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दलित की हत्या, खाट से बाँध जलाया शव: भारत-पाक मैच की जीत पर ‘समुदाय विशेष’ से हुई थी बहस

उत्तर प्रदेश के रामपुर बेला गाँव में 33 वर्षीय एक दलित को उसकी झोपड़ी में ही जलाकर मार दिया गया। मृतक का नाम विनय प्रकाश है।

जानकारी के अनुसार विनय 16 जून को भारत-पाक मैच में हुई भारत की जीत पर खुशी मना रहा था, तभी ‘समुदाय विशेष’ के कुछ लोगों के साथ उसकी झड़प हुई थी। देर रात हुई इस झड़प के बाद विनय अपनी झोपड़ी में सोने चला गया। सोमवार की सुबह गाँव वालों ने देखा कि विनय की झोपड़ी से धुआँ उठ रहा है। आग की लपटों मे विनय और उसकी झोपड़ी इतनी बुरी तरह जल चुके थे कि विनय के शव की पहचान भी नहीं हो पा रही थी।

बता दें कि विनय एक किसान था और वह सुअरों को भी चराता था। वो अक्सर अपने गाँव से दूर अपने खेतों के पास एक फूस की झोपड़ी में सोता था। गाँव वालों का दावा है कि विनय की हत्या की गई है। पुलिस ने भी हत्या के बाद सुराग मिटाने के लिए शव को झोपड़ी सहित जलाने के अंदेशा को खारिज नहीं किया है। हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस हत्याकांड के पीछे भारत-पाक मैच के बाद हुई झड़प का कोई कनेक्शन है या नहीं। घटना से नाराज़ गाँव वालों ने पट्टी पुलिस से विनय के घर वालों के लिए मुआवजे की भी माँग की है।

राज्य अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति आयोग ने घटना का संज्ञान लिया है और प्रतापगढ़ पुलिस को मामले की जाँच कर आरोपी को गिरफ्तार करने के साथ ही रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया है।

J&K में 24 घंटे के भीतर 4 आतंकी हमले: मेजर सहित 3 जवान वीरगति को प्राप्त

जम्मू कश्मीर में 24 घंटे के भीतर 4 आतंकी हमलों ने घाटी को दहला दिया है। यहाँ हम आपको चारों घटनाओं के बारे में एक साथ सारी जानकारी देने जा रहे हैं। सबसे ताज़ा घटना आज मंगलवार (जून 18, 2019) की है। आज अनंतनाग में सुरक्षा बलों एवं आतंकियों के बीच गोलीबारी हुई। ये मुठभेड़ बिजबिहारा शहर के नजदीक स्थित मरहमा संगम गाँव में हुई। पुलिस को सूचना मिली थी कि इस क्षेत्र में कुछ आतंकी फँसे हुए हैं। इसके बाद भारतीय सेना की 33 राष्ट्रीय राइफल्स, जम्मू कश्मीर पुलिस और सीआरपीएफ ने संयुक्त ऑपरेशन चलाया। आतंकियों ने इस दौरान तलाशी अभियान चला रहे दस्ते पर ग्रेनेड फेंका। यह मुठभेड़ अभी भी जारी है।

अब थोड़ा पीछे चलते हैं और इन चारों घटनाओं में से सबसे पहली घटना की बात करते हैं। ये घटना भी अनंतनाग में हुई, जब कॉम्बिंग ऑपरेशन चला रहे सुरक्षा बलों के एक दस्ते पर आतंकियों द्वारा हमला किया गया। इस हमले में आर्मी मेजर केतन शर्मा वीरगति को प्राप्त हो गए। एक अन्य जवान भी गंभीर रूप से घायल हैं, जिनका इलाज चल रहा है। यह हमला अछबल जिले के बदूरा क्षेत्र में किया गया। आतंकियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई इस मुठभेड़ में एक आतंकी को भी मार गिराया गया। यहाँ भी आतंकियों के छिपे होने की सूचना पर ही सुरक्षा बल के जवान पहुँचे थे।

अब चलते हैं दूसरी घटना की ओर। इस हमले में 44 राष्ट्रीय राइफल्स की मल्टी-विकल पैट्रॉल को निशाना बनाया गया। आतंकियों ने जवानों की गाड़ी के नजदीक एक अन्य गाड़ी में बम फिट कर के पुलवामा जैसी घटना दोहराने की कोशिश की। बुलेट प्रूफ वाहन में होने के बावजूद इस हमले में जवान घायल हुए। सभी घायल जवानों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। ताजा सूचना के अनुसार, 2 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए हैं। इस हमले में कुल 9 जवान घायल हुए थे। आपको बता दें कि यह घटना उस स्थल से 27 किलोमीटर की ही दूरी पर हुई है, जहाँ पुलवामा हमले के दौरान 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने इसे एक ‘फेल्ड एटेम्पट’ करार दिया है।

तीसरी घटना के दौरान सीआरपीएफ को निशाना बनाया गया। इसमें 180 सीआरपीएफ बटालियन कैम्प के मुख्यालय पर बम फेंके गए। यह हमला त्राल में हुआ। हालाँकि, ग्रेनेड मुख्यालय के बाहर ही फट गया और जवान घायल होने से बच गए।

दूसरी घटना में वीरगति को प्राप्त जवान केतन शर्मा मेरठ के रहने वाले हैं। अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र केतन के परिवार में कोहराम मचा है। वहाँ सेना के अधिकारियों व नेताओं का ताँता लगा हुआ है। 5 वर्ष पूर्व ही उनकी शादी दिल्ली निवासी इरा से हुई थी। वो अपने पीछे 3 वर्ष की एक बेटी को छोड़ गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बलिदानी जवान के परिजनों को 25 लाख रुपए व परिवार के एक आश्रित को नौकरी देने की घोषणा की है। मेरठ में एक सड़क का नामकरण भी केतन शर्मा की याद में किया जाएगा। शर्मा 28 दिनों की छुट्टी बिताने के बाद 26 मई को ही वापस लौटे थे। उनकी माँ को काफ़ी देर तक केतन के घायल होने की बात ही बताई गई थी। आतंकियों की गोली सीधे केतन के सिर में लगी थी।

कोटा से BJP सांसद ओम बिड़ला होंगे नए लोकसभा स्पीकर, मोदी-शाह की जोड़ी ने फिर चौंकाया

लोकसभा अध्यक्ष के लिए नाम पर चल रहा सस्पेंस खत्म हो गया है। कोटा से बीजेपी सांसद ओम बिड़ला लोकसभा के नए स्पीकर होंगे। ओम बिड़ला अमित शाह के काफी करीबी माने जाते हैं। राजस्थान में विधानसभा चुनावों के दौरान उन्हें संगठन की जिम्मेदारी भी दी गई थी। ओम बिड़ला कोटा से लगातार 2 बार (साल 2014 और 2019 में) सांसद का चुनाव जीते हैं। बिड़ला तीन बार विधायक भी रहे हैं।

ओम बिड़ला इस पद के लिए आज (जून 18, 2019) अपना नामांकन दाखिल करेंगे। जिसके बाद बुधवार (जून 19, 2019) को सदन में इस पर मतदान होगा। लोकसभा में एनडीए की संख्या बल से साफ है कि उनकी चुनावी प्रक्रिया में किसी तरह की दिक्कत नहीं आएगी और ऐसे में ओम बिड़ला का स्पीकर बनना तय माना जा रहा है। लोकसभा स्पीकर के पद के लिए ओम बिड़ला को चुनने के लिए उनकी पत्नी अमिता बिड़ला ने कैबिनेट का आभार जताया और कहा कि ये उनके लिए बहुत ही गर्व और खुशी का क्षण है।

17वीं लोकसभा के पहले सत्र में मंगलवार (जून 18, 2019) को दूसरे दिन भी नए सांसदों का शपथ ग्रहण जारी रहेगा। आज जिन राज्यों के सांसदों को शपथ दिलाई जानी है, उनमें यूपी, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु से चुनकर आए सांसद शामिल हैं। सदन में सांसदों को शपथ दिलाने के लिए प्रोटेम स्पीकर के तौर पर टीकमगढ़ से बीजेपी सांसद वीरेंद्र कुमार को नियुक्त किया गया है। वह नव नियुक्त सांसदों को शपथ दिला रहे हैं। सत्र के पहले दिन कुल 313 सांसदों ने शपथ ली। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी जैसे दिग्गज शामिल रहे।

नई आतंकी प्लानिंग: J&K नहीं अब नेपाल के रास्ते होगा अटैक, बिहार-UP में हो रही स्लीपर सेल की भर्ती

भारत-पाकिस्तान सीमा पर सुरक्षा बलों की कड़ी निगरानी के कारण अब ISI नेपाल के जरिए जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमले की साजिश रच रही है। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक अब आतंकियों को नेपाल में मौजूद स्लीपर सेल के जरिए भारतीय सुरक्षा बलों पर हमले के निर्देश दिए जा रहे हैं। इस सूचना की मानें तो मार्च और अप्रैल के महीने में 2 कश्मीरी आतंकी नेपाल भी गए, जहाँ उनकी मुलाकात हिलबुल मुजाहीद्दीन के टॉप कमांडर्स से हुई ।

जी न्यूज और आजतक की खबर के अनुसार इस मीटिंग में उन 2 आतंकियों की मुलाकात हिजबुल के 3 और आतंकियों से हुई। इसके बाद हमले की साजिश को अंजाम देने के लिए पाँचों आतंकी कश्मीर लौट आए। इनकी मदद आईएसआई द्वारा की जा रही है।

जानकारी के अनुसार अब आतंकी गुटों को यह डर सताने लगा है कि भारतीय एजेंसी उन पर लगातार नजर रख रही हैं, इसलिए वो नेपाल जाकर ISI के एजेंटों से मुलाकात कर रहे हैं। यहाँ से ISI आतंकियों को फंडिंग भी कर रही है।

जी न्यूज की खबर के अनुसार केंद्रीय सुरक्षा में तैनात एक अधिकारी का कहना है कि जब से कश्मीर में टेरर फंडिंग पर नकेल कसी गई है, तभी से लाइन ऑफ़ कंट्रोल और इंटरनेशनल बॉर्डर पर कड़ी निगरानी के चलते ISI के लिए कश्मीर में मौजूद आतंकियों को मदद करना मुश्किल हो गया है। यही कारण है कि नेपाल के जरिए अब आतंकियों को भारत के खिलाफ हमले के लिए तैयार किया जा रहा है। फिलहाल भारतीय एजेंसियाँ ये पता करने की कोशिश कर रही हैं कि पिछले महीने में कितने आतंकी नेपाली गए हैं।

गौरतलब है कि खुफिया एजेंसियों ने पिछले दिनों गृह मंत्रालय को भेजी गई रिपोर्ट में कहा था कि पाक के इशारे पर आतंकी गुट लश्कर-ए-तैयबा फैजाबाद और गोरखपुर में अपना बेस बना रहा है। साथ ही नेपाल और बिहार-यूपी से सटे तराई के कई इलाकों में उसने अपनी गतिविधियाँ भी बढ़ा दी हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि आतंकी संगठन गोरखपुर और फैज़ाबाद में अपने संगठन में लोगों को भर्ती करने की साज़िश में लगा हुआ है और इसके लिए उसने एक लश्कर आतंकी मोहम्मद उमर मदनी को अपने नेटवर्क को मजबूत करने की जिम्मेदारी भी दी है।

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो राजीव की रानी है: कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने सोनिया को दिखाया ‘झाँसी की रानी’

पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी में अब पार्टी कार्यकर्ताओं ने महारानी लक्ष्मीबाई का रूप दिख रहा है। जहाँ राहुल द्वारा इस्तीफा देने की ख़बरों के बीच अब सोनिया गाँधी उन्हें मनाने में लगी हैं और नेताओं के साथ बैठक कर सब कुछ ठीक-ठाक कर रही हैं, लगता है कि कार्यकर्ताओं का भरोसा राहुल से पूरी तरह उठ चुका है। तभी तो कार्यकर्ताओं ने सोनिया से इतनी उम्मीदें लगा रखी हैं कि अब उन्हें कंगना राणावत अभिनीत फ़िल्म ‘मणिकर्णिका’ के गेट-अप में दिखाया जा रहा है। ये पोस्टर प्रयागराज के कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने छपवाया है, जिसमें प्रमुख तौर पर हसीब अहमद शामिल हैं।

हसीब अहमद इससे पहले भी इसी तरह के पोस्टरों के लिए चर्चा में रहे हैं। जब प्रियंका गाँधी लोकसभा चुनाव से पहले प्रयागराज के दौरे पर आई थीं, तब अहमद ने उन्हें ‘राम भक्त’ बताते हुए पोस्टर्स छपवाए थे। उस पोस्टर में रामचरितमानस के दोहे लिखे थे और भगवान राम के साथ राहुल व प्रियंका को दिखाया गया था। उससे पहले प्रयागराज कुम्भ मेले के दौरान अहमद ने प्रियंका को ‘गंगा की बेटी’ बताते हुए पोस्टर छपवाए थे। हसीब अहमद प्रयागराज कॉन्ग्रेस के महासचिव हैं। उत्तर प्रदेश में इस तरह के पोस्टरों को लेकर पोस्टर वॉर भी होता रहा है और सभी प्रमुख दल एक पोस्टर के जवाब में दूसरा पोस्टर लगवाते हैं।

ताज़ा पोस्टर में लिखा गया है- “चमक उठी सन 91 में वो तलवार पुरानी है, खूब लड़ी मर्दानी वो तो इंदिरा, राजीव की रानी है।” हसीब अहमद ने राहुल गाँधी को एक खुला पत्र लिख कर कहा था कि अगर उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़ा तो कार्यकर्ता आत्महत्या कर लेंगे। उन्होंने लिखा था कि पार्टी उन्हीं की अगुआई में आगे बढ़ी है और जम कर लड़ी है।

कॉंग्रेसपरती की हालत अभी काफी खराब है और पार्टी अध्यक्ष के इस्तीफे के बाद सदन में नेता चुनने को लेकर भी अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है। पिछले लोकसभा चुनावों की तरह इस बार विपक्ष की कोई साझा बैठक भी नहीं हुई है। ऐसे में, शायद पार्टी को अब फिर से सोनिया पर ही भरोसा है और इसीलिए कार्यकर्ता उनमें जबरदस्ती झाँसी की रानी को देखने की कोशिश कर रहे हैं।

शपथ लेने के बाद रजिस्टर पर हस्ताक्षर करना भूले राहुल गाँधी, राजनाथ ने दिलाया याद

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला संसद सत्र शुरू हो गया। सोमवार यानी जून 17, 2019 से शुरू हुए इस सत्र में पहले दो दिन सभी नव-निर्वाचित सांसदों को शपथ दिलाई जाएगी। पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे कई दिग्गज नेताओं ने शपथ ली। प्रोटेम स्पीकर वीरेंद्र कुमार ने इन सांसदों को शपथ दिलाई। वहीं पहले ही दिन राहुल गाँधी की सदन में तब किरकिरी हो गई, जब वह शपथ लेने के बाद हस्ताक्षर करना ही भूल बैठे। सांसद का शपथ लेने के बाद वायनाड से जीत कर आए राहुल संसद के रजिस्टर में हस्ताक्षर करना भूल गए, जो कि एक औपचारिक प्रक्रिया है।

इसके बाद राजनाथ सिंह व अन्य नेताओं ने राहुल को इस बात की याद दिलाई, तब उन्होंने आकर हस्ताक्षर किए। चौथी बार सांसद चुने गए राहुल गाँधी इस बार अमेठी से हार गए। दो सीटों पर चुनाव लड़ने के कारण वह संसद पहुँच सके क्योंकि केरल में उन्हें जीत मिली। लंच टाइम के बाद संसद पहुँचे राहुल गाँधी ने अंग्रेजी में शपथ ली। शपथ लेने से पहले उन्होंने एक ट्वीट में लिखा:

“लोकसभा के सदस्य के रूप में मेरा लगातार चौथा कार्यकाल आज से शुरू हो रहा है। केरल के वायनाड का प्रतिनिधित्व करते हुए मैं आज दोपहर शपथ लेकर संसद में अपनी नई पारी की शुरुआत करने जा रहा हूँ। मैं यह भरोसा दिलाता हूँ कि मैं भारत के संविधान के प्रति सच्चा विश्वास और निष्ठा रखूँगा।”

बुधवार (जून 19, 2019) को लोकसभा में लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) और उपाध्यक्ष (डिप्टी स्पीकर) का मतदान होना है। भाजपा ने पहले कार्यकाल के दौरान अन्नाद्रमुक को लोकसभा उपाध्यक्ष का पद दे दिया था, जबकि वे तब राजग का हिस्सा भी नहीं थे। चर्चा है कि भाजपा उसी परंपरा का पालन करते हुए किसी नॉन-राजग पार्टी को यह पद दे सकती है। सोमवार को निर्वाचित साध्वी प्रज्ञा ने जब शपथ लिया, तब विपक्षी नेताओं ने उनके नाम को लेकर विवाद खड़ा किया। कुल मिलकर पहले दिन 313 सांसदों ने शपथ ली।

पहले दिन सांसदों ने जम कर ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए और जब आसनसोल से चुने गए बाबुल सुप्रियो ने शपथ लिया, तब सदन में ‘जय श्री राम’ के नारे गूँजे। अभी तक विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस ने सदन में अपने नेता के नाम की घोषणा नहीं की है। संसदीय परंपरा के अनुसार, नवगठित लोकसभा को राष्ट्रपति भी सम्बोधित करेंगे। फिर उनके अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव लाया जाएगा, जिस पर विस्तृत बहस होगी। पहले दिन संसद में कई सदस्य अपने क्षेत्रीय पारम्परिक परिधान में पहुँचे।

हालाँकि, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, मल्लिकार्जुन खड़गे, एचडी देवेगौड़ा और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेताओं के न रहने के कारण सदन में यह साफ़ झलका कि अब पीढ़ियाँ बदल गई हैं। सनी देओल, गौतम गंभीर, मिमी चक्रवर्ती और रवि किशन के होने से ग्लैमर का भी तड़का लगा।

पत्नी को छोड़ अल्लाह मेहर 13 साल की साली के साथ फरार, ससुर को दी मार डालने की धमकी

ग्रेटर नोएडा में 25 वर्षीय एक युवक अपनी पत्नी को छोड़ कर 13 साल की नाबालिग लड़की के साथ शादी करने के लिए भाग निकला। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, जिस लड़की के साथ अल्लाह मेहर नाम का यह युवक भाग निकला है, वह उसकी पत्नी की छोटी बहन है। अल्लाह मेहर के दो चाचाओं व एक दोस्त के ख़िलाफ़ इस मामले में पुलिस द्वारा केस दर्ज कर लिया गया है। उसके ससुर हनीफ ने पुलिस में शिकायत करते हुए इस मामले की जानकारी दी। हनीफ ने अपनी शिकायत में कहा:

“मेरा दामाद अल्लाह मेहर 7 जून को ईद के अवसर पर ससुराल आया था। मैं काम के लिए निकल रहा था, तभी मेरा दामाद वहाँ मेरी बेटी (उसकी पत्नी), अपने दोनों बच्चे और तीन अन्य रिश्तेदारों के साथ पहुँचा। जब मैं काम से वापस घर लौटा, तब मेरी बेटी ने जानकारी दी कि उसका पति व उसके साथ आए अन्य रिश्तेदार मेरी छोटी बेटी को अपने साथ ले गए हैं। इसके अलावा वह घर से 70000 रुपए और सारे गहने भी ले गया, जो घर में रखे हुए थे।”

हनीफ ने इस घटना के बाद बुलंदशहर पहुँच कर अपने दामाद से अपनी छोटी बेटी को छोड़ने को कहा लेकिन उसने इनकार कर दिया। उसने कहा कि उसकी बेटी नाबालिग है और इसीलिए उसके साथ बलपूर्वक शादी नहीं की जा सकती। इसके बाद अल्लाह मेहर ने अपने ससुर हनीफ को धमकी दी कि अगर वो फिर कभी अपनी बेटी को देखने आया तो उसके पूरे परिवार को मार डाला जाएगा। हनीफ ने अपने दामाद पर आरोप लगाया कि वह 10 दिनों से नाबालिग को बंधक बनाए हुए है।

पुलिस ने इस मामले में चार लोगों के ख़िलाफ़ धारा 363 (अपहरण), धारा 366 (किसी स्त्री के साथ शादी के लिए जबरदस्ती करना या अपहृत करना) और धारा 506 (धमकी देना) के तहत मामला दर्ज कर लिया है। आरोपित नाबालिग लड़की के साथ फरार है। इस मामले में पुलिस ने उसके सगे-सम्बन्धियों से पूछताछ की है और जल्द ही गिरफ़्तारी भी की जाएगी, ऐसा ग्रेटर नोएडा थाना के SHO सुजीत उपाध्याय ने भरोसा दिलाया है।

अप्रिय नितीश कुमार, बच्चों का रक्त अपने चेहरे पर मल कर 103 दिन तक घूमिए

सौ से ज़्यादा बच्चे मर गए, इससे आगे क्या कहा जाए! विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। हॉस्पिटल का नाम, बीमारी का नाम, जगह का नाम, किसकी गलती है आदि बेकार की बातें हैं, क्योंकि सौ से ज़्यादा बच्चे मर चुके हैं। इतने बच्चे मर कैसे जाते हैं? क्योंकि भारत में जान की क़ीमत नहीं है। हमने कभी किसी सरकारी कर्मचारी या नेता को इन कारणों से हत्या का मुकदमा झेलते नहीं देखा।

सूरत में आग में बच्चे मर गए, कौन-सा नेता या सरकारी अफसर जेल गया? किसी को पता भी नहीं। शायद कोई जाएगा भी नहीं क्योंकि इसे हत्या की जगह हादसा कहा जाता है। हादसा का मतलब है कि कोई अप्रिय घटना हो गई। जबकि, ये घटना ‘हो’ नहीं गई, ये बस इतंजार में थी अपने होने की। ये तो व्यवस्थित तरीके से कराई गई घटना है। ये तो कुछ लोगों द्वारा एक तरह से चैलेंज है कि ‘हम अपना काम नहीं करेंगे ठीक से, तुम से जो हो सकता है कर लो’।

तब पता चलता है कि माँओं की गोद में बेजान लाशें हैं और बिल्डिंग से चालीस फ़ीट ऊपर तक गहरा धुआँ उठ रहा है। जब आग थमती है तो आपके पास एक संख्या पहुँचती है कि इतने लोग मर गए। बिहार वाले कांड में भी हम संख्या ही गिन रहे हैं। संख्या से तब तक फ़र्क़ नहीं पड़ता, किसी को भी नहीं, जब तक वो बच्चा आपका न हो।

अधिकांशतः, हम इसलिए लिखते हैं क्योंकि हमें किसी को अटैक करना है। हमारी संवेदनशीलता अकांउटेबिलिटी फ़िक्स करने की जगह, या इस बीमारी के प्रति जागरूकता जगाने की जगह, किसकी सरकार है, कौन मंत्री है, और किसने क्या बेहूदा बयान दिया है, उस पर बात बढ़ाने में चली जाती है। हम स्वयं ही ऐसे विषयों पर बच्चों या उनके माता-पिता के साथ खड़े होने की जगह किसी के विरोध में खड़े हो जाते हैं।

जब आप विरोध में खड़े हो जाते हैं तो मुद्दा आक्रमण की तरफ मुड़ जाता है। मुद्दा यह नहीं रहता कि सरकार क्या कर रही है, कैसे कर रही है, आगे क्या करे, बल्कि मुद्दा यह बन जाता है कि तमाम वो बिंदु खोज कर ले आए जाएँ ताकि पता चले कि इस नेता ने कब-कब, क्या-क्या बोला है। फिर हमारी चर्चा सरकार को, जो विदित है कि निकम्मी है, उसी को और निकम्मी बताने की तरफ मुड़ जाती है। जबकि चर्चा की ज़मीन ही यही होनी चाहिए कि सरकार तो निकम्मी है ही, लेकिन आगे क्या किया जाए।

गोरखपुर में अगस्त के महीने में दो साल पहले ऐसे ही बच्चों की मौतें हुई थीं। उस वक्त भी चर्चा ऐसे ही भटक कर कहीं और पहुँच गई थी। उस वक्त भी भाजपा-योगी के चक्कर में लोग संवेदना की राह से उतर कर कब संवेदनहीनता में बच्चों की तस्वीरें लगा कर अपनी राजनैतिक घृणा का प्रदर्शन करने लगे, उन्हें पता भी नहीं चला। बच्चों की बीमारी, और यह बीमारी होती क्यों है, इसको छोड़ कर बातें इस पर होने लगी कि किसने क्या बयान दिया है।

बिहार एक बेकार जगह बनी हुई है। सुशासन बाबू ने जो तबाही वहाँ मचाई है, वो लालू के दौर से बहुत अलग नहीं है। ये सारे बच्चे बचाए जा सकते थे। ये बीमारी जिन दो तरीक़ों से फैलती है, उसमें से एक मच्छर के काटने से होती है, दूसरा है जलजनित। पहले के लिए टीका विकसित किया जा चुका है, दूसरे में तुरंत लक्षण पहचान कर डॉक्टर तक पहुँचना ही बचाव है। उसका कोई टीका नहीं।

ऐसे में जागरुकता अभियान की ज़रूरत होती है जो कि सरकार की ज़िम्मेदारी है। सरकार की ज़िम्मेदारी इसलिए है क्योंकि सरकारों में एक स्वास्थ्य विभाग होता है, और हम साबुन ख़रीदते हैं तो उस पर टैक्स कटता है जिससे सरकारों के मंत्री और अफसरों की तनख़्वाह जाती है। ये लोग इन बच्चों के हत्यारे हैं क्योंकि बिहार सरकार ने इस बीमारी से निपटने के लिए काग़ज़ पर एक पूरी प्रक्रिया बनाई हुई है। इसमें टीकाकरण से लेकर स्वच्छता और जागरुकता अभियान शामिल है। लेकिन वो इस साल लागू नहीं किया गया क्योंकि पिछले साल कम बच्चे मरे थे।

इसका समीकरण बिलकुल सीधा है, जब ज़्यादा बच्चे मर जाते हैं तो सरकार हरकत में आती है और बताया जाता है कि फ़लाँ लोगों को विदेश भेजा जाएगा इस पर स्टडी करने के लिए। सरकारें अपनी गलती नहीं मानतीं। वो यह नहीं बताती कि इस बीमारी से बचाव असंभव तो बिलकुल नहीं है। जैसे ही ऐसा मौसम आए, सरकारी काग़ज़ों में लिखा है कि लोगों में जागरूकता फैलाई जाए कि इस बीमारी के लक्षण क्या हैं, कैसे बचाव हो सकता है, सफ़ाई रखनी है आदि।

गोरखपुर में भी, और पूरे पूर्वांचल बेल्ट में, 1977 से हजारों बच्चे हर साल मरते रहे। गोरखपुर वाला मामला दो साल पहले जब राष्ट्रीय परिदृश्य में उछला तो योगी सरकार ने इस पर एक्शन लिया। टीकाकरण को प्राथमिकता दी गई और नवजात शिशुओं से शुरुआत की गई। सूअरों को आबादी वाले इलाके से हटाया गया। मच्छर मारने के उपाय किए गए। जागरूकता फैलाई गई कि बच्चों को मिट्टी वाले फ़र्श पर न सोने दिया जाए। सारे लक्षण बताए गए कि लोग तुरंत समझ सकें कि बच्चे को बीमारी हुई है, और अस्पताल ले जाना आवश्यक है।

लेकिन बिहार में इनके निष्प्राण होने का इंतजार किया जा रहा था शायद। 2015 में हुआ था तो काग़ज़ पर लिखा गया कि क्या करना है। एक-दो साल उस पर एक्शन भी हुआ। फिर लगता है सरकार भूल गई कि ये हर साल आता है और बच्चों को महज़ एक संख्या में बदल कर चला जाता है।

सरकारें भूल जाती हैं कि भारत जैसे देश में, या बिहार जैसे राज्य में, जहाँ जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा दो रोटी जुटाने में व्यस्त रहता है, वहाँ माँ-बाप से कहीं ज्यादा ज़िम्मेदारी सरकार की होती है कि वो अपना बहुत ज़रूरी काम करे क्योंकि उसके लिए एक मंत्रालय बनाया गया है। जो बच्चे मरते हैं वो किसी की पहली या दूसरी संतान होते हैं। वो शायद जागरुक नहीं होते इन बातों को लेकर। उनके लिए शायद सीज़न बीतने के बाद लक्षण पहचानने में गलती हो सकती है।

इसकी भयावहता को ‘चमकी बुखार’ जैसा बेहूदा नाम देकर कम किया जाना भी अजीब लगता है। ऐसी बीमारी जो हजारों बच्चों को लील जाती है उसके नाम में ‘चमकी’ और ‘बुखार’ जैसे सामान्य शब्दों का प्रयोग बताता है कि सरकार ने भारतीय जनमानस के सामूहिक मनोविज्ञान पर अध्ययन नहीं किया कि वो किस तरह के नामों से डरते हैं, किस नाम पर ज्यादा रिएक्ट नहीं करते। आप सोचिए कि जिस व्यक्ति को इसकी भयावहता का अंदाज़ा न हो, वो ‘चमकी बुखार’ सुन कर इस बीमारी के बारे में क्या राय बनाएगा।

इसीलिए लोग सरकार चुनते हैं कि वो अगर नमक ख़रीदकर आपको टैक्स देते हैं तो उनकी कुछ ज़िम्मेदारी आपको लेनी ही होगी। यहाँ सरकार को लगातार मिशन मोड में यह बताते रहना होगा, चाहे आदमी सुन-सुन कर चिड़चिड़ा हो जाए, कि मस्तिष्क ज्वर से बचाव कैसे करें, कौन-सा पानी पिएँ, मच्छरों से बचाव करें, घर के आस-पास गंदगी न फैलने दें। इस पूरी प्रक्रिया को, इस जागरुकता अभियान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पारंपरिक ज्ञान की तरह आगे बढ़ाने की हद तक फैलाते रहना चाहिए।

सुशासन बाबू की सरकार में बिहार में शायद कुछ भी सही नहीं हो रहा। अपराध घट नहीं रहे, शिक्षकों को वेतन नहीं मिल रहा, पटना के पीएमसीएच के आईसीयू में लोग बाँस वाला पंखा हौंक रहे हैं, सड़कों पर अराजकता है… एक बिहारी आज भी वापस जा कर कुछ करने से डरता है क्योंकि जिस लालू के काल को गाली देकर, उसे एक घटिया उदाहरण बता कर नितीश कुमार सत्ता में आए, उन्होंने शुरुआत के कुछ सालों के बाद, बिहार के लिए कुछ नहीं किया।

मीडिया नहीं घेरेगी क्योंकि आधी मीडिया नितीश को भाजपा के पार्टनर के रूप में देखती है, और बाकी की आधी मीडिया को लगता है कि आने वाले दिनों में नितीश मोदी के विरोधियों के खेमे में शिफ्ट हो सकते हैं। ऐसे में जैसी तीक्ष्णता के साथ योगी पर धावा बोला गया था, वैसी तीक्ष्णता नितीश के मामले में नहीं दिखेगी। उसके बाद मीडिया वालों को अपना बिजनेस भी देखना है। उस योजना में नितीश किसी भी तरह से फ़िट नहीं बैठते। इसलिए, इतनी बर्बादी और निकम्मेपन के बाद भी जदयू-भाजपा की सरकार कभी भी ज़हरीली आलोचना की शिकार नहीं हुई है।

सोशल मीडिया वाली जेनरेशन

इसी संदर्भ में सोशल मीडिया पर देखने पर एक हद दर्जे की संवेदनहीनता दिखती है। ये संवेदनहीनता सोशल मीडिया की पहचान बन चुकी है जहाँ मुद्दा बच्चों की मौत से हट कर राजनैतिक विरोधियों को गरियाने तक सिमट जाता है। हर दूसरा आदमी अपने पोस्ट पर तीसरे आदमी को धिक्कार रहा है कि कोई इस पर क्यों नही लिख रहा, फ़लाँ आदमी कुछ क्यों नहीं कर रहा, आप सही आदमी को क्यों नहीं चुनते…

हो सकता है दो-एक लोग सही मंशा रखते हों। हो सकता है कुछ लोग विचलित हो गए हों। लेकिन बच्चों की तस्वीरें लगा कर आप कुछ नहीं कर रहे, सिवाय दिखावे के। उस तस्वीर के लगाने से आप संवेदनशील नहीं हो जाते। अगर आप संवेदनशील हैं तो आपको दूसरे ‘क्या नहीं हैं’, वो बताने की कोई ज़रूरत नहीं। हम सारे लोग इस तरह से व्यवहार करने लगते हैं जैसे कि हम ही सबसे ज्यादा विचलित हो गए हों, और हमारी बात हर कोई क्यों नहीं मान रहा, नेता ऐसे कैसे बोल रहे हैं…

ऐसे समय में बात करना, खुद को अभिव्यक्त करना ज़रूरी है। गुस्सा भी वाजिब है लेकिन जज मत बनिए। क्योंकि आपकी संवेदनशीलता आपके ऐसे पोस्ट के बाद वाले पोस्ट में झलक जाती है जहाँ आप किसी और विषय पर चले जाते हैं जिसे पढ़ने के बाद कहीं से नहीं लगता कि आपको बच्चों की मौत से उतना दुःख वास्तव में पहुँचा है जितना आपने पोस्ट में लिख दिया।

सत्य तो यह है कि आपको लिखना है, और आपको दिखना है कि आपने अपनी ज़िम्मेदारी लिख कर निभा ली। जब आपको अपनी ज़िम्मेदारी ही निभानी है तो बस अपने हिस्से का लिखिए। आप रोइए, गाइए, हताश हो जाइए, काला पिक्चर लगाइए, लेकिन आपको कोई हक़ नहीं है यह कहने का कि बाकी लोग क्या कर रहे हैं। ज्योंहि आप बच्चों की मौतों को अपने व्यक्तिगत इमेज बिल्डिंग के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं, वो बच्चे दोबारा मर जाते हैं।

सरकारों को आड़े हाथों लेना, आलोचना करना, स्वास्थ्य सुविधाओं पर आवाज उठाना हमरा फर्ज है एक नागरिक के तौर पर लेकिन जब आप इसे खानापूर्ति की तरह लगाते हैं तो पता चलता है कि आप गंभीर नहीं हैं। गंभीरता तब झलकेगी जब आप दूसरों पर फ़ैसले नहीं सुनाएँगे, और अगर एक मुद्दा पकड़ा है तो उस पर तब तक लिखते रहेंगे जब तक वो सही मुक़ाम तक न पहुँच जाए।

ईश-निंदा में फ़ँसे Pak हिन्दू डॉक्टर लटकाए जा सकते हैं सूली पर… लेकिन ‘इनटॉलेरेंस’ भारत में है

पाकिस्तान में डॉ. रमेश कुमार माल्ही सूली पर लटकाए जा सकते हैं- इसलिए नहीं कि उन्होंने किसी की हत्या कर दी, किसी का बलात्कार कर दिया; इसलिए भी नहीं कि उन्होंने किसी भी प्रकार का देशद्रोह या किसी दहशतगर्दी की वारदात में हिस्सेदारी की हो। किसी नशीले पदार्थ के व्यापार में भी नहीं। उन्हें फाँसी पर इमरान खान का ‘नया पाकिस्तान’ केवल इसलिए लटका देगा क्योंकि उनके ख़िलाफ़ एक मौलवी ने आरोप लगा दिया है कि उन्होंने क़ुरान के पन्ने फाड़कर उसमें लपेटकर मौलवी को दवा दी थी।

पाकिस्तान का ईश निंदा कानून

पाकिस्तान का ईश निंदा कानून न केवल इस रूप में दमनकारी है कि इसके अंतर्गत महज़ कुछ शब्दों के लिए किसी की जान ले ली जा सकती है, बल्कि इस कानून के अनुपालन में भी कोई नियम-कायदा नहीं है। पाक के बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय के किसी भी व्यक्ति के द्वारा शिकायत भर कर देना काफी है आपको सलाखों के पीछे पहुँचा देने के लिए। कहने को तो यह पाकिस्तान की सरकार द्वारा “मान्यता-प्राप्त” किसी भी पंथ के खिलाफ बोलने पर लगाया जा सकता है, लेकिन असलियत में यह केवल मुस्लिमों द्वारा गैर-मुस्लिमों को ‘सीधा’ करने के लिए इस्तेमाल होता है। यही आसिया बीबी के मामले में हुआ- उनकी पड़ोसिनों ने कहासुनी का बदला लेने के लिए उनके खिलाफ इस कानून के अंतर्गत शिकायत कर दी, जिसके लिए उन्हें पहले 8 साल मौत की सजा के डर में बिताने पड़े, फिर रिहा होते ही पाकिस्तान छोड़ कर कनाडा भागना पड़ा, और यही डॉ. माल्ही के साथ होता दिख रहा है।

पेशे से जानवरों के डॉक्टर रमेश कुमार माल्ही ने कुछ दिन पहले इलाके के ‘प्रभावशाली’ मुस्लिम परिवार के मवेशियों को देर रात देखने से मना कर दिया था। इसी के बाद उन पर यह केस हुआ, और वह जेल में ठूँस दिए गए। उनकी गिरफ़्तारी के बाद जिस इलाके में वह रहते थे (मीरपुर खास, सिंध का फुलादियों), वहाँ हिन्दुओं के खिलाफ दंगे भड़क गए और हिन्दुओं की दुकानों को चुन-चुन कर आग के हवाले कर दिया गया है

हिंदुस्तान के छद्म-लिबरलों के लिए सबक

हिंदुस्तान के जिन छद्म-लिबरलों को यह देश पिछले पाँच सालों में ‘हिन्दू पाकिस्तान’, ‘भगवा तालिबान’, ‘असहिष्णु’ बनता दिख रहा है, उन्हें सच में एक बार पाकिस्तान का दौरा कर आना चाहिए। जाकर के वहाँ देखना चाहिए कि कैसे इस कानून में नरमी दिखाने का नाम लेते ही भीड़ सड़कों पर उतर आती है, दंगे-फसाद मच जाते हैं, सलमान तासीर और शाहबाज़ भट्टी को उनके ही सुरक्षाकर्मी केवल इसलिए मौत के घाट उतार देते हैं कि वह इस कानून के खिलाफ बोलने की हिमाकत किए थे। मुहम्मद बिलाल खान जहाँ सिर्फ इसलिए मार दिए जाते हैं क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान की सेना और आईएसआई की आलोचना कर दी थी। जिन्हें अपने देश भारत के कानून इतने दमनकारी लगते हैं कि लैला जैसी डिस्टोपिया बनाकर वह मुस्लिमों की प्रताड़ना दिखाना चाहते हैं, उन्हें केवल एक हफ़्ते पाकिस्तान में बिता कर आना चाहिए।

हिंदुस्तान में जितना क़ानूनी हक़ अभिव्यक्ति की आज़ादी को है, उससे ज्यादा केवल हमसे कहीं ज्यादा समय तक और परिपक्व ढंग से लोकतान्त्रिक शैली की सामाजिक संस्कृति अपना चुके यूरोपीय-अमेरिकी देशों में है। हमारे साथ या उसी समय के आस-पास आज़ाद हुए अधिकांश देशों, और खासकर पड़ोसियों पर नज़र डालें तो जेहन में पाकिस्तान का ईश-निंदा कानून, बांग्लादेश में नास्तिक/गैर-मुस्लिम ब्लॉगरों की इस्लाम के ख़िलाफ़ बोलने या लिखने पर हत्या, म्याँमार में लोकतंत्र और सैन्य शासन का ऑड-ईवेन दिखता है। और इस देश में जहाँ कमलेश तिवारी हज़रत मोहम्मद के खिलाफ बोल कर जेल में सड़ जाता है, वहीं मालदा-बशीरहाट में ममता बनर्जी मुस्लिम दंगाईयों को एक लड़के की फेसबुक पोस्ट पर आधा राज्य जला डालने के लिए आज़ाद छोड़ देतीं हैं; ‘सेक्सी दुर्गा’ फिल्म पर बुद्धिजीवी आँख-कान-मुँह बंद कर लेते हैं, और ‘हिन्दू आतंकवाद’ का शिगूफ़ा छेड़ने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी आज भी अपना प्रधानमंत्री बनाने का सपना देख सकती है। इसलिए हर कदम पर हिंदुस्तान में इनटॉलेरेंस देखने वालों से गुज़ारिश है कि आस-पास देख लें, आपके हिन्दूफ़ोबिक यूटोपिया जितना तो अच्छा नहीं है, लेकिन वैसे हिंदुस्तान का लोकतंत्र काफी अच्छा है…

पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों के बाद अब शिक्षक भी सड़क पर, पुलिस से हाथापाई

पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों के बाद अब शिक्षकों की नाराज़गी सामने आई है। कोलकाता के सॉल्ट लेक स्थित मयूख भवन द्वीप पर शिक्षकों और पुलिस के बीच हाथापाई की घटना भी सामने आई है। एसएसके, एमएसके और एएस शिक्षक संघों के शिक्षक सोमवार को शिक्षा मंत्री से मुलाकात करने के लिए विकास भवन जा रहे थे। शिक्षकों की माँग है कि उनका वेतन बढ़ाया जाए क्योंकि उन्हें काफ़ी कम रूपए मिल रहे हैं। पुलिस ने जब शिक्षकों को मयूख भवन द्वीप पर जाने से रोक दिया, तब शिक्षकों ने बैरिकेड तोड़ने का प्रयास किया। इसके बाद पुलिस ने जब उन्हें रोका तो दोनों में भिड़ंत हो गई

ये शिक्षक पिछले 6 दिनों से लगातार विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। वे राज्य के शिक्षा मंत्री से मिलने की माँग कर रहे हैं। सोमवार (जून 17, 2019) को शिक्षकों ने जब शिक्षा मंत्री से मिलने का प्रयास किया, तब ये झड़प हुई। मंत्री ने उन्हें मिलने के लिए समय नहीं दिया, जिसके बाद वे आक्रोशित हो गए। असल में इन शिक्षकों ने काफ़ी समय पहले ही राज्य सरकार को अपनी माँगों से परिचित करा दिया था लेकिन लोकसभा चुनाव जीतने के बाद इनकी माँगों को सुनने का आश्वासन दिया गया था।

अब, जब लोकसभा चुनाव जीतने के बाद शिक्षक मंत्री से मिलने पहुँचे, तब उन्होंने बात करना तो दूर, मिलने के लिए समय देने तक से भी इनकार कर दिया। बता दें कि बंगाल में डॉक्टरों व सरकार की भी कई दिनों से भिड़ंत चल रही है। 11 जून को जूनियर डॉक्टरों के साथ हुई मारपीट के विरोध में पूरे देश के डॉक्टरों ने बंगाल के डॉक्टरों के समर्थन में विरोध प्रदर्शन किया।