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मुस्लिम बहुल ट्यूनीशिया ने आत्मघाती आतंकी हमले के बाद नक़ाब पर लगाया प्रतिबंध

अफ्रीका के मुस्लिम देश ट्यूनीशिया के प्रधानमंत्री ने देश में हुए हमलों के बाद सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सरकारी कार्यालयों में नक़ाब पर प्रतिबंध लगा दिया। प्रधानमंत्री यूसुफ़ चाहेद ने एक सरकारी परिपत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके अनुसार, “सरकारी प्रशासनिक कार्यालयों एवं सरकारी संस्थानों में किसी भी व्यक्ति के मुँह ढक कर आने पर सुरक्षा कारणों से प्रतिबंध” लगाने की बात की गई है।

इस आदेश के अनुसार, सुरक्षा कारणों से देश के सभी स्त्री-पुरुषों के लिए अपना चेहरा खुला रखना अनिवार्य कर दिया गया, जिससे उनकी पहचान स्पष्ट हो सके। दरअसल, ट्यूनीशियान में 27 जून 2019 को हुए आत्मघाती हमले के बाद यह निर्णय लिया गया है। इस हमले में दो लोग मारे गए थे और सात घायल हुए थे।

वहीं, मानवधिकारों से जुड़ी संस्था ट्यूनीशिया लीग ने अनुरोध किया है कि यह प्रतिबंध स्थायी न होकर अस्थायी होना चाहिए। लीग के अध्यक्ष जामेल मुसल्लम का कहना है कि हमें इच्छानुसार, पोशाक पहनने की आज़ादी होनी चाहिए।

ट्यूनीशिया एक मुस्लिम देश है जहाँ इस्लाम राजकीय धर्म है। देश की सरकार को ‘इस्लाम का संरक्षक’ माना जाता है और संविधान में देश के राष्ट्रपति का मुस्लिम होना आवश्यक है।

ऐतिहासिक तौर पर भी ट्यूनीशिया में ज़िन अल अबिदीन बेन अली के शासनकाल के दौरान भी, किसी भी मजहब के प्रतीक चिह्नों का वाह्य प्रदर्शन, चाहे वो इस्लामी ही क्यों न हो प्रतिबंधित था। लेकिन, 2011 की ‘क्रांति’ के बाद स्थिति बदल गई। ऐसे मज़हबी प्रतीकों पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया था। हालाँकि, 2015 के आतंकी हमले के बाद, नक़ाब पर प्रतिबंध को फिर से लागू करने की माँग की गई।

कॉन्ग्रेस और मजहब विशेष के अवैध प्रवासियों की प्रेम कहानी: नेहरू से ‘गाँधी’ तक तुष्टिकरण का चरम

वैसे तो एनआरसी का मसला असम की राज्य सरकार, केंद्र की तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार और असम के राजनैतिक दलों से शुरू हुआ था, मगर इसकी जड़ें पंडित नेहरू के कार्यकाल तक जाती हैं- जो बहुत कम लोग जानते हैं।

1950 में बनाए गए अप्रवासी कानून के तहत सरकार के संज्ञान में लाया गया कि असम में अवैध प्रवासियों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो कि चिंता का विषय है। इसलिए इस कानून की स्थापना के पीछे का मूल ही असम से अवैध प्रवासियों को बाहर करना था। 1950 में बना अप्रवासी कानून उस समय की कार्यकारी सरकार ने बनाया था।

1951 में असम से अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने के लिए एक ऐसी सूची की आवश्यकता पड़ी, जिसमें भारतीय नागरिकों की जानकारी हो, इसलिए National Register of Citizens of India (NRC) भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार किया गया, जिसमें देश के सभी नागरिकों के नाम, आयु व पता लिखे गए थे। 

1951 की एनआरसी उस वर्ष की जनगणना के बाद तैयार की गयी थी। इसके बाद दूसरा कदम सरकार को यह उठाना था कि असम से अवैध प्रवासियों को बाहर निकाला जाए। लेकिन 1951 में जनगणना के बाद अंत में चुनाव शुरू हो गए, जो 1952 तक चले और इसके बाद नई सरकार ने इस काम को ठंडे बस्ते में डाल दिया। 1952 में सरकार की ओर से एक बड़ा ही बेतुका कारण बताकर इस विषय को टाल दिया गया। 

‘विदेशी मामलों पर श्वेत पत्र’ में सरकार ने कहा कि अक्टूबर 1952 से भारत और पाकिस्तान के बीच वीज़ा और पासपोर्ट नियमों का कार्यान्वन शुरू हो चुका था जो अधिक महत्व का काम था इसलिए एनआरसी के काम को रोकना पड़ा। यह कारण बेतुका इसलिए भी है क्योंकि वीज़ा और पासपोर्ट के संचालन के बाद से तो काम और भी आसान हो जाना चाहिए था, ताकि विदेशी नागरिकों को अपने देश से वीज़ा और पासपोर्ट लाने की चेतावनी दी जा सके।

1961 की जनगणना के बाद भारत के रजिस्ट्रार जनरल ने अपनी जनगणना की रिपोर्ट में बताया कि साल 1961 तक असम में 2 लाख से अधिक अवैध प्रवासी आ चुके थे। इसके करीब 4 साल बाद 1965 में (तब तक प्रधानमंत्री नेहरू का देहांत हो चुका था और इस गंभीर विषय को लाल बहादुर शास्त्री जी के ज़िम्मे छोड़ा गया) एनआरसी के अंतर्गत आने वाले सभी लोगों को एक राष्ट्रीय पहचान पत्र और राष्ट्रीय पहचान अंक दिए जाने थे। मगर इस काम की व्यापकता से डरते हुए और इसे अव्यवहारिक घोषित करते हुए इसे सन 1966 में भी टाल दिया गया।

1971 तक पूर्वी पाकिस्तान में स्थिति भयावह हो चुकी थी जिसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच एक और युद्ध हुआ। इस दौरान भी बहुत बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों ने भारत में प्रवेश किया। 1971 के बाद से यह प्रवेश बढ़ता ही गया। चार वर्षों बाद 1975 में देश में  आपातकाल लागू होने के बाद 1977 तक कोई बड़ी प्रगति इसमें नहीं हो सकी, लेकिन 1979 में असम के छात्र परिषदों ने इस मामले को बहुत ही व्यापक स्तर पर उठाया और काफी बड़ी संख्या को प्रभावित किया। 

छात्र संगठनों का असम के लिए संघर्ष

ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) व ऑल असम गण संग्राम परिषद (AAGSP) का संघर्ष भी अपने आप में एक कहानी है। असम में बढ़ते अप्रवासियों के कारण असम के संसाधनों का ह्रास हो रहा था। वे संसाधन जो राज्य की मूल निवासी जनता को मिलने चाहिए थे, उन्हें अवैध प्रवासियों को दिया जा रहा था। बांग्लादेश से भारत आने वाले अवैध प्रवासियों में समुदाय विशेष की आबादी ज़्यादा थी, और कॉन्ग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति के कारण समुदाय विशेष को विशेष सत्कार मिलता था। राज्य की नौकरियाँ यदि कोई सबसे ज़्यादा खा रहा था तो वे अवैध प्रवासी थे।

राज्य में अगर अवैध बस्तियाँ बन रही थीं, ज़मीन पर कब्ज़ा बढ़ रहा था और कानून व्यवस्था चरमरा रही थी तो उसके पीछे भी अवैध प्रवासी थे। चोरी, हत्या, लूट, धमकी और अन्य अपराध भी राज्य में अवैध प्रवासियों के कारण बढ़ते ही जा रहे थे। दुःखद यह है कि एनआरसी के जिस काम को 1966 में लाल बहादुर शास्त्री जी ने टाल दिया था, उसे दोबारा इंदिरा गाँधी ने शुरू तक नहीं कराया। 2 लाख से अधिक प्रवासी 1961 में असम में आ चुके थे, और इसके बाद भारत-पाक युद्ध और आगामी वर्षों में भी प्रवासियों का आगमन रुक नहीं रहा था, जिसके कारण अपराध और अपराधियों की संख्या बढ़ रही थी।

अंततः असम के छात्र संगठनों के आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया। इस आंदोलन में भी काफ़ी हिंसा हुई और बहुत लोगों की जानें गईं। इस आंदोलन में ट्रेन भी रोकी गईं, और असम से बिहार रिफाइनरी भेजे जाने वाले तेल को भी रोका गया। आंदोलनकारियों की माँग थी कि 1951 के बाद आए सभी अवैध प्रवासियों को राज्य से बाहर निकाला जाए। आंदोलनकारियों की माँग केवल अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने की ही नहीं, बल्कि अवैध वोटरों को भी निकालने की थी।

करीब 6 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद सन 1985 में AASU और AAGSP की बातें राज्य व केंद्र सरकार ने मान ली और राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के साथ AASU और AAGSP व राज्य सरकार का त्रिपक्षीय समझौता हुआ जिसे असम एकॉर्ड या ‘असम समझौते’ के नाम से जाना जाता है। राजीव गाँधी की सरकार में हुए इस समझौते के अनुसार सरकार ने यह वादा किया था कि दिनांक 25 मार्च 1971 (बांग्लादेश का स्वतंत्रता दिवस) के निर्णायक दिवस के बाद असम में आए शरणार्थियों को वापस बांग्लादेश भेज दिया जाएगा। 

ध्यान रहे कि इससे पहले सरकार के संज्ञान में वर्ष 1965 में ही यह आ गया था कि 2 लाख से अधिक प्रवासी राज्य में प्रवेश कर चुके हैं और उन्हें हटाना है, मगर सरकार अपनी अक्षमता के कारण उन 2 लाख प्रवासियों को माफ करने की नीति बना चुकी थी और छात्र संगठनों ने भी यह महसूस किया कि 6 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद कुछ फ़ैसला तो हमारे हित में आया, इसलिए वे सरकार के साथ इस समझौते का हिस्सा बन गए और आंदोलन वापस ले लिया गया। 

अब तक असम की स्थिति 1951 से अलग हो चुकी थी, इसलिए 1951 में बनी एनआरसी की सूची अपडेट करने की ज़रूरत थी। अपडेट करने के बाद ही 1951-1971 के बीच आए अवैध प्रवासियों को राज्य में शरण दिए जाने की इजाज़त दी जाती और उसके बाद के कालखंड में आए प्रवासियों को बाहर निकाला जाता। मगर हमेशा की तरह कॉन्ग्रेस ने असम समझौता केवल अपने राजनीतिक फायदे के लिए ही किया था क्योंकि एनआरसी अपडेट करने को लेकर कॉन्ग्रेस ने कोई भी प्रगति नहीं दिखाई। 

इसके बाद सालों तक अवैध प्रवासियों पर चर्चा नहीं की गई, न उन्हें खोजा गया न ही उन्हें निकालने का प्रयास किया गया। हाँ, 2005 में एक बार मनमोहन सिंह ने प्रयास का दिखावा ज़रूर किया था। असम से ही राज्यसभा साँसद रहे मनमोहन सिंह ने 2005 में दिल्ली में त्रिपक्षीय बैठक की जिसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन का प्रतिनिधित्व रहा। लेकिन खुद रिमोट-कंट्रोल से चलने वाले मनमोहन सिंह इसके आगे कुछ न कर सके, और मात्र बैठक करके अपना राजनीतिक हित साध गए।

2009 में पड़ा सर्वोच्च न्यायालय का डंडा

2009 में ‘असम पब्लिक वर्क्स’ नामक एक ग़ैर सरकारी संगठन ने जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की। इस याचिका के माध्यम से संगठन ने सरकार से पूछा कि एनआरसी अपडेट होने का काम कहाँ तक पहुँचा, लेकिन दुर्भाग्य से यह काम तनिक भी आगे नहीं बढ़ा था। सर्वोच्च न्यायालय ने इसके बाद सरकार से इस काम को तेज़ी से शुरू करने को कहा जिसके बाद सरकार ने वर्ष 2010 में दो प्रखंडों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया। 

कामरूप और बारपेटा में एनआरसी अपडेट करने की शुरुआत के लिए गए अधिकारियों को मुँह की खानी पड़ी। असम में अवैध प्रवासी समुदाय समुदाय ने अधिकारियों, मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के विरुद्ध प्रदर्शन किया, नारे लगाए और जब पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो उन्होंने आगजनी भी की। इसके बाद माहौल और ख़राब हो गया जिससे यह काम पुनः रुक गया।  

उस समय की यूपीए सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी पालन न कर सकी। इतना ही नहीं, पिछले प्रोजेक्ट्स को लटकाने का कॉन्ग्रेस का रवैया फिर सामने आया और इसके बाद 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने पूरा काम अपनी निगरानी में लिया। 2014 में चुन कर आई मोदी सरकार को सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर तेज़ी से काम करने का आदेश दिया। 

नरेंद्र मोदी सरकार ने इस मामले में कोई ढिलाई नहीं बरती। कॉन्ग्रेस के रवैये के विपरीत, मोदी सरकार ने काम में तेज़ी दिखाई और वह काम जो 1985 में शुरू हो जाना चाहिए था, वह 30 वर्षों बाद 2015 में शुरू हुआ। एनआरसी को अपडेट करने के लिए मोदी सरकार ने आवेदन की शुरुआत 2015 से कर दी। लोगों ने आवेदन भरना शुरू किया और 31 अगस्त 2018 को आवेदन बंद होने तक, असम की आबादी के बराबर 3 करोड़ 29 लाख आवेदन आ चुके थे। 1 सितंबर से ही सरकार ने वेरिफिकेशन यानी जाँच का काम शुरू कर दिया। करीब दो वर्षों में यह काम पूरा हो गया, और 30 जुलाई 2017 को सरकार ने पहली ड्राफ्ट रिपोर्ट यानि प्रारूप तैयार कर दिया।

3 करोड़ की जनसंख्या में से केवल 1 करोड़ 90 लाख लोगों के नाम इस रिपोर्ट में शामिल थे। इसके बाद सरकार ने लोगों को अवसर दिया कि जिनके नाम शामिल नहीं हैं, वे कोई भी प्रामाणिक दस्तावेज़ दिखा कर अपना नाम शामिल करा सकते हैं। साल भर बाद दोबारा वेरिफिकेशन हुआ और 30 जुलाई 2018 को सरकार ने फाइनल ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार की, जिसमें 40 लाख लोगों के नाम नहीं थे। 

इसके बाद भी सरकार ने एक और अवसर उन लोगों को दिया, जो नागरिक हैं और फिर भी अपने दस्तावेज़ जमा नहीं करा पाए। इस साल 2019 में सरकार फाइनल रिपोर्ट जारी करेगी, जो कि ड्राफ्ट रिपोर्ट नहीं होगी। यह ग़ौर करने वाली बात है कि पिछले 5 सालों में जिस तेज़ी के साथ काम हुआ है, पिछली सरकारों ने वह तेज़ी नहीं दिखाई। 30 सालों से अटके हुए काम को मोदी सरकार ने 5 साल में पूरा किया। अगर मोदी सरकार सत्ता में वापस नहीं आई होती तो शायद इस साल आने वाली एनआरसी की फाइनल रिपोर्ट की संभावना ही नहीं होती।

अब भी जिनके नाम इस एनआरसी में नहीं होंगे, और वे लोग देश के नागरिक हुए, उनके पास अवसर है कि वे ‘फॉरेनर ट्रिब्यूनल’ में अपनी याचिका दायर करें, ख़ुद को नागरिक साबित करें और सूची में अपना नाम दर्ज करवाएँ। यानि जिन लोगों के नाम सरकार ने सूची में नहीं रखे हैं, मगर वे फिर भी ख़ुद को देश का नागरिक मानते हैं, उन्हें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपनी लड़ाई लड़नी होगी। यदि उन्होंने वहाँ साबित कर दिया कि वे भारतीय नागरिक ही हैं, तब उनका नाम एनआरसी में जोड़ दिया जाएगा। भारत सरकार द्वारा दो तीन मौके दिए जाने के बाद यही रास्ता बचेगा। 

अपने राजनीतिक हित के लिए समस्याओं को जारी रखना कॉन्ग्रेस का पुराना रवैया रहा है। 2017-18 में एनआरसी की ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद कॉन्ग्रेस असम में रहने वाले अवैध प्रवासियों के हक़ में आवाज़ उठाने लगी, कानूनी प्रक्रिया से इनकार करने लगी और यहाँ तक कहने लगी कि भाजपा से ज़्यादा काम हमने किया है। ख़ैर कॉन्ग्रेस की इसी नीति ने उसे देश में नकारा है और यदि आगे भी यही स्थिति रही तो कॉन्ग्रेस मुक्त भारत होना पक्का है। 

VIDEO: जब पाकिस्तानी एंकर ने Apple कंपनी को समझ लिया सेब, सोशल मीडिया पर हुई ट्रोल, खूब उड़ा मजाक

पाकिस्तानी न्यूज चैनल की एक महिला एंकर लाइव शो के दौरान एक ऐसी गलती कर बैठी, जिससे वो ट्विटर पर ट्रोल हो गई। दरअसल, यह महिला एंकर शो के दौरान कन्फ्यूज हो गई और Apple कंपनी को सेब (फल) समझ बैठी। इसके बाद इस प्रोग्राम का ये फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और एंकर का सोशल मीडिया पर जमकर मजाक उड़ाया जा रहा है। लोग इस पर तरह-तरह की मीम्स बनाकर एंकर और पाकिस्तान की खिंचाई कर रहे हैं।

बता दें कि, न्यूज चैनल पर बिजनस से जुड़ा कार्यक्रम चल रहा था। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर चर्चा चल रही थी। इस दौरान पैनलिस्ट एंकर को बताते हैं कि अमेरिकी मल्टीनैशनल कंपनी ऐपल के कारोबार की बात करें, तो वह पाकिस्तान के पूरे बजट से कहीं ज्यादा है। इसी बीच एंकर उन्हें टोकते हुए कहती हैं, “हाँ, मैंने भी सुना है कि सेब की कई किस्में होती हैं और अच्छा कारोबार कर रही हैं।” एंकर की इस बात से पैनलिस्ट हैरान रह जाते हैं और वो उन्हें करेक्ट करते हुए कहते हैं कि वो एप्पल मोबाइल कंपनी के बारे में बात कर रहे हैं, न कि खाने वाले फल सेब के बारे में। ये सुनते ही एंकर की शक्ल उतर गई और वो बेहद शर्मिंदा हो गईं।

पाकिस्तान की एक पत्रकार नायला इनायत ने अपने ट्विटर हैंडल से इस कार्यक्रम का एक वीडियो क्लिप शेयर किया। ट्विटर पर यह वीडियो शेयर होते ही यूजर्स ने इसे हाथों हाथ लिया और जमकर मजाक उड़ाया। लोगों ने कमेंट करते हुए कहा कि कहा कि ये न्यूज चैनल है या कॉमेडी शो। एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि इसलिए कहते हैं रोजाना एक सेब आपको डॉक्टर से दूर रखता है, लेकिन ये नहीं कहा कि सेब आपको मनोचिकित्सक से भी दूर रखता है। वहीं, सिद्धार्थ नाम के यूजर ने लिखा कि उस आदमी को सलाम जो महिला एंकर की सेब वाली बात सुनकर भी धैर्य के साथ कुर्सी पर बैठा रहा और हँसा नहीं।

‘जय श्री राम’ और ‘रामनवमी’ से पूरी तरह अनजान है ‘महान’ अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन

लोकसभा चुनाव के दौरान बंगाल में ‘जय श्री राम’ के नारे को लेकर चल रहा बवाल फिलहाल थमता हुआ नजर नहीं आ रहा। बंगाल में जय श्री राम के नारे को लेकर टीएमसी और भाजपा आमने-सामने हैं। अब इस विवाद पर नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की है। 

अमर्त्य सेन ने कहा है कि ‘जय श्री राम’ के नारे का बंगाली संस्कृति से कोई संबंध नहीं है। सेन ने कहा कि ‘माँ दुर्गा’ के जयकारे की तरह ‘जय श्री राम’ का नारा बंगाली संस्कृति से जुड़ा हुआ नहीं है। उनका कहना है कि उन्होंने पहले कभी जय श्री राम का नारा नहीं सुना। अब इसका इस्तेमाल लोगों को पीटने के लिए किया जा रहा है। सेन के अनुसार, जय श्री राम का बंगाली संस्कृति से कोई संबंध नहीं है।

अमर्त्य सेन ने ये बात शुक्रवार (जुलाई 5, 2019) को जादवपुर विश्वविद्यालय में कही। उन्होंने कहा कि आज कल राम नवमी काफी लोकप्रिय हो रही है, मगर उन्होंने पहले कभी इसके बारे में नहीं सुना। उनका कहना है कि ‘माँ दुर्गा’ बंगालियों के जीवन में सर्वव्याप्त हैं और अब बंगाल में जय श्री राम का इस्तेमाल लोगों को पीटने के लिए किया जा रहा है। साथ ही सेन ने कहा कि उन्होंने अपनी चार साल की पोती से पूछा कि आपका पसंदीदा भगवान कौन है, तो उसने जवाब देते हुए कहा कि ‘माँ दुर्गा’ उसकी पसंदीदा देवी हैं। सेन का कहना है कि रामनवमी के साथ माँ दुर्गा के महत्त्व की तुलना नहीं की जा सकती।

अमर्त्य सेन के इस बयान पर अब पश्चिम बंगाल के भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि शायद अमर्त्य सेन बंगाल को नहीं जानते हैं। क्या वो बंगाल और भारतीय संस्कृति के बारे में जानते हैं? जय श्री राम का नारा अधिकतर जगहों पर लगाया जाता है और अब पूरा बंगाल इसे कह रहा है।

गौरतलब है कि, जय श्री राम बीते लोकसभा चुनाव से ही बंगाल में चर्चा में बना हुआ है। आम लोगों से ज्यादा यह नारा सियासी गलियारों में गूँजता दिखाई दे रहा है। बंगाल में जय श्री राम का नारा भाजपा की पहचान का पर्याय बन गया है और इस नारे को लगाने वाले की पहचान भारतीय जनता पार्टी के समर्थक के तौर पर होने लगी है। ऐसा देखा गया है कि, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जय श्री राम के नारे से काफी चिढ़ती हैं और जय श्री राम बोलने पर वो लोगों को जेल भी भिजवा चुकी हैं।

PM मोदी Varanasi लाइव: पूर्व PM शास्त्री की प्रतिमा का अनावरण, 22 लाख पौधारोपण का लक्ष्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी पहुँच गए हैं। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नईक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उन्हें पुस्तक भेंट करके उनका स्वागत किया। केंद्रीय मंत्री महेंद्रनाथ पांडे भी इस दौरान मौजूद रहे। इसके बाद पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की प्रतिमा का अनावरण किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में पौधारोपण अभियान की शुरुआत की। इस अभियान के तहत 22 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य है। प्रधानमंत्री मोदी बनारस आए थे एक भले आगंतुक की तरह, लेकिन अब यहाँ की गलियों में उनकी आत्मा निवास करती है। अपनी बनारस यात्रा में वो हर बार एक नई बस्ती से परिचय कराते हैं। इसके अलावा वो कई बार BHU भी जा चुके हैं। स्वतंत्रता भवन में भाषण भी दे चुके हैं।

अपने दौरे से पहले पीएम मोदी ने ट्वीट करके बताया था कि वो भाजपा का देशव्यापी सदस्यता अभियान शुरू करेंगे। यह अभियान समाज के सभी वर्ग के लोगों को भाजपा परिवार से जोड़ेगा। यह हमारी पार्टी को मज़बूत करेगा।

ट्विटर पर एक वीडियो शेयर करते हुए उन्होंने लिखा, “महान शिक्षाविद् और प्रखर राष्ट्रवादी विचारक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनकी जयंती पर शत-शत नमन। राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।” इसके अलावा उन्होंने इस बात की भी जानकारी दी कि वो इस अभियान में काशी में शामिल रहेंगे। 

अपने वाराणसी दौरे में प्रधानमंत्री मोदी बड़ा लालपुर में दीनदयाल उपाध्याय व्यापार सुविधा केंद्र में लगभग 5,000 पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे। इस अवसर पर वो सदस्यता अभियान शुरू करेंगे, साथ ही कुछ कार्यकर्ताओं को सम्मानित भी करेंगे।

अपने पिछले कार्यकाल के दौरान पीए मोदी ने गंगा घाट में फावड़ा चलाकर अपने ड्रीम प्रोजेक्ट स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की थी।

बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद एयरस्पेस बंद करने के कारण कंगाल PAK को हुआ ₹688 करोड़ का नुकसान

बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद से पाकिस्तान ने अपना एयरस्पेस बंद किया हुआ है, जिसके कारण पिछले दिनों भारतीय एयरलाइंस के साथ विदेश में रहने वाले भारतीय छात्रों को काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। लेकिन ऐसा नहीं है कि ये नुकसान सिर्फ़ भारतीय छात्रों और भारतीय एयरलाइंस को ही हुआ हो, क्योंकि इस कदम को उठाने से पाकिस्तान को भी करोड़ों की चपत लगी है।

मीडिया खबरों के अनुसार पाकिस्तान को अपना एयरस्पेस बंद करने के कारण फरवरी से अब तक लगभग ₹688 करोड़ का नुकसान हुआ है। पहले से ही आर्थिक कंगाली का सामना कर रहे पाकिस्तान को यह नुकसान कुछ ज़्यादा ही भारी पड़ा है। इस कदम को उठाने से पाकिस्तान की जो कमाई एयरस्पेस से होती थी वो रुक गई है। साथ ही रोजाना करीब 400 विमान पाकिस्तान के एयरस्पेस का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। पाकिस्तान ने 26 फरवरी को बालाकोट स्ट्राइक के बाद 11 में से केवल 2 एयरस्पेस खोले हुए हैं, जो कि दोनों दक्षिणी पाकिस्तान में आते हैं।

हालाँकि, पाकिस्तान के फैसले से भारत एयरलाइंस को भी काफ़ी नुकसान झेलना पड़ रहा है। खबरों के मुताबिक फरवरी से अब तक एयरलाइंस को ₹549 करोड़ का घाटा हुआ है, जिसमें एयरइंडिया को अकेले ₹491 करोड़ का घाटा झेलना पड़ा है। पहले खबरे थीं पाकिस्तान अपने हवाई क्षेत्र भारत के विमानों की आवाजाही के लिए 28 जून तक बंद रहेगा, लेकिन जुलाई आने के बाद भी अभी इसके खुलने की कोई उम्मीद नहीं नजर आ रही है, जिससे घाटे के आँकड़े में और बढ़ौतरी मुमकिन है।

एयरस्पेस से किस तरह होती है कमाई?

बता दें किसी भी देश का एयरस्पेस इस्तेमाल करने के लिए एयरलाइंस कंपनियों को उस देश के सिविल एवियेशन एडमिनिस्ट्रेशन को पैसे चुकाने पड़ते हैं। ये रकम इस बात पर निर्भर करती है कि एयरक्राफ्ट किस टाइप का है और उससे कितनी दूरी कवर की जा रही है या फिर एयरक्राफ्ट का वजन कितना है।

अलग-अलग देशों में एयरस्पेस का चार्ज अलग-अलग होता है, जैसे कनाडा में एयरक्राफ्ट के वजन और ट्रैवल की दूरी के आधार पर चार्ज तय किया जाता है जबकि अमेरिका में सिर्फ़ ट्रैवल की दूरी के आधार पर चार्ज लिया जाता है। भारत में यही चार्ज ओवरलिफ्ट और लैंडिंग चार्ज डीजीसीए तय करता है, जिसके कारण हमारे देश में स्थानीय उड़ानों को अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से ज्यादा भुगतान करना पड़ता है।

हुसैन अली ने उपचार के नाम पर किया 2 लड़कियों का बलात्कार, महिलाओं ने गुस्से में मार डाला

असम के पश्चिम करबी अंगलोंग जिले में गुरुवार (जून 4, 209) को 2 बलात्कारों के आरोपित हुसैन अली को गाँव की महिलाओं ने गुस्से में घेरकर मार डाला। जिसकी जानकारी पुलिस ने शुक्रवार (जून 5, 2019 ) यानी कल दी।

जानकारी के अनुसार, हुसैन नाम का व्यक्ति 1 जुलाई को गाँव में पारंपरिक उपचार के नाम पर एक अंधी महिला की आँख ठीक करने उसके घर आया था, जहाँ आकर उसने पहले कुछ रिचुअल किए और फिर ‘बाद में’ आने को कहकर वहाँ से चला गया।

जिले के एसपी मृणाल तालुकदार के मुताबिक 3 जुलाई को हुसैन दोबारा उसी घर में आया, जहाँ उसने पहले कुछ रिचुअल किए और फिर महिला की 22 वर्षीय बेटी को ये कहकर अलग कमरे में ले गया कि उसे कुछ और उपचार करने हैं जिनसे उसकी माँ की आँखों का अंधापन दूर हो जाएगा।

कमरे में ले जाकर हुसैन ने लड़की को नशीला पदार्थ सुँघाया और बेहोशी की हालत में उससे रेप करके वहाँ से चला गया। इसके बाद अगले दिन वो फिर आया और पीड़िता की 16 साल की एक रिश्तेदार के साथ भी बिलकुल उसी प्रकार बलात्कार किया जैसे एक दिन पहले 22 वर्षीय पीड़िता के साथ किया था।

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हुसैन अली की इस घिनौनी हरकत का पता चलते ही इलाके की गुस्साई भीड़ (जिसमें ज्यादातर महिलाएँ थीं) का गुस्सा उस पर टूट पड़ा और उन्होंने उसे जमकर पीटा। इतना पीटा कि लगभग अधमरा कर दिया। असम ट्रिब्यूनल की खबर के अनुसार हुसैन अली को इस पिटाई में गंभीर चोटें आईं, जिसके कारण उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन गहरी चोट लगाने के कारण हुसैन ने अस्पताल में दम तोड़ दिया।

प्रिय अमर्त्य सेन जी, मजहबी नारा पढ़कर हत्या करने वालों पर आपके नोबल विचारों का सबको इंतजार है

नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद से अमर्त्य सेन अमूमन वाहियात बातें बोलने के लिए ही चर्चा में आते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति के नाम पर इन्होंने जो-जो कांड किए, उसके लिए भी इन्हें याद किया जाता है। लेकिन जब-जब लोग इनके विचित्र बयानों को भूलने लगते हैं, इनका नया बयान तुरंत आ जाता है।

हाल ही में उन्होंने बताया कि ‘जय श्री राम’ के नारे का बंगाल से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि उनकी चार साल की पोती की फ़ेवरेट देवी तो दुर्गा हैं। अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा बंगाल और भारत से अलग बिताने के कारण, सेन साहब शायद भूल रहे हैं कि बंगाल में देवी दुर्गा की पूजा की शुरुआत भी तब से हुई जब से कृत्तिवासी रामायण में राम की शक्तिपूजा का संदर्भ आता है। वही रामायण और रचनाकार जिनसे वो व्यक्ति (टैगोर) भी प्रभावित थे जिन्होंने अमर्त्य सेन को उनका नाम दिया था। कृत्तिवासी ओझा ने बाल्मीकि रामायण का बंगाली अनुवाद किया था और तुलसीदास तक उनकी कृति से प्रभावित थे। यही बकवास प्रीतिश नंदी ने भी की थी तब बंगाल में राम के महत्व और ऐतिहासिकता पर एक लेख हमने लिखा था, जो कि यहाँ पढ़ा जा सकता है।

आजकल लिबरल गिरोह, जिसके सेन साहब एक जानेमाने हस्ताक्षर हैं, ‘जय श्री राम’ के नारे से समस्या पाले बैठा है। कुछ दिनों पहले इसी नारे के फ़ालतू नैरेटिव के नाम पर कि ‘गली में एक समुदाय विशेष के शख्स को ‘जय श्री राम’ न बोलने पर हिन्दुओं ने मार डाला’, इस्लामी भीड़ इकट्ठा की गई और दुर्गा का मंदिर तोड़ दिया गया। ये वही दुर्गा हैं जो सेन साहब की पोती की फ़ेवरेट देवी हैं। अमर्त्य सेन ने इस पर कुछ बयान नहीं दिया क्योंकि ये उन्हें सूट नहीं करता होगा।

अमर्त्य सेन यह भूल जाते हैं कि ‘जय श्री राम’ का नारा भले ही किसी की जान न ले रहा हो, लेकिन उनके गिरोह के सदस्यों द्वारा इस नैरेटिव की हवाबाज़ी के कारण भीड़ इकट्ठा हो रही है, मंदिर तोड़ रही है, पुलिस के ऊपर हमला बोल रही है। कल ही सूरत में इसी नैरेटिव के दम पर, बिना प्राशसनिक अनुमति के समुदाय विशेष की एक भीड़ निकली और पुलिस पर हमला किया। पाँच पुलिसकर्मी घायल हुए, उनकी गाड़ियों में आग लगा दिया गया। अब अमर्त्य सेन ही बता दें कि इसको जलाते वक्त, पुलिस पर पत्थरबाज़ी के वक्त कौन सा नारा लगाया जा रहा होगा। उनको बोलने में परेशानी होगी क्योंकि वो नारा ‘जय श्री राम’ का तो बिलकुल नहीं था।

सेन साहब आप डेमोनाइज करते रहिए एक नारे को क्योंकि ये आपके गैंग के नैरेटिव को सूट करता है। लेकिन आप यह मत भूलिए कि आप जो कर रहे हैं वो बहुत घातक है। आप एक आग लगा रहे हैं फर्जी बातें फैला कर। आपके जैसे लोगों ने भीड़ों के हाथ में आहत होकर लड़ने का हथियार दे दिया है जो चंद मिनटों में कहीं भी इकट्ठा हो रही है और मंदिर तोड़ने से लेकर किसी की जान तक लेने को उतारू हो जाती है। दंगाइयों को अपनी हवाबाज़ी के माध्यम से लेजिटिमेसी मत दीजिए।

जब आप छींकते भी हैं तो वो महज आप नहीं छींकते, बल्कि नोबेल पुरस्कार से सम्मानित आदमी छींकता है। इसलिए जब आप कुछ भी कहते हैं तो उस पुरस्कार का लिहाज तो कीजिए। आपने कहा कि आपके विचार से, राम का बंगाल की संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। आपने कहा है, और भले ही आपको समाज शास्त्र, इतिहास या इंडोलॉजी के लिए नोबेल नहीं मिला है लेकिन आम जनता तो यही मानेगी कि सेन साहब ने कहा है तो सच ही कह रहे होंगे, पढ़े-लिखे आदमी हैं।

आज कल पढ़े-लिखे लोग आम जनता की इसी अनभिज्ञता का फायदा उठा कर अपनी धूर्तता से तथ्यों को अपने हिसाब से, ‘मेरे विचार से’ कह कर मोड़ लेते हैं। शोध के छात्र और अब प्रोफेसर बने सेन साहब को ये तो मालूम होगा कि किसी भी चीज को ‘सामान्यीकृत’ करने से पहले उस हिसाब से साक्ष्य या आँकड़े भी तो होने चाहिए। आपने दस ख़बरें सुनी या फिर आपके गैंग के लोगों ने जितनी बार ट्वीट किया, आपको लगा कि हर बार अलग घटना के बारे में कहा जा रहा है, और आप उसे ही आधार बना कर यह कह दिया कि आजकल इसका प्रयोग तो लोगों को पीटने के लिए बहाने के तौर पर इस्तेमाल होता है। ये ‘आजकल’ वाली बारम्बारता की दर कितनी है सेन साहब? उसमें भी पता चलता है कि दोनों एक मजहब वाले लोग ही एक दूसरे को वीडियो बनाने के लिए ‘जय श्री राम’ बुलवाते हैं ताकि आपके जैसों की दुकान चलती रहे।

अमर्त्य सेन साहब ने आगे कहा कि आजकल कोलकाता में रामनवमी ज्यादा मनाया जाता है जो उन्हें पहले देखने को नहीं मिलता था। सही बात है। आजकल जो हो रहा है, वो गलत क्यों है, कैसे है? दुर्गापूजा भी बंगाल में आदमी के बसते ही शुरु नहीं हुई थी। वो भी एक रामभक्त ने ही शुरु की थी। उसी तरह रामनवमी भी अगर पहले नहीं होती थी, जो कि स्वयं में एक झूठ है, तो अब होने में क्या समस्या है? ‘जय श्री राम’ बोल कर कोई देह में बम बाँध कर फट तो नहीं रहा। अगर एक त्योहार शुरु हो रहा है तो आपके पेट में मरोड़ें क्यों उठ रही हैं? आप ‘समय’ तो हैं नहीं कि आपके पैदा होने के साथ जो था वही सही और शाश्वत है, और बुढ़ापे में जो दिख रहा है वो ब्लासफेमी हो जाएगा!

सेन साहब नारा तो एक और है जिससे भारत नहीं पूरा विश्व परेशान है। वो नारा ‘जय श्री राम’ का नहीं है। आप दिमाग पर ज़ोर डालिएगा तो भी आपको याद नहीं आएगा क्योंकि वो आपके सिस्टम में है ही नहीं। वो आपने फ़ायरवाल से रोक रखा है। वो नारा न तो आपको सुनाई देता है, न ही उसके नाम पर होने वाली घटनाओं की खबर आप तक पहुँचती है, न ही आप उसे सुनना चाहते हैं।

वो नारा है ‘अल्लाहु अकबर’ का। इस नारे को चिल्लाती भीड़ मंदिर तोड़ती है, मॉब लिंचिंग करती है। इसे बुलंद आवाज में बोलते हुए बम धमाके किए जाते हैं, आत्मघाती विस्फोट होते हैं। इस नारे को चिल्लाते हुए हिंसा करने वाले पूरे विश्व के लिए एक कैंसर बन चुके हैं। यूरोप का हर बड़ा शहर इनके आतंकी दस्तखत से दहल चुका है। भारत के एक बड़े हिस्से में इसका आतंक बरक़रार है। अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक इस नारे से लड़ रहा है क्योंकि लोन वुल्फ़ हमले से लेकर सुसाइड बॉम्बिंग तक आम हो गई है।

लेकिन आपकी मति यहाँ भ्रष्ट हो जाती है। आपकी औकात नहीं है किसी भी पब्लिक स्टेज पर यह बोलने की कि ‘मजहबी नारे’ का प्रयोग आतंकी हमलों के लिए किया जाता है। एक तरफ हजारों लोगों की हत्या का ज़िम्मेदार एक नारा है, दूसरी तरफ आपके पास बस इतना है कहने को कि आजकल इस नारे का प्रयोग लोगों को पीटने के लिए किया जा रहा है। पीटने के लिए उपयोग किए गए नारे में और काले झंडे पर लिख कर, अपने आत्मघाती हमले या टेरर अटैक के पहले लिखे पोस्ट या वीडियो में बोले जाने वाले नारे में ‘पीटने’ और ‘कई लोगों की जान ले लेने’ जितना का अंतर है।

आप तो ज्ञानी आदमी हैं। आपके लिए किसी को पीटना ज्यादा दुखदायी है, जान ले लेना तो दुखों का अंत करना है। एक ही दिल है सेन साहब, कितना जहर उसमें लेकर घूम रहे हो!

अनुमानों, फैंसी कल्पना पर आधारित राणा अय्यूब की ‘गुजरात फाइल्स’ को SC ने बताया बकवास

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (जुलाई 5, 2019) को हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए हरेन पांड्या हत्या मामले में मोहम्मद असगर अली समेत 11 आरोपितों को दोषी ठहराया है। जिसमें 7 आरोपितों को उम्र कैद की सजा सुनाई है। गुजरात हाईकोर्ट ने साल 2003 के हरेन पांड्या हत्याकांड के सभी 12 आरोपितों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया था। आरोपितों के समर्थन में हरेन पंड्या मामले की नए सिरे से जाँच करने की माँग करने वाली एक याचिका में विवादास्पद पत्रकार राणा अय्यूब की पुस्तक का इस्तेमाल किया गया था, जिसे खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इसकी कोई उपयोगिता नहीं है।

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील की थी, और न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की पीठ ने अपील को स्वीकार कर लिया। अपील के साथ, शीर्ष अदालत ने सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन द्वारा दायर की गई याचिका पर भी सुनावई की। एक लीगल एनजीओ ने हरेन पंड्या की हत्या की नए सिरे से जाँच करने की माँग की थी, जिसके आधार पर उच्च न्यायालय ने आरोपितों को बरी कर दिया था।

उच्च न्यायालय के आदेश को पलटने के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायालय ने उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें मामले की नए सिरे से जाँच की माँग की गई थी। शीर्ष अदालत के फैसले में कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने अपने मामले के समर्थन में विवादित पत्रकार राणा अय्यूब द्वारा लिखित पुस्तक गुजरात फाइल्स – एनाटॉमी ऑफ ए कवरअप’ प्रस्तुत की थी। इस पुस्तक और विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित कुछ अन्य लेखों के आधार पर, वकील शांति भूषण और प्रशांत भूषण ने तर्क दिया था कि यह आगे की जाँच के लिए एक उपयुक्त केस है।

हरेन पांड्या केस में सुप्रीम कोर्ट का आदेश

मगर, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य में कोई योग्यता नहीं पाई। पीठ ने कहा कि राणा अय्यूब की पुस्तक कोई उपयोगिता नहीं है। यह पुस्तक अनुमानों, अटकलों और कल्पना पर आधारित है। जाहिर तौर पर इसका कोई महत्त्व नहीं है। अदालत ने कहा कि राणा अय्यूब ने अपनी पुस्तक में जो तर्क दिए हैं, वो उनके विचार हैं और किसी व्यक्ति के विचार या राय सबूतों के दायरे में नहीं आते।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके राजनीतिक रूप से प्रेरित होने की प्रबल संभावना है, जिसे खारिज नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि गुजरात में गोधरा कांड के बाद जिस तरह से चीजें घटित हुई हैं, उसके बाद इस तरह के आरोप और प्रतिवाद असामान्य नहीं हैं और कई बार इसे उठाने का प्रयास किया गया। हालाँकि, बाद में इसकी पुष्टि नहीं होती है। अदालत ने केस का निर्णय सुनाते हुए कहा कि याचिकर्चाओं द्वारा राणा अय्यूब की पुस्तक समेत प्रस्तुत की गई सामग्री के आधार पर कोई केस नहीं बनता है। कोर्ट ने कहा कि राणा अय्यूब की पुस्तक का कोई महत्त्व नहीं है। याचिका को खारिज करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं पर 50,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

वैसे ये पहली बार नहीं है, जब राणा अय्यूब द्वारा गुजरात पर लिखी गई पुस्तक की तथ्यों के आधार पर न होने की आलोचना की गई है। यहाँ तक कि भाजपा विरोधी प्रोपेगेंडा साइट तहलका ने भी इस कहानी को प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था। तहलका की संपादक सोमा चौधरी ने राजनीतिक दबाव के कारण राणा की कहानी प्रकाशित नहीं होने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि उनकी कहानी इसलिए प्रकाशित नहीं हुई थी, क्योंकि वो प्रकाशन के संपादकीय मानकों को पूरा नहीं करता था।

मजहब-ए-इस्लाम का मजाक बनाने वाली नुसरत इस्लाम से खारिज, बरेलवी मसलक ने जारी किया फतवा

इस्लाम को छोड़कर दूसरे धर्म में शादी करने के कारण नुसरत जहां लगातार इस्लामिक कट्टरपंथियों के गुस्से का शिकार हो रही हैं। बंगाली अभिनेत्री और टीएमसी सांसद नुसरत जहां कोलकाता में इस्कॉन रथयात्रा के दौरान आरती को लेकर बरेलवी मसलक के उलेमा के निशान पर आ गई हैं। उलेमा ने नुसरत जहां के इस किरदार को सियासी रूप दिया है।

आरती करते हुए नुसरत जहां का वीडियो, फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही उलेमा ने अपनी प्रतिक्रिया दी हैं। उलेमा ने कहा है कि मजहब-ए-इस्लाम के दायरे को जो भी पार करता है वो इस्लाम से खारिज हो जाता है। नुसरत जहां ने ऐसी गुस्ताखी की है कि यदि वे फिर से इस्लाम धर्म में आना चाहेंगी तो उन्हें तौबा करनी होगी। उलेमा ने कहा कि ऐसे लोग सियासत के लिए मजहब को बदनाम करते हैं।

इस्कॉन रथयात्रा में शामिल होने के बाद हाल ही में व्यवसायी निखिल जैन से शादी रचाने वाली नुसरत ने अपने खिलाफ जारी कथित फतवे पर कहा था, “फालतू चीजों पर मैं ध्यान नहीं देती। मैं अपना धर्म जानती हूँ। मैं जन्‍म से मुस्लिम हूँ और आज भी मुस्लिम हूँ। यह आस्‍था का मामला है। इसे आपको अपने अंदर से महसूस करना होता है न कि अपने दिमाग से।” लेकिन शायद उलेमा को उनका यह बयान ख़ास पसंद नहीं आया है।

‘सुर्ख़ियों में बने रहने के लिए किया मजहब को बदनाम’

देवबंद के बाद बरेलवी मसलक के उलेमा ने आरती करने पर एतराज जताया है। उलेमा ने कहा कि सियासत करने या सुर्खियों में छाए रहने के लिए मजहब को बदनाम किया जा रहा है। मुफ्ती मुहम्मद गुलाम रजवी ने कहा कि इस्लाम ने औरतों को उनके अधिकार दिए हैं। सियासत करना अलग है लेकिन गैर शरई काम करना इस्लाम के खिलाफ है। जो भी शख्स मजहब-ए-इस्लाम का दायरा पार करता है, वो खुद बे खुद इस्लाम से खारिज हो जाता है। नुसरत जहां ने भी ऐसा ही किया है। अगर उन्हें फिर से इस्लाम धर्म में आना है तो तौबा करनी होगी।

‘इस्लाम में आरती करना है मना’

मुफ्ती सय्यद कफील अहमद हाशमी ने नुसरत को लेकर कहा कि आरती करना इस्लाम में मना है। इस तरह के काम करना शरीयत के खिलाफ माना जाता है। सियासत के लिए मजहब को बदनाम करना ठीक नहीं है। शरीयत कानून में इसकी सख्त मनाही है। नुसरत जहां ने गैर शरई काम किया है। बरेलवी मसलक के उलेमा ने कहा कि गैर शरई काम करने वालों के लिए दरगाह आला हजरत से फतवा भी जारी हो चुका है। इस तरह के फतवे सभी पर लागू हो जाते हैं।