहा हो गईं हैं- और उसके पास भाजपा के पास ‘लौट के बुद्धू घर को आए’ के अलावा कोई और चारा ही नहीं बचा है। 54 विधायकों पर पकड़ के साथ वे ठाकरे परिवार की उम्मीदों की धुरी थे। अब जब उन्होंने भी मना कर दिया तो भाजपा के बिना किसी और की सरकार बन ही नहीं सकती।

वैसे तो वे शिव सेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के मित्र भी हैं, लेकिन जैसा कि उन्हें दो साल पहले ही एहतियातन पद्म विभूषण देने वाले मोदी ने उनके गढ़ सतारा की रैली में हफ्ते भर ही पहले कहा था, “शरद ‘राव’ शरद ‘राव’ हैं, वे हवा का रुख पहचानते हैं।” उद्धव ठाकरे को भी इतनी बयानबाजी के पहले हवा का रुख पहचानना सीखना चाहिए।

कटी गर्दन हाथ में ले कर बनानी थी वीडियो, बाप खुश, बीवी खुश… लेकिन घृणा कौन फैला रहा? हिन्दू!

कमलेश तिवारी हत्याकांड की जितनी भी जानकारी सामने आ रही है वो बताती है कि मजहबी उन्माद किस स्तर तक उतर सकता है। कमलेश तिवारी ने जो कहा, वो कब और कहाँ कहा, इसकी किसी को पुख्ता जानकारी नहीं। उसने ऐसा क्यों कहा था, ये भी भुलाया जा चुका है। केस चला, जेल में रहे, बाहर आए, लेकिन वो नहीं भूले जिन्होंने पूरी दुनिया को एक झंडे के नीचे लाने का सपना पाल रखा है।

वो नहीं भूले जो बाजारों में फट जाते हैं। वो नहीं भूले जिन्हें कोई मुल्ला, कोई मौलवी, कोई मजहबी घृणा फैलाता, तसबीह फिराता उन्मादी यह कह कर उकसाता रहा कि कमलेश तिवारी की गर्दन ले कर आओ। और हाँ, जब वो कहते हैं कि गर्दन ले कर आओ तो इसका कोई सांकेतिक मतलब नहीं होता। मतलब सिर्फ और सिर्फ, शब्दशः बस एक ही होता है: कमलेश तिवारी की गर्दन उतार कर लाओ। मतलब यह कि गोली मार कर, जहर दे कर, गाड़ी से कुचल कर मारो या जैसे भी, लेकिन गर्दन ले कर आना है।

इसलिए अशफाक और मोइनुद्दीन जब कमलेश तिवारी को मारने चले तो रास्ते में नमाज पढ़ कर चले। उन्होंने कहीं भी अपनी पहचान नहीं छिपाई। मिठाई के डिब्बे में रसीद रखी, होटल में अपना नाम दिया। उन्होंने कबूला कि वो चाहते थे कि लोग जानें कि मारने वाला कौन है, किसी को किसी भी तरह का भ्रम न हो कि किसी गैर-मजहब वाले ने मारा। ये बात और है कि हत्या के बाद जब यही बात लोग ट्विटर पर लिख रहे थे तो आतंकियों के, नक्सिलियों के, हत्यारों के हिमायतियों ने लगातार पूछा कि इसे मजहबी रंग क्यों दिया जा रहा है।

इसकी मानसिकता में आप जाइए। पढ़े-लिखे लोग, इंतज़ार करते हैं, मृतक से बातचीत करते हैं, मित्रवत् रिश्ता बनाते हैं, और सबके अंत में एक ही मकसद: कमलेश तिवारी की गर्दन काटनी है। ये किसी व्यक्ति की सोच नहीं है, ये सामूहिक सोच है जो किसी व्यक्ति के माध्यम से फलित होती है। कमलेश तिवारी की हत्या अशफाक और मोइनुद्दीन ने ही नहीं, एक मजहब ने की है जो ऐसे लोगों को रोकना तो छोड़िए, उनकी निंदा तक नहीं कर पाता।

हर जगह मिली सहायता

इन्हें कैसे लोगों ने सहायता दी? इनके सहयोगियों में मुफ्ती हैं, मौलवी हैं, मुल्ला हैं और इन्हें मदरसों में छुपाया गया, इनके बाप को कहा गया कि उन्हें इधर बुला लो, बाकी हम देख लेंगे। इसके बाप को कोई गम नहीं कि उसके बेटे ने क्या किया है, वो बार-बार ‘अल्लाह अच्छा करेगा’ कह रहा है फोन पर। आप सोचिए कि ये कैसे बाप हैं जो बेटे द्वारा की गई हत्या पर खुश हैं और इस उम्मीद में हैं कि कोई मदद कर देगा। मतलब, बाप भी सहमत है कि जो किया अच्छा किया!

पत्नी का भी वही हाल है। ये कैसा परिवार है, ये कैसा तंत्र है जो इस तरह की हत्या को सहमति देता है? ये कैसा समाज है, ये कैसा समुदाय है जो ऐसी हत्या पर खुश होता है और हर जगह लिखता है कि जो हुआ, वो सही हुआ। फिर ध्यान में आता है अशफाक का कबूलनामा जहाँ वो स्वीकारता है कि उसकी योजना थी कि गर्दन काट कर अलग करे, उसे हाथ में ले, उसका विडियो बनाए और उसे वायरल करे ताकि लोगों को यह चेतावनी मिले कि वो ऐसी बातें न करें।

ये घृणा कोई एक दिन में नहीं उपजती, ये घृणा संकलित होती रहती है, रिस-रिस कर। ये घृणा बचपन से, शिक्षण संस्थानों से, घरों से, मजहबी स्थलों से, दोस्तों के दायरे से, बाप से, समाज से, सामुदायिक जलसों से, सड़कों पर बँधे लाउडस्पीकरों से भरी जाती है। इसलिए हत्यारे को इस बात का मलाल नहीं होता कि वो हत्या करने जा रहा है। इसलिए उसे तनिक भी हिचक नहीं होती जब वो कमलेश तिवारी का मुँह बंद करके, उसका गला रेतता है।

इसकी तैयारी कितनी सटीक रही होगी कि डेढ़ मिनट में ही वो सारे काम निपटा लेता है। चूँकि वो जानता है कि समय की कमी होगी, इसलिए उसने हलाल करने की बाकायदा प्रैक्टिस की होगी, कई जानवर काटे होंगे। मीडिया रिपोर्ट्स में तो ये भी कहा जा रहा है। छाती में सात बार हृदय वाली जगह पर छुरा मारना, ताकि उसे दर्द हो। चेहरे पर गोली मारना, सर में नहीं, ताकि वो महसूस कर सके।

और आपको लगता है कि ये एक व्यक्ति का काम है? जी नहीं, वो चाकू भले ही मोइनुद्दीन के हाथ में थी, लेकिन उसे चलाने की शक्ति, जो कि पसलियों में बार-बार फँस कर निकल रही होगी, वो शक्ति सामुदायिक थी। अशफाक की उँगली ट्रिगर पर थी, लेकिन उसे चलाने का बल टीवी कैमरे पर बोलती उन आवाजों का था जो हर दिन नए अशफाक पैदा कर रही है। आपको लगता है कि ऐसे कृत्यों को अंजाम देना इतना आसान है?

चुप लोगों से बचिए, इन्हें पहचानिए

नेता ने कहा था कि वो हत्या कर के आएँ तो सही, जमानत की जिम्मेदारी वो लेता है। उसका बाप कहता है कि बात हो गई है, वो घर आ जाए। ये किससे बात हो गई है अशफाक के बाप की? कौन हैं ये लोग जो ऐसे लोगों को बचाने के लिए ‘बात’ कर चुके होते हैं? कौन हैं ये लोग जो किसी को इतना दिलासा दे देते हैं कि वो हत्या करे, गर्दन काट ले, विडियो बना ले, वायरल करे, और फिर भी वो बचा लिया जाएगा?

ये एक तंत्र है जो बहुत अच्छे तरीके से काम करता है। दुर्भाग्य बस यही है कि बुद्धिजीवियों की भी सहमति है इन्हें क्योंकि ये लोग हिन्दुओं के खिलाफ हैं, उन्हीं हिन्दुओं के खिलाफ जो बाबरी जैसे धब्बे को मिटाना चाहता है अयोध्या के इतिहास से, उन्हीं हिन्दुओं को खिलाफ जिसने अपने मतलब की सरकार चुनी है। इसलिए आधे घंटे में कमलेश तिवारी की हत्या में निजी दुश्मनी, चंदे के बँटवारे को ले कर हुई अनबन, उनकी माताजी का बयान, और प्रेम प्रसंग तक हवा में तैरने लगता है।

इनसे हर जगह बच कर रहिए। अगर आप किसी को जानते हैं, जो सोशल मीडिया पर चुप है इस मुद्दे को ले कर, तो वो अशफाक और मोइनुद्दीन को मौन सहमति दे रहा है। जो इस पर चुप बैठे हैं, वो वही हैं जो अशफाक के विडियो के वायरल होने के इंतजार में बैठे थे। इसलिए, इनसे आपको हर कदम पर बचना होगा। ये वो बम हैं,जो फटे नहीं हैं लेकिन कोई मुफ्ती, मुल्ला, मौलवी इन्हें दो बार उकसा दे, तो ये मिठाई के डिब्बें में रसीद रख कर आपका सर उतारने निकल पड़ेंगे।

उन्मादियों से बचिए, उन्हें पहचानिए। हर व्यक्ति उन्मादी नहीं है, लेकिन जो भी ट्विटर के ट्रेंड में हिन्दुओं की घृणा तलाश लेता है, लेकिन कमलेश की गर्दन पर बारह इंच लम्बा और तीन इंच गहरा घाव नहीं देख पाता, वो पोटेंशियल जिहादी है। वो किसी दिन किसी बाजार में नारा-ए-लहसुन लगाते हुए फट जाएगा और आप कहेंगे कि ये तो आपका दोस्त था, बड़ा रिजर्व रहता था।

मैं ये नहीं कह रहा कि आप सबकी निशानदेही कीजिए, मैं ये कह रहा हूँ कि चुप लोगों को पहचानिए। सारे लोग ऐसे नहीं हैं, लेकिन जिन्हें ट्विटर के ट्रेंड में घृणा दिखती है, लेकिन अशफाक-मोइनुद्दीन पर वो चुप रहते हैं, तो उनसे दूर रहिए। इनसे डरिए और संभल कर रहिए। इनसे आत्मरक्षा के उपाय कीजिए, क्योंकि जब अशफाक पिस्तौल तानेगा, और मोइनुद्दीन छाती पर चाकू मारेगा, गला रेतेगा और गर्दन उतारने से पहले मोबाइल पर विडियो बनाएगा, तब आपका वही उपाय काम में आएगा।

इनसे मतलब मत रखिए, ऐसे लोग उन्मादी हैं जो किसी के सगे नहीं। लेकिन हाँ, सारे लोग ऐसे नहीं होते। मैं उन्हें तलाश रहा हूँ जो ऐसे नहीं हैं। मुझे मिले नहीं, ये और बात है। लेकिन, मैं दिल की अतल गहराइयों से ये पूरी तरह, जिम्मेदारी से, मानता हूँ कि किसी खास समुदाय के सारे लोग ऐसे नहीं होते। आप कितना भी कह लें, मैं नहीं मानता। मैं इसलिए नहीं मानता क्योंकि मेरा धर्म ऐसा कहता है।

कमलेश तिवारी के हत्यारों अशफाक, मोइनुद्दीन की गिरफ्तारी के बाद नावेद आया सामने, नेपाल पहुँचाने की थी जिम्मेदारी

कमलेश तिवारी हत्याकांड में अशफाक और मोइनुद्दीन की गिरफ्तारी के बाद नावेद एक नया नाम सामने आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार नावेद पेशे से एक वकील है और लॉ स्टूडेंट भी। पूरी साजिश में नावेद ने ही दोनों हत्यारों को नेपाल पहुँचाने का प्लान था। बरेली में दरगाह के मौलाना सैय्यद कैफी अली की गिरफ्तारी के बाद नावेद को भी यूपी पुलिस और एटीएस ने लंबी पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अब अशफाक और मोइनुद्दीन का सामना नावेद से करवाया जाएगा और दोनों के बयान क्रॉस चेक होंगे। अभी तक मिली जानकारी के अनुसार नावेद पर दोनों हत्यारों को नेपाल तक पहुँचाने की योजना बनाने का आरोप है। इसके अलावा उसपर मौलाना कैफी के साथ मिलकर दोनों आरोपितों को पनाह देने और उनका इलाज करवाने का भी आरोप है।

यहाँ बता दें कि इस पूरे मामले के संबंध में पहले नागपुर से आसिम की गिरफ्तारी हुई थी। जिससे पूछताछ के बाद ही कैफी और नावेद भी पकड़ में आए। पुलिस ने मौलाना को गुरुवार को बरेली से गिरफ्तार किया था और अब नावेद की गिरफ्तारी भी हो गई है। इन दोनों के अलावा 2 अन्य लोगों के भी साजिश में शामिल होने की जानकारी मिली है। जिनके बारे में पुलिस पता लगा रही है।

गौरतलब है कि कमलेश तिवारी की हत्या करने के बाद फरार हुए दोनों आरोपितों को बरेली में मौलाना कैफी ने मदद दी थी। अशफाक और मोइनुद्दीन दोनों बरेली पहुँचकर तीन घंटे मौलाना के घर रुके थे, बाद में इनके रुकने का इंतजाम मदरसे में हुआ था। कैफी के निर्देश पर ही नावेद ने दोनों को नेपाल बॉर्डर तक पहुँचने में मदद की थी।

फिलहाल, इस पूरे हत्याकांड में ताजा अपडेट के लिए बता दें कि मोइनुद्दीन अहमद और अशफाक हुसैन पुलिस कस्टडी में रिमांड पर लखनऊ लाए गए हैं। गुरुवार (अक्टूबर 24, 2019) शाम को ही गुजरात से ट्रांजिट रिमांड पर लेकर दोनों आरोपियों को लखनऊ पहुँची पुलिस ने कोर्ट में पेश किया। जिसके बाद दोनों को कोर्ट ने 48 घंटे के पुलिस रिमांड पर भेज दिया। दोनों 25 अक्टूबर सुबह 10 बजे से 27 अक्टूबर सुबह 10 बजे तक रिमांड पर रहेंगे।

शरद पवार के गढ़ में लहराया परचम: मिलिए BJP के उस विधायक से जिसके पिता ने मजदूरी कर इंजीनियरिंग पढ़ाई

महाराष्ट्र के चुनावी नतीजे न केवल सूबे के मौजूदा पीढ़ी के नेताओं, जैसे देवेंद्र फडणवीस, उद्धव ठाकरे, अजित पवार, राज ठाकरे, और शरद पवार जैसे पुराने क्षत्रपों का समर साबित हुआ, बल्कि इनमें कई नई पीढ़ी के नेता भी उभर कर आए हैं। सबसे चर्चित युवा प्रत्याशियों में ठाकरे खानदान के चश्मों-चिराग आदित्य ठाकरे हैं, जो न केवल शिव सेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे के बेटे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मुखिया राज ठाकरे के बेटे हैं, बल्कि अपने परिवार के पहले जनप्रतिनिधि भी। इसके अलावा शरद पवार के पोते रोहित पवार ने भी काफ़ी सुर्खियाँ बटोरीं।

लेकिन इस बीच एक चेहरा छिप गया- मिल मजदूर पिता के बेटे राम सतपुते का, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए अपना पहला ही चुनाव राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) के गढ़ मालशिरस में जीता है। सतपुते लम्बे अरसे तक संघ के अनुषांगिक संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के भी सदस्य रहे हैं। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है।

अष्टी इलाके के निवासी सतपुते एबीवीपी में प्रदेश मंत्री के पद पर भी काम कर चुके हैं। बाद में वे भारतीय जनता युवा मोर्चा में शामिल हो गए, तो वहाँ भी उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर आसीन कर दिया गया। माना जाता है कि वे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के खासे करीबी हैं। उनके पिता विट्ठल सतपुते चीनी मिल में मजदूरी करते थे।

राम सतपुते को पहले ही विधानसभा चुनाव में टिकट मालशिरस का मिला, जिसे राकांपा का गढ़ और भगवा खेमे के लिए टेढ़ी खीर माना जाता है। और इन चुनावों में एनसीपी सबसे बड़ी विजेता बनकर उभरी भी है। उसने अपने विधायकों की संख्या में 13 की बढ़ोतरी की है, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन में भाजपा और शिवसेना को मिलाकर कुल 24 सीटों का घाटा हुआ है। ऐसे में सतपुते की इस जीत के मायने अहम हैं।

हालाँकि एनसीपी के उत्तमराव शिवदास जानकर ने सतपुते को कड़ी टक्कर दी- दोनों को ही एक लाख से ज्यादा वोट मिले और वोट % का अंतर महज़ 1% रहा, लेकिन अंततः सतपुते बाजी मारने में सफल रहे।

पहले यह सीट पर भाजपा की सहयोगी रामदास आठवले की पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) का उम्मीदवार उतरना था, लेकिन भाजपा प्रत्याशी राम सतपुते का नाम प्रस्तावित होने पर आरपीआई भी राज़ी हो गई। और राकांपा के गढ़ में सेंध लगाकर सतपुते ने भी साबित कर दिया कि उन पर दाँव लगाकर पार्टी नेतृत्व ने कोई भूल नहीं की थी।

कश्मीर के स्कूली बच्चों में कट्टर सोच भरने की फिराक में आतंकी संगठन जमात-ए-इस्लामी: खुफिया एजेंसी

जम्मू-कश्मीर में अब आतंकवादी संगठन स्कूली बच्चों को मोहरा बनाने की फिराक में है। इंटेलिजेंस एजेंसियों ने इस बारे में सुरक्षाबलों को अलर्ट किया है। खुफिया एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों को सूचित किया है कि आतंकवादी घाटी में स्कूली बच्चों को कट्टरपंथी बनाने के लिए जमात-ए-इस्लामी जैसे प्रतिबंधित संगठनों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

इंटेलिजेंस इनपुट्स के मुताबिक आतंकी संगठनों ने कश्मीर में स्कूली बच्चों के जेहन में कट्टर सोच भरने का खाका तैयार किया है। ऐसी रिपोर्ट हैं कि आतंकी संगठन इस खुराफात के लिए प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी को आगे कर रहे हैं। जमात-ए-इस्लामी घाटी में स्कूली बच्चों में कट्टर सोच भरने का जिम्मा सौंपा गया है। 

आतंकवादी संगठन स्कूली बच्चों को कट्टरपंथी बनाने और एक समानांतर स्कूली शिक्षा प्रणाली शुरू करने के लिए इस संगठन के कैडर का उपयोग कर रहे हैं। ऐसी खबरें हैं कि जमात-ए-इस्लामी कश्मीर में स्थानीय स्तर पर एक समानांतर स्कूली शिक्षा प्रणाली स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इसका उद्देश्य बच्चों में सरकार विरोधी नैरेटिव फैलाना और बच्चों में नफरत भरना है।

आतंकी संगठनों की एक तरफ ये रणनीति है तो दूसरी ओर घाटी में पहले से चल रही स्कूली व्यवस्था को निशाना बनाने की कोशिश भी की जा रही है। हाल ही में आतंकवादियों ने चावलगाम में एक स्कूल की इमारत को जलाने की कोशिश की। वहीं आतंकवादी संगठन और भी सरकारी स्कूलों को निशाना बनाने की योजना बना रहे हैं।

दरअसल ये आतंकी संगठन स्कूलों पर हमला करके बच्चों के अभिभावकों के दिलों में दहशत भरना चाहते हैं। जिससे कि वो अपने बच्चों को इन स्कूलों से निकाल कर जमात-ए-इस्लामी द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों में भेजने के लिए मजबूर हो जाएँ।

उल्लेखनीय है कि केंद्र ने मार्च में जमात-ए-इस्लामी जम्मू और कश्मीर पर पाँच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया। इसमें कहा गया था कि संगठन उग्रवादी संगठनों के साथ घनिष्ठ संपर्क में था। जमात-ए-इस्लामी को आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित किया गया था, जिसका उद्देश्य राज्य में किसी भी अलगाववादी गतिविधि को बढ़ने से रोकना है।

क़बूलनामा: कमलेश तिवारी के सिर को धड़ से अलग कर बनाना चाहते थे वीडियो, हत्या से पहले पढ़ी थी नमाज़

हिन्दू महासभा के पूर्व अध्यक्ष और हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष रहे कमलेश तिवारी की हत्या के मुख्य आरोपित अशफ़ाक़ और मोइनुद्दीन को गुरुवार (24 अक्टूबर) को मुख्य न्यायायिक मजिस्ट्रेट सुदेश कुमार के आदेश पर दो दिन के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया। क़रीब छ: घंटे तक चली पुलिस पूछताछ में हत्यारों ने अपने ज़ुर्म पर बिना किसी ख़ौफ़ के बयान दिया। उन्होंने बताया कि शुक्रवार (18 अक्टूबर) को सुबह क़रीब 10:30 बजे जब वो हत्या के मक़सद से भगवा कपड़े पहनकर खुर्शीदाबाद के लिए निकले थे, तो रास्ते में दरगाह में उन्होंने नामज़ पढ़ी थी।

इसके आगे उन्होंने बताया कि कमलेश तिवारी के कार्यालय का पता पूछते-पूछते वो आगे बढ़े। रास्ते में उन्हें लाल कपड़े पहने महिला मिली जिससे दोनों ने तिवारी का पता पूछा। भगवा कपड़े देखकर महिला को भ्रम हो गया और उसने कहा कि चलो मेरे साथ चुनाव प्रचार करो। महिला ने ख़ुद को अल्पसंख्यक मोर्चा का पदाधिकारी बताया था।

महज़ डेढ़ मिनट के अंदर हत्या की इस वारदात को अंजाम देने वाले आरोपितों ने अपना ज़ुर्म क़बूलते हुए कि वो लोग कमलेश तिवारी का सिर धड़ से अलग करना चाहते थे। इसके बाद सिर को हाथ में लेकर वीडियो बनाकर दहशत फैलाना चाहते थे। ऐसा करके वो लोगों को चेताना चाहते थे कि अब कोई धार्मिक विवादित टिप्पणी न करे। लेकिन, वहाँ घायल होने और पकड़े जाने के डर से वो कमलेश तिवारी का गला पूरी तरह से नहीं रेत पाए थे।   

आरोपित चाहते थे कि उनका नाम सामने आए, गर्दन पर सामने से किया था वार

अशफ़ाक़ ने बताया कि कमलेश के कार्यालय में पहुँचने पर उन्होंने देखा कि नीचे उनका गार्ड सो रहा था। नीचे कोई नहीं था, वो जीना चढ़ने लगे। कमलेश ने अपने कर्मचारी सौराष्ट्र को बता रखा था कि, कुछ मेहमान आने वाले हैं। इसलिए सौराष्ट्र ने उन्हें नहीं रोका। आरोपितों ने इस बात को नकारा है कि वे पिस्टल व चाकू मिठाई के डिब्बे में लेकर आए थे। उन्होंने बताया कि अशफ़ाक़ के पास पिस्टल थी, जबकि दोनों चाकू पैंट में रख रखा था। आधा किलो वाले मिठाई के डिब्बे में सिर्फ़ रसीद थी। इसकी वजह थी कि वो ख़ुद चाहते थे कि जाँच में उनका नाम सामने आए। इसीलिए दोनों हर जगह असली आईडी लगा रहे थे और सबूत छोड़ते हुए जा रहे थे।

अशफ़ाक़ ने बताया कि गोली उसे ही चलानी थी। इसलिए जब हमला किया तो उन्हें अचेत करने के लिए चाकू से गर्दन पर सामने की तरफ़ से सीधा वार किया। इस हमले से तिवारी की धीमी सी आवाज़ निकली, इसके बाद मोइनुद्दीन ने तिवारी का मुँह दबाया और अशफ़ाक़ ने गोली चलाई। यह गोली मोइनुद्दीन के हाथ से होकर गुज़री और फिर कमलेश तिवारी को लगी। इस दौरान तिवारी का गला भी रेता गया, इससे मोईनुद्दीन का हाथ भी छिल गया।

चोट लगी होने की वजह से दोनों लोगों ने चोटिल हाथ को जेब में डाला और चौराहे की तरफ भाग निकले। चौराहे पर ही एक मेडिकल स्टोर से अशफ़ाक़ ने डेटॉल, मरहम-पट्टी ख़रीदी। यहाँ से होटल गए और कपड़े बदल कर 16 मिनट में ‘चेक-आउट’ किए बिना बाहर आ गए।

कमलेश तिवारी के फोन पर बात करने से भी थे खफ़ा

आरोपितों ने बताया कि जब वो कमलेश से मिलने कमरे में गए तो वह उनसे ठीक से बात नहीं कर पा रहे थे। वे लोग बात शुरू करते, तो बीच में ही कभी किसी का फोन आ जाता, तो कभी वो किसी से बात करने लगते थे। बीच-बीच में कई बार कमलेश तिवारी ने उन्हें कहा कि काम बहुत बढ़ गया है। पार्टी का बड़ा सम्मेलन करना है। उनकी इस बात से आरोपित झुँझला भी रहे थे।

कुल चार लोग थे निशाने पर

अशफ़ाक़ ने बताया कि हिन्दू समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश तिवारी के अलावा यूपी अध्यक्ष गौरव गोस्वामी, सूरत के ही एक नेता और लखनऊ में विवादित बयान देने वाले उसके सम्प्रदाय के ही एक व्यक्ति निशाने पर थे।