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‘द वायर’ वालो, इतिहास पढ़ो, संदर्भ देखो और तब ज्ञान छाँटो कि जर्मन राजदूत के संघ जाने का क्या अर्थ है

The Wire वाले भाटिया जी बहुत दुःखी हैं- बहुत ही ज़्यादा। जर्मनी के राजदूत संघ वालों से मिलने नागपुर चले गए न! भाटिया जी याद दिला रहे हैं कि संघ के दो पितृ-पुरुषों सावरकर और गोलवलकर ने हिटलर की तारीफ़ कर दी थी, और इसलिए जर्मनी के राजदूत वॉल्टर जे लिंडनर का संघ के लोगों से मिलना न केवल हिटलर के हाथों मारे गए यहूदियों का अपमान है बल्कि बिना सीधे-सीधे कहे यह भी समझा रहे हैं कि इससे जर्मनी के सत्तर साल का प्रायश्चित मिट्टी में मिल गया।

दो बार प्रतिबंधित होने के बाद भी आज तक जारी कैसे है RSS?

भाटिया जी बताते हैं कि संघ पर दो-दो बार प्रतिबंध लग चुका है। पहले तो उनका इतिहास-ज्ञान ही सुधारा जाए- संघ दो नहीं, तीन बार प्रतिबंधित हुआ है। एक बार गाँधी-वध के बाद, एक बार आपातकाल में, और तीसरी बार बाबरी-ध्वंस के बाद। कारणों पर मैं बाद में आऊँगा, पहले भाटिया जी ये बताएँ कि इतनी बार प्रतिबंधित होने के बावजूद संघ आज तक काम कैसे कर रहा है?

अगर यह सवाल भाटिया जी से बगलें झाँकने के अलावा कोई जवाब नहीं होगा। क्योंकि जवाब यह है कि हर बार संघ को प्रतिबंधित करने के बाद भी, कोई भी सरकार उसके द्वारा कोई गैर-क़ानूनी काम साबित नहीं कर पाई है। न गाँधी-वध में सरदार पटेल संघ का हाथ साबित कर पाए, न ही नरसिम्हा राव बाबरी-ध्वंस में संघ का हाथ साबित कर पाए। इसके अलावा संघ पर तीसरा प्रतिबंध इंदिरा गाँधी के उस आपातकाल में लगा, जिसके लिए जेल जाना या प्रतिबंधित होना शर्म नहीं, गर्व की बात है।

हिटलर, ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’

यह सच है कि हिटलर की तारीफ़ गोलवलकर और सावरकर ने की थी। लेकिन हिटलर को ‘मेरे मित्र हिटलर’ तो गाँधी ने भी कहा था। उन्होंने तो हिटलर को ‘वीर’, ‘अपनी पितृभूमि से प्रेम करने वाला’ भी कहा था, और कहा था कि उन्हें नहीं लगता कि हिटलर वह दैत्य है जो उसके दुश्मन उसे बताते हैं। तो क्या गाँधी को केवल इतना कह देने के लिए भारत के हृदय से हटा दें? भाटिया जी बताएँगे कि गाँधी जी की बात तो ‘परिप्रेक्ष्य’ में देखा जाना चाहिए, अलग से उठा कर नहीं; भाटिया जी यह भी बताएँगे कि बाद में गाँधी की धारणा हिटलर के बारे में बदल गई। तो धारणाएँ तो गोलवलकर की भी जीवन में सतत रूप से बदलतीं रहीं थीं– जैसा कि किसी भी ऐसे विचारक के साथ होता ही है जिसने वैचारिक स्वातंत्र्य अक्षुण्ण रखा हो न कि किसी विचारधारा के आगे गिरवी रख दिया हो, जैसे वायर वाले कर चुके हैं।

तो या गाँधी और सावरकर-गोलवलकर के लिए मापदण्ड अलग-अलग हैं, कि गाँधी के विचारों में परिवर्तन ठीक है, गोलवलकर-सावरकर के नहीं; और अगर ऐसा नहीं है तो भाटिया जी बताएँ वह क्या हैं- वैचारिक दोगले, जिसने यह जानकर भी गोलवलकर का दानवीकरण किया, या फिर इतिहास से अनभिज्ञ, जिस स्थिति में सवाल यह उठेगा कि खुद इतिहास ठीक से न जानने वाला व्यक्ति किस नैतिक अधिकार से किसी देश के राजदूत को ज्ञान दे रहा है, और 50-60 लाख लोगों की तुलना इतिहास के सबसे क्रूर व्यक्तियों में से एक से कर रहा है?

हिटलर के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की तुलना संघ के और हिन्दुओं के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से करने वाले भाटिया जी को यह भी जान लेना चाहिए कि ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की संघ की अवधारणा नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में दी गई अवधारणा से बहुत अलग नहीं है। वह भी अपनी किताब में ‘हिन्दुस्तानियत’ को परिभाषित संस्कृति से ही करते हैं, भौगोलिकता से नहीं– और हिंदुस्तान की राष्ट्रीय संस्कृति तो वही होगी जो हिंदुस्तान में पैदा हुई हो, यानि हिन्दू संस्कृति। अब सिद्धार्थ भाटिया बताएँ कि नेहरू फ़ासिस्ट थे या नाज़ी?

यहूदियों का दोस्त कौन?

जब हिटलर की बात होती है तो यहूदियों की बात होना लाज़मी है। यह देख लेना ज़रूरी है कि यहूदियों को दो हज़ार साल दुनिया में दर-दर भटकने के बाद अपना राज्य, अपना राष्ट्र मिला तो उसके बारे में और उसके साथ हिंदुस्तान में किसने क्या व्यवहार किया। 1920 के दशक में सावरकर ने लिखा कि अगर यहूदियों के अपने राज्य, अपने राष्ट्र का ज़ियोनिस्ट सपना पूरा होता है तो उन्हें यहूदियों जितनी ही ख़ुशी होगी। 1947 में जब यहूदियों को अपना खुद का राज्य, अपना देश मिलने में भारत ने टाँग मारी तो सावरकर बिफ़र उठे। गोलवलकर ने इजराइल को अपने सपनों के हिन्दू राष्ट्र के लिए एक आदर्श ‘मॉडल’ माना था। और इसके उलटे, गाँधी ने फ़िलिस्तीन को यहूदियों नहीं अरबी फ़िलिस्तीनियों का बताया था

इज़राइल के साथ नेहरूवियन हिंदुस्तान के कैसे रिश्ते रहे, इसे इस एक कथन से समझा जा सकता है: “हिंदुस्तान के साथ इज़राइल का रिश्ता रखैल का है– आप आड़ में यह अफेयर चलाने में तो खुश हैं, लेकिन सबके सामने इस संबंध को स्वीकार करने को तैयार नहीं।” मैं भाटिया जी को चुनौती देता हूँ कि इस कथन को वह गलत साबित करके दिखाएँ। यह सच्चाई बदलने वाला भी एक ‘संघी’ मोदी ही था। भाटिया जी बताएँगे कि हिटलर के हाथों मारे गए यहूदियों की आत्माएँ जर्मनी के राजदूत के उस संघ के दरवाज़े जाने से नाराज़ होंगी, जिसने इज़राइल को सम्मान देने वाला मोदी बनाया, या उन गाँधी की समाधि पर राजघाट जाने से, जिनका दिल इज़राइल के लिए नहीं पिघला।

इसमें कोई शक नहीं कि गोलवलकर-सावरकर के कई विचार गलत भी थे। कुछ उस समय गलत नहीं भी रहे होंगे लेकिन हो सकता है आज के परिप्रेक्ष्य में उनकी प्रासंगिकता न हो- यह मोहन भगवत ने भी माना है कि संघ केवल गोलवलकर या सावरकर की उस समय कही गई बातों तक सीमित नहीं है। लेकिन उन विचारों को बिना परिप्रेक्ष्य, बिना देश-काल-परिस्थिति के, उठा कर उसके आधार पर न केवल किसी व्यक्ति का बल्कि उस व्यक्ति से जुड़े हर व्यक्ति का भी मूल्यांकन करना या तो घृणित है, या फिर बौद्धिक दीवालियापन। यह भाटिया जी तय कर लें कि उनकी श्रेणी क्या हो सकती है।

शशि थरूर जी ब्रो, आपके व्हाट्सएप में पहुँची हर शायरी ग़ालिब की नहीं होती!

‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ इस तरह की शायरियाँ और चेतावनियाँ अक्सर गाड़ी और टेम्पो के पीछे लिखी नजर आती हैं, लेकिन इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले शशि थरूर जैसे बुद्धिजीवियों के लिए भी यह काफी हद तक सही साबित होती है।

वेबकूफ जैसे शब्द ईजाद करने वाले कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर आज ट्विटर पर खुद ही व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का हिस्सा बनते नजर आए हैं। दरअसल, शशि थरूर ने आज ‘मिर्जा ग़ालिब के जन्मदिन’ पर ‘ग़ालिब’ की ही एक एक बहुत ही सुन्दर और मनोहर शायरी शेयर की है। लेकिन ट्विटर यूज़र्स को इसमें कुछ झोल नजर आ गया।

शशि थरूर ने आज ट्वीट करते हुए लिखा –

“ख़ुदा की मोहब्बत को फ़ना कौन करेगा?
सभी बन्दे नेक हों तो गुनाह कौन करेगा?
ऐ ख़ुदा मेरे दोस्तों को सलामत रखना

वरना मेरी सलामती की दुआ कौन करेगा
और रखना मेरे दुश्मनों को भी महफूज़ वरना

मेरी तेरे पास आने की दुआ कौन करेगा…!!!
Mirza Ghalib’s 220th birthday. So many great lines…. “

लेकिन इस ‘दर्दभरी शायरी’ को ट्वीट करते ही ट्वीटर यूज़र्स ने शशि थरूर को याद दिला दिया कि ना ही आज मिर्जा ग़ालिब का जन्मदिन है और ना ही ये शायरी ग़ालिब ने लिखी हुई है। जब तक ‘वेबकूफ’ शब्द गढ़ने वाले शशि थरूर समझ पाते कि वो ‘फूट इन माउथ’ मोमेंट का शिकार हुए हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उन्होंने एक ट्वीट के जरिए स्पष्ट किया कि उन्हें जन्मदिन की तारीख को लेकर कुछ ग़लतफ़हमी हो गई थी। इसके बाद शशि थरूर को बेहद रोचक रिप्लाई आने लगे।

कुछ ट्विटर यूज़र इस बात से भी नाराज थे कि आज ही कॉन्ग्रेस नेता शीला दीक्षित का निधन हुआ और शशि थरूर को शायरी सूझ रही थी।

अधिक शायरी के लिए ऑटो वालों से संपर्क करें शशि थरूर

हालाँकि, शशि थरूर बहुत ज्ञानी आदमी हैं लेकिन उन्हें इस तरह की ‘फैन’ होने की बातों से वास्तविक साहित्य प्रेमियों को निराश नहीं करना चाहिए। यह सिर्फ इस बात का सबूत है कि इस मामले में आपका ज्ञान बेहद सतही और सिर्फ ज्ञान के प्रदर्शन के तक ही समर्पित है।

जिस शायरी को शशि थरूर मिर्जा ग़ालिब की बताकर अन्य लोगों में भी इस भ्रम को फैलाते हैं, उस तरह की शायरी के स्टिकर अपने काले छाते की कमानियों में छोटे शहरों के बस स्टैंड में बेच रहे होते हैं। ये शायरियाँ ऑटो-रिक्शा चालक और बस या ट्रक ड्राइवर्स अपने मनोरंजन के उद्देश्य से शीशे या फिर बोनट आदि पर चिपकाकर चलते हैं।

शायरी का वो संकलन, जिसे हमने थरूर की मोबाइल से निकाला

ऑपइंडिया तीखी मिर्ची सेल ने शशि थरूर का मोबाइल हैक कर के शायरी का वो संकलन निकला है जिसे शशि थरूर आने वाले मशहूर शायरों के जन्मदिन पर पोस्ट करने वाले थे। सड़कछाप पंक्तियों को ग़ालिब का बताते हुए श्री थरूर जी ब्रो ने यह जानकारी भी दी कि मिर्ज़ा ग़ालिब उनके ‘ऑल टाइम फेवरेट’ हैं। कल वो ग़ालिब के नाम से नीचे की पंक्तियाँ न ट्वीट कर दें, इस कारण लोगों में डर का माहौल है। एक नजर –

मालिक की गाड़ी, ड्राइवर का पसीना
चलती है सड़क पर बन कर हसीना

ड्राईवर की ज़िन्दगी में लाखों इलज़ाम होते हैं,
निगाहें साफ़ होती हैं फिर भी बदनाम होते हैं!

चलती है गाड़ी उड़ती है धूल
जलते हैं दुश्मन खिलते हैं फूल

बागों में मोरनी पूछे, चौराहे पर पूछे सिपाही
बोम्बे में एसवरिया पूछे ७९११ क्यों नहीं आई

मेरी चलती है
तो तेरी क्यों जलती है

एक चाँद को देख कर चांदनी भी शरमा गई
किस्मत थी इस गरीब की सवारी गाड़ी में आ गई

गुल गया, गुलबदन गया, गई होंठों की लाली,
अब तो पीछा छोड़ दे मैं हो गई बच्चों वाली

टेबल पर ‘उल्टा तिरंगा’ रखते हैं ‘वेबकूफ’ शशि थरूर

कल ही कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने एक तस्वीर शेयर की थी, जिसमें उन्होंने अपने टेबल पर उल्टा तिरंगा रखा हुआ था। इसके बाद ट्विटर यूज़र्स ने उन्हें इस बात पर जमकर लताड़ लगाई थी।

भू माफिया आजम खान ने निजी यूनिवर्सिटी में करवाया था सरकारी खर्चे से ‘जश्न’, सैफई से भी ज्यादा था खर्चा

अपने दादा के नाम पर अली जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण में 26 किसानों की 5 हेक्टेयर जमीन हड़पने के कारण चर्चा में आए भू माफिया आजम खान का विवादों से गहरा सम्बन्ध रहा है। भू माफिया आजम खान समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और रामपुर से मौजूदा सांसद हैं। जनसत्ता की एक रिपोर्ट के अनुसार, भू माफिया आजम खान ने अखिलेश सरकार में सैफई महोत्सव की तर्ज पर रामपुर महोत्सव का आयोजन किया था।

जश्न-ए-जौहर

इस महोत्स्व के दौरान भी वो विवादों के घेरे में आए थे। दरअसल, उस वक्त भी एक विवाद उछला था, जब आजम खान ने रामपुर महोत्सव का नाम बदलकर जश्न-ए-जौहर कर दिया था। इस समारोह का स्थान उन्होंने अपने निजी विश्वविद्यालय में रखा था। खास बात यह है कि उस समारोह का पूरा इंतजाम जिला प्रशासन ने किया था। राज्य सरकार की तरफ से इसके लिए 58 लाख रुपए आवंटित किए गए थे, जो कि सैफई महोत्सव से 10 लाख ज्यादा थे। तब आरोप लगे थे कि अखिलेश सरकार आजम खान के सामने नतमस्तक है और उन्होंने ही इसकी सारी तैयारियाँ करवाई हैं।

आजम खान को रामपुर जिला प्रशासन ने उन्हें भू-माफिया घोषित किया है और इस सम्बन्ध में उनका नाम एंटी भू माफिया पोर्टल पर जमीन कब्जाने वालों की सूची में डाल दिया गया है। आजम खान के खिलाफ ये मामला जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़ा हुआ है। पीड़ित लोगों का आरोप है कि आजम खान ने अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए जौहर विश्वविद्यालय के लिए जमीन हथिया ली। जौहर विश्वविद्यालय के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के शासन में भी इस तरह के आरोप लगे थे। लेकिन सरकार में होने के बावजूद उन पर कभी किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई।

भू माफिया आजम खान पर पिछले एक महीने में 13 मामले दर्ज किए गए हैं। उनके खिलाफ अलग-अलग केसों में 30 मुकदमे चल रहे हैं।

झारखंड के 5000 बच्चों की तस्करी करने वाला दरिंदा पन्ना लाल महतो खूंटी से गिरफ़्तार

झारखंड पुलिस ने शुक्रवार (19 जुलाई 2019) को दावा किया कि खूंटी ज़िले में हज़ारों लड़कियों को ख़रीदने-बेचने व मानव तस्करी के सरगना पन्ना लाल महतो को गिरफ़्तार कर लिया गया है। महतो की गिरफ़्तारी झारखंड पुलिस एक बड़ी सफलता है।

महतो पर आरोप है कि उसने झारखंड के 5,000 बच्चों को, जिनमें अधिकतर आदिवासी लड़कियाँ थीं, उन्हें नई दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में बेच दिया। पुलिस ने उसके क़ब्ज़े से अवैध भूमि सौदों और तस्करी से संबंधित कई दस्तावेज़ भी ज़ब्त किए।

डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (हेडक्वार्टर) जयदीप लकड़ा ने बताया कि महतों को गुरुवार (18 जुलाई 2019) की आधी रात को खूंटी पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले खूंटी टोला से गिरफ़्तार किया गया। उन्होंने बताया, “हमें एक सूचना मिली कि महतो खूंटी टोला के एक पखनु गंझू के घर पर है। जब हम घर पर छापा मारने पहुँचे, तो उसने अपनी एसयूवी कार से भागने की कोशिश की लेकिन हमने उसे पकड़ लिया।”

इसके आगे उन्होंने बताया,

“हमने एक पीले रंग की फाइल बरामद की जिसमें मानव तस्करी से संबंधित धन के आदान-प्रदान का विवरण, भूमि सौदों से संबंधित एक नीले रंग की डायरी, एक सफेद SUV, विभिन्न बैंकों के चेकबुक, एटीएम कार्ड, गैर-न्यायिक टिकट और अन्य वस्तुएँ बरामद किए।”

इसके अलावा, खूंटी के बाल कल्याण समिति (CWC) ने महतो के ख़िलाफ़ मानव-तस्करी विरोधी इकाई (AHTU) (खूंटी) में भी एक FIR दर्ज की थी। खूंटी में CWC के सदस्य बैद्यनाथ कुमार ने कहा था कि उन्होंने खूंटी ब्लॉक की नाबालिग लड़की की तस्करी में शामिल होने के मामले में अगस्त 2018 में महतो के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था। उन्होंने बताया,

“लड़की की तस्करी पिछले साल दिल्ली में की गई थी। उसे दिल्ली पुलिस ने बचा लिया था और फिर उसे दिल्ली CWC को सौंप दिया गया था। इसके बाद लड़की को खूंटी CWC लाया गया, जहाँ उसका बयान दर्ज किया गया।”

बैद्यनाथ कुमार के अनुसार,

“लड़की ने अपने बयान में बताया कि उसके साथ मारपीट की गई और यौन शोषण भी किया गया। उसके बयान के आधार पर, पुलिस ने महतो के ख़िलाफ़ धारा-363, 370 (4), 370 (A), 371, 374, 354 (A) और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम की धारा-8 के तहत FIR दर्ज की गई थी।”

ख़बर के अनुसार, इससे पहले भी महतो को गिरफ़्तार किया जा चुका है। महतो और उसकी पत्नी सुनीता कुमारी को अक्टूबर 2014 में नई दिल्ली के शकूरपुर इलाक़े से मानव तस्करी के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था, जब वे किसी अज्ञात स्थान पर भागने के लिए अपना सामान इकट्ठा करने के लिए वहाँ गए थे।

पुलिस ने बताया कि महतो को मानव तस्करी और अन्य मामलों में 2004 और 2006 में भी गिरफ़्तार किया गया था। पुलिस ने कहा कि आरोपित ने रांची, दिल्ली और खूंटी में बड़ी संपत्ति अर्जित कर ली है।

एक NGO का दावा है कि झारखंड से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में हर साल कम से कम 10,000 बच्चों की तस्करी की जाती है। अधिकांश पीड़ितों को घरेलू कामों में और कुछ को वेश्यालय में धकेल दिया जाता है।

जल्द हल होगा कश्मीर मसला, धरती की कोई ताकत इसे नहीं रोक सकती: रक्षा मंत्री

कठुआ: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दावा किया कि कश्मीर मुद्दे का समाधान अब होने को है, और “धरती की कोई ताकत इसे रोक नहीं सकती।” रक्षा मंत्री ने यह बात द्रास सेक्टर स्थित कारगिल युद्ध स्मारक पर कही। इस दौरान उन्होंने कठुआ और बसंतसर में दो पुलों का भी उद्घाटन किया।

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‘तो कैसे, हमें मालूम है’

उझ नदी पर बना 1,000 मित्र लम्बा कठुआ का पुल बॉर्डर रोड आर्गेनाइजेशन (बीआरओ, BRO) के अब तक के इतिहास का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है। ₹50 करोड़ के इस पुल का लोकार्पण करते हुए राजनाथ ने, जोकि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में गृह मंत्री का कार्यभार भी संभाल चुके हैं, देश को आश्वस्त किया कि “कश्मीर समस्या का हल जल्दी ही होने वाला है।” इस दौरान उन्होंने अपने गृह मंत्री होने के उस दौर को भी याद किया जब उनके नेतृत्व में पहुँचे सर्वदलीय डेलीगेशन से बात करने के लिए हुर्रियत नेताओं ने अपने घर के दरवाज़े तक नहीं खोले थे।

राजनाथ ने चेतावनी भी दी कि बातचीत ही उनकी सरकार के पास इकलौता विकल्प नहीं है। “अगर बातचीत से नहीं, तो कैसे, हमें मालूम है।” उन्होंने साथ ही जोड़ा, “इसका समाधान हो कर रहेगा। मैं जो बोलता हूँ, सोच-समझ कर बोलता हूँ। ऐसे नहीं बोलता हूँ।”

टेरर फंडिंग: कश्मीरी अखबार के संपादक से NIA की पूछताछ, जिहादी पत्रकारों को ISI से मदद मिलने का शक

कश्मीर घाटी में हिंसा की घटनाओं के लिए आतंकी फंडिंग केस की जाँच कर रही राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने मंगलवार (जुलाई 16, 2019) को कश्मीर के एक स्थानीय अखबार के संपादक से पूछताछ की। एनआईए ने एजेंसी के दिल्ली मुख्यालय में घाटी के अखबार ‘कश्मीर रीडर’ के संपादक मोहम्मद हयात भट को बुलाकर उनसे कई घंटों तक कड़ी पूछताछ की। इससे पूर्व एजेंसी ने पिछले हफ्ते हयात भट को समन जारी किया था। मूल रूप से पुलवामा के निवासी हयात भट से हुई पूछताछ में कई बड़ी जानकारियाँ एजेंसी के हाथ लगी हैं।

खबर के मुताबिक, हयात भट उर्फ हाजी हयात ने साल 2012 में ‘कश्मीर रीडर’ अखबार की शुरुआत की थी और इससे पूर्व वो हेल्पलाइन ऐडवर्टाइजिंग एजेंसी के नाम से एक फर्म चलाता था, जिसे किसी दूसरे देश से फंडिंग मिलती थी। श्रीनगर नगर निगम के एक अधिकारी के अनुसार, ऐडवर्टाइजिंग एजेंसी चलाने वाले भट को साल 2007 में 10 वर्षों के लिए सरकारी विज्ञापनों के लिए श्री नगर निगम की स्थापना का कॉन्ट्रैक्ट मिला था। उसे श्री नगर में लगभग 150 स्थानों के लिए एक मामूली राशि के लिए अनुबंध मिला था। बता दें कि जिस समय भट को यह कॉन्ट्रैक्ट मिला था, उस समय जम्मू-कश्मीर के सीएम पीडीपी के नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद थे।

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी का दावा है कि भट के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से बेहद करीबी संबंध थे और उसने अपने अखबार में लिखने के लिए कई जिहादी पत्रकारों को भी नौकरी पर रखा हुआ है। उनमें से कुछ पत्रकार अब कथित रुप से कश्मीर के प्रेस क्लब के कार्यकारी सदस्य हैं। अधिकारियों के अनुसार, एजेंसी कश्मीर के एक संदिग्ध संगठन ‘कश्मीर एडिटर्स गिल्ड’ के संस्थापकों का भी पता लगाने में जुटी हुई है। एजेंसी के अधिकारियों को शक है कि इस संगठन का निर्माण आईएसआई द्वारा घाटी में कराया गया है और इसके कई सदस्य भी टेरर फंडिंग केस में शामिल हो सकते हैं।

जानकारी के अनुसार, एनआईए भारत सरकार के खिलाफ नफरत पैदा करने वाली सामग्री को लेकर कश्मीर के कई पत्रकारों से पूछताछ कर रही है। वहीं, कश्मीर एडिटर्स गिल्ड (KEG) के नव निर्वाचित निकाय ने टाइम्स ऑफ इंडिया के रिपोर्ट की निंदा करते हुए इसे आधारहीन बताया है। उन्होंने कहा है कि वे इस रिपोर्ट पर कानूनी कार्रवाई करेंगे।

गौरतलब है कि, कुछ दिनों पहले, एनआईए ने कश्मीरी अलगाववादी आसिया अंद्राबी की श्रीनगर स्थित घर को अटैच किया था। आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किए जाने के कारण यूएपीए के तहत यह कार्रवाई की गई थी। आसिया अंद्राबी के इस घर का इस्तेमाल आतंकी संगठन दुख्तरान-ए-मिल्लत की गतिविधियों के लिए किया गया था। अब आसिया अंद्राबी अपने इस घर को तब तक नहीं बेच सकती है, जब तक इस पूरे मामले की जाँच खत्म न हो जाए। कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने और युवाओं को भड़काने के कारण अलगाववादी नेता शब्बीर शाह, यासिन मलिक, आसिया अंद्राबी, पत्थरबाजों के पोस्टर बॉय मसरत आलम और हवाला एजेंट जहूर वटाली को पहले ही गिरफ़्तार किया जा चुका है।

जागरुकता कार्यक्रम के पोस्टर में निर्भया गैंगरेप के दोषी की फोटो, मंत्री ने दिए जाँच के आदेश

पंजाब चुनाव आयोग ने होशियारपुर ज़िले में अपने चुनाव जागरूकता अभियान में जिस पोस्टर का इस्तेमाल किया उससे अच्छा-ख़ासा बवाल मच गया है। दरअसल, विवाद इस पोस्टर लगी तस्वीर को लेकर है जिसमें तीन लोगों के साथ निर्भया सामूहिक बलात्कार के दोषी मुकेश सिंह की भी फोटो को जगह दी गई है।

निर्भया बलात्कार मामले में मुकेश ने ख़ुद को यह कहकर निर्दोष बताया था कि वारदात के समय वो बस चला रहा था। हालाँकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने मुकेश समेत चार आरोपितों को फाँसी की सज़ा सुनाई थी। इसके बाद कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देते हुए मुकेश मे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था।      

वहीं, इस पोस्टर पर पंजाब के मंत्री का कहना है कि यह मामला ग़लत पहचान का है। श्याम अरोड़ा ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि इस मामले की जाँच कराई जाएगी। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि जिस शख़्स की फोटो पर विवाद हो रहा है, उस पर भी संशय बना हुआ है कि वो उसी आरोपित की है भी कि नहीं! इस संदर्भ में जाँच करके पता लगाया जाएगा कि आख़िर ऐसा हुआ कैसे।

8 घटनाएँ जहाँ ‘शांतिप्रियों’ का ‘हमसे जय श्री राम बुलवाया’ फ़र्ज़ी निकला, कारण क्या हैं?

23 मई से देश में अजीब ही ‘डर का माहौल’ है- एक तरफ़ कथित लिबरलों का गिरोह ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ सरकार आने के बाद ‘समुदाय विशेष’ की चिंता में दुबला हुए जा रहा है, और दूसरी ओर हिन्दू हैरान-परेशान हैं कि आखिर वह कौन लोग हैं जो ‘जय श्री राम’ का नारा हिन्दुओं को तो लगाने की इजाज़त दिला नहीं पा रहे हैं, और समुदाय विशेष से लगवाए ले रहे हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह कि ऐसे अधिकाँश मामले भी झूठे ही निकल रहे हैं जिनमें समुदाय विशेष को जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर करने की बात कही गई है। एक तबरेज़ अंसारी के सच्चे मामले के बनाम ऐसे ढेरों मामले होते हैं जिनमें कभी मीडिया, तो कभी खुद शिकायतकर्ता द्वारा ज़बरदस्ती मामले को साम्प्रदायिक रंग देने की बात निकल कर बाहर आ रही है।

28 मई, गुरुग्राम: बरकत का दावा निकला झूठा

मोहम्मद बरकत ने दावा किया कि गुरुग्राम में कुछ हिन्दुओं ने उसे घेर कर मारा, उसकी इस्लामी गोल टोपी फेंक दी और ‘जय श्री राम’ बोलने के लिए मजबूर किया। हरकत में आई गुरुग्राम पुलिस ने 15 लोगों को हिरासत में लिया, 50 के करीब सीसीटीवी फुटेज खंगालीं, और अंत में इस नतीजे पर पहुँची कि बरकत अली के साथ मार-पीट तो हुई, लेकिन न ही उसकी टोपी किसी ने ‘फेंकी’ और न ही जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया गया। यही नहीं, स्वराज्य संवाददाता स्वाति चतुर्वेदी की जाँच में तो शक की सूई इस ओर भी घूमी कि बरकत को किसी ने सिखाया-पढ़ाया तो नहीं था इस घटना को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए।

2 जून, करीमनगर: ‘मजनूँ’ की पिटाई बनी ‘जय श्री राम’

किसी समय ’15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो’ का दावा करने वाले अकबरुद्दीन ओवैसी की AIMIM के नेता रहे और आजकल ‘मजलिस बचाओ’ से जुड़े अमजद उल्लाह खान ने दावा किया कि भाजपा-संघ के लोगों ने समुदाय विशेष के एक किशोर को पीटा क्योंकि उसने जय श्री राम कहने से मना कर दिया था। करीमनगर के कमिश्नर ने साफ किया कि उनकी जाँच में ऐसा कुछ नहीं निकला, और यह निजी कारणों से हुई हिंसा थी- समुदाय विशेष का लड़का किसी किशोरी को तंग करने को लेकर उस लड़की के पक्ष के लोगों के हाथों पिटा था। यही नहीं, पिटने वाले लड़के के भी अपने बेटे की गलती मानते हुए माफ़ी माँगी

23 जून, दिल्ली: मोमिन को नहीं मिला चश्मदीदों का साथ

रोहिणी, सेक्टर-20 के मदरसे में पढ़ाने वाले मोहम्मद मोमिन ने आरोप लगाया कि जय श्री राम बोलने से इंकार करने पर कुछ लोगों ने उनकी कार को टक्कर मार दी। पुलिस ने जाँच की लेकिन एक भी चश्मदीद गवाह ने मोमिन की बात का समर्थन नहीं किया। घटनास्थल के पास लगे सीसीटीवी फुटेज से भी आरोपों की पुष्टि नहीं हुई

29 जून, कूच बिहार: आप्सी मियाँ की करनी हिन्दुओं के सर

आप्सी मियाँ ने अपने हममज़हब असगर को कान पकड़ कर उठक-बैठक लगाने और जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया। और लिबरल गिरोह ने हिन्दुओं को जिम्मेदार ठहराने में समय नहीं लगाया। यह भी ध्यान नहीं दिया कि कुछ बिहार पश्चिम बंगाल में है- जहाँ हिन्दू खुद भी अगर जय श्री राम बोलें तो हो सकता है उन्हें गोली मारी जा सकती है। ऐसे में एक हिन्दू भला समुदाय विशेष से जय श्री राम बुलवाएगा?

5 जुलाई, कानपुर: नशे में हुई लड़ाई पर झूठ

ऑटो-ड्राइवर आतिब पर हमला बेशक हुआ, ईंट-पत्थर से मारकर उसे मरणासन्न भी बिलकुल किया गया, लेकिन यहाँ भी जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर करने की बात झूठ निकली। पुलिस जाँच के अनुसार यह एक नशे में हुई हाथापाई थी, जिसकी परिणति आतिब को शौचालय में बाँधकर पीटने के रूप में हुई

12 जुलाई, उन्नाव: जुमे तक अगर काज़ी साहब की बात न मानी तो…

क्रिकेट खेलने में स्थानीय लड़कों से हुए हुए विवाद और झगड़े को लेकर मदरसे के बच्चे जब काज़ी निसार मिस्बाही के पास पहुँचे तो क़ाज़ी साहब खुद ही ‘स्पिनर’ निकले। न केवल मदरसे के बच्चों से जबरन जय श्री राम बुलवाए जाने का ‘स्पिन’ उन्होंने मामले में लगा दिया, बल्कि धमकी भी दी कि अगर जुमे तक उनके बताए चार ‘दोषियों’ को उसी जुमे तक न पकड़ा गया तो ‘जो एक्शन कहीं भी नहीं हुआ, वो होगा‘। वह बात और है कि न केवल पुलिस की जाँच में यह मामला भी साम्प्रदायिक रूप से खोखला निकला, बल्कि फिर भी प्रदेश के प्रमुख सचिव (सूचना) तक को मामले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलानी पड़ गई।

14 जुलाई, मुज़फ़्फ़रनगर: न दाढ़ी नोंची, न राम-नाम बुलवाया

इमाम इमलाकुर रहमान जब अपने साथ मारपीट की बात पर मुज़फ़्फ़रनगर में FIR करने पहुँचे तो न ही मामले में कोई जय श्री राम था, और न ही उन्होंने दाढ़ी नोंचे जाने की बात अपनी FIR में कही। लेकिन जब तक वह मामले की पूरी FIR करने बागपत पहुँचे (जहाँ का मामला था), यह सब चीज़ें बागपत FIR में अतिरिक्त आ गईं थीं। न केवल इन्हें एसपी ने ख़ारिज किया, बल्कि अंदेशा भी जताया कि साम्प्रदायिक एंगल जानबूझकर जोड़ा गया ताकि मामले में त्वरित कार्रवाई हो।

20 जुलाई, औरंगाबाद: नहीं किया भीड़ ने मजबूर

इमरान इस्माइल पटेल ने दावा किया कि रात को भीड़ ने घर लौटते समय पकड़ कर मारपीट की और जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया। वहीं न केवल पुलिस बल्कि इमरान को बचाने वाले चश्मदीद ने भी उसके दावे की तस्दीक करने से साफ़ मना कर दिया है। पुलिस के अनुसार यह एक निजी रंजिश के चलते हुई हाथापाई थी

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि न केवल ‘हमसे जय श्री राम बुलवाया जा रहा है’ के दावों की बाढ़ आ रही है, बल्कि अधिकाँश दावे गलत भी साबित हो रहे हैं? अगर दावे सही साबित होते तो माना जा सकता था कि चाहे किसी के बहकावे में, चाहे हिन्दूफ़ोबिक राज्य-व्यवस्था से ऊबकर हिन्दू भड़क उठे हैं। लेकिन चूँकि लगभग सारे दावे भी गलत साबित हो रहे हैं, तो ऐसा भी नहीं है।

तो कारण आखिर है क्या?

एक कारण यह हो सकता है कि हिंसा-पीड़ितों को यह सुस्त और निकम्मी पुलिस और प्रशासन व्यवस्था को हरकत में लाने का आसान तरीका दिख रहा हो। ऐसे तो न पुलिस किसी की गाड़ी को टक्कर लगने या किसी के साथ मारपीट होने की FIR भी लिखने वाली, जाँच तो दूर की बात है। लेकिन अगर वही पीड़ित “हाय, मुझे मेरी मर्ज़ी के खिलाफ ‘जय श्री राम’ बोलने के लिए मजबूर किया गया” रो दे, तो हिन्दुओं को दुष्ट, साम्प्रदायिक दानव के रूप में दिखाने के लिए तैयार बैठे मीडिया गिद्ध उसके केस को चमका देंगे, ‘ऊपर’ से प्रेशर होगा और पुलिस मामला तेजी से निपटाने के लिए मजबूर हो जाएगी।

दूसरा कारण ऐसे आरोपों के उफनने का यह है कि लिबरल गैंग के पास हिन्दुओं के खिलाफ बोलने के लिए और कोई आधार नहीं बचा है। न ही कोई हनुमान चालीसा पढ़ते हुए छाती पर बम बाँधकर धमाके कर रहा है, न ही ‘जय श्री राम’ बोलकर कहीं 26/11, 9/11 जैसे हमले कर रहा है। साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ चल रहे मामलों की दिशा भी उनके बाइज़्ज़त बरी होने की दिशा में बढ़ती दिख रही है। ऐसे में हिन्दू आतंकवाद का शिगूफ़ा छेड़ने के लिए कुछ तो चाहिए। बम धमाके न सही, ‘ज़बरदस्ती जय श्री राम बुलवाया जा रहा है’ ही सही! बंदूक लेकर कथित हिन्दू आतंकवादी सड़कों पर भले नहीं उतर रहे, लेकिन लोगों को बीफ़ करी खाने भी तो नहीं मिल रही!

ऐसे में सवाल उठता है कि पुलिस आखिर क्या कर रही है इस झूठे नैरेटिव को काटने के लिए। आज हर जिले की पुलिस का अपना ट्विटर अकाउंट है, जो अमूमन ट्विटर द्वारा ब्लू-टिक से सत्यापित भी किया होता है। क्यों नहीं किसी भी मामले में साम्प्रदायिक एंगल न होने की बात पक्के तौर पर स्थापित होते ही जिले/राज्य की पुलिस का अकाउंट कुछ शब्दों का ट्वीट या एक दस से तीस सेकंड का वीडियो डाल ऐसी बातों का खण्डन कर देता है? अगर पुलिस सोशल मीडिया में आ रही खबरों के आधार पर किसी अपराध का स्वतः-संज्ञान लेने का अधिकार रखती है तो किसी भी समुदाय के खिलाफ दुर्भावनावश या निहित स्वार्थ के अंतर्गत चलाए जा रहे नैरेटिव को तोड़ने के लिए ऐसा ट्वीट करना पुलिस की जिम्मेदारी क्यों नहीं है?

JNU महिला प्रोफेसर का आरोप – मुस्लिम होने के कारण किया जा रहा है प्रताड़ित

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ मुस्लिम महिला प्रोफेसर ने शिकायत की है कि उन्हें मुस्लिम होने के कारण प्रताड़ित किया जा रहा है। जिसके बाद दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने मामले पर संज्ञान लिया और जेएनयू के रजिस्ट्रार को नोटिस भी जारी किया है

आयोग के मुताबिक प्रोफेसर ने जेएनयू प्रशासन पर उत्पीड़न का आरोप लगाने के साथ सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल एक्सक्लूजन एंड इनक्लूसिव के निदेशक पर भी उत्पीड़न का आरोप लगाया है।

महिला प्रोफेसर का आरोप है कि अप्रैल 2019 से बिना कोई कारण उनका वेतन रोक दिया गया है। साथ ही उन्हें पीएचडी और एमफिल के छात्रों का सुपरवाइजर भी नहीं बनाया जा रहा है, जबकि बहुत से छात्र ऐसे हैं जो उन्हें सुपरवाइजर चुनना चाहते हैं।

महिला प्रोफेसर ने वीसी पर आरोप लगाते हुए कहा है कि उनके साथ ये सब वीसी की मिलीभगत से हो रहा है। उन्हें पिछले कुछ समय से प्रशासनिक बैठकों में भी नहीं बुलाया जा रहा है। साथ ही उन्हें उनका ऑफिशियल ई-मेल भी इस्तेमाल करने पर रोका जा रहा है।

इसके अलावा उनकी शिकायत है कि यूनिवर्सिटी स्थित आवास खाली करने के लिए भी उनपर दबाव बनाया जा रहा है। प्रोफेसर के मुताबिक उनके साथ ये सब सिर्फ़ उनके मुस्लिम होने के कारण किया जा रहा है।

इस मामले पर जेएनयू अधिकारियों ने महिला प्रोफेसर के आरोपों को खारिज किया है और बताया है, “2013 में यूजीसी के योजनाबद्ध परियोजना के तहत महिला ने जेएनयू ज्वाइन किया था, वे यहाँ स्थायी कर्मचारी नहीं हैं।” विश्वविद्यालय के अधिकारियों की मानें तो महिला की सैलरी विश्वविद्यालय उन्हें नहीं देता बल्कि उनकी सैलरी यूजीसी के जरिए आती थी। इसलिए यूजीसी द्वारा सैलरी रिलीज न करने के कारण उनको उनका वेतन नहीं मिला था, लेकिन अब जब यूजीसी ने सैलरी जारी कर दी है तो उनकों उनका वेतन दे दिया गया है।

गौरतलब है महिला प्रोफेसर इससे पहले हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में 4 साल पढ़ा चुकी हैं। उनका कहना है कि वो बहुत परेशान है क्योंकि इससे पहले भी उन्हें वेतन के लिए लड़ाई लड़नी पड़ी थी, जिसके कारण वे हाईकोर्ट तक पहुँच गई थी। बाद में उन्हें उनका वेतन मिलना शुरू हुआ था।

इस मामले पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने जेएनयू प्रशासन को नोटिस जारी किया और उनसे 1 अगस्त तक जवाब माँगा है। आयोग का कहना है कि महिला प्रोफेसर उत्पीड़न से इतनी त्रस्त हो चुकी हैं कि उनके मन में कई बार आत्महत्या का भी ख्याल आया है।

मज़हबी कार्यों की आड़ में आतंकी स्लीपर सेल बनाने की चल रही थी साजिश, NIA ने दर्ज किया चार्जशीट

पाकिस्तान द्वारा जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद को गिरफ्तार किए जाने के कुछ ही दिन बाद, भारत की राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने सईद पर शिकंजा कसते हुए कहा कि लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक ने आतंकवादी संगठन के स्लीपर सेल की स्थापना के लिए देश में एक विशाल हवाला नेटवर्क बनाया था। NIA ने शुक्रवार (जुलाई 19, 2019) को फलाह-ए-इन्सानियत फाउंडेशन (FIF) से जुड़े तीन आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दायर किया। ये आरोपित खूंखार आतंकवादी हाफिद सईद के कहने पर दिल्ली और हरियाणा में स्लीपर सेल और लॉजिस्टिक बेस बनाने में शामिल था।

जाँच एजेंसी ने आरोपित मोहम्मद हुसैन मोलानी के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया। NIA द्वारा की गई जाँच में पता चला कि फलाह-ए-इन्सानियत फाउंडेशन के प्रमुख हाफिज मोहम्मद सईद के साथ-साथ उप प्रमुख शाहिद महमूद ने दिल्ली और हरियाणा में मज़हबी कार्यों की आड़ में 2012 में स्लीपर सेल और लॉजिस्टिक बेस बनाने की साजिश रची थी। NIA के मुताबिक, उन्होंने मस्जिद का निर्माण, धार्मिक शिक्षा के लिए मदरसा और समुदाय विशेष की गरीब लड़कियों की शादी के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने जैसे धार्मिक काम की आड़ में अपनी साजिश में अंजाम देने की साजिश रची थी।

आरोपित मोहम्मद सलमान, मोहम्मद सलीम उर्फ मामा और पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद कामरान के खिलाफ आईपीसी की धारा 120 बी और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 17, 20 और 21 के तहत मामला दर्ज किया गया है। मोहम्मद कामरान फिलहाल फरार है।

एजेंसी ने बताया कि, इस साजिश को अंजाम देने के लिए शाहिद महमूद ने अपने सहयोगी मोहम्मद कामरान को दुबई स्थित एक पाकिस्तानी नागरिक को पाकिस्तान से दुबई और फिर हवाला चैनलों के माध्यम से भारत भेजने का काम सौंपा था और फिर उससे मज़हबी विचार वाले भारतीयों की पहचान करने के लिए कहा गया था, जिन्हें मस्जिद के निर्माण, मदरसा में शिक्षा, मजहब की लड़कियों की शादी के नाम पर पैसे देकर इसमें फँसाया जा सके।

इनका उद्देश्य इन्हें फँसाकर इनका इस्तेमाल स्लीपर सेल और ठिकाने बनाने के लिए किया जाना था। इसके लिए मोहम्मद कामरान ने दुबई के कुछ भारतीयों की पहचान भी की थी, जिनमें नई दिल्ली के एक मोहम्मद सलमान शामिल था। जाँच एजेंसी ने कहा कि उसने मज़हबी कार्यों के नाम पर अवैध रूप से हवाला के जरिए बड़ी रकम ट्रांसफर करनी शुरू भी कर दी थी।

हरियाणा के पलवल जिले के उत्तावर में खुल्फा-ए-रशीदीन मस्जिद के निर्माण और समुदाय विशेष की लड़कियों की शादी के लिए मोहम्मद सलमान को दुबई से मोहम्मद कामरान से बड़ी रकम दी थी। जाँच एजेंसी ने कहा कि आरोपितों हाफिज मोहम्मद सईद, शाहिद महमूद, मोहम्मद आरिफ गुलामबाशिर धरमपुरिया और मोहम्मद हुसैन मोलानी के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 173 (8) के तहत आगे की जाँच जारी है।