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जम्मू-कश्मीर में आम ज़िन्दगी पटरी पर: आज घाटी के साथ जम्मू में भी कई मदरसों को खोल दिया गया

जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने वाले अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के 15 दिन बाद बुधवार (अगस्त 21, 2019) को घाटी में कई सारे मदरसों को फिर से चालू कर दिया गया। इससे पहले राज्य के कई इलाकों में स्कूल-कॉलेजों को खोल दिया गया था। प्रशासन ने बुधवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर में दिन के समय में कोई पाबंदी नहीं रहेगी। साथ ही राज्य में माध्यमिक शैक्षणिक संस्थान भी खुले रहेंगे। प्रशासन ने कश्मीर के ज्यादातर शहरी क्षेत्र से पाबंदी हटा ली हैं। जम्मू में मदरसों को भी फिर से चालू कर दिया गया है।

वहीं, जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के निष्क्रिय होने के बाद राज्य के बारामूला में मंगलवार (अगस्त 20, 2019) देर रात आतंकवादियों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ हुई। मुठभेड़ में एक आतंकी मारा गया। हालाँकि, इस ऑपरेशन के दौरान एक एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) को भी अपनी जान गँवानी पड़ी। वैसे, आर्टिकल 370 के जम्मू-कश्मीर में निष्प्रभावी होने के बाद एनकाउंटर का यह पहला मामला था।

बता दें कि, राज्य प्रशासन ने प्रदेश के सभी स्कूलों-कॉलेजों और सरकारी दफ्तरों को पहले ही खोलने के निर्देश जारी किए थे। प्रशासन ने बताया था कि कुल 190 स्कूलों को खोला जाएगा। गौरतलब है कि, 5 अगस्त को राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटाए जाने की घोषणा करने से पहले ही सुरक्षा के मद्देनज़र प्रशासन ने कश्मीर में कर्फ्यू लगा दिया था। इसके बाद से ही स्कूल-कॉलेजों को बंद कर दिया गया था।

कानूनी विवाद और चिदंबरम के परिवार का है काला इतिहास, सभी कानूनी मामले एक नजर में

आईएनएक्स मीडिया केस (INX Media Case) में कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम को सुप्रीम कोर्ट से आज बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज होने के बाद आज जस्टिस रमन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच में सुनवाई हुई। केस में पी चिदंबरम की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अंतरिम जमानत की अर्जी लगाई गई थी। लेकिन अदालत ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है। बुधवार सुबह जस्टिस रमन्ना की कोर्ट में ये मामला गया। लेकिन उन्होंने इस केस को चीफ जस्टिस की कोर्ट में भेज दिया था।

चिदंबरम की अर्जी में कुछ खामियों की वजह से उसमें सुधार किया गया और एक बार फिर जस्टिस रमन्ना की अदालत में उनके वकीलों ने दलील दी। लेकिन दूसरी बार भी जस्टिस रमन्ना ने सुनवाई से इनकार कर दिया।

पी चिदंबरम पर प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के कठोर रुख के बाद से कॉन्ग्रेस नेता पर लगातार गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है। यही वजह है कि चिदंबरम कल शाम से ही गायब हैं और उनके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर भी जारी कर दिया गया ताकि वो देश छोड़कर भाग न सकें। चिदंबरम के परिवार का और कानूनी मामलों का रिश्ता नया नहीं है।

एक नजर कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम से जुड़े कानूनी विवादों के इतिहास पर-

  • एयरसेल मैक्सिस मामलों में पूर्व केंद्रीय मंत्री चिदंबरम को पहली बार पिछले साल जुलाई में अंतरिम राहत मिली थी। इसके बाद समय-समय पर उनकी अंतरिम राहत की अवधि बढ़ाई जाती रही है।
  • पिछले साल 19 जुलाई को सीबीआई द्वारा दाखिल आरोप पत्र में चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम के नाम थे।
  • सीबीआई जाँच कर रही है कि UPA-1 के दौरान वर्ष 2006 में वित्त मंत्री के पद पर रहते हुए चिदंबरम ने एक विदेशी कंपनी को एफआईपीबी मंजूरी कैसे दे दी? क्योंकि ऐसा करने का अधिकार केवल आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) के पास ही होता है।
  • पी चिदंबरम के अलावा उनके बेटे कार्ति चिदंबरम के खिलाफ भी ये आरोप हैं कि उन्होंने आईएनएक्स मीडिया के खिलाफ संभावित जाँच को रुकवाने के लिए 10 लाख डॉलर की माँग की थी। इस मामले में कार्ति चिदंबरम को बीते साल 28 फरवरी को गिरफ्तार भी किया गया था।
  • प्रवर्तन निदेशालय (ED) एयरसेल मैक्सिस प्रकरण में धनशोधन के एक अलग मामले की जाँच कर रहा है। इस मामले में एजेंसी चिदंबरम से पूछताछ कर चुकी है और उनकी अग्रिम जमानत याचिका लंबित है।
  • चिदंबरम 3,500 करोड़ रुपए के एयरसेल मैक्सिस सौदे तथा 305 करोड़ रुपए के आईएनएस मीडिया मामले की जाँच कर रही एजेंसियों के दायरे में हैं।
  • दोनों ही उपक्रमों को एफआईपीबी से मंजूरी UPA सरकार के पहले कार्यकाल में दी गई थी और तब चिदंबरम वित्त मंत्री थे।
  • आईएनएक्स मीडिया मामले में सीबीआई (CBI) ने मई 15, 2017 में FIR दर्ज की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 2007 में जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे तब 305 करोड़ रुपए की विदेशी धनराशि प्राप्त करने के लिए मीडिया समूह को दी गई विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) मंजूरी में अनियमितताएँ बरती गईं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस संबंध में 2018 में धनशोधन का एक मामला दर्ज किया।
  • प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने चिदंबरम से एयर इंडिया से जुड़े एक खरीद मामले की जाँच में सहयोग करने को कहा था। इस मामले में चिदंबरम के पूर्व मंत्रिमंडलीय सहयोगी प्रफुल्ल पटेल से भी जाँच एजेंसी ने पूछताछ की थी।
  • पी चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम के खिलाफ सीबीआई (CBI) सारदा चिटफंड घोटाले में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है। उन पर 1.4 करोड़ रुपए की कथित रिश्वत लेने का आरोप है। इस साल फरवरी में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उन्हें मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी थी।
  • इसके अलावा, मद्रास HC ने पी चिदंबरम, उनकी पत्नी नलिनी, बेटे कार्ति, कार्ति की पत्नी श्रीनिधि कार्ति चिदंबरम पर काला धन (अज्ञात विदेशी आय एवं परिसंपत्ति) तथा कर अधिनियम, 2015 के अधिरोपण के तहत मुकदमा चलाने के लिए पिछले साल नवंबर में आयकर विभाग द्वारा जारी मंजूरी संबंधी आदेश रद्द कर दिए थे।
  • उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई। फिलहाल यह मामला लंबित है।
  • सीबीआई ने इन आरोपों की भी प्राथमिक जाँच शुरू की है कि तमिलनाडु में एक होटल को पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम के एक संबंधी ने इंडियन ओवरसीज बैंक (आईओबी) के अधिकारियों की कथित मिली-भगत से हड़प लिया है।
  • इसके अलावा पी चिदंबरम के खिलाफ इशरत जहाँ मामले से जुड़े एक हलफनामे में कथित छेड़छाड़ करने से संबंधित शिकायत दिल्ली पुलिस में लंबित है। आरोप है कि जब हलफनामे में छेड़छाड़ की गई थी तब चिदंबरम गृह मंत्री थे।

चिदंबरम और अमित शाह का फर्क: एक 9 साल पहले डटा था, दूसरा आज भागा-भागा फिर रहा

गिरफ्तारी के डर से भागे-भागे फिर रहे वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम और मौजूदा केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच का फर्क जानना हो तो आपको वक्त को नौ साल पीछे ले जाना पड़ेगा। वह रविवार (जुलाई 25, 2010) का दिन था। सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में सीबीआई को गुजरात के गृह मंत्री की तलाश थी। उस व्यक्ति की जो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद सरकार में सबसे ज्यादा रसूख रखने वाला शख्स माना जाता था। जिसके पास एक साथ 12 मंत्रालयों की जिम्मेदारी थी। ये शख्स थे अमित शाह।

सीबीआई को गुजरात पुलिस के आतंकरोधी दस्ते द्वारा नवंबर 2005 में सोहराबुद्दीन शेख को एक एनकाउंटर में मार गिराने के मामले में उनकी तलाश थी। अमित शाह उस दिन सबसे पहले गुजरात भाजपा के दफ्तर पहुँचे। उससे एक दिन पहले उन्होंने अपने ख़िलाफ़ चार्जशीट फाइल होने के बाद मोदी मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। वहाँ उन्होंने घोषणा किया कि वे भाजपा दफ्तर से सीधा सीबीआई दफ्तर जाकर आत्मसमर्पण करेंगे।

उन्होंने अपने ख़िलाफ़ सारे आरोपों को बनावटी और कॉन्ग्रेस की साज़िश करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के बहाने गुजरात की भाजपा सरकार का एनकाउंटर करना चाह रही है। साथ ही उन्होंने पूरे भरोसे के साथ कहा कि न्यायपालिका में यह मामला नहीं टिकेगा। आप भी उस प्रेस कॉन्फ्रेंस को देखिए, जिसमें अमित शाह ने आत्मसमर्पण से पहले अपनी बात रखी थी:

जुलाई 2010 में आत्मसमर्पण से पहले अमित शाह ने जो बातें कहीं, वो आज भी सुलगते हुए सवाल हैं

इसके बाद अमित शाह सीधे सीबीआई दफ़्तर पहुँचे, जहाँ से उन्हें मजिस्ट्रेट के पास पेश किया गया और फिर जेल भेज दिया गया। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या देश के गृह मंत्री रह चुके पी चिदंबरम ऐसा करने का साहस रखते हैं? क्या वो मीडिया या सरकारी एजेंसियों के समक्ष प्रस्तुत होकर अपना पक्ष रखेंगे? या फिर वो इसीलिए भाग रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनके पास अपने बचाव में कहने को कुछ नहीं है? अमित शाह के पास था तो अपनी बात कह वे सीधे
सीबीआई के पास पहुँच गए।

अमित शाह के ख़िलाफ़ क्या खेल रचा गया था, इसकी एक जरा सी बानगी देखिए। जुलाई 22, 2010 को अमित शाह को सीबीआई का समन मिला की वो दोपहर 1 बजे एजेंसी के समक्ष प्रस्तुत हों। यह समन उन्हें सिर्फ़ 2 घंटे पहले यानी 11 बजे दिया गया था। इसके बाद उनसे कहा गया कि वह 23 जुलाई को एजेंसी के सामने पेश हों। उसी दिन शाम 4 बजे चार्जशीट दाखिल कर दिया गया और उसके अगले दिन अमित शाह ने इस्तीफा दे दिया। लेकिन, इन सारे प्रकरण में अमित शाह की नाराज़गी केवल इस बात को लेकर थी कि एक तो उन्हें जवाब देने का समय नहीं दिया गया और फिर उनकी बात सुने बिना चार्जशीट दाखिल कर दिया गया।

चिदंबरम के मामले में ऐसा नहीं था। उन्हें अदालत से कई बार राहत मिली। अगर उनके ख़िलाफ़ चल रहे आईएनएक्स मीडिया केस और एयरसेल-मैक्सिस केस को मिला दें तो पाएँगे कई महीनों से अदालत से उन्हें गिरफ़्तारी से राहत मिल रही थी। बचाव के लिए उन्हें भरपूर समय मिला। अमित शाह के मामले में ऐसा नहीं था। उनका सवाल था कि किसी व्यक्ति को दोपहर 1 बजे पूछताछ के लिए बुलाया जाए और फिर 3 घंटे बाद ही 4 बजे हजारों पेज की चार्जशीट पेश कर दी जाए, तो उसका क्या मतलब निकाला जाए?

अमित शाह के कहने का अर्थ यह था कि चार्जशीट पहले से तैयार कर के रखी गई थी, क्योंकि हजारों पेज की चार्जशीट 3 घंटे में तो नहीं ही तैयार की जा सकती है। चिदंबरम के पास कोई जवाब नहीं है? कोई दलील नहीं है? तभी तो वे अपनी गाड़ी और ड्राइवर को छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं। क़ानून के शिकंजे का ऐसा खौफ कि फोन भी स्विच ऑफ कर लिया। क्या चिदंबरम के पास आज 2010 वाले अमित शाह जैसी हिम्मत है, जिससे वह आत्मसमर्पण कर सकें?

चिदंबरम राष्ट्रीय नेता है, बड़े वकील हैं और केंद्र में कई मंत्रालय संभाल चुके हैं। उनकी तुलना में 2010 वाले अमित शाह कहीं नहीं ठहरते। उस समय शाह वह भले गुजरात के शक्तिशाली नेता थे, लेकिन थे तो राज्य के ही नेता न। क्या आपको पता है सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस का निष्कर्ष क्या निकला? दिसंबर 2014 में सीबीआई की विशेष अदालत ने अमित शाह को इस केस से बरी कर दिया। उनके ख़िलाफ़ कोई भी आरोप सही साबित नहीं हुए।

जस्टिस एमबी गोसावी ने कहा कि उनके ख़िलाफ़ पूरा का पूरा मामला गवाहों के बयानों पर आधारित है, जो अफवाहों की तरह लग रहे हैं। अर्थात, यह खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली बात हो गई। अमित शाह ने गिरफ़्तारी के बाद 3 महीने जेल की सज़ा भुगती। उन्हें गुजरात से तड़ीपार करने का निर्देश दिया गया। केस को गुजरात से बाहर मुंबई ट्रांसफर कर दिया गया। 2012 तक वह गुजरात से बाहर ही रहे।

शाह अकेले नेता नहीं थे जिसे उस समय की यूपीए सरकार ने घेरने की कोशिश की थी। उस समय कई भाजपा नेताओं व हिंदूवादी संगठनों से जुड़े लोगों को इसी तरह पकड़-पकड़ कर परेशान किया गया था।

भारतीय इतिहास में शायद ही ऐसी कोई बानगी मिले जहाँ किसी मुख्यमंत्री से 9 घंटे लगातार बैठा कर पूछताछ की गई हो। मार्च 2010 में एसआईटी ने ऐसा किया था। यह सब कुछ चिदंबरम के गृह मंत्री रहते हुआ था। इस मामले में भी मोदी दोषी साबित नहीं हुए और सरकारी एजेंसियाँ कुछ भी साबित नहीं कर पाई।

आज समय बदल गया है। चिदंबरम भाग रहे हैं और अमित शाह गृह मंत्री हैं। बस अंतर इतना है कि इस बार मामला भ्रष्टाचार का है, बना-बनाया नहीं है। इसके ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस नेताओं के पास भी कोई तर्क नहीं हैं सिवाय यह कहने के कि ‘मोदी बदला ले रहा है’।

चिदंबरम देश के सबसे बड़े वकीलों में से एक हैं। उनके पास दशकों का राजनीतिक व प्रशासनिक अनुभव है। ऐसे में, आज अगर वो ‘फरार’ हैं तो सवाल उठने लाजिमी हैं। अगर उन्होंने कुछ ग़लत नहीं किया है तो वह भाग क्यों रहे हैं? उनके पक्ष में कपिल सिब्बल और सलमान ख़ुर्शीद जैसे वकीलों की लाइन लगी हुई है, जो कल से ही सुप्रीम कोर्ट में जमे हुए हैं और हर पैंतरा आजमा रहे हैं। अमित शाह के मामले में ऐसा नहीं था। अगर आप निर्दोष हैं तो आपके पास लोगों के सम्मुख आकर सच्चाई कहने की ताक़त होनी चाहिए। कानून का सामना करने की हिम्मत चाहिए।

जब व्यक्ति निर्दोष होता है और उसे पता होता है कि उसे फँसाया जा रहा है, तो उसके पास क़ानून का सामना करने की हिम्मत होती है। जैसे उस समय अमित शाह ने कहा था कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है और उनका आत्मविश्वास ही था कि उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका में यह बना-बनाया हुआ मामला टिकेगा ही नहीं।

वैसे आपको बता दें कि राफेल-राफेल चिल्लाने वाले और कश्मीर पर मोदी सरकार को कोसने वाले चिदंबरम का भगोड़ो से पुराना नाता रहा है। मार्च 2013 में माल्या ने चिदंबरम को पत्र लिख कर माँग की थी कि उन्हें एसबीआई से एनओसी दिलाया जाए। एसबीआई उस बैंक समूह का नेतृत्व कर रहा था, जिन्होंने माल्या की एयरलाइन्स को लोन दिए थे। मार्च 2013 में विजय माल्या और पी चिदंबरम की मुलाक़ात भी हुई थी। यूपीए सरकार के अंतिम दिनों में पी चिदंबरम ने सोना के आयात को लेकर बनी पॉलिसी में अहम बदलाव किए, जिससे नीरव मोदी सहित 13 व्यापारियों को काफ़ी फायदा पहुँचा।

देश की जनता आज चिदंबरम से एक ही बात पूछना चाह रही है। उन्होंने कभी आईएनएक्स मीडिया को एफडीआई के लिए फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड से क्लियरेंस दिलाने के लिए पीटर और इन्द्राणी मुखर्जी से अपने बेटे के व्यापार में मदद करने को क्यों कहा? रिश्वत क्यों माँगी?

NDTV के प्रणय रॉय, राधिका रॉय, विक्रम चंद्रा पर साज़िश, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार का मामला: पढ़ें नए FIR में क्या है

सीबीआई ने प्रणय रॉय, राधिका रॉय और NDTV के पूर्व सीईओ विक्रम चंद्रा पर मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में नई FIR दर्ज की है। इसके अलावा एजेंसी ने विक्रम चंद्रा के घर पर छापा मारकर तलाशी अभियान भी चला रखा है। आरोप है कि उन्होंने FDI के नियमों का उल्लंघन किया है।

ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR की प्रति के अनुसार यह टैक्स चोरी का मामला है, और आयकर विभाग के कुछ अधिकारियों की भी इसमें मिलीभगत है। आगे आरोप यह भी है कि आरोपितों ने पैसा घुमाकर फ़र्ज़ी लेनदेन के ज़रिए भारत लाने के लिए ‘टैक्स-हेवन’ देशों में सब्सिडरी इकाईयाँ बनाईं। NDTV में अज्ञात लोकसेवकों (जनप्रतिनिधि, नौकरशाह और सरकारी कर्मचारी) के पैसे का निवेश होने की भी बात FIR में कही गई है।

FIR के अनुसार NDTV ने Network PLC (NNPLC) को लंदन में 30 नवंबर, 2006 को स्थापित किया। FIR के अनुसार “NNPLC ने मेसर्स जेफ्फ्रीज़ इंटरनेशनल के ज़रिए 100 मिलियन डॉलर की राशि मई 2007 में step-up coupon convertible bonds के ज़रिए इकठ्ठा की। जेफ्फ्रीज़ इंटरनेशनल को इस काम के लिए 55 लाख डॉलर का कमीशन मिला। इसके बाद NNPLC ने भारत में NDTV ग्रुप की कई कंपनियों NDTV Group viz. NDTV imagine Ltd., NDTV LifeStyle Limited, NDTV Emerging Market BV, NDTV Convergence Ltd. और NDTV Labs Limited के खाते में ₹193,98,44,3251 ट्रांसफर किए।”

हॉलैंड (नीदरलैंड्स) में NDTV पर एक दूसरी कंपनी NDTV lnternational Holding BV 10 अप्रैल 2008 को शुरू करने का भी आरोप है। इसका इस्तेमाल अमेरिका की कम्पनी General Electric (GE) की सब्सिडरी कंपनी NBCU से $15 करोड़ का फंड इकठ्ठा करने के लिया गया। इस राशि का निवेश NDTV International Holding में करके, आरोप है कि, NBCU ने NNPLC में 26% अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी खरीद ली। FIR में आगे आरोप है कि यह राशि मॉरीशस और लंदन में खोली गईं NDTV Ltd. की सब्सिडरियों में से होते हुए आखिर में भारत में NDTV lmagine Ltd., NDTV Lifestyle, NDry Lab, NDTV convergence, NDTV NGEN and NDTV studio आदि भारत में NDTV की कंपनियों में बटोर ली गई।

साज़िश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार

FIR में NDTV के प्रमोटरों प्रणय रॉय, राधिका रॉय और विक्रम चंद्रा और मरहूम केवीएल नारायण राव पर अज्ञात लोकसेवकों के साथ FDI के रास्ते मनी लॉन्ड्रिंग की साज़िश को अंजाम देने का आरोप है। उनपर साज़िश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के आपराधिक आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि NNPLC को FIPB बोर्ड की मंजूरी उस समय के FDI प्रावधानों को ताक पर रखकर दी गई। प्रणय रॉय, राधिका रॉय और विक्रम चंद्रा पर मुकदमा IPC की धारा 120-B, 420, और भ्रष्टाचार-निरोधी अधिनियम, 1988 की धारा 13(1) और 13(2) के अंतर्गत दर्ज किया गया है।

बात रवीश कुमार के ‘सूत्रों’, ‘कई लोगों से मैंने बात की’, ‘मुझे कई मैसेज आते हैं’, वाली पत्रकारिता की

कल एक लेख में मैंने वामपंथी मीडिया की कार्यशैली में आए बदलाव की बात की थी कि कैसे मोदी के 2014 में आने से पहले और उसके बाद, उनकी रिपोर्टिंग, विश्लेषण और लेखों के मुद्दों को प्रोपेगेंडा की चाशनी में डुबा कर छानने की बातों में बदलाव आया। उसी बात को आगे बढ़ाते हुए, वामपंथी लम्पट पत्रकार समूह की एक विशुद्ध देशी तकनीक पर बात करना चाहूँगा।

आपने एक स्वघोषित महान एंकर को बहुत बेचैन पाया होगा। वो स्वयं ही अपने फेसबुक वाल पर हैशटैग चलाते हैं जिसमें वो लिखते हैं कि रवीश जी, आपसे उम्मीद है। इस हैशटैग को रवीश जी ने अगर सही तरीके से समझा होता तो वो समझ जाते कि लोगों ने बिना हैशटैग के उनसे कहा कि रवीश जी, आपसे अच्छी पत्रकारिता की उम्मीद है। लेकिन नब्बे प्रतिशत खबरों को ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ के नाम पर चलाने वाले रवीश जी से वैसी उम्मीद बेकार ही है।

रवीश जी ने हिन्दी पत्रकारिता को कई शब्द और वाक्यांश दिए हैं जिनमें ‘गोदी मीडिया’, ‘व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी’, ‘डर का माहौल’, ‘आपातकाल आ रहा है ब्रो’ आदि प्रमुख हैं। आजकल रवीश जी नई बात को मेनस्ट्रीम करने की कोशिश में लगे हैं। उनका कहना है कि लोगों में ‘साहस का मंदी’ आ गई है। ‘बोलने का खतरा’ नामक वाक्यांश को भी रवीश जी धीरे से प्रचलित करने की फिराक में हैं। उसे आप आने वाले दिनों में उनके फेसबुक वाल पर और प्राइम टाइम में देख और सुन पाएँगे।

रवीश जी का दुर्भाग्य देखिए कि उन्होंने गोदी मीडिया की बात की और उन्हें ये ही नहीं पता कि उनका पूरा स्टूडियो, मालिक समेत किसकी गोद में है। ये भी हो सकता है कि रवीश जी पत्रकारिता छोड़ कर जबसे लिंग्विस्ट बनने की राह पर चल पड़े हैं, तब से वो बैठे तो गोद ही में हैं, लेकिन उन्हें पता ही नहीं है। कई बार लोग गोद में इतना ज़्यादा कम्फर्टेबल हो जाते हैं कि उन्हें लगता है कि यही कुआँ संसार है।

वैसे ही व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी की बात करने वाले रवीश कब उसके चांसलर बन गए, उन्हें पता ही नहीं चला। इनकी खबरों को आप सुनिए जिसमें सत्य और तथ्य के अभाव के कारण रवीश जी आपको विश्वास दिलाने की भरपूर कोशिश करते नजर आते हैं। वो किसी क्रेडिबल आदमी से बात नहीं कराते। कहते हैं सूत्रों के हवाले से आई खबर के अनुसार!

उसके बाद उनकी वैचारिक क्रांति का अगला पड़ाव ‘मुझे कई लोगों ने मैसेज किया’ पर आ कर रुकता है। कभी सोचा है आपने कि एक बड़ी कम्पनी, एक बहुत बड़ा पत्रकार, अपने इनबॉक्स पर इतना आश्रित क्यों हो जाता है? कभी सोचा है कि वो ये क्यों कहता है कि लोग ‘ऑन द रिकॉर्ड’ बोलना नहीं चाहते?

ये समझने के लिए आपको टीवी पत्रकारिता को समझना होगा। खास कर, जब टीवी के लोग कहीं जाते हैं तो उन्हें कैमरे पर वही बुलवाना होता है, जो प्रोग्राम के प्रोड्यूसर ने सोच रखा है। इसलिए, लोगों को तैयार किया जाता है कि उन्हें क्या बोलना है, कैसे बोलना है। ये हमेशा नहीं होता पर जब भी मुद्दा आपके मतलब का हो, ऊपर से आदेश हो कि इसे ऐसे ही कवर करना है, तब लोगों को तैयार किया जाता है।

जब लोग कैमरे पर आने को तैयार न हों, तो दो बातें होती हैं। पहली यह कि वो व्यक्ति वाकई डरा हुआ हो, दूसरी यह कि टीवी पर बैठा पत्रकार जो चाह रहा है वो उसे मिल नहीं रहा। अब आप सोचिए कि किसी की नौकरी जा चुकी हो, उसके पास खोने को और क्या है? वो व्यक्ति कैमरे पर आ कर क्यों नहीं बोल सकता?

बकौल रवीश कुमार, 25 से 50 लाख लोगों की नौकरी जा चुकी है। आप इस बड़ी संख्या को देखिए जिसमें अंदाजा भी लगाया है तो 25 से 50 लाख तक का लगाया है। इन दोनों संख्याओं में 25 लाख का अंतर है। ये हमारे आज के पत्रकार हैं जिनके अंदाजे का रेंज सौ प्रतिशत होता है। जब हम अंदाजा लगाते हैं तो कहेंगे कि 25-30 लाख लोगों की नौकरी गई। ये भी बहुत बड़ा मार्जिन है। लेकिन रवीश कह रहे हैं कि ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ लाखों लोगों की नौकरियाँ जा चुकी है तो वो यह भी कह सकते थे कि लगभग 1 से 2 करोड़ लोगों की नौकरी चली गई। रवीश भक्त ‘आह रवीश जी, वाह रवीश जी’ कहते रहेंगे।

दूसरी बात आप यह सोचिए कि इन 25 से 50 लाख लोगों में रवीश को दस लोग ऐसे नहीं मिले जो कैमरे पर कहते कि उनकी नौकरी चली गई। जब पत्रकार ‘मुझे कई लोगों ने मैसेज किया’ से लेकर ‘मैंने कई लोगों से बात की’ कहते हुए आपको यह कहने लगे कि लोगों के ‘साहस में मंदी’ आ रही है तो आपको समझ जाना चाहिए कि पत्रकार का मुख्य उद्देश्य किसी उद्योग से नौकरियों के जाने का नहीं, बल्कि उसके नाम एक और नया मुहावरा हो जाए, इसका प्रयास है।

ऐसे शब्दों का प्रयोग रिपोर्ट को साहित्यिक बनाने के लिए लोग करते हैं लेकिन इसके साथ ही आपके पास पर्याप्त सबूत होने चाहिए। ‘साहस की मंदी’ बहुत ही पोएटिक बात है लेकिन इसका आधार क्या है? ‘ऑन द रिकॉर्ड नहीं आना चाहते’ के नाम पर आप वही पुराना कैसेट घिस रहे हैं कि मोदी ने लोगों को इतना डरा दिया है कि लोग बोलना नहीं चाहते!

ये फर्जीवाड़ा कब तक चलेगा?

ये पत्रकारिता नहीं है। ये किसी भी तरह अपनी बात मनवाने का एक तरीका है। ये एक कुत्सित प्रयास है जहाँ आपके पास न तो तथ्य हैं, न ढंग के मुद्दे हैं, न दिखलाने के लिए लोग हैं, इसलिए सबसे आसान तरीका है ‘मैंने कई लोगों से बात की’। अगर आपने कई लोगों से बात की तो कहाँ हैं वो लोग? आपको कई लोगों ने मैसेज किया तो क्या आपकी टीम उन लोगों से मिलने गई? या पिछले दिनों जो कविता कृष्णन जैसे नक्सलियों ने चार लोगों के पैर दिखा कर पूरे कश्मीर के परेशान होने की बात की थी, वही तरीका है आप लोगों की पत्रकारिता की?

रोजगार के मुद्दे पर रवीश कुमार ने आँकड़ों, एजेंसियों से आए तथ्यों की दूसरी तरफ खड़े होने पर चुनाव तक चिल्लाते रहे कि बेरोजगारी बढ़ रही है जबकि उस समय ऐसा बिलकुल नहीं था। रवीश हमेशा वैसी जगहों पर चले जाते थे जहाँ छात्र तैयारी करते हैं। जहाँ लोग नौकरियों की तैयारी करते हैं वहाँ आपको बेरोजगार नहीं मिलेंगे तो कौन मिलेगा? फिर भी, जब लगातार भाजपा की सरकारें बनती रहीं तो थक हार कर रवीश ने कहा था कि पता नहीं मोदी ने क्या कर दिया है कि ये लोग अभी भी उसी को वोट करना चाहते हैं! ऐसा कहते हुए रवीश के चेहरे की मुस्कान ऐसी विचित्र थी की जीवन में दूसरे किसी जीव को मैंने वैसे मुस्कुराते नहीं देखा है।

ये पत्रकारिता कुछ ऐसे चलती है कि आपको रिपोर्ट बनाने से पहले हेडलाइन लिखना होता है और उसमें निष्कर्ष होना चाहिए कि आपको जाना कहाँ है। यहाँ रवीश कुमार और उनके पूरे गिरोह की लड़ाई किससे है यह छुपा नहीं है। इसलिए अब ये सारे लोग एक जगह, एक दूसरे का इंटरव्यू लेते मिलेंगे आपको। हर जगह यही बोला जा रहा है कि पत्रकारिता तो अब बस ये लोग ही बचा सकते हैं।

ऐसा बोलना अपने आप में किस तरह के घमंड के भरने से फलित होता है, ये हम सब जानते हैं। ‘हम चुनी दीगरे नेस्त’ वाली भावना एक अलग तरह की असहिष्णुता है। आप सोचिए कि ये गुमान कहाँ से आता है कि पत्रकारिता तो वही कर रहे हैं, बाकी तो गीत गा रहे हैं। इस तरह के इन्टॉलरेंस का कोई अंत नहीं। ये अपने गिरोह को छोड़ कर कभी भी बाहर नहीं जाते। क्या आपने इन्हें कभी भी अपने गिरोह के बाहर के लोगों की रिपोर्ट को शेयर करते देखा है? क्या कभी भी टीवी पर कहते सुना है वैसे अखबार का नाम जो वामपंथी विचार के न हों?

आपने नहीं सुना होगा क्योंकि अहम के चरम पर बैठे हैं ये लोग। जब काम की खबरें न हों तो खबरें बनाते हैं, सबूत न मिले तो ‘मुझे कई लोगों ने मैसेज किया’ बताते हैं, कैमरे ले कर कहीं चले भी गए, और मतलब की बात करने को कई तैयार न हो तो कह देंगे कि लोगों में ‘साहस की मंदी’ है। ये है वामपंथी पत्रकारिता जो खबरों को देखता नहीं, दिखाता नहीं, बल्कि खबरों को बनाता है, मेकअप करता है उनका और तब आपको गंभीर चेहरे के साथ बताता है कि भाई साहब आप देखते कहाँ हैं, रवीश का हलाल खबर शॉप यहाँ है!

हम क्रेडिबल हैं, हम पर विश्वास करो… पिलीज ब्रो…

पैटर्न पर गौर कीजिए। पहले इन्होंने खबरों में झुकाव दे कर कवर करना शुरु किया। मोदी बोले कुछ, उसको घुमा कर कुछ और कहना शुरु किया। उसके बाद दौर आया एक घटना को इस तरह से सारे सियार मिल कर हुआँ-हुआँ करते थे, मानो वो घटना पूरे भारत की पहचान हो। कोई अपराध हुआ तो उसमें हिन्दू, सवर्ण आदि को ऐसे प्रोजेक्ट किया जाने लगा जैसे अपराध का कारण दो लोगों की आपसी दुश्मनी नहीं, धर्म और जाति थी। जबकि ऐसा होता नहीं था।

इस दौर के बाद जब दूसरे धड़े का मीडिया सक्रिय होने लगा और इनके झूठ पकड़ कर पूछने लगा कि एक मुद्दे पर हाय-तौबा करते हो, दूसरे पर क्यों नहीं, तब इन्होंने नया तरीका अपनाया। वो नया तरीका था खबरें पैदा करने का। इस शृंखला में अमित शाह के बेटे से लेकर अजित डोवाल तक पर पैसों के होराफेरी के आरोप लगे जो साबित नहीं हो सके। ये बात और है इनके मालिक पर सैकड़ों करोड़ों के शेयर की हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग के मुकदमे चल रहे हैं, उस पर कभी बात नहीं करते। इनके मालिक की पेशी भी हो तो वो प्रेस फ्रीडम पर हमला हो जाता है।

खबरें पैदा करने की कड़ी में दक्षिणपंथी मीडिया द्वारा इनकी करतूतों को एक्सपोज करते रहने के कारण इन पर से लोगों का विश्वास लगातार गिरता जा रहा है। इनके पोर्टलों का ट्रैफिक नीचे जा रहा है, टीवी देखने वाले कम हो रहे हैं, और ये लोग अपने आप को फर्जी अवार्ड दे कर खुश हो रहे हैं।

‘द वायर’ से लेकर ‘न्यूज लॉन्ड्री’ तक रवीश के इंटरव्यू करते दिखते हैं जहाँ रवीश कुमार बताते हैं कि मीडिया की स्थिति खराब है। जबकि बात इसके उलट यह है कि इनके विचारधारा वाली मीडिया की स्थिति खराब है। लोगों ने इन्हें देखना-पढ़ना बंद कर दिया है और वैसे लोगों को पसंद किया जा रहा है जिनकी पत्रकारिता किसी से घृणा के आधार पर नहीं हो रही, जो नकारात्मक नहीं है, जो जीडीपी के ऊपर जाने पर ये सवाल नहीं पूछते कि गरीब जीडीपी नहीं खाता, और जब वो नीचे जाए तो पलट कर ये नहीं कहते कि अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई।

इसलिए, अब इनके जो स्वघोषित प्रतिमान हैं, वो स्वयं ही कहते नजर आ रहे हैं कि पत्रकारिता तो वही कर रहे हैं। इसलिए सड़क पर निकलिए तो बच कर निकलिए। कोई राह चलते पकड़ लेगा और कहेगा कि ‘मैं सही पत्रकारिता कर रहा हूँ, प्लीज मेरी बात मान लो, मुझे कई लोगों ने मैंसेज किया है’। ऐसा कहने के बाद क्या पता वो आपको अपने फोन का पासवर्ड बता कर मैसेज पढ़वा ही दे!

तुगलकाबाद रविदास मंदिर पुनर्निमाण के लिए विरोध प्रदर्शन, 1 माह का वेतन देंगे BJP सांसद

दिल्ली के तुगलकाबाद में संत रविदास मंदिर तोड़े जाने के खिलाफ आक्रोशित भीम आर्मी पार्टी के कार्यकर्ता बुधवार (अगस्त 21, 2019) को दिल्ली पहुँच कर जंतर-मंतर और रामलीला मैदान समेत कई जगहों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली में रविदास मंदिर को हटाए जाने वाले उनके आदेशों को राजनीतिक रंग देने की कोशिश न की जाए। साथ ही उन्होंने माहौल बिगाड़ने की कोशिश करने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही थी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। इस विरोध प्रदर्शन में भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर के साथ ही केजरीवाल सरकार में सामाजिक कल्‍याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम और आम आदमी पार्टी AAP के कई विधायक भी श‍ामिल हैं। राजेंद्र पाल गौतम ने आरोप लगाया कि दिल्‍ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने पुलिस की मौजूदगी में मंदिर को गिरा दिया और प्रतिमा को ले गए। हालाँकि, प्राधिकरण ने मंदिर शब्‍द का इस्‍तेमाल न करते हुए कहा कि उसने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर स्‍ट्रक्‍चर को हटाया।

वहीं, संत रविदास मंदिर के तोड़े जाने पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी सांसद विजय गोयल का कहना है कि संत रविदास के मंदिर को दोबारा बनाया जाना चाहिए। सांसद ने इस मंदिर के निर्माण के लिए ‘गुरू रविदास जयंती समारोह समिति’ को अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी बात कही है।

गौरतलब है कि, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों दिल्ली के तुगलकाबाद में गुरू रविदास की मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया था जिसके बाद दिल्ली के साथ पंजाब में विरोध शुरू हो गया और फिर ऑल इंडिया आदि धर्म मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष संत सतविंदर हीरा और साधु समाज के प्रधान संत सरवण दास महाराज ने 13 अगस्त को बंद का एलान करते हुए कहा था कि इससे उनके समाज की धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं, और प्रदर्शन करके वो अपने समाज के संगठित होने का अहसास करवाना चाहते हैं।

जिसके बाद मंगलवार (अगस्त 13, 2019) को पंजाब में रविदास समाज के लोगों ने राज्य बंद बुलाया था। इस दौरान एहतियात के तौर पर जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और गुरदासपुर के सारे शिक्षण संस्थानो को बंद कर दिया गया था।

72 साल बाद PAK में खुला 1000 वर्ष पुराना मंदिर, भारत से ले जाकर स्थापित किए जाएँगे देवी-देवता

पाकिस्तान के सियालकोट में 72 साल बाद करीब 1000 साल पुराना शिवाला तेजा सिंह मंदिर पूजा-पाठ के लिए खोल दिया गया है। विभाजन के दौरान इस मंदिर को बंद कर दिया गया था। पाकिस्तान के हिंदू लम्बे समय से इस मंदिर को खोलने की माँग कर रहे थे।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक बीते गुरुवार को इस मंदिर में हिंदू परंपरा के मुताबिक भव्य कार्यक्रम का भी आयोजन हुआ। पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिन्दुओं की माँग को देखते हुए पाकिस्तान इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) ने इस मंदिर को खोलने का फैसला किया। मंदिर खुलने पर आयोजित समारोह में हिंदू सुधार सभा के अध्यक्ष अमरनाथ रंधावा, डॉ मुनव्वर चंद और पंडित काशी राम सहित कई हिंदू नेता मौजूद थे।

मंदिर खुलने के बाद इसके जीर्णोद्धार का काम जोरों पर है। इसके लिए ईटीपीबी ने पहली किस्त के तौर पर 50 लाख रुपए दिए हैं। मीडिया खबरों की मानें तो इस मंदिर में भारत से लाकर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाएँगी। साथ ही यहाँ पर नियमित पूजा-पाठ करने के लिए एक पुजारी भी रखे जाएँगे। मंदिर में एक बावर्ची और एक सेवादार रखने की भी बात कही ज रही है।

मंदिर के ख़ुलने को लेकर श्राइन सचिव सैयद फराज अब्बास ने कहा है कि मंदिर को खोलने की माँग लंबे समय से हिंदू समुदाय द्वारा की जा रही थी। ऐसे में ईपीटीबी की पहल के बाद इमरान सरकार ने इसे फिर से खोलने के निर्देश दिए हैं।

उन्होंने बताया कि मंदिर में फर्श का काम शुरू हो गया है, सुरक्षा के लिए द्वार लगवाए जा रहे हैं। छोटी-मोटी रिपेयरिंग के बाद सफेदी का काम भी शुरू हो गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक मंदिर के पुुननिर्माण के बाद पौराणिक शिवालय का दोबारा से मरम्मत करवाया जाएगा। इन सबको पूरा होने में कम से कम 2 से 3 महीने लगेंगे।

Article 370: SC पहुॅंचा कश्मीरी पंडितों का संगठन, कहा- फैसले से पहले हमारी भी सुन लीजिएगा

आर्टिकल 370 पर केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका के ख़िलाफ़ कश्मीरी पंडितों के एक संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में केविएट दायर की है। रूट्स इन कश्मीर (RIK) की ओर से केविएट वकील बिमल रॉय ने दायर की है।

इसके माध्यम से शीर्ष अदालत से अपील की गई है कि उनका पक्ष सुने बिना आर्टिकल 370 पर लिए फैसला को चुनौती देने वाली याचिका पर किसी तरह का निर्देश जारी नहीं किया जाए।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के फैसले के ख़िलाफ़ 6 लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इन लोगों में पूर्व एयर वाइस मार्शल कपिल काक और रिटॉयर्ड मेजर अशोक मेहता शामिल थे। इनके अलावा मनमोहन सरकार में कश्मीर पर वार्ताकार रहीं राधा कुमार, जम्मू और कश्मीर कैडर से संबंधित पूर्व आईएएस अधिकारी हिंडल हैदर तैयबजी, पंजाब कैडर के पूर्व आईएएस अभिताभ पांडे के भी इस याचिका पर हस्ताक्षर थे।

कश्मीरी पंडितों के संगठन RIK का मानना है कि आर्टिकल 370 और आर्टिकल 35ए के तहत एक मुस्लिम बहुल राज्य को मिले विशेष प्रावधान का जम्मू-कश्मीर को इस्लामिक स्टेट बनाने के लिए दुरुपयोग किया जा रहा था। ये अनुच्छेद न केवल पंडितों की कश्मीर में वापसी में बाधा थे, बल्कि उन हजारों लोगों को न्याय दिलाने में भी बाधक थे, जो आतंकवाद का शिकार हुए हैं।

केविएट दायर करने वाले संगठन की मानें तो इन अनुच्छेदों के निष्प्रभावी होने से अब अल्पसंख्यकों, महिलाओं और वंचित समुदायों को नई व्यवस्था के अनुरूप बराबरी का अधिकार मिल पाएगा। साथ ही जम्मू-कश्मीर, भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और समृद्धि का हिस्सा बन पाएगा।

कश्मीरी पंडितों का यह संगठन अरसे से अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए के दुष्परिणामों को लेकर जागरुकता अभियान चला रहा था।

‘अयोध्या के भगवान रामलला नाबालिग हैं, उनकी संपत्ति को न तो बेचा और न ही छीना जा सकता है’

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का आज (अगस्त 21, 2019) नौवां दिन है। 6 अगस्त से सर्वोच्च अदालत इस मामले की रोजाना सुनवाई कर रही है, जिसके तहत हफ्ते में 5 दिन मामला सुना जा रहा है। रामलला विराजमान के वकील सीएस वैद्यनाथन ने बुधवार (अगस्त 21, 2019) को अदालत में दलील देते हुए कहा कि अयोध्या के भगवान रामलला नाबालिग हैं। वैद्यनाथन ने कहा कि राम मंदिर में विराजमान रामलला नाबालिग हैं। नाबालिग की संपत्ति को ना तो बेचा जा सकता है और ना ही छीना जा सकता है।

रामलला के वकील ने अदालत के सामने अपनी दलील रखते हुए कहा कि अगर थोड़ी देर को ये मान भी लिया जाए कि वहाँ कोई मंदिर नहीं, कोई देवता नहीं थे, फिर भी लोगों का विश्वास है कि राम जन्मभूमि पर ही श्रीराम का जन्म हुआ था। ऐसे में वहाँ पर मूर्ति रखना उस स्थान को पवित्रता प्रदान करता है। वैद्यनाथन ने कहा, “अगर जमीन हमारी है और किसी और के द्वारा गैरकानूनी तौर पर कोई ढाँचा खड़ा कर लिया जाता है, तो जमीन उनकी नहीं होगी। यदि वहाँ पर मंदिर था, लोग पूजा भी कर रहे थे तो उन्हें और कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है।”

उन्होंने कहा कि एक मंदिर हमेशा मंदिर ही रहता है, संपत्ति को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। मूर्ति किसी की संपत्ति नहीं है, मूर्ति ही देवता हैं। वैद्यनाथन ने कोर्ट से राम जन्मस्थान को लेकर हजारों साल से लगातार चली आ रही हिंदू आस्था को महत्व देने का निवेदन किया।

गौरतलब है कि, इससे पहले, मंगलवार (अगस्त 20, 2019) को रामलला के वकील ने अदालत में अपनी दलीलें रखते हुए  ASI की रिपोर्ट समेत कुछ साक्ष्य अदालत के सामने पेश किए थे। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में मिली चीजों का हवाला देते हुए दावा किया था कि मंदिर वहीं था, जहाँ मस्जिद बनाया गया। वैद्यनाथन ने कहा कि एएसआई की रिपोर्ट में मगरमच्छ और कछुए का जिक्र किया गया है, जो मुस्लिम संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं।

प्रेस फ्रीडम का रोना रो रहे NDTV और रॉय दम्पति का काला चिट्ठा: शेयर्स की धोखाधड़ी से लेकर ICICI लोन तक

एनडीटीवी के संस्थापक प्रणय रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय देश छोड़ कर भागना चाह रहे थे लेकिन उन्हें एयरपोर्ट पर रोक लिया गया। एनडीटीवी ने इसे मीडिया की स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ बताया। एनडीटीवी ने रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ चल रहे मामलों को एक झटके में फेक और प्रमाणरहित करार दिया। एनडीटीवी ने दावा किया कि रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ कार्रवाई सरकार की धमकी है कि मीडिया संस्थाएँ उनकी तरफदारी करें वरना उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। जबकि, सच्चाई यह है कि रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी और क़ानून का उल्लंघन के कई मामले चल रहे हैं और जाँच एजेंसियों ने उन्हें दोषी भी पाया है।

आईसीआईसीआई लोन फ्रॉड केस: कैसे क्या हुआ?

एनडीटीवी ने आर्थिक धोखाधड़ी भरे कारनामे 2004 से ही शुरू कर दिए थे, जब उसने ‘जनरल अटलांटिक पार्टनर्स इन्वेस्टमेंट (GA)’ के साथ करार किया। इस करार के दौरान एनडीटीवी ने ‘अंतरंग व्यापार का प्रतिषेध विनियम’ और ‘Substantial Acquisition of Shares and Takeovers विनियम’ का उल्लंघन किया। इसका पूरा विवरण आप यहाँ पढ़ सकते हैं। रॉय दम्पति ने GA से एनडीटीवी के शेयर्स 439 रुपए के भाव से वापस ख़रीदे, जब इसका मूल्य 400 रुपए चल रहा था।

इससे बाकि निवेशकों को भी मौक़ा मिल गया कि वे अपने-अपने शेयर्स इसी दाम पर बेच डालें, जिस मूल्य पर रॉय दम्पति ने उन्हें वापस ख़रीदा था। इसके बाद रॉय दम्पति ने एनडीटीवी के 14.99% शेयर्स गोल्डमैन सैक्स नामक कम्पनी को बेच कर फिर नियमों का उल्लंघन किया। इससे गोल्डमैन को एनडीटीवी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में अपना प्रतिनिधि भेजने का मौक़ा मिल गया। इस डील के बारे में न तो सम्बंधित अधिकारियों को कुछ बताया गया, न सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सूचना दी गई और न ही निवेशों को भनक लगने दिया गया।

न एनडीटीवी और न ही गोल्डमैन ने इस बारे में किसी को कुछ बताया। इन शेयर्स को ओपन-मार्केट व्यापार के रूप में दिखाया गया, जबकि इन्हें पूर्व निर्धारित योजना के तहत बेचा और ख़रीदा गया था। नीचे गोल्डमैन सैक्स द्वारा नॉमिनेट किए गए डायरेक्टर का पत्र है, जो उसने एक निवेशक को जवाब देते हुए लिखा था।

एनडीटीवी के डायरेक्टर (गोल्डमैन सैक्स द्वारा नॉमिनेटेड) का निवेशक को लिखा गया पत्र

इस पत्र में उसने ख़ुद को गोल्डमैन सैक्स द्वारा निवेश किए गए निश्चित फंड का नॉमिनी बताया था। डायरेक्टर ने लिखा कि वह उन फंड्स का प्रबंधन संभालता है। 2016 में सेबी ने गोल्डमैन सैक्स से जुड़ी 2 संस्थाओं के ख़िलाफ़ जाँच शुरू की, जो इस डील का हिस्सा थे। प्रणय और राधिका रॉय ने 2 कंपनियों को कई लाख शेयर बेचे, जिनका मूल्य 400 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से 360 करोड़ रुपए होते। इसके बाद रॉय दम्पति ने शेयर्स वापस खरीदना चाहा लेकिन उनके पास फंड्स की कमी थी।

फंड्स की कमी पूरी करने के लिए रॉय दम्पति ने इंडिया बुल्स से 501 करोड़ रुपए का लोन लिया। इस लोन को चुकाने के लिए आईसीआईसीआई बैंक से 375 करोड़ का लोन लिया गया। इस ट्रांज़ैक्शन के पीछे की सच्चाई जानने के लिए हमें उस एफआईआर की तह तक जाना होगा, जो रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ जून 2017 में दर्ज की गई थी।

रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ एफआईआर

इस एफआईआर में रॉय दम्पति के अलावा आरआरपीआर होल्डिंग नमक कम्पनी और आईसीआईसीआई के कुछ अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज किया गया था। आरआरपीआर होल्डिंग कम्पनी में रॉय दम्पति के अधिकतर शेयर्स हैं। इन सबके ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश और धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया। इस एफआईआर में 403.85 करोड़ रुपयों की मनी लॉन्ड्रिंग समेत आईसीआईसीआई को हुए 48 करोड़ रुपए के नुकसान का भी जिक्र है, जो प्रणय-राधिका के कारण हुआ।

अगस्त 2009 में रॉय दम्पति ने एनडीटीवी के अपने शेयर्स को आरआरपीआर होल्डिंग्स को 4 रुपए प्रति शेयर की दर से बेच डाला जबकि शेयर्स का असली बाजार मूल्य उस समय 140 रुपए प्रति शेयर था। इसके बाद मार्च 2010 में जब शेयर्स का असली बाजार भाव उतना ही था, आरआरपीआर होल्डिंग ने 34.79 शेयर्स 4 रुपए प्रति शेयर की भाव से एनडीटीवी को वापस बेच डाला। आरआरपीआर होल्डिंग्स कम्पनी के संस्थापक रॉय दम्पति ही हैं। उन्होंने इंडिया बुल्स से 501 करोड़ रुपए का लोन लिया।

अक्टूबर 2008 में आरआरपीआर ने आईसीआईसीआई बैंक से 375 करोड़ रुपये लोन लिया। इस लोन के लिए रॉय दम्पति ने अपने शेयर्स रखे लेकिन सम्बंधित सरकारी संस्थाओं व अधिकारियों को इस बारे में कोई सूचना नहीं दी गई, अर्थात इसे छिपा कर दिया गया। सेबी के नियमों का उल्लंघन हुआ। एफआईआर की कॉपी का वह हिस्सा आप भी देखिए।

रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ एफआईआर की कॉपी का हिस्सा

नियमों के मुताबिक, बैंक किसी भी कम्पनी के 30% से ज्यादा शेयर्स गिरवी के रूप में नहीं रख सकता, जबकि इस मामले में यह आँकड़ा 60% से भी अधिक रहा, जो सेबी और एमआईबी के नियमों का सीधा उल्लंघन था।

आईसीआईसीआई बैंक को नुकसान

आरआरपीआर होल्डिंग और वीसीपीएल के बीच हुए करार की जानकारी आईसीआईसीआई बैंक को भी थी। बता दें कि रॉय दम्पति ने वीसीपीएल नमक कम्पनी के साथ भी बेनामी करार किया था, जिससे एनडीटीवी का कंट्रोल वीसीपीएल का पास चला गया। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि आरआरपीआर ने अपने बैलेंस शीट में स्वीकार किया है कि उसे आईसीआईसीआई को 15 करोड़ रुपए देने हैं, लेकिन आईसीआईसीआई ने एक पत्र लिख कर बता दिया कि आरआरपीआर के पास उसका कोई बकाया नहीं है। कैसे?

सबसे पहले आईसीआईसीआई का वह पत्र देखिए जिसमें कहा गया है कि सारा बकाया लोन चुकता कर दिया गया:

आईसीआईसीआई कहता है कि आरआरपीआर ने लोन चुका दिए

अब आरआरपीआर का बैलेंस शीट देखिए जिसमें कहा गया है कि उसे आईसीआईसीआई को 15 करोड़ रुपए देने हैं:

आरआरपीआर कहता है कि आईसीआईसीआई को 15 करोड़ रुपए देने हैं

एफआईआर के अनुसार, आईसीआईसीआई को कुल 48 करोड़ रुपए का नुक्सान हुआ। यह भी बड़ा खुलासा हुआ कि प्रणय रॉय और राधिका रॉय के पास लोन चुकता करने के लिए फंड्स थे लेकिन उन्होंने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया। एक और गौर करने लायक बात यह है कि वीसीपीएल ने 53.85 करोड़ आरआरपीआर को ट्रांसफर किए और उसी दिन यह रुपए प्रणय रॉय के व्यक्तिगत खाते में भेज दिए गए। यानी आईसीआईसीआई को तो घाटा हुआ लेकिन प्रणय रॉय को तो फायदा हुआ।

वो सवाल जिनका जवाब मिलना ज़रूरी है

रॉय दम्पति ने आख़िर इस बात को क्यों छिपाया कि आरआरपीआर होल्डिंग को जो 375 करोड़ रुपए का लोन दिया गया, उसके लिए एनडीटीवी के शेयर्स को गिरवी रखा गया था? इसे बात को छिपाने के पीछे क्या मकसद था?

आरआरपीआर के बैलेंस शीट में साफ़-साफ़ दिखता है कि उसे आईसीआईसीआई बैंक को रुपए भुगतान करने बाकी हैं लेकिन बैंक कहता है कि सारे रुपए पे कर दिए गए हैं। यह विरोधाभास क्यों?

आख़िर आईसीआईसीआई ने लोन से मिलने वाले ब्याज को छोड़ दिया, क्यों? जानबूझ कर नुकसान सहने का कारण क्या?

आईसीआईसीआई ने एक ऐसे करार का हिस्सा बनना क्यों स्वीकार किया, जिसमें सेबी व अन्य कई नियम तोड़े गए और क़ानून का उल्लंघन हुआ?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि उस समय आईसीआईसीआई बैंक के टॉप लेवल पर वो कौन से अधिकारी थे, जिनके कारण यह करार संभव हो पाया और क्या किन्हीं बड़े राजनेताओं व उद्योगपतियों से उनके सम्बन्ध थे?

एफआईआर क्या कहता है?

अब यह जानते हैं कि एफआईआर में क्या डिमांड्स किए गए हैं। सबसे पहले एफआईआर का वो वाला हिस्सा पढ़ लीजिए:

एफआईआर कॉपी में किए गए डिमांड्स

एफआईआर में माँग की गई है कि इस पूरे मामले की जाँच सीबीआई से कराई जाए। इस बात को लेकर संशय है कि आख़िर एनडीटीवी का असली मालिक है कौन? एनआईआर इसका पता लगाने को कहता है। गुप्त रूप से एनडीटीवी का नियंत्रण इधर से उधर किया गया और आईसीआईसीआई ने इसमें क्या किरदार निभाया? एफआईआर कॉपी पूछती है कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे की वजह क्या थी? इसका उद्देश्य क्या था?

एक और बड़ा सवाल यह है कि एनडीटीवी के 85 मिलियन डॉलर के फंड्स विदेश में क्या कर रहे थे और उन्हें भारत वापस क्यों लाया गया, जिससे उसके प्रोमोटरों को 403 करोड़ रुपयों का फायदा हुआ?

रॉय दम्पति के अन्य कारनामे

2015 में सेबी ने एनडीटीवी पर 2 करोड़ रुपए का आर्थिक दंड लगाया क्योंकि कम्पनी ने यह बात छिपाई थी कि इनकम टैक्स ने उससे 450 करोड़ रुपए टैक्स जमा कराने को कहा था। फरवरी 2014 में इस सम्बन्ध में नोटिस मिलने के बावजूद एनडीटीवी ने स्टॉक एक्सचेंज को इससे सम्बंधित कोई सूचना नहीं दी, जो नियमों का उल्लंघन है। 2018 में सेबी ने एनडीटीवी पर फिर से आर्थिक दंड लगाया। SAT ने भी पाया कि एनडीटीवी ने नियमों का उल्लंघन किया है।

नीरा राडिया ने प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ के पत्रकार एमके वेणु से बात करते हुए कहा था कि वो और मनोज मोदी (मुकेश अंबानी का क़रीबी) ने कहा था कि वे प्रणय रॉय से मिलने दिल्ली जा रहे हैं, क्योंकि उनका समर्थन करना ज़रूरी है। हालाँकि, रिलायंस ने एनडीटीवी में किसी भी प्रकार के निवेश की बात को नकार दिया है। लेकिन, ‘नीरा राडिया एंगल’ बताता है कि इसमें बहुत लोच है।

इससे एक बात तो साफ़ हो जाती है कि एनडीटीवी के ख़िलाफ़ चल रहे मामले या रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ हो रही कार्रवाई का मीडिया की स्वतंत्रता से कुछ लेना-देना नहीं है। प्रणय रॉय की मानें तो कोर्ट, सेबी और सीबीआई, सभी के सभी मोदी सरकार के प्रभाव में कार्य कर रहे हैं। आईसीआईसीआई लोन वाली स्टोरी संडे गार्डियन ने की थी, जिसके बाद एनडीटीवी के उनके ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा दर्ज कराया। हालाँकि, अदालती फैसला एनडीटीवी के पक्ष में नहीं आया। प्रणय रॉय इसे ‘मीडिया की स्वतन्त्रता’ से जोड़ कर अपनी लॉबी यानी ‘गिरोह विशेष’ को सरकार के ख़िलाफ़ सक्रिय करना चाह रहे हैं।

(यह लेख OpIndia की एडिटर नूपुर शर्मा द्वारा लिखे गए अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है।)