मध्य प्रदेश में जबलपुर के सिविक सेंटर में कीर्ति स्तम्भ को तोड़े जाने से जैन समाज काफ़ी आक्रोश में हैं। दरअसल, सिविक सेंटर पर आचार्यश्री विद्यासागर महाराज के 50वें दीक्षा वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में इस कीर्ति स्तम्भ का निर्माण कराया गया था जिसे नगर निगम द्वारा तोड़ दिया गया था। इसके विरोध में जैन समाज के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाक़ात की। उन्हें ज्ञापन सौंपते हुए जैन समाज ने दोषियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई के साथ-साथ कीर्ति स्तम्भ के पुनर्निमाण की माँग भी की।
Disturbing News Alert!
Kamalnath Govt demolished the Underconstruction Kirti Stambh of Jain Guru Vidhyasagar Maharaja, in Jabalpur yesterday!
No hue & cry in the Media because this was Not Lenin’s statue & the state is not BJP ruled!
इस प्रतिनिधिमंडल में दिगंबर जैन पंचायत कमेटी के अध्यक्ष प्रमोद हिमांशु व दिगंबर जैन पंचायत सभा जबलपुर के संदेश जैन, युवराज जैन शामिल थे। सीएम से मुलाक़ात के बारे में अध्यक्ष प्रमोद हिमांशु ने बताया कि मुख्यमंत्री ने उनकी माँगों पर विचार करने और मामले की जाँच कराने का आश्वासन दिया है।
ख़बर के अनुसार, दिगंबर जैन पंचायत कमेटी के तत्वाधान में शनिवार (20 जुलाई 2019) को जवाहर चौक जैन मंदिर में चातुर्मास पर कलश स्थापित होगा। इसकी स्थापना आचार्यश्री विद्यासागर महाराज के चातुर्मास के लिए की जाएगी। जानकाारी के मुताबिक़, सभी मुनि शाम के समय हबीबगंज जैन मंदिर के लिए विहार करेंगे। आगामी रविवार को महामस्तकाभिषेक व शांतिधारा आदि अनुष्ठान किए जाएँगे।
इसके अलावा, शुक्रवार (19 जुलाई 2019) को जैन समाज ने विरोध स्वरूप धरना जारी रखा था। वहीं, पिसनहारी की मढ़िया से जुलूस निकालकर विरोध दर्ज कराया। स्थानीय लोगों का कहना था कि यह विरोध-रैली तब तक जारी रहेगी जब तक प्रशासन द्वारा कोई उचित निर्णय नहीं ले लिया जाता।
इससे पहले जैन समुदाय द्वारा गुरुवार (18 जुलाई 2019) को कलेक्टर आफ़िस का घेराव किया गया था। यहाँ पहुँचे लोगों ने नगर निगम के दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करने की माँग उठाई। इस संदर्भ में उन्होंने कलेक्टर भरत यादव को ज्ञापन भी सौंपा। इस पर भरत यादव ने कहा था कि नगर निगम की अचानक कार्रवाई की जाँच कराई जाएगी। उन्होंने बताया कि अगर यह अवैध निर्माण होता तो उसके लिए नोटिस या हिदायत दी जानी चाहिए थी। साथ ही इस मामले को प्रशासन के संज्ञान में लाने की बात भी उन्होंने कही थी।
कीर्ति स्तम्भ को लेकर उपजे विवाद के चलते जैन समाज ने विरोध स्वरूप दुकानें बंद रखीं। समुदाय से जुड़े कुछ संगठनों और पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं ने बड़े फुहारा पर धरना भी दिया। पदाधिकारियों का कहना था कि नगर निगम ने ख़ुद इस निर्माण (कीर्ति स्तम्भ) की अनुमति दी थी। इस पर सवाल उठाते हुए धरना प्रदर्शनकारियों का कहना था कि अनुमति देने के बाद तोड़-फोड़ क्यों की गई?
केरल के कन्नूर में ब्रेनन कॉलेज के प्रिंसिपल के.फलागुणन ने गुरुवार (जुलाई 18, 2019) को कैंपस में छात्र संगठनों के बीच झगड़े की आशंका का हवाला देते हुए एबीवीपी के झंडे को कैंपस से हटा दिया, जबकि एसएफआई के झंडे को वही लगे रहने दिया। इस कदम के बाद प्रिंसिपल विवादों में घिर गए हैं। सोशल मीडिया में झंडा हटाते प्रिंसिपल की वीडियो वायरल हो गई।
जानकारी के मुताबिक यहाँ ABVP के सदस्य RSS-ABVP कार्यकर्ता विशाल का बलिदान दिवस मना रहे थे, जिसे PFI ने 2012 में मार दिया था। इसके मद्देनजर पहले प्रिंसिपल ने अस्थायी रूप से कॉलेज में झंडे लगाने की अनुमति दी थी। लेकिन बाद में वह एबीवीपी के सदस्यों से उनका झंडा हटाने के लिए कहने लगे। जब सदस्यों ने ऐसा करने से मना किया तो प्रिंसिपल ने खुद जाकर एबीवीपी के झंडे को उतार दिया। इस घटना के बाद आंदोलन कर रहे सदस्यों ने उनके घर तक मार्च कर प्रदर्शन किया।
Kannur : Thalassery Brennen College principal uproots #ABVP flag and throws it outside college while Red Jihadis cheer. Only SFI flags are allowed here. This is what we face in Kerala. This is why it pains us more when we see a #RichaBharti arrested in a BJP ruled state. pic.twitter.com/4e7wcN4GFP
— Sabarimala keeps South India ‘Hindu’ (@PartyVillage017) July 17, 2019
प्रिंसिपल की मानें तो उन्होंने ऐसा दो पक्षों में संभावित झगड़े को रोकने के लिए किया। लेकिन भाजपा नेता कृष्णादास की मानें तो कैंपस में एसएफआई की अच्छी पकड़ होने कारण प्रिंसिपल उनकी करतूतों को अनदेखा कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि वे झगड़ों को रोकना चाहते तो एसएफआई के झंडे को भी हटा देते।
बता दें इस घटना के अगले दिन एबीवीपी के सदस्यों ने दोबारा झंडा फहराने की कोशिश की, लेकिन उन्हें इस दौरान पुलिस का प्रतिरोध झेलना पड़ा। पूरे प्रकरण में प्रिंसिपल का कहना है कि उन्हें एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने जान से मारने की धमकी दी है, इसलिए उन्होंने अपने घर के बाहर पुलिस की तैनाती करवाई है।
घटना के बाद हुई आलोचनाओं पर प्रिंसिपल ने सफाई दी है। उन्होंने कहा, “मैंने झंडा इसलिए उतारा ताकि Sfi और Abvp के बीच होने वाले झगड़े को टाला जा सके।” उनकी मानें तो हजारों की तादाद में एक ओर sfi के छात्र थे, जबकि दूसरी ओर abvp के 7 कार्यकर्ता थे। इसलिए उन्होंने वो किया जो उन्हें लगा कि स्थिति को संभालने के लिए सबसे बेहतर था। उन्होंने झंडा उतारा और उसे बाहर ले जाकर पुलिस को सौंप दिया।
जानकारी के अनुसार ब्रेनन कॉलेज में एसएफआई की अच्छी पकड़ है। जिसके कारण यहाँ दूसरे संगठनों को काम करने से रोका जाता है। सीपीएम नेता और केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन यहाँ के एलुमनी है।Sfi सीपीएम का छात्र संघ है, जिसे यहाँ के कैंपस में हिंसात्मक राजनीति के लिए जाना जाता है।
दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और दिल्ली प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष शीला दीक्षित का शनिवार (जुलाई 20, 2019) को निधन हो गया। 81 वर्षीय शीला दीक्षित लंबे समय से बीमार चल रही थी। कॉन्ग्रेस की दिग्गज नेता दीक्षित दिल्ली में सबसे लम्बे समय तक काम करने वाली मुख्यमंत्री रही थीं। उन्होंने 1998 से 2013 तक दिल्ली में मुख्यमंत्री पद सम्भाला था।
शीला दीक्षित की तबियत कुछ वक्त से ठीक नहीं थी। उन्होंने दिल्ली के एस्कार्ट अस्पताल में अंतिम सांस ली। मौजूदा वक्त में उनके पास कॉन्ग्रेस के दिल्ली अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी थी। हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में वो उत्तर पूर्वी दिल्ली से चुनाव भी लड़ीं थी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।
शीला दीक्षित का नाम कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेताओं में शामिल था। वो 15 सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। शीला दीक्षित की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे लेकिन उनके विरोधी भी वर्तमान दिल्ली के निर्माण में उनकी भूमिका को सराहते हैं। शीला दीक्षित के निधन पर पूरे देश के नेता उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में आदिवासियों की 150 बीघा जमीन पर कब्जे को लेकर हुई हत्याओं पर पूरे देश में नाराजगी दिख रही है। घोरावल के मूर्तिया गाँव में बीते बुधवार की दोपहर जमीनी विवाद में दो पक्षों के बीच जमकर खूनी संघर्ष हुआ। यह भी सच है कि कुछ लोग इस घटना के बहाने अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आदिवासियों की मौत पर राजनीति कर रहे लोगों की पार्टी के सरकार के जमाने में ही इस नरसंहार की पटकथा तैयार की जा चुकी थी!
आदिवासियों की जमीन पर नौकरशाहों और पूँजीपतियों का कब्ज़ा कोई नई बात नहीं है। हाल ही में हरियाणा में एक प्रकरण सामने आया था जिसमें आदिवासियों के नाम पर कई एकड़ जमीन निकल आई थी। दरअसल, अन्य राज्यों के पूंजीपतियों द्वारा यहाँ पर अवैध रूप से जमीन आदिवासियों के नाम पर खरीदी गई थी। भू-माफिया अक्सर टैक्स और अन्य कानूनों से बचने के लिए राज्य सरकार की मदद से इस तरह के कारनामों को अंजाम देते आए हैं।
आदिवासियों की जमीन की गैर-आदिवासियों के बीच खरीद-बिक्री की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो जमींदारी प्रथा के उन्मूलन से पूर्व आदिवासी भूमि का हस्तानांतरण जमींदारों की आपसी साँठ-गाँठ से होता था। जमींदारी जाने के बाद यह कार्य द्विसंधि से प्राप्त डिक्री के आधार पर होने लगा।
वर्ष 1954 में जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोनभद्र गए थे तो वहाँ की जमीन और प्रकृति से प्रभावित होकर इसे भारत का स्विट्ज़रलैंड बताया था। लेकिन नेहरू शायद तब यह नहीं जानते थे कि उनके इस स्विट्ज़रलैंड में उन्हीं की नाक के नीचे किस प्रकार का काला धंधा पनप रहा है।
सोनभद्र: टाइमलाइन, एक नजर
ओबरा-आदिवासी बाहुल्य जनपद में सदियों से आदिवासियों की जोत भूमि को तमाम नियमों के आधार पर नजरअंदाज किया जाता रहा है। तमाम सर्वे के बावजूद अधिकारियों की संवेदनहीनता उन्हें भूमिहीन बनाती रही है। घोरावल के मूर्तिया उम्भा गाँव में हुए खूनी संघर्ष के पीछे प्रशासनिक लापरवाही भी बड़ी दोषी रही है। इस गाँव में पिछले 70 वर्ष से ज्यादा समय से खेत जोत रहे गोड़ जनजाति के लोग प्रशासन से गुहार लगाते रहे, लेकिन उन्हें उनकी जमीन पर अधिकार नहीं दिया गया। जबकि तत्कालीन जिलाधिकारी अमित कुमार सिंह ने सहायक अभिलेख अधिकारी को मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन कर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। 2 फरवरी 2019 को उनके तबादले के चार दिन बाद 6 फरवरी 2019 को सहायक अभिलेख अधिकारी ने आदिवासियों की माँग को अनसुना कर दाखिला ख़ारिज जारी करते हुए बेदखली का आदेश दे दिया। यही निर्णय बुधवार की घटना की नींव बना।
1955 से लगातार चर्चा में रहा मामला
यह मामला वर्ष 1955 से चला आ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बिहार के आईएएस प्रभात कुमार मिश्रा और तत्कालीन ग्राम प्रधान ने उम्भा की लगभग 600 बीघा जमीन को अपने नाम कराने का प्रयास किया था। जबकि गाँव वालों का कहना है कि वहाँ के आदिवासी 1940 से पूर्व से ही इन जमीनों पर काबिज रहे हैं और वहाँ खेती करते आए हैं।
दिसम्बर 17, 1955 :
उक्त आईएएस अधिकारी ने तहसीलदार के माध्यम से 17 दिसम्बर 1955 में जमीन को आदर्श कॉपरेटिव सोसायटी के नाम करा ली। यह सोसायटी बिहार के मुजफ्फरपुर निवासी माहेश्वरी प्रसाद नारायण सिन्हा द्वारा बनाई गई थी। जबकि उस समय तहसीलदार को नामान्तरण का अधिकार नहीं था। नारायण सिन्हा ने तहसीलदार से साँठ-गाँठ कर के 639 बीघा जमीन को सोसायटी के नाम कर लिया। ध्यान रखिए कि यह सब नियमों के विरुद्ध किया गया था।
इसके बाद माहेश्वरी नारायण (आदर्श कॉपरेटिव सोसायटी के मालिक) ने इस जमीन में से 148 बीघा अपने IAS दामाद (प्रभात कुमार मिश्र, निवासी- पटना) की सहायता से तहसीलदार द्वारा अपनी बेटी आशा मिश्र के नाम करवा दी गई थी।
सितम्बर 06, 1989
इसके बाद यही जमीन आशा मिश्र (पत्नी- प्रभात कुमार, आईएएस अधिकारी) ने अपनी बेटी किरण कुमार के नाम कर दी, उनके पति, भानु प्रसाद (निवासी, भागलपुर) भी IAS हैं। इस सबके बीच गाँव के लोग जमीन पर कृषि कार्य करते रहे और उपज का हिस्सा IAS परिवार को पहुँचा देते थे।
अक्टूबर 17, 2017
यही वो समय था, जब किरण कुमार ने यह जमीन गाँव के प्रधान यज्ञवत सिंह को बेच दी। ग्रामीणों द्वारा बताया जा रहा है कि यह सौदा 2 करोड़ रुपए में हुआ था। ग्रामीणों द्वारा इस सौदे का विरोध भी किया गया था।
ध्यान देने की बात यह है कि माहेश्वरी नारायण द्वारा ली गई यह जमीन 1955 में भी कानूनी रूप से किसी के नाम पर नहीं की जा सकती थी, तो वर्ष 2019 में इस जमीन पर किसी व्यक्ति द्वारा मालिकाना हक़ बताना ही गलत है।
फरवरी 06, 2019
प्रधान यज्ञदत्त द्वारा इस जमीन का दाखिला ख़ारिज करवाया गया। कानून के अनुसार सोसायटी की जमीन किसी व्यक्ति के नाम नही हो सकती। नामान्तरण के खिलाफ ग्रामीणों ने एआरओ (सहायक समीक्षा अधिकारी) के यहाँ शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन 6 फरवरी 2019 को एआरओ ने ग्रामीणों के खिलाफ आदेश दिया। ग्रामीणों ने उसके बाद जिला प्रशासन को भी इस बारे में अवगत कराया, लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई।
पाँच महीने बाद प्रधान पूरी तैयारी के साथ आया था। लेकिन ग्रामीणों ने उसके विरोध किया। प्रधान यज्ञदत्त ने इस मामले में न्यायालय का सहारा लेने किस कोशिश की पर कोई फायदा नहीं हुआ। इन सब बातों से बौखलाया प्रधान यज्ञदत्त किसी भी प्रकार से 100 बीघा से ज्यादा जमीन हथियाने के प्रयास करने लगा और बुधवार को हुआ नरसंहार इस बात का प्रमाण है।
सोनभद्र में भूमि विवाद को लेकर फायरिंग, दस की हत्या; 25 गंभीर रूप से घायल
राजस्व विभाग के भ्रष्ट अफसर हैं गुनहगार
उत्तर प्रदेश के इस आदिवासी इलाके में राजस्व अधिकारियों द्वारा की गई धोखाधड़ी की पड़ताल करने पर पता चला कि हाल के दिनों में सोनभद्र भ्रष्ट नौकरशाहों, राजनेताओं और माफिया डॉन का अड्डा बन गया है जो औने-पौने दाम में जमीन खरीदते हैं। तहसील के उम्भा गाँव में जहाँ बुधवार को नरसंहार की वारदात हुई, वहाँ से महज कुछ सौ गज की दूरी पर स्थित विशंब्री गाँव में 600 बीघे का बड़ा भूखंड उत्तर प्रदेश सरकार के चकबंदी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने हड़प रखा है।
आदिवासियों की जमीन और उनसे जुड़े कानून आज भी पेचीदा हैं
आँकड़ों की यदि बात करें तो भारत में आज भी करीब 30 करोड़ से ज्यादा लोग जंगलों में जीवन-यापन करने वाले हैं। इनमें से मात्र साढ़े चार करोड़ लोगों द्वारा ही जमीन और संपत्ति अपने नाम पर की गई है। प्राकृतिक सम्पदा और अपने आर्थिक हितों के कारण ये लोग आधे से ज्यादा जनजातीय हिस्सों में बसते हैं या फिर आदिवासी तरीकों से अपना जीवनयापन करते आए हैं। इनमे से अधिकतर जमीन या तो भर्ती वन अधिनियम (Indian Forest Act, 1927) के तहत संरक्षित हैं या फिर अभी भी अवर्गीकृत हैं।
मुख्यधारा से ये लोग आज भी इतने कटे हुए हैं कि इन्हें सरकारी उपक्रमों, नियम कानून और किसी संवैधानिक संरचना के बारे में शायद ही कोई विशेष जानकारी हो। इसी बात का फायदा बाहर से आने वाले पूँजीपति और नौकरशाह आसानी से उठा लेते हैं। ये जमीनें या तो प्राकृतिक सम्पदा से संपन्न होती हैं या फिर इन पर भविष्य में उद्योग लगाने के नजरिए से इन पर अधिकार जमा लिया जाता है।
सोनभद्र प्रकरण ने हर उस अफसर के कान जरूर खड़े कर दिए होंगे जो इस प्रकार के किसी भी धंधे में संलिप्त रहा है और इस सरकारी तंत्र और उसकी नीतियों में मौजूद कमियों का फायदा उठाते आ रहे हैं। देखा जाए तो सोनभद्र प्रकरण से उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरा देश एक सबक ले सकता है और तुरंत इस मामले में उचित कार्रवाई करते हुए कमजोर कड़ियों, चाहे वो नियम-कानून हों या फिर सरकारी तंत्र हों, पर संज्ञान लेते हुए कुछ ऐतिहासिक कदम उठाएँ।
भूदान आंदोलन का गवाह हमारा यह देश आज भू-माफियाओं के चंगुल में है और शायद ही कोई सरकार इस बात से अनजान हो। यही समय है कि देश का शासन-प्रशासन इस मामले पर अपनी नींद तोड़कर आवश्यक कार्रवाई करे ताकि भविष्य में इस प्रकार की किसी दुर्घटना से बचा जा सके।
पश्चिम बंगाल के कल्याणी विश्वविद्यालय में कथित तौर पर तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) के गुंडों द्वारा किए गए बम विस्फोट में एबीवीपी का एक कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हो गया। घायल कार्यकर्ता की पहचान 19 वर्षीय तारक हलदर के तौर पर हुई है।
घटना शुक्रवार (जुलाई 19, 2019) दोपहर की है। एबीवीपी की राज्य इकाई के उपाध्यक्ष डॉ. इंद्रनील खान के अनुसार, तारक की बाईं जांघ में गंभीर चोटें आई है और काफी खून बाह गया। उसे बेहतर इलाज के लिए कोलकाता के अपोलो ग्लेनेगल्स अस्पताल में शिफ्ट किया गया है।
टीएमसी की गुंडागर्दी के खिलाफ एबीवीपी ने शनिवार को प्रदर्शन भी किया। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति काफी ख़राब है। इस सप्ताह की शुरुआत में 15 जुलाई को कांकीनाड़ा और भाटपाड़ा के एक अस्पताल समेत विभिन्न इलाकों में बमबाजी की गई थी। तलाशी के दौरान पुलिस को कांटापुकुर इलाके में 50 से भी ज्यादा जिंदा बम और बम बनाने के सामान मिले थे।
इसी इलाके में भाजपा-टीएमसी कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष में दो लोगों की मौत हो गई थी और तीन घायल हो गए थे। हाल के दिनों में राज्य में राजनीतिक हिंसा में बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता और समर्थकों की हत्याएँ हुई है।
महाराष्ट्र के औरंगाबाद के मदीना होटल में काम करने वाले इमरान इस्माइल ने शुक्रवार को 10 लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसमें उसने कहा था कि गुरुवार की देर रात जब वो घर जा रहा था तो रास्ते में कुछ लोगों ने उसे रोका और जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया। विरोध करने पर उन लोगों ने इमरान की पिटाई की और जबरदस्ती तीन बार जय श्री राम बुलवाया।
पुलिस के मुताबिक, शुरुआती जाँच में पता चला है कि घटना को अनावश्यक रूप से सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। सबूत बताते हैं कि इस्माइल के साथ हाथापाई निजी दुश्मनी की वजह से हुई थी। इमरान को बचाने वाले चश्मदीद (गणेश) ने भी यही बात कही है। गणेश ने कहा है कि इमरान झूठ बोल रहा है कि जय श्री राम नहीं बोलने पर उसके साथ मारपीट की गई।
जानकारी के मुताबिक, इमरान को होटल से घर जाने के दौरान आठ से दस लोगों ने हुडको कॉर्नर इलाके में रोका था। उनमें से एक ने इमरान की मोटरसाइकिल की चाबी ली और पूछा कि वह कहाँ रहता है। इमरान का कहना है कि उन लोगों ने उसे जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया। जब इमरान ने जय श्री राम बोलने से मना किया तो कथित रूप से उसे डराया और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई। इमरान का कहना है कि परेशान होकर उसने उनके सामने 3 बार जय श्री राम के नारे लगाए।
इमरान ने दावा किया है कि इसके बावजूद उनलोगों ने उसे पीटा। इस बीच, शोर-गुल सुनकर पास में रहने वाले गणेश और उनकी पत्नी बाहर आए और इमरान को बचाया। इसके बाद, इमरान बेगमपुरा पुलिस स्टेशन गया और शिकायत दर्ज कराई।
So again this news turn out to be fake?♂️
मिडिया रिपोर्ट के अनुसार, जब पुलिस ने गवाहों[गणेश](जिसने इसे बचाया है एसा इमरान का कहना है) के बयान लिया तो पता चला की उनकी आपसी दुश्मनी के चलते उनमे झगड़ा हुआ और मार पीट! और जैसा वो बता रहा है जय श्री राम के लिए मारा;ऐसा कुछ नही हुआ था! https://t.co/CkfT6tsejWpic.twitter.com/eGPnq4LovH
पुलिस आयुक्त चिरंजीव प्रसाद ने बताया कि कुछ लोग इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि जो सबूत सामने आए हैं, वो इस तरफ इशारा नहीं कर रहे। गणेश ने बताया कि मारपीट आपसी दुश्मनी की वजह से हुई थी।
वहीं, जब ऑपइंडिया ने औरंगाबाद पुलिस से इस मामले पर संपर्क किया, तो उन्होंने कहा कि जाँच जारी है और चश्मदीदों द्वारा किए गए दावों के मद्देनजर, स्पष्ट तौर पर इस बात का दावा नहीं किया जा सकता है कि इमरान को आरोपितों ने जय श्री राम न बोलने के लिए मजबूर किया गया था।
गौरतलब है कि इससे पहले भी उन्नाव में ऐसा ही मामला सामने आया था। यहाँ मुस्लिम छात्रों के बीच क्रिकेट को लेकर मारपीट हुई थी, लेकिन शहर के काजी निसार अहमद मिस्बाही ने आरोप लगाते हुए कहा था कि मदरसे के बच्चों से जबरदस्ती जय श्री राम के नारे लगवाए जा रहे थे और इसका विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई है। निसार अहमद ने इस मारपीट को मॉब लिंचिंग से जोड़ने की भी कोशिश की थी।
हालाँकि, ADG (कानून-व्यस्था) ने इस घटना को लेकर बताया था कि जाँच में पता चला है कि मदरसे के बच्चों से धार्मिक नारे नहीं लगवाए गए थे। ऐसे झूठे आरोप लगाकर मेरठ और आगरा में भी शांति भंग करने का प्रयास किया गया, लेकिन जिला और पुलिस प्रशासन के चलते यह नाकाम हो गया। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि उन्नाव में क्रिकेट खेलने के चलते विवाद हुआ था। और क्रिकेट की वजह से ही छात्रों के बीच झगड़ा हुआ।
अगले महीने से शुरू हो रहे वेस्ट इंडीज़ दौरे के लिए भारतीय क्रिकेट टीम में महेंद्र सिंह धोनी के चयन को लेकर काफी चर्चा हो चुकी है। कुछ लोग कहते हैं कि धोनी का बेहतरीन दौर उनके पीछे है और उन्हें समय रहते संन्यास ले लेना चाहिए। उनका तर्क है कि धोनी अब पहले की तरह मैच-जिताऊ खेल नहीं खेलते जिससे उनकी उपयोगिता कम होती जा रही है।
वर्ल्ड कप के शुरुआत से लोग यह भी सोच रहे थे कि धोनी इसके बाद क्रिकेट को अलविदा कह सकते है। वर्ल्ड कप ख़त्म हो चुका है और अगस्त के दौरे के लिए टीम चुनी जा रही है। इसी बीच खबर आई है कि धोनी ने चयनकर्ताओं को कहा है कि वो इस दौरे के लिए उपलब्ध नहीं हो पाएँगे क्योंकि उन्हें आने वाले दो महीने अपने आर्मी रेजिमेंट के साथ बिताने हैं।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, BCCI के एक सूत्र ने बताया है कि धोनी की अभी संन्यास लेने की कोई इच्छा नहीं है और उनके इस दौरे के लिए अनुपलब्ध रहने की बात मुख्य चयनकर्ता और कप्तान विराट कोहली को बता दी गई है।
दिल्ली पुलिस ने देश की राजधानी में चल रहे एक ऐसे ड्रग्स रैकेट का खुलासा किया है जिसके तार तालिबान से जुड़े हैं। स्पेशल सेल ने शुक्रवार (19 जुलाई 2019) को 150 किलो हेरोइन बरामद कर जाकिर नगर में चल रही एक हेरोइन फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जब्त हेरोइन की क़ीमत 600 करोड़ रुपए बताई जा रही है।
पुलिस ने 2 अफ़गानी रसायन विशेषज्ञों समेत 5 लोगों को गिरफ़्तार किया है। यह दिल्ली में जब्त की गई ड्रग्स की अब तक की सबसे बड़ी खेप है। स्पेशल सेल का कहना है कि यह रैकेट देश में अब तक 5000 करोड़ रुपए की हेरोइन ला चुका है।
Delhi Police: Special Cell arrested five persons including two Afghan chemical experts and seized around 150 kgs of Afghan origin heroin worth about Rs 600 crores in international market.
अफगानिस्तान से हेरोइन की तस्करी बेहद दिलचस्प तरीके से की जा रही थी। जूट की बोरियों को अफगानिस्तान में लिक्विड हेरोइन में भीगो दिया जाता था। सूखने के बाद बोरियों में मसाले भरकर दिल्ली भेजा जाता था। इसके बाद बोरियों को तस्कर दिल्ली के जाकिर नगर स्थित फैक्ट्री में ले जाकर कई तरह के केमिकल में भिगोते थे। फिर गीली बोरियों को सुखाकर इनके रेसों में चिपटी हेरोइन को खास तकनीक से पाउडर में बदला जाता था। इसके बाद बोरियों को जला दिया जाता था।
जूट की एक बोरी से कम से कम एक किलो हेरोइन निकलती थी। ख़बर के अनुसार, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 120 दिनों के लंबे अभियान के बाद यह सफलता हासिल की है। इस रैकेट में अफ़ग़ानिस्तान तालिबान का नेता और उसका पाकिस्तानी साथी भी शामिल है। लंबे ऑपरेशन के बाद दिल्ली पुलिस ने छह कारों में भरी लगभग 150 किलो हेरोइन ज़ब्त करने में सफल रही। सभी कारें दिल्ली और अमृतसर के आसपास विभिन्न मार्गों पर खड़ी थी। दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के डीसीपी मनीष चंद्रा ने न्यूज 18 को बताया कि विशेष रूप से तैयार हेरोइन के घोल में जूट के रेशों को तस्कर भिगो देते थे।
ख़बर के अनुसार, हेरोइन को अफ़गानिस्तान से पाकिस्तान के रास्ते होते हुए दिल्ली लाया जाता था। पुलिस ने बताया कि पाकिस्तान-अफगानिस्तान के ड्रग तस्करों का यह सिंडिकेट ड्रग्स में डूबे जूट के धागों को जलालाबाद से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भेजता था। इसके बाद उसकी बोरियाँ बना दी जाती थीं। इसके बाद मसाले और अन्य सामान भरकर बोरियाँ दिल्ली में रह रहे कश्मीर के मसाला कारोबारियों तक पहुँचा दी जाती थीं। दिल्ली में बोरियाँ खाली की जातीं और स्मग्लर उन्हें अपने साथ ले जाते। इसके बाद जाकिर नगर की फैक्ट्री में बोरियों से हेरोइन अलग किया जाता था।
गिरफ़्तार किए गए आरोपितों में अफ़गानिस्तान से शिनवारी रहमत गुल और अख़्तर मोहम्मद शिनवारी है। भारतीय नागरिकों में बटला हाउस से वेकिल अहमद, फरीदाबाद का धीरज और दिल्ली के महारानी बाग का रईस खान शामिल है।
स्पेशल सेल के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ड्रग्स के गोरखधंधे से जुड़े लोगों की धर-पकड़ के लिए स्पेशल सेल की एक टीम काम कर रही थी। उन्होंने बताया कि हेरोइन फैक्ट्री से जुड़े 5 लोगों को हिरासत में लिया गया है, जिनमें 2 अफ़गानिस्तान मूल के हैं। आरोपितों के क़ब्जे से टोयटा, कैमी, होंडा सिविक, कोरोल जैसी लग्ज़री गाड़ियाँ भी बरामद की गई हैं।
महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष यशमति ठाकुर शुक्रवार (19 जुलाई 2019) को सेंट जॉर्ज अस्पताल पहुँची, जहाँ उन्होंने अपनी दबंग छवि का खुला प्रदर्शन किया। दरअसल, वहाँ कॉन्ग्रेस विधायक श्रीमंत पाटिल का इलाज चल रहा है, उन्हीं से मिलने वो वहाँ पहुँची थी। इस दौरान वो वहाँ पुलिस से भिड़ गईं और उनसे काफ़ी कहासुनी हो गई।
इस घटना का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वो काफ़ी तल्ख़ अंदाज़ में दिख रही हैं। इस वीडियो में वो पुलिस व डॉक्टर्स के साथ अपशब्द बोलती साफ़ नज़र आ रही हैं। अस्पताल की शांति को तार-तार करते हुए उन्होंने कई पुलिसकर्मियों के साथ ऊँची आवाज़ में बात तो की ही साथ वहाँ मौजूद महिला पुलिसकर्मियों को भी खरी-खोटी सुनाई। वायरल हुए इस वीडियो में महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष यशोमति ठाकुर एक सवाल करती दिख रही हैं कि अस्पताल में कॉर्डियक यूनिट नहीं है तो हृदय की बीमारी का इलाज कैसे किया जा रहा है?
#WATCH Mumbai:Altercation b/w Maharashtra Congress Working Pres Yashomati Thakur&police at St George’s Hospital where she tried to meet K’taka Congress MLA Shrimant Patil. She asks hospital admn ‘how’s he being treated for cardiac ailment when hospital doesn’t have cardiac unit? pic.twitter.com/qMCNRleRgM
यशोमति ठाकुर ने महिला पुलिसकर्मियों को लगभग लताड़ते हुए उन्हें छूने तक से मना कर दिया और कहा कि कोई उनसे बहस ना करे। माहौल बिगड़ता देख पुलिसकर्मियों ने जब उन्हें वहाँ से जाने के लिए कहा तो उन्होंने कहा, “नहीं जाऊँगी तो…।” यशोमती ने आरोप लगाते हुए यहाँ तक कह डाला, “वर्दी में आप लोग मदद कर रहे हो उन्हें पैसे खाने के लिए।”
ख़बर के अनुसार, कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया था कि उसके विधायक श्रीमंत पाटिल को गठबंधन सरकार गिराने की कोशिश के तहत अगवा कर लिया गया था। इस संदर्भ में बैंगलूरू पुलिस स्टेशन में शिक़ायत भी दर्ज कराई गई थी। कॉन्ग्रेस के अनुसार, पार्टी विधायकों के एक साथ रिजॉर्ट में होने के बाद श्रीमंत पाटिल अचानक ग़ायब हो गए थे। इसके बाद उनसे कोई सम्पर्क नहीं साध पाया था।
यह मामला उस वक़्त सामने आया जब विधानसभा में मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा हो रही थी और वरिष्ठ नेता डीके शिवकुमार ने आरोप लगाते हुए बताया कि पाटिल को अगवा करके मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इसके अलावा श्रीमंत पाटिल का एक फोटो भी सामने आया है जिसमें वो एक अस्पताल में लेटे और ईसीजी से जुड़ी जाँच कराते दिख रहे थे।
विधानसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए शिवकुमार ने कहा, “मैं हाथ जोड़ कर अध्यक्ष से अपील करता हूँ कि मेरे पार्टी के विधायकों को अगवा किया गया है। मुझे परिजन का कॉल आया था। महोदय मैं चाहता हूँ कि आप उन्हें वापस लाएँ। हम पुलिस संरक्षण चाहते हैं।”
भू-माफिया घोषित किए गए सपा सांसद आजम खान ने फिर से विवादित बयान दिया है। उत्तर प्रदेश के रामपुर से सांसद आजम खान ने कहा है कि मुस्लिम देश के बँटवारे के वक्त पाकिस्तान न जाने की सजा भुगत रहे हैं। 1947 के बाद से ही मुस्लिम मॉब लिंचिंग का शिकार हो रहे हैं। अगर उस समय मुस्लिम पाकिस्तान चले गए होते तो उन्हें ये सजा नहीं मिलती। मुस्लिम यहाँ हैं, तो सजा तो भुगतेंगे ही।
Azam Khan,Rampur MP on mob lynching incidents:It’s the punishment Muslims are getting after 1947.Muslims will face it whatever may it be.Why didn’t our ancestors go to Pakistan?Ask this to Maulana Azad,Jawaharlal Nehru, Sardar Patel&Bapu.They had made promises to Muslims. (19.07) pic.twitter.com/RoRWpm8JqV
आजम खान का कहना है कि उनके पूर्वजों ने भारत को अपना वतन माना और अब उन्हें इसकी सजा भुगतनी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि उनके पूर्वज पाकिस्तान क्यों नहींं गए, यह बात मौलाना आजाद, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और बापू से पूछना चाहिए। उन्होंने मुस्लिमों से सुरक्षा का वादा किया था। आजम खान का कहना है कि मुस्लिम बँटवारे के हिस्सेदार नहीं थे, लेकिन फिर भी उन्हें बँटवारे की सजा मिल रही है।
गौरतलब है कि, उत्तर प्रदेश सरकार ने शुक्रवार (जुलाई 19, 2019) को आजम खान को भू-माफिया की लिस्ट में शामिल किया था। उन पर जमीन कब्जाने के करीब 23 मामले दर्ज हैं। जौहर विश्वविद्यालय के लिए किसानों की जमीन कब्जाने के आरोप में उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है।
Ajay Pal Sharma,SP Rampur: Till date 23 FIRs have been registered against SP MP Azam Khan in connection with land encroachment. As per the complaints filed by farmers police officials used to threaten them &grab the land illegally.A team has been formed to investigate the matter. pic.twitter.com/IRWHu1aBU6
जिलाधिकारी आन्जनेय कुमार सिंह के मुताबिक भू-माफिया उन्हें घोषित किया जाता है जो दंबगई से जमीनों पर कब्जा करने के आदी हों, जो अवैध कब्जा छोड़ने के लिए तैयार न हों और जिनके नाम अवैध तरीके से जमीन हथियाने संबंधी मामले के मद्देनजर पुलिस केस में दर्ज हो। ऐसे लोगों का नाम उत्तर प्रदेश एंटी भू-माफिया पोर्टल पर दर्ज कराया जाता है और सरकार इनकी निगरानी करती है। भू-माफियाओं की पहचान इस पोर्टल की शुरुआत 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने की थी।