बेंगलुरु में ‘आई मॉनेटरी एडवाइजरी’ (I Monetary Advisory) के नाम से फर्जी इस्लामिक बैंक चलाने और समुदाय विशेष के निवेशकों से ₹1500 करोड़ ठगने के आरोपित मोहम्मद मंसूर खान ने वीडियो जारी कर 24 घंटे के भीतर हिंदुस्तान लौटने की घोषणा की है। आईएमए के कथित पोंज़ी स्कीम स्कैंडल से जुड़े मामले प्रकाश में आने के बाद, माना जाता है कि, आरोपित मंसूर खान ने दुबई की राह ली थी। मंसूर ने एक वीडियो जारी कर दावा किया कि अब तक हिंदुस्तान आने से पिछले कुछ दिनों से नासाज़ चल रही तबियत रोक रही थी। “मैं आने का पूरा बंदोबस्त कर रहा हूँ इंशाल्लाह… सबसे पहले तो मेरा हिंदुस्तान छोड़ के जाना ही सबसे बड़ी गलती थी… जो मैं हरगिज़ नहीं जाना चाहता था, लेकिन कुछ ऐसे हालात बन गए कि मुझे ये कदम उठाना पड़ा।” मंसूर ने यह भी दावा किया कि देश छोड़ने का फैसला नेताओं और ‘एंटी-सोशल एलिमेंट्स’ के दबाव में लेना पड़ा।
नज़दीकी सहयोगी की गिरफ़्तारी
दक्षिण के नीरव मोदी कहे जाने वाले मंसूर खान के सहयोगी सईद मुजाहिद के ठिकानों पर पिछले महीने SIT ने छापेमारी की थी। इसके बाद SIT ने मुजाहिद को भी हिरासत में ले लिया था। इसी मामले में कॉन्ग्रेस नेता और कर्नाटक के मंत्री बीज़ेड ज़मीर अहमद खान भी शक के घेरे में हैं। परवर्तन निदेशालय (ईडी) को दिए गए एक हलफनामे में ज़मीर ने IMA ज्वेल्स को अपनी एक सम्पत्ति ₹5 करोड़ में बेचने की बात कबूली थी।
करोड़ों खातों से, अरबों की सम्पत्ति ज़ब्त
जाँच एजेंसियों ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई की है और आरोपित कम्पनी की ₹190 करोड़ से अधिक की संपत्ति ज़ब्त की जा चुकी है। जाँच एजेंसियों ने कम्पनी के 52 बैंक खातों से ₹12 करोड़ भी ज़ब्त किए हैं। ईडी का कहना है कि आईएमए किसी भी प्रकार का बिजनेस नहीं कर रही थी बल्कि एक पोंजी स्कीम चला रही थी।
‘हलाल बैंकिंग’ के सब्ज़-बाग़ में डूबे समुदाय विशेष वाले
आरोप है कि मंसूर ख़ान ने समुदाय विशेष का धन हड़पने की योजना बनाई थी, जिसके तहत इस्लामिक बैंकिंग और हलाल निवेश के नाम पर एक फ़र्म बनाई गई जिसका नाम रखा ‘आई मॉनेटरी एडवाइज़री’ (I Monetary Advisory)। इस्लामिक बैंक के नाम पर मंसूर ख़ान ने अपने समुदाय के लोगों से इस फ़र्म में निवेश करने को कहा। इस समुदाय का एक बड़ा वर्ग कुरान में ब्याज हराम होने के चलते बैंकों में पैसा रखने में असहज महसूस करता है। आरोप है कि मंसूर ने समुदाय विशेष से पैसे निवेश करवा कर और उन्हें 14% से 18% के लाभ का सपना दिखाया, जोकि झूठा निकला।
उज्ज्वला स्कीम की बड़ी विपक्षी आलोचना, कि एक सिलेंडर लेने के बाद लोग दूसरा सिलेंडर लेने में रुचि नहीं दिखाते, का पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने खण्डन किया है। संसद में उन्होंने दावा किया कि 86% के करीब उज्ज्वला लाभार्थी दूसरा सिलेंडर लिए हैं। गरीब परिवारों की महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन देने की ‘उज्ज्वला’ योजना को मोदी सरकार की सबसे महत्वाकाँक्षी योजनाओं में से एक माना जाता था, और लोक सभा में अकेली भाजपा के 303 सांसदों को पहुँचाने में इसकी बड़ी भूमिका मानी जाती है। प्रधान लोक सभा के प्रश्न काल में बोल रहे थे।
9000 डिस्ट्रीब्यूटरों ने एलपीजी सुलभ बनाई
धर्मेंद्र प्रधान ने यह भी दावा किया कि पिछले पाँच वर्षों में 9000 वितरकों (डिस्ट्रीब्यूटरों) का नेटवर्क खड़ा कर एलपीजी को सर्वसुलभ बनाया गया है। यह वितरक तेल विपणन कंपनियों (ऑइल मार्केटिंग कम्पनीज़, OMCs) के माध्यम से खड़े किए गए हैं। प्रधान द्वारा दिया गया 86% उज्ज्वला लाभार्थियों द्वारा नियमित ग्राहक बनने का आँकड़ा भी इन्हीं कंपनियों के द्वारा दिए गए आँकड़ों पर आधारित है। “OMCs ने सूचित किया है कि कम-से-कम एक साल पुराने गैस कनेक्शन धारकों में से लगभग 86% दूसरे सिलेंडर के लिए लौट कर आए हैं।” उन्होंने एलपीजी सब्सिडी भी ‘पहल’ (प्रत्यक्ष हस्तांतरण लाभ) के तहत लोगों के खाते में सीधे हस्तांतरित किए जाने की जानकारी सदन को दी।
7 करोड़+ गैस कनेक्शन, 14 की बजाय 5 किलो के सिलेंडर का विकल्प
धर्मेंद्र प्रधान ने सदन को यह भी सूचित किया कि तेल कंपनियाँ लोगों को एलपीजी गैस के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न कदम उठा रही हैं। मसलन, आवश्यकतानुसार लोग 14 किलो के बड़े सिलेंडर को 5 किलो के छोटे सिलेंडर से भी बदल सकते हैं, एलपीजी के लगातार इस्तेमाल के फायदों और इसके सुरक्षित प्रयोग के प्रति जागरूकता के लिए प्रधान मंत्री एलपीजी पंचायत का आयोजन आदि। इसके अलावा जो लोग रीफिल के लिए नहीं आते, उन तक एसएमएस के ज़रिए पहुँचना, होर्डिंग, बैनरों का प्रयोग आदि भी कंपनियों द्वारा किए जाने की बात धर्मेंद्र प्रधान ने की।
प्रधान ने यह भी बताया कि 8 जुलाई, 2019 तक के आँकड़ों के हिसाब से तेल कंपनियाँ देश में लगभग 7.34 करोड़ कनेक्शन बाँट चुकीं हैं। उन्होंने एक और बड़ा दावा यह भी किया कि उज्ज्वला योजना के कार्यान्वन के बाद से देश में सीने में दिक्कत की शिकायतों में 20% कमी आई है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उज्ज्वला अपनाने के लिए लोगों से जो अपील की थी, उसमें एक भावनात्मक पहलू महिलाओं को उपले और कण्डे पर खाना बनाने में होने वाली श्वास-संबंधी और सीने की अन्य बीमारियों का भी था।
सलमा अंसारी द्वारा चाचा नेहरू मदरसे में मंदिर बनवाने का ऐलान करने के बाद मामला तूल पकड़ता नजर आ रहा है। एक ओर इस्लामी धर्मगुरू जहाँ इसका विरोध करते नजर आ रहे हैं। वहीं अलीगढ़ की पूर्व मेयर एवं भाजपा नेता शकुंतला भारती ने उनके इस कदम की तारीफ़ की है। साथ ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मंदिर बनाने की भी माँग की है।
टाइम्स नॉउ को दिए साक्षात्कार में भाजपा नेता ने कहा, “उनकी भावनाओं का हम सम्मान करते हैं। इतना सुंदर विचार उनके मन में आया, हम उनका समर्थन करते हैं कि उन्होंने दृढ़ संकल्प के साथ एक अच्छे भारतीय नागरिक होने का परिचय दिया है। वो मंदिर बनवा रही हैं उनकी भावना के साथ हैं हम, और जो भी हम लोगों से सहयोग होगा हम करने के लिए तैयार हैं।”
खबरों के मुताबिक भारती ने आगे ये भी कहा, “अगर मदरसा में उनकी (सलमा की) इच्छा है कि एक मंदिर बनाया जाए तो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी एक मंदिर बनाया जाना चाहिए।”
पूर्व मेयर से जब पत्रकार ने सलमा अंसारी के फैसले का विरोध करने वाले लोगों के बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब दिया,”मदरसा उनका है। वो वहाँ क्या कर रही हैं क्या नहीं कर रही हैं, पहले तो उन्हें हस्तक्षेप करने का अधिकार ही नहीं है और अगर ये हस्तक्षेप कर रहे हैं तो ये गलत है। किसी की भावनाओं को दबाना, किसी की इच्छाओं का दमन करना, कानून के तहत नहीं आता है। ऐसे लोगों के विरुद्ध वास्तव में कार्रवाई होनी चाहिए।”
शकुंतला कहती हैं कि उन्हें बड़ा अफसोस होता है जब लोग कहते हैं यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर लगनी चाहिए। उनका पूछना है आखिर क्यों जिन्ना की तस्वीर लगनी चाहिए और इसका विरोध आज तक क्यों नहीं किया गया है।
बता दें कि सलमा अंसारी के इस फैसले पर समुदाय विशेष के लोगों का कहना है कि जो मंदिर बनवाएगा वो मुस्लिम नहीं हैं। अगर उन्हें (सलमा) को मंदिर बनवाना है तो वह अपने घर में बनवाएँ।
मरुमलारची द्रविड़ मुनेत्र कषगम (MDMK) के महासचिव और राज्यसभा सांसद वायको ने हिंदी को लेकर विवादित बयान दिया है। 23 साल बाद राज्यसभा पहुँचे वायको ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत ज्यादातर सदस्यों के हिंदी में संबोधन पर आपत्ति व्यक्त की। वायको यहीं नहीं रुके, उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी के कारण भी संसद में बहस का स्तर नीचे गिर गया है। उनके विचार में प्रधानमंत्री का सिर्फ हिंदी में संबोधन के पीछे ‘हिंदी, हिंदू, हिंदू राष्ट्र’ की सोच है। वायको का कहना है कि पीएम मोदी सिर्फ हिन्दी बोलकर देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं।
Vaiko,MDMK Chief: What literature is there in Hindi? It has no roots&Sanskrit is a dead language.Shouting in Hindi nobody could understand even after using headphones(in Parliament).Standard of debates have deteriorated,main reason for this is imposition of Hindi.This is my view. pic.twitter.com/TzrCc2uCAg
वायको ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि पहले संसद में विभिन्न विषयों पर गहरी जानकारी रखने वालों को भेजा जाता था। आज डिबेट का स्तर हिंदी की वजह से गिर गया है। वे बस हिंदी में चिल्लाते हैं। यहाँ तक कि पीएम मोदी भी सदन को हिंदी में संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी में कौन सा साहित्य है? इसकी तो जड़ें ही नहीं हैं। वायको ने कहा कि संस्कृत एक मृत भाषा है। संसद में किसी के हिंदी बोलने पर सदस्य हेडफ़ोन लगा लेते हैं। कोई नहीं समझ पाता इसको।
Report: The controversy surrounding Hindi was reignited by Rajya Sabha MP and Marumalarchi Dravida Munnetra Kazhagam (MDMK) chief Vaiko on Monday after he raised objection over the use of the language in Parliament. | #HindiPhobiahttps://t.co/VPgU6QuJI0
वायको ने आगे कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संसद में अंग्रेजी बोला करते थे। मोरारजी देसाई भी संसद में इंग्लिश बोलते थे। इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, पीवी नरिसिम्हा राव और मनमोहन सिंह भी सदन को अंग्रेजी में संबोधित करते थे। उन्होंने कहा कि सिर्फ मोदी ही बार-बार हिंदी के प्रति प्यार जताते रहते हैं। वो ही हिंदी के कट्टरपंथी हैं। उनकी नजर में हिंदी बोलने के पीछे प्रधानमंत्री की मंशा ‘हिंदी, हिंदू, हिंदू राष्ट्र’ की है। संसद में अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए।
एमडीएमके महासचिव ने कहा कि जब तक संसद में संविधान की मान्यता प्राप्त सभी 28 भाषाओं में बातचीत शुरू नहीं हो जाती, तब तक सिर्फ अंग्रेजी में ही बातचीत होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जवाहरलाल नेहरू एक महान लोकतांत्रिक थे, जो संसद के सत्र को कभी नहीं छोड़ते थे। लेकिन मोदी शायद ही सत्र में भाग लेते हैं। यदि नेहरू एक पहाड़ हैं, तो मोदी उस पहाड़ का केवल एक हिस्सा हैं।
केरल CPM प्रमुख कोडियरी बालाकृष्णन के बेटे बिनॉय कोडियरी ने DNA टेस्ट के लिए अपना ब्लड सैंपल देने से इनकार कर दिया। बिनॉय ने यह तर्क़ दिया कि वो बीमार है इसलिए ब्लड सैंपल नहीं दे सकता।
पिछले बुधवार को बिनॉय को डिंडोशी सेशन कोर्ट से अग्रिम ज़मानत मिल गई थी। हालाँकि, अदालत ने उसे DNA टेस्ट कराने का आदेश दिया है क्योंकि DNA टेस्ट ही एकमात्र ऐसा सबूत रहेगा, जिससे इस मामले पर फ़ैसला लिया जाएगा।
ख़बर के अनुसार, बिनॉय आज ओशिवारा स्टेशन पहुँचा और जाँच अधिकारी ने उससे इस मामले पर 30 मिनट तक पूछताछ की। उसने अधिकारी को बताया कि वो बीमार था इसलिए अपना ब्लड सैंपल नहीं दे सका। अपनी बात को सच साबित करने के लिए उसने एक मेडिकल सर्टिफिकेट भी दिखाया। साथ ही उसने आश्वासन दिया कि वो इस मामले में अपना पूरा सहयोग देगा।
अब बिनॉय को अगले सोमवार को अपना ब्लड सैंपल देना होगा।
दरअसल, बिनॉय कोडियरी के ख़िलाफ़ एक 33 वर्षीय महिला ने बलात्कार का मामला दर्ज करवाया था। मुंबई पुलिस ने बिनॉय के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया। अपनी शिक़ायत में महिला ने बिनॉय पर आरोप लगाया कि उसने उसे शादी का झाँसा देकर उसके साथ एक दशक से अधिक समय तक बलात्कार किया। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि बिनॉय ने उसे नहीं बताया था कि वो पहले से शादीशुदा है। इसके अलावा महिला ने यह दावा भी किया था कि उसका और बिनॉय का एक आठ साल का बेटा भी है।
शिक़ायत दर्ज होने के बाद से ही बिनॉय फ़रार था। पुलिस ने उसके लिए लुक आउट नोटिस भी जारी किया। बिनॉय की स्थिति पर केरल के एक पत्रकार ओ अब्दुल्ला ने उसे इस केस से निपटने के लिए इस्लाम क़बूल करने का सुझाव दिया था।
हमारे देश का न्यायिक तंत्र किस धीमी गति से काम करता है, इसकी बानगी हाल ही में मध्य प्रदेश में देखने को मिली। ₹20 के जेबकतरी के मामले का निपटारा 41 साल में भी नहीं हो सका, और अंत में फरियादी को ही यह याचना करनी पड़ी कि वह अब इस मुकदमे का अंत चाहता है। अंततः लोक अदालत में यह मामला समाप्त हो गया।
15 साल बाद 4 महीने जेल में भी बिताए
आरोपित इस्माइल के ख़िलाफ़ बाबूलाल ने बस टिकट की लाइन में अपनी जेब से ₹20 चुराने का आरोप लगाते हुए माधोगंज (मध्य प्रदेश) के पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। जांच और न्यायालय में चालान पेश होने के बावजूद मामला न्यायालय में लंबित ही रहा। इस्माइल ने न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा नियत तारीख पर अदालत आना भी बंद कर दिया। आखिरकार 2004 में अदालत ने इस्माइल की गिरफ़्तारी का वारंट जारी किया और 15 साल ढूँढ़ने के बाद पुलिस ने उसे जेल भेज दिया। इस्माइल ने 4 महीने जेल में बिताए।
‘साहब, मैं आरोपी को नहीं जानता। अब मामला खत्म कीजिए’
गत शनिवार (13 जुलाई, 2019) को मामला लोक अदालत के सुपुर्द कर दिया गया। प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट अनिल कुमार नामदेव की अदालत ने 64-वर्षीय बाबूलाल से कहा कि 41 साल पुराने मामले को, जहाँ आरोपित चार महीने जेल काट भी चुका है, और खींचने का मतलब नहीं है। बाबूलाल ने भी सहमति जताते कि वे आरोपित को नहीं जानते। इसके बाद मामले को खत्म कर दिया गया। नवभारत टाइम्स से बात करते हुए मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय की ग्वालियर खण्डपीठ के सरकारी वकील ऋषिकेश मिश्रा ने भी कहा कि लोक अदालतों में ऐसे ही आपसी सहमति से निराकरण होता है।
पूर्व रॉ अधिकारी ने भारत के उप-राष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। पत्रकार चिरंजीवी भट ने पूर्व रॉ अधिकारी एनके सूद से बातचीत की, जिसमें उन्होंने हामिद अंसारी के क़रीबी द्वारा वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन को बदनाम करने और उनका करियर तबाह करने की बात का खुलासा किया। (आप पूरे इंटरव्यू को हूबहू यहाँ पढ़ सकते हैं) पूर्व रॉ अधिकारी ने पत्रकार चिरंजीवी भट से बात करते हुए कहा:
“रतन सहगल नामक व्यक्ति हामिद अंसारी का सहयोगी रहा है। आपने नाम्बी नारायणन का नाम ज़रूर सुना होगा। उन पर जासूसी का आरोप लगा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ लगे सारे आरोपों को निराधार पाया था। वे निर्दोष बरी हुए। लेकिन, किसी को नहीं पता है कि उनके ख़िलाफ़ साज़िश किसने रची? ये सब रतन सहगल ने किया। उसने ही नाम्बी नारायणन को फँसाने के लिए जासूसी के आरोपों का जाल बिछाया। ऐसा उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि बिगाड़ने के लिए किया। रतन जब आईबी में था तब उसे अमेरिकन एजेंसी सीआईए के लिए जासूसी करते हुए धरा जा चुका था। अब वह सुखपूर्वक अमेरिका में जीवन गुजार रहा है। वह पूर्व-राष्ट्रपति अंसारी का क़रीबी है और हमें डराया करता था। वह हमें निर्देश दिया करता था।”
आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी यदि मैं आपको बताऊँ कि दशकों पहले, हमारे पास एक ऐसा असाधारण वैज्ञानिक था, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहा था? साथ ही यह कि उन्हें नौकरी से ‘देशद्रोही’ जैसे आरोप लगाकर निकाल दिया गया और हमारी तत्कालीन ‘सेक्युलर’ सरकार द्वारा उनका जीवन बर्बाद कर दिया गया? क्या आप उन लोगों को कभी माफ़ कर पाएंगे?
मिलिए इसरो वैज्ञानिक नम्बी नारायण से, जिन्हें 25 जनवरी 2019 को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
विद्वान और देशभक्त वैज्ञानिक नम्बी नारायणन
पीएसएलवी (PSLV) को याद करिए, जिसने वर्ष 2014 में मंगलयान को संचालित किया था और मंगल ग्रह पर भारतीय ध्वज लहराया था। पीएसएलवी, जिसने वर्ष 2008 में चंद्रयान को संचालित किया और इस बात की पुष्टि की कि चंद्रमा पर निश्चित रूप से पानी की बर्फ है।
जनवरी 5, 2014 को भारत ने अंतरिक्ष में लम्बी छलांग लगाकर नया इतिहास रचा था। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के बूते रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजने का परीक्षण 100% ख़रा उतरा था। इस लम्बी छलांग के पीछे असल में कौन था? लेकिन उस दौरान पूरी खबरों में कहीं भी उस वैज्ञानिक का उल्लेख तक नहीं था। उस वैज्ञानिक का नाम है प्रोफैसर नम्बी नारायणन।
सबसे पहले 1970 में ‘तरल ईंधन रॉकेट’ तकनीक लाने वाले वैज्ञानिक रहे नम्बी नारायणन 1994 में इसरो में क्रायोजेनिक विभाग के वरिष्ठ अधिकारी थे। अफ़सोस की बात है कि उन्हें सत्ता और सियासत के षड्यंत्र का शिकार बनाया गया। जिस व्यक्ति को राष्ट्रीय अलंकरण देकर सम्मानित किया जाना चाहिए था, उसे ही जेल की सलाखों के पीछे बन्द कर दिया गया। उन्हें देश का गद्दार करार दिया गया। हमारे देश की विडम्बना है कि जो लोग देश के लिए कुछ कर गुजरने का हौंसला रखते हैं, उनको किसी न किसी तरह से हतोत्साहित कर रोक दिया जाता है।
नम्बी नारायणन और उनके साथी डी. शशिकुमार को वर्ष 1994 में केरल पुलिस ने जासूसी और भारत की रॉकेट प्रौद्योगिकी शत्रु देशों को बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। तब मीडिया ने इन ख़बरों को बहुत उछाला था। मीडिया ने बिना जाँचे-परखे पुलिस की इस ‘थ्योरी’ पर विश्वास करके उन्हें राष्ट्रद्रोही के रूप में प्रस्तुत किया था। पुलिस ने इसे सैक्स जासूसी स्कैंडल की तरह पेश किया था। सीआईए ने मालदीव की 2 ऐसी महिलाओं को तैयार किया जिनके पास ऐसे रहस्य थे, जिनकी जानकारी न पुलिस को थी, न मीडिया को।
PSLV ने हमें हमेशा गौरवान्वित किया है। पीएसएलवी रॉकेट स्वदेशी “विकास इंजन” पर चलता है और नम्बी नारायणन ने इसे बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
1990 के दशक में, नम्बी नारायणन भारत के शीर्ष वैज्ञानिकों में से एक थे, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहे थे। इससे पहले, भारत ने रूस से इस तकनीक को खरीदने की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिकियों ने पूरी लड़ाई लड़ी और इसे रोक दिया। स्वाभाविक है कि जिन लोगों के पास यह तकनीक होगी, वे अन्य देशों से ईर्ष्या के कारण इस तकनीक की रक्षा करेंगे।
अमेरिकी दबाव में रूस ने क्रायोजेनिक इंजन देने से इन्कार कर दिया था। तब नम्बी नारायणन ने ही सरकार को भरोसा दिलाया था कि वह और उनकी टीम देसी क्रायोजेनिक इंजन बनाकर दिखाएँगे। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को ध्वस्त करने के लिए अमेरिका ने साजिश रची और केरल की वामपंथी सरकार उसका हथियार बन गई।
हैरानी की बात तो यह है कि केन्द्र में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार की भूमिका भी संदिग्ध रही थी, जिसने इतने बड़े वैज्ञानिक के ख़िलाफ़ साजिश पर ख़ामोशी अख्तियार कर ली थी। मीडिया में ऐसी रिपोर्ट वर्णित थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए भारत में ऊपर से नीचे तक के नेताओं और अफ़सरों को मोटी रकम पहुँचाती थी।
फिर, यह सब हुआ।
वर्ष 1994 में, नम्बी नारायणन पर अचानक जासूसी और विदेशी एजेंटों को रॉकेट सम्बंधित संवेदनशील जानकारी लीक करने का आरोप लगाया गया था। उन्हें गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया, इसके साथ ही उनका करियर ख़त्म हो गया।
एक दिन सुबह अचानक ख़बर आनी शुरू हुई कि मालदीव की दो सुंदरियों मरियम रशीदा और फव्जिया हसन ने भारत के दो वैज्ञानिकों को हनी ट्रैप में फँसा लिया है। ज़िस्म और कुछ लाख डॉलर के बदले में इन वैज्ञानिकों ने भारत के क्रायोजेनिक इंजन का प्रोग्राम बेच डाला था!
मलयालम मीडिया से शुरू हुई इस ख़बर को राष्ट्रीय मीडिया में भी जगह मिली। फिर बी ग्रेड की फिल्मों जैसा कथानक लिखने वालों की ख़ोज हुई और मालदीव की औरतों, वैज्ञानिकों और मुख्यमंत्री के क़रीबी कहे जाने वाले बड़े पुलिस अधिकारियों की मसालेदार कहानियाँ गढ़ी गयीं। थोड़े ही दिन में लोगों को भी लगने लगा कि इसरो के इस जासूसी काण्ड में मुख्यमंत्री की भी मिली भगत है। आईजी रमन श्रीवास्तव और करुणाकरण पर शिकंजा कसने लगा।
लगातार अख़बारों में आती ख़बरों के मद्देनजर हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया और ओमन चंडी ने इसी वक़्त इस्तीफ़ा दे दिया। आख़िरकार करुणाकरण को भी इस्तीफ़ा देना पड़ा और एंटनी मुख्यमंत्री बने। उन्हें पता था कि मामला तो कुछ है ही नहीं इसलिए केस सीबीआई को सौंप दिया गया।
नारायणन और शशि कुमार की घनघोर भर्त्सना हुई। ऑटो रिक्शा वाले तक नारायणन की पत्नी को पहचानकर बिठाने से इनकार करने लगे। यहाँ तक कि उनके बच्चों को भी जासूस-गद्दार का बच्चा बताया गया। सीबीआई ने जाँच शुरू की तो पहले ही हफ़्ते में पता चल गया कि शुरूआती सबूत ही फ़र्ज़ी हैं और इसमें कोई मुक़दमा नहीं बनता। फिर भी, मीडिया में वैज्ञानिकों के घर से काफ़ी नगद मिलने की ख़बरें उड़ाई गयी जो कि सीबीआई को कभी मिली ही नहीं थी।
सीबीआई ने अदालत में कहा कि ये केरल पुलिस की काफ़ी सोची समझी साज़िश थी। केरल पुलिस के सीबी मैथ्यूज, विजयन और के के जोशुआ के अलावा आईबी के आर बी श्रीकुमार पर मुक़दमा चलाने की सिफ़ारिश सीबीआई ने कर दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी अभियुक्तों को रिहा किया और केरल सरकार को पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई करने कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या-राम जन्मभूमि मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को आगामी 19 जुलाई तक जवाब देने के लिए कहा है कि मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश के रिटायर होने पर क्या-क्या नियम और क़ानून हैं। कोर्ट ने यूपी सरकार को पूछा है कि CBI जज एसके यादव जब तक फ़ैसला नहीं दे देते, तब तक उन्हें रिटायर न करने के लिए क्या प्रावधान है?
Ram Janmabhoomi-Babri Masjid matter: SC asked UP govt to apprise it by 19 July as to what are the rules®ulations when a judge hearing the entire case retires. Judges were informed that trial court judge was to retire on Sept 30 & he sought more time to complete the trial. pic.twitter.com/PUiaz3Pezr
दरअसल, इस मामले की सुनवाई कर रहे CBI जज एसके यादव ने मई में सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर सूचित किया था कि वो 30 सितंबर को रिटायर हो रहे हैं। उन्होंने इस केस की सुनवाई पूरी करने के लिए छ: महीने का और समय माँगा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह आवश्यक है कि CBI जज एसके यादव इस मामले की सुनवाई पूरी कर फ़ैसला सुनाएँ। कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि हम अनुच्छेद-142 के तहत आदेश जारी करेंगे कि उन्हें 30 सितंबर तक रिटायर न किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने 19 अप्रैल 2017 को मामले की रोजाना सुनवाई कर उसे दो साल के अंदर पूरा करने का आदेश दिया था। इस मामले में वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी आरोपित हैं। इसके अलावा, रामजन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता पैनल के चेयरमैन जस्टिस इब्राहिम कलीफुल्ला से गुरुवार (18 जुलाई) तक स्टेटस रिपोर्ट माँगी है।
बता दें कि कोर्ट ने बातचीत के ज़रिए हल निकलने के लिए रिटायर्ड जज एफएमआई कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल गठित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट अब 25 जुलाई से इस मामले पर रोज़ाना सुनवाई पर विचार कर रहा है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस (IANS) ने आज सुबह एक कपल के अपहरण की एक घटना को गलत तरीके से पेश किया। शुरुआत में उन्होंने रिपोर्ट किया था कि भाजपा विधायक राजेश मिश्रा की बेटी साक्षी मिश्रा और उनके पति का इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बाहर बंदूक की नोक पर एक काली एसयूवी में अपहरण कर लिया गया। बाद में पता चला कि जिस कपल का अपहरण किया गया था, वो साक्षी और अजिताभ नहीं, बल्कि एक दूसरा कपल था। हालाँकि, पुलिस ने किडनैपर को पकड़ लिया और उस दंपती को उसकी चंगुल से छुड़ा लिया।
नेशनल हेराल्ड द्वारा प्रकाशित की गई गलत खबर का स्क्रीनशॉट
साक्षी और उनके पति अजितेश दोनों को अदालत की सुनवाई में भाग लेने के लिए ले जाया गया था। उनके वकील ने दावा किया था कि कोर्ट परिसर के बाहर अजितेश के साथ मारपीट की गई। वकील का कहना है कि इनको किडनैप नहीं किया गया था।
जो कन्फ्यूजन IANS न्यूज़ एजेंसी को हुई, वही कन्फ्यूजन कुछ अन्य न्यूज़ पोर्टलों को भी हुआ। जिसमें इंडिया टुडे, द ट्रिब्यून और कॉन्ग्रेस मुखपत्र नेशनल हेराल्ड आदि शामिल हैं। इन्होंने भी IANS की तरह ही यही गलत खबर चला दी। हालाँकि, IANS ने बाद में अपनी खबर को सही कर लिया। जिसके बाद ये साफ हो गया कि दोनों घटनाएँ अलग-अलग थीं।
गौरतलब है कि IANS ने पिछले साल पीएम मोदी का ज़िक्र करते हुए एक अपशब्द का इस्तेमाल किया था। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित एक नई योजना के बारे में बताते हुए IANS के पत्रकार ने नरेंद्र मोदी के मिडिल नेम में ‘Bakhch**d’ शब्द का इस्तेमाल किया था। हालाँकि उस पत्रकार को बाद में निलंबित कर दिया गया था।
इससे पहले, ऑपइंडिया ने बताया था कि कैसे उत्तर प्रदेश में पीएमएमवीवाई पर खर्च किए गए पैसे पर IANS द्वारा दायर एक आरटीआई का कथित जवाब आधिकारिक सरकारी आँकड़ों से काफी अलग था।
IANS ने 12 मई 2019 को चुनाव आयोग के आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए व्यापक स्तर पर एक एग्जिट पोल प्रकाशित किया था। IANS ने ये एग्जिट पोल चुनाव के अंतिम चरण शुरू होने से पहले ही प्रकाशित कर दिया गया था। जबकि चुनाव आयोग द्वारा 1998 से रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट 1951 के तहत मतदान शुरू होने के समय से लेकर मतदान के सभी चरणों के समाप्त होने के आधे घंटे बाद तक एक्जिट पोल प्रकाशित करने पर प्रतिबंध है।
केरल के तिरुवनंतपुरम में प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी कॉलेज के परिसर के अंदर एक छात्र के ऊपर चाकू से हमला करने वाले मुख्य आरोपित नसीम को सोमवार (जुलाई 15, 2019) को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। नसीम वामपंथी छात्र संगठन स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) का नेता है। नसीम के साथ ही इस घटना के एक और आरोपित आर शिवरंजीत को भी गिरफ्तार किया गया।
पुलिस ने कहा कि दोनों आरोपित को मध्य रात्रि में केशवदासपुरम से हिरासत में ले लिया गया, जब ये दोनों छिपने के लिए नए ठिकाने की तलाश में थे। एक पुलिस अधिकारी ने पीटीआई को बताया कि उनकी गिरफ्तारी दर्ज की गई है और उनसे पूछताछ जारी है। इसके साथ ही मामले में गिरफ्तार एसएफआई नेताओं की कुल संख्या 6 हो गई है।
गौरतलब है कि शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को एसएफआई नेता ने अखिल नाम के छात्र के ऊपर चाकू से हमला किया। जिसके बाद उसे गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती करवाया गया। जहाँ उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है। पीड़ित अखिल तृतीय वर्ष का बीए (राजनीति) का छात्र है । अखिल के ऊपर हमला करने के बाद से ही दोनों आरोपित फरार थे।
जानकारी के मुताबिक, अखिल और उसके मित्र कॉलेज कैंटीन में गाते-बजाते थे, जो कैंटीन के बगल में ही स्थित SFI की स्थानीय इकाई के कमरे में रहने वाली एक महिला SFI सदस्या को पसंद नहीं आया। उसने SFI की स्थानीय इकाई में गाना बंद कराने की शिकायत कर दी और इसके चलते अखिल की SFI के बाकी सदस्यों से जुबानी जंग कई दिन तक चली। इसके बाद 10 जुलाई को एक छोटी-मोटी हाथापाई हुई लेकिन शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को समझौते के लिए बैठक बुलाई गई थी। लेकिन सुलह के लिए बुलाई गई इस बैठक में मामला हाथ से निकलता गया और देखते-ही-देखते अखिल के एक दोस्त पर हमला हो गया। इसके बाद बाहर से भी एक बड़ा गुट अंदर आया और अखिल के ग्रुप धावा बोल दिया। इस हाथापाई में अखिल के सीने पर चाकू से वार किया गया।
इस घटना की जानकारी फैलते ही छात्रों का एक बड़ा समूह SFI के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने लगा। प्रदर्शन करने वालों में SFI के भी सदस्य थे। उनका कहना था कि कॉलेज में SFI के 13 यूनिट सदस्यों का व्यवहार फासिस्टों जैसा ही है, हालाँकि वे SFI समर्थक हैं। छात्रों को कॉलेज में अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आने-जाने की अनुमति नहीं है और कहीं भी वे पेड़ों के आस-पास बैठें या गाना गाएँ तो उन्हें मार-पीटकर भगा दिया जाता है।