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बौद्ध, जैन, सिख, यहूदी, पारसी: इन्हें कभी ‘इनटॉलेरेंस’ की पीड़ा क्यों नहीं होती?

जिस अमेरिकी कमीशन ने हिंदुस्तान में ‘डर का माहौल’ के झूठे कथानक (नैरेटिव) पर अपनी अनिमंत्रित चौधराहट की मुहर लगाई, उसी कमीशन के चेयरपर्सन डॉ. तेंज़िन दोरजी ने कमीशन के बहुमत से अलग न केवल राय रखी बल्कि संख्याबल से दबाए जाने पर कमीशन की रिपोर्ट से अलग राय का असहमति-पत्र (डिसेंट नोट) लिखा। इस नोट में डॉ. दोरजी ने साफ-साफ लिखा कि कमीशन की रिपोर्ट ने हिंदुस्तान का जो चित्रण किया है, उनके व्यक्तिगत अनुभव उससे कतई मेल नहीं खाते। उन्होंने बताया कि एक तिब्बती बौद्ध होने के नाते वह हिंदुस्तान के सबसे कमज़ोर अल्पसंख्यक वर्ग के तौर पर 30 वर्ष रहे हैं। इस दौरान उन्होंने “पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता” का अनुभव किया है।

‘खुला समाज, सुदृढ़ लोकतंत्र और न्यायपालिका’

डॉ. दोरजी ने हिंदुस्तान को महान सभ्यता और प्राचीन समय से ही बहुपंथिक, बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक समाज बताया। उन्होंने लिखा कि हालाँकि छिटपुट हिंसक घटनाएँ (जो दुर्भाग्यपूर्ण, गैरकानूनी और गलत हैं, इसमें कोई दोराय नहीं) होती रहतीं हैं, लेकिन हिंदुस्तान के बहुपंथिक और सेक्युलर (लिबरल गैंग के नीम-हकीमी अर्थ में नहीं, सही अर्थ में) होने में कोई शक नहीं। वह दलाई लामा को भी उद्धृत करते हुए कहते हैं कि हिंदुस्तान की भिन्नता, समरसता और आदर व करुणा के कायल दलाई लामा भी हैं।

डॉ. दोरजी अपने भारतीय ‘गृह-राज्यों’ कर्नाटक और हिमाचल का ज़िक्र करते हुए उनकी और समूचे हिंदुस्तान की तुलना तिब्बत पर कब्ज़ा किए हुए चीन से करते हैं। वह बताते हैं कि कैसे हिंदुस्तान में समृद्ध हो रही तिब्बती भाषा और संस्कृति खुद तिब्बत में चीनी बूटों तले दम तोड़ रहे हैं।

इतिहास भी करता है तस्दीक

डॉ. दोरजी के इन कथनों की तस्दीक हिंदुस्तान का समूचा इतिहास भी करता है- चाहे आप कितने हज़ार साल भी चले जाएँ। दुनिया के सबसे छोटे और प्राचीनतम धार्मिक समूहों में शामिल पारसियों से लेकर यहीं वैदिक समाज से विद्रोह कर उत्पन्न हुए बौद्धों, जैनों, सिखों और इस्लाम-ईसाईयत के पुरोधा यहूदियों तक हिंदुस्तान में विभिन्न ही नहीं, परस्पर विरोधी आस्था के लोग हज़ारों सालों से रहते आए हैं। यहूदी तो दुनिया की सबसे प्रताड़ित कौम हैं, और इतनी सदियों में इकलौता हिंदुस्तान है, जहाँ कभी उन्हें मज़हबी वजह से निशाना नहीं बनाया गया।

आखिर ख़ास समुदाय और ईसाईयों में से ही क्यों आती है “इनटॉलेरेंस” की शिकायत?

अगर उपरोक्त बातें सही हैं, कि हिंदुस्तान की संस्कृति सर्व-समावेशी और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की है, तो सवाल यह है कि आखिर आज ‘इनटॉलेरेंस’ का इतना बाजा क्यों बज रहा है? तो जवाब जानने के लिए समकालीन हिन्दू समाज के साथ-साथ यह शोर जिस तबके से आ रहा है, उसकी ओर भी एक नज़र गहराई से डालना ज़रूरी हो जाता है।

आखिर ऐसा क्यों है कि हिंदुस्तान में सारी दिक्कतें केवल दो पंथों इस्लाम और ईसाईयत को मानने वालों को ही हो रहीं हैं? क्या इसका कारण यह है कि हिंदुस्तान की बहुसंख्यक आबादी हिन्दुओं का इन दोनों मज़हबों से कोई खास बैर है? या फिर ये कि इन पंथों की विचारधारा या इनके अनुयायियों के आचरण में कुछ ऐसा है जो इनके अन्य के साथ टकराव का कारण बन जाता है?

अगर खोट हिन्दुओं में है तो यहूदी क्यों नहीं शिकार?

अगर एकबारगी यह मान लिया जाए कि खोट हिन्दुओं में ही है, हिन्दुओं में इस्लाम और ईसाईयत के प्रति शत्रुता किसी बहाने ‘इनबिल्ट’ है, तो सवाल यह उठेगा कि इसी विचारधारा के पूर्ववर्ती यहूदियों को हिंदुस्तान में कोई दिक्क्त क्यों नहीं हुई? यहूदियों में भी ‘एक ही अदृश्य, अव्यक्त ईश्वर; मूर्तिपूजा/अन्य किसी शक्ति की उपासना अनंतकाल के नर्कभोग वाला पाप’ आदि अधिकांश वही सब बातें मान्य हैं जो इस्लाम और ईसाईयत में प्रचलित हैं। जहाँ तक मेरी जानकारी है, बड़ा अंतर खाली अंतिम नबी के सवाल पर है- यहूदी इंतजार में हैं, ईसाईयों के हिसाब से ईसा थे, इस्लाम के हिसाब से हज़रत मोहम्मद। क्या इतने से ही हिन्दू भड़के हुए हैं?

या फिर जबरिया मतांतरण की ज़िद है ‘इनटॉलेरेंस’ की जड़ में?

अब दूसरी संभावना पर गौर करते हैं- कि हिन्दू विरोध इस्लाम और ईसाईयत की विचारधारा का नहीं करते, मजहब विशेष और ईसाई अपने दिमागों में क्या सोचते हैं इसका नहीं करते, बल्कि विरोध करते हैं कि अपनी सोच, अपना पंथिक आग्रह दूसरों पर थोपने की प्रवृत्ति का। विरोध करते हैं ईसाईयों के हिन्दुओं के पवित्र प्रतीक चिह्नों को ‘हड़प’ कर उन्हें हिंदुत्व से लोगों को काटने के प्रयोग का। विरोध करते हैं हिंसा और ज़ोर-ज़बर्दस्ती से लोगों के मतांतरण का, जो समुदाय विशेष द्वारा किए जाने की खबरें हम सुनते रहते हैं।

यहूदी इसी मामले में इस्लाम और ईसाईयत से अलग हैं- वे भले यह मानें कि हिन्दू ‘पापी’ हैं और नर्क के भागी होंगे मरने के बाद, लेकिन वे अपना मत, अपनी आस्था थोपते नहीं हैं। पारसियों में (जहाँ तक मेरी जानकारी है, जोकि शायद बहुत ज़्यादा नहीं है) ‘अहुरों’ की पूजा होती है और ‘दैवों’ की निंदा- सुनने में ऐसा लगता है (जोकि सम्भवतः सही न भी हो) मानो जिन असुरों के विरुद्ध हिन्दू देवता लड़ते थे, शायद पारसी उन्हीं के पूजक हैं। लेकिन तब भी कभी पारसी-विरोधी हिंसा क्यों नहीं हुई? क्योंकि उन्होंने कभी अपनी अहुर-पूजा को हिन्दुओं पर लादने की कोशिश नहीं की- न तलवार के दम पर, न पिछले दरवाज़ों से।

एक और बात, इस लेख में उठाना पढ़ रहा कोई छद्म-लिबरल उठाने को यह भी सवाल उठा सकता है कि हो सकता है ईसाईयों और समुदाय विशेष ने हिंदुत्व (हिन्दू धर्म) की ऐसी कोई विद्वत्तापूर्ण निंदा या आलोचना की हो जो और कोई पंथ न कर पाया हो, और यह ‘असहिष्णुता’ उस वजह से हो। हो “सकता” है, पर ऐसा है नहीं। है इसका उलट। इस्लामिक इतिहास हिंदुस्तान में अधिकाँश समय मंदिर-ध्वंस, बलात्कार और सामूहिक हत्याकांड, आदि का रहा है- और अब तो यह छद्म-लिबरल भी मानने को मजबूर हैं। और ईसाई ‘विद्वानों’ ने तर्कपूर्ण आलोचना तो दूर की बात, अनुवाद भी फ़र्ज़ी किए ताकि आर्यन आक्रमण थ्योरी की आड़ में हिन्दुओं को बाँटकर चर्च का साम्राज्य फैलाया जा सके।

वहीं बौद्धों ने वैदिक ऋचाओं से लेकर कर्मकांडों की, जैनों ने वैदिक यज्ञ-हिंसा से लेकर युद्ध में हिंसा करने वाले राम-कृष्ण जैसे अवतारों की आलोचना में ग्रंथ-के-ग्रंथ लिखे हैं, जिस पर सदियों हिन्दुओं ने बहस की है, शास्त्रार्थ हुए हैं, हिन्दुओं और अन्य ने एक-दूसरे के आगे सर मुड़ाया है, शिष्यत्व स्वीकार किया है। लेकिन मंदिर ढहाना, आर्य-द्रविड़ का कृत्रिम भेद खड़ा करने जैसे काम नहीं हुए हैं। हिन्दुओं ने तो किसी भी प्रकार की परा-शक्ति को नकारने वाली चार्वाक परम्परा को भी ऋषि-परम्पराओं में स्वीकार किया है। अतः डॉ. दोरजी के इस बयान के आलोक में इस्लाम के समर्थकों और ईसाईयों को आत्म-विवेचन करने की जरूरत है कि ‘इनटॉलेरेंस’ के लिए जिम्मेदार ‘भगवाकरण’ है, ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ है, या हिन्दुओं को आक्रामकता अख्तियार करने के लिए मजबूर करने वाले उनके आचरण।

लखनऊ इमामबाड़ा में ‘छोटे कपड़ों’ में नहीं मिलेगी एंट्री, मौलवियों ने कहा यह कोई पर्यटन स्थल नहीं

अब लखनऊ के इमामबाड़े में लड़कियों के कपडे देख कर उन्हें एंट्री दी जाएगी। जहाँ दुनियाभर में महिलाओं को समानता का अधिकार दिए जाने वाली बात की जा रही है, इमामबाड़े का यह निर्णय हैरान कर देने वाला है। मुस्लिम धर्मगुरुओं के सुझावों के बाद जिला प्रशासन ने यह निर्णय लिया है। कोई भी महिला अब शॉर्ट्स पहन कर इमामबाड़े के परिसर में नहीं घुस सकेगी। इसकी निगरानी की ज़िम्मेदारी सिक्योरिटी गार्ड्स को सौंपी जाएगी। इमामबाड़े के परिसर में अब प्रोफेशनल शेयरिंग और फोटोग्राफी भी नहीं होगी। इन सब पर रोक लगा दिया गया है। सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जाएँगे।

शिया समुदाय के साथ हुई बैठक के बाद जिला प्रशासन ने फरमान जारी किया कि छोटे कपड़े पहनने वाली कोई भी लड़की या महिला इमामबाड़े के परिसर में प्रवेश नहीं कर सकेंगी। जिला प्रशासन के अनुसार, इमामबाड़े की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि वहाँ शार्ट स्कर्ट्स और छोटे कपड़े पहनने वाली महिलाओं की एंट्री प्रतिबंधित की जाएगी। अब पर्यटकों को भी पूरे कपड़े पहनने होंगे।

जिला प्रशासन ने कहा है कि गार्ड्स को इस बात के लिए अनुमति दे दी गई है कि वे ‘धार्मिक भावनाएँ आहत करने वाले और अश्लील’ कपड़ों में किसी भी पर्यटक को अंदर न घुसने दें। पर्यटकों को ‘गरिमामय’ कपड़े पहनने की सलाह दी गई है। प्रशासन ने कहा कि बार-बार ये शिकायतें आ रही थीं कि लोग बड़े एवं छोटे इमामबाड़े में ‘अशोभनीय’ कपड़े पहन कर आ रहे हैं। इसके बाद नाराज़ शिया मुस्लिम धर्मगुरुओं ने पीएम मोदी व सीएम योगी को पत्र लिख कर मामले से अवगत कराया। शिया धर्मगुरुओं ने माँग की कि इमामबाड़े में भी स्वर्ण मंदिर की तरह ही ड्रेस कोड लागू किया जाए।

बैठक में हुसैनाबाद एलाइड ट्रस्ट और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। मौलवियों का कहना है कि बड़ा इमामबाड़ा कोई पर्यटन स्थल नहीं है। यह 235 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत है। इस धरोहर का अपना इतिहास है। यह मुस्लिमों की भावनाओं से जुड़ा स्थल है। इसलिए इसकी धार्मिक पवित्रता को बनाए रखना जरूरी है। सारे मौलवी इस बात से भी नाराज़ हैं कि इमामबाड़ा परिसर में युवा जोड़े एक-दूसरे से प्यार का इजहार करते नज़र आते हैं।

टीम इंडिया की नई जर्सी से 2019 के ‘भगवाकरण’ और 2001 में गांगुली के गंडे-ताबीज़ का कनेक्शन जोड़ रहे हैं लिबरल

टीम इंडिया की नई जर्सी लिबरलों को कितना दुःख दे रही है, राष्ट्रवादियों को इसका ज़रा भी इल्म नहीं है। मोदी के हाथों मुँह की खाने के बाद उनकी ‘भगवा’ से ही एलर्जी बढ़ गई है। जैसे सावन के अंधे को हर जगह हरा ही हरा दिखता है, उसी तरह हमारे लिबरल राजनेताओं और पत्रकारों को हर भगवे में ‘मोदी के एजेंट’ दिखने लगे हैं। और उन्हें पूरी तरह दोष भी नहीं दिया जा सकता- पाँच साल खटने के बाद 303-52 की हार किसी को भी मानसिक तौर पर ‘हिला देगी’।

कुछ के दिमाग तो इतने ज्यादा ध्वस्त हो गए हैं कि उन्हें अब जीतती हुई टीम इंडिया पर भी आपत्ति होने लगी है। एक फैन फहद मसूद (किस विशेष समुदाय का, यह बताने की ज़रूरत नहीं है) को कोहली एंड कम्पनी की जीत भी ‘पत्थरदिल विजेता’ लगने लगी!

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यह महज़ एक आदमी का फितूर नहीं है- हर दूसरे-तीसरे छद्म-लिबरल से बात करिए तो वह ‘उन पुराने दिनों’ की ही याद में विषादी हुए जा रहे हैं। टॉलरेंस, ‘सरल समय’, ‘ओल्ड-फैशन्ड’ के पीछे नेहरूवियन भारत की जो याद है, वह असल में उसी निकम्मेपन की सताती हुई याद है, जिसमें एक मुट्ठी-भर लोगों के पास हर तरह की सुविधा थी, और बाकी लोगों के पास केवल संघर्ष था। उसी का प्रतिबिम्ब वह क्रिकेट टीम में देख कर खुश होते थे कि एक बार में खाली एक-आध खिलाड़ी चल रहे हैं और बाकियों को ढो रहे हैं।

आज भारत और भारत की क्रिकेट टीम दोनों में कुशलता बढ़ गई है। कई सारे स्टार आ गए हैं। कई लोग अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। यह उन्हें अजीर्ण का मरीज बना रहा है, जो न केवल अकुशल, अक्षम टीम और देश के आदी थे, बल्कि कारक भी।

कोहली EVM पर जाकर किस पार्टी का बटन दबाते हैं, यह तो शायद ही कोई पक्का कह सकता है, लेकिन मीडिया गिरोह को तो पक्का कोहली और मोदी में समानता दिखती होगी- एकमनस्क भाव से लक्ष्य का पीछा, और उसकी प्राप्ति। ‘निष्ठुर’ और निर्बाध बढ़ रहे दोनों के विजय-रथ से खुद असफलता-पर-असफलता झेल रहे लिबरलों के दिलों में डाह की आग तो सुलगनी ही थी, और उस पर ‘भगवा पेट्रोल’!

कोहली से मन नहीं भरा, ‘दादा’ को भी घसीट लिया

लेकिन केवल कोहली और भगवा जर्सी पर नाराज़गी जताने से मन नहीं भरा तो लिबरल गिरोह ने ‘समय-यात्रा’ कर के मोदी के भगवाकरण प्लान में गांगुली का 2001 में टी-शर्ट लहराना शामिल कर लिया। उनके हिसाब से गांगुली के लॉर्ड्स में टी-शर्ट लहराते समय उनके शरीर पर मौजूद गंडे-ताबीज़ आदि धार्मिक और आस्था के प्रतीक-चिह्न ‘शर्मनाक’ और ‘अंधविश्वासी’ थे!

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प्रिय लिबरलों, आपकी ही सलाह आपके लिए: खेल को खेल रहने दें। राजनीति का अड्डा न बनाएँ।

बॉलीवुड का ‘दंगल’ छोड़ने पर उमर अब्दुल्ला और फ़ैसल ने ज़ायरा का किया समर्थन

नेशनल अवॉर्ड जीत चुकी एक्ट्रेस ज़ायरा वसीम के बॉलीवुड छोड़ने के फ़ैसले का जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने समर्थन किया है। समर्थन के साथ-साथ ज़ायरा को भविष्य के लिए शुभकामनाएँ भी दी हैं। 

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया और लिखा, “ज़ायरा वसीम की पसंद पर सवाल उठाने वाले हम कौन होते हैं? वो जैसे चाहें वैसे अपनी ज़िंदगी जिएँ। मैं बस उन्हें शुभकामना दे सकता हूँ और कामना करता हूँ कि वो जो करें उससे उन्हें ख़ुशी मिले।”

इसके अलावा, भारतीय प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में उतरने वाले शाह फ़ैसल ने शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि वो ज़ायरा वसीम फ़ैसले का सम्मान करते हैं। अपने ट्वीट में फ़ैसल ने लिखा, “मैंने ज़ायरा वसीम के एक्ट्रेस बनने के फ़ैसले का हमेशा सम्मान किया। शायद ही किसी अन्य कश्मीरी ने इतनी कम उम्र में इस तरह की लोकप्रियता और ऐसी सफलता हासिल की हो। आज जब उन्होंने फ़िल्म जगत छोड़ा ही है तो मेरे पास उनके फ़ैसले का सम्मान करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। उन्हें शुभकामनाएँ।”

दरअसल, ज़ायरा वसीम ने यह कहकर बॉलीवुड को बॉय-बॉय कह दिया कि अपने काम से ख़ुश नहीं हैं। अपने फेसबुक पेज पर उन्होंने लिखा कि वो ख़ुश इसलिए नहीं हैं क्योंकि बॉलीवुड उन्हें उनके अल्लाह और उनके मज़हब इस्लाम से दूर कर रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि हालाँकि बॉलीवुड ने उन्हें बहुत प्रेम और समर्थन दिया है, लेकिन उनके ईमान से दूर कर दिया है।

कोई भी पलायन नहीं कर रहा है, अब जब हम सत्ता में हैं, कौन पलायन करेगा: योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मेरठ में हिन्दू परिवारों के पलायन की ख़बरों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने माइग्रेशन एंगल को ख़ारिज कर दिया और कहा कि व्यक्तिगत विवादों के कुछ मामले हो सकते हैं, लेकिन माइग्रेशन की ख़बर झूठी है।

आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, सीएम योगी ने कहा, “कोई भी पलायन नहीं कर रहा है, अब जब हम सत्ता में हैं, कौन पलायन करेगा?”

दरअसल, NaMo ऐप पर एक भाजपा नेता द्वारा हाल ही में दावा किया गया था कि मेरठ के प्रहलाद नगर से कम से कम 125 हिन्दू परिवारों ने इलाक़े में मुस्लिम महिलाओं द्वारा हिन्दू महिलाओं के उत्पीड़न के कारण पलायन किया है। इस क्षेत्र में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं जबकि हिंदू परिवारों की संख्या 425 के आसपास है।

NaMo ऐप पर मिली शिक़ायत को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) को भेज दिया गया, जिसके बाद इस मामले पर रिपोर्ट माँगी गई। मेरठ के बीजेपी सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा कि वह सीएम से इस बारे में बात करेंगे। विश्व हिंदू महासभा द्वारा पत्र लिखकर मेरठ में हिन्दुओं के लिए सुरक्षा की माँग की गई थी।

साथी पत्रकार का आरोप- कापड़ी ने अपनी फिल्म बेचने के लिए दुधमुँही बच्ची को गोद लेने का ‘नाटक’ किया

पत्रकार विनोद कापड़ी ने कुछ दिन पहले दावा किया था कि वो और उनकी पत्नी साक्षी जोशी कूड़ेदान में पड़ी मिली एक बच्ची को गोद लेंगे। लेकिन अब एक दूसरे पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने यह आरोप लगाया है कि यह महज़ साक्षी की नेटफ्लिक्स फिल्म ‘पीहू’ के प्रमोशन का स्टंट था। गौरतलब है कि ‘पीहू’ भी माँ द्वारा पैदा होते ही त्यागी गई एक बच्ची के जीवन पर आधारित है।

ट्विटर पर जड़े आरोप

अभिषेक ने ट्विटर पर ट्वीट-शृंखला में यह दावा किया कि न केवल कापड़ी का बच्ची को गोद ले चुके होने का दावा गलत था, बल्कि इसको लेकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जो ‘हाइप’ बना, वह भी कापड़ी द्वारा ही ‘प्लांटेड स्टोरीज़’ थीं। नागौर, जहाँ यह बच्ची मिली थी, के अधिकारियों ने यह साफ कर दिया कि औपचारिकताएँ अभी शुरू नहीं हुईं हैं, और एक समिति बनेगी, जो बच्ची को गोद लेने वाले माँ-बाप का निर्धारण करेगी।

कूड़े से बच्ची को ग्रामीणों ने बचाया, कापड़ी ने नाम रख दिया?

नागौर के निकट बरनेल गाँव में ग्रामीणों ने एक नवजात बच्ची को कूड़े में से निकाल कर नागौर, राजस्थान के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया था। लेकिन कुछ मीडिया हाउसों ने यह खबर चला दी कि बच्ची को बचाने वाले ही कापड़ी दम्पति थे। जैसे ही बच्ची के मिलने की खबर मीडिया में फैली, विनोद कापड़ी ने ट्वीट कर दिया कि वे इस बच्ची को गोद लेना चाहते हैं। उन्होंने सोशल मीडिया यूज़र्स से उन्हें मामले की विस्तारपूर्वक जानकारी देने की भी अपील की। जल्दी ही कापड़ी दम्पति ने नागौर के अस्पताल पहुँच बच्ची को भी देखा, और नागौर के जिलाधिकारी से मिल कर बच्ची के गोद लिए जाने के बाबत क़ानूनी प्रक्रिया की भी जानकारी ली।

कापड़ी की पत्नी साक्षी जोशी ने तो उस बच्ची को ‘हमारी बेटी’ सम्बोधित करते हुए ट्वीट भी करना शुरू कर दिया।

विनोद कापड़ी ने और आगे जाकर लड़की का नाम भी रख दिया- ‘पीहू’। यही नाम कापड़ी की पत्नी साक्षी जोशी की कुछ दिन पहले नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म का भी था।

लेकिन अभिषेक उपाध्याय के मुताबिक कापड़ी ने अभी तक कोई औपचारिक प्रक्रिया शुरू नहीं की है बच्ची को गोद लेने के लिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विनोद कापड़ी ने केवल बच्ची के साथ फोटो खिंचवाने आदि के बहाने ‘पीहू’ फिल्म के प्रचार के लिए अस्पताल का रुख किया था।

अभिषेक उपाध्याय ने यह भी जोड़ा कि बच्चे को गोद लेना एक शांत प्रक्रिया होती है, ताकि बड़े होकर बच्चे को अपने गोद लिए हुए होने को लेकर किसी असहज स्थिति का सामना न करना पड़े। अतः अगर कापड़ी दम्पति का सच में बच्ची को गोद लेने का इरादा होता, तो वे इतना शोर-शराबा न करते। वह तो बस वाहवाही लूटकर मौके से गायब हो गए।

कापड़ी दावा, हमने प्रक्रिया शुरू कर दी है

वहीं पत्रकार शेफ़ाली वैद्य द्वारा इस मामले में आड़े हाथों लिए जाने के बाद विनोद कापड़ी ने दावा किया है कि उन्होंने बच्चे गोद लेने के इच्छुक दम्पति के तौर पर पंजीकरण 18 जून को करा लिया था। लेकिन यहाँ उनके सामने सवाल यह है कि जब उन्होंने 18 जून को प्रक्रिया प्रारम्भ मात्र की, तो 16 जून से ही वह किस आधार पर बच्ची को गोद ‘ले लेने’ का दम भर रहे थे?

PUBG खेलने से रोका तो छोटे भाई ने की बड़े भाई मोहम्मद शेख की हत्या

टेक्नोलॉजी के साथ सामाजिक ट्रेंड्स और व्यवस्थाएँ तेजी से बदल रही हैं और इसी का नतीजा है कि आए दिन हमें इसके अलग-अलग परिणाम देखने को मिल रहे हैं। महाराष्ट्र के ठाणे से ऑनलाइन गेम PUBG को लेकर एक हैरान कर देने वाली खबर सामने आई है। यहाँ पर PUBG खेलने से मना करने पर 15 साल के किशोर ने कथित तौर पर अपने बड़े भाई मोहम्मद शेख (19 साल) की हत्या कर दी। 

वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक ममता डिसूजा ने बताया कि पीड़ित मोहम्मद शेख ने शनिवार (जून 29, 2019) सुबह जब छोटे भाई को अपने मोबाइल फोन पर पबजी खेलने से मना किया तो वो क्रोधित हो गया। डिसूजा ने बताया कि किशोर ने गुस्से में आकर अपने बड़े भाई मोहम्मद शेख का सिर दीवार पर दे मारा और फिर उस पर लगातार कैंची से हमला किया। शेख को सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। डिसूजा ने बताया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

PUBG की बुरी लत को लेकर इस तरह की घटनाएँ पहले भी सामने आ चुकी हैं। तेलंगाना में पिछले महीने, एक 16 वर्षीय लड़के को जब उसके माता-पिता ने अधिकतर समय फोन पर बिताने के लिए डाँटा तो उसने आत्महत्या कर ली। इस गेम के बुरे प्रभाव के मद्देनजर गुजरात के कई शहरों में PUBG बैन कर दिया गया है। गौरतलब है कि, PUBG गेम पर प्रतिबंध लगने के बावजूद इसे खेलने के आरोप में गुजरात पुलिस ने 15 मार्च को राजकोट में 10 छात्रों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें से 6 कॉलेज के छात्र भी शामिल थे।

60000 जवान, CCTV कैमरे और आधुनिक तकनीक: अमरनाथ यात्रियों के लिए तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था

अमरनाथ यात्रा के दौरान सरकार इस बार वो सारी व्यवस्थाएँ कर रही हैं, जिससे आतंकियों के मंसूबों को नाकाम किया जा सके। हाल ही में ख़ुफ़िया इनपुट आई थी कि आतंकी अमरनाथ धाम यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को निशाना बना सकते हैं। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कई अहम निर्णय लिए। अमरनाथ यात्रा को सफलता से संचालित करने के लिए सुरक्षा बलों के 60,000 जवानों को लगाया गया है। बालटाल और पुलगाम रूट में इन जवानों को तैनात किया जाएगा। रविवार (जून 30, 2019) को श्रद्धालुओं का पहला जत्था जम्मू स्थित बेस कैम्प से रवाना हुआ।

अमरनाथ यात्रा के दौरान लगभग 4000 फ़ीट की ऊँचाई पर जाना होता है, इसीलिए यह काफ़ी कठिन यात्रा भी होती है। सुरक्षा के लिए अधिकतर सीआरपीएफ के जवानों को लगाया गया है और जम्मू कश्मीर पुलिस के जवान भी लगाए गए हैं। सीआरपीएफ के आईजी रविदीप सहाय ने कहा कि यह यात्रा उन लोगों के लिए एक बड़े कार्यक्रम की तरह है और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए एक विस्तृत योजना तैयार की गई है। उन्होंने बताया कि इसके लिए भारतीय सेना, बीएसएफ, सीआरपीएफ और जम्मू कश्मीर पुलिस कंधे से कन्धा मिला कर काम कर रही है।

सीआरपीएफ आईजी ने बताया कि रात के समय भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी जाएगी ताकि श्रद्धालुओं को किसी किस्म की दिक्कत न आए। यात्रा की सुगमता के लिए केंद्र सरकार ने इस बार तकनीक का भी सहारा लिया है। सभी गाड़ियों को रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन टैग (RFI) से सुसज्जित किया गया है। इससे सुरक्षाकर्मियों को श्रद्धालुओं की सही लोकेशन पता चलते रहेगी। मानवरहित एरिअल व्हीकल (UAVs) का भी सहारा लिया जा रहा है। इससे श्रद्धालुओं की पूरी स्थिति पता चलती रहेगी। इसके अलावा सीसीटीवी कैमरों का भी प्रयोग किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि इस यात्रा में आतंकवाद ही एक चिंता है, चिंताएँ और भी हैं।

मौसम की समस्या का भी यात्रियों को अक्सर सामना करना पड़ता है, इसके लिए ‘कस्टमाइज़्ड वेदर अपडेट’ तकनीक का सहारा लिया गया है। इससे मौसम में होने वाले संभावित बदलावों की जानकारी तुरंत मिल पाएगी। जुलाई व अगस्त के दौरान बारिश का मौसम रहता है और मॉनसून के कारण यात्रियों को हर कैम्प में प्रत्येक 3 घंटे के अंतराल पर मौसम की जानकारी मिलती रहेगी। यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर ‘माउंटेन रेस्क्यू टीम’ को स्टैंडबाय पर रखा गया है, ताकि किसी भी आपदा की स्थिति में तुरंत उनकी मदद मिल सके। इससे पता चलता है कि सरकार और सुरक्षा बल हर मोर्चे पर काम कर रहे हैं और तैयारी रख रहे हैं।

श्रद्धालुओं के आराम करने व भोजन करने के लिए विभिन्न पड़ाव बनाए गए हैं, जहाँ वे रुक कर विश्राम कर सकते हैं। सुरक्षा और मौसम को लेकर कड़े इंतजाम के अलावा यात्रियों की सुविधा का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है।

बहन की पढ़ाई से थी जलन, टीचर के साथ मिलकर चचेरे भाइयों ने किया बहन का बलात्कार

एक आठवीं कक्षा की नाबालिग छात्रा (16 वर्षीया) के साथ उसके चार चचेरे भाइयों द्वारा दो साल तक बलात्कार किए जाने की ख़ौफ़नाक घटना सामने आई है। यह घटना उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले की है जहाँ चार भाइयों ने टीचर के साथ मिलकर अपनी ही बहन का बलात्कार सिर्फ़ इसलिए किया क्योंकि वो पढ़ने में अव्वल थी। 

ख़बर के अनुसार, बरेली ज़िले के सीतापुर में इस्लामिया स्कूल के अंदर बनाया गया बलात्कार का वीडियो सामने आया है जिससे इस बात की पुष्टि हो गई। बलात्कार संबंधी वीडियो जब परिवार के व्हाट्सएप ग्रुप पर भेजा गया तब इस बात का ख़ुलासा हुआ। आरोपित पीड़िता के पिता को उनकी बेटी का वीडियो वायरल करने की लगातार धमकी देते हुए दुष्कर्म कर रहे थे।

पीड़िता के पिता ने पुलिस थाने में आरोपितों के ख़िलाफ़ शिक़ायत की। पिता की तहरीर पर पुलिस ने दो चचेरे भाई समेत पाँच आरोपितों पर मुक़दमा दर्ज कराया है। 16 साल छात्रा ने भी बताया कि दो साल में कई बार उसके भाइयों और टीचर ने उसका रेप किया।

इस मामले में एडिशनल एसपी (उत्तर) मधुवन कुमार सिंह ने बताया कि मेडिकल रिपोर्ट में रेप की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा, “बच्ची को बेहोश करने के बाद भाई और टीचर बारी-बारी से उसका रेप करते थे और वीडियो भी बनाते थे।” सिंह ने इस बात की भी जानकारी दी कि इस मामले में एक आरोपित को गिरफ़्तार किया जा चुका है। उन्होंने बताया, “हमने शिक़ायत का संज्ञान लिया है और हम जल्द से जल्द मजिस्ट्रेट के सामने उसका बयान दर्ज कराने की तैयारी कर रहे हैं।”

उत्तर प्रदेश में महिलाओं खासकर नाबालिग लड़कियों के ख़िलाफ़ आपराधिक हमलों की घटनाओं में वृद्धि हुई है। इस महीने की शुरुआत में, उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में युवा लड़कियों के ख़िलाफ़ अपराध के कम से कम पाँच मामले सामने आए हैं। 11 जून 2019 को वरिष्ठ पुलिस और गृह विभाग के अधिकारियों के साथ एक उच्च-स्तरीय बैठक में, उत्तर प्रदेश के सीएम, योगी आदित्यनाथ ने राज्य में अपराधियों के बीच ‘डर पैदा करने’ में विफल रहने के लिए पुलिस प्रशासन को आड़े हाथों भी लिया था। इसके अलावा उन्होंने पुलिस विभाग को फ़टकार लगाते हुए एंटी रोमियो दस्ते को सक्रिय करने का आदेश दिया था।

इससे पहले वडोदरा में एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा 14 साल की दसवीं कक्षा की छात्रा के साथ न सिर्फ़ बार-बार बलात्कार करने बल्कि इस कुकृत्य को मोबाइल फोन में रिकॉर्ड करने की ख़बर सामने आई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी ख़बर के अनुसार, कथित तौर पर इमरान उस छात्रा को विभिन्न धार्मिक स्थलों पर ले गया और उसका धर्म-परिवर्तन (इस्लाम में) कराने में लगा रहा। 19 वर्षीय तौसीफ़ इमरान ख़ान जिसने नाबालिग का यौन शोषण किया, वो 12वीं कक्षा का छात्र था और मंझलपुर का रहने वाला था। उसके ख़िलाफ़ POCSO अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया।

TRS विधायक के भाई की गुंडागर्दी, पुलिस और महिला वन रक्षकों को बुरी तरह पीटा

तेलंगाना में सत्तारूढ़ पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी सामने आई है। टीआरएस के कार्यकर्ताओं ने आसिफाबाद जिले में वृक्षारोपण के लिए पहुँचे पुलिस दल और वन रक्षकों की टीम पर हमला बोल दिया। दरअसल, सरकार राज्य में ट्री प्लांटेशन का काम कर रही है। इसके लिए वन विभाग के सहयोग से ट्री प्लांटेशन कराया जा रहा है। इसी दौरान राज्य के आसिफाबाद जिले में कुछ लोगों ने पुलिस और वन विभाग की टीम पर हमला कर दिया। 

हमलावरों ने महिला वन रक्षकों को भी नहीं बख्शा। महिला वनकर्मियों के साथ भी मारपीट की। जान बचाने के लिए वन अधिकारी ट्रैक्टर पर चढ़ गई, लेकिन कार्यकर्ताओं ने उसे वहाँ भी नहीं बख्शा। उसके ऊपर लाठी-डंडों से लगातार वार करते रहे। वह जोर-जोर से दर्द से कराह रही थीं और फिर बेहोश हो गईं। घटनास्थल पर मौजूद दूसरे अधिकारियों ने किसी तरह महिला अधिकारी को बचाया।

ये घटना शनिवार (जून 29, 2019) की है। इसका वीडियो भी सामने आया है। इस हमले में वन विभाग की एक अधिकारी अनीता बुरी तरह से घायल हो गईं। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पीड़ित अनीता ने आरोप लगाया है कि हमलावरों का नेतृत्व टीआरएस के विधायक कोनेरु कोनप्पा के भाई कृष्णा कर रहे थे। कृष्णा के नेतृत्व में टीआरएस कार्यकर्ताओं ने वनकर्मियों और पुलिसकर्मियों पर हमला किया। बता दें कि, आरोपित कृष्णा खुद जिला परिषद का चेयरपर्सन है।

जानकारी के मुताबिक, अनीता अपने स्टाफ के साथ सिरपुर कागजनगर ब्लॉक के सरसला गाँव पहुँची थीं। यहाँ उन्हें हरिता हरम वृक्षारोपण अभियान के तहत बीस एकड़ जमीन पर खुदवाई करवानी थी। अनीता ने अपने स्टाफ से काम शुरू करने को कहा। तभी कृष्णा कुछ स्थानीय लोगों के साथ वहाँ पहुँचे और उन्होंने वन विभाग के लोगों को खुदाई करने से रोका। उनका कहना था कि जमीन गाँव वालों की है और वहाँ पौधे नहीं लगाए जा सकते। अनीता ने लोगों को समझाने का प्रयास किया लेकिन वे उनकी एक भी सुनने को तैयार नहीं थे और फिर जैसे ही वन विभाग के लोगों ने खुदाई का काम शुरू किया तो लोगों ने अनीता पर डंडों से हमला कर दिया। अनीता का आरोप है कि कृष्णा राव ने उनके बाल पकड़कर उन्हें खींचा। वो जान बचाकर ट्रैक्टर के ऊपर चढ़ गईं, लेकिन लोगों ने वहाँ भी उनके ऊपर ताबड़तोड़ डंडे बरसाए।