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मुस्लिम कैसे लें लाइसेंसी हथियार? इमामबाड़ा में दी जाती इसकी ट्रेनिंग – अब बात से पलटे कल्बे जव्वाद

मुस्लिमों को हथियार खरीदने और उसे इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग देने पर मुस्लिम धर्मगुरु कल्बे जव्वाद ने सफ़ाई दी है। कल्बे जव्वाद की ओर से दी गई सफाई में कहा गया है कि हथियार रखने और लाइसेंस बनवाने की खबरें गलत हैं। इस तरह का कोई भी कार्यक्रम लखनऊ के इमामबाड़ा परिसर में नहीं होगा। जव्वाद की मानें तो उन्होंने आयोजन कराने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद पराचा से उनका बयान वापस लेने के लिए भी कहा है। जबकि मॉब लिंचिंग की खबरों (ज्यादातर झूठी) के बीच मुस्लिमों को हथियार उठाने से नहीं हिचकने का विवादित सलाह दे चुके हैं कल्बे जव्वाद।

आज तक की खबर के मुताबिक मुस्लिम धर्मगुरु कल्बे जव्वाद ने सफाई देने के दौरान कहा, “यह कार्यक्रम अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद पराचा का है। मैंने पराचा से बयान को वापस लेने के लिए कहा है और सरकार को समय देने के लिए कहा है।”

कल्बे जव्वाद का कहना है कि यदि सरकार मॉब लिंचिंग के मामलों पर कार्रवाई करने को और कानूनों को सख्त बनाने के लिए कह रही है, तो हमें विश्वास करना चाहिए।

कल्बे जव्वाद की मानें तो भारत में मुस्लिम सबसे अधिक सुरक्षित हैं। इसलिए अब मुस्लिमों को शिक्षा, रोजगार और आधुनिकरण पर काम करना चाहिए। कल्बे कहते हैं कि मॉब लिंचिंग की घटनाएँ हर सरकार में हुई हैं। चाहे सपा हो या कॉन्ग्रेस, लेकिन किसी ने कानून बनाने की बात नहीं की। ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री सख्त कानून बनाने की बात कर रहे हैं तो हमें विश्वास रखना चाहिए।

इसके अलावा खबरों की मानें तो मुस्लिम धर्मगुरु ने सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद की बात पर असहमति दर्ज कराते हुए यह भी कहा कि हमें पहले सरकार से कानून बनाने की माँग करनी चाहिए। अगर वे इसमें असफल होते हैं तब इस तरीके से कैम्प का आयोजन किया जाए और सभी धर्मगुरुओं को एक प्लेटफॉर्म पर लाया जाए।

गौरतलब है कि इस समय कार्यक्रम के आयोजन से मना करके अपने बयान पर यू-टर्न लेने वाले कल्बे जव्वाद इससे पहले कह चुके हैं कि 26 तारीख को जो परिसर में कैंप लगेगा, उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ इस बात की जानकारी दी जाएगी कि सरकार से हथियार कैसे लें, इसके लिए कैसे अप्लाई करें। इसमें कोई हथियार की ट्रेनिंग नहीं दी जाएगी और न ही किसी प्रकार के हथियार के बारे में बताया जाएगा।

जबकि इस विवादित आयोजन कराने वाले महमूद पराचा ने इस कैंप के बारे में बयान देते हुए कहा था कि इस कैंप में मॉब लिंचिंग से बचने के लिए हम सभी को ट्रेनिंग देंगे, क्योंकि ये मॉब लिंचिंग सरकार करा रही है। यह मॉब लिंचिंग किसी एक संप्रदाय के प्रति हो रही है। इसमें मुस्लिम मारे जा रहे हैं, दलित मारे जा रहे हैं।

The Print वालों, रोना बंद करो- हिन्दुओं की हालत ‘शांतिप्रियों’ से बदतर है तुम्हारे ‘सेक्युलर’ राज में

मुगल इस देश पर कमोबेश 700 साल राज कर चुके हैं- उससे पहले मुहम्मद बिन कासिम के 670 के दशक में सिंध पर हमले से 1200 ई. के करीब दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बीच करीब 400-500 साल इस्लामी आक्रांताओं ने हिन्दुस्तान को लूटा, औरतों को नोंचा-खसोटा, मर्दों का कत्ले-आम किया, यानि कुल मिलाकर भरपूर राज किया। उसके बाद 90 सालों की अंग्रेजी हुकूमत में भी अधिकांश नवाबों की नवाबी सलामत ही रही, और उसके बाद नेहरू का तो यह मानना ही था कि इस देश के दो टुकड़े कर देने और लाखों के खून की होली के बाद भी मुस्लिमों को ‘विशेष ध्यान से’ इस देश में रखा जाना चाहिए।

670 ईस्वी से 500 साल हमलावर-हत्यारे-लुटेरे, अगले 700 साल निरंकुश शासक, उसके बाद 90 साल के अंग्रेजी राज में सीमित शक्तियों के साथ शासन और उसके बाद 70 साल से एक सेक्युलर राज्य के ‘लाडले’ बने रहने के बाद भी अगर कोई कौम ‘भेदभाव’ की शिकायत करे तो इससे ज्यादा क्रूर मज़ाक कोई नहीं हो सकता। The Print में छपे लेख के मुताबिक़ हिंदुस्तान में मुस्लिम होना आसान नहीं- “राज्य की एजेंसियों का इस्तेमाल हमें निशाना बनाने के लिए किया जाता रहा है।” इस बेहूदा तर्क के लिए सहारा लिया जाता है कुल दो घटनाओं का- हाशिमपुरा हत्याकाण्ड, और 11 मुस्लिमों को 25 साल बाद टाडा मुकदमे में बरी कर दिया जाना। महज इन दो घटनाओं के दम पर यह साबित हो गया कि मुस्लिम सताई हुई ‘माइनॉरिटी’ कौम हैं।

पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार कौन?

इस लेख की शुरुआत में ही मुस्लिमों को आत्ममंथन करने और अपनी कमज़ोरियों, अपने पिछड़ेपन के लिए दूसरों को दोषी ठहराने की बजाय खुद से ज़िम्मेदारी उठाने की बात करने वाले एक दूसरे लेख पर हमला किया जाता है। यह तर्क दिया जाता है कि हाशिमपुरा और टाडा से डरकर कट्टरपंथी अपनी ‘ghetto’ के नाम से जानी जाने वाली बस्तियों तक सीमित हो गए। लेखिका फातिमा खान ने रोना रोया कि मुस्लिमों में स्वच्छता की कमी की धारणा उनके खिलाफ ‘नैरेटिव’ है। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि स्कूलों, कॉलेजों आदि सार्वजनिक स्थलों पर मुस्लिमों को ‘इस्लामोफ़ोबिया’ झेलना पड़ता है।

इसके बाद ‘हर कौम को मूलभूत सुविधाएँ निष्पक्ष रूप से मुहैया कराना सरकार की ज़िम्मेदारी है’ का ज्ञान बाँचा जाता है। वह इसलिए ताकि इसकी आड़ में यह घटिया तर्क दिया जा सके कि जबकि मुस्लिमों ने खुद को अपनी मर्ज़ी से उन बस्तियों में कैद कर लिया जहाँ घुसने में गैर-मुस्लिमों के प्राण निकलते हों, लेकिन फिर भी उन तक मूलभूत सुविधाएँ पहुँचाना सरकार की जिम्मेदारी है।

आगे न बढ़ पहले इतने ही प्रोपेगण्डे की बात करें। तो हाशिमपुरा तो हुआ 1987 में, और टाडा के अंतर्गत गिरफ्तारियाँ हुईं 1994 में। तो हमारी पिछली पीढ़ी, और उसके पहले की पीढ़ी, और उनके भी पहले की पीढ़ी और न जाने कितनी पीढ़ियों से मौजूद मुस्लिम बस्तियों के पीछे क्या था? किसका डर था? मुस्लिमों में स्वच्छता के अभाव की धारणा भी, चाहे जितनी गलत हो या न हो, हाशिमपुरा से कम-से-कम दो पीढ़ी पुरानी है। रही बात अपनी जान जोखिम में डालकर इस्लामी बस्तियों में घुसने और स्वच्छता सेवाएँ पहुँचाने की, तो फातिमा जी को यह पता होना चाहिए कि अगर मुस्लिमों ने ‘ghettos’ के रूप में अपनी बंद बस्तियाँ बना लीं, जिनमें कोई अपराध होने पर पुलिस भी जाने में डरती रही, तो उनमें सफ़ाई व्यवस्था पहुँचाना न ही सरकार की ज़िम्मेदारी है, और न ही सरकार ने झाड़ू लगाने या नालियाँ साफ़ करने वालों की जान खरीद रखी है कि उन्हें ज़बरदस्ती ऐसी जगह धकेल दे जहाँ जाने में हथियारों से लैस पुलिस बल भी घबराते रहे हों।

हिन्दू-मुस्लिम अशांति का ज़िम्मेदार कौन?

फातिमा के लेख में कम-से-कम एक बात की सत्यनिष्ठ अभिव्यक्ति है- हिन्दू-मुस्लिम इस देश में ‘शांतिपूर्ण’ नहीं, तनावपूर्ण माहौल में ही रहे हैं; आधुनिक युग में केवल यही तनाव असल हिंसा के रूप में अभिव्यक्त होने लगा है, और सूचना-क्रांति के बाद से हमारे टीवी और मोबाइल के ज़रिए हमारी ज़िंदगियों तक पहुँचने लगा है। लेकिन फातिमा को यह बताना चाहिए कि इस तनाव के पीछे ज़िम्मेदार कौन रहा?

अगर हिन्दू जिम्मेदार रहे तो मुस्लिमों (और कुछ हद तक ईसाईयों) को छोड़ कर और किसी से कभी टकराव क्यों नहीं हुआ? हिन्दू खुद में हजारों जात-पाँत, सम्प्रदाय में विभाजित रहे, लेकिन कभी सुना क्या कि किसी शाक्त क्षत्रिय ने बौद्ध पर या यहूदी पर या किसी शूद्र वैष्णव पर भी पंथिक टकराव के चलते हमला कर दिया हो? हिन्दू-इस्लामिक इतिहास लगभग इस्लाम जितना ही पुराना है, शायद एक-आध सदी का फ़र्क हो। क्या किसी भी हिन्दू राजा ने किसी भी मुस्लिम को उसके मज़हब के चलते मारा है? या आधुनिक काल में भी आ जाएँ तो एक भी ऐसे हिन्दू-मुस्लिम दंगे का रिकॉर्ड है क्या जो हिन्दुओं ने भड़काया हो? या मुस्लिमों के गैर-हिंसक उकसावे पर भी हिन्दुओं ने हिंसा की हो?

फिर से मॉब-लिंचिंग का झूठ

‘मॉब-लिंचिंग’ पत्रकारिता के समुदाय विशेष का नया ‘वॉट अबाउट 2002’ बन चुका है- यह जानकर भी कि काठ की यह हांडी फिर नहीं चढ़नी, कोशिश जारी रहेगी। बार-बार मॉब लिंचिंग का नैरेटिव झूठा निकला, ‘हमसे जय श्री राम बुलवाया गया’ की कलई खुल रही है, लेकिन कोशिश बदस्तूर जारी है।

हिन्दुओं की हालत

अब ज़रा फातिमा द्वारा ही तय किए गए मानदंडों पर हिन्दुओं की हालत देख लें- फिर ही यह सोचा जा सकता है कि किसे देश में शोषण और प्रताड़ना का रोना रोने का अधिकार है।

सबसे पहले स्वच्छता की बात करें। लिबरल गैंग का ही पोर्टल है लाइवमिंट। उस पर 2014 में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हिन्दू बस्तियों की हालत स्वच्छता के मामले में मुस्लिमों से भी बुरी है- इतनी अधिक कि हिन्दुओं के घर शिशुओं की मौत भी गंदगी से हो जाती थी। यानि या तो गंदगी का हिन्दू-मुस्लिम कनेक्शन नहीं है, और हर गरीब, हर हाशिए पर पड़ा इंसान गंदगी में जीने के लिए मजबूर है, और नहीं तो अगर गंदगी को साम्प्रदायिक एंगल देना ही है तो रोना रोने का अधिकार तो हिन्दुओं को है!

अगर बात गलत आतंकी हमले के आरोप में ज़िंदगी बर्बाद होने की करें तो बेशक उन 11 आरोपितों के साथ गलत हुआ, लेकिन यही तो साध्वी प्रज्ञा, स्वामी असीमानन्द, और समझौता धमाकों के आरोपितों के साथ भी हुआ! उन्हें भी तो समझौता मामले में बरी कर दिया गया! उनके लिए फातिमा कूदीं पैरवी में कि इनकी ज़िंदगी महज़ शक में जेल में सड़ा कर बर्बाद मत करो, अदालत का फैसला आने दो? उनका लेख जिस पोर्टल में छपा, उसके सम्पादक शेखर गुप्ता बिना साध्वी प्रज्ञा पर मालेगाँव का आरोप साबित हुए उन्हें शर्म का विषय कहते हैं। इस पर फातिमा का क्या कहना है?

फातिमा सरकारी मशीनरी की बात करना चाहतीं हैं? जिस सरकारी मशीनरी को वह महज़ दो घटनाओं के चलते अपनी पूरी कौम के खिलाफ खड़ा मान रहीं हैं, वही मशीनरी सबरीमाला, तिरुपति बालाजी समेत हिन्दुओं के हज़ारों मंदिरों को निगल चुकी है। RTE का बोझ केवल हिन्दू शैक्षिक संस्थान उठा रहे हैं- मुस्लिमों के मदरसे इससे आज़ाद हैं। सरकारी AMU और जामिया मिलिया इस्लामिया आरक्षण देने से मना करते हैं और उसके पक्ष में तोड़-मरोड़ कर कुतर्क देते हैं। केवल हमारे गुरुओं, पूजा-परम्पराओं पर ‘वैज्ञानिकता’ की आड़ में हमला ‘fair game’ और ‘free speech’ होता है। तबरेज़ और इकलाख की मौत पर मीडिया से लेकर प्रधानमंत्री तक सब बोले, भारत यादव और मंगरू का नाम भी आपको पता है?

कड़वा सच यही है फातिमा खान जी कि इस देश पर लगभग 1000 साल तक राज करने और उसके बाद से आज तक हर एक सरकार की आँखों के तारे बने रहने के बाद भी मुस्लिम पिछड़ा है, ‘डरा हुआ’ है तो उसे अपने अंदर ही झाँक कर देखने की ज़रूरत है कि ऐसा क्यों है? यही नसीरुद्दीन शाह ने कहा था, जिन्हें आपने आड़े हाथों ले लिया; यही आरिफ मोहम्मद खान ने कहा, जिनपर आप हमलवार हो गईं; और यही बात उस लेख में कही गई थी, जिसके जवाब में आपने यह झूठा विषवमन किया है।

कर्नाटक: कॉन्ग्रेस की मुश्किलें बढ़ी, 2 MLA पहुँचे SC, BSP विधायक के साथ पर भी संशय

कर्नाटक में सियासी नाटक जारी है। तमाम उपायों के बाद भी मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रही हैं। बता दें कि कुमारस्वामी को सोमवार (22 जुलाई, 2019) को विधानसभा में विश्वासमत साबित करना है। वहीं, इससे पहले रविवार को कर्नाटक के दो निर्दलीय विधायकों ने कॉन्ग्रेस और जेडीएस गठबंधन की सरकार की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है।

न्यूज एजेंसी एएनआई के रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक के दो निर्दलीय विधायक एच नागेश और आर शंकर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। इसमें दोनों विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट से विश्वासमत के मामले में हस्तक्षेप करते हुए कर्नाटक सरकार को सोमवार को ही विश्वासमत साबित करने के आदेश देने की माँग की है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों विधायकों ने SC में दाखिल याचिका में कहा है कि उन्हें डर है कि सीएम कुमारस्वामी सोमवार को मेडिकल इमरजेंसी का हवाला देकर विश्वासमत को टालने का प्रयास कर सकते हैं।

बता दें कि कर्नाटक में जहाँ कुमारस्वामी की सरकार बचाने के लिए एक-एक वोट जरूरी है। वहीं, कुछ रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के एकलौते विधायक एन महेश ने भी विश्वासमत से अपने हाथ खींच लिए हैं। एन महेश ने एक बयान में कहा, “मुझे कुछ व्यक्तिगत काम है, जिसके कारण मैं विधानसभा के सत्र में नहीं जा पाउँगा। मेरे आलाकमान ने मुझे विश्वास प्रस्ताव पर मतदान करने से रोक दिया है, इसलिए मैं सोमवार और मंगलवार को सत्र में भाग नहीं लूँगा। इस दौरान मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र में रहूँगा।” ऐसे समय में कॉन्ग्रेसी दिग्गज मंथन में जुटे हैं। अब देखना यह है कि सियासत का यह घोड़ा किस करवट बैठता है।

बसपा ने बीते साल हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जेडीएस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। इससे पहले कर्नाटक विधानसभा में शुक्रवार को भी बहुमत परीक्षण नहीं हो पाया था। हालाँकि, यह भी कहा जा रहा है कि मायावती ने अपने एकमात्र विधायक को कुमारस्वामी के पक्ष में मतदान के लिए निर्देशित किया है।

राज्यपाल वजुभाई वाला की ओर से मुख्यमंत्री कुमारस्वामी को कर्नाटक विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए शुक्रवार शाम 6 बजे तक का समय दिया गया था लेकिन कुमारस्वामी निर्धारित समय तक बहुमत साबित नहीं कर सके। बाद में कर्नाटक विधानसभा के अध्यक्ष रमेश कुमार ने शुक्रवार को सदन की कार्यवाही 22 जुलाई तक के लिए स्थगित कर दिया था।

शिनजियांग में कैद 20 लाख उइगरों के मानवाधिकारों के हनन पर पाकिस्तान की चुप्पी?

चीन पर शिनजियांग में 10 लाख उइगरों को हिरासत में लेने व उइगरों पर अत्याचार करने का आरोप है, इस संदर्भ में हाल ही में 22 देशों के राजदूतों ने चीन की नीतियों की आलोचना करते हुए संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद को एक पत्र लिखा था। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान इस मामले में अपनी आँखें मूंदे बैठा है।

पाकिस्तान, ईरान और सऊदी अरब जैसे कई इस्लामिक देश ऐसे देश हैं जिन्होंने समुदाय विशेष पर हो रहे इन कथित अत्याचारों पर चुप्पी साध रखी है। इसकी वजह शायद चीन का इन देशों में भारी निवेश है। चीनी निवेश इन देशों को आर्थिक संकट से उबारने में बहुत महत्वपूर्ण है। इसी के चलते ये इस्लामिक देश चीन की नीतियों का विरोध करने की बजाए उसके समर्थन में खड़े नज़र आते हैं।

चीन का करीबी सहयोगी, पाकिस्तान इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के सबसे शक्तिशाली सदस्यों में से एक है। हालाँकि, इस संगठन ने बड़े पैमाने पर शिनजियांग में इस्लाम के ख़िलाफ़ मानव अधिकारों के मामलों को कवर किया है।

ब्रसेल्सबेड साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम (SADF) के अनुसंधान निदेशक, डॉ सिगफ्रीड ओ वुल्फ ने पाकिस्तान की इस चुप्पी के विषय में कहा कि इसकी मुख्य वजह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का कार्यान्वयन है। यह बात स्पष्ट है कि उइगरों के विषय में कोई भी सवाल उठाना पाकिस्तान को भारी पड़ सकता है और इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पड़ेगा। पाकिस्तान को यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि उइगर मसले पर कुछ भी बोलने से CPEC के कार्यान्वयन पर संभावित नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

इसके आगे उन्होंने कहा, “इस संदर्भ में, हमें यह भी उम्मीद करनी चाहिए कि पाकिस्तानी नेतृत्व देश में चीनी-विरोधी भावनाओं को आगे न बढ़ाने के लिए सवाल नहीं उठाना चाहता जो कि पहले से ही बढ़ रही हैं। इससे चीनी परियोजनाओं, श्रमिकों और कंपनियों की सुरक्षा स्थिति और भी ख़राब हो जाएगी।”

वुल्फ ने कहा कि एक और पहलू इस्लामाबाद है जो विशेष रूप से चीन में उइगरों के साथ दुर्व्यवहार को अनदेखा करके बीजिंग को खुश करना चाहती हैं। इससे सुरक्षा और सैन्य-संबंधित मामलों में पाकिस्तान-चीन द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत बनाने में पाक को मदद मिलती है। जो चीनी हथियारों और सैन्य उपकरणों के वितरण में स्पष्ट नज़र आती है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को लिखे पत्र में चीन को उइगरों की हिरासत को रोकने का आग्रह किया गया था। अमेरिकी विदेश मंत्री, माइकल पोम्पेओ ने उइगरों को क़ैद रखने की चीन की नीति को ‘सदी का दाग’ भी कहा। विदेश विभाग का अनुमान है कि 8 लाख उइगरों समेत इसी मजहब जे 20 लाख तुर्कों को बीजिंग ने आंतरिक शिविरों में “re-education” के नाम पर क़ैद कर रखा है।

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि शिनजियांग में बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों के उल्लंघन को कवर करने के लिए पाकिस्तान चीन के साथ हाथ मिला रहा है। यूरोपीय फ़ाउंडेशन फ़ॉर साउथ एशियन स्टडीज़ (EFSAS) के एक वरिष्ठ शोध विश्लेषक दुसन वेन्ज़ोविच ने कहा कि जिस तरह से चीन आतंकवाद का मुक़ाबला करने के लिए दोहरे मानकों को बनाए रखता है, मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी न घोषित करना इस बात को स्पष्ट करता है।” 

वुल्फ ने इस बात पर भी अंदेशा जताया कि पाकिस्तान, अमेरिका की यात्रा के दौरान दोहरा खेल खेलने की अपनी पुरानी रणनीति को जारी रखेगा। वुल्फ का मानना ​​है कि ईरान पर इस्लामाबाद का रुख, साथ ही ईरान-पाकिस्तान-चीन द्वारा साझा किए गए त्रिपक्षीय संबंधों को अमेरिका के साथ बातचीत में एक सौदेबाज़ी के तरीके के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

गुजरात को नहीं देंगे नर्मदा का पानी: CM कमलनाथ

मध्य प्रदेश के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार ने गुजरात को दिए जाने वाले नर्मदा के पानी में कटौती की धमकी दी है। उनका आरोप है कि सरदार सरोवर बाँध के विस्थापितों के पुनर्वास को लेकर गुजरात की राज्य सरकार गंभीर नहीं है। यहाँ तक कि आरोपों के मुताबिक, नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी (NCA) की बैठकों को भी सीरियसली नहीं लिया जा रहा है।

‘बिजली के लिए पानी नहीं दे रही गुजरात सरकार’

मध्य प्रदेश के नर्मदा घाटी विकास मंत्री सुरेंद्र सिंह बघेल ने गुजरात को चेतावनी दी है कि अगर गुजरात और केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश की बाँध से विस्थापित हुए लोगों को लेकर चिंताओं पर गौर नहीं किया तो नर्मदा का पानी उनकी सरकार रोक देगी। उन्होंने बिजली के लिए गुजरात सरकार द्वारा मध्य प्रदेश को पानी न देने का भी आरोप लगाया। प्रत्युत्तर में गुजरात सरकार ने मध्य प्रदेश सरकार को चेतावनी दी है कि वह (कमलनाथ सरकार) बाँध के पानी के साथ राजनीतिक खिलवाड़ न करे। गुजरात सरकार ने मध्य प्रदेश को उन दोनों के सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों और नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी से बँधे होने की बात भी याद दिलाई।

गुजरात के उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल के मुताबिक मध्य प्रदेश सरकार की धमकी NCA के अंतर्गत हुए अंतर्राज्यीय समझौते की समझ का अभाव दिखाती है। उन्होंने साफ़ किया कि समझौते के अंतर्गत बिजली के लिए पानी तभी छोड़ा जा सकता है जब पानी का स्तर बाँध में 131 मीटर के स्तर से ऊपर पहुँच गया हो। उन्होंने ₹400 करोड़ विस्थापितों के पुनर्वास के लिए पहले ही जारी हो चुके होने का दावा भी किया।

विजय रूपाणि का बयान

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणि भी मामले में कूद पड़े हैं। उन्होंने कहा कि गुजरात अपने न्यायोचित हिस्से का पानी लेकर रहेगा। साथ ही उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस को समूचे देश के हितों को दाँव पर रख कर राजनीति करना शोभा नहीं देता। “कॉन्ग्रेस लोक सभा चुनावों में हार पचा नहीं पाई है और पहले ही तय हो चुके मुद्दों पर नए सिरे से राजनीति करने का मौका तलाश रही है। पानी का बँटवारा NCA समझौते के मुताबिक ही हो रहा है, और एक राज्य अचानक से इसे बदल देने का निर्णय नहीं ले सकता।”

रूपाणि ने साफ़ किया कि मध्य प्रदेश ने विस्थापितों का मुद्दा पहली बार गत 27 मई को ही उठाया था। उस समय मध्य प्रदेश सरकार का कहना था कि 6000 से ज्यादा लोगों का पुनर्वास अभी लंबित है। उनके दावे के मुताबिक मध्य प्रदेश ने 18 जुलाई की सरदार सरोवर रिजर्वायर रेगुलेशन कमिटी की मीटिंग का भी बहिष्कार किया था।

वहीं मध्य प्रदेश के मंत्री बघेल ने दावा किया कि मध्य प्रदेश को बैठक का बहिष्कार इसलिए करना पड़ा क्योंकि गुजरात सरकार और केंद्र उन्हें गंभीरता से ले नहीं रहे थे। सरदार सरोवर बाँध पर बने दो पनबिजली प्लांटों की बिजली का बँटवारा मध्य प्रदेश (57%), महाराष्ट्र (27 %) और गुजरात (16%) के बीच होता है

सोनभद्र हत्याकांड के लिए कॉन्ग्रेस-सपा जिम्मेदार, सजा के लिए रहें तैयार: CM योगी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार (जुलाई 21, 2019) को सोनभद्र गोलीबारी में मारे गए परिवारों से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि यह पाप कॉन्ग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं का है और जिन लोगों ने अपराध किया है, उन्हें इसकी सजा के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस मामले मे कुल 29 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं जिसमें एक आरोपी ग्राम प्रधान भी हैं।

योगी आदित्यनाथ ने सीधे-सीधे इस घटना के लिए कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि इस घटना की नींव 1955 में ही पड़ गई थी, जब कॉन्ग्रेस की सरकार थी। सोनभद्र के विवाद के लिए 1955 और 1989 की कॉन्ग्रेस सरकार दोषी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सोनभद्र में जो घटना घटी है, उसकी नींव 1955 में रखी गई थी। 1955 में कॉन्ग्रेस की सरकार ने सोनभद्र में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के नाम पर जनजाति के लोगों की भूमि को एक पब्लिक ट्रस्ट के नाम कर दिया। वर्ष 1989 में उस ट्रस्ट से जुड़े लोगों के नाम पर वह जमीन कर दी गई। वर्ष 2017 में वह जमीन कुछ लोगों को बेची गई। यह कैसे हुआ, इसका परीक्षण भी जाँच कमिटी करेगी। इस गड़बड़ी की जाँच के लिये राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई है, जो 10 दिन में रिपोर्ट सौंपेगी।

इसके साथ ही सीएम ने पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने का भी ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि मृतकों के परिजनों को 18-18 लाख और घायलों को ढाई-ढाई लाख रुपए का मुआवजा दिया जाएगा। इससे पहले सीएम ने मृतक के परिजन को 5-5 लाख रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की थी।

पूरा मामला: सोनभद्र: हत्याकांड की बुनियाद आजादी से भी पुरानी, भ्रष्ट अधिकारियों ने रखी नींव

रूस में कट्टरपंथियों के निशाने पर हिन्दू आश्रम, PM मोदी से मदद की आस

रूस में ईसाई कट्टरपंथियों द्वारा एक हिन्दू आश्रम ‘श्री प्रकाश धाम’ से जुड़े प्रसून प्रकाश और उनके परिवार को लगातार सताए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। श्री प्रकाश धाम जो कि रूस, यूरेशिया, यूरोप और यूके में मौजूद केंद्रों का एक समूह है। इस हिन्दू आश्रम को ईसाई कट्टरपंथियों ने न सिर्फ़ बदनाम करने की कोशिश की बल्कि इसके संरंक्षकों पर शारीरिक हमले भी करवाए। इसकी जानकारी आश्रम के निदेशक प्रसून प्रकाश ने ख़ुद दी।

दरअसल, प्रसून प्रकाश भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए ‘श्री प्रकाश धाम’ में सावर्जनिक मामलों के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। उनका जन्म मॉस्को में ही हुआ था और उन्होंने रूसी प्रशासनिक सेवा में अंतरराष्ट्रीय संबंधों (विशेष) पर मॉस्को स्टेट विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया।

उन्होंने बताया, “लगभग चार साल पहले मेरा परिवार और हमारा आश्रम (श्री प्रकाश धाम) राष्ट्रवादी रूढ़िवादी ईसाई गुंडों (कुछ हद तक ईसाई भारतीय हिन्दू समूहों के ईसाई के समान, अगर ऐसा कहना सही है) का शिकार हो गया।” इस बात की पुष्टि के लिए उन्होंने उन लेखों का ज़िक्र किया जिसमें इस घटना का उल्लेख किया गया था। यह लेख ‘न्यूज़वीक’ और ‘डेली कॉलर’ में छपे थे। इन्हें पढ़ने के लिए कृपया नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें:

इन लेखों को पढ़ने के बाद यह बात स्पष्ट हो गई कि आश्रम के धर्मगुरू श्री प्रकाश का जीवन लंबे समय से प्रताड़ित रहा जिसमें रूढ़िवादी ईसाईयों ने उन्हें कई बार धमकियाँ भी दीं कि वो रूस से बाहर चले जाएँ। धर्मगुरू ने मीडिया से हुई बातचीत में बताया कि रूस में वो 1990 से शांति से रह रहे थे, जिसमें पहले वो एक मेडिकल स्टूडेंट थे, और फिर एक आध्यात्मिक गुरू के तौर पर थे। लेकिन यह स्थिति उस समय बदल गई जब हिन्दू-विरोधी अलेक्जेंडर ड्वोर्किन की नज़र उनके आश्रम पर पड़ी।

धर्मगुरू श्री प्रकाश के अनुसार, उनके आश्रम और उनके घर को खोजकर उनके पास फ़र्ज़ी पत्रकारों को भेजा गया। उनके आश्रम में विरोधी लोग अनुयायी की शक्ल में आते, फ़र्ज़ी पत्रकार आश्रम और उनकी तस्वीरें लेते, वीडियो रिकॉर्डिंग करते और इस तरह आश्रम और धर्मगुरू के बारे में ग़लत प्रचार करते।

इस बारे में प्रसून प्रकाश ने बताया कि आश्रम और उन्हें बदनाम करने का सिलसिला इंटरनेट, टीवी और रेडियो से शुरू हुआ। यहाँ तक कि उनके ऊपर शारीरिक हमले तक करवाए गए। इन सब गतिविधियों से तंग आकर जब उन्होंने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया तो उनके वकील जो कि पुतिन समर्थक थे, उन पर FSB द्वारा केस न लड़ने का दबाव बनाया गया। उन्होंने बताया कि हमने इस मामले को संयुक्त राष्ट्र और रूसी संसद में भी उठाया।

प्रसून प्रकाश ने जानकारी दी कि फ़िलहाल, स्थिति क़ाबू में है क्योंकि पिछले साल, 10 दिसंबर को उन्होंने रूस और भारत द्वारा इस मामले पर की गई कवरेज की मदद से उपरोक्त हिन्दू-विरोधी ईसाई संगठन के ख़िलाफ़ मामला जीत लिया था। इस जीत में कई लोगों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इसमें हमारे नए वकील जो कि मुस्लिम थे और कुछ पत्रकार शामिल हैं जिन्होंने इस मुद्दे को गंभीरता से प्रकाशित किया।

इसके अलावा यह मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन तक पहुँच चुका है। प्रसून प्रकाश ने इस बात की भी जानकारी दी कि दो साल पहले उन्होंने रूसी मीडिया की उच्चस्तरीय बैठक में तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री जनरल वी.के. सिंह से भी मुलाक़ात की थी। इस मामले में श्री प्रकाश धाम और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं को भारत सरकार से काफ़ी उम्मीदें हैं।

झारखंड कॉन्ग्रेस में सिर-फुटौव्वल, प्रदेश अध्यक्ष को पूर्व केंद्रीय मंत्री ने लताड़ा

लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद से कॉन्ग्रेस में जारी सिर-फुटौव्वल अब झारखंड पहुॅंच गई है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार पर हमला बोला है। सहाय ने कहा, “अजय कुमार को पद तो मिल गया, लेकिन उनकी कोई विचारधारा नहीं है। पहले वो झारखंड मुक्ति मोर्चा (JVM) में थे, उसके बाद कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए हैं।

ANI से सुबोध कांत सहाय ने शनिवार (जुलाई 20, 2019) को यह बात कही। 1986 बैच के पूर्व आईपीएस अधिकारी अजय कुमार जुलाई 2011 में जेवीएम के टिकट पर मध्यावधि चुनाव में 15 वीं लोकसभा के सदस्य चुने गए थे। अगस्त 2014 में वे कॉन्ग्रेस में शामिल हुए और नवंबर 2017 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था।

हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। पार्टी झारखंड की 14 सीटों में से केवल 1 सीट जीतने में सफल रही थी। इस हार के बाद अजय कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। हालाँकि उनके इस्तीफे पर अभी केंद्रीय नेतृत्व ने कोई फैसला नहीं किया है।

झारखंड में इस साल नवंबर-दिसंबर में विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे वक़्त में सहाय ने अजय कुमार पर भाजपा की प्रशंंसा करने का भी आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि देश में गाँधी और गोडसे की विचारधारा के बीच टकराव चल रहा है और वे (अजय) भाजपा की प्रशंसा कर रहे हैं।

गाजियाबाद में भाजपा नेता की हत्या, शाहरुख़ और तसनीम गिरफ्तार

भाजपा नेता डॉ. बलवीर सिंह तोमर की गाज़ियाबाद में हुई हत्या के मामले में यूपी पुलिस ने शाहरुख़ और तसनीम नामक दो आरोपितों को गिरफ्तार किया है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया से जुड़े पत्रकार राज शेखर झा के ट्विटर हैंडल के मुताबिक दो अन्य आरोपित फ़रार चल रहे हैं। हमलावरों ने डासना में तोमर को शनिवार (20 जुलाई, 2019) की रात गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था

पाँच राउंड गोलियाँ झेलने वाले तोमर को तुरंत अस्पताल ले जाया गया जहाँ इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। यह घटना नज़दीकी पुलिस स्टेशन से मात्र 50 मीटर की दूरी पर हुई। एसएचओ प्रवीण शर्मा को निलंबित कर दिया गया है।

कर्नाटक टेस्ट करूँगा ‘बंक’, बहनजी का इंस्ट्रक्शन: बसपा विधायक

कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी की अगुआई वाली कॉन्ग्रेस-जदएस सरकार विश्वास मत पर मतदान को जितना टाल रही है उसका संकट उतना ही गहराता जा रहा है। सोमवार को होने वाले बहुमत परीक्षण से पहले राज्य में बसपा के इकलौते विधायक एन सुरेश ने घोषणा की है कि फ्लोर टेस्ट के दौरान वे विधानसभा में मौजूद नहीं रहेंगे।

उनके मुताबिक बसपा सुप्रीमो मायावती के निर्देश पर उन्होंने बहुमत परीक्षण से दूर रहने का फैसला किया है। 16 विधायकों की बगावत के कारण 14 महीने पुरानी कुमारस्वामी सरकार पहले से ही संकट में है। इनमें से 13 कॉन्ग्रेस के और 3 जदएस के हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने बागी विधायकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि उन्हें विधानसभा के सत्र में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसके बाद से बागी विधायक विश्वासमत पर चर्चा से दूर ही रहे हैं। उन्हें मनाने के गठबंधन सरकार के प्रयास अब तक सफल नहीं हो पाए हैं।

बीते हफ्ते लगातार दो दिनों तक विश्वास मत पर मतदान नहीं होने के बाद विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी थी। इस दौरान राज्यपाल ने स्पीकर और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर विश्वास मत पर वोटिंग कराने को कहा था।

मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि राज्यपाल वजूभाई वाला विधानसभा को निर्देशित नहीं कर सकते कि विश्वास मत प्रस्ताव किस तरह लिया जाए। वहीं, कॉन्ग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का रूख करते हुए कहा है कि बागी विधायकों की याचिका पर न्यायालय का आदेश विधानसभा के चालू सत्र में पार्टी के लिए अपने विधायकों को व्हिप जारी करने में बाधक बन रहा है।

224 सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा में भाजपा के 105 विधायक हैं और उसे दो निर्दलीयों का समर्थन भी हासिल है। ऐसे में अब तक अपने विधानसभा क्षेत्र में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए विशेष पैकेज के बदले समर्थन का वादा करते रहे एन सुरेश के पीछे हटने से कुमारस्वामी सरकार के गिरने का खतरा और बढ़ गया है।