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चोरी के शक़ में शैनुल शेख की पीटकर हत्या, पश्चिम बंगाल के मालदा में तनाव

पश्चिम बंगाल में मालदा ज़िले के बैशनभनगर और कलियाचक क्षेत्र में तनाव का महौल है। ख़बर है कि रविवार (30 जून) को एक युवक को इतनी बुरी तरह से पीटा कि उसकी मौत हो गई। उस युवक पर शक़ था कि वो बाइक चोरी में शामिल था। 

ख़बर के अनुसार, मृतक की पहचान 24 वर्षीय शैनुल शेख के रूप में हुई है। इलाक़े में प्रदर्शन उस समय शुरू हुआ जब शैनुल के शव को उसके गृहनगर बैशनभनगर लाया गया। जानकारी के अनुसार, शेख को निजी अंगों, आँखों और कानों में गंभीर चोटें आई हुईं थी। उसे मालदा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के एसएसकेएम अस्पताल में भेजा गया था, जहाँ उसकी मौत हो गई।

शैनुल शेख के परिवार में उसकी माँ और पत्नी के अलावा एक छ: महीने की बेटी भी है। शेख की माँ सूफ़िया ने बताया:

“वो परिवार में अकेला कमाने वाला शख़्स था। वो ईंट के भट्टे पर काम करता था। बुधवार (25 जून) को कुछ लोगों ने उसे बाहर बुलाया और बाद में हमें पता चला कि उसकी बुरी तरह से पिटाई की गई है।”

इसके अलावा शेख की पिटाई किए जाने का एक वीडियो भी सामने आया है, इसे देखने के बाद लोगों में ग़ुस्सा और बढ़ गया। हत्या के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग 34 को जाम कर दिया और कलियाचक में दुकानों और अन्य प्रतिष्ठानों में जमकर तोड़-फोड़ की। इसके अलावा यह भी पता चला है कि प्रदर्शनकारियों ने सरकारी बसों में भी तोड़-फोड़ की है। हालात इतने विकट हो गए कि पुलिस को स्थिति पर क़ाबू पाने के लिए हवाई फायरिंग तक करनी पड़ गई। पुलिस ने इस बात की जानकारी दी कि इस घटना के संबंध में एक शख़्स को गिरफ़्तार किया गया है।

एक पुलिस अधिकारी ने बताया:

“अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखने वाले प्रदर्शनकारयों ने कलियाचक क्षेत्र में NH 34 पर प्रदर्शन किया। वो एक युवक की मौत के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे। क्षेत्र में भारी मात्रा में पुलिस बलों को तैनात किया गया है। राज्य की स्थिति फ़िलहाल शांतिपूर्ण है।”

कॉन्ग्रेस नेता और सुजापुर के विधायक इशा ख़ान चौधरी ने शैनुल शेख के परिवार वालों से मुलाक़ात की और शांति बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा:

“परिवार के सदस्य और निवासी बैशनभनगर पुलिस स्टेशन पर प्रदर्शन के लिए शव को ले जाना चाहते हैं। मैंने उन्हें अंतिम संस्कार के लिए मनाया है और प्रदर्शन बंद करने के लिए कहा। हम चाहते हैं कि शेख को मारने वाले लोगों को गिरफ्तार किया जाए। मैंने पुलिस से कहा है कि इस बात की जाँच की जाए कि यह सामुदायिक हिंसा थी या नहीं।”

भारत के वीर: पुलवामा हमले के बाद वीरगति को प्राप्त जवानों के परिवार वालों के लिए 12 गुना ज्यादा दान

पुलवामा आतंकी हमले में 40 सीआरपीएफ जवानों के वीरगति को प्राप्त होने के बाद से ‘भारत के वीर’ फंड में बड़ी मात्रा में दान किया जा रहा है। 14 फरवरी को हुए अटैक में 40 वीरों के बलिदान के बाद पूरे देश में जवानों के लिए डोनेशन में काफी वृद्धि दर्ज की गई है। खबर के मुताबिक, इस साल 18 जून तक ₹242.15 करोड़ की सहायता राशि मिल चुकी है। वीरों के लिए दिए जाने वाले डोनेशन में 12 गुना से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।

बता दें कि 2017 के मध्य में ‘भारत के वीर फंड’ की स्थापना गई थी। फंड की स्थापना के बाद उसी साल उसमें कुल ₹6.40 करोड़ जमा हुए थे। इसके बाद साल 2018 में इस फंड में ₹19.43 करोड़ जमा किए गए, लेकिन इस साल फंड में जमा हुई राशि इससे काफी अधिक है।

‘भारत के वीर’ फंड में जमा होने वाली राशि को सीधे वीरों के परिवार तक पहुँचाया जाता है। इस साल 18 जून तक ₹14.20 करोड़ की राशि वीरगति को प्राप्त जवानों के परिवारों को मदद के तौर पर दी जा चुकी है। 2018 में  ₹6.58 करोड़ और 2017 में ₹11 करोड़ की राशि मदद के तौर पर इस फंड से दी गई थी।

भारत के वीर फंड में स्वैच्छिक तौर पर डोनेशन दिया जा सकता है। इस पोर्टल पर वीरगति को प्राप्त जवानों की डिटेल्स होती हैं और सीधे उनके परिवार की भी मदद की जा सकती है। यहाँ डोनेशन देने के लिए ऑनलाइन ट्रांसफर के साथ यूपीआई के जरिए भी पेमेंट किया जा सकता है। शहीदों के लिए बनाए गए इस पोर्टल पर दान में पुलवामा हमले के बाद लोगों ने काफी सक्रियता दिखाई है। ‘भारत के वीर’ के जरिए वीरों की मदद करने के लिए भारतीय स्टेट बैंक ने यूपीआई पेमेंट गेटवे की शुरुआत की, ताकि लोग आसानी से योगदान कर सकें। इसके साथ ही पेटीएम ने भी जवानों के परिजनों को दान देने के लिए ‘CRPF Wives welfare Association’ नाम की एक अलग विंडो बनाई थी। 

पिछले सप्ताह राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने ‘भारत के वीर’ पोर्टल के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पिछले 2 साल से इस पोर्टल के जरिए वीरगति को प्राप्त जवानों के परिवार को सीधे तौर पर मदद मिलती है। पोर्टल लॉन्च होने के बाद से अब तक कुल ₹31.78 करोड़ की मदद जवानों के परिवार को मिल चुकी है। इसके साथ ही राय ने जानकारी देते हुए कहा कि अब तक 267 सुरक्षाकर्मियों के परिजनों को ₹16.27 करोड़ की धनराशि वितरित की गई है, जिसका विवरण पोर्टल पर अपलोड किया गया था। उन्होंने बताया कि इसमें से ₹11.11 करोड़ सीआरपीएफ के वीरगति को प्राप्त जवानों को,  ₹3.30 करोड़ बीएसएफ को, ₹1.69 करोड़ असम राइफल्स को और ₹17.76 लाख सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के जवानों के परिवार वालों को दिया गया।

पुलवामा हमले के बाद से भारत के वीर पोर्टल पर आम नागरिकों द्वारा चंदा देने की संख्या में काफी अधिक वृद्धि हुई है। गौरतलब है कि 14 फरवरी को जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने सीआरपीएफ के काफिले को अपना निशाना बनाया था और इस हमले में 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इसके बाद से डोनेशन में लगभग 12 गुना अधिक वृद्धि दर्ज की गई। पोर्टल के बनने के बाद से अब तक कुल ₹267.98 करोड़ की रकम इसमें शहीदों के परिवार के लिए इकट्ठा की जा चुकी है।

हिस्ट्रीशीटर इरफ़ान ने किया नवविवाहिता शोभा का अपहरण, सदमे में पिता की हार्ट अटैक से मौत

राजस्थान में 5 पाँच दिन पहले मोनू पठान (इरफान) नाम के हिस्ट्री शीटर ने बंदूक की नोक पर नवविवाहित शोभा का अपहरण किया था। जिसके मद्देनजर शोभा के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी, लेकिन कार्रवाई करने की बजाय पुलिस मामले में लापरवाही दिखाती रही। अपहरण के पाँचवे दिन तक पुलिस की टाल-मटोली से परेशान पिता को जब अपहर्ताओं ने मामले को वापस लेने की धमकी दी, तो वह सदमें में आ गए, और दिल का दौरा पड़ने से शनिवार (जून 29, 2019) सुबह उनकी मौत हो गई।

खबरों के अनुसार परिजनों का कहना है कि पुलिस द्वारा कार्रवाई नहीं करने के सदमें को वह सह नहीं सके। उन्हें निजी अस्पताल भी ले जाया गया, लेकिन उन्हें वहाँ मृत घोषित कर दिया गया। डॉक्टरों ने साइलेंट हार्ट अटैक को उनकी मौत का कारण बताया है, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट अभी नहीं आई है।

नवलकिशोर (शोभा के पिता) की मौत की खबर सुनते ही उनके परिजन, दोस्त और सामाजिक संगठन सुबह 9 बजे एमबीएस के पोस्टमार्टम रूम पहुँच गए और वहाँ बहुत हंगामा किया। शोभा को ढूँढने और आरोपित की गिरफ्तारी की माँग पर उन्होंने नवलकिशोर के शव को उठाने से भी इंंकार कर दिया।

परिजनों ने इस दौरान परिवार के लिए 50 लाख रुपए (कुछ खबरों के अनुसार) की सहायता और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की माँग की। उन्होंने आईजी के दफ्तर के सामने सड़क पर शव रखकर प्रदर्शन शुरू कर दिया। जिसके बाद नयापुरा डीएसपी ऑफिस में पुलिस प्रशासन व मृतक के परिजनों के बीच करीब दोनों घंटे तक बातचीत हुई, लेकिन इस बातचीत का कोई निष्कर्ष नहीं निकला और प्रदर्शन जारी रहा। फिर, प्रशासन ने जब परिजनों की कुछ माँगों पर सहमति जताई तब जाकर मामला शांत हुआ।

बता दें परिजनों के प्रदर्शन में भाजपा सांसद संदीप शर्मा उनका पूरा साथ दे रहे हैं। उन्होंने कहा है कि अगर 24 घंटे में बदमाशों को नहीं पकड़ा गया तो वह आंदोलन करेंगे। इस मामले के बाद से ही प्रदेश के लोग प्रशासन से नाराज है। ट्विटर पर इस मामले में कहा जा रहा है कि कॉन्ग्रेस ने पूरा प्रदेश अपराधियों को सौंप दिया है। 5 दिन हो चुके हैं इस घटना को, लेकिन पुलिस ने इस पर कोई एक्शन नहीं लिया। यूजर्स इस मामले में नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से हस्तक्षेप करने की माँग कर रहे हैं।

वहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक एएसपी ने आश्वासन दिया है आरोपित को जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा। पुलिस ने लड़की को बचाने और आरोपित को गिरफ्तार करने के लिए 4-5 लोगों की टीम को अनुमानित जगह पर भेजा गया है, साथ ही मोनू पठान (इरफान) के घरवालों और दोस्तों से पूछताछ जारी है।

मीम मामला: प्रियंका शर्मा की रिहाई में देरी क्यों – पश्चिम बंगाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट का अवमानना नोटिस

उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार को अवमानना नोटिस जारी किया है। ममता बनर्जी का मीम पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार भाजपा कार्यकर्ता प्रियंका शर्मा की रिहाई में देरी को लेकर दायर अवमानना याचिका पर सोमवार (जुलाई 1, 2019) को यह नोटिस जारी किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार से पूछा है कि मई में उसके आदेश के तुरंत बाद प्रियंका शर्मा को रिहा क्यों नहीं किया गया? प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रियंका शर्मा के भाई राजीब शर्मा द्वारा दायर अवमानना याचिका पर राज्य सरकार और अन्य को नोटिस जारी किया है।

कोर्ट ने सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए 4 सप्ताह का वक्त दिया है। भाजपा युवा मोर्चा की नेता प्रियंका शर्मा ने मई में फेसबुक पर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से संबंधित एक मीम पोस्ट किया था। इसके बाद प्रियंका को 10 मई को  गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 500 और सूचना एवं प्रौद्योगिकी कानून के प्रावधानों के आरोपों में मामला दर्ज किया गया था।

यह गिरफ्तारी तृणमूल कॉन्ग्रेस के स्थानीय नेता की शिकायत पर हुई थी। शीर्ष अदालत की अवकाश पीठ ने 14 मई को प्रियंका शर्मा को तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पहले माफी माँगने की शर्त पर बेल देने की बात कही थी, लेकिन बाद में स्पष्ट किया कि जमानत के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है। प्रियंका शर्मा के भाई राजीब शर्मा ने न्यायालय में दायर याचिका में आरोप लगाया कि 14 मई के आदेश के बावजूद उनकी बहन की जेल से रिहाई में 24 घंटे से ज्यादा की देरी की गई।

किसी सांसद के रिश्तेदार को नहीं मिलेगा टिकट: UP उपचुनाव की तैयारी में जुटी BJP का फैसला

लोकसभा में शानदार जीत हासिल करने के बाद अब भाजपा उत्तर प्रदेश में होने वाले उपचुनाव की तैयारियों में जुट गई है। पार्टी की जीत के लिए बीजेपी ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है। इसी क्रम में पार्टी ने उपचुनाव के संबंध में एक अहम फैसला लिया है। खबर के मुताबिक, बीजेपी इस बार नए कार्यकर्ताओं को टिकट देने के मूड में है। इसलिए पार्टी ने इन उपचुनावों में जीते हुए सांसदों के बेटे-बेटियों या रिश्तेदारों को टिकट नहीं देने का फैसला किया है। इसका मतलब है कि इस बार उपचुनाव में सभी सीटों पर नए कार्यकर्ताओं को टिकट दिया जाएगा।

हाल ही में बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक में ये फैसला लिया गया है। बता दें कि यूपी में कुल 12 सीटों पर उपचुनाव होने हैं। जानकारी के मुताबिक, सांसद बनने के बाद खाली हुई सीटों पर कई सांसद अपने परिजनों को उतारने की तैयारी में थे। पार्टी ने इसे भाँपते हुए साफ कर दिया कि किसी भी जीते हुए सांसद के किसी भी रिश्तेदार को टिकट नहीं दिया जाएगा। पार्टी के इस फैसले ने इन लोगों के इरादों पर पानी फेर दिया।

भारतीय जनता पार्टी यूपी की सभी सीटों के साथ-साथ रामपुर विधानसभा सीट पर काफी जोर लगा रही है। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा को रामपुर विधानसभा सीट का प्रभारी बनाया गया है। यूपी में 12 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के लिए भाजपा ने 11 सीटों पर जहाँ एक-एक मंत्री को लगाया है, तो वहीं हारी हुई सीट जलालपुर जीतने के लिए दो मंत्रियों की तैनाती की गई है।

डबल मर्डर: जुनैद की बहन से अजीम को था प्यार… लेकिन किसी और से सगाई पर गिराई 2 लाशें

उत्तर प्रदेश के मेरठ में ख़ौफ़नाक वारदात को अंजाम देने की ख़बर सामने आई है। गाज़ियाबाद में एक कार में गोली चलाकर दो लोगों की हत्या कर दी गई। पुलिस के अनुसार, हत्या करने का आरोप जुनैद के फुफेरे भाई अजीम पर है। दरअसल, रविवार (30 जून 2019) को जुनैद की बहन की सगाई होनी थी। लेकिन, सगाई से पहले जुनैद और ड्राइवर दानिश की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या की इस वारदात के पीछे अवैध संबंधों का हवाला दिया जा रहा है।

ख़बर के अनुसार, शनिवार (29 जून 2019) की सुबह कोतवाली क्षेत्र में ढलाई वाली गली के निवासी अजीम, जमील और महमूदनगर के निवासी जुनैद कार बुक करके दिल्ली के सीलमपुर इलाक़े में गए थे। तीनों युवकों के बारे में पता चला है कि वे सोना गलाकर जेवर बनाने का काम करते हैं। तय योजना के अनुसार, रास्ते में ड्राइवर के बराबर वाली सीट पर बैठे जुनैद पर अजीम और जमील ने गोली चला दी। ड्राइवर दानिश की भी गोली मारकर हत्या कर दी। पुलिस ने भी इस बात की पुष्टि की है कि जुनैद और दानिश के सिर में पीछे से गोली मारी गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों पर गोली कार में पीछे बैठे व्यक्तियों ने ही चलाई है।

छानबीन में ख़ुलासा हुआ है कि अजीम का प्रेम-प्रसंग जुनैद की बहन से चल रहा था। लेकिन, जुनैद को यह रिश्ता बिल्कुल पसंद नहीं था, और इसलिए उसने अपनी बहन का रिश्ता कहीं और तय कर दिया। वहीं, अजीम को यह बात इतनी नागवार लगी कि उसने सगाई से पहले ही जमील के साथ मिलकर हत्या की इस वारदात को अजाम दे डाला।

वारदात के बाद दोनों आरोपित कार को लोनी-गाज़ियाबाद रोड पर टीला शाहबाजपुर गाँव के सामने खड़ी करके वहाँ से रफूचक्कर हो गए। मृतकों से बरामद आईडी-कार्ड से उनकी पहचान की गई। इसके बाद मेरठ पुलिस तुरंत हरक़त में आई और हत्या के दोनों आरोपितों अजीम और जमील को गिरफ़्तार कर लिया। गोलीबारी के दौरान अजीम को भी गोली छूकर निकली थी, इससे पहले कि वो अपने कपड़े बदल पाता, पुलिस ने उसे धर-दबोचा। फ़िलहाल, दोनों को लोनी पुलिस के हवाले कर दिया गया है।

J&K में पत्थरबाजी की घटनाएँ 3.25% बढ़ीं, लेकिन 59% ज्यादा गिरफ्तार किए गए पत्थरबाज

जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी एक बड़ी समस्या है। आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में इस कारण सुरक्षा बलों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पत्थरबाजों से सख्ती से निपटने की नीति को देखते हुए हालाँकि पिछले दो वर्षों के आँकड़े थोड़े सुकून देने वाले हैं। 2017 के मुकाबले 2018 में पत्थरबाजों की गिरफ्तारी में भारी बढ़ोतरी हुई है जबकि इन घटनाओं में बहुत मामूली वृद्धि देखने को मिली। जानकारी के अनुसार 2017 में 1412 पत्थरबाजी की घटनाएँ हुईं जबकि इस दौरान 2388 पत्थरबाजों की गिरफ्तार किया गया। वहीं 2018 में पत्थरबाजी की 1458 घटनाएँ (पिछले वर्ष की तुलना में सिर्फ 46 ज्यादा) हुईं जबकि इस मामले में 3797 पत्थरबाजों को गिरफ्तार (पिछले वर्ष की तुलना में 1409 ज्यादा) किया गया।

सालपत्थरबाजी की घटनाएँपत्थरबाजों की गिरफ्तारी
201714122388
201814583797

प्रतिशत की बात करें तो एक तरफ जहाँ सिर्फ 3.25% पत्थरबाजी की घटनाओं में वृद्धि हुई है, वहीं पत्थरबाजों की गिरफ्तारी में 59% का इजाफा हुआ है। इस बात की जानकारी गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने राज्यसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में दी। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष 2018 में 3797 पत्थरबाजों की गिरफ्तारी हुई थी जिसमें से 65 को जेल भेजा गया था। जबकि 2017 में 2388 पत्थरबाजों को गिरफ्तार किया गया था और 63 को जेल भेजा गया था।

राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री के जवाब से इस बात का भी पता चला कि पिछले वर्षों के मुकाबले 2018 में सुरक्षाबल से मुठभेड़ में स्थानीय आतंकी ज्यादा मारे गए।

आँकड़ों के अनुसार 2018 में सुरक्षाबलों ने कुल 257 आतंकी मारे। इनमें 146 कश्मीरी थे, जबकि 111 आतंकी दूसरे मुल्क के थे। जबकि 2016 और 2017 में ये आँकड़े उलटे देखने को मिले थे। इन वर्षों में सुरक्षाबल द्वारा दूसरे मुल्कों के आतंकी ज्यादा मारे गए थे और स्थानीय कम।

सालकुल मारे गए आतंकीस्थानीय आतंकीविदेशी आतंकी
2018257146111
201721386127
20161506486

टाइम्स ऑफ इंडिया की छपी रिपोर्ट के अनुसार 2017 में सुरक्षाबलों ने 86 स्थानीय आतंकियों के मुकाबले 127 बाहरी आतंकी का सफाया किया था जबकि 2016 में 86 बाहरी आतंकियों के मुकाबले 64 स्थानीय आतंकियों को मारा था।

‘इस जर्सी ने ही वर्ल्‍ड कप में भारत की जीत के सिलसिले को रोक दिया’

विश्वकप 2019 के 38वें मैंच में इंग्लैंड ने भारत को कल (जून 30, 2019) 31 रनों से हरा दिया। चूँकि यह भारत की विश्व कप 2019 में पहली हार थी इसलिए जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने इसके लिए भगवा जर्सी को जिम्मेदार ठहराया।

मुकाबले में भारत के हारने के बाद महबूबा मुफ्ती ने ट्वीट किया, “आप मुझे अंधविश्वासी कह सकते हैं, लेकिन इस जर्सी ने ही वर्ल्‍ड कप में भारत की जीत के सिलसिले को रोक दिया है।”

वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस लीडर उमर अब्दुल्ला ने भी भारत की हार पर सवाल उठाया है। उमर ने ट्वीट करके पूछा है, “पाकिस्तान और इंग्लैंड की जगह अगर हमारा सेमीफाइनल का टिकट दाँव पर लगा होता, तब भी क्या टीम इंडिया ऐसे ही बल्लेबाजी करती।”

बता दें कि 1992 के बाद से यह पहला मौका है जब विश्वकप के किसी मैच में इंग्लैंड ने भारत को मात दी है। इस मैच में भारत की जीत के लिए पाकिस्तानी प्रशंसक भी उनको प्रोत्साहित कर रहे थे, क्योंकि इंग्लैंड की हार से वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में पहुँचने की पाकिस्तान की उम्मीदें बढ़ रही थीं।

कहानी राजर्षि की: जिसे बोस और पटेल की तरह कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का पद त्यागना पड़ा, कारण- नेहरू

राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन- एक ऐसा नाम जिसने उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की जड़ें मजबूत करने में अपनी ज़िंदगी खपा दी। यूपी के गाँव-गाँव में घूम कर निःस्वार्थ भाव से जिस तरह उन्होंने पार्टी की सेवा की थी, उनका लोकतान्त्रिक तरीके से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनना शायद ही किसी को अखरता। लेकिन, कॉन्ग्रेस पार्टी का शायद यह दुर्भाग्य ही था कि राजर्षि का अध्यक्ष बनना ‘किसी’ को रास नहीं आया और उन ‘किसी’ का नाम था- जवाहरलाल नेहरू। भारतीय राजनीतिक इतिहास की यह घटना उस समय की है जब नेहरू कॉन्ग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता थे और जनता के बीच उनकी छवि भी बहुत ही पूजनीय किस्म की थी। लेकिन, ऐसा तीसरी बार हुआ जब नेहरू ने लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए पार्टी अध्यक्ष के साथ सहयोग नहीं किया।

सोमवार (जुलाई 1, 2019) को देशरत्न पुरुषोत्तम दास टंडन की पुण्यतिथि है और इस अवसर पर यह याद करना ज़रूरी है कि कैसे नेहरू ने लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए व्यक्ति को राजनीतिक वनवास पर जाने को मजबूर कर दिया। इलाहाबाद- नेहरू और टंडन, दोनों इसी शहर से आते थे। इलाहाबाद की राजनीति में जिसका भी दखल होता, वो कॉन्ग्रेस पार्टी में ऊँचे मुकाम पर पहुँचता- चाहे वो नेहरू हों, टंडन हों या फिर दोनों के शिष्य लाल बहादुर शास्त्री। जी हाँ, शुरुआती दिनों में लाल बहादुर शास्त्री ने दोनों के बीच एक पुल का काम किया था। तब शास्त्री दोनों के बीच पत्रों का आदान-प्रदान करते थे और सबसे बड़ी बात तो यह कि ये पत्र ख़ुद शास्त्री ही लिखा करते थे।

जब टंडन शास्त्री को कोई पत्र लिखने को कहते और वह पत्र नेहरू को जाने वाला होता तो शास्त्री उसी भाषा में लिखते जो नेहरू को पसंद आए। इसी तरह वह नेहरू द्वारा टंडन को भेजे जाने वाले पत्रों के मामले में करते थे। राजर्षि टंडन के योगदानों की बात करने से पहले उस 1950 के चुनाव को याद करना ज़रूरी है, जब कॉन्ग्रेस को नेहरू की ज़िद के आगे झुकना पड़ा था। माना जाता है कि उस समय कॉन्ग्रेस में दो खेमे थे, एक का नेतृत्व नेहरू करते थे और दूसरे के नेता पटेल थे। जहाँ पटेल को दक्षिणपंथी विचारधारा का माना जाता है, वहीं नेहरू वामपंथी झुकाव वाले नेता थे।

1950 में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ और जवाहरलाल नेहरू के समर्थन में जेपी कृपलानी मैदान में उतरे। जेपी कृपलानी आज़ादी के समय भी कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे। आचार्य कृपलानी को नेहरू का पूरा समर्थन मिला और नेहरू ने इस चुनाव को अपने स्वाभिमान पर लिया। कारण- जिस व्यक्ति को देश का सबसे ‘लोकप्रिय’ नेता कहा जाता था, उसके उम्मीदवार की पार्टी में ही हार होने से तरह-तरह की चर्चाओं को बल मिल सकता था। लोग सोचते कि जो व्यक्ति अपनी पार्टी में ही लोकप्रिय नहीं है, वह पूरे देश में प्रचंड लोकप्रियता का दावा कैसे कर सकता है! लेकिन हुआ वही जो ‘किसी’ की इच्छा के अनुरूप नहीं था।

उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल के समर्थन और गाँव-गाँव में अपनी मजबूत छवि के कारण टंडन इस चुनाव को जीतने में कामयाब रहे। बेदाग़ चरित्र और विवादों से दूर रहने वाले टंडन हिंदुत्व की तरफ़ झुकाव वाले नेता थे। इस चुनाव परिणाम को नेहरू ने अपने स्वाभिमान पर धक्का के रूप में लिया और यही वह समय था जब देश के प्रधानमंत्री ने अपना असली ‘खेल’ दिखाया। इससे पहले वह ऐसे ‘खेल’ दो बार और दिखा चुके थे। टंडन के साथ खेला गया ‘खेल’ आगे लेकिन उससे पहले जरा उन दोनों घटनाओं को याद कर लेते हैं। 1946 में कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के लिए नेहरू और पटेल नामांकन की दौर में थे। गाँधीजी का पूरा समर्थन नेहरू के साथ था, ऐसा उन्होंने जता दिया था। इसके बावजूद 15 में से 12 स्टेट कमिटियों ने पटेल को अपना नेता चुना।

अब आप जानना चाहेंगे कि 15 में से नेहरू कितने स्टेट कमिटियों की पसंद थे? इसका जवाब है- एक भी नहीं। पटेल को 12 और नेहरू को शून्य स्टेट कमिटियों का समर्थन मिला। जो कॉन्ग्रेस अध्यक्ष चुना जाता, उसका प्रधानमंत्री बनना भी लगभग तय था। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जैसे दिग्गज की आपत्ति के बावजूद गाँधीजी ने पटेल को अपना नामांकन वापस लेने को कहा। नेहरू ने अपने पक्ष में एक भी स्टेट कमिटी को न पाकर चुप्पी साध ली थी लेकिन अपने अनुयायी के दुःख को गाँधीजी कैसे सह सकते थे! विचार-विमर्श का दौर चला और अंततः राष्ट्र के लिए सोचने वाले पटेल ने जनहित में गाँधीजी की भावनाओं का ख्याल रखा और अपना इस्तीफा सौंप दिया। यह दूसरा ऐसा मौका था जब नेहरू के कारण लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को ताक पर रखा गया।

पहली वाली घटना लगभग सबको पता है। जब सुभाष चंद्र बोस कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष बने, तब नेहरू ने उनके साथ सहयोग करना बंद कर दिया और गाँधी-नेहरू का सहयोग न मिलने के कारण बोस को इस्तीफा देना पड़ा। अब वापस 1950 में आते हैं। पुरुषोत्तम दास टंडन के मामले में इतिहास ने अपने आपको तीसरी बार दोहराया। टंडन चुनाव जीत चुके थे। लेकिन गुस्साए नेहरू ने पार्टी को साफ़-साफ़ बता दिया कि अगर अध्यक्ष उनकी पसंद का न हो तो उनके लिए काम करना मुश्किल है। यहाँ तक कि नेहरू ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने की भी धमकी दे डाली। कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पता था कि उन्हें चुनाव जितने के लिए नेहरू की लोकप्रियता की आवश्यकता है। नेहरू ने इसी कमजोरी का फायदा उठाया।

जवाहरलाल नेहरू ने पार्टी के मामलों में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष टंडन का सहयोग करना बंद कर दिया। अड़ियल रवैया वाले नेहरू ने संगठन की विभिन्न निर्णय लेने वाली समितियों को अपने पक्ष में करने के लिए एक राजनीतिक द्वंद्व छेड़ दिया। उन्होंने ‘धर्मनिरपेक्षता’ के मुद्दे पर टंडन का विरोध किया और अपनी यह सोच ज़ाहिर की कि इससे कोई समझौता नहीं हो सकता। आख़िर ऐसा हो भी क्यों न! टंडन उन विरले नेताओं में से थे, जिन्होंने धर्मान्तरण के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा था। यहाँ तक कि संविधान सभा में भी बहस करते हुए टंडन ने सभा को धर्मान्तरण की निंदा करने को कहा था। शायद नेहरू को टंडन में एक सॉफ्ट हिंदुत्व वाला नेता दिखता था और इसीलिए वह उनसे ख़फ़ा रहते थे।

जिस तरह गाँधीजी ने बोस के साथ किया था, नेहरू उससे भी दो क़दम आगे बढ़ गए। देश के प्रधानमंत्री ने देश की सबसे बड़ी और सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था। गाँधी-बोस एपिसोड और नेहरू-पटेल एपिसोड एक बार फिर से ख़ुद को दोहरा रहा था। भले ही इस बार नेहरू के सहयोग के लिए हमेशा की तरह गाँधीजी नहीं थे लेकिन नेहरू ने इतना तो अब तक सीख ही लिया था कि ऐसे मसलों को कैसे हैंडल करना है। 1952 में होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर एक भय का माहौल था। यूपी में कॉन्ग्रेस की जड़ों को गहरे तक स्थापित करने वाले टंडन अपनी लोकप्रियता से पूरे भारत में शायद चुनाव नहीं जिता सकते थे, ऐसा पार्टी के अन्य नेताओं को लगता था।

2016 में आज़ादी की 70वीं वर्षगाँठ पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने राजर्षि टंडन के योगदानों को याद किया

इन राजनीतिक उठा-पटक के बीच पुरुषोत्तम दास टंडन ने ठीक वैसा ही त्याग किया, जैसा 1938 में बोस और 1946 में पटेल ने किया था। पार्टी के हित में और देश के भविष्य की सोचते हुए टंडन ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। अफ़सोस यह कि राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन को शायद इतिहास ने वो स्थान नहीं दिया, जो उन्हें मिलना चाहिए था। इसके बाद नेहरू कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बने। नेहरू ने देश और कॉन्ग्रेस, दोनों पर ही राज किया। पटेल की मृत्यु के बाद कॉन्ग्रेस में नेहरू का कोई प्रतिद्वंद्वी भी नहीं रहा और पार्टी और देश, दोनों के ही सत्ता के सिरमौर वही रहे। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन को अपनी ज़िंदगी कॉन्ग्रेस के लिए खपाने का इनाम राजनीतिक वनवास के रूप में मिला।

हालाँकि, 1952 और 1956 में उन्हें राज्यसभा के लिए चुना गया लेकिन उनकी सक्रियता कम होती चली गई। अहिंसावादी टंडन स्वास्थ्य कारणों से भी राजनीति से दूर रहने लगे थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वह रबर का चप्पल पहना करते थे क्योंकि हिंसा के विरुद्ध चमड़े की चीजों से उन्होने दूरी बना ली थी। उनके बारे में एक कहानी बड़ी प्रचलित है। एक बार जब वह संसद में अपना वेतन लेने पहुँचे, तो उन्होंने अधिकारियों को वो रुपए तत्काल पब्लिक सर्विस फंड में ट्रांसफर करने को कहा। हतप्रभ अधिकारियों व नेताओं ने उनसे पूछा कि आपको 400 रुपए ही मिलते हैं और वो भी आप देशसेवा में दे देना चाहते हैं? इस पर राजर्षि ने कहा कि उनके सातों बेटे नौकरी कर रहे हैं और वे सभी उन्हें 100-100 रुपए हर महीने भेजते हैं।

उन्होंने कहा कि उसमें से वे 300-400 रुपए ख़र्च करते हैं और बाकी के समाज सेवा में लगा देते हैं। उन्होंने अपने संसदीय वेतन के बारे में कहा कि यह मेरी अतिरिक्त कमाई है और इसकी मुझे कोई ज़रूरत नहीं है, इसलिए यह समाज सेवा में जाएगा। टंडन के निःस्वार्थ जीवन को देखते हुए महात्मा गाँधी उन्हें ‘राजर्षि’ कह कर पुकारा करते थे। देश का शायद यह दुर्भाग्य रहा कि उनके जैसे नेता की सेवा कुछ और दिन नहीं मिल पाई। अगर उन्हें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद त्यागने को मजबूर न किया गया होता तो शायद देश और कॉन्ग्रेस को उनके अनुभव और ज्ञान से और लाभ मिलता। लेकिन अफ़सोस, जिस नेहरू ने कहा था कि टंडन की जीत को वह अपने ख़िलाफ़ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ मान कर पीएम पद से इस्तीफा दे देंगे, अपनी इस धमकी से वह तो अपने पद पर बने रहे और पार्टी अध्यक्ष भी बने लेकिन लोकतान्त्रिक तरीके से जीते टंडन को राजनीतिक वनवास पर जाना पड़ा।

VIDEO: सूखी नदी में बनाया जा रहा था पुल, अचानक आई पानी की तेज़ धार में फँसे 7 मजदूर

मध्य प्रदेश में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे जान कर आप भी चौंक जाएँगे। दरअसल, यहाँ एक सूखी नदी में पानी की तेज़ रफ़्तार वाली धार ने सभी मज़दूरों को फँसा दिया। सूखी नदी में ये सारे मजदूर पुल बनाने का काम कर रहे थे और इन्हें दूर-दूर तक पानी के आने की कहीं से भी आशंका नहीं थी। हालाँकि, बाद में सभी मजदूरों को सुरक्षित बचा लिया गया। नीचे संलग्न की गई वीडियो में आप इस घटना को देख सकते हैं कि कैसे जल से विहीन नदी में अचानक से पानी की तेज़ धार आ गई।

जानकारी देते चलें कि पिछले वर्ष 2018 में मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में भी इसी तरह की एक घटना सामने आई थी। वहाँ बारिश के कारण नाले का जलस्तर अचानक से बहुत ज्यादा बढ़ गया था और इसकी वजह से कार पानी के तेज बहाव में बह गई थी। उस दुर्घटना में 4 कार सवारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था।

ताज़ा मामले में भी ऐसा ही कुछ देखा जा सकते है जो यह बताता है कि पानी की तेज़ धार अगर सामने आ रही है तो वह किसी को भी नहीं बख्शती। मंदसौर वाली घटना में ग्रामीणों के लाख मना करने के बावजूद कार सवारों ने आगे जाने की सोची और फिर उनकी मौत हो गई। यह उनके लिए सबक है जो पानी की धार से मज़ाक करते हैं या इसे हलके में लेते हैं।