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कर्नाटक हाई कोर्ट में धर्म परिवर्तन? इस्लामी संगठन ने जजों और वकीलों के बीच बाँटी कुरान

क्या विडंबना है! जिस दिन राँची की एक अदालत हिंदू लड़की ऋचा भारती को ज़मानत के लिए क़ुरान की 5 प्रतियाँ वितरित करने का आदेश देती है, ठीक उसी दिन लगभग 2000 किलोमीटर दूर भारत के ही एक राज्य कर्नाटक में इस्लामी धर्मांतरण का प्रयास किया जा रहा होता है। वो भी कहाँ, किसी मुहल्ले, बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर नहीं… कोर्ट में, सरकारी संस्थानों में!

कर्नाटक में सलाम सेंटर नामक एक इस्लामिक संगठन है। यह ‘दवाह (Dawah)’ के लिए मशहूर है। दवाह मतलब वो इस्लामी प्रथा जिसमें गैर-मुस्लिमों को इस्लाम अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। सलाम सेंटर की वेबसाइट के अनुसार, “वह कुरान गैर-मुस्लिम भाइयों और बहनों के बीच बाँटने का काम करता है। इसने हजारों लोगों के बीच इस्लाम, कुरान और पैगंबर मुहम्मद (PBUH) का प्रचार-प्रसार किया है।”

वेबसाइट में यह भी कहा गया है, “डॉक्टर्स, पुलिस अधिकारियों, शिक्षकों, अधिवक्ताओं, न्यायाधीशों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, आईटी प्रोफेशनल्स जैसों के बीच ‘कुरान सबके लिए’ का संदेश देने में उनका अभियान बेहद सफल रहा है।”

सलाम सेंटर के संस्थापक और चेयरमैन सैयद हामिद मोहसिन ने कर्नाटक हाई कोर्ट में भी ‘दवाह (Dawah)’ किया और अदालत के भीतर वकीलों के साथ-साथ न्यायाधीशों को भी कुरान की प्रतियाँ बाँटीं। वह अपनी वेबसाइट पर कहते हैं, “कर्नाटक उच्च न्यायालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में कुरान वितरण के सफल कार्यक्रम के बाद मैंने यह सोचा कि क्यों न कुरान को व्यक्तिगत रूप से न्यायाधीशों और वकीलों को उनके कार्यालयों में जाकर पेश किया जाए। इस संबंध में जब मैंने कुछ मुस्लिम वकीलों के साथ चर्चा की, तो उन्होंने भी इस आइडिया पर सहमति जताई। हालाँकि कुरान की प्रतियों को न्यायाधीशों के कार्यलय में जाकर बाँटना कोई आसान काम नहीं है लेकिन मैंने चुनौती स्वीकारते हुए कहा, “कोशिश करनी चाहिए। यह अल्लाह का काम है, और अल्लाह निश्चित रूप से इस काम में हमारी मदद करेगा।”

बेंगलुरु के सिटी सिविल कोर्ट में वकीलों के बीच कुरान वितरण

मोहसिन ने हाई कोर्ट के जजों के साथ मीटिंग की पूरी कहानी वेबसाइट पर लिख रखी है। मोहसिन के अनुसार, जजों के साथ उनकी मीटिंग 12 दिनों तक चली। वह लिखते हैं, “माननीय न्यायाधीशों ने जब हमारे हाथों में कुरान देखा तो वे सम्मानपूर्वक उठ खड़े हुए, गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। हमने उन्हें कुरान, पैगंबर मुहम्मद के जीवन पर एक किताब, मूल इस्लामी साहित्य और कुरान की डीवीडी दी। उन्होंने आदरपूर्वक हमें अपने बगल में बैठने की पेशकश की। उन्होंने बड़े ही सम्मान के साथ हमारे दिए उपहार को खोला और तुरंत कुरान पढ़ना शुरू कर दिया। फिर वे कुरान, पैगंबर मुहम्मद, इस्लाम पर बातचीत करने लगे।”

कोर्ट के पुस्तकालय में भी कुरान दिया गया। मोहसिन के अनुसार कुरान अब तक कोर्ट पुस्तकालय में नहीं थी। कई वकीलों और कोर्ट में कार्यरत कई अन्य अधिकारियों को भी कुरान वितरित की गई।

एक वकील ने मोहसिन को कुरान के बारे में कुछ बताया, उसे भी वेबसाइट पर मजेदार ढंग से डाला गया है। वकील ने कहा, “मैंने पाँच दिन पहले आपसे कुरान प्राप्त किया था और इसे पढ़ गया। मुझे इसमें हिंदुओं के खिलाफ कुछ भी नहीं मिला। जबकि हमें बताया गया था कि कुरान में केवल हिंदुओं के खिलाफ जहर है। हमें यह भी बताया गया था कि कुरान हिंदुओं के खिलाफ जिहाद के लिए कहता है। लेकिन कुरान में इस तरह का कुछ भी नहीं है। इसे पढ़ने के बाद मेरी गलतफहमी दूर हो गई है। अब मैं कुरान का गंभीरता से अध्ययन करूँगा और दूसरों की गलतफहमी को दूर करने की कोशिश करूँगा।”

मोहसिन ने अपनी वेबसाइट पर कुरान को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट के गैर-मुस्लिम जजों द्वारा कही गई बातों को भी बड़े अनोखे अंदाज में लिख रखा है। इनमें से एक जज ने मोहसिन को बताया, “हाँ, मैं कुरान पढ़ना चाहता हूँ ताकि जान सकूँ कि अल्लाह ने पूरी मानवता को क्या संदेश दिया है। अगर कुरान में सभी मानवों के लिए संदेश है तो आपने इसे अब तक मानवता से दूर क्यों रखा?”

एक अन्य जज ने मोहसिन से कहा, “मैं पिछले 10 वर्षों से देख रहा हूँ कि इस्लाम और मुस्लिमों पर अत्याचार का स्तर बढ़ा है। अब इन अत्याचारों के निवारण के लिए आपको अगले 10 वर्षों तक कुरान को लोकप्रिय बनाना होगा। यह लगातार बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए। अन्यथा मुस्लिमों के लिए हालात बदतर हो सकते हैं।”

यह बहुत आश्चर्यजनक है कि इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए कर्नाटक हाई कोर्ट ने इजाजत दे दी और वो भी अपने ही यहाँ, जजों-वकीलों के बीच! वो भी तब जब भारतीय न्यायपालिका हमारे संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप की दुहाई बार-बार देती है।

सलाम सेंटर के चेयरमैन सैयद हामिद मोहसिन पैगंबर मुहम्मद पर कन्नड़ भाषा में लिखी पुस्तक कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को देते हुए (फोटो साभार: salaamcentre.in)

मोहसिन ने तो अपनी वेबसाइट पर यह भी दावा किया है कि वह कर्नाटक विधान परिषद में भी ‘दवाह (Dawah)’ कर चुका है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को कुरान देते हुए अपनी फोटो उसने वेबसाइट पर भी डाली है।

सलाम सेंटर ने तो यहाँ तक कहा है कि उसने पुलिस विभागों में भी ‘दवाह (Dawah)’ करवाया है। एक जगह वेबसाइट पर लिखा गया, “सलाम सेंटर ने कर्नाटक राज्य पुलिस कर्मियों को पवित्र कुरान का संदेश देकर एक और उपलब्धि हासिल कर ली है। बहुत सकारात्मक परिणाम होने की संभावना है। इंशा अल्लाह!” और हाँ, केवल पुलिस विभाग ही नहीं, सलाम सेंटर कर्नाटक राज्य आंतरिक सुरक्षा खुफिया विभाग के मुख्यालय में भी कुरान वितरित कर चुकी है।

पुलिस कमिश्नर को कुरान देते हुए

मौजूदा क़ानूनों को देखें तो मोहसिन की कार्रवाई अवैध नहीं है। लेकिन यह वास्तव में चिंता का विषय जरूर है कि कथित रूप से धर्मनिरपेक्ष संस्थानों को धर्म परिवर्तन (या कम से कम प्रचार-प्रसार) के लिए लक्षित किया जा रहा है। इसके अलावा, यह अस्थिर जनसांख्यिकी अराजकता को जन्म देती है। ऐसी परिस्थितियों में, न केवल ईसाइयों बल्कि समुदाय विशेष द्वारा भी धर्मांतरण के लिए हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है।

कुलभूषण जाधव: आज आएगा ज़िंदगी-मौत पर फ़ैसला, जानिए इतिहास

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में आज कुलभूषण जाधव मामले पर फैसला आना है। 2016 में ईरान से अगवा कर पाकिस्तान ने उन्हें भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के लिए जासूसी के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई थी, जिसे रोकने के लिए भारत सरकार ने हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अपील की थी। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने पाकिस्तान को निर्देश दिया था कि उसके अंतिम निर्णय पर पहुँचने तक कुलभूषण जाधव की सज़ा पर अमल न किया जाए।

गिरफ़्तारी की जगह पर ही प्रश्नचिह्न

पाकिस्तान का दावा है कि उसने पूर्व नेवी अफ़सर जाधव को बलूचिस्तान में पकड़ा। भारत लगातार इसका खंडन करता रहा है। भारत का कहना है कि जाधव को पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI ने ईरान से अगवा किया था। पाकिस्तान में उन पर सैन्य अदालत में मुकदमा चलाकर 2017 के अप्रैल में जासूसी और आतंकवाद के जुर्म में मौत की सज़ा सुनाई थी।

कब क्या हुआ

25 मार्च, 2016: पाकिस्तानी अधिकारी भारत को जाधव की गिरफ़्तारी की सूचना एक प्रेस रिलीज़ के ज़रिए देते हैं। भारत ने उसी दिन जाधव तक भारतीय दूतावास का कॉन्सुलर एक्सेस (दूतवासीय पहुँच, जोकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का नियम और शिष्टाचार दोनों है) देने की माँग पाकिस्तान के सामने रखी।

30 मार्च, 2016: भारत ने पाकिस्तान को अपनी कॉन्सुलर एक्सेस माँग की याद दिलाई। एक बार नहीं, 14 बार।

7 दिसंबर, 2016: पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री सरताज अज़ीज़ ने भी माना कि कुलभूषण जाधव के खिलाफ पाकिस्तानी अदालत में पेश सबूत पक्के नहीं हैं। लेकिन उसी दिन पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर यह दावा भी कर दिया कि सरताज अज़ीज़ द्वारा ऐसा बयान दिए जाने की बात ही गलत है।

6 जनवरी, 2017: पाकिस्तान ने नए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटरस को डोज़ियर सौंपने का दावा किया, जो अपने देश को “अस्थिर” करने के लिए भारतीय हस्तक्षेप पर था।

10 जनवरी, 2017: पाकिस्तानी सेना की इंटर-सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशन्स (ISPR) ने प्रेस रिलीज़ जारी कर जाधव को मृत्युदण्ड सुनाए जाने की सूचना दी।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पहुँचा भारत

मई, 2017: भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जाधव तक कॉन्सुलर एक्सेस न देने को लेकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ याचिका दायर की और सैन्य अदालत के फैसले को चुनौती दी। 15 मई, 2017 को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने भारत और पाकिस्तान की दलीलें सुनने के बाद मामला सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने भारत का पक्ष रखा। 18 मई को अदालत ने अपने अंतिम फैसले तक के लिए कुलभूषण को सुनाई गई सज़ा को स्थगित कर दिया। भारत ने विएना कन्वेशन के नियमों के गंभीर उल्लंघन का आरोप पाकिस्तान पर लगाया। भारत के अनुसार विएना कन्वेंशन के अनुच्छेद 36 के दिशा-निर्देश के मुताबिक़ कॉन्सुलर एक्सेस हर मामले में आवश्यक है, चाहे जासूसी के आरोप ही क्यों ना हों।

17 अप्रैल, 2018: भारत ने अपने पक्ष में दूसरे दौर की दलीलें रखीं।

7 जुलाई, 2018: पाकिस्तान ने भारत के आरोपों पर अपना प्रत्युत्तर अदालत में जमा किया।

20 नवम्बर, 2018: तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कुलभूषण तक राजनयिक पहुँच (डिप्लोमेटिक एक्सेस) की माँग की।

19 फरवरी, 2019: अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कुलभूषण मामले की खुली अदालत में सुनवाई शुरू की। भारत की माँग मृत्यु दण्ड को ख़ारिज करने और जाधव की तत्काल रिहाई की थी। भारत के अनुसार पाकिस्तान ने ठोस सबूत पेश करना तो दूर, सामान्य न्यायिक प्रक्रिया का भी पालन इस मामले में नहीं किया। अपना पक्ष रखते हुए भारत ने दावा किया कि एक तथाकथित कबूलनामे के अलावा पाकिस्तान के पास जाधव के ख़िलाफ़ कोई भी सबूत नहीं है। जाधव की पहचान और राष्ट्रीयता के सवाल पर भारत ने कहा कि उसका पूर्व नेवी अफसर होने की पहचान ही राष्ट्रीयता का सबूत है। कसाब समेत पाकिस्तान द्वारा अपने आतंकियों की लाशों को स्वीकार करने से इंकार पर तंज कसते हुए साल्वे ने यह भी कहा कि भारत के नागरिक ऐसे नहीं होते की सरकार को उनकी नागरिकता नकारने की ज़रूरत पड़े, और न ही भारत विदेशी ज़मीन पर फँसे अपने नागरिकों को नकारता है

ऋचा भारती को आप ने कहा क़ुरान बाँटो, उसे ‘रंडी साली’, ‘फक योर सिस्टर’ कहने वाले क्या बाँटें मी लॉर्ड?

आजकल कोर्ट ऐसे-ऐसे विचित्र फ़ैसले दे रही है कि या तो आपकी भाषा पर से नियंत्रण हट जाएगा या आपको उनकी समझदारी पर शक होने लगेगा। संविधान में अभिव्यक्ति की आज़ादी है। लेकिन ये किस समय, किसके पक्ष में इस्तेमाल होगा, ये कोई नहीं जानता। आम आदमी फेसबुक पर बहुत सारी बातें लिखता है और वो बातें बहुत अच्छी से लेकर बहुत खराब के रेंज में हो सकती हैं। लिखने वाले अलग-अलग परिस्थितियों में, अलग तरीक़ों से व्यवहार करते हैं। अभिव्यक्ति भी बदल जाती है, शब्द बदल जाते हैं।

हाल ही में ऋचा भारती को कोर्ट ने विचित्र सजा सुनाई। ऋचा ने फेसबुक पर रोहिंग्या आदि के ख़िलाफ़ कुछ ‘आपत्तिजनक’ पोस्ट शेयर किए थे। किसी की भावनाएँ आहत हुईं और केस कर दिया। आरोपित की गिरफ़्तारी हुई तो आरोपित ने बेल का आवेदन दिया। कोर्ट ने ऋचा को बेल तो दिया लेकिन एक शर्त पर कि वो शिकायतकर्ता, यानी अंजुमन कमिटी, समेत चार पुस्तकालयों में क़ुरान की प्रतियाँ बाँटे। ऋचा ने बाद में इस शर्त पर आपत्ति जताई कि ये आदेश अटपटा है और उसके मौलिक अधिकारों का हनन है। साथ ही, ऋचा ने यह भी कहा कि जिन लोगों ने पोस्ट लिखा वो बाहर हैं और एक नागरिक के तौर पर रोहिंग्याओं के भारत में घुसने पर उसे अपनी बात रखने का हक है।

आगे क्या होगा, ये तो कोर्ट का मसला है लेकिन ऐसे मौक़ों पर फ़्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन पर चर्चा ज़रूरी है। कोर्ट चाहे तो आदर्शवादी बन कर यह नकार दे कि आम लोग आम जीवन में गाली देते हैं, लिखते हैं, और बातचीत का हिस्सा बनाते हैं। हर दी हुई गाली से किसी न किसी की भावनाएँ आहत होंगी ही। गाली देना गलत बात है, लेकिन यह बात भी तय है कि पुलिस और प्रशासन चाह कर भी ऐसा करने वाले सारे लोगों को जेल में नहीं डाल सकती। अब तर्क यह आएगा कि जो बात कोर्ट के सामने आएगी वो उसी पर फ़ैसला देगी। सही बात है, लेकिन एक केस के सारे बिंदुओं पर तो न्यायिक दंडाधिकारी अपनी बात रखेंगे न?

उसी पोस्ट पर जो ऋचा के साथ हुआ वो न तो अंजुमन कमिटी को दिखा न कोर्ट को। अंजुमन इस्लामिया अगर स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण का ध्यान रखती है तो उसे ऋचा के साथ-साथ उन लोगों पर भी केस करना चाहिए था जो समुदाय विशेष वाले नाम हैं और उस लड़की को ‘रंडी साली ऋचा’ कह रहे हैं और उसको बहन के रेप की धमकी दे रहे हैं। हो सकता है अंजुमन इस्लामिया वालों को ‘फक योर सिस्टर’ का या ‘तेरी माँ मेरी रखैल’ आदि का मतलब मालूम न हो, लेकिन कोर्ट के जजों को तो ज़रूर पता होगा कि इन शब्दों से एक लड़की की ‘मोडेस्टी आउटरेज’ होती है। और यह क़ानूनन जुर्म है। लेकिन कोर्ट भी लैंडमार्क जजमेंट देने के चक्कर में कमेंट पढ़ना भूल गई होगी क्योंकि मर्डर, रेप, डकैती, किडनैपिंग से लेकर लाखों केस अदालतों में लंबित हैं तो रह गया होगा। बस अब जज साहब यह न कह दें कि ‘हुआ सो हुआ’।

ऐसे मुद्दों पर कोर्ट की अवमानना से लेकर कई ऐसी बातें होती हैं कि आप बहुत कुछ चाह कर भी नहीं लिख सकते। क़ानूनी दायरे में तो ऐसी सजा या शर्तों का प्रावधान है लेकिन क़ानूनी दायरे में किसी विदेशी शरणार्थी (जो कि कई बार ग़ैरक़ानूनी कार्यों में लिप्त पाए जाते रहे हैं) के ख़िलाफ़ टिप्पणी करने से पहले शायद इस बात पर ध्यान जाना चाहिए कि इसी देश का नागरिक, इसी देश की एक लड़की को ‘रंडी साली’ कहता है और उसकी बहन के बलात्कार की धमकी देता है। रोहिंग्याओं और बढ़ती जनसंख्या एक समस्या है, और हर आदमी, अपने शब्दों में उस पर चर्चा करने को स्वतंत्र है। इन समस्याओं पर समग्र चर्चा की आवश्यकता है और सोशल मीडिया जैसे अनौपचारिक माध्यमों पर भी अगर व्यक्ति खुद को अभिव्यक्त न कर पाएगा तो जाएगा कहाँ?

ऐसे में तो फिर सरकारों द्वारा की गई हर गिरफ़्तारी जायज हो जाएगी! या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी फर्जी सेकुलरों वाला रोग लग गया है कि अगर पत्रकारिता के गिरोह विशेष के सदस्य की गिरफ़्तारी होगी तो आसमान सर पर उठा लिया जाएगा लेकिन उसके बाहर के लोग पकड़े जाएँगे तो कहा जाएगा कि ‘इस तरह के जहर फैलाने वाले व्यक्ति की गिरफ़्तारी बिलकुल सही है’। ये तो दोगलापन है, भले ही बुद्धिजीवियों में यह आज कल ज्यादा प्रचलन में है। आज अभिव्यक्ति पर हमला मानने वाले अचानक से चुप क्यों हैं? क्या कमेंट में ‘रंडी साली ऋचा’ लिखने वाले मजहबी नाम वाले व्यक्ति को वही कोर्ट रामायण पढ़ने और बाँटने की सलाह दे तो भी क्या यही प्रतिक्रिया रहेगी? क्या उस मामले में कोर्ट संघी नहीं हो जाएगा? क्या तब यह नहीं कहा जाएगा कि सरकार कोर्ट पर दबाव डाल रही है?

यही दुर्भाग्य है कि कोर्ट की हिम्मत नहीं होती समुदाय विशेष के मामले में यही विवेकशील निर्णय देने की। इस देश की संस्थाओं ने बार-बार यह साबित किया है कि समुदाय विशेष के मामले उनके निजी और मज़हबी मसले हो जाते हैं जबकि हिन्दुओं के मंदिरों की संपत्ति से लेकर उनके विवाह में कितने लोग पहुँचें, दीवाली पर कितने पटाखे फोड़े जाएँ, होली में कितना पानी बहाया जाए, दही हांडी की ऊँचाई कितनी हो – यह सब कोर्ट और सरकार तय करती है।

ISIS-अलकायदा से जुड़ा जिहादी धर्म प्रचारक मुल्ला क्रेकर गिरफ्तार

इराक-कुर्द मूल के विवादित कट्टरपंथी धर्म प्रचारक मुल्ला फ़तेह क्रेकर को नॉर्वे ने गिरफ्तार कर लिया है। नॉर्वे ने उसे इतालवी अधिकारियों के अनुरोध पर गिरफ्तार किया है। इटली ने उसे आतंकी साजिश रचने का दोषी ठहराया है।

वर्ष 1991 से नार्वे में शरणार्थी के रूप में रहने वाले क्रेकर (63 साल) पर इटली ने ‘रावती शाक्स’ (Rawthi Shax) संगठन चलाने का आरोप लगाया है। ‘रावती शाक्स’ ऐसा नेटवर्क है, जिसके तार इस्लामिक स्टेट समूह (ISIS) से जुड़े हैं और इस पर पश्चिमी देशों पर हमले की साजिश रचने का भी इल्जाम है। क्रेकर के संगठन के सम्बन्ध अलकायदा के नेताओं के साथ भी हैं।   

नॉर्वे ने इराक-कुर्द मूल के विवादित कट्टरपंथी प्रचारक मुल्ला क्रेकर को गिरफ्तार किया है

क्रेकर का असली नाम नजामुद्दीन अहमद फराज है। उत्तरी इटली के बोल्ज़ानो में एक अदालत ने उसकी गैरमौजूदगी में सोमवार (जुलाई 15, 2019) को उसे आतंकवाद की साजिश के लिए 12 साल की सजा सुनाई। मुल्ला क्रेकर के पाँच अन्य साथियों को भी सजा सुनाई गई है। क्रेकर के अलावा, दो अन्य अपराधी नॉर्वे में रहते हैं, जबकि अन्य तीन इंग्लैंड में रह रहे हैं।

पश्चिम बंगाल: हनुमान चालीसा पढ़ रहे लोगों को पुलिस ने पीटा, राम के बाद हनुमान पर भी नजर टेढ़ी

ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल में ‘जय श्री राम’ बोलने के लिए लोगों को जेल भेजने के बाद अब ममता बनर्जी की पुलिस के निशाने पर बजरंग बली आ गए हैं। हावड़ा के डॉब्सन रोड पर मंगलवार को ऐसा ही कुछ देखने को मिला। पुलिस पर यहॉं हनुमान चालीसा पढ़ रहे लोगों को पीटने का आरोप है।

राज्य के एक भाजयुमो कार्यकर्ता के हवाले से एएनआई ने बताया है, “हम हर मंगलवार की तरह हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। अचानक पुलिस आई और गालियाँ देने लगी। हमारे साथ मारपीट भी की गई।” सार्वजनिक जगहों पर नमाज अता करने पर पाबंदी की मॉंग को लेकर बीते कुछ हफ्तों से हर मंगलवार को भाजयुमो के कार्यकर्ता शहर के हनुमान मंदिर के पास की सड़क पर सार्वजनिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं। इसमें स्थानीय लोगों खासकर, बच्चों और महिलाओं की भी अच्छी-खासी भागीदारी देखने को मिल रही है।

बीते सप्ताह हावड़ा के एसी मार्केट स्थित हनुमान मंदिर के करीब पाठ किया गया था। इसके कारण सड़क पर करीब एक घंटे तक आवागमन बंद रहा।

भाजयुमो का कहना है कि जब समुदाय विशेष हर शुक्रवार को नमाज के नाम पर सड़क बंद कर सकते हैं और प्रशासन उन्हें नहीं रोकता तो हम हनुमान चालीसा का पाठ सड़क पर क्यों नहीं कर सकते। मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश ने बीते दिनों कहा था कि जब तक उनकी माँग नहीं मानी जाती युवा मोर्चा के कार्यकर्ता हर मंगलवार को हावड़ा के विभिन्न मार्गों पर स्थित हनुमान मंदिर के करीब पाठ करेंगे। उन्होंने कहा था कि सड़क पर जुमे की नमाज अता किए जाने के कारण हावड़ा का जीटी रोड बंद हो जाता है। इसके कारण होने वाली अव्यवस्था और ट्रैफिक जाम की वजह से लोगों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती है। खासकर, मरीजों को अस्पताल और कामकाजी लोगों को दफ्तर पहुँचने में।

उन्होंने कहा था, “ममता बनर्जी की सरकार बनने के बाद से जुमे की नमाज के कारण जीटी रोड और अन्य मुख्य सड़कें बंद हो जाती है। इसके कारण मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं और लोग समय से दफ्तर नहीं पहुँच पाते। जब तक इस पर पाबंदी नहीं लगती, हम सभी मुख्य मार्गों पर स्थित हनुमान मंदिर के करीब हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे।” बता दें कि ममता बनर्जी के अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के ख़िलाफ़ बंगाल भाजपा काफ़ी समय से मुखर है।

वहीं, सड़क पर नमाज से न केवल आम लोगों को परेशानी होती है, बल्कि यह प्रशासन के लिए भी बड़ा सिरदर्द है। यही कारण है कि हरियाणा में हिंदू संगठन सार्वजनिक जगहों पर नमाज अता किए जाने पर प्रतिबंध लगाने की माँग कर रहे हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी इसकी आलोचना करते हुए कह चुके हैं कि नमाज मस्जिदों में अता की जानी चाहिए न कि सार्वजनिक जगहों पर। बीते साल मद्रास हाईकोर्ट ने भी कहा था कि प्रार्थना के लिए सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

बीते साल दिसंबर में नोएडा पुलिस ने सेक्टर 58 में स्थित कंपनियों को एक एडवाइजरी नोटिस जारी करते हुए कहा था कि वे अपने कर्मचारियों को नजदीक के पार्कों में नमाज अता करने से रोकें। पुलिस ने इस बात पर जोर दिया था कि कंपनी के कर्मचारी अपने दफ्तर या मस्जिद में नमाज अता करें न कि सार्वजनिक जगहों पर।

हाँ, प्रतीक सिन्हा! चंद्रयान 2 की लॉन्चिंग से पहले ISRO अध्यक्ष फिर पूजा करेंगे

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) 15 जुलाई को अपने दूसरे चंद्र मिशन, चंद्रयान-2 को लॉन्च करने वाला था। लेकिन, लॉन्चिंग के तकरीबन 1 घंटे पहले इस मिशन को रोक दिया गया। इसरो ने तकनीकी खामी की वजह से प्रक्षेपण टालने का फैसला किया।

हालाँकि, रॉकेट का प्रक्षेपण इसरो के लिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन, चंद्र मिशन एक जटिल प्रक्रिया है। चंद्रयान 2 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र पर उतरता, जिसका इससे पहले किसी अन्य देश ने कभी प्रयास नहीं किया है। इस मिशन में, छोटी सी चूक की वजह से पैसे और संसाधनों की भारी बर्बादी हो सकती थी। इसलिए जल्दबाजी में लॉन्च करके मिशन को संकट में डालने से बेहतर उसे टालना था।

चंद्र मिशन की अपेक्षा अगर कुछ और ज्यादा पेचीदा है तो वह है ट्विटर पर इससे सम्बंधित प्रतिक्रियाएँ! इसरो के अध्यक्ष के शिवन ने चंद्रयान के लॉन्चिंग के 2 दिन पहले यानी, 13 जुलाई को तिरुमला मंदिर में मिशन की सफलता के लिए पूजा-अर्चना की थी। मिशन के टलने के बाद कुछ लोग ट्विटर पर सिवन की पूजा पर प्रतिक्रिया देने से खुद को रोक नहीं सके और बेतुकी बातें करनी शुरू कर दीं।

इन्हीं में से एक नाम है प्रतीक सिन्हा का! फैक्ट चेक के नाम पर प्रोपेगैंडा रचने वाली वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने ट्वीट किया कि क्या इसरो के चेयरमैन फिर से दूसरी बार चंद्रयान के प्रक्षेपण से पहले प्रार्थना करेंगे? उन्होंने उपहास करते हुए लिखा कि पहली बार के प्रार्थना का तो निश्चित तौर पर कोई प्रभाव नहीं दिखा।

प्रतीक सिन्हा के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

हालाँकि, कुछ लोगों ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि इसरो चीफ किसी भी प्रक्षेपण से पहले तिरुमला मंदिर में जाकर प्रार्थना करते हैं। ये वो काफी सालों से करते आ रहे हैं। लेकिन सिन्हा की नज़र में इनमें से कोई भी तर्क मायने नहीं रखता, क्योंकि फैक्ट चेक के नाम पर फेक न्यूज़ फैलाने वाली वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक के अनुसार रॉकेट लॉन्च से पहले मंदिर में प्रार्थना करना ‘अवैज्ञानिक परंपरा’ है और इसे त्याग देना चाहिए।

इसके अलावा मोहन गुरुस्वामी भी इस मामले में अपनी प्रतिभा दिखाने से पीछ नहीं हटे। उन्होंने लिखा, “उन्हें (शिवन) खुद को साइंटिस्ट या इंजीनियर कहते हुए शर्म आना चाहिए।”

यह सही है कि विज्ञान प्रमाण और सबूतों पर आधारित होता है। आम तौर पर कहा जाता है कि मंदिर के अनुष्ठानों की प्रकृति के बारे में सबूत अपर्याप्त हैं। हो सकता है कि उनका ये कहना सही हो कि लॉन्च से पहले मंदिर में जाना एक ‘अवैज्ञानिक परंपरा’ है, लेकिन ऐसा करने में हर्ज ही क्या है? इससे इतने सारे लोग परेशान क्यों हैं?

भारतीय लोग विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्या हासिल कर सकते हैं, इसरो इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। फिर भी, लोग एक साधारण सी परंपरा को लेकर परेशान हैं। कम से कम वे स्वर्ग में एक सुनहरे ख्वाबों से भरे भविष्य का वादा करते हुए, घृणित अपराधों के लिए लोगों के एक समूह का ब्रेनवॉश तो नहीं करते हैं। प्रतीक सिन्हा खुद एक ऐसे व्यक्ति हैं जो सबूतों पर भरोसा नहीं करते हैं। जाकिर मूसा जैसे खूंखार आतंकवादी, जो कि इस्लामी शासन स्थापित करना चाहता था, उसके अपराधों पर पर्दा डालते हुए AltNews के संस्थापक ने उसे आतंकवादी न कहकर ‘अलगाववादी’ के रूप में प्रदर्शित किया। और ये काम सिर्फ यही कर सकते हैं।

क्या आपने अपने जन्मदिन के लिए मोमबत्ती जलाने और बुझाने की प्रथा खत्म कर दी? ये आपके लिए एक सुंदर और धार्मिक अनुष्ठान हो सकता है, लेकिन क्या आप इसे वैज्ञानिक कह सकते हैं? बच्चों को मोमबत्ती फूंँकते हुए कुछ माँगने के लिए कहा जाता है। फिर भी, किसी को भी इस बारे में कोई शिकायत नहीं है। जन्मदिन पर केक काटने और चेहरे पर केक लगाकर इसकी बर्बादी करने के रस्म से तो मंदिर में पूजा करना बेहतर ही है।

और हाँ, प्रतीक सिन्हा, इसकी बहुत अधिक संभावना है कि इसरो के अध्यक्ष दूसरे लॉन्च से पहले भी तिरुमला में प्रार्थना करेंगे, क्योंकि वो जानते हैं कि वो क्या कर रहे हैं।

इसरो का लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी के स्रोतों के बारे में पता लगाना है। पानी, पृथ्वी और सौरमंडल के शुरुआती दिनों का विस्तृत ज्ञान दे सकता है। इस पानी का भविष्य में इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इसके अलावा इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसरो हीलियम -3 का भी पता लगाएगा, जो कि भविष्य में परमाणु ईंधन का स्रोत हो सकता है।

कई हॉलीवुड फिल्मों के बजट की तुलना में काफी सस्ते बजट के साथ यह कोशिश इसरो कर रहा है। इसरो ने यह भी स्पष्ट किया था कि उन्होंने लॉन्च को इसलिए रद्द कर दिया, क्योंकि वो किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहते थे। हालाँकि, समस्या बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन ऐहतियात के तौर पर उन्होंने चंद्रयान-2 के लॉन्चिंग को स्थगित कर दिया।

(अश्विन के इस मूल लेख का अनुवाद रचना कुमारी ने किया है।)

पूर्व PM चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर BJP में शामिल, अगले साल पहुँच सकते हैं राज्यसभा

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर आज (जुलाई 16, 2019) आधिकारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। एक दिन पहले ही उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दिया था। राज्यसभा में वे
समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

उन्होंने भाजपा महासचिव भूपेंद्र यादव की उपस्थिति में पार्टी की सदस्यता ली। इसके बाद उन्होंने भाजपा के कार्यवाहक अध्यक्ष जेपी नड्डा से भी मुलाकात की।

गौरतलब है 50 वर्षीय नीरज शेखर 2 बार लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के निधन के बाद 2007 में बलिया सीट से पहली बार जीत हासिल की थी और बाद में वो 2009 में फिर से सांसद निर्वाचित हुए थे। 2014 में हार का मुँह देखने के बाद समाजवादी पार्टी ने उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया। उनका कार्यकाल 2020 में समाप्त होने वाला था, लेकिन उन्होंने पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया। बताया जा रहा है भाजपा 2020 में उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा भेज सकती है।

खबरों के मुताबिक वह 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी परंपरागत सीट बलिया से टिकट माँग रहे थे। कहा जा रहा है कि टिकट न मिलने से वह नाराज़ चल रहे थे। हालाँकि उन्होंने इस इस्तीफ़े के पीछे ऐसे कोई वजह खुलकर नहीं बताई है, अपने इस कदम के पीछे उन्होंने व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया है।

डोनाल्‍ड ट्रम्प की बेटी ने माना ओवैसी के हॉस्पिटल का लोहा, स्पेशल विजिट करने आईं भारत: Fact Check

सोशल मीडिया पर कौन सी खबर किस दिशा में आगे बढ़ जाए, कहना मुश्किल होता है। ऐसा ही एक उदाहरण ओवैसी के प्रशंसकों द्वारा आजकल देखने को मिल रहा है।

क्या है मामला?

दरअसल, फेसबुक पर एक विडियो शेयर किया जा रहा है, जिसमें एक महिला इंटरव्यू देते हुए देखी जा रही है। इस विडियो को शेयर करते हुए दावा किया गया है कि यह महिला अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की बेटी हैं, जो खासतौर पर हैदराबाद में ओवैसी के अस्पताल का दौरा करने गई थी।

वीडियो में महिला ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (AIMIM) नेता और असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरूद्दीन ओवैसी की तारीफ करते सुनी जा सकती हैं। शेयर करते हुए इस विडियो के साथ कैप्शन लिखा गया है-

“डॉनल्ड ट्रम्प की बेटी खुद कह रही हैं कि हम स्पेशल अकबरुद्दीन ओवैसी के हॉस्पिटल विजिट करने आए हैं। असदुद्दीन ओवैसी नाम नहीं ब्रैंड हैं।”

AIMIM पार्टी समर्थकों द्वारा यह वीडियो शेयर किया जा रहा है

AIMIM पार्टी के अन्य समर्थकों द्वारा भी यह वीडियो इसी कैप्शन के साथ शेयर किया जा रहा है।

AIMIM समर्थक इस वीडियो में किए गए दावे पर अपनी प्रतिक्रियाएँ भी दे रहे हैं।

ओवैसी की पार्टी AIMIM के कार्यकर्ता भी इस वीडियो को शेयर कर रहे हैं और कटाक्ष करते हुए लिख रहे हैं- “डंका तो सिर्फ मोदी का ही बज रहा है विदेश में।”

क्या है सच्चाई?

वास्तव में, सोशल मीडिया पर AIMIM समर्थकों द्वारा शेयर किया जा रहा यह वीडियो यूट्यूब डोनाल्ड ट्रम्प की बेटी इवाँका ट्रम्प का नहीं बल्कि ब्रियाना कुक का है। यूट्यूब पर इस ओरिजनल वीडियो में साफ-साफ लिखा है कि इवाँका की दोस्‍त आसरा अस्‍पताल (अकबरुद्दीन ओवैसी) गईं थीं। इस वीडियो को दिसंबर 01, 2017 में SharpIndians TV News & Entertainment नाम के Youtube चैनल ने अपलोड किया था। इसका वॉटरमार्क भी वीडियो में देखा जा सकता है।

यूट्यूब पर अपलोडेड यह वीडियो यहाँ देखा जा सकता है –

यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि वायरल वीडियो में दिख रहीं महिला डोनाल्ड ट्रम्प की बेटी इवाँका ट्रंप नहीं बल्कि ब्रियाना कुक हैं। ब्रियाना भी अमेरिकी ही हैं।

जबकि, डोनाल्ड ट्रम्प की बेटी इवाँका नवंबर 2017 में हैदराबाद गई थीं। हैदराबाद में हुए ग्लोबल ऑन्टरप्रिन्योरिशप समिट 2017 में वह अमेरिकी डेलिगेशन का नेतृत्व कर रही थीं। जैसा कि ANI के इस ट्वीट में देखा जा सकता है।

वीडियो पर दिख रहे वॉटरमार्क और लोगो से यह स्पष्ट है कि यह वीडियो असली है और इसी का एक हिस्सा फर्जी दावे के साथ शेयर किया जा रहा है। असली वीडियो की शुरुआत में महिला कहती हैं, “इवाँका ट्रंप के डेलिगेशन के साथ अमेरिका से मैं ब्रियाना कुक हूँ।”

हालाँकि, वीडियो की वास्तविकता से हटकर AIMIM समर्थकों द्वारा वायरल किए जा रहे वीडियो में दिख रही महिला को ध्यान से देखने पर खुद यह साबित हो जाता है कि वह न तो इवाँका ट्रंप हैं और न ही डॉनल्ड ट्रम्प की दूसरी बेटी टिफनी ट्रम्प हैं। ऐसी भी कोई रिपोर्ट नहीं है कि टिफनी ट्रम्प अपनी बहन इवाँका से साथ भारत आई थीं।

अंतिम निर्णय

इस फैक्ट चेक से पता चलता है कि अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रम्प की बेटी हैदराबाद स्थित ओवैसी के अस्‍पताल में कभी नहीं गईं थीं। ओवैसी की पार्टी AIMIM के समर्थकों द्वारा वायरल वीडियो में दिख रहीं महिला का नाम ब्रियाना कुक है, जो कि वे इवाँका के हैदराबाद दौरे के वक्‍त अ‍मेरिकी प्रतिनिधि मंडल में शामिल थीं।

तमिलनाडु: इस्लामी शासन खड़ा करने की कोशिश नाकाम, NIA ने 14 को गिरफ्तार किया

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने तमिलनाडु में आतंकी संगठन ‘अंसारुल्ला’ को खड़ा करने की कोशिश कर रहे 14 संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। इन्हें हाल ही में सऊदी अरब ने भारत को सौंपा था। बताया जाता है कि इस्लामिक शासन खड़ा करने के लिए ये लोग आतंकी हमले की साजिश रच रहे थे।

संदिग्धों को सोमवार (जुलाई 16, 2019) को नई दिल्ली से चेन्नई विशेष विमान से ले जाया गया। उन्हें पूनमल्ली की एनआईए कोर्ट में विशेष जज के समक्ष पेश किया गया। सुनवाई के बाद कोर्ट ने इन्हें 25 जुलाई तक एजेंसी की हिरासत में भेज दिया।

जानकारी के मुताबिक कोर्ट के सामने पेश किए गए संदिग्ध चेन्नई, तिरूनवेल्ली,थेनी, नागापट्टनम और रामनाथपुरम के रहने वाले हैं और वाहदत-ए-इस्लामी हिंद (तमिलनाडु का धार्मिक संगठन) के सदस्य हैं। साथ ही इन लोगों पर आरोप है कि ये तमिलनाडु के उन लोगों के संपर्क में थे जो प्रदेश में अंसारुल्ला को खड़ा करना चाहते थे।

बताया जा रहा है कि ये सभी संदिग्ध अंसारुल्ला को खड़ा करने के लिए पैसे जुटा रहे थे। जिसके चलते इन्हें हाल ही में सऊदी अरब से भारत प्रत्यर्पित किया गया।

खबरों की मानें तो इस मामले में एनआईए ने शनिवार को हसन अली और हरीश मोहम्मद नाम के दो लोगों को गिरफ्तार किया था। दोनों ने पूरे नेटवर्क का खुलासा किया और बताया कि इस्लामिक शासन स्थापित करने के मकसद से वे आतंकी हमले को अंजाम देना चाहता था। इसके लिए पैसे की व्यवस्था की और अन्य तैयारी की। 

एनआईए ने चेन्नई और नागपट्टनम जिलों में आरोपितों के ठिकानों पर छापेमारी भी की और चेन्नई निवासी सईद बुखारी और नागपट्टिनम निवासी हसन अली, युनुसमारिकार और मोहम्मद युसुफूद्दीन हरीश मोहम्मद के खिलाफ 9 जुलाई, 2019 मामला दर्ज किया।

छापेमारी में 15 सिमकार्ड, 7 मेमोरी कार्ड, 3 लैपटॉप, 5 हार्डडिस्क, 6 पेन ड्राइवर, 2 टैबलेट, 3 सीडी/डीवीडी, दस्तावेज, मैगजीन, बैनर, नोटिस, पोस्टर और पुस्तकें बरामद हुई थी।

गाँधी परिवार का करीबी संजय भण्डारी, ₹2800 करोड़ का भ्रष्टाचार: पिलैटस पर एक साल के प्रतिबंध की कहानी

₹2800 करोड़ के भ्रष्टाचार में सीबीआई द्वारा आरोपित होने का खमियाजा पिलैटस कंपनी को रक्षा मंत्रालय का सौदा खोकर भुगतना पड़ा है। रक्षा मंत्रालय ने 38 प्रशिक्षण हवाई जहाज उससे खरीदने की योजना को त्याग दिया है। यही नहीं, कम्पनी पर न्यूनतम एक वर्ष का प्रतिबंध भी लगा दिया गया है। पिलैटस पर जिस मामले में भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप है, वह 2012 यानी पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के अंतिम दौर का है।

‘वायु सेना को बता दिया है’

हिंदुस्तान टाइम्स में रक्षा मंत्रालय के अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि सरकार ने सीबीआई जाँच को ध्यान में रखते हुए वायु सेना को पिलैटस के साथ बात आगे न बढ़ाने की हिदायत दे दी है। प्रशिक्षण एयरक्राफ्टों की त्वरित आवश्यकता को देखते हुए सरकार-से-सरकार समझौते के रास्ते से प्रशिक्षण एयरक्राफ्टों की यथाशीघ्र आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। फ़िलहाल एयर फोर्स में HAL के HJT-16 किरण प्रशिक्षण एयरक्राफ्ट पुराने पड़ रहे हैं।

भ्रष्टाचार मामले का भंडारी एंगल

जिस भ्रष्टाचार मामले में पिलैटस को प्रतिबंध का सामना करना पड़ रहा है, वह भी कॉन्ग्रेस के गाँधी परिवार के करीबी माने जाने वाले संजय भण्डारी से जुड़ा है। सीबीआई ने पिछले महीने ही कुख्यात हथियार सौदागर संजय भण्डारी, पिलैटस और वायु सेना के अज्ञात अधिकारियों के ख़िलाफ़ 75 प्रशिक्षण एयरक्राफ्टों की खरीद में ₹339 करोड़ की रिश्वत का मामला दर्ज किया था। सौदे की कुल कीमत उस समय ₹2800 करोड़ थी। सीबीआई का आरोप है कि पिलैटस ने भण्डारी और उनकी कंपनी ऑफसेट इंडिया सोल्यूशन्स प्राइवेट लिमिटेड के एक दूसरे निदेशक बिमल सरीन के साथ आपराधिक षड्यंत्र रचा और इसी के अंतर्गत पिलैटस ने भण्डारी के साथ जून, 2010 में एक सर्विस प्रोवाइडर अनुबंध किया।

मामला प्रकाश में तब आया था जब उपरोक्त सौदे के लिए पिलैटस की निकटतम प्रतिद्वंद्वी रही दक्षिण कोरियाई कंपनी कोरिया एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज़ ने पिलैटस को यह करार दिए जाने के खिलाफ तत्कालीन यूपीए सरकार से विरोध दर्ज कराया था। उनका दावा था कि पिलैटस की बोली के दस्तावेज़ अधूरे थे, और इसलिए उसे मिला हुआ करार रद्द होना चाहिए। दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री ने इस मामले में भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी से बात की थी और उनसे इस निर्णय पर पुनर्विचार का आग्रह किया था। लेकिन इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला, और अंत में यह अनुबंध पिलैटस को ही दिया गया था