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‘बड़ी मजबूरी’ में मनोज तिवारी को जान से मार दूँगा, जरूरत पड़ी तो मोदी को भी रास्ते से हटा दूँगा’

दिल्ली भाजपा अध्यक्ष और मशहूर गायक व अभिनेता मनोज तिवारी को जान से मारने की धमकी मिली है। एक एसएमएस में मिली इस धमकी में धमकी देने वाले ने यह भी कहा है कि उसे तिवारी को मारने का निर्णय ‘बड़ी मजबूरी’ में लेना पड़ रहा है, जिसके लिए वह स्वयं बहुत दुखी है। मनोज तिवारी ने मामले की शिकायत दिल्ली पुलिस से की है, जो इस शख्स को तलाशने में जुट गई है। तिवारी ने समाचार एजेंसी से बात करते हुए बताया कि हिंदी में भेजे गए इस संदेश को भेजने वाले ने अपना नाम नहीं बताया है।

इस शख्स ने SMS में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी लपेटते हुए कहा कि अगर जरूरत हुई, तो उन्हें भी ‘रास्ते से हटा दिया जाएगा’। यह संदेश तिवारी को शुक्रवार दोपहर 12.52 बजे मिला था और उन्होंने इसे शनिवार को पढ़ा। इससे पहले भाजपा के ही पश्चिमी दिल्ली के सांसद प्रवेश वर्मा को भी दो दिन पहले ही किसी ने जान से मार देने की धमकी दी थी। उन्होंने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर अमूल्य पटनायक को पत्र लिखकर इस बारे में जानकारी दी थी। प्रवेश वर्मा का कहना था कि वह दिल्ली में मस्जिदों के अवैध निर्माण के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं, इसीलिए उनको निशाना बनाया जा रहा है।

नहीं उतरा EVM का ‘भूत’, राहुल गाँधी करेंगे आंदोलन, चुनाव का बहिष्कार

2019 के लोकसभा नतीजों से झटका खाने के बावजूद राहुल गाँधी सुधरते नहीं नज़र आ रहे हैं। पहले योग दिवस पर वाहियात ट्वीट करने के कारण उनकी आलोचना हुई, अब एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वह ‘EVM हैकिंग’ पर मोदी सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाने की तैयारी में जुटे हैं। संडे गार्जियन की खबर के अनुसार कॉन्ग्रेस के (इस्तीफा देने के बाद बरकरार) अध्यक्ष राहुल केंद्र सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाना चाहते हैं।

संडे गार्जियन के अनुसार कॉन्ग्रेस के डाटा एनालिटिक्स मुखिया प्रवीण चक्रवर्ती की एक रिपोर्ट पढ़ने के बाद से राहुल गाँधी यह मानने लगे हैं कि कॉन्ग्रेस EVM में गड़बड़ी के चलते ही हारी। अख़बार का दावा है कि राहुल गाँधी ने बैलेट से चुनाव कराने माँग उठाने के साथ विधानसभा निर्वाचन के बहिष्कार का निर्णय लिया है। लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता उनकी इस योजना से सहमत नहीं दिख रहे हैं। उनके हिसाब से अगर कॉन्ग्रेस बहिष्कार करती है तो उसकी बची-खुची जगह भी क्षेत्रीय दलों के हाथों में चली जाएगी। लेकिन राहुल गाँधी अपनी योजना पर अड़े हैं।

राहुल की माँ और यूपीए अध्यक्षा सोनिया गाँधी का समर्थन भी राहुल गाँधी की इस योजना को मिलता हुआ नहीं लग रहा है। उनके सलाहकारों की भी यह राय रिपोर्ट में बताई गई है कि इस कदम से EVM की बजाय कॉन्ग्रेस की ही विश्वसनीयता दाँव पर होगी। कॉन्ग्रेस इससे पहले लोक सभा निर्वाचन में भी EVM पर हमले कर के देख चुकी है। एक संदिग्ध ‘एक्सपर्ट’ के इस्तेमाल से भी उसे कोई फायदा नहीं हुआ था। आज भले सोनिया गाँधी EVM पर सवाल उठाने में हिचकिचा रहीं हों, लेकिन अतीत में वह भी पीछे नहीं रहीं हैं

‘कबीर सिंह’ में जिनको मर्दवाद दिख रहा है: नकली समीक्षकों की समीक्षा

एक चीज़ होती है “टाइटल” जिसका मलतब होता है कि परोसी जा रही चीज़ का बहुत बड़ा प्रतिशत टाइटल में समाहित है। “कबीर सिंह” नाम से पता तो चल रहा होगा कि कबीर सिंह नाम का किरदार। उसी के इर्द गिर्द होगा जो भी होगा। बाकी सब साइड में ही रहेंगे। ठीक ना!

अर्जुन रेड्डी की रीमेक है और उसके मुकाबले उन्नीस ही है। खैर… इधर कुछ मिलने वालों ने इस फिल्म के रिव्यू भेजे जिन्हें पढ़कर दिमाग हिल गया। जिसमें से सबसे ज़्यादा आकर्षित किया मुझे स्त्री-विरोधी शब्द ने। एक तो मुझे ये समझ नहीं आता कि आजकल हर किसी चीज़ में ये स्त्री-विरोधी (फर्ज़ी वाला) क्या एंगल है! मतलब हर कहीं, कभी भी। ना हो तब भी, जबरन! ज़बरदस्ती हर बात में ये एंगल ढूंढना और फिर पूरी बात का रुख मोड़कर रख देना सही नहीं है भाई।

एक किरदार लिखा गया, कबीर सिंह नाम का। किरदार कुछ यूँ है कि सनकी है। एंगर मैनेजमेंट की समस्या है उसे। नशा करता है। मेडिकल स्टूडेंट है। जो भी करता है शिद्दत से करता है। “होप इज गुड” उसका दर्शन है। कॉलेज छोड़कर जा रहा होता है और एक लड़की आती है, रुक जाता है। यहाँ आपको ये बात पकड़नी होगी कि उसे पहले किसी लड़की में दिलचस्पी नहीं होती है उस तरह की लेकिन एक लड़की आती है और वो अपना फैसला बदल लेता है। आपको ये बात एंड तक पकड़कर रखनी होगी क्योंकि जब आप उस लड़के को परवर्ट कहते हैं तब ये फैक्टर बीच में आएगा ही।

लड़का लड़की से प्यार करता है। पज़ेसिव होता है। केयर करता है। ध्यान रखता है लड़की का हर लेवल पर। जो भी करता है उसमें दोनों का कंसेंट रहता है। एक सीन ऐसा नहीं जहाँ लड़का लड़की के साथ ज़बरदस्ती कर रहा हो और लड़की ने विरोध किया हो। एक सीन ऐसा नहीं जहाँ लड़की असहज हुई हो और चेहरे से लगा हो।

एक संवाद है जहाँ नायक बोल रहा है कि, “चुप नहीं रहना चाहिए। चुप रहना आदत बन जाती है फिर।” इससे उसका व्यक्तित्व समझ में आ जाना चाहिए तब तक तो। ये दूसरी बार होता है फिल्म शुरू होने के बाद तक जहाँ आप कबीर सिंह के बारे में जान पाते हैं उसके डार्क शेड्स के अलावा।

हाँ तो आगे, प्यार होता है और प्यार में वो सब होता है जो होता ही है और होना ही चाहिए। प्यार में आदर्श मत ढूँढिए। वो आदर्श नहीं होता। वो रफ़ हो होता है जब तक किसी को नुकसान नहीं पहुँचा रहा। प्यार है आपकी सेल्फी नहीं जिसमें फिल्टर्स लगाकर दिखाया जाए। जो है सो है। प्यार महत्वपूर्ण है और रहेगा। भाई बिना पज़ेसिव हुए कौन-सा प्यार होता है एक तो कोई महान आत्मा मुझे ये समझाए और पजेसिव हो जाए तो स्त्री-विरोधी कैसे हो जाए, दूसरी बात ये समझाए।

स्पेस नाम की चीज़ को प्यार में इतना हाइप दिया गया है कि अधिकार को गुलामी का नाम दिया गया और अब अगर लड़का अपनी प्रेमिका को प्यार में दुपट्टा सही करने को बोल दे तो उसे गुलामी कहना आम बात हो गयी है। पेरेंट्स कह दें तो वही बात गुलामी से शिफ्ट होकर उनका कंसर्न बन जाती है। है ना!

तो स्त्री विरोधी है ये फिल्म! अच्छा! मेरी मति थोड़ी कम साथ देती है शायद इसलिए इसको पॉइंट्स से समझाती हूँ, आइए आप भी मेरे साथ अगर वक़्त है तो।

1. संभवतः बॉलीवुड में मैंने पहला ऐसा सीन देखा है जहाँ लड़का अपने दोस्त से अपनी प्रेमिका के पीरियड्स की तकलीफ और दर्द पर बात कर रहा है कि, “यार तुझे पता है जब पीरियड्स होते हैं तब उसे कितना दर्द होता है। गर्म पानी का बैग रखना होता है उसकी थाई पर वगैरह वगैरह, समझ रहा है तू मेरी बात? और ये स्त्री-विरोध है! वाह। यहाँ पतियों और प्रेमियों को अपनी पत्नियों और प्रेमिकाओं के पीरियड्स कब आए कब गए हवा नहीं लगती और ये बात कर रहे हैं। गज़ब।

2. लड़का लड़की को थप्पड़ मारता है ये बात उछाल दी गई लेकिन एंड में लड़की लड़के को एक के बाद एक थप्पड़ जड़ती है जिसे वो गर्दन झुकाकर प्यार से सहता है, ये बात नहीं दिखी! अब ये पॉइंट्स लिखा है तो बात ये होने लगेगी कि अच्छा! तो मतलब थप्पड़ मारना सही है? जबकि ये मैंने कहा ही नहीं, मैंने तो ये ध्यान दिलाया कि लड़की वाले थप्पड़ आप मिस कर गए पॉपकॉर्न के चक्कर में।

3. लड़का लड़की को प्रॉपर्टी समझता है! गलत। कहीं नहीं ऐसा। वो उसकी परवाह करता है। अपने साथ रखकर उसकी पढ़ाई में मदद करता है, उसकी चोट ठीक करता है। लड़की सहज होती है सहमति रखती है। नहीं रखती है तो बताएँ।

ये पॉइंट्स मैं इसलिए गिना रही हूँ ताकि आपकी एक साइड की आँख में जो इन्फेक्शन हो रखा है वो सही हो जाए और आप दोनों आँखों से देख पाए।

खैर, मेरे मुद्दे कुछ और हैं उस पर आती हूँ।

कबीर सिंह आपके संस्कारी समाज का रफ़ चिट्ठा है बिना फ़िल्टर का, जिसमें लड़का जैसा है वैसा ही दिखता है। जो-जो उसके साथ घटता है उसके बाद उसके व्यक्तित्व में आए परिवर्तनों से वो खुद जूझ रहा है। अब चूँकि टाइटल में कबीर सिंह ही है तो प्रीति सिक्का के खाते में कम डायलॉग क्यों हैं, ये मूर्खता वाला सवाल ना कीजिए।

जो ज्ञान की गंगा कबीर सिंह को लेकर बहाई जा रही है उसे देखकर तो डायरेक्टर और एक्टर्स ने भी एक्स्ट्रा दो बार फिल्म देख डाली होगी कि यार कहीं सच में औरतों पर अत्याचार तो नहीं बना दिया!

एक बात बताइए, सिनेमा पहले आया कि समाज! पहले चेहरा आया कि दर्पण! तो कौन किसका प्रभाव है ये आपको समझ नहीं आता क्या? आप प्रक्रिया को परिणाम और परिणाम को प्रभाव कैसे बोल सकते हैं, क्या लॉजिक क्या है आपका?

समाज पहले बना ना! तो फिर इस फिल्म में ऐसा क्या दिखाया गया है जो पहले से आपके समाज में भयंकर रूप से मौजूद नहीं है? अतिरेक से समस्या हुई आपको! हम्म। तो वो तो सिनेमा में होगा ही। मसाला डाला जाएगा ना, नहीं तो आप जाएँगे ही क्यों!

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर कल्ट है और कबीर सिंह कबाड़ा!

वैसे इसमें स्टार्टिंग में दिखाया गया है ना कि लड़का एंगर मैनेजमेंट की समस्या से ग्रसित है! तो अब मुझे ये जानना है कि एंगर मेनेजमेंट से जूझ रहा किरदार किस तरह का व्यवहार करेगा? संतुलित! नहीं ना! सनकी इन्सान किस तरह से पेश आता है! फ़िल्टर लगाकर! नहीं ना! और किसने कहा कि लड़कियों को कबीर सिंह जैसा प्रेमी ही चाहिए या नहीं चाहिए? ये आप और हम कैसे तय करेंगे और क्यों करेंगे?

कबीर सिंह से रातों रात सब बिगड़ेंगे। गर्लफ्रेंड को प्रॉपर्टी समझेंगे। शराब, सिगरेट, ड्रग्स में नहाएँगे, रेंडमली किसी को भी रास्ते चलते पीट पिटा देंगे? अब सब कबीर सिंह बनकर घूमेंगे? अच्छा मतलब सब एमबीबीएस भी करेंगे? हैं? मतलब कुछ भी। कुछ भी। अबे! कुछ भी।

स्टार्टिंग में ही एक चीज़ और दिखाई गई है जब कबीर की दादी बोलती है “होप इज़ गुड और कबीर को यकीं है कि उसकी गुड़िया कहीं नहीं गई है वो उसे ढूँढ लेगा।” इसका मतलब अंत तक भी समझ नहीं आया क्या इतनी लम्बी फिल्म में? नहीं आया होगा क्योंकि स्त्री-विरोधी कोहरा छंटे तब ना कुछ दिखे।

सिंपल है बाबा, एक लड़का है प्यार करता है। सब कुछ स्वाभाविक सा है। उसके साथ हुए गलत को लेकर लड़ जाता है। उसमें कमियाँ है वो परफेक्ट नहीं है, जो कोई भी नहीं होता।

क्या अपने प्यार के लिए लड़ना नहीं चाहिए? लड़का अगर अपने या लड़की के घरवालों की बात मानकर लड़की को छोड़ दे तो कायर और ना माने उनकी बात तो बागी, हिंसक? मतलब दोनों तरफ से आप ही खेल लो यार।

डायरेक्टर ने आपको बोला क्या कि मैंने अखंड रामायण का पाठ रखा है, सपरिवार पधारना! तो फिर वहाँ जाकर कौन-से आदर्श खोज रहे हैं आप? ए सर्टिफिकेट का मतलब नहीं बुझाता आपको?

कौन-सी ऐसी चीज़ है जिसको इस फिल्म में जस्टिफाई किया गया है? क्या इसमें लगातार कबीर को उसकी आदतों की वजह से लताड़ नहीं लगाई गई है? ट्रेलर से समझ नहीं आया समझदारों को कि डार्क शेड की सनकी मिजाज़ के किरदार की फिल्म है?

परवर्ट कैसे हुआ लड़का? प्यार के नाम पर वो किसको ठगता है ये जानना है मुझे। वो एक्ट्रेस को अप्रोच करता है साफ़ बोलकर कि फिजिकल होना है प्यार-व्यार कुछ नहीं और वो लड़की तैयार हो जाती है यानी कि वो लड़की क्या हुई इस लॉजिक के हिसाब से? मासूम! अब आप इस पर घेरेंगे कि अच्छा! तो मतलब लड़का किसी के भी साथ सोए कोई दिक्कत नहीं! अब मैं यहाँ स्पून फिडिंग नहीं करवाऊँगी, कम से कम धूर्तों को तो बिल्कुल नहीं।

एक सीन है जहाँ वो एक्ट्रेस कबीर के कपड़े प्रेस कर रही है और वो चिढ़कर अपने दोस्त से बोलता है, “यार मुझे पसंद नहीं कि कोई मेरे लिए ये सब करे। मुझे अच्छा लगता था ये सब करना प्रीति के लिए।” अब ये दिखा कि नहीं आपको? कितनी छोटी छोटी चीजें जो सबसे बड़ा इम्पेक्ट रख रही हैं वो सब अपने छोड़ दी और उठाकर लाए अपने मतलब की चीज़। क्यों?

लड़का जहाँ जाता है अपनी प्रेमिका को ढूँढ़ता है। एक फेज़ होता है लाइफ का और अब आती है वो तीसरी बारी जहाँ लड़का अपनी माँ से कहता है कि, “माँ समझो न मेरी लाइफ का एक फेज़ चल रहा है।” होता है भाई एक फेज़ लाइफ का, वो भी तब जब रिश्तों में हारता है इंसान। तब संतुलन हिलता है दिल का, दिमाग का, व्यक्तित्व के हर एक पहलू का। सही गलत का फर्क सबसे पहले धुंधला पड़ता है उस पर भी तब जब नशा चढ़ा रहता हो सारा वक़्त। वो अपने आप को जिलाए रखने के लिए सेल्फ डेसट्रक्टिव मोड में लाकर उल जुलूल करने को बाध्य रहता है और जो कि पूरी तरह से गलत ही होता है। ये है कबीर सिंह का किरदार। ये सारी चीजें हरगिज़ जस्टिफाई नहीं की जा सकती लेकिन ये संभावनाएँ तो हैं ना!

हाउ कैन यू थिंक कि नशे का आदि सनकी इंसान समाज को आदर्श देगा? हाउ कुड यू? वही बात की मछली को उसके पेड़ पर चढ़ने की काबिलियत से नापना है तो आपको इलाज की ज़रूरत है भाई।

चौथी बारी तब आती है जब वो अपने दोस्त से पूछता है कि “ये कास्ट वास्ट कौन सिखाता है यार ये सब? क्या है ये सब! अरेंज मैरिज में प्यार होता है क्या या फिर सुहागरात का सोचकर ही एक दूसरे पर कूद जाते हैं?” अगर एक सनकी आदमी ऐसे सवाल पूछता है तो फिर इस दुनिया का हर आदमी सनकी क्यों ना हो? मैं तो खुद ऐसी हूँ।

जब किरदार सनकी है तो गीता पाठ नहीं पड़ेगा। व्हॉट डू यू वॉन्ट? हम साथ साथ हैं की टीम इन कबीर सिंह?

ड्रग्स, शराब, सिगरेट, हिंसा निश्चित और निर्विवाद रूप से बेहद ख़राब चीज़ें हैं और वो सबको पता है। आपको भी तो। या आप ये फिल्म देखते ही ये सब पीने लगे? अगर नहीं तो दूसरों की समझदारी पर शक क्यों?

मतलब एक सिनेमा बना, जिसमें शाहिद की अल्टीमेट एक्टिंग गई तेल लेने, ये संस्कारी समाज का “रैंकिंग डिसऑर्डर” पहले कूद गया। ऐसे जज करेंगे आप?

फिल्म है फिल्म और कोई महान फिल्म नही है। आदमी तीन घंटे मनोरंजन के लिए जाता है वरना ज्ञान तो इधर फेसबुक पर भी घणा पसरा है। संस्कारों की खेती इधर वैसे ही बिना ब्रेक के हो रही है। ऐसे जज कीजिएगा तो बॉलीवुड, टाॅलीवुड, हॉलीवुड सब बंद करना पड़ जाएगा।

मैसेज चाहिए इनको! तो नैतिक शिक्षा की क्लास में जाइए न, ए सर्टिफिकेट की फिल्म देखने काहे जा रहे?

हर मिनट होते बलात्कार वाले समाज के लोग इन फिल्मों से बिगड़ रहे हैं? जबकि सदियों से घरों में रामायण रखी है लेकिन एक पेज ना खुलता इनसे। बिल्कुल फिल्मों का प्रभाव होता है समाज पर लेकिन माइंड इट कि फिल्में खुद समाज का जीता जागता प्रभाव है। समाज ने कबीर सिंह पैदा किए हैं फिल्मों ने तो एक्टिंग करवाई है।

कबीर सिंह कोई महान नायक नहीं है। प्यार करता है और उसके लिए लड़ना जानता है बाकी सब उसके किरदार की कहानी है। बाकि क्या बात करनी होती है! संगीत अच्छा है। कॉपी रीमिक्स के ज़माने में कुछ मौलिक गीत है कुछ अर्जुन रेड्डी का ही बैकग्राउंड संगीत लिया गया है। कुछ सीन एडिट किए जा सकते थे और अर्जुन रेड्डी वाले ही रहते तो बेहतर था। शाहिद अपने किरदार से हिले नहीं हैं आपको भी नहीं हिलने देंगे। खैर..

एक किरदार रचा जाता है सिनेमा के लिए और उसको वैसा का वैसा उतारा जाता है परदे पर। डायरेक्टर आपके मूड और संस्कारों के हिसाब से नहीं बनाएगा। ऐसे तो कभी कुछ भी नहीं बन पाएगा। फिल्म को ए सर्टिफिकेट मिला है। सोच समझकर जाइए ना। हर चीज़ की एक काबिल जगह होती है। नैतिक शिक्षा चाहिए तो किताबों का रुख करें, प्रेरणा चाहिए तो मोटिवेशनल क्लासेस जॉइन करें। और उसको समाज की भलाई में किस तरह लाया गया उस पर मुझे टैग करके निबंध लिखें। आई वुड लव टू रीड बेबीज़।

फिर भी इस फिल्म से ही सन्देश चाहिए तो वो है ये कि प्यार कीजिए तो उसके लिए लड़िए। घरवाले नहीं मानेंगे टाइप का टाइमपास मत कीजिए। छोड़ देने के बाद इन्सान की क्या हालत हो सकती है उस पर भी गौर कीजिए। उसकी बर्बादी की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

जाते जाते एक दिलचस्प बात बता दूँ कि अर्जुन रेड्डी स्त्री विरोधी नहीं थी लेकिन कबीर सिंह है! हें हें हें!

मानोगे नहीं ना सुपर दोगलों!

एंड अफ्कोर्स मासूमों! नशा कोई भी हो चेतावनी के साथ आता है। नहीं भी आता हो तब भी मुझे आपकी समझदारी पर कोई शक नहीं। ये एक विशुद्ध मसाला फिल्म है। बात बस ये है। झूठ मत फैलाइए।

और जो ये पूछ रहे कि आपको ऐसा प्रेमी मिले तब क्या हो? तो तब ये हो कि वो लड़का प्रेमी था तब ऐसा नहीं था, प्रेम के चले जाने के बाद सेल्फ डेसट्रकटिव मोड में आ जाता है! उसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा भाइयों और भाइयों की बहनों?

इस फिल्म में बेवफा कोई नहीं है। एक सीन है बस उसी की वजह से गलतफहमियाँ होती है और फिर ये सब। खैर।

लेखिका: भारती गौड़

CCTV लगवाकर गंभीर ने केजरीवाल को कहा: एक कैमरा आपके झूठे वादों पर भी फोकस्ड

पूर्वी दिल्ली से सांसद गौतम गंभीर ने अपने संसदीय क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरे लगाने का काम शुरू किया है। उन्होंने इससे जुड़ा एक वीडियो ट्विटर पर शेयर करते हुए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल पर तंज भी कसा है। भाजपा सांसद ने कहा कि उनका एक कैमरा उनके झूठे वादों पर भी फोकस करेगा। दरअसल, केजरीवाल ने पूरी दिल्ली में सीसीटीवी कैमरा लगाने का वादा किया था जो कि अब तक अधूरा है।

गंभीर ने ट्वीट किया, “ऊपर वाला अब और करीब से देखेगा। मेरी माताओं, बहनों की सुरक्षा और अपराध नियंत्रण के लिए मैंने आज से अपने संसदीय क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरा लगवाने का काम शुरू कर दिया है। वैसे मफलरवाले (केजरीवाल) सर जी मेरा एक कैमरा आपके झूठे वादों पर भी फोकस्ड है।” इसमें गंभीर ने Hawkeye Systems को धन्यवाद भी दिया है।

इसके साथ ही गौतम गंभीर ने Hawkeye Systems द्वारा लिखा गया एक पत्र भी साझा किया है। जिसमें Hawkeye Systems ने गंभीर को पूर्वी दिल्ली में लोगों की सेवा करने के लिए बधाई दी है और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी ने गंभीर के सीसीटीवी कैमरे लगाकर महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के कार्य को पूरा करने में सहयोग करने की इच्छा जाहिर की है। कंपनी ने कहा कि वो गौतम गंभीर द्वारा बताए गए स्थानों पर 50 कैमरे इन्सटॉल करना चाहते हैं। कंपनी का कहना है कि ये उनके लिए सम्मान की बात होगी। इस पत्र में Hawkeye Systems ने कहा है कि गंभीर की स्वीकृति के बाद 3 से 4 सप्ताह में सारे कैमरे लग जाएँगे।

बता दें कि, सीसीटीवी कैमरे लगवाना उन वादों में से है, जिसे गौतम गंभीर ने लोकसभा चुनाव से पहले किए थे। क्रिकेट से राजनीति में आए गंभीर ने पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी (आप) की आतिशी मार्लेना और कॉन्ग्रेस के अरविंदर सिंह लवली को लोकसभा चुनाव में शिकस्त दी थी।

श्री लंका धमाके में नेशनल तौहीद जमात से जुड़े सारे आरोपित हिरासत में

श्री लंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने शनिवार को घोषणा की कि ईस्टर बम धमाकों में संदिग्ध माने जा रहे संगठन एनटीजे के सभी सदस्य उनकी हिरासत में आ गए हैं। 3 चर्चों और कई लक्ज़री होटलों में हुए नौ बम धमाकों में 258 लोग मारे गए थे और 500 के करीब घायल हुए थे। सरकार ने स्थानीय इस्लामी संगठन नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) पर इस्लामिक स्टेट (आइएस) के साथ हमले का आरोप लगाया था। दक्षिण श्री लंका के गाल में जनसभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे पुलिस से सूचना मिली है कि ज़ाहरान के ग्रुप के सभी लोग हिरासत में हैं।”

श्री लंका में हुए इस हमले में ज़ाहरान हाशिम वह संदिग्ध है जो बम धमाके में ही मारा गया था। इस हमले में 11 भारतीयों समेत 44 विदेशी भी मारे गए थे। विक्रमसिंघे के मुताबिक चरमपंथी संगठन से खतरे को पूरी तरह काबू में कर लिया गया है। “उनके साथ जिनके भी तार जुड़े थे, उन सबसे पूछताछ की जा रही है। ज़ाहरान के मज़हबी भाषण को सुनने जो आते थे, उनसे भी पूछताछ हुई है।” विक्रमसिंघे की सरकार पर पहले से दी गई गुप्त जानकारी पर भी कदम न उठाने का आरोप लगा था। जिम्मेदारी तय करने के लिए जाँच की जा रही है

वहीं राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना ने देश में लागू आपातकाल की सीमा बढ़ा दी है। यह शनिवार को समाप्त होने वाला था। धमाकों के बाद लागू इस कानून के अंतर्गत पुलिस और सुरक्षा बलों को हिरासत समेत इसके अंतर्गत व्यापक अधिकार मिले थे

‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने पर पुलिस ने 14 साल के लड़के को गोली मारी: बंगाल BJP

पश्चिम बंगाल में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल बीजेपी के अनुसार, शनिवार (22 जून) को बांकुरा ज़िले के पंचायसर में उनके 3 कार्यकर्ताओं को ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने की वजह से गोली मार दी गई, जबकि 14 साल का सौमन गंभीर रूप से घायल हो गया। फ़िलहाल, सौमन को मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है जहाँ वो ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा है। बीजेपी ट्विटर हैंडल से शेयर की गई इस घटना पर बीजेपी का कहना है कि राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी प्रशासनिक पावर का इस्तेमाल “निर्दोष नागरिकों पर आतंक फैलाने के लिए” कर रही हैं।

दरअसल, यह घटना उस वक्त हुई जब तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सांसद सुवेंदु अधिकारी बांकुरा में एक सार्वजनिक सभा में आए थे। यहाँ बीजेपी कार्यकर्ताओं ने ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। इसके बाद सत्ताधारी तृणमूल और बीजेपी के बीच तगड़ी झड़प हो गई और TMC कार्यकर्ताओं ने बीजेपी के स्थानीय अध्यक्ष तमल भुइन की दुकान को तहस-नहस कर दिया। स्थानीय अध्यक्ष के बचाव में बीजेपी कार्यकर्ता TMC कार्यकर्ताओं से भिड़ गए।

बांकुरा ज़िले से बीजेपी सांसद सुभाष सरकार ने बताया कि आपसी झड़प की सूचना जब पुलिस तक पहुँची तो उन्होंने वहाँ गोलीबारी शुरू कर दी। पुलिस ने गोलीबारी करने पर तर्क दिया कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया जिससे वहाँ मौजूद भीड़ तितर-बितर हो जाए। वहीं, बांकुरा के बीजेपी सांसद ने राज्य की पुलिस को फटकार लगाई और उनके इस दावे को ख़ारिज कर दिया कि उन्होंने दंगाई भीड़ को नियंत्रित करने के लिए गोलीबारी की थी।

इससे पहले, पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना ज़िले के भाटपारा इलाक़े में हिंसक झड़पें हुई थीं, जिसके बाद क्षेत्र में भाजपा का तीन सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल आया था। प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के दौरान पश्चिम बंगाल पुलिस की निंदा करने वाले नारे लगाए गए। ख़बरों के मुताबिक, बम भी फेंके गए जिसके बाद पुलिस ने हिंसा रोकने के लिए स्थानीय लोगों पर लाठी चार्ज किया।

IANS न्यूज़ एजेंसी से हुई बातचीत में अहलूवालिया कहा, “जब दो समूहों के बीच झड़प हुई, तो पुलिस ने एक समूह पर आरोप लगाया और दूसरे पर गोली चला दी। हम जानना चाहते हैं कि यह फैसला किसने लिया? इस साज़िश के पीछे कौन था? इसमें पूरी जाँच होनी चाहिए। हम (केंद्रीय गृह मंत्री) अमित शाह को रिपोर्ट सौंपेंगे और उन्हें यहाँ की ज़मीनी स्थिति से अवगत कराएँगे।”

जय श्रीराम के नारे से ममता बनर्जी पहले भी कई बार आक्रामक हो चुकी हैं। हाल ही में उन्होंने कहा था कि वो देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बचाने के लिए ‘जय श्री राम’ का विरोध करती रहेंगी। इस पर भाजपा ने मुख्यमंत्री निवास पर ‘जय श्रीराम’ लिखकर 10 लाख पोस्टकार्ड भेजने का फैसला किया था।

मोमिन ने बोला झूठ, जय श्री राम न बोलने पर कार से टक्कर की बात निकली फ़र्ज़ी

शनिवार (जून 22, 2019) को पुलिस ने मदरसा शिक्षक के उस आरोप को खारिज कर दिया, जिसमें उसने जय श्री राम बोलने से मना करने पर कार से टक्कर मारने का आरोप लगाया था। खबर के मुताबिक, पुलिस ने कहा कि मदरसा शिक्षक पर कथित हमले का कोई सुराग नहीं मिला है।

गौरतलब है कि दिल्ली के रोहिणी सेक्टर 20 इलाके में मदरसे के एक शिक्षक मोहम्मद मोमिन ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में कहा कि गुरुवार (जून 20, 2019) को जब वो मस्जिद से निकलकर मदरसे के पास टहल रहा था, तो उसके पास कार सवार कुछ युवक पहुँचे और उन लोगों ने मोमिन से जय श्री राम का नारा लगाने को कहा। मोहम्मद मोमिन का कहना है कि जब उसने करने से इनकार कर दिया तो गाड़ी में सवार लोगों ने उसे गालियाँ दी और फिर कार से टक्कर मारी।

दिल्ली पुलिस ने आईपीसी की धारा 323 के तहत केस दर्ज करते हुए मामले में जाँच शुरू की। पुलिस ने इस मामले में घटनास्थल की सीसीटीवी फुटेज भी खंगाला और शुरुआती जाँच के बारे में बताते हुए रोहिणी के डीसीपी एस डी मिश्रा ने कहा कि उन्होंने इस बारे में घटना के समय मौजूद चश्मदीद गवाह से बात की, जिसने उन्हें इस घटनाक्रम के पूरे सीक्वेंस को बताया। इससे मोमिन के आरोप साबित नहीं होते हैं। वहीं एक और पुलिसकर्मी ने बताया कि प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर मोमिन के दावों की पुष्टि नहीं होती है, लेकिन जाँच जारी है। घटनास्थल के पास लगे सीसीटीवी फुटेज से भी आरोपों की पुष्टि नहीं होती है।

इससे पहले भी कई ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, जब समुदाय विशेष के लोग जय श्री राम न बोलने पर मारपीट करने का आरोप लगाते हैं, लेकिन जब पुलिस तहकीकात करती है, तो आरोप पूरी तरह से निराधार और फर्जी साबित होता है। ऐसी ही एक घटना कुछ दिनों पहले गुरुग्राम में देखने को मिली। यहाँ के मुस्लिम युवक बरकत अली ने आरोप लगाया था कि वो शनिवार (मई 25, 2019) की रात मस्जिद से नमाज पढ़कर अपने घर जा रहा था। तभी रास्ते में 6 युवकों ने उसे रोका और टोपी उतारकर जय श्री राम बोलने के लिए कहा। बरकत का कहना था कि जब उसने ऐसा करने से मना किया तो युवकों ने उसके साथ मारपीट की।

वहीं, जब पुलिस ने इस मामले की गंभीरता को लेते हुए इसकी तहकीकात करनी शुरू की और उक्त इलाके में लगे सीसीटीवी के तकरीबन 50 फुटेज देखे। जिसमें सामने आया कि मुस्लिम युवक के साथ मारपीट हुई थी। लेकिन इस दौरान न तो किसी ने उसकी टोपी फेंकी और न ही उसकी शर्ट फाड़ी गई। इस मामले में पुलिस ने भी कहा था कि शराब के नशे में की गई मामूली सी मारपीट की घटना को कुछ असामाजिक तत्व सांप्रदायिकता का रंग देने का प्रयास कर रहे हैं।

अमेरिका वालो! भारत के अल्पसंख्यकों पर ज्ञान मत दो, पहले अपना ‘फोबिया’ ठीक करो

अमेरिका के विदेश विभाग की 2019 की अंतरराष्ट्रीय मज़हबी स्वतन्त्रता रिपोर्ट हाल ही में विदेश सचिव माइक पोम्पिओ द्वारा जारी की गई थी। अपनी रिपोर्ट में ट्रम्प प्रशासन ने ‘मोब-लिंचिंग’ की घटनाओं पर ‘चिंता जताते हुए’ मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। भाजपा का सीधे-सीधे नाम लेकर आरोप लगाया है कि उसके नेता मुस्लिम-विरोधी भाषण देते हैं। अधिकारी ऐसे हमलावरों पर मुकदमा अमूमन नहीं चलाते हैं। भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि भारतीय संविधान सभी समुदायों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा का वचन देता है। भारतीय जनता पार्टी की ओर से भी अमेरिकी रिपोर्ट की भर्त्सना की गई है।

समझ नहीं आ रहा यह हास्यास्पद ज्यादा है या पाखंडी कि जिस देश में कू क्लक्स क्लान (KKK) जैसे अश्वेतों को दोबारा गुलाम बनाने का सपना देखने वाला संगठन और रिचर्ड स्पेंसर जैसे श्वेत श्रेष्ठतावादी (वाइट सुप्रीमेसिस्ट) हज़ारों की संख्या में समर्थन जुटा रहे हों, जहाँ श्रीनिवास कुचिभोटला को एडम प्यूरिनटन “मुस्लिम समझ कर” गोली मार देता है, वह देश दूसरे देशों को अपने नागरिकों से कैसा बर्ताव करना है, यह सिखाए। अमेरिका को दूसरे देशों पर रिपोर्ट जारी करने के पहले अपने गिरेबान में झाँक लेना चाहिए।

58% अमेरिकी मुस्लिमों को आईएस समर्थक के रूप में देखते हैं

अमेरिका के ही एक संस्थान द्वारा किए गए सर्वे में अमेरिका के 58% लोग मुस्लिमों को आतंकी संगठन आईएस के समर्थक के रूप में देखते हैं। अमेरिका में 9/11 के एक आतंकी हमले के बाद मुस्लिमों के खिलाफ भेदभाव की घटनाएँ 250% बढ़ गईं हैं। अमेरिका की ट्रम्प सरकार को दुनिया की सबसे ज्यादा ‘इस्लामोफ़ोबिक’ सरकार के रूप में देखा जाता है। अमेरिका को सोच कर देखना चाहिए कि अगर भारत ने इन सब चीज़ों पर ‘रिपोर्ट’ जारी करनी शुरू कर दी तो उसे मुँह छिपाने कहाँ जाना पड़ेगा।

हिन्दूफ़ोबिया पर तो अमेरिका बात करना शुरू भी नहीं कर पाएगा

इस्लामोफ़ोबिया पर तो अमेरिका इस्लामी आतंक के हमलों की आड़ लेकर बचने का प्रयास कर सकता है, लेकिन हिन्दूफ़ोबिया के बचाव में अमेरिका के पास क्या तर्क है? कभी भारत को अमेरिका का ‘बौद्धिक वर्ग’ “P/C lens: P = pollution, population, and poverty; C = caste, cows, curry” से स्टीरियोटाइप करता है, कभी ‘बियर योग’ से लेकर ‘परम्परा-विहीन योग’ (पोस्ट-लीनियेज योग) के नाम पर बिना श्रेय दिए योग की चोरी करता है।

अमेरिकी मीडिया अपनी ही सांसद तुलसी गबार्ड और हिन्दू-अमेरिकन फाउंडेशन के खिलाफ हिन्दूफ़ोबिक नैरेटिव बुनता हैगीता को ‘बेईमान किताब’ कहने वाली और जानबूझकर हिन्दू शास्त्रों का गलत अनुवाद करने वाली वेंडी डोनिगर अमेरिकी सरकार से टैक्स छूट पाने वाले (यानि अमेरिकी सरकार द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से वित्तपोषित) शिकागो विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर है। नाज़ियों के हाकेनक्रेउज़ (हुक की तरह मुड़ा हुआ क्रॉस, ईसाई प्रतीकचिह्न) को अमेरिका में हिन्दुओं के स्वास्तिक के रूप में प्रचारित किया जाता है। भारत की संसद इस पर ‘कदम उठाने’ लगे तो?

शार्लोट्सविल याद दिलाएँ?

कहते हैं, “जाके पैर न फटी बिवाई, ता का जाने पीर पराई!” लेकिन अमेरिका के मामले में उलटी ही गंगा बह रही है। अपने राष्ट्रपति के खुद लिबरल गिरोह के दुष्प्रचार का शिकार होने के बावजूद ट्रम्प प्रशासन दूसरे देशों के खिलाफ उसी मीडिया के आधार पर राय कैसे बना सकता है? सामान्य अपराधों को पत्रकारिता के अमेरिकी समुदाय विशेष ने उसी तरह “भारत में इस्लामोफ़ोबिया/अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा” बना दिया है, जैसे ट्रम्प के “शार्लोट्सविल में दोनों ओर अच्छे लोग थे… दक्षिणपंथी प्रदर्शनकारियों में कुछ निंदनीय नाज़ी और वाइट सुप्रीमेसिस्टों के अलावा कुछ अच्छे लोग भी थे” को मीडिया ने “देखो, ट्रम्प नाज़ियों और वाइट सुप्रीमेसिस्टों का समर्थन कर रहा है” के रूप में दिखाया था

(शार्लोट्सविल में दक्षिणपंथी विरोध प्रदर्शन के बीच में घुस कर कुछ नाज़ियों और वाइट सुप्रीमेसिस्टों ने दूसरी ओर विरोध प्रदर्शन कर रहे वामपंथियों के खिलाफ हिंसा की थी, जिसमें 3 लोग मारे गए थे, और 30 से ज्यादा घायल हुए थे। ट्रम्प ने घटना की निंदा करते हुए कहा था कि दक्षिणपंथी जुलूस में केवल निंदनीय नाज़ी और वाइट सुप्रीमेसिस्ट ही नहीं, कुछ अच्छे लोग भी थे, जिनका इस घटना ने कोई लेना-देना नहीं था। मीडिया ने उनकी बात को तोड़-मरोड़ कर उन्हें नाज़ी-समर्थक के रूप में दिखाया था।)

चौधराहट कम करे अमेरिका

अमेरिका के लिए बेहतर होगा कि वह अपनी चौधराहट दुनिया पर दिखाना बंद करे। उसे पहले तो यह साफ़ करना चाहिए कि भारत के आंतरिक मामलों में दखलंदाज़ी करने वाला वह होता कौन है। अपने यहाँ चुनावों में बर्नी सैंडर्स के ख़िलाफ़ षड्यंत्र के खुलासे तक में रूसी हाथ होने के नाम से अमेरिकियों को अजीर्ण हो गया था। ऐसे में दूसरे देशों में इस हस्तक्षेप का क्या मतलब है? दूसरे देशों की सम्प्रभुता में हस्तक्षेप की यह नीति और कुछ नहीं, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ही है। बेहतर होगा कि अमेरिका हिंदुस्तान के मुस्लिमों की चिंता छोड़ कर अपनी इस खुजली का इलाज करे।

UPA सरकार का एक और घोटाला आया सामने, Pilates डील में CBI ने दर्ज की FIR

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने कॉन्ग्रेस शासनकाल (2008-09) में खरीदे गए 75 एयर फ़ोर्स के बेसिक ट्रेनर विमानों की ख़रीद में अनियमितता और भ्रष्टाचार (339 करोड़ रुपए की रिश्वत) के आरोपों में भगोड़े हथियार व्यापारी संजय भंडारी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया है।

CBI ने दिल्ली स्थित भंडारी के आधिकारिक ठिकानों पर छापेमारी की जिसमें इस मामले से जुड़े कुछ अहम दस्तावेज़ भी CBI के हाथ लगे हैं। जाँच एजेंसियों का कहना है कि रिश्वत के पैसों से लंदन में रॉबर्ट वाड्रा के लिए बेनामी सम्पत्ति ख़रीदी गई थी। इसी के चलते CBI ने संजय भंडारी से जुड़ी सम्पत्तियों पर छापेमारी की और कई दस्तावेज़ ज़ब्त किए।

ख़बर के अनुसार, FIR दर्ज करने के अलावा CBI ने नोएडा और गाज़ियाबाद में कुल नौ स्थानों पर छापा मारा, इसमें संजय भंडारी का घर और ट्रेनर विमान बनाने वाली स्विस कंपनी पिलाटस का दफ़्तर भी शामिल है। इससे पहले भी CBI संजय भंडारी की सम्पत्तियों पर रेड डाल चुकी है।

CBI ने संजय भंडारी समेत भारतीय वायु सेना, रक्षा मंत्रालय के अज्ञात अधिकारियों और स्विटज़रलैंड की कंपनी पिलाटस एयरक्राफ्ट लिमिटेड के ख़िलाफ़ FIR दर्ज की है। यह FIR पिलाटस एयरक्राफ्ट डील को लेकर दर्ज की गई है, जो कि UPA के कार्यकाल में हुई थी। इस FIR में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और उनके जीजा रॉबर्ट वाड्रा का नाम दर्ज नहीं है। लेकिन रॉबर्ट वाड्रा के संबंध भंडारी से हैं यह साबित हो चुका है।

CBI की FIR के अनुसार, 2011 से 2015 के बीच एक तरफ पिलाटस वायुसेना को ट्रेनर विमान सप्लाई कर रहा था, तो दूसरी ओर संजय भंडारी के भारत और दुबई स्थित कंपनियों में करोड़ों रुपए जमा करा रहा था। इस बीच 350 करोड़ रुपए जमा कराने के सबूत मिले हैं।

यह भी पता चला है कि इसी दौरान संजय भंडारी ने करोड़ों रुपए नकद देकर कई कंपनियाँ ख़रीदी और अपनी कंपनियों में नकद के बदले दूसरी कंपनियों से फंड ट्रांसफर कराया। CBI के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पूरी डील में 350 करोड़ रुपए से अधिक दलाली की जाने की आशंका है। जाँच के बाद ही पता चल पाएगा कि असल में कुल कितने की दलाली दी गई थी।

जानकारी के मुताबिक़, संजय भंडारी के लंदन स्थित रिश्तेदार सुमित चड्ढा, मनोज अरोड़ा और रॉबर्ट वाड्रा के बीच ई-मेल पर हुई बातचीत से पता चलता है कि वाड्रा की उस सम्पत्ति में दिलचस्पी थी और वो उस प्रॉपर्टी में चल रहे रेनोवेशन वर्क के बारे में सब कुछ जानना चाहता था। प्रवर्तन निदेशालय कोर्ट को इस सम्पत्ति के बारे में बता चुका है, जिसके लाभार्थी रॉबर्ट वाड्रा हैं। इसमें लंदन के दो घर शामिल हैं जिनकी क़ीमत 5 मिलियन पाउंड और 4 मिलियन पाउंड है। इसके अलावा 6 फ़्लैट भी शामिल हैं।

आख़िर पिलाटस डील क्या है

पिलाटस डील वायु सेना के लिए बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट ख़रीदने के लिए थी, जिसके तहत 75 पिलाटस पीसी-7 बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट ख़रीदे जाने की तैयारी थी। यह डील 2,896 करोड़ रुपए में हुई थी। वर्ष 2008 में भंडारी ने ऑफसेट सॉलूशन्स नामक कंपनी बनाई। वर्ष 2010 में ऑफसेट ने पिलाटस के साथ एक डील साइन की। जाँच एजेंसियों को मिले दस्तावोज़ के अनुसार, 7,50,000 स्विस फ्रैंक पिलाटस ने कंसलटेंसी के लिए भंडारी को दिए। इसी दौरान संजय भंडारी ने लंदन में रियल एस्टेट प्रॉपर्टी ख़रीद रहे थे।

मोदी की सुनामी में हम जिन्दा बच गए, यही बड़ी बात है: सलमान खुर्शीद

कॉन्ग्रेस ने पहली बार ये माना है कि लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी की लहर ही नहीं सुनामी चल रही थी। फर्रुखाबाद से लोकसभा चुनाव हारने के बाद पहली बार कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद शनिवार (जून 22, 109) को वहाँ पहुँचे। इस दौरान उन्होंने लोकसभा चुनाव में हार की समीक्षा की और माना कि पीएम मोदी की लोकप्रियता का चुनाव में कोई मुकाबला नहीं कर सका। उन्होंने कहा कि मोदी की सुनामी सब कुछ बहा ले गई लेकिन हम जिंदा रहे ये अच्छी बात है।

सलमान खुर्शीद ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “आज तो हम यही जानते हैं कि चुनाव हुआ और चुनाव में पीएम की लोकप्रियता इतनी थी कि उसके सामने कोई खड़ा नहीं हो पाया, लेकिन एक अच्छी बात है कि सुनामी आया, उसने सब कुछ बहा दिया, लेकिन कम से कम हम जिंदा रहे और आपसे बात तो कर सकते हैं।” इसके साथ ही उन्होंने कहा कि यदि वो पीएम मोदी की लोकप्रियता को नकारते हैं, तो इसका मतलब है कि वो चुनावों को भी नकार रहे हैं।

हालाँकि, सलमान खुर्शीद ने मोदी लहर को तो माना पर साथ ही सबरीमाला और तीन तलाक मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना भी साधा। उन्होंने सबरीमाला मुद्दे पर कहा कि केंद्र सरकार सबरीमाला के फैसले को पलटने के लिए तैयार है, जबकि उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को रोका नहीं जाना चाहिए। महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत है। मोदी सरकार को अदालत का फैसला मानना चाहिए।

वहीं, उन्होंने संसद में मोदी सरकार द्वारा तीन तलाक बिल लाए जाने का जिक्र करते हुए कहा कि तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट पहले ही समाप्त कर चुका है। दुनिया में तीन तलाक कहीं नहीं है। हिंदुस्तान में भी तीन तलाक कहीं नहीं है। देश में तीन तलाक को गलत समझा गया है, जो देश में है ही नहीं, उस पर तीन साल की सजा दी जा रही है। गौरतलब है कि, 2019 के लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को 2014 के मुकाबले केवल 8 सीटों का फायदा हुआ है। 2014 में जहाँ पार्टी को 44 सीटें मिली थीं, वहीं इस बार पार्टी के खाते में 52 सीटें ही आई हैं।