हिमाचल प्रदेश से आने वाले जगत प्रकाश नड्डा को भारतीय जनता पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। पिछली मोदी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे नड्डा को जब हालिया गठित मंत्रिमंडल में कोई जगह नहीं दी गई थी, तभी से यह अंदेशा लगाया जा रहा था कि उन्हें कोई बड़ी ज़िम्मेदारी मिलने वाली है। इससे पहले जब 2014 में भाजपा की केंद्र में बड़ी जीत हुई थी, तब नड्डा को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर चर्चा चली थी लेकिन अमित शाह को अध्यक्ष बनाया गया। अब जब अमित शाह ने गृह मंत्रालय का प्रभार संभाला है, संगठन में नड्डा को उनकी ज़िम्मेदारी हल्की करने के लिए लाया गया है। कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव तक शाह राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे।
59 वर्षीय जेपी नड्डा 3 बार हिमाचल प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं। वे 1993, 1998 और 2007 में चुनाव जीत कर विधायक बने। 1998 में उन्हें राज्य कैबिनेट में शामिल किया गया और वह मंत्री बने। 2012 में उन्हें राज्यसभा सांसद चुना गया। जेपी नड्डा भाजपा के आँतरिक संगठन में काफ़ी समय से सक्रिय रहे हैं और उनकी शिक्षा-दीक्षा पटना के सेंट जेवियर्स स्कूल में हुई है। अपने समय के अधिकतर नेताओं की तरह युवावस्था में उन्होंने भी जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से प्रेरित होकर राजनीति का दामन थामा था। 1977 में वह पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के सचिव भी बने थे।
नड्डा को भाजपा का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करने की जानकारी केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी। इसके बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने नड्डा को बधाई दी। सिंह ने बताया कि भाजपा संसदीय बोर्ड ने नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष चुना है। राजनाथ ने यह भी बताया कि गृह मंत्री बनने के बाद शाह ने पीएम मोदी से कहा था कि पार्टी अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी अब किसी और को दे देनी चाहिए। जेपी नड्डा को हिमाचल में फॉरेस्ट मंत्री रहने के दौरान उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए जाना जाता है।
मंत्री रहते समय उन्होंने फॉरेस्ट क्राइम को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी नीतियाँ बनाई थीं व ज़रूरी एक्शन लिया था। उन्होंने फॉरेस्ट पुलिस स्टेशन स्थापित किए थे। शिमला को हरित बनाने के लिए उनके कार्यकाल में कई कार्य हुए। राज्य में वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के लिए भी उन्होंने अहम पहल किए। बहुत कम लोगों को पता है कि नड्डा की खेल में भी ख़ासी रूचि है। अपने स्कूल के दिनों में उन्होंने दिल्ली में आयोजित एक तैराकी प्रतियोगिता में बिहार का प्रतिनिधित्व किया था। नड्डा ने हिमाचल विश्वविद्यालय से LLB की डिग्री प्राप्त की है।
1991 में जेपी नड्डा को मात्र 31 वर्ष की उम्र में भाजयुमो का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था। तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद नड्डा को पूर्ण अध्यक्ष भी बनाया जा सकता है, ऐसी चर्चा है। हालिया लोकसभा चुनावों में नड्डा यूपी में पार्टी के प्रभारी थे, जहाँ पार्टी ने 62 सीटों पर जीत दर्ज की। ये भी एक संयोग है कि भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष अमित शाह भी 2014 लोकसभा चुनाव में यूपी में ही पार्टी के प्रभारी थे और वहाँ भाजपा के अभूतपूर्व प्रदर्शन के बाद उनका क़द बढ़ गया था।
ऑपइंडिया को हाल ही में मीडिया ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी की तरफ से कानूनी नोटिस मिली है। उस नोटिस का हमारा जो जवाब है, वो निम्नलिखित है। लेकिन जवाब देने से भी पहले हम यह साफ कर देना चाहते हैं कि ऐसे दबाव बनाने वाले दाँव-पेंच ऑपइंडिया के साथ नहीं चलेंगे। हम उनके सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं और अगर जरूरी हुआ तो कानूनी लड़ाई के लिए भी तैयार हैं।
हमें आपकी क्लाइंट स्वाति चतुर्वेदी की ओर से मानहानि नोटिस मेसर्स आध्यासी मीडिया एन्ड कंटेंट सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड, OpIndia.com, संपादक नूपुर झुनझुनवाला शर्मा व अन्य के विरुद्ध प्राप्त हुई है। उस नोटिस में आप ने उद्धृत किया है कि आपकी क्लाइंट ‘बहुत ही प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रख्यात पत्रकार हैं।’ अपने इस दावे के समर्थन में आपने उन तमाम प्रकाशनों का नाम गिनाया है, जिनमें स्वाति चतुर्वेदी ने पिछले 20 वर्षों में काम किया है। आपने इस तथ्य पर भी जोर दिया है कि एक खोजी पत्रकार के तौर पर अपने कैरियर में उन्हें कभी किसी आरोप का सामना नहीं करना पड़ा है। आपने उन्हें 2018 में मिले एक अवार्ड का भी ज़िक्र किया है।
स्वाति चतुर्वेदी की क़ानूनी नोटिस का प्रासंगिक अंश
हालाँकि हम इस बात से इनकार नहीं कर रहे कि स्वति चतुर्वेदी का करियर दो दशकों से भी लम्बा हो सकता है (जो कि उनके लिहाज से एक उपलब्धि है) लेकिन हम विनम्रतापूर्वक इस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे कि महज़ एक अवार्ड जीत लेने भर से किसी को ‘प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रख्यात’ नहीं माना जा सकता। और अपने इस कथन के समर्थन में स्वाति चतुर्वेदी जी को ही उद्धृत करना चाहेंगे। हम आपका ध्यानाकर्षण इस ओर करना चाहेंगे कि स्वाति चतुर्वेदी ने खुद ही (और विशेषतः सोशल मीडिया पर) कई अवार्डों का मज़ाक उड़ाया है। उदाहरण हैं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला फिलिप कोटलर अवार्ड, प्रख्यात अभिनेता अनुपम खेर को मिला पद्म भूषण अवार्ड, प्रख्यात अभिनेत्री रवीना टंडन को मिला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, और यहाँ तक कि अपने साथी पत्रकारों को मिले पुरस्कार। उनके इन शब्दों से यह इंगित होता है कि महज़ एक अवार्ड पा जाना किसी के ‘प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रख्यात’ होने का प्रमाण नहीं हो सकता।
आगे, हम यह मान कर चलते हैं कि जब आप कहते हैं कि स्वाति चतुर्वेदी को ‘कभी किसी आरोप का सामना नहीं करना पड़ा है।’ तो आपका तात्पर्य है कि उनके खिलाफ किसी अदालत में कोई कानूनी मामला लंबित नहीं है। लेकिन यह सच नहीं है। उन्होंने एक व्यक्ति पर ‘यौन उत्पीड़न के लिए गिरफ्तार’ होने का आरोप लगाया था जो मिथ्या था। उन व्यक्ति ने स्वाति चतुर्वेदी पर मानहानि का मुकदमा किया था।
अगर क़ानूनी मामलों को परे भी हटा दें तो स्वाति चतुर्वेदी पर और भी बहुत से आरोप हैं- भले ही वह सामान्य भाषा में हों और क़ानूनी रूप में नहीं। उन पर अभद्र भाषा के प्रयोग, खराब पत्रकारिता, तोड़-मरोड़ कर खबर प्रस्तुत करना। इनमें से कुछ को उदाहरण के तौर पर उल्लेख हम नीचे आपकी नोटिस का उत्तर देते हुए करेंगे।
अपनी नोटिस में आप एक “Swati Chaturvedi may be delusional: Sources” शीर्षक वाले लेख का विशेष उल्लेख करते हैं। आप OpIndia.com पर आरोप लगाते हैं कि हमने “यह मिथ्या वर्णन किया कि स्वाति चतुर्वेदी वामपंथी प्रोपेगैंडा वेबसाइट The Wire के साथ काम करतीं हैं, और (हमारा) इरादा उनकी मानहानि का था।” चूँकि स्वाति चतुर्वेदी ने कई मौकों पर The Wire के लिए लेख लिखे हैं, अतः हमें नहीं लगता कि यह कहना कि वह The Wire के साथ काम करतीं हैं, किसी भी प्रकार से मानहानि करने वाला कथन होगा। बल्कि आपकी नोटिस में तो खुद ही The Wire का नाम उन प्रकाशनों में है जिनके साथ उन्होंने “काम किया हुआ है।”
स्वाति चतुर्वेदी की क़ानूनी नोटिस का प्रासंगिक अंश
पर अगर स्वाति चतुर्वेदी को लगता है कि The Wire के साथ जुड़ा होना उनकी प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुँचाता है, तो हम उनके साथ सहानुभूति प्रकट करते हुए क्षमायाची हैं।
आपने अपनी कानूनी नोटिस में आगे यह लिखा है कि हमारे लेख में कहा गया वह कथन जो कहता है कि उन पर साहित्यिक चोरी (plagiarism) का आरोप लगता है और उनकी स्पष्ट झूठ और मनगढ़ंत बातों के लिए आलोचना होती है, पूरी तरह गलत है, और हमारे पास इस कथन का कोई आधार नहीं है, और हमारा इरादा आपकी मुवक्किल को उनके साथियों की नज़रों में गिराने का था। आपने यह भी उल्लेख किया कि हमारे अनुसार स्वाति चतुर्वेदी का धमकीबाज गिरोह (extortion racket) चलाना भी गलत है।
इन सभी बातों का अलग-अलग खंडन निम्नलिखित है:
1. साहित्यिक चोरी (plagiarism)
The Economist पत्र से संबद्ध Stanley Pignal नामक एक पत्रकार ने स्वाति चतुर्वेदी पर उनके ट्वीट्स के हिस्से चुराने का आरोप लगाया था। Pignal ने अपने दावे के समर्थन में सबूत पेश करते हुए ट्वीट भी किया था। (विस्तृत जानकारी यहाँ पढ़ी जा सकती है) दिलचस्प बात यह है कि स्वाति चतुर्वेदी ने कथित तौर पर चोरी उस लेख में की जो पत्रकारों की ईमानदारी के बारे में था। हमने महज़ Stanley Pignal द्वारा लगाए गए आरोपों का समाचार प्रस्तुत किया है, न कि उस पर निर्णय करने बैठे हों। इसके अलावा इससे यह भी साबित होता है कि जब हमने लिखा कि स्वाति चतुर्वेदी पर plagiarism का आरोप लगा, तो वह आधारहीन कथन नहीं था।
2. स्पष्ट झूठ और मनगढ़ंत बातें
आपकी मुवक्किल ने अभिनेता लियोनार्डो डि केप्रिओ को RSS के एक कार्यक्रम में बुलाए जाने की खबर छापी थी, जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं था। उम्मीद के अनुसार वह गलत निकली। उन्होंने यह भी असत्य दावा किया था कि ठुकराए हुए आदमी से पिटती हुई एक लड़की की तस्वीर असल में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई हिंसा की तस्वीर है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के एक नेता के भी मनगढ़ंत कथन बनाए हैं, वह भी राष्ट्रीय स्तर पर देखे जाने वाले टेलीविजन चैनल पर।
अतः यह सत्य है कि उन पर स्पष्ट झूठ और मनगढ़ंत बातों का आरोप अक्सर लगता रहता है, हालाँकि हम यह मानने को तैयार हैं कि इनमें से अधिकाँश आरोप कानूनी प्रकृति के नहीं हैं क्योंकि प्रभावित पक्षों ने या तो उन रिपोर्टों या खुद स्वाति को क़ानूनी नोटिस भेजने लायक महत्वपूर्ण नहीं समझा।
3. धमकीबाज गिरोह (extortion racket)
यह आरोप OpIndia ने नहीं, PGurus नामक एक वेबसाइट ने लगाया था। PGurus का इस बाबत लेख अप्रैल, 2018 में प्रकाशित हुआ था और हमारी वह मूल रिपोर्ट जिसमें इस आरोप का समाचार था, वह भी उसी समय के आस-पास प्रकाशित हुई है। यह आरोप OpIndia का नहीं है, और हम यह दोहराना चाहेंगे कि हम अन्य पोर्टल द्वारा लगाए गए आरोप का केवल समाचार प्रकाशित कर रहे थे।
हमारी रिपोर्ट यहाँ, और PGurus की मूल रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है (उसे अभी तक हटाया नहीं गया है)। बल्कि कई अन्य लोगों, जिनमें फिल्म डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री शामिल हैं, ने PGurus के लेख को ट्वीट किया था और इंगित किया था कि स्वाति चतुर्वेदी का नाम सूची में है। लेकिन इनमें से किसी भी पक्ष के खिलाफ कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की गई। हम अपने लेख को मूल स्रोत (PGurus) के लेख के अपडेट होने पर अपडेट कर देंगे।
4. स्वाति के साथियों की नज़रों में उनकी मानहानि
स्वाति चतुर्वेदी के साथियों में से कुछ ने गुप्त रूप से हमें बताया है कि उन्हें हिंदुस्तान टाइम्स से पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का नकली साक्षात्कार करने के लिए निकाला गया था। अगर हमारा इरादा उनकी साख को नुकसान पहुँचाने का होता तो हम अपनी रिपोर्टों में हमेशा ‘सूत्रों के हवाले से’ यह दावा संलग्न कर देते, जैसा आपकी मुवक्किल अपनी पत्रकारिता में अक्सर करती रहती हैं। लेकिन हमने ऐसा नहीं किया क्योंकि हमारा इरादा उनकी मानहानि का नहीं था। इसके अलावा इससे यह भी पता चलता है कि उनकी साख अपने साथियों में उतनी अच्छी थी भी नहीं, और OpIndia को उस (साख) के किसी भी कथित नुकसान के लिए आपकी मुवक्किल द्वारा जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
आपकी नोटिस में आगे हमारे एक लेख (शीर्षक: “The Wire and its ‘star journalist’ peddles another absurd lie about RSS and it’s not the first time”) का उल्लेख करते हुए यह भी लिखा है कि इसका प्रकाशन निश्चित तौर पर आपकी मुवक्किल की मानहानि के लिए किया गया है।
स्वाति चतुर्वेदी की क़ानूनी नोटिस का प्रासंगिक अंश
हम यह स्पष्ट रूप से कहना चाहेंगे कि हम अपने लेख के साथ हैं, और मकसद लेख की आलोचना था, लेखक की मानहानि नहीं। ऊपर उल्लिखित लेख में आपकी मुवक्किल ने लिखा है:
“RSS को मोदी और शाह द्वारा बताया गया है कि जब भाजपा वापस आएगी, तो संविधान में संशोधन कर नए बहुसंख्यकवादी चरित्र को प्रतिबिंबित किया जाएगा, और जिस सेक्युलरिज़्म से वे सभी नफरत करते हैं, उसे हटा दिया जाएगा।” शब्दाडम्बर और कथित ‘सूत्रों’ के अतिरिक्त आपकी मुवक्किल ने इसका कोई सबूत पेश नहीं किया है। अगर हमारे लेख में, एक क्षण के लिए, मान भी लिया जाए कि मानहानि के तत्व हैं, तो भी वह आपकी मुवक्किल के मूल लेख में जितनी मानहानि की गई है, उससे कम ही हैं। आपकी मुवक्किल का लेख एक प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था पर बड़े-बड़े षड्यंत्र रचने का आरोप लगाता है। हमारे विपरीत दावे (कि आपकी मुवक्किल ने झूठ बोला) का पता इस तथ्य से चल जाता है कि मोदी सरकार के इस कार्यकाल के सबसे पहले फैसलों में से एक अल्पसंख्यक कल्याण के बारे में था, जो कि किसी भी बहुसंख्यकवादी चरित्र के विपरीत है।
हमने जो “और यह पहली बार भी नहीं है” लिखा, वह भी सच है, और हम उसके भी साथ हैं। 2018 में आपकी मुवक्किल ने लिखा था कि RSS में दूसरे नंबर की वरिष्ठता रखने वाले सुरेश जोशी का मार्च में कार्यकाल खत्म होने पर उनकी जगह प्रधानमंत्री मोदी के करीबी दत्तात्रेय होसबोले को लाए जा सकने की संभावना है।
अपने निष्कर्षीय विश्लेषण में आपकी मुवक्किल ने दावा किया था कि इस बदलाव के ‘बहुत बड़े’ मायने हैं भाजपा और RSS के लिए। ऐसा दावा किया गया था कि संघ प्रमुख मोहन भागवत और सुरेश जोशी का मानना है कि संघ भाजपा के ‘नीचे’ रह कर काम नहीं कर सकता, लेकिन अगर होसबोले द्वितीय वरीयता पर काबिज हो गए तो शक्ति-संतुलन प्रधानमंत्री मोदी की ओर झुक जाएगा। लेखिका ने यह भी दावा किया था कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संघ में होसबोले की पदोन्नति बहुत तेजी से हुई है।
जैसा कि अब हम सभी जानते हैं कि 2018 में जोशी का संघ के महासचिव या ‘सरकार्यवाह’ के तौर पर पुनर्निर्वाचन अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने कर दिया, जोकि संघ का उच्चतम निर्णयात्मक समूह है।
आपकी कानूनी नोटिस में आपने उल्लेख किया है कि इस लेख में भी हमने plagiarism के आरोप दोहराए हैं। हम दोहराते हैं कि plagiarism के आरोप दूसरे पत्रकार ने लगाए थे, और हमने केवल उनका समाचार प्रकाशित किया था।
आगे आपने उल्लेख किया है कि OpIndia.com पर छपे लेख पढ़ने के बाद स्वाति चतुर्वेदी को यह जान कर दुःख हुआ कि उनके साथी उनकी प्रमाणिकता पर संदेह करते हैं, और यह कि हमारे लेख के चलते उनके पाठकों की संख्या गिर गई है। हम स्वाति चतुर्वेदी को इसकी पुष्टि करने के लिए धन्यवाद देते हैं कि उनके साथी OpIndia.com को पढ़ते और उस पर विश्वास करते हैं।
स्वाति चतुर्वेदी की क़ानूनी नोटिस का प्रासंगिक अंश
जहाँ तक ₹50,00,000 (पचास लाख) की आपकी मुवक्किल की माँग का सवाल है, ‘मानसिक कष्ट’ और ‘प्रतिष्ठा की हानि’ के ‘मुआवजे’ के तौर पर, तो जब तक कि हम अपने लेख हटा न दें, तब तक के लिए हम यह स्पष्ट रूप से कहना चाहेंगे कि चूँकि हम पर लगाए गए आरोप वैध नहीं हैं, अतः हम इसे किसी औचत्य का नहीं मानते कि हम आपकी मुवक्किल को कोई धनराशि दें।
स्वाति चतुर्वेदी की क़ानूनी नोटिस का प्रासंगिक अंश
हमें ऐसा विश्वास दिलाया गया कि स्वाति चतुर्वेदी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता में विश्वास करती हैं और यह नहीं मानतीं कि किसी पत्रकार के लिखे लेख से किसी की साख खो सकती है। हाल ही में एक पूर्व पत्रकार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अपमानजनक कमेंट करने के लिए गिरफ्तार किए जाने के विरुद्ध स्वाति चतुर्वेदी ने उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना की थी।
हम उनके द्वारा सोशल मीडिया पर डाली गई मशहूर कहावत दोहराना चाहेंगे, “अगर आज़ादी का कोई भी अर्थ है, तो वह लोगों को वह सुनाने का अधिकार है जो वह नहीं सुनना चाहते।” हम निश्चित तौर पर आपकी मुवक्किल स्वाति चतुर्वेदी और कई अन्य पत्रकारों को वह सुनाने के दोषी हैं जो वह नहीं सुनना चाहते। जैसा कि आपकी मुवक्किल के द्वारा प्रदर्शित किया गया, यह मानहानि नहीं आज़ादी है।
अंत में हम यह दोहराना चाहेंगे कि हमारा स्वाति चतुर्वेदी के खिलाफ कोई निजी एजेंडा नहीं है, लेकिन यही बात निश्चित तौर पर पलट कर स्वाति के बारे में नहीं कही जा सकती। वह लगातार ऑपइंडिया और ऑपइंडिया से जुड़े लोगों के विषय में अभद्र तरीके से टिप्पणियाँ करती रहती हैं, सोशल मीडिया पर भी और अपनी किताब में भी। हमारे पास 100 से अधिक (गिनती अभी भी चालू है) उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स और किताब के अंशों का उदाहरण है, जिसे हम अदालत में अपने समर्थन में पेश कर सकते हैं।
हमारे सभी लेखों में, जिनमें उनका उल्लेख है, हमने केवल उनके पाखंड (खुद अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए दूसरों पर ‘ट्रोल’ का ठप्पा लगाना) और उनकी रिपोर्टों के साथ समस्याओं (अक्सर उनकी रिपोर्टें गलत निकल आती हैं) और उनके ऑनलाइन व्यवहार के बारे में लिखा है, और उनका आधार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री है।
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में रविवार (जून 16, 2019) की रात को 22 वर्षीय पाकिस्तानी ब्लॉगर एवं पत्रकार मुहम्मद बिलाल खान की हत्या कर दी गई। मुहम्मद बिलाल को पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई की आलोचना करने के लिए जाना जाता था। ‘डॉन’ समाचार पत्र के मुताबिक, इस्लामाबाद के G-9/4 एरिया में बिलाल के ऊपर हमला हुआ था। पुलिस अधीक्षक सद्दार मलिक नईम ने ब्लॉगर की हत्या की पुष्टि की है। पुलिस ने बताया कि मोहम्मद बिलाल खान अपने एक दोस्त के साथ थे। तभी उन्हें एक फोन आया, जिसके बाद एक व्यक्ति रात में उन्हें पास के जंगल में लेकर गया। जहाँ पर उनकी हत्या कर दी गई।
A 22-year-old Pakistani blogger and journalist known for criticising the country’s powerful military and the spy agency ISI was hacked to death by an unidentified man, police said on Monday. https://t.co/nTsjSKDN1S
सद्दार मलिक नईम ने बताया कि हत्या के लिए खंजर का इस्तेमाल किया गया था, वहीं कुछ लोगों ने बंदूक चलने की भी आवाज सुनी थी। इस हमले में बिलाल खान की मौत हो गई, और खान के मित्र गंभीर रूप से घायल हो गए। खान के ट्विटर पर 16000 फॉलोवर्स हैं, तो वहीं यू-ट्यूब 48000 और फेसबुक पर 22000 फोलोवर्स हैं। उनकी हत्या के बाद सोशल मीडिया पर #Justice4MuhammadBilalKhan ट्रेंड करने लगा। कई ट्विटर यूजर्स का कहना है कि पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के आलोचक होने के कारण उनकी हत्या कर दी गई।
रविवार रात 11 बजे बिलाल के पिता अब्दुल्ला ने कराची कंपनी पुलिस स्टेशन में पाकिस्तान पीनल कोड के धारा 302, धारा 304 और धारा 34 के तहत एफआईआर रिपोर्ट दर्ज करवाई। इसके साथ ही उन्होंने आतंकवाद निरोधी अधिनियम की धारा 7 के तहत भी शिकायत दर्ज करवाई। अब्दुल्ला ने कहा कि उनके बेटे के ऊपर धारदार हथियार से हमला किया गया। उन्हें अपने बेटे पर गर्व है। आगे उन्होंंने कहा, “मेरे बेटे की एकमात्र गलती ये थी कि उसने पैगंबर के बारे में बात की थी।”
दिल्ली में एक ऑटो ड्राइवर और पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद मामला अब गृह मंत्रालय तक पहुँच चुका है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले में दिल्ली पुलिस से रिपोर्ट माँगी है। इस घटना पर राजनीति इतनी हो गई है कि लोगों को समझ नहीं आ रहा कि गलती किसकी है – पुलिस की या सिख ऑटो ड्राइवर की? ऐसे में ज़ी न्यूज़ के ब्यूरो चीफ (जीतेन्द्र शर्मा) ने इस मामले से जुड़े 4 वीडियो ट्वीट कर इस घटना के बारे में चीजें साफ़ करने की कोशिश की। उनके द्वारा ट्वीट किए गए पहले वीडियो में दिख रहा है कि पुलिस वाले टेम्पो ड्राइवर की पिटाई कर रहे हैं। आरोप है कि पहले तो ड्राइवर ने पुलिस की गाड़ी को टक्कर मारी, उसके बाद तलवार से हमला कर दिया। इसके बाद पुलिस ने एक्शन लिया।
घटना का पहला विडियो।विडियो में साफ दिख रहा है कि किस तरह टेम्पो चालक तलवार से पुलिसवालों को धमका रहा है और जब पकड़ने की कोशिश की जाती है तो तलवार से एक पुलिसकर्मी को घायल कर देता है। pic.twitter.com/ZA7SAnqS8c
इसके बाद जीतेंद्र शर्मा ने ट्वीट किया उस वीडियो को, जो इस घटना से पहले का है, यानी पुलिस द्वारा ड्राइवर की पिटाई से पहले का। इस वीडियो में दिख रहा है कि टेम्पो चालक तलवार निकाल कर पुलिस वालों को धमकी भरे अंदाज में कुछ कह रहा है और फिर एक पुलिस वाले पर तलवार से वार भी करता है। इस वीडियो में सभी पुलिस वाले उसके तलवार से बचते दिख रहे हैं और उसे पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसके बाद तीसरे ट्वीट में जो वीडियो है, उस में कुछ सिख समुदाय के लोग पुलिस वाले को खदेड़ते नज़र आ रहे हैं, क्योंकि वह ड्राइवर सिख था।
टेम्पो चालक के साथ पिटाई के विरोध में रात में सड़कों पर आये सिख समुदाय का एक और वीडियो। मुखर्जी नगर थाने के बाहर इलाके के ACP के साथ किस तरह मारपीट कर रहे है। विरोध करने का भी एक तरीका होता है और अपराध को मजहब के चश्में से ना देखें। pic.twitter.com/47xVfpA6PC
इस वीडियो में लोग पुलिस अधिकारी पर पत्थरबाज़ी करते दिख रहे हैं। इस पूरे मामले में तीन पुलिस वालों को सस्पेंड किया जा चुका है। जीतेंद्र शर्मा ने लिखा कि उक्त ड्राइवर को छोड़ दिया गया है। अंतिम वीडियो में लोगों द्वारा एक एसीपी को खदेड़ कर उसकी पिटाई की जा रही है। आप इन चारों वीडियो को देख कर इस घटना का क्रमानुसार अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या सब हुआ और क्या नहीं।
इन वीडियो में यह भी दिख रहा है कि अपने पिता को पुलिस से उलझता देख टेम्पो ड्राइवर के बेटे ने पुलिस पर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश भी की। मामले पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने लिखा कि नागरिकों की रक्षा करने वालों को हिंसक भीड़ जैसा व्यवहार करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। उनका इशारा दिल्ली पुलिस की तरफ था। उन्होंने इस घटना को दिल्ली पुलिस की क्रूरता करार दिया। इस घटना में ड्राइवर से झड़प के दौरान एक पुलिसकर्मी घायल भी हुआ है।
दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी मामले की जाँच कर रहे हैं। इस घटना के विरोध में मुखर्जी नगर में रहने वाले सिख समुदाय के लोगों ने गाड़ियों में तोड़फोड़ की और पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया।
‘लैला’ नेटफ्लिक्स पर 14 जून को रिलीज हुआ, हिन्दूफ़ोबिया जैसे नैरेटिव को और मजबूत करने एवं आगे बढ़ाने की एक और लीला ही है। ‘लैला’ प्रयाग अकबर की इसी नाम से लिखी एक नॉवेल से अडॉप्टेड है, जिसे किताब से हटकर ठीक-ठाक घालमेल करते हुए अलग आयाम तक ले गई हैं इस शो की निर्देशिका और क्रिएटिव डायरेक्टर दीपा मेहता। दीपा मेहता ‘वॉटर’ और ‘फायर’ जैसी फिल्मों के कारण पहले से ही अपनी हिन्दू संस्कृति विरोधी विवादस्पद पहचान बना चुकी हैं। इस सीरीज पर और इसमें इस्तेमाल हिन्दूफोबिक अजेंडे पर विस्तार से बात करने से पहले एक छोटी सी यात्रा पर आपको ले चलते हैं कि क्यों ऐसे टीवी शो या वेब सीरीज और फिल्मों की अचानक से बाढ़ आ गई है? कौन-कौन हैं इस पूरे नैरेटिव और सनातन या हिंदुत्व को बदनाम करने वाले महानुभाव? आखिर किसने इनकी दुखती रग पर हाथ नहीं बल्कि लात रख दिया है कि यह पूरा इकोसिस्टम अपनी पूरी ताकत के साथ जी-जान से जुट गया है इस देश, इसकी वास्तविक पहचान और इसकी सांस्कृतिक अस्मिता में पलीता लगाने के लिए…
लैला में शुद्धि कैंप में शालिनी पाठक
स्वर्णिम काल: वामी गिरोह के पतन की शुरुआत!
2013 से पहले का समय मानो इस देश का स्वर्णिम काल था! बेशक तब आए-दिन दंगे, मॉब लिंचिंग, भयंकर भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा से लेकर स्वच्छता-सफाई और विकास, चाहे वह इस देश के गरीब आम और खास तबके का हो या फिर नवीन इंफ्रास्ट्रक्चर का – यह सब मुद्दा था ही नहीं। तमाम वामी-कामी बुद्धिजीवी, लुटियंस पत्रकार, ‘निष्पक्ष’ पक्षकार, नेता और छद्म आंदोलनकारी सब की बढ़ियाँ छन रही थी। सब मलाई काट रहे थे। चारों-तरफ आनंद ही आनंद था। लेकिन तभी अचानक से नए-पुराने पाप प्रकट होने लगे, एक के बाद एक घोटाले सामने आने लगे, निर्भया के बलात्कार और निर्मम हत्या ने अचानक से उस बुलबुले को फोड़ दिया जो उस समय तक के मलाई काटने वालों ने बनाया था।
‘हिन्दू आतंकवाद’ से लेकर, राष्ट्रवाद और इस देश की तरक्की के बारे में वास्तविक धरातल पर कुछ सोचना; सबको या तो बेहद बदनाम कर दिया गया था या गाली बना दी गई थी। किसने किया यह सब, आप सबको पता है क्योंकि बाद में उस खेल के सभी किरदार खुल कर बाहर आ गए। जनता को उस माहौल में जो गड़बड़ी थी वो साफ़ नज़र आ गया था। निर्भया के बाद अन्ना आंदोलन ने बहुतों को मुखर कर दिया, देश उनके लिए सर्वोपरि होने लगा। राष्ट्र के प्रतीक विरोध का सिंबल बन गए। कॉन्ग्रेस के हाथ से सत्ता छिटकने की सुगबुगाहट हो चुकी थी। सच में उस समय देश भयंकर पीड़ा में कराह रहा था, ऐसे में दिल्ली में केजरीवाल उभरे (जिन्होंने अपनी बाद की हरकतों से आंदोलन और प्रतिरोध जैसे सशक्त हथियारों की धार को इतना कुंद कर दिया कि अब मात्र ‘आत्म मुग्ध बौना’ होना ही इनकी पहचान रह गई है) तो गुजरात से चले मोदी ने जब ‘कॉन्ग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दिया तो उसमें बहुतों को उम्मीद की किरण नज़र आई लेकिन पूरे कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम ने इसे अपने अस्तित्व पर खतरे के रूप में पहचान लिया और फिर शुरू हुआ ‘दक्षिणपंथी ताकतों’ के उभार के नाम पर ‘काल्पनिक डर’ फ़ैलाने और बेचने का कारोबार और इसमें वो सब लग गए जिनकी आने वाले समय में बैंड बजने वाली थी। चूँकि, वो ‘बुद्धिजीवी’ थे इसलिए वो भलीभाँति समझ गए कि अब उनके लिए ‘अच्छे दिन’ नहीं बल्कि मुश्किल भरे दिन आने वाले हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सत्ता में आई और फिर खेल का दूसरा भाग शुरू हो गया, जहाँ यह पूरा इकोसिस्टम किसी एक व्यक्ति से विरोध और नफ़रत के नाम पर राष्ट्र और इसके सभी प्रतीकों के खिलाफ गाली बनाने में जुट गई, मोदी को हिंदुत्व का प्रतीक मान हिंदुत्व के नाम पर पूरी ‘सनातन संस्कृति’ को बदनाम करने में लग गई। तमाम तरह के गल्प और अपनी उर्वर काल्पनिकता को विभिन्न माध्यमों, चाहे वो किताब हो, टॉक शो, फिल्म या सीरियल के रूप में इस तरह परोसा कि जैसे उनका दिखाया हुआ ‘नकली डर’ वास्तविक हो और जो सामने विकास या तरक्की दिखनी शुरू हुई है वो सब ‘नकली’ है, मात्र एक छलावा। लेकिन पूरे इकोसिस्टम की पहले और बाद की दोनों भविष्यवाणियाँ, सर्वे, आँकड़ो के रूप में गणितीय लफ्फबाजी सब फेल होने लगे, पूरा इकोसिस्टम फेल होने लगा, इनका हर प्रोपेगेंडा फेल होने लगा और ये सिलसिला 2019 के चुनावों तक लगातार चलता रहा। इस बार भी आपने देखा-समझा-जाना कि कैसे इस पूरे नेक्सस ने जो सामने है, उसे नकारकर काल्पनिक डर दिखाकर, जाति-धर्म, विभेदीकरण में खुद लिप्त होकर, आरोप हिंदुत्व या दक्षिण पंथ पर लगाते रहे। लेकिन जनता ने सब कुछ ख़ारिज कर दिया।
बेबश शालिनी पाठक
उसी समय मई में ही इस शो ‘लैला‘ का ट्रेलर रिलीज हुआ था जिसका ट्विटर से लेकर सोशल मीडिया पर भयंकर विरोध हुआ, शो शायद चुनाव से पहले ही रिलीज होता लेकिन उस समय चुनाव आयोग जिस तरह से बाकी वेब सीरीज पर प्रतिबन्ध लगा रहा था, शायद इसे भी रोक देता। तब इसका रिलीज डेट 14 जून तय किया गया था। विरोध स्वरूप नेटफ्लिक्स के इस शो के ट्रेलर को सबसे ज़्यादा लोगों ने डिसलाइक किया था। ऐसा करके भी लोगों ने इसे चर्चा में ला दिया।
चुनाव परिणाम के बाद: लुटे-पिटे वामी-कामी काम पर लग गए
चुनाव परिणाम में संयोग से इस पूरे नेक्सस के मन का कुछ भी नहीं हुआ अब शायद यह पूरा इकोसिस्टम और आक्रामक होकर हमला करे और ‘लैला’ तो बस एक शुरुआत भर हो। क्योंकि आज भी तमाम संस्थानों और शक्तिशाली जगहों पर इस गिरोह का ही कब्ज़ा है और अब डर बेचकर अपनी दुकान चलाना इनका मुख्य व्यवसाय। आज ‘लैला’ कुछ और नहीं बल्कि उसी काल्पनिक डर का विस्तार है। जो आपको एक बार फिर से क्रिएटिव लिबर्टी और कलात्मकता के नाम पर एक डिस्टोपियन इंडिया ‘आर्यावर्त’ (एक ऐसा काल्पनिक समाज जो बेहद अमानवीय और अराजक है) की रूप रेखा पेश कर डराने और अपनी गौरवशाली सनातन परम्परा और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ तमाम तरह की नकारात्मकता और नफ़रत को शामिल कर एक ऐसी खिचड़ी परोसने की कोशिश है। जिसे आप खाएँगे तो अच्छे स्वास्थ्य या मनोरंजन के नाम पर लेकिन यह धीमी ज़हर के रूप में, आपकी सेहत ख़राब करने वाली है।
आपका दिमाग उन काल्पनिक समस्याओं में उलझ जाने वाला है जिसकी आने वाले समय में संभावना न के बराबर है। क्योंकि यह पूरा गिरोह एक ऐसे समाज और संस्कृति को लगातार बर्बर, अराजक, आक्रामक और अत्याचारी के रूप में परोसने में लगा है, जिसका कभी ऐसा कोई इतिहास ही नहीं रहा, इसलिए बड़ी चालाकी से ऐसे भविष्य की कल्पना कर लगातार डराने की कोशिश की जा रही है। ऐसा करने का एक और खास मकसद जो है वह आतंक, नक्सलवाद या दूसरे समुदाय विशेष या ऐसे कौम की उन वास्तविक समस्याओं से मुँह मोड़ लेना है, जो समस्याएँ वास्तव में न सिर्फ हैं, बल्कि वर्षों से पूरी तीव्रता से समाज का हिस्सा बने हैं, इसे खोखला कर रहे हैं। लेकिन यह इकोसिस्टम अपने फायदे के लिए हमेशा से उसे नकारता रहा या उस पर बात करने से कतराता रहा। क्या इस पर आगे बात होगी? पता नहीं, फ़िलहाल, डिस्टोपिआ क्या है उसकी एक झलक देखें…
अब सीधे-सीधे बात कर लेते हैं नेटफ्लिक्स इंडिया के 14 जून से प्रसारित इस वेब सीरीज ‘लीला’ की। कहने को यह शो प्रयाग अकबर के 2017 में प्रकाशित नॉवेल ‘लैला’ पर आधारित है, जिसमें कथ्य के लिए तथ्य कम लेकिन ‘डर का माहौल है’ वाली नैरेटिव के माध्यम से जो कहने की कोशिश नेटफ्लिक्स, निर्देशक दीपा मेहता, शंकर रमन (गुरगाँव फेम) और पवन कुमार के साथ ही स्क्रीन प्ले राइटर उर्मि जुवेकर ने किया है। इसके मुख्य किरदारों के रूप में हैं हुमा कुरैशी (जो कठुआ काण्ड में पूरे हिन्दू धर्म को दोषी मानते हुए सोनम, स्वरा के साथ प्लाकार्ड गैंग की हिस्सा थीं), सिद्धार्थ (कुछ दिन पहले ही मोदी के प्रति नफ़रत के कारण ट्विटर में छाए हुए थे), राहुल खन्ना, संजय सूरी और आरिफ ज़कारिया। इन किरदारों के माध्यम से पूरे ‘हिन्दू विरोधी नैरेटिव’ को परोसा गया है। इकोसिस्टम द्वारा पहले से ही चली आ रही हिंदुत्व, इसके प्रतीकों और अपने गौरवशाली परम्परा के प्रति नफ़रत और हीनताबोध से भर जाने या भर देने का एक और प्रयास है ‘लैला’।
कहानी आपको ‘2047’ (हाल ही में बीजेपी के 2047 तक सत्ता की बात चर्चा में थी) के डिस्टोपियन भारत “आर्यावर्त” में ले जाती है। सीरीज चूँकि, दिल्ली में शूट हुई है तो आप इसे बड़ी आसानी से पहचान सकते हैं कि इस सीरीज का मकसद किस भारत और किस सत्ता के प्रति डर बैठाना है।
आर्यावर्त के सत्ता प्रमुख जोशी जी
देश या राज्य की बात करें तो वह है ‘आर्यावर्त’, राज्य का नारा है ‘जय आर्यावर्त’ जो हिटलर के नारे से मैच करता है ‘Hail Hitler’ अर्थात जय हिटलर। और मुखिया हैं जोशी जी, जो ‘शुद्धतावादी’ समाज के पक्षधर हैं। जो राज्य में पूजनीय हैं और जनता उनकी भक्त। कहानी आपको एक ऐसे भारत में ले जाती है जहाँ लोगों को जाति-धर्म-संप्रदाय के नाम पर अलग-अलग सेक्टरों में रखा जाता है, भाषा जहाँ संस्कृतनिष्ठ है, प्रदूषण अपने चरम पर है। पीने के पानी के लिए चारों तरफ हाहाकार मचा है। पानी खरीदना, बेचना या बाँटना अपराध है, राज्य की तरफ से कभी-कभी पानी मिलता है। नॉनवेज बैन है। हर तरफ अराजकता का माहौल है, कानून व्यवस्था के नाम कुछ भी नहीं बचा है राज्य में, पत्रकारों को लेबर कैंप में रखा जा रहा है या जान से मार दिया जा रहा है। बुद्धिजीवी-प्रोफेसरों की मॉब लिंचिंग हो रही है। ‘दूश’ अर्थात अछूतों से कोई भी सम्बन्ध रखना मना है। महिलाओं पर अमानवीय अत्याचार हो रहे हैं। चाइल्ड लेबर खूब हो रहा है, मिक्स्ड बच्चों को पिजरों में कैद कर रखा जा रहा है। शिक्षा के नाम पर भक्त बनाकर राज्य उनका ब्रेन वाश कर रहा है। एक तरफ घेटोज और स्लम्स की भरमार है अर्थात गरीबी बहुत ज़्यादा है तो दूसरी तरह अमीर वर्ग बेहद सुविधा संपन्न है जो आर्यावर्त का हिस्सा है।
ऐसे में एक हिन्दू लड़की शालिनी पाठक (हुमा कुरैशी) मुस्लिम लड़का रिजवान (राहुल खन्ना) से निकाह कर लेती हैं। चूँकि, दोनों में प्यार है और उनका परिवार उस अराजक और अत्यधिक प्रदूषित माहौल में भी आलीशान और बेहद ऐसो-आराम की ज़िन्दगी जी रहा है। जहाँ एक तरफ पीने का पानी नहीं है वहीं यह परिवार चोरी से टैंकर माफियाओं से राज्य का पानी खरीद कर स्वीमिंग पूल जैसी लग्जरी अफोर्ड कर पा रहा है। बेटी ‘लैला’ अपने पापा रिजवान के साथ स्वीमिंग पूल में नहा रही है तभी आर्यावर्त राज्य का एक सिपाही डॉ राकेश (जिसका काम मिक्स बच्चों को मार देना या उन्हें बेच देना है, वह जोशी का एक सिपाही है) वहाँ आता है और सब कुछ तहस-नहस हो जाता है। बेटी ‘अशुद्ध’ क्योंकि हिन्दू-मुस्लिम के मिक्स्ड ब्लड की है, होने के कारण गायब कर दी जाती है, रिजवान को हिंदूवादी ताकतें भीड़ की शक्ल में जान से मार देती है और शालिनी को शुद्धिकरण कैंप ‘श्रम केंद्र’ भेज दिया जाता है। जहाँ की सुरक्षा और व्यवस्था की कमान ‘हिजड़ों’ के हाथ में है।
यहाँ उसे बेहद नारकीय जीवन से गुजरना पड़ता है। न जाने कितनी माँओं से उनकी अशुद्ध बच्चों को अलग कर दिया गया है। शालिनी इसी कैंप में रहते हुए अपनी बेटी की तलाश में निकलती है, उसकी पूरी कोशिश अपनी बेटी ‘लैला’ तक पहुँचने की जद्दोजहद है और इसी के इर्द-गिर्द बुनी गई है डिस्टोपियन इंडिया ‘आर्यावर्त’ की कहानी। इस कैंप में दिन-रात एक धुन बजती है…
मेरा जन्म ही मेरा कर्म है… मेरा सौभाग्य है कि मैंने इस धरती पर जन्म लिया। आर्यावर्त के लिए जान देना और जान लेना मेरा कर्तव्य है। भले ही वो जान मेरे बच्चे की क्यों न हो!
इसके माध्यम से यह दिखाने का प्रयास है कि यदि हिंदुत्ववादी ताकतें सत्ता पर इसी तरह हावीं रहीं तो यह देश खासतौर से मुस्लिमों और अन्य समुदायों के लिए रहने लायक नहीं होगा, अछूत पर होगा भयंकर अत्याचार, जिसे इस सीरीज में ‘दूश’ के रूप में दिखाया गया है। कहने का मतलब, सब कुछ निकट भविष्य में बेहद ख़राब होने जा रहा है। पूरा ताना बाना इस तरह बुना गया है जिससे आप पिछले कुछ सालों में हुई छिटपुट घटनाक्रमों के माध्यम से खुद को कोरिलेट करते हुए उस डर की दुनिया से खुद को इस तरह से जोड़ लें जिस तरह से इकोसिस्टम आपको दिखाना और डराना चाहता है। बड़ी चालाकी से इसमें उम्मीद की किरण भी है और वो हैं ‘विद्रोही’ (एक तरह से आतंकी या वामपंथी नक्सली कह लें) जो जोशी जी को मारने के लिए नरसंहार के लिए भी तैयार हैं। एक और ट्वीस्ट है इसमें, आर्यावर्त में भी ‘संघ’ की तर्ज पर एक और सत्ता का केंद्र दिखाया गया है और इनके बीच थोड़ा सा मनमुटाव भी, जिसके मुखिया हैं मोहन राव।
दीक्षित स्काईडोम प्रोजेक्ट का इंजीनियर , जो विद्रोहियों से मिल गया है
खैर, इस तरह की हरकतें न वामपंथियों के लिए नई हैं और न भारत विरोधी पूंजीवादी ताकतों के लिए, जिनके बीच बाहर भले खटपट दिखे लेकिन अंदर साँठ-गाँठ तगड़ी होती है। और इसी गठजोड़ का नतीजा है, पिछले काफी समय से ऐसे कई सीरीज का नेटफ्लिक्स पर रिलीज होना। नेटफ्लिक्स ने कई बार हिन्दू भावनाओं से खिलवाड़ किया है। हिन्दुओं की छवि और उनके प्रतीकों को नकारात्मक तरीके से पेश किया गया है। नेटफ्लिक्स और पूरे इकोसिस्टम की लगातार प्रवृत्ति रही है – एंटी हिन्दू नैरेटिव को स्थापित करने की। ‘Ghoul’ और ‘Sacred Games’ के बाद ‘लैला’ के संयुक्त रूप में यह उनका तीसरा प्रयास है। कहने को ‘लैला’ भविष्य की काल्पनिक कहानी है पर इस सीरीज में इस्तेमाल हुए प्रतीकों, विज़ुअल्स, शब्दावली आदि से इस गिरोह की मानसिकता साफ पता चलती है और रही सही कसर गिरोह के तमाम फिल्म समीक्षकों ने पूरी कर दी। रिव्यु में बिलकुल साफ़ कर दिया गया है कि जो इस दौर में चल रहा है, इसका भविष्य यही है।
अब आते हैं असली मुद्दे पर, यह सब जो भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और क्रिएटिव लिबर्टी के नाम पर हो रहा है, उस पर। जिस तरह से हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है, उसकी वजह क्या है? जिस तरह से काल्पनिक डर का माहौल और ‘डरे हुए मुस्लिम’ की छवि को बार-बार परोसा जा रहा है – बात इस पर करते हैं। इसके पीछे के एजेंडा को समझना इतना मुश्किल नहीं है। बाजार बेशक एक ताकत के रूप में यहाँ मौजूद है लेकिन इस बाजार के ग्राहक कौन हैं? किसके दम पर नेटफ्लिक्स जैसी ताकतें भारत या आने वाले भारत की ऐसी नकारात्मक छवि को इस तरह से पेश कर पा रही हैं?
क्या इसकी सबसे बड़ी वजह हमारी सहिष्णुता नहीं है। हम सब-कुछ देख सुन कर भी मौन रहते हैं। कभी उतनी सशक्तता से एकजुट हो अपना विरोध भी नहीं जता पाते कि नेटफ्लिक्स और इनके पीछे छिपी राष्ट्र विरोधी ताकतों का हौसला पस्त हो। इसी नेटफ्लिक्स को सऊदी अरब सहित कई देशों से वहाँ के विरोध में बनाए गए कई शो को वेबसाइट से हटाना पड़ा। वहाँ की सरकारों ने सीधे इसे बैन कर दिया लेकिन अगर यहाँ की सरकार ऐसा कोई कदम उठाए तो यह पूरा कॉन्ग्रेसी, वामपंथी, अर्बन नक्सल गिरोह एक्शन में आ जाएगा। इनके गिरोह का ही कोई सुप्रीम कोर्ट जाएगा और अभिव्यक्ति के नाम पर अपने पक्ष में फैसला ले आएगा।
तो, इस तरह के प्रोपेगेंडा को काटने का या इनको ऐसा करने से रोकने का कारगर उपाय क्या हो सकता है? सबसे आसान उपाय है दर्शक जिन्हें राष्ट्र और वहाँ के लोगों की उन्नति प्यारी हो वो अपने स्तर पर ऐसे शो का पूरी तरह बहिष्कार करें। दो-चार बार भी ऐसा हो गया तो कितना भी बड़ा पूँजीपति हो ऐसे गिरोहों और ऐसे हिदुत्व विरोधी कंटेंट में पैसा लगाने से कतराएगा। याद रखिए, यह बड़ी लड़ाई का हिस्सा है, देश के टुकड़े करने का इनका सपना मरा नहीं है। बस कहीं दुबका पड़ा है। ये हर माध्यम से देश के बच्चों और युवाओं में काल्पनिक डर, दहशत और झूठ का ज़हर बो रहे हैं ताकि एक दिन ये इस देश की चिता पर जश्न मना सकें, अट्टहास कर सकें।
प्रतिरोध का प्रतीक
इनके हर झूठ को बेनकाब कीजिए, इन्हें पढ़िए, तर्कों से घेरिए, इनसे सवाल पर सवाल कीजिए, इनके हर नैरेटिव की लंका लगा दीजिए। इनसे पूछिए कि क्यों ऐसे स्टोरी-टेलर और पूँजीपति हलाला, तलाक या आतंकवाद या समुदाय विशेष पर खुलकर कुछ नहीं कह पा रहे, कुछ बना नहीं पा रहे? यहाँ तो काल्पनिक डर का माहौल दिखा रहे हैं वहाँ तो सब कुछ सामने है। है हिम्मत, नक्सल आतंकवाद, अलगाववाद पर कुछ बोलने, लिखने या दिखाने की। यह दुबक के पतली गली से निकल लेंगे या आपको भक्त, वॉर मोंगर, गंगा-यमुनी तहज़ीब के खिलाफ अनेक विशेषणों से नामाजेंगे तब समझ जाइएगा, तीर निशाने पर लगी है। कभी अगर ऐसे विषयों पर फ़िल्में बनती भी है तो ज़रा ध्यान से देखिए कैसे बड़ी चालाकी से उसमें भी वो अपना नैरेटिव सेट कर जाते हैं और आपको पता भी नहीं चलता।
चलते-चलते ‘लैला’ में बड़ी आसानी से क्रिएटिव लिबर्टी लेते हुए पूरे कथानक को ऐसे प्रदर्शित किया गया है जिससे ज़्यादा से ज़्यादा ख़राब तरीके से हिंदुत्व की छवि को बिगाड़ा जा सके। ‘आर्यावर्त’ से मुस्लिम समुदाय का लगभग सफाया हो चुका है। जो बचे हैं उन्हें स्काईडोम अर्थात गगनचुम्बी तकनीकी दीवारें बनाकर बिलकुल अलग-थलग कर दिया है। नृत्य, गीत, संगीत, पोएट्री, पेंटिंग सब पर बैन लग चुका है आर्यावर्त में, बस 2047 में भी ज़िंदा हैं तो फैज अहमद फैज़ और उनकी सत्ता विरोधी पोएट्री। ऐसा दिखाकर बड़ी आसानी से वो सब परोस दिया गया जिसका डर ये पिछले पाँच साल से दिखाते आ रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों द्वारा 10 जून से जारी हड़ताल के अब खत्म होने के आसार दिख रहे हैं। जूनियर डॉक्टरों पर किए गए हमले के बाद लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन के बाद आज सीएम ममता बनर्जी और डॉक्टरों के बीच बैठक चली। सचिवालय में हुई बैठक में डॉक्टरों की बात ममता तक पहुँचाने के लिए डॉक्टरों के प्रतिनिधिमंडल पहुँचे। बंगाल में 14 मेडिकल कॉलेज हैं और ममता बनर्जी प्रत्येक मेडिकल कॉलेज के दो-दो प्रतिनिधियों से मिलीं।
West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee has accepted the proposal of doctors to set up Grievance Redressal Cell in Government Hospitals. https://t.co/h3mGR0s5cB
इस दौरान डॉक्टरों ने मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में उन्हें हो रही दिक्कतों से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अवगत कराया। जानकारी के मुताबिक, ममता बनर्जी ने सरकारी अस्पतालों में शिकायत निवारण सेल का निर्माण करने के डॉक्टरों के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। ममता ने पश्चिम बंगाल के हर अस्पताल में नोडल पुलिस ऑफिसर तैनात करने का निर्देश दिया है।
ममता ने आंदोलनरत जूनियर डॉक्टरों के साथ बैठक में कहा कि राज्य सरकार ने किसी भी डॉक्टर के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं। एनआरएस अस्पताल में हुई घटना में कथित तौर पर लिप्त 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। हालाँकि, पहले ममता कैमरे के सामने लाइव बैठक करने के लिए मना कर रही थीं, लेकिन फिर मान गईं। केवल दो क्षेत्रीय न्यूज चैनलों को राज्य सचिवालय में बनर्जी और जूनियर डॉक्टरों के बीच हुई बैठक को कवर करने की अनुमति दी गई।
बिहार में गर्मी का प्रकोप ऐसा है कि अब इसके कारण प्रशासन ने धारा 144 लागू कर दी है। आपदा प्रबंधन विभाग ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि अब तक भीषण गर्मी व लू के कारण 184 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह आँकड़ा अब 200 के पार हो चुका है। हालत यह है कि सिर्फ़ पिछले 2 दिनों में 113 लोग काल के ग्रास बन गए हैं। स्थिति को और बदतर होने से बचाने के लिए गया में धारा 144 लागू कर दी गई है। डीएम अभिषेक सिंह ने नया निर्देश जारी करते हुए सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक लोगों को घर में ही रहने को कहा है।
इसके अलावा 11 बजे से 4 बजे तक दिन में सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई है। जब तक मौसम सामान्य नहीं हो जाता, धारा 144 लागू रहेगी। यहाँ तक कि सरकारी मनरेगा योजनाएँ व उनके तहत होने वाले कामकाज भी सुबह 10.30 के बाद ठप्प रहेंगे। खुले स्थानों पर किसी भी प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करने पर भी प्रशासन ने निषेध लगा दिया है। यह सब इसीलिए किया गया है क्योंकि ज़िले के अस्पतालों में कोहराम मचा हुआ है और गर्मी से पीड़ित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
Gaya: District Magistrate issues an order in view of scorching heat under section 144 (prohibiting unlawful assembly); bans governmental/non-governmental construction works, MGNREGA labour work, and any cultural programme or gathering in open spaces, between 11 am to 4 pm. #Biharpic.twitter.com/gLnR1Y0XeN
बताया जा रहा है कि लू लगने से सबसे ज्यादा मौतें औरंगाबाद जिले में हुई हैं। धारा 144 लागू करने का एक कारण यह भी है कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होने के कारण लोग आक्रोशित हो सकते हैं और असामाजिक तत्व इसका फ़ायदा उठा कर अस्पतालों में तोड़फोड़ कर सकते हैं, जिससे पहले से ही बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर और बुरा असर पड़ेगा। क़ानून व्यवस्था को देखते हुए डीएम ने समूचे जिले के लिए यह निर्देश जारी किया है।
गया जिलाधिकारी ने दिया धारा 144 लगाने का आदेश
जिलाधिकारी ने एहतियातन चैंबर ऑफ कॉमर्स, गया से भी निवेदन किया है कि गया शहरी क्षेत्र की दुकानों को दिन में सिर्फ 11:00 बजे तक खोला जाए एवं अपराह्न में 4:00 बजे के बाद खोला जाए। जिलाधिकारी ने आगे कहा कि दिन में 11:00 बजे से 4:00 बजे के बीच दुकानों को बंद रखा जाए और ग्राहकों को भी इसकी सूचना दी जाए, ताकि ग्राहक भीषण गर्मी एवं लू का शिकार न हो सकें।
हैदारबाद के बेगमपेट इलाके में रविवार (जून 16, 2019) को एक बार में डांसर को कस्टमर के साथ सेक्स न करने पर कपड़े उतारकर पीटा गया। महिला ने अपनी 4 साथी महिला डांसर और एक सईद नाम के कस्टमर पर मारपीट का आरोप लगाया है। पुलिस ने चारों महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया जबकि सईद अभी फरार है।
Four have been arrested for allegedly stripping and beating a bar dancer after she refused to engage in paid sexual intercourse in Hyderabad.https://t.co/jPwzyf5YEy
मीडिया खबरों के मुताबिक पुलिस अभी फरार सईद को ढूँढ रही है। पंजागुट्टा पुलिस ने बताया है कि महिला ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि उसने जब से बार ज्वाइन किया था तब से उसपर कस्टमर्स के साथ सेक्स करने के लिए दबाव बनाया जाता था। रविवार को जब उसने सेक्स करने से इंकार किया तो चार महिला डांसर और कस्टमर ने उसके कपड़े उतार दिए और सड़क पर पीटा।
A woman dancer at a bar was allegedly stripped and trashed by four of her fellow woman dancers and a man after she refused to extend sexual favours to customershttps://t.co/2rmRIaSokr
25 वर्षीय महिला लोकल फिल्म इंडस्ट्री में बतौर जूनियर कलाकार काम किया करती थी लेकिन जनवरी में आर्थिक संकट के कारण उसने बार ज्वाइन किया था। न्यूज 18 में प्रकाशित खबर के मुताबिक शहर के जाने-माने लिस्बन रेस्ट्रोबार में महिला को अवैध रूप से काम पर रखा गया था। पीड़िता ने आरोप लगाया है कि जब उसने मदद के लिए पुलिस से गुहार लगाई तो पुलिस ने भी उसे बचाने में आनाकानी की।
हालाँकि, एएनआई की खबर के अनुसार इस मामले में पुलिस ने आरोपितों पर आईपीसी धारा 354, 509, 506, 323, 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया है, और उनके खिलाफ जाँच भी शुरू हो गई है। इसके अलावा चार महिला आरोपितों को गिरफ्तार करके न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। जबकि एक की तलाश जारी है। इस मामले में तेलंगाना के डीजीपी महेंद्र रेड्डी ने विस्तृत रिपोर्ट माँगी है।
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार को 6 महीने पूरे हो गए हैं। राज्य सरकार के मंत्री इन दिनों अपने-अपने क्षेत्रों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने में व्यस्त हैं। इसी बीच इंदौर से एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स में बवाल होने की ख़बर सामने आई है। दरअसल, वहाँ राज्य सरकार में मंत्री सज्जन सिंह वर्मा एक प्रेस कॉन्फ्रेस में मीडिया को संबोधित करने वाले थे। इस मौक़े पर कई अन्य कॉन्ग्रेसी नेता भी शामिल होने आए थे। इन्हीं में एक नाम स्थानीय कॉन्ग्रेसी नेता सनी राजपाल का भी था। वहाँ पहुँचकर कॉन्ग्रेस के इस दबंग नेता ने न सिर्फ़ पुलिस वालों के साथ बदसलूकी की बल्कि अपनी पावर का भी इस्तेमाल किया।
#WATCH Indore: Congress leader Sunny Rajpal misbehaves with a police personnel after being denied entry for a meeting chaired by minister Sajjan Singh Verma. #MadhyaPradesh. pic.twitter.com/LOBZ2SpITL
न्यूज़ एजेंसी ANI द्वारा शेयर किए इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि जब पुलिस अधिकारी ने नेता साहब को रोक कर कुछ पूछना चाहा तो उन्होंने भड़कते हुए कहा कि वो पार्टी के स्पोक पर्सन (प्रवक्ता) हैं। इतना कहते-कहते वो पुलिस से हाथापाई करने लगे और ज़बरदस्ती अंदर चले गए। हल्ला-गुल्ला होता देख वहाँ मौजूद अन्य नेताओं ने मामले को शांत कराया।
सोशल मीडिया पर अब यह वीडियो वायरल हो चुका है। बता दें कि सज्जन सिंह वर्मा राज्य सरकार में PWD मंत्री हैं, जिनके पास राज्य में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की ज़िम्मेदारी है।
कमलनाथ सरकार सत्ता पर आसीन होते ही आए दिन चर्चा का विषय बनी हुई है। कभी किसानों की क़र्ज़माफ़ी, कभी आयकर विभाग की छापेमारी। ख़बर तो यह भी है कि CBI की रडार पर कमलनाथ के क़रीबी भी हैं। हद तो तब पार हो जाती जब कमलनाथ यह तक बोलने से नहीं चूकते कि लोकसभा चुनाव 2019 का ख़र्च उठाने के लिए बीजेपी नेताओं की पत्नियाँ गहने बेच रही हैं।
अमरनाथ धाम की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए भारतीय रेलवे नया तोहफ़ा लेकर आया है। भारत सरकार जहाँ इस यात्रा को सफलतापूर्वक सुगमता से संचालित करने की पूरी कोशिश में लगी है, रेलवे ने इसके लिए स्पेशल ट्रेन चलाने की घोषणा की है। यह ट्रेन दिल्ली से लेकर जम्मू-कश्मीर तक चलेगी और बीच में 11 स्टेशनों पर रुकेगी। यात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए रेलवे ने उनकी सुविधा के लिए यह ऐलान किया है। यह ट्रेन दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल से हर सप्ताल 2 बार चलेगी। इसे 1 जुलाई से लेकर 15 अगस्त तक चलाया जाएगा।
रेल मंत्री पीयूष गोयल ने स्पेशल ट्रेन को लेकर दी जानकारी
केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी देते हुए बताया, “अमरनाथ यात्रियों को रेलवे का तोहफ़ा: विश्व प्रसिद्ध तीर्थ बाबा अमरनाथ के दर्शन हेतु जाने वाले श्रद्धालुओं के लिये रेलवे विशेष ट्रेन चलाने जा रहा है। यह ट्रेन 1 जुलाई से शुरु होगी तथा सप्ताह में दो बार आनंद विहार, दिल्ली से उधमपुर तक चलेगी।” इसके अलावा वापसी के लिए भी स्पेशल ट्रेन की घोषणा की गई है, जो उधमपुर से आनंद विहार तक चलेगी। ये ट्रेनें गाजियाबाद, मेरठ सिटी जंक्शन, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, यमुनानगर जगाधरी, अंबाला कैंट जंक्शन, लुधियाना जंक्शन, जालंधर कैंट, पठानकोट कैंट और जम्मू तवी स्टेशन पर रुकेगी।
भारतीय रेल द्वारा जारी किया गया विज्ञापन
इन ट्रेनों में जनरल व स्लीपिंग वर्ग की सुविधा उपलब्ध होगी। इस बार अमरनाथ यात्रा पर इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकियों द्वारा हमले के मँडराते ख़तरे को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा की व्यवस्था की गई है। पुलवामा और अनंतनाग में हाल के दिनों में बड़े हमले हो चुके हैं। ये अमरनाथ यात्रा की रास्ते में ही आते हैं। ऐसे में, सुरक्षा को लेकर पहले से सतर्कता बरती जा रही है। इस बार की अमरनाथ यात्रा में 350 से भी अधिक अर्धसैनिक बलों की कम्पनियाँ तैनात किए जाने की तैयारी है।