राजस्थान विधानसभा में आज बसपा के एक विधायक ने बसपा सुप्रीमो मायावती को लेकर लोगों की वर्षों पुरानी शंका का समाधान कर दिया। बीएसपी के विधायक राजेंद्र गुढ़ा ने बेहद सरल और स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि उनकी पार्टी में टिकट पैसा देने पर मिलता है।
#WATCH BSP MLA, Rajendra Gudha in Rajasthan Assembly, “Humari party Bahujan Samaj Party mein paise lekar ticket diya jata hai..koi aur zada paise de deta hai toh pehle ka ticket kat kar dusre ko mil jata hai, teesra koi zada paise de deta hai toh un dono ka ticket kat jata hai.” pic.twitter.com/ZMNbF5c9R6
राजेंद्र गुढ़ा ने राजस्थान विधानसभा में कहा, “हमारी पार्टी में पैसे लेकर टिकट दिया जाता है। टिकट की खरीद-फरोख्त में जो शख्स सबसे ज्यादा पैसे देता है, उसे टिकट दे दिया जाता है और यह सिलसिला उस शख्स पर जाकर ठहर जाता है जो सबसे ज्यादा रकम अदा करता है।” गुढ़ा ने कहा कि एक तरह से आप कह सकते हैं कि टिकटों के लिए बोली लगती है, जो शख्स सबसे बड़ी बोली लगाता है वो टिकट का स्वभाविक हकदार बन जाता है।
‘पैसे लेकर टिकट दिए जाने की समस्या का समाधान’ विषयक एक सेमिनार में राजेन्द्र ने कहा, “बीएसपी में पैसे लेकर टिकट दिया जाता है। कोई ज्यादा पैसे देता है तो पहले का टिकट काटकर दूसरे को दे दिया जाता है। कोई तीसरा उससे भी ज्यादा पैसे दे देता है तो दोनों का टिकट कट जाता है।”
राजेंद्र कहते हैं कि अगर आप पहले की चुनावी प्रक्रिया को देखें तो टिकट हासिल करने का पैमाना किसी उम्मीदवार की काबिलियत पर निर्भर करता था कि वो अपने इलाके को कितना जानता है। लोगों के बीच उसकी लोकप्रियता कितनी है। लेकिन समय बदलने के साथ राजनीति के स्तर में गिरावट आई है। इसके लिए आप उन लोगों को जिम्मेदार मान सकते हैं जो धनबल के जरिए टिकट हासिल करने की जुगत में होते हैं।
बीएसपी नेता राजेंद्र ने कहा कि पैसे से चुनाव प्रभावित हो रहे हैं। गरीब आदमी चुनाव नहीं लड़ सकता। पार्टियों में टिकट के लिए पैसे का लेन-देन होता है, हमारी पार्टी में भी होता है। इन बातों के बीच विधानसभा में मौजूद उप नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने कहा इस पर तो मायावती ही स्पष्ट जवाब दे सकती हैं।
बसपा के राजस्थान में 6 विधायक हैं। गुढ़ा राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत नजदीकी भी माने जाते हैं। गहलोत की कई मौकों पर वे प्रशंसा भी कर चुके हैं।
स्वराज्य पोर्टल पर आज एक खबर छपी है जहाँ उन्होंने यह बताया है कि 2018 से अब तक बीस लोगों की हत्याएँ हुई हैं गौतस्करों और बीफ माफिया द्वारा। इनमें किसान हैं, पुलिस वाले हैं, साधु हैं। ये इक्का-दुक्का हुआ हो, ऐसा भी नहीं। साल भर में अगर बीस लोग मरे हों, और मारने वालों के नाम मोनू खान, अमजद, इश्तियाक, मुनव्वर, रामनिवास, वाहिद, इम्तियाज, अब्दुल जब्बार, नूर अली, जफरुद्दीन, सलमान, नदीम, शहजाद, नदीम, जब्बार, नजीम, जीशान, मुमताज हों, तो आपको हवा भी नहीं लगती।
ऐसा क्यों होता है? क्योंकि ऐसे में एक बहुप्रचलित लिबरल आउटरेज फ्लो चार्ट काम में आता है। आउटरेज के लिए कीबोर्ड क्रांतिकारी तैयार बैठे रहते हैं, लेकिन उनके कुछ कंडीशन्स होते हैं। मरने वाला अगर हिन्दू है, तो वो खोजते हैं कि दलित है या नहीं। अगर दलित है, और मारने वाला भी दलित या विशेष मजहब से है, तो उसकी चर्चा बेकार है। उस दलित की हत्या का कोई मतलब नहीं। अगर दलित को किसी हिन्दू ने मारा, जो तथाकथित सवर्ण जाति से ताल्लुक रखता है तो, चाहे वो विवाद आपसी हो, उसमें फर्जी का नैरेटिव घुसाया जाता है कि हत्या में जातिवादी भेदभाव है।
फोटो साभार: cyber bully
वैसे ही, हत्या का शिकार समुदाय विशेष का है, और मारने वाले भी उसी मजहब से हैं, तो वो खबर नहीं बनती। हाँ, भले ही वो चोर हो, दंगाई हो, लेकिन अगर किसी हिन्दू नाम वाले ने उसकी हत्या की है तो उस एक आदमी के अपराध का बोझ पूरे हिन्दू धर्म के सर आ जाता है। कठुआ वाला केस सबको याद है, गाजियाबाद से लेकर, अलीगढ़ या कोई और भी नाम ले लीजिए, कोई मौलवी किसी बच्ची का बलात्कार करता मिल जाएगा, लेकिन उन मामलों में भारत की बेटी और इस्लाम शर्मिंदा नहीं होते।
ये जो बीस लोग मरे हैं उसमें एक किसान अकबर अली भी है, उसकी हत्या कई चोरों ने मिल कर की, जिसमें से अधिकतर भागने में सफल रहे, पर नूर अली पकड़ लिया गया। लेकिन अकबर अली पहलू खान नहीं बन पाया क्योंकि उसका हत्यारा नूर अली था जो कि सुनने में लगता है कि मजहब विशेष से है। तो, लिबरल आउटरेज चार्ट के अनुसार इन बीस हत्याओं में एक भी ऐसी हत्या नहीं थी जिस पर लिबरलों का हो-हल्ला हो सके।
नैरेटिव की ताकत
लेकिन आपको यह सब नहीं बताया जाता है। फर्जी के आँकड़े इकट्ठा करने वाली वेबसाइट से हेटक्राइम का डेटा उठाया जाता है, जिसमें सुविधानुसार हिन्दुओं की हत्याओं को छोड़ दिया जाता है, और समुदाय विशेष की सामाजिक अपराध के कारण हुई हत्याओं को भी मजहबी बता कर दिखाया जाता है। उसके बाद चिट्ठी-पत्री तो चलती ही है, सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया तक इतना जबरदस्त इंतजाम होता है कि देश का प्रधानमंत्री झुक जाता है फेक नैरेटिव के आगे और उसे जवाब देना पड़ता है।
लेकिन देश का प्रधानमंत्री गोपाल, नरेश, देवीलाल, नवल सिंह, रामकिशन, सुहागिन, गोलू, निशा, मोनी, मोलू, समा देवी, जोगेन्द्र समेत पुलिसकर्मी प्रकाश मेशराम, संजीव गुर्जर, मनोज मिश्रा, विपिन और सुमेर के साथ तीन साधुओं की मौत पर नहीं झुकता। देश का प्रधानमंत्री सोशल मीडिया के इस फेक नैरेटिव के प्रेशर में गौरक्षकों पर तो बोलता है, लेकिन उन्हीं गौरक्षकों की गौतस्करों द्वारा की गई हत्याओं पर नहीं बोलता।
ये है नैरेटिव की ताकत। यहाँ पर मात खाता है तथाकथित दक्षिणपंथी। क्या ये पैटर्न नहीं है? क्या गायों को चुरा कर काटने वाले, लगातार किसानों से लेकर पुलिस वालों को नहीं मार रहे? जब एक तबरेज की हत्या को ऐसे दिखाया जाता है कि हर हिन्दू दूसरे समुदाय के हर आदमी को घेर कर मारने को उतारू है तो इतनी हत्याओं के बाद भी इस पर बात कैसे नहीं होती?
लिंचिंग के लिए कानून बनाने की माँग उठती है, जब 49 तथाकथित सेलिब्रिटी लिखते हैं तब इधर के 61 की नींद खुलती है। ये तो प्रतिक्रिया है, क्योंकि आप तब जगे, जब सामने वाले ने कुछ किया। जबकि होना तो यह चाहिए कि प्रधानमंत्री से लेकर, सारे जवाबदेह नेताओं को हर ऐसी घटना पर पूछना चाहिए कि आखिर देश में गाय पालने वाला किसान बीफ माफिया से सुरक्षित क्यों नहीं है? आखिर बार-बार एक ही तरह की घटना क्यों हो रही है? आखिर क्या बात है कि मरने वाले लगभग हर बार हिन्दू होते हैं, और मारने वाले लगभग हर बार दूसरे खास मजहब के?
गौरक्षक अगर एक-दो बार कानून हाथ में ले कर गौतस्करों को पीट देता है तब खूब बवाल होता है लेकिन वही गौरक्षक गोपाल, गौतस्करों का पीछा करते हुए, उसे रोकने की कोशिश करता है, तो उसे गोली मारने वाला बीफ माफिया चर्चा से ही गायब हो जाता है। कितने लोग जानते हैं कि बीफ माफिया है भी इस देश में? लगातार एक ही तरह की घटनाएँ होती जा रही हैं, और हमें पता तक नहीं चलता।
इसके उलट, एक कथित चोर भीड़ से पिटता है, और चार दिन बाद कहीं मरता है, तो उस पर चर्चा होती है। जब चर्चा होती है तो दो खेमे बँट जाते हैं, जिसमें एक उसे लिंचिंग कहते हुए दोष हिन्दुओं पर डालता है, और दूसरा, ये कहने में व्यस्त हो जाता है कि ऐसा कहने वाले झूठ बोल रहे हैं। तबरेज ट्रेंड करने लगता है, हर आदमी उसकी बात करने लगता है। जबकि तबरेज कौन था? तबरेज कथित तौर पर चोरी करने आया हुआ एक लड़का था। आप देख लीजिए नैरेटिव की ताकत।
लेकिन गोपाल के केस में क्या हुआ? आपको पता भी नहीं है कि गोपाल कौन है। गोपाल तीन छोटी बच्चियों का पिता था। वो गायों को बचा रहा था, वही गाय जो हमारे और आपके लिए पूज्या है। वही गाय जिसे काटना असंवैधानिक और गैरकानूनी है। वही गाय जिस पर खूब बहस हुई है। वही गाय जो हिन्दुओं का प्रतीक है। हमारे और आपके आस्था के प्रतीक को बचाने के लिए एक हिन्दू अपनी जान दे देता है, लेकिन हम उसे अखलाख या तबरेज नहीं बना पाते।
अगर यही चलता रहा तो गोपाल को भी लोग भूल जाएँगे जैसे उन साधुओं को भूल गए जिन्हें सलमान, नदीम, शाहजाद, जब्बार और नजीम ने इसलिए हाथ और पाँव बाँध कर, गर्दन और शरीर पर लगातार छुरा भोंक कर मार दिया था क्योंकि उन्होंने पुलिस को गौतस्करी और गाय काटने वाले इन लोगों के बारे में सूचना दी थी। साधु तो अपना काम कर रहे थे। वो मार दिए गए। लेकिन हमें उनका नाम भी पता नहीं। हमें इस घटना की भी जानकारी नहीं।
हमने अपना काम नहीं किया
पुलिस तो अपना काम करेगी, लेकिन हमने अपना काम नहीं किया। हमने अपनी एकता कहाँ दिखाई किसी को! हमने इन धर्मरक्षकों को श्रद्धांजलि भी तो नहीं दी! वो तीन साधु जिस स्थिति में खाट से बँधे मिले, हर हिन्दू के भीतर रोष होना चाहिए, क्रोध आना चाहिए कि हमने अपने स्तर से कुछ नहीं किया। जबकि हमें, हर ऐसी खबर पर, अपने स्तर से लगातार लिखना और बोलना चाहिए।
अगर हम चुप रहेंगे तो हम ही पीड़ित भी होंगे, और हमें ही अपराधी भी बना दिया जाएगा। आप आस-पास देखिए कि माहौल क्या है। सौ करोड़ की हिन्दू आबादी वाले देश में जोमैटो ज्ञान देता है कि भोजन का कोई रिलीजन नहीं है लेकिन जब उससे यह सवाल किया जाता है कि एक ‘शांतिप्रिय’ को ‘हलाल किया मुर्गा’ क्यो नहीं मिला तो वो बताता है कि इस खराब अनुभव के लिए उन्हें खेद है। उस लड़के को रिलीजन पर ज्ञान देने की जगह जोमैटो यह भी कह सकता था कि डिलीवरी करने वाले कर्मचारी को उसके मजहब या धर्म के आधार पर बदलना कंपनी की नीतियों के खिलाफ है।
लेकिन जोमैटो ज्ञान देना चुनता है क्योंकि वो जानता है कि वो हिन्दुओं को ज्ञान दे कर मीडिया से ‘एपिक रिप्लाय’ और ‘किलर रिप्लाय’ वाले आर्टिकल लिखवा कर फ्री की पब्लिसिटी पा जाएगा। ऐसा ज्ञान वो मेनू में सूअर के मांस पर आपत्ति जताने वाले उपभोक्ता को नहीं दो सकता क्योंकि उसे पता है कि ऐसा ज्ञान किस रूप में बह जाता है।
याद होगा कि हनुमान के स्टिकर को देख कर ऊबर पर चढ़ने से एक लड़की ने इनकार कर दिया था और कहा था कि हनुमान की वह छवि मिलिटेंट हिन्दुवाद का परिचायक है! फिर लिबरलों को सामूहिक रूप से चरमसुख प्राप्त होने लगा था और वो इसी ऑर्गेज्मिक मोड में कई दिन रहे। तब ऊबर ने नहीं कहा था कि वो किसी ड्राइवर की कार पर लगे आस्था के चिह्नों का सम्मान करते हैं। तब इन दोमुँहे एक्टिविस्टों और चरमसुखवादियों ने ऐलान किया था कि वो ऐसी गाड़ियों पर नहीं चढ़ेंगे।
आवाज लगाना, आवाज उठाना, आवाज सुनाना सीखो
तब ऊबर चुप था, लेकिन जहाँ बात एक हिन्दू द्वारा की गई मूर्खतापूर्ण हरकत पर आई, ऊबर ईट्स (जो कि ऊबर की ही ईकाई है) ने यह ऐलान किया कि जोमैटो, हम तुम्हारे साथ हैं। आप जोमैटो का इस्तेमाल करें या न करें, ये आपकी मर्जी है लेकिन ऐसे दोगलेपन पर भी आप चुप रहते हैं, अपने स्तर से कुछ नहीं करते तो फिर क्यों न एमेजॉन पर भगवान गणेश की तस्वीर वाले फ्लोर मैट बिकेंगे?
कैराना में सपा का विधायक कहता है कि हिन्दुओं की दुकानों से सामान मत खरीदो, थोड़ी दूर जा करखास सम्प्रदाय की दुकानों से खरीदो, ये लोग खुद ही चले जाएँगे जब नुकसान होगा। तब हमने क्या किया? हमें तो याद भी नहीं है कि किसी ने ऐसा किया। वो भी उस कैराना में जहाँ से हिन्दुओं को भगा दिया गया है। मेरठ में भी हिन्दुओं की बहू-बेटियों को छेड़ा जाता रहा ताकि वो स्वयं ही ग्लानि से, अपनी इज्जत बचाने के लिए कहीं और चले जाएँ। हमने उस मामले में क्या किया?
सौ करोड़ की आबादी, भाजपा समर्थित राजग के 45% वोट शेयर में आखिर किसके वोटर कार्ड हैं? फिर सवाल कौन पूछेगा इन हुक्मरानों से जिन्हें हमने इतनी भारी संख्या में वोट दे कर जिताया और आलम यह है कि योगी आदित्यनाथ के राज्य में, जहाँ तीन चौथाई विधायक भाजपा के हैं, हिन्दुओं को अपने घरों पर लिखना पड़ रहा है कि यह मकान बिकाऊ है!
अपने वोट की कीमत पहचानो। अपनी इज्जत की रक्षा करो। अपने धर्म को धर्म समझो और उसकी रक्षा में कम से कम जो कर सकते हो वो करो। लिख सकते हो तो लिखो, बोल सकते हो तो बोलो, किसी का बहिष्कार कर सकते हो तो करो। क्योंकि सत्ता में सरकार बिठाने मात्र से धर्म सुरक्षित नहीं हो जाता। सरकार चुन लेने से विचारधारा या राष्ट्रवाद सुरक्षित नहीं हो जाता। सरकारों को लगातार याद दिलाना होता है कि उन्हें हमने चुना है, और उन्हें ही हमारा काम भी करना होगा। अगली बार हटाने का विकल्प मत रखिए, सीखिए लम्पट लेनिनवंशी माओनंदन कामपंथी वामभक्तों से कि एक सुर में सियारों की तरह ‘हुआँ-हुआँ’ करने से भी छप्पन इंच की छाती वाले शेर को जवाब देना पड़ जाता है।
आपने अपने शेर को पिछली बार कब आवाज थी? एग्जेक्टली!
जोमैटो के तथाकथित मूल्य कितने खोखले हैं, अलग-अलग समुदाय के ग्राहकों की शिकायतों पर उसकी प्रतिक्रिया में कितना विरोधाभास है, यह एक बार फिर सामने आ गया है। ‘खाने का कोई मजहब नहीं होता’ का प्रचार दॉंव उलटा पड़ने के बाद उसने कथित तौर पर एक ग्राहक से हिन्दू डिलीवरी ब्वॉय भेजने का वादा किया।
फेसबुक पर पोस्ट करते हुए एक व्यक्ति ने दावा किया है कि जोमैटो के कस्टमर केयर ने ऑर्डर किए जाने पर हिन्दू डिलीवरी बवॉय भेजने का वादा किया। दावे के समर्थन में इस व्यक्ति ने स्क्रीनशॉट और मोबाइल के स्क्रीन का वीडियो भी पोस्ट किया है।
स्क्रीनशॉट में जोमैटो का कस्टमर केयर ग्राहक से बार-बार माफी मॉंगता नजर आ रहा है। इस स्क्रीनशॉट की सत्यता की पुष्टि के लिए हमने जोमैटो के कार्यालय से कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
गौरतलब है कि जोमैटो के एक ग्राहक ने खाने की डिलीवरी लेने से मना कर दिया था, क्योंकि खाना पहुँचाने वाला मुस्लिम था और श्रावण के महीने में वह गैर-हिन्दू के हाथ से खाना स्वीकार नहीं करना चाहता था। इस पर जवाब देते हुए जोमैटो ने कहा था कि खाने का कोई मज़हब नहीं होता, बल्कि खाना अपने आप में मज़हब होता है।
ऑनलाइन फूड कंपनी जोमैटो (Zomato) विवाद पर अब मध्य प्रदेश पुलिस ने जबलपुर के रहने वाले युवक को नोटिस भेजने का फैसला लिया है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब बुधवार (जुलाई 31, 2019) को जोमैटो पर खाना ऑर्डर करने के बाद मुस्लिम डिलिवरी ब्वॉय की वजह से अमित शुक्ला नामक एक युवक ने खाना कैंसिल कर दिया था। इसके बाद ट्विटर पर ट्वीट भी किया, जिसके बाद काफी विवाद हुआ।
जबलपुर के एसपी अमित सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पंडित अमित शुक्ला को नोटिस भेजा जाएगा। साथ ही, उससे बॉन्ड भी साइन कराया जाएगा। इसके अलावा पुलिस अगले 6 महीने तक उसकी गतिविधियों पर नजर रखेगी। अगर वह ऐसी हरकत दोहराता है तो उसे हिरासत में भी लिया जाएगा।
Jabalpur-based Pt Amit Shukla, who cancelled his food order over religion is in trouble as the state police have decided to serve a notice under Section 106/117 of CrPC, a provision that will require him to sign a bond to keep peace. https://t.co/IytIB6g5yn
रिपोर्ट्स के अनुसार, एसपी का कहना है कि अमित शुक्ला का ट्वीट संविधान की भावना के खिलाफ है। वहीं, एप बेस्ड फूड डिलिवरी सर्विस जोमैटो ने भी शुक्ला की शिकायत पर जवाब देते हुए ट्वीट किया था कि खाने का कोई धर्म नहीं होता और खाना खुद एक धर्म है।
अमित शुक्ला ने मुस्लिम युवक द्वारा डिलीवरी किए जाने पर आपत्ति जताई थी, जिसके बाद जोमैटो ने युवक की बात सुनने के बजाए अपनी कम्पनी की शर्तों का हवाला दिया था। हालाँकि, सोशल मीडिया पर अमित शुक्ला की बात का समर्थन भी किया गया क्योंकि उसे अपने सर्विस प्रदाता से अपनी इच्छानुसार सर्विस का ऑर्डर देने का अधिकार था।
अमित शुक्ला ने मुस्लिम डिलिवरी ब्वॉय को देखकर ऑर्डर कैंसल कर दिया था। साथ ही, उन्होंने दूसरे राइडर से खाना भिजवाने की माँग की थी। हालाँकि, कंपनी ने इसके लिए इनकार कर दिया और रिफंड देने से भी मना कर दिया था। इसके बाद कस्टमर ने कानूनी कार्रवाई करने की धमकी भी दी थी।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कैबिनेट में शामिल सिद्दिकुल्लाह चौधरी ने एक साथ तीन तलाक को अपराध करार देने वाले कानून को इस्लाम पर हमला बताया है। उन्होंने इसे कबूल नहीं करने की बात कही है। चौधरी जमीयत उलेमा-ए-हिंद के पश्चिम बंगाल यूनिट के अध्यक्ष भी हैं।
उन्होंने कहा, “संसद से इस बिल का पास होना दुखद है। यह इस्लाम पर हमला है। हम तीन तलाक पर बने कानून को स्वीकार नहीं करेंगे।” उन्होंने कहा कि जमीयत की केंद्रीय कमिटी की बैठक के बाद हम आगे की कार्रवाई पर विचार करेंगे।
Siddiqullah Chowdhury, West Bengal Minister & President of Jamiat Ulema-e-Hind’s West Bengal Unit on #TripleTalaqBill: It is a matter of grief, it is an attack on Islam. We will no accept it. When there will be central committee meeting, we’ll decide on further course of action. pic.twitter.com/KctYffBJ5j
राज्यसभा ने मंगलवार को तीन तलाक को गैर कानूनी करार देने वाले विधेयक को मंजूरी दी थी। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बुधवार रात इस पर दस्तख्त कर दिए। इसके साथ ही यह कानून देश में लागू हो गया है।
मोटर व्हीकल (संशोधन) विधेयक 2019 बुधवार (31 जुलाई 2019) को राज्यसभा में पारित हो गया। इस बिल के पक्ष में 108 मत और 13 मत विपक्ष में पड़े। अब ट्रैफिक रूल्स तोड़ने की सज़ा भारी होगी। इस बिल में जुर्माने की रक़म बढ़ाकर 10 गुना कर दी गई है। ग़ौरतलब है कि पिछली लोकसभा में इस बिल को पास किया गया था, लेकिन लोकसभा भंग होने के बाद नई सरकार ने इसे कुछ अन्य संशोधनों के साथ पुराने स्वरूप में ही 17वीं लोकसभा में पेश करने फ़ैसला किया।
बिल पेश करते हुए केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने यह स्वीकार किया और कहा, “हमारे देश में हर साल 5 लाख दुर्घटनाएँ होती हैं, जिससे हर साल 1.5 लाख लोगों की मौत होती है। हम दुनिया में दुर्घटनाओं में पहले नंबर पर हैं, अब हमें इसे ठीक करने का मौक़ा मिला है।”
Union Road Transport Minister, Nitin Gadkari on the passing of Motor Vehicles (Amendment) Bill, 2019 in Rajya Sabha: 5 lakh accidents happen in our country causing 1.5 lakh deaths, every year. We are number one in accidents in the world, now we’ve got the chance to correct this. pic.twitter.com/BauLEtBx1K
मीडिया से मुख़ातिब होते हुए उन्होंने बताया कि देश में 22 लाख ड्राइवर्स की कमी है, इसके लिए हम ड्राइविंग सेंटर्स खोल रहे हैं। और इस तरह देश में अच्छे और प्रशिक्षित ड्राइवर आएँगे। ट्रांसपोर्ट में नई तकनीक लाई जा रही है और सभी सिस्टम को करप्शन फ्री कर रहे हैं। परिवहन मंत्री ने बताया कि राज्य सरकार को भी साथ लेकर काम करना है। इसके लिए कोई भी रेवन्यू केंद्र सरकार नहीं लेगी। उन्होंने मोटर व्हीकल (संशोधन) विधेयक 2019 के बारे में कहा कि यह न केवल एक मोटर व्हीकल एक्ट है, बल्कि यह एक सड़क सुरक्षा बिल है। उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि इससे दुर्घटनाओं में कमी आएगी। इस विधेयक का पारित होना उन लोगों के लिए एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने दुर्घटनाओं में अपनी जान गँवाई।”
मोटर व्हीकल संशोधन विधेयक में कई प्रावधान शामिल किए गए हैं। इसके अनुसार, हेलमेट न पहनने पर 100 रुपए के ज़ुर्माने को बढ़ाकर 1,000 रुपए कर दिया है। ओवर-स्पीडिंग के लिए पहले 500 रुपए का जुर्माना वसूला जाता था, लेकिन अब उसके लिए 5,000 रुपए देने पड़ेंगे। शराब पीकर गाड़ी चलाने के जुर्म में पहले 2,000 रुपए का ज़ुर्माना था जिसे बढ़ाकर 10,000 रुपए कर दिया गया है।
गाड़ी चलाते समय मोबाइल पर बात करना भी आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है। पहले ऐसा करते पकड़े जाने पर 1,000 रुपए का ज़ुर्माना लगता था, लेकिन अब इसके लिए 5,000 रुपए कर दिया गया है। सीटबेल्ट न लगाने पर जो चालान मात्र 100 रुपए का था वो अब 1,000 रुपए कर दिया गया है। आपातकालीन सेवाओं के लिए रास्ता नहीं देने पर 10,000 रुपए का प्रावधान किया गया है।
सरकारी बस में अगर कोई बिना टिकट यात्रा करते पकड़े गया तो अब धारा-178 के तहत 500 रुपए का ज़ुर्माना लगेगा जो कि पहले 200 रुपए था। वहीं, अगर कोई नाबालिग ड्राइविंग करते पकड़ा गया तो उसके लिए नाबालिग के माता-पिता या गाड़ी के मालिक को दोषी माना जाएगा। इसके लिए 25,000 रुपए का ज़ुर्माना और तीन साल की क़ैद भी हो सकती है।
फ़िलहाल, ड्राइविंग लाइसेंस 20 साल तक के लिए वैध होता है और अगर इस बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाएगी तो यह वैधता 10 साल तक कम हो जाएगी। सड़क हादसे में मारे गए लोगों की मुआवज़ा राशि 5 लाख और गंभीर रूप से घायलों की 2.5 लाख की गई है।
अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली की आप सरकार के पाँच साल केंद्र का हवाला देते-देते कब गुजर गए पता ही नहीं चला। चूँकि अब 2020 के विधानसभा चुनाव एक बार फिर से सिर पर हैं तब बड़े-बड़े वादों से जनता को लुभाने वाली आम आदमी पार्टी फिर से सक्रिय है। कभी दिल्ली मेट्रो में महिलाओं को फ्री राइड के ऑफर दिए जा रहे हैं तो कभी सीलिंग रुकवाने के नाम पर व्यापारियों से साँठ-गाँठ की जा रही है।
चुनावों में खुद के अस्त्तिव को बचाए रखने के लालच में आज केजरीवाल ने एक बार फिर दिल्लीवासियों को नया तोहफा दिया है। दरअसल, दिल्ली में सरकार ने प्रति महीना 200 यूनिट तक बिजली बिलकुल फ्री कर दी है। जिसका मतलब यदि दिल्ली वाले 200 यूनिट तक बिजली खपत करते हैं तो उन्हें बिजली बिल नहीं भरना होगा।
Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal: Those in Delhi, who consume up to 200 units of electricity, need not pay their electricity bills; they will get a zero electricity bill. Consumers of 201-400 units of electricity will receive approximately 50% subsidy. pic.twitter.com/j7cdmwH3Qz
केजरीवाल के इस नज़राने का फायदा दिल्ली वालों को आज से ही मिलना शुरू होगा। इसके अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने बताया है कि 201 से 400 यूनिट तक आधी सब्सिडी जनता को देनी होगी। यानी 3 रुपए यूनिट चार्ज के मुताबिक बिजली का बिल 0-200 यूनिट तक माफ़ होगा जबकि 4.50 रुपए यूनिट के अनुसार 201-400 यूनिट तक आधा बिल उपभोक्ता अदा करेंगे।
केजरीवाल की मानें तो दिल्ली के लोगों में बिजली बचाने और उसका चतुराई से इस्तेमाल करने हेतु उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए यह कदम उठाया गया है। उनका दावा है पूरे देश में दिल्ली सबसे सस्ती बिजली उपलब्ध कराती है। पता नहीं केजरीवाल को ऐसा क्यों लगता है कि अगर दिल्ली में लोगों को मुफ्त बिजली दी जाएगी तो वो उसका समझदारी से उपयोग करेंगे! जबकि वास्तविक हकीकत तो यह है कि जितनी मुफ्तखोरी की आदत दिल्ली वालों को पड़ रही है वो उतने ही लापारवाह और गैर-जिम्मेदार होते जा रहे हैं। एक बार को दिल्ली में अगर बिजली महंगी हो जाए तो जरूर दिल्ली के लोग उसका प्रयोग संभलकर करेंगे, लेकिन फ्री ऑफर सुनकर तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
खैर, आम आदमी पार्टी द्वारा किए गए कुछ कामों का उद्देश्य जानना और हवा में चलाए तीरों के पीछे का कारण जानना दोनों एक बराबर हैं। केजरीवाल के इस कदम पर भाजपा नेता हरीश खुराना ने उनसे एक आरटीआई शेयर करते हुए सवाल किया है। इस आरटीआई में बिजली कंपनियों को दी गई उन बढ़ती सब्सिडी का लेखा-जोखा है, जिनका पिछले 5 सालों में भुगतान किया गया है।
आप दम तो भर रहे हो की पाँच साल में आपने बिजली के दाम नहीं बढ़ने दिए तो यह भी बता दो यह जो सब्सिडी हर साल बढ़ा कर बिजली कम्पनी को दे रहे हो वो किसका पैसा है?
आरटीआई के आँकड़े दर्शाते हैं कि 2014-15 के बाद से लगातार बिजली कंपनियों को जाने वाली सब्सिडी में बढ़ोतरी हुई है। साथ ही हरीश खुराना द्वारा शेयर की गई दूसरी तस्वीर में हम देख सकते हैं कि बिजली कंपनियाँ लगातार हर साल हर कैटेगरी में फिक्सड चार्ज को बढ़ा रही हैं।
अब सवाल यह है कि ये पैसे दिल्ली सरकार कहाँ से देती है? जाहिर है प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ये पैसे हमसे ही लिए जाते हैं और आखिर में ‘फ्री’ शब्द की घोषणा के साथ हमें बरगला दिया जाता है। हम समझ ही नहीं पाते कि केजरीवाल जैसे लोग हमें किस स्कीम के तहत अंदर से खोखला कर रहे हैं। हम सिर्फ़ ‘फ्री’ सुनते हैं और उनके वादों, उनकी स्कीमों पर फ्लैट हो जाते हैं। हम मानकर चलते हैं ‘चलिए इतना नहीं तो कुछ तो देगा ही।’
लेकिन केजरीवाल और पार्टी द्वारा इस मुफ्तखोरी की सर्विस को आप ऐसे समझिए कि आज से 18-20 साल पहले जब कॉल की दरें 8-10-12 रुपए/मिनट हुआ करती थी, उस समय आईस्क्रीम या समोसा 2 रुपए में मिल जाते थे। लेकिन आज स्थिति उलटी है। कॉल की दरें 25 पैसे-50 पैसे से लेकर फ्री तक पहुँच गई है और समोसे-आइसक्रीम के रेट 10-15 रुपए हो गए हैं। पैसा हमारी जेब से दो अलग-अलग जगह उतना ही जा रहा है, लेकिन चूँकि कॉल दरों के रेट हमें फ्री कहकर बेची जा रही हैं और उनकी हमें रोज के हिसाब से जरूरत है, तो वो हमें सस्ती और अपने जेब के अनुकूल लग रही है। इसी प्रकार दिल्ली सरकार द्वारा ‘फ्री’ में दी गई सभी चीजों के पीछे यही सूत्र काम कर रहा है। रोज मिलने वाली चीज ‘फ्री’ और साल में जाने वाली चीज महंगी… कभी सोचा है कि जब हम आज कमा भी ज्यादा रहे हैं और हमें सीएम की कृपा से फ्री भी सब मिलने लगा है, तो आखिर हम फिर भी बचत क्यों नहीं कर पा रहे?
ऐसा इसलिए क्योंकि इस समय दिल्ली में बाजारवाद और केजरीवाल एक जैसे स्ट्रैटेजी के साथ लोगों की मनोस्थिति से खेल रहे हैं। इन ‘दोनों’ द्वारा दिए विकल्पों को न आज हम नकारने की स्थिति में है और न ही स्वीकारने की…
कौन नहीं चाहता कि बिना कुछ मेहनत किए उसे फ्री बिजली, पानी, वाई-फाई की सुविधा मिले? जवाब है- हर कोई चाहता है। हर किसी को चाहिए कि केजरीवाल चाहे समाज सुधार के नाम पर हमारे साथ कितने ही ऑड-ईवन प्रयोग करें, लेकिन आखिर में हमारी मूलभूत जरूरतों को निशाना बना कर, कुछ न कुछ छुनछुना थमा कर दिल्ली पर काबिज हो जाएँ।
इन पाँच सालों में मेट्रो से लेकर सड़कों पर लगी होर्डिंग्स तक में केजरीवाल सिर्फ़ इस बात का प्रचार करते रहे हैं कि वो अपनी ओर से दिल्ली को सुधारने की बहुत कोशिश कर रहे हैं लेकिन केंद्र ने उनके हाथों को बाँधा हुआ है। वो महिलाओं की सुरक्षा के लिए कदम उठाना चाहते हैं लेकिन दिल्ली पुलिस उनके अधीन नहीं है, वो बड़े-बड़े कॉलेज खुलवाना चाहते हैं लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं है।
2015 से अब तक हम देख चुके हैं कि केजरीवाल की कार्यशैली से उनकी अपनी पार्टी के सदस्य और कार्यकर्ता ही उनसे कितने नाराज हैं- अल्का लांबा, कपिल मिश्रा, कुमार विश्वास, योगेंद्र यादव वो नाम हैं जिनके बलबूते केजरीवाल को दिल्ली में ऐतिहासिक मत प्राप्त हुआ था, लेकिन सत्ता के लोभ ने न केवल जनता के बीच केजरीवाल की छवि को धूमिल किया बल्कि उनके अपने लोग ही उनसे अलग-थलग होते गए। अब सोशल मीडिया पर ये ‘बागी’ केजरीवाल के ख़िलाफ़ खुलकर बोलते हैं और उन्हें तानाशाह से लेकर हिटलर जैसी उपाधियाँ देते हैं।
2015 में फ्री वाई-फाई से लेकर गली-गली में सीसीटीवी लगाने का वादा करके दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने वाले केजरीवाल आज फिर से अपने झूठे वादों की राजनीति खेलकर 2020 फतह करना चाहते हैं लेकिन उनके पिछले वादों की जमीनी हकीकत क्या है, उस पर भी जरा ध्यान डाल लें:
दिल्ली को पूर्ण राज्य दिलाने के लिए केजरीवाल ने पिछले 4 साल कुछ भी नहीं किया। इस मुद्दे को उन्होंने पिछले साल तक ठंडे बस्ते में डाले रखा और अब वह वादा कर रहे हैं कि अगर वो दोबारा सत्ता में आए तो वो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाकर रहेंगे, जिसके लिए वो कुछ समय पहले आंदोलन तक करने वाले थे। सोचिए, जिस राज्य का सीएम काम करने से ज्यादा धरने पर बैठने की धमकी देता हो, वहाँ प्रगति की गति क्या होगी?
2015 में केजरीवाल ने वादा किया था कि वो मोहल्ला क्लीनिक के जरिए हर घर तक हेल्थ फैसिलिटी पहुँचाएँगे, लेकिन वास्तविकता ये है कि उन्होंने न दिल्ली में केंद्र सरकार की आयुष्मान योजना को आने दिया और न पूर्ण रूप से मोहल्ला क्लीनिक को जनता तक पहुँचाया। उन्हें लगता है कि कुछ हँसते हुए चेहरे होर्डिंग पर लगाने से स्वास्थ्य सुविधाएँ बेहतर हो जाती हैं।
दिल्ली को प्रदूषण रहित बनाने का वादा करने वाले केजरीवाल ऑड-ईवन जैसी कोशिशों को लेकर चर्चा में जरूर रहे लेकिन उसमें विफल होने के बाद प्रदूषण नियंत्रण कानून बनाने के लिए उन्होंने कोई काम नहीं किया।
2015 में अपने घोषणा पत्र में जिन्होंने 2 लाख सार्वजनिक शौचालय बनाने का वादा किया था, सच्चाई यह है कि वो चार साल में अपने लक्ष्य के 15 प्रतिशत तक ही पहुँच पाए हैं।
शिक्षा के स्तर में आए सुधार पर हम केजरीवाल की तारीफ़ करते नहीं थकते लेकिन बीती 1 जुलाई को दिल्ली भाजपा अध्यक्ष और सांसद मनोज तिवारी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करके इसमें भी केजरीवाल पर और सिसोदिया पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा दिया। उन्होंने, एक आरटीआई का हवाला देते हुए खुलासा किया कि स्कूलों में कमरों के निर्माण के लिए अतिरिक्त ₹2000 करोड़ दिए गए थे, जो केवल ₹892 करोड़ में बनाए जा सकते थे। इन स्कूलों के निर्माण के लिए जिन 34 ठेकेदारों को टेंडर दिए गए थे, उनमें उनके रिश्तेदार भी शामिल हैं।
इसके अलावा सीसीटीवी मुद्दे को लेकर केजरीवाल सरकार सक्रिय है, लेकिन इस पर भी भाजपा ने उनकी हकीकत का पर्दाफाश कर दिया। भाजपा नेता हरीश खुराना का कहना था कि तो केजरीवाल को अपने कार्यकाल खत्म होने के अंतिम समय में सीसीटीवी कैमरा लगाने की याद आई है, इस पर ही सवाल खड़ा होता है। उनके मुताबिक केजरीवाल सरकार ऐसी कंपनी से सीसीटीवी कैमरे लगवाने जा रही है, जो यूरोप और यूके में पूरी तरह से बैन है। बता दें कि सीसीटीवी कैमरे को बनाने वाली चीन की हिकविजन कंपनी को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में सीसीटीवी कैमरा लगाने का ठेका दिया है, जो यूरोप, अमेरिका और यूके में पूरी तरह से बैन है। हरीश खुराना ने इस दौरान अरविंद केजरीवाल पर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का भी आरोप लगाया।
कुल मिलाकर विपक्ष हो या फिर आम जनता, आज सब जान और समझ चुके हैं कि केजरीवाल सरकार की राजनीति सिर्फ़ झूठ की बिसात पर टिकी है। उनके लिए उनके किए वादों की कोई अहमियत नहीं है। वो चुनाव से पहले बच्चों की कसम खाकर कभी कॉन्ग्रेस से हाथ मिलाने का फैसला नहीं करते हैं, और चुनाव के बाद खुद ही उनसे जुड़ने के लिए लालायित दिखाई पड़ते हैं। राजनीतिक फैसले तो बड़ी बात, केजरीवाल वो शख्स हैं जो छोटी-छोटी चीजों पर भी अपना मत बदलते रहते हैं। तबरेज़ और अंकित की मौत पर उनका सियासी नाटक और मुआवजे पर किया गया ड्रामा इसका जीता-जागता उदाहरण है।
क्रिकेट एसोसिएशन घोटाले के मामले में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री से प्रवर्तन निदेशालय की (ED) पूछताछ चल की है। यह मामला क्रिकेट एसोसिएशन को मिलने वाले फंड की अनियमितता से जुड़ा हुआ है। CBI के अनुसार, फ़ारूक अब्दुल्ला जब जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष थे, उस दौरान उन्होंने करोड़ो रुपए का गबन किया।
मीडिया रिपोर्ट के आरोप के अनुसार, 2002 से 2012 के बीच जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन को राज्य में खेल को बढ़ावा देने के लिए 113 करोड़ रूपए दिए गए थे, लेकिन इस फंड को खर्च नहीं किया गया। फारूक अब्दुल्ला पर आरोप है कि 113 करोड़ रूपए में से 43.69 करोड़ रूपए से ज़्यादा का गबन किया गया और इन रुपयों को खिलाड़ियों पर ख़र्च नहीं किया गया।
इस घोटले में फारूक अब्दुल्ला के अलावा क्रिकेट एसोसिएशन के तत्कालीन महासचिव मोहम्मद सलीम ख़ान, तत्कालीन कोषाध्यक्ष अहसान अहमद मिर्जा और जम्मू-कश्मीर बैंक का एक कर्मचारी बशीर अहमद मिसगर भी आरोपित हैं। इन सभी पर आपराधिक साज़िश और विश्वासघात का आरोप लगा है।
साल 2015 में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने इस केस की कमान CBI को सौंप दी थी। ऐसा करने के पीछे तर्क यह दिया गया था कि फारूक अब्दुल्ला का राज्य में काफ़ी दबदबा था और ऐसी संभावना थी कि राज्य पुलिस को इस मामले की जाँच में परेशानी हो सकती थी। इसी वजह से इस केस को CBI को सौंप दिया गया।
बता दें कि कोर्ट ने यह फ़ैसला माजिद याकूब डार और निस्सार अहमद ख़ान नाम के दो खिलाड़ियों द्वारा दायर की गई याचिका पर दिया है। वहीं, कोर्ट में फारूक अब्दुल्ला का कहना था कि उनकी राजनीतिक छवि को धूमिल करने के लिए इस तरह के झूठे आरोप लगाए गए हैंं।
फर्रुखाबाद के कम्पिल में नगर पंचायत अध्यक्ष के चुनाव को लेकर चल रही रंजिश में बुधवार (जुलाई 31, 2019) दोपहर चेयरमैन के जिला पंचायत सदस्य भाई और कॉन्ग्रेस नेता के बीच ताबड़तोड़ फायरिंग हुई। बताया जा रहा है कि पुरानी रंजिश को लेकर दो सम्प्रदाय के लोगों के बीच यह मारपीट और फायरिंग हुई है। इस घटना में एक पक्ष से एक, जबकि दूसरे पक्ष से दो लोग घायल हो गए हैं।
इस फायरिंग के बाद सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका के चलते घटना की सूचना मिलने पर भारी पुलिस बल और पीएसी को कस्बे में तैनात कर दिया गया। पुलिस ने इस मामले में आठ-दस लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। दोनों पक्षों ने एक दूसरे के खिलाफ जवाबी तहरीर थाने में दी।
दरअसल, नगर के मोहल्ला माँझगाँव निवासी कॉन्ग्रेस नेता रावेश खान उर्फ बंटी ने नगर पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में रावेश हार गए थे और मोहल्ला गढ़ी निवासी एक अन्य स्थानीय नेता उदयपाल यादव जीते थे। इसके बाद से ही दोनों पक्षों में रंजिश चल रही थी। रावेश ने नगर पंचायत के विकास कार्यों में धाँधली के आरोप लगाकर कई शिकायतें भी शासन स्तर पर की हैं।
पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार दोपहर उदयपाल का जिला पंचायत सदस्य भाई नीलेश यादव कार से जा रहा था। इस दौरान रावेश काजी मोहल्ला बाइपास आरा मशीन के पास खड़े थे। आरोप है कि यहाँ पर रावेश ने नीलेश की कार रोक ली। इसके बाद विवाद शुरू हो गया और दोनों पक्षों से ताबड़तोड़ फायरिंग होने लगी। इस फायरिंग से वहाँ मौके पर भगदड़ मच गई।
तस्वीर साभार: अमर उजाला
आसपास के लोगों ने इधर-उधर छिप कर अपनी जान बचाई। दोनों पक्षों के लोग तमंचों व बंदूकों की बटों से मारपीट करने लगे। इसमें रावेश खान, उसका चचेरा भाई हिकमत उल्ला उर्फ शानू व दूसरे पक्ष से नीलेश का चालक सनी व अंकज शर्मा घायल हो गए। सूचना पर पुलिस दोनों पक्षों को पकड़कर थाने ले गई। थाने में पहुँचते ही दोनों में फिर मारपीट होने लगी।
थाने में पुलिस ने किसी तरह स्थिति को संभाला और सनी व अंकज को मेडिकल के लिए भेज दिया। अंकज ने गोली मारने का आरोप लगाया है। इस बीच अन्य थानों से भी पुलिस दल वहाँ पहुँच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए अपर पुलिस अधीक्षक त्रिभुवन सिंह ने भी मौके पर पहुँचकर मामले की जानकारी ली। बताया गया कि करीब 10-15 राउंड फायरिंग हुई है। थाना प्रभारी निरीक्षक जेएल सोनकर ने बताया कि घायलों को मेडिकल के लिए भेजा गया है। तहरीर मिलने पर मुकदमा दर्ज किया जाएगा।
28 जुलाई को रायबरेली के पास उस कार को टक्कर मारी जाती है, जिसमें उन्नाव रेप पीड़िता अपनी चाची, मौसी और वकील के साथ सवार होती है। मामला मीडिया में छाने के बाद न केवल प्रशासनिक अमला हरकत में आता है, बल्कि पीड़िता को न्याय त्वरित गति से सुनिश्चित करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट भी सक्रिय हो जाता है।
हादसे के पॉंचवें दिन यानी 1 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट उन्नाव रेप मामले से जुड़े सभी 5 मामलों को दिल्ली ट्रांसफर करने का आदेश देता है। केस की रोजाना सुनवाई करते हुए 45 दिन की डेडलाइन तय करता है। हादसे की पड़ताल एक हफ्ते के भीतर पूरी करने का निर्देश देता है। उत्तर प्रदेश सरकार को पीड़िता के परिजनों को 25 लाख रुपए का मुआवजा देने को भी कहता है।
जिस देश की अदालतों में करीब तीन करोड़ मामले लंबित हो, वहॉं इस तरह की तेजी न्यायिक व्यवस्था में यकीन और गहरा करती है। लेकिन, त्वरित गति से इंसाफ केवल उन्हीं मामलों में मिलता क्यों दिखता है जो मीडिया की सुर्खी बनते हैं? चाहे वह निर्भया का मामला हो या कठुआ का और अब उन्नाव।
देशभर में 30 जून तक बाल दुष्कर्म के डेढ़ लाख से ज्यादा मामले लंबित थे। देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में से करीब 12 फीसदी रेप के होते हैं। बीते महीने केन्द्र सरकार ने लोकसभा में बताया गया था कि 2014-16 के बीच हिरासत में दुष्कर्म के 300 से ज्यादा मामले सामने आए थे। बीते साल लोकसभा में सरकार ने एनसीआरबी के आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया था कि 2015 में 34,651 और 2016 में 38,947 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे। लेकिन, सजा इनमें से एक चौथाई मामलों में ही हो पाती है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को बाल दुष्कर्म के मामलों की जानकारी देते हुए बताया गया था कि इस प्रकार के मामलों के निपटाने की दर महज नौ फीसदी ही है। और यह हालात पोक्सो कानून लागू होने के सात साल बाद की है। रिपोर्ट के अनुसार देश भर में इस साल एक जनवरी से लेकर 30 जून तक ऐसे 24,212 मामले दर्ज किए गए थे।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर एक घंटे में 4 रेप होता है। ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बलात्कार के मामले 2015 की तुलना में 2016 में 12.4 फीसदी बढ़े। 2016 में 38,947 बलात्कार के मामले देश में दर्ज हुए। इसी ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि साल 2016 में देश की विभिन्न अदालतों में चल रहे बलात्कार के 1,52,165 नए-पुराने मामलों में केवल 25 का निपटारा किया जा सका, जबकि उस साल रेप के 38,947 नए मामले दर्ज किए गए थे।
देश की राजधानी दिल्ली में ही साल 2011 से 2016 के बीच महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों में 277 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दिल्ली में साल 2011 में जहां इस तरह के 572 मामले दर्ज किए गए थे, वहीं साल 2016 में यह आंकड़ा 2155 रहा। यहाँ तक कि निर्भया कांड के बाद दिल्ली में दुष्कर्म के मामलों में 132 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
महिला सुरक्षा हर कानून और दावे का मजाक उड़ाते ये आँकड़े केवल रेप के मामलों के हैं, जो दुनिया भर में सबसे कम रिपोर्ट होने वाला अपराध है। ज्यादातर मामलों में पीड़िता पुलिस तक पहुँचने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाती। यौन उत्पीड़न के खिलाफ काम करने वाली अमेरिकी संस्था रेप, असॉल्ट एंड इन्सेस्ट नेशनल नेटवर्क के अनुसार अमेरिका में होने वाले हर एक हजार यौन अपराधों में केवल 310 मामले पुलिस को सामने आते हैं। इसमें से भी केवल 6 मामलों में अपराधी को सजा हो पाती है। अब इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भारत जैसे देश में इस तरह के कितने मामले रिपोर्ट होते होंगे।
इन आँकड़ों से यह भी पता चलता है कि कानून भले कितने भी कड़े कर दिए जाए जब तक त्वरित गति से इंसाफ मिलता नहीं मिलेगा हालात नहीं बदलेंगे। और हर मामला आपका भी इतना खून नहीं खौलाता है कि आप पोस्टर-बैनर और कैंडल लेकर सड़क पर उतर जाएँ!