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‘CM केजरीवाल और सिसोदिया ने स्कूल चमकाने के नाम पर किया ₹2,000 करोड़ का घोटाला’

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही वक्त रह गया है। इस बीच आज (जुलाई 1, 2019) दिल्ली भाजपा अध्यक्ष और सांसद मनोज तिवारी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। इस दौरान मनोज तिवारी ने कहा, “हम एक ऐसे स्कैम का खुलासा करने जा रहे हैं, जिसमें दिल्ली के सीएम और डिप्टी सीएम शामिल हैं। एक आरटीआई से खुलासा हुआ है कि स्कूलों में कमरों के निर्माण के लिए अतिरिक्त ₹2000 करोड़ दिए गए थे, जो केवल ₹892 करोड़ में बनाए जा सकते थे। इन स्कूलों के निर्माण के लिए जिन 34 ठेकेदारों को टेंडर दिए गए, उनमें उनके रिश्तेदार भी शामिल हैं।”

दिल्ली भाजपा के आधिकारिक ट्विटर पर दी गई जानकारी के अनुसार, मनोज तिवारी ने मनीष सिसोदिया पर घोटाला करने का आरोप लगाते हुए इस्तीफे की माँग की है। उन्होंने कहा कि जिस लोकपाल की बात केजरीवाल करते थे, वो उसी लोकपाल को इस घोटाले की जानकारी देने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अच्छे से अच्छे होटल का कमरा भी ज्यादा से ज़्यादा ₹5000 sq.ft से ज्यादा का नहीं बनता, लेकिन केजरीवाल सरकार स्कूल का कमरा ₹8800 sq.ft का बनवा रही है। ये दिल्ली की जनता के टैक्स का ऐसा दुरुपयोग है, जो कहीं देखने को नहीं मिलेगा।

इसके साथ ही, भाजपा सांसद प्रवेश साहिब सिंह ने कहा कि दिल्ली सरकार कहती है कि उन्होंने शिक्षा का बजट बढ़ाया है। क्या बजट इसलिए था कि इतना बड़ा घोटाला कर सके ताकि इस पैसे का इस्तेमाल चुनाव में कर सकें। उन्होंने कहा कि आलीशान बंगले में भी ₹2200 रुपए sq.ft से ज्यादा का खर्च नहीं आता और दिल्ली सरकार ₹8800 sq.ft का कड़ी टुकड़ी का कमरा बनवा रही है। उन्होंने कहा कि कड़ी टुकड़ी की छत कभी स्कूल में उपयोग नहीं होता, लेकिन इसका उपयोग केजरीवाल सरकार स्कूल के कमरे बनाने में कर रही है। यह कड़ी टुकड़ी की छत सबसे सस्ती बनती है और यह बच्चों की जान के साथ खिलवाड़ है।

दिल्ली की उत्तर पश्चिमी सीट से भाजपा सांसद हंसराज हंस ने भी इस बारे में कहा कि मीडिया को भी अपने स्तर पर जाँच करनी चाहिए कि शिक्षा के नाम पर केजरीवाल सरकार ने इतनी बड़ी लूट की है।

मजहब के नाम पर जायरा ने सिर्फ़ खुद के सपनों को नहीं मारा, बल्कि दूसरी लड़कियों को भी गड्ढे में ढकेला है

दंगल गर्ल जायरा वसीम द्वारा मजहब और करियर के बीच में लिया गया फैसला कल से मुझे भीतर तक बेचैन करता रहा। उन्होंने मजहब का हवाला देकर बॉलीवुड को अलविदा कहा। उनके द्वारा की गई घोषणा में बताया गया कि उनका एक्टिंग करियर उन्हें उनके मजहब से दूर कर रहा था, इसलिए उन्होंने ये कदम उठाया।

मालूम नहीं कि ये फैसला उनकी मर्जी से लिया गया है या उन्होंने किसी दबाव में आकर इसकी घोषणा की। लेकिन अगर वास्तविकता में जो वजह उन्होंने बताई, वही उनके फैसले का आधार है तो हम अंदाजा लगा सकते हैं कि यह स्थिति कितनी भयावह है। जहाँ इस्लामी मजहब में जन्मी दुनिया भर की लड़कियाँ अपने सपनों को पूरा करने के लिए जद्दोजहद कर रही हैं, वहीं जायरा और उन जैसी लड़कियाँ आगे होते हुए भी खुद को पीछे की ओर ढकेल रही हैं।

जायरा के इंस्टाग्राम पोस्ट के पहले पन्ने का स्क्रीनशॉट

मुझे दुख इस बात का नहीं है कि उन्होंने बॉलीवुड को छोड़ा, मुझे पीड़ा इस बात से है कि उन्होंने इसके पीछे मजहब को वजह बताया, दुख इस बात का है कि उन्होंने एक्टिंग को यह कह कर छोड़ा कि यह उनके मजहब के खिलाफ है। सोचिए, जिस मजहब को जायरा ने करियर छोड़ने के पीछे का कारण बताया है उसके चलते 2015 में महज 6 साल की फरहीन के सिर से दुपट्टा हटने के कारण उसके पिता जाफर हुसैन ने उसे जमीन पर पटककर मार डाला था। उसके कारण 2018 में हल्दवानी की रहने वाली शहनवाज की माँ की मौत के बाद उसकी पढ़ाई छुड़वा दी गई थी और इसी मजहब के कारण 2018 में एक पिता ने प्रोफेसर बनने का सपना देखने वाली लड़की को घर में कैद कर लिया था। कोई लंबा अरसा नहीं बीता जब खबर आई थी कि ईरान में सिर से दुपट्टा हटाने के कारण एक लड़की को आधिकारिक रूप से 2 साल कैद सुना दी गई। ये सभी घटनाएँ खबरों में सिर्फ़ इसलिए आई थीं क्योंकि मजहब इनके पीछे मुख्य वजह था। फिर भी जायरा ने ऐसा फैसला लिया… आखिर क्यों?

मजहब की दुहाई देने वाली ऐसी अनगिनत खबरों को हम आए दिन सोशल मीडिया से लेकर मीडिया के कॉर्नर में पढ़ते हैं, लेकिन फिर भी हम स्थिति को सुधारने से ज्यादा उसको बिगाड़ने का प्रयास करते हैं। मुझे हैरानी है इस बात से कि हर मौक़े पर लड़कियों के अधिकारों और उनकी आजादी का ‘झंडा’ लेकर चलने वाला लिबरल गिरोह यहाँ पर आकर जायरा का न केवल समर्थन कर रहा है बल्कि उनके मजहब में हस्तक्षेप करने से भी मना कर रहा है। ये वही लिबरल गिरोह है जो हिंदू-मुस्लिम की खबर में मुस्लिम के दोषी होने के बाद भी हिंदू को दोषी ठहराता है, ताकि उनका सेकुलरिज्म कायम रहे। लेकिन, जायरा का ऐसे तर्क देकर अपने सपनों को पीछे छोड़ना कितना भयानक है शायद अभी इसकी कल्पना न वह कर पा रही हैं और न ही इसका आभास लिबरल गिरोह को हो रहा है, जिन्हें आज तथाकथित सेकुलरिज्म साबित करने के लिए अपने ही अजेंडे के ख़िलाफ़ जाना पड़ रहा है।

आप एक बार खुद सोचिए, जायरा वसीम 2016 में दंगल फिल्म आने के बाद उन तमाम लड़कियों के लिए रोल मॉडल बनकर उभरी थीं, जिन्हें समाज की आलोचनाएँ और मजहब की रोक के कारण अपने सपनों को कुचलना पड़ता है। उन पर इस फैसले का क्या असर पड़ेगा, क्या मजहब के ठेकेदार, अपनी विचारधारा भुनाने के लिए दोबारा जायरा को उन लड़कियों के सामने उदाहरण बनाकर पेश नहीं करेंगे, जिनमें जायरा का दंगल लुक देखकर आगे बढ़ने का जोश आया था, जिन्होंने जायरा को देखकर सीखा था कि कैसे लीक से हटकर खुद की पहचान बनाई जा सकती है।

दंगल फिल्म में उनकी एक्टिंग से न केवल उनके फिल्मी किरदार ने लोगों को उनका प्रशंसक बनाया था बल्कि उनके निजी जीवन के संघर्ष ने भी उन लड़कियों के मन में गहरी छाप छोड़ी थी, जो मजहब की बेड़ियों को तोड़कर आगे निकलना चाहती थीं, लेकिन मुमकिन नहीं हो पा रहा था। मैं मानती हूँ कि बहुत बड़े तबके पर जायरा द्वारा दिखाई गई इस हिम्मत का खासा असर नहीं पड़ा होगा, लेकिन जिन पर पड़ा होगा, उनका क्या? जिन्होंने जायरा के संघर्ष में खुद का भविष्य सोचा होगा, उनका क्या? वो जायरा जिसने अपने सपने के लिए उन तमाम आलोचनाओं को पछाड़ा था, जो उसके बढ़ते कदमों को रोकने के लिए की जा रही थी। जायरा द्वारा दंगल फिल्म में निभाए गए धाकड़ रोल में मजहब की उलाहनाएँ देकर उनके बालों की कटिंग से लेकर उनके पहनावे पर सवाल उठे थे, लेकिन उन्हें मिलती प्रशंसा ने इन सभी बातों को खारिज कर दिया था।

मैं और मेरे जैसे बहुत सारे लोग जायरा के फैसले के बाद अक्षम होंगे इस बात को समझने में कि आखिर एक्टिंग करना पाप कैसे हो सकता है? आखिर कैसे एक कलाकार होने के गुण आपको आपके खुदा से दूर ले जाते हैं, आखिर कैसे इतने बड़े प्लेटफॉर्म पर पहुँचने के बाद भी आप ऐसी मानसिकता में जकड़े रहते हैं, जो आपको आगे ले जाने की बजाय पीछे ढकेलती है। ये परवरिश होती है या फिर हमारा समुदाय हमें ऐसा करने के लिए प्रभावित करता है?

जायरा के इस फैसले पर लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने तथाकथित लिबरलों और उन सभी मजहब के ठेकेदारों से सवाल किया है, जो यह कह रहे हैं कि जायरा के इस फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए। तस्लीमा कहती हैं कि महिलाओं का हमेशा से नारी-विरोधी और पितृसत्तात्मक समाज ने ब्रेनवॉश किया है ताकि वह अनपढ़, आश्रित, गुलाम, सेक्स की वस्तु और बच्चे पैदा करने की मशीन बनकर रह जाएँ। उनका कहना है महिलाओं के पास न आजादी है और न चुनने का विकल्प।

तस्लीमा के अलावा इस फैसले पर रवीना टंडन और पायल रोहतगी जैसे कलाकारों ने भी अपना विरोध दर्ज कराया है। रवीना टंडन ने अपने ट्वीट में लिखा, “कोई फर्क नहीं पड़ता अगर वो लोग जिन्होंने महज 2 फिल्मो में काम किया है, इस इंडस्ट्री के प्रति कृतज्ञता महसूस नहीं करते हैं कि उन्हें यहाँ क्या-क्या मिला है।” उन्होंने आगे कहा, “आशा करिए कि वो शांति के साथ यहाँ से निकल जाएँ और अपने उल्टे रास्तों पर चलने वाली सोच को खुद तक ही सीमित रखें।”

जबकि पायल रोहतगी ने ट्वीट करके जायरा वसीम को एक अंधभक्त और कट्टर मुस्लिम बताया। उन्होंने इस फैसले के लिए कुरान के विचार का हवाला दिया है। उन्होंने कहा, “इससे लगता है कि इस्लाम ऐसा धर्म है जहाँ महिलाएँ पुरुषों के बराबर नहीं हैं। मुझे पढ़कर काफी खुशी हुई।”

जायरा वसीम का इस्लाम के सामने अपने एक्टिंग करियर को नकारना बताता है कि हम उसी परवरिश और समुदाय में जकड़े हुए हैं, जो जब चाहे हमारी सोच और सपनों पर हावी होकर उसे ध्वस्त कर सकता है। हम कितना ही आगे क्यों न बढ़ जाएँ, लेकिन बावजूद इसके हमारा वातावरण हमें अपने अनुसार फैसले लेने के लिए प्रभावित करता है। जायरा का फैसला उन सभी प्रोग्रेसिव लोगों के मुँह पर तमाचा है जो मानते हैं कि बॉलीवुड जैसी जगह पहुँचने के बाद धर्म या मजहब बहुत छोटी बातें रह जाती हैं, जबकि हकीकत यह है कि इनकी जकड़ इतनी मजबूत है कि यहाँ तक पहुँच कर, सफल होकर भी एक लड़की ‘माय लाइफ, माय रूल्ज’ जैसे तर्क देकर हिजाब में फँसे रहना चाहती है, एक लड़की पितृसत्तात्मक समाज से जन्मी बंदिशों को इज्जत और सम्मान का केंद्र कहती है और उससे उभरने की बजाए उस दलदल में फँसे रहने की गाँठें स्वयं बाँधती हैं। आज की हकीकत सिर्फ़ इतनी है कि एक लड़की, जिसके बढ़ते कदमों ने आशा की लौ को धधकाया था वो मजहब की हवा में बुझ गई है, और इस अंधेरे का एहसास उसे खुद नहीं है।

बस अब यह उम्मीद है कि हमारे समाज की वो लड़कियाँ जो आगे बढ़ने के सपने देखती हैं, जिन्हें खुद की शिक्षा और सुरक्षा धर्म-मजहब से ऊपर लगती है, वे जायरा में अपना आईडल न खोजें। वे तस्लीमा नसरीन जैसी लेखिकाओं और मसीह अलीनेज़ाद जैसी लड़कियों को अपना आदर्श मानें, जिन्होंने मजहब और अस्तित्व की लड़ाई में खुद के औचित्य को बचाना उचित समझा और सही मायने में लाखों महिलाओं के लिए आईडल हैं।

ज़ायरा वसीम पर सेलेब्रिटी दो-फाड़, कोई बोले- ‘ड्रामेबाज़’, तो कोई ‘साहसी’

ज़ायरा वसीम के ‘सन्यास’ पर बॉलीवुड समेत सेलिब्रेटी, साहित्यकारों, नेताओं आदि का वर्ग पूरी तरह दो-फाड़ हो गया है। जहाँ अभिनेत्री रवीना समेत कुछ लोगों ने उनके बॉलीवुड के कथित नकारात्मक चित्रण की आलोचना की है, वहीं कुछ लोगों ने उनकी निजी ‘चॉइस’ बताते हुए उनका बचाव किया है।

‘दो फिल्म पुरानी लड़की के पुरातनपंथी विचार’

रवीना टंडन ने अप्रत्यक्ष रूप से ज़ायरा वसीम पर कटाक्ष करते हुए उन्हें ‘कृतघ्न’ कहा है। उनके अनुसार महज़ दो फिल्म पुरानी लड़की के कृतघ्न हो जाने से बॉलीवुड को कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे लोगों को केवल शिष्टाचारपूर्वक निकल जाना चाहिए, और अपने पुरातनपंथी विचार खुद तक ही सीमित रखने चाहिए।

‘इसके बाद क्या? बुरका या नकाब?’

कनाडाई-पाकिस्तानी लेखक तारिक फतह ने पूछा कि ‘इस्लाम की राह’ पर ज़ायरा वसीम कितना आगे जाने वालीं हैं? बुरका और नकाब भी पहनना शुरू कर देंगी?

‘मूर्खतापूर्ण निर्णय… औरतों की ब्रेनवॉशिंग’

बांग्लादेशी मूल की लेखिका तस्लीमा नसरीन, जो इस्लाम के खिलाफ ‘लज्जा’ नामक किताब लिखने के बाद से फ़तवेबाजों के निशाने पर रहीं हैं, ने इसे ‘मूर्खतापूर्ण निर्णय’ करार दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि मज़हब के नाम पर औरतों की ब्रेनवॉशिंग कर उन्हें अनपढ़ से लेकर सेक्स गुलाम तक रखा जाता है।

‘टैलेंट न हो तो आमिर खान भी स्टार नहीं बना सकता’

ज़ायरा के खिलाफ बयान देने तो केआरके भी उतर आए। ज़ायरा की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि ज़ायरा के पास प्रतिभा नहीं है, और वह ड्रामेबाज़ हैं।

‘लिबरल’ वर्ग की हैरतअंगेज़ प्रतिक्रिया

खुद को ‘प्रगतिशील’ और अपने से भिन्न राय रखने वालों को एक लाइन से दकियानूसी संघी करार देने वाले लिबरल वर्ग की प्रतिक्रिया इस मामले में हैरतअंगेज़ है। जहाँ बहुत सी शख्सियतों ने मुँह बंद रखना ही सही प्रतिक्रिया समझी, वहीं कुछ अन्य तो उनके बॉलीवुड को इस्लाम से असंगत बताने के समर्थन में ही उतर आईं।

कॉन्ग्रेस की फ़िलहाल स्टार कैम्पेनर और 2014 में लोकसभा प्रत्याशी (और मुस्लिम) नगमा ने लिखा कि ज़ायरा वसीम ‘साहसी लड़की’ हैं, जिन्होंने (ऐसा कर) ‘रूढ़िवादी छवि को तोड़ कर दिखाया है’।

मिंट की स्तम्भकार और हारवर्ड की प्रतिष्ठित 2020 नीमैन फेलोशिप जीतने वाली अशवाक मसूदी ने तो मामले को मज़हब से उठाकर लैंगिक भेदभाव का मुद्दा बनाने की कोशिश कर डाली।

कॉन्ग्रेस ‘फैन’ ज़ैनाब सिकंदर ने इसे नुसरत जहां के सिन्दूर से जोड़ कर प्रतिक्रिया को इस्लाम के खिलाफ किसी साजिश के तौर पर पेश करने की कोशिश की।

मामले में समाजवादी पार्टी के लोक सभा सदस्य एसटी हसन भी कूद पड़े। उन्हें ‘अंग-प्रदर्शन’ और ‘सेक्स-अपील वाला’ कुछ भी दिखाए जाने को गैर-इस्लामिक करार दिया।

Video: आज़म ख़ान ने इशारों में किया जया प्रदा पर ‘अंडरवियर’ से भी ज्यादा अश्लील टिप्पणी

सपा सांसद आज़म ख़ान ने एक बार फिर से शर्मनाक बयान दिया है। जयाप्रदा के अंतर्वस्त्रों पर कमेंट कर चुके आज़म ख़ान इस बार एक क़दम और आगे बढ़ गए और अपने भाषण में एक से बढ़ कर एक अश्लील शब्दों का प्रयोग किया। आज़म ख़ान ने एक भाषण के दौरान कहा, “मैंने *#$खाना नहीं खोल रखा है। मैंने कोई नाचघर नहीं खोल रखा है। मैं यह शब्द जानबूझ कर इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि लोगों को पता है कि ये शब्द सीधा कहाँ जाकर लग रहा है? जिस समाज में इस लफ्ज को मोहतरम मान लिया जाएगा, वह समाज क्या तरक्की करेगा, क्या सिर उठा कर चलेगा?“

विवादित बयानों के शूरमा माने जाने वाले आज़म ख़ान ने संसद को भी नौटंकी बताया। उन्होंने कहा कि वे जैसे ही संसद पहुँचे, उन्हें लगा कि वे किसी नौटंकी में आ गए हैं। उन्होंने संसद में सांसदों की वेशभूषा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वो लोग एकदम मदारी की तरह लग रहे थे। भाजपा पर निशाना साधते हुए आज़म ख़ान ने आगे कहा:

“आपने देखा कि अंजाम क्या हुआ? कितनी दौलत ख़र्च हुई थी? कितनी ताक़त लगाई गई? वो कहते थे कि आज़म ख़ान जीत गए तो जड़ से नाक निकल जाएगी। अरे, नाक नहीं जाने क्या-क्या निकल गई। सपा सांसद ने आगे कहा कि हमने खुद कहते हुए सुना है कि पूरी भारतीय जनता पार्टी हार जाती, लेकिन आजम खान नहीं जीतता हमें ख़ुशी थी। हम इतने बुरे हैं। सिर्फ इसलिए बुरे हैं कि हम बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। शरीफों की इज्जत है। वो लोग रास्ते बताएँगे, ऐसे लोग देवी-देवता अपने आप को बनाएँगे। हमारे मरे हुए माँ-बाप 3 दिन तक टेलीविजन पर डिस्कस होंगे।”

अमर सिंह ने रामपुर के सांसद आज़म ख़ान के इस बयान की कड़ी निंदा की है। सिंह ने कहा कि आज़म ख़ान जैसे लोग महिलाओं का सम्मान करना नहीं जानते। जया प्रदा पर आज़म ख़ान द्वारा बार-बार विवादित और अश्लील टिप्प्णी किए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए अमर सिंह ने याद दिलाया कि जया बच्चन भी उन्हीं की पार्टी की नेता हैं और वे कई फ़िल्मों में काम कर चुकी हैं। आज़म ख़ान को चुनाव प्रचार के दौरान विवादित बयानों के कारण प्रतिबंधित भी किया गया था।

‘ज़ायरा का अकाउंट हैक हो गया था, उसने नहीं कहा बॉलीवुड इस्लाम से दूर कर देता है’

ज़ायरा वसीम का प्रकरण ‘फ़िल्मी’ होता जा रहा है। पहले तो महज़ 18 साल की उम्र में उन्होंने इस्लाम के लिए बॉलीवुड को अलविदा कह कर देश को कल चौंका दिया, और अब उनके मैनेजर के हवाले से खबर आ रही है कि उनके इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि सोशल मीडिया अकाउंट किसी ने ‘हैक’ कर लिए और ऐसा लिख दिया कि वह इस्लाम का ठीक से पालन करने के लिए फ़िल्में छोड़ रहीं हैं।

मीडिया से कोई बात नहीं, न ही पुलिस शिकायत

लेकिन यह खबर लिखे जाने तक न ही ज़ायरा वसीम के परिवार ने मीडिया से बात कर इस दावे की पुष्टि या इसका खंडन किया है, और न ही पुलिस में अपने अकाउंट के हैक होने के बाबत कोई शिकायत उनके द्वारा दर्ज कराए जाने की बात पता चली है। वह पोस्ट्स भी जस-की-तस उनके इंस्टाग्राम और फेसबुक पर हैं ही।

इन पोस्ट्स में ज़ायरा वसीम ने लिखा था कि इतनी शोहरत और सफलता मिलने के बाद भी वह सच में खुश नहीं हैं। नई जीवनशैली से एडजस्ट करते हुए उन्हें यह अहसास हुआ कि उनके कैरियर ने उनके मज़हब के साथ उनके रिश्ते पर असर डाला है। अपनी दिक्कतों के बारे में बात करते हुए ज़ायरा ने लिखा कि उन्हें तसल्ली केवल अल्लाह और कुरान में मिली। उन्होंने कहा, “कुरान की महान और पाक समझ में मुझे पूर्णता और अमन मिला। दिलों को अमन तभी मिलता है जब वह अपने बनाने वाले, उसकी खासियतें, उसके रहम और उसके हुक्म का इल्म हो जाता है।”

कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं हैं

ज़ायरा के मुताबिक उन्होंने पहला कदम अपनी सच्ची राह के अहसास से उठाया और फिल्मों को अलविदा इसलिए कहा ताकि वह अपने मज़हब पर गौर फरमा सकें। 2017 में ज़ायरा कट्टरपंथी इस्लामियों के निशाने पर आ गईं थीं। उनके अनुसार वह एक ‘प्रदूषित’ माध्यम में काम करतीं थीं, और पूरे सम्प्रदाय के लिए शर्म और बदनामी का सबब थीं। उनके राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती से मिलने के बाद भी वह ट्रोलों के निशाने पर आ गईं थीं।

चलती बस में महिला का वीडियो बनाना मोहम्मद ख़ान को पड़ा महँगा, लोगों ने की कुटाई, हुआ गिरफ़्तार

चलती बस में 35 वर्षीय महिला का वीडियो बनाने वाले एक शख़्स को कोलकाता पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है। दरअसल, वो महिला रविवार (30 जून) की सुबह अपने पति और बेटी के साथ बस से जा रही थी, अचानक उसकी नज़र अपने पीछे वाली सीट पर बैठे शख़्स पर गई जो उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहा था।

ख़बर के अनुसार, 24 वर्षीय मोहम्मद ख़ान को मुचीपारा पुलिस स्टेशन द्वारा गिरफ़्तार किया गया है। आरोपित ख़ान हावड़ा के उलुबेरिया का निवासी है और उसे भारतीय दंड संहिता की धारा-354 के तहत गिरफ़्तार किया गया।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के अनुसार, महिला रविवार सुबह धूलगढ़-सियालदह मार्ग पर एक निजी बस में सवार हुई थी। आरोपित ख़ान उसके सामने बैठ गया। एक सह-यात्री ने महिला को सूचित किया कि आरोपित उसकी तस्वीरें ले रहा है।

महिला ने कहा:

“सह-यात्रियों में से एक ने पहली बार देखा कि वह आदमी मेरी तस्वीरें ले रहा था। जब हमने उसे तस्वीरें दिखाने की माँग की, तो उसने इनकार कर दिया। लेकिन हमें उसके सेल फोन पर तस्वीरें मिलीं। इसलिए मैंने 100 नंबर डायल कर दिया और पुलिस से मदद माँगी।”

महिला ने जब कॉल किया तो उस समय बस लेनिन सरानी पर वेलिंगटन क्रॉसिंग से आगे निकल गई। कंट्रोल रूम के एक अधिकारी ने तुरंत सियालदह ट्रैफिक गार्ड के प्रभारी अधिकारी को बस रोककर इस मामले पर कार्रवाई करने को कहा। महिला के फोन करने के कुछ ही मिनटों के भीतर पुलिस ने आरोपित को पकड़ लिया।

पुलिस के पहुँचने से पहले ही यात्रियों ने सार्वजनिक रूप से आरोपित को पीटना शुरू कर दिया था।  यह जानने पर कि पुलिस को बुलाया गया है, आरोपित मोहम्मद ख़ान दया की भीख माँगते हुए उस महिला के पैरों पर गिर गया। लेकिन वहाँ मौजूद महिलाओं ने उसे सबक सिखाने का फ़ैसला किया और उसे पुलिस के हवाले कर दिया।

पुलिस के मुताबिक़, NRS अस्पताल के सामने बस को रोका गया था। आरोपी को यात्रियों ने सौंप दिया था लेकिन उसका दोस्त भागने में क़ामयाब रहा। फ़िलहाल युवक को मुचीपारा पुलिस थाने ले जाया गया है। इस मामले में पुलिस की त्वरित कार्रवाई की सराहना की जा रही है।

DMK ने ठुकराई कॉन्ग्रेस की माँग, पूर्व PM मनमोहन सिंह को राज्यसभा भेजने से किया इनकार

डीएमके ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के लिए एक राज्यसभा सीट देने से इनकार कर दिया है। बता दें कि कई दिनों से मीडिया में ऐसी ख़बरें चल रही थीं कि कॉन्ग्रेस ने तमिलनाडु की अपनी सहयोगी द्रविड़ पार्टी से पूर्व पीएम के लिए एक राज्यसभा सीट की माँग की थी। मनमोहन सिंह का राज्यसभा में कार्यकाल ख़त्म हो गया है और अभी संसद के दोनों सदनों में से किसी में भी पूर्व प्रधानमंत्री सदस्य के रूप में उपस्थित नहीं है। एचडी देवेगौड़ा भी लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। कॉन्ग्रेस के लिए मनमोहन सिंह का संसद में रहना ज़रूरी है क्योंकि अर्थनीति व अन्य कठिन विषयों पर मोदी सरकार को घेरने के लिए उनके चेहरे का उपयोग किया जाता है।

पिछले 5 वर्षों में अर्थव्यवस्था और अन्य जटिल विषयों पर कॉन्ग्रेस की तरफ़ से मनमोहन सिंह ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस किया। अतः, पार्टी उन्हें हर हाल में संसद में रखना चाहती है। तमिलनाडु में इसी महीने राज्यसभा की 6 सीटों के लिए मतदान होना है। आँकड़ों की बात करें तो इनमें से 3 सीटें डीएमके के खाते में जा सकती हैं, वहीं बाकी की 3 सीटों पर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी एआईडीएमके के जीतने की उम्मीद है। ऐसे में, कॉन्ग्रेस ने डीएमके को 3 में से 1 सीट डॉक्टर सिंह के लिए माँगी थी, जिसे डीएमके द्वारा ठुकरा दिए जाने की बात सामने आई है।

दरअसल, डीएमके ने 3 में से 1 सीट एमडीएमके संस्थापक वाइको को देने का निर्णय लिया है। वाइको तमिलनाडु के पुराने नेता हैं और डीएमके ने उन्हें पहले ही 1 सीट देने का वादा किया था। बाकी की 2 सीटों पर डीएमके के ही उम्मीदवार होंगे। ऐसे में कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि कॉन्ग्रेस डॉक्टर सिंह को राजस्थान से राज्यसभा भेज सकती है। चूँकि, राजस्थान भाजपा के अध्यक्ष और वयोवृद्ध नेता मदन लाल सैनी का हाल ही में निधन हो गया था, इससे राजस्थान में एक राज्यसभा सीट खाली हुई है।

डीएमके द्वारा आख़िरी समय पर अपना निर्णय बदलने से कॉन्ग्रेस भी हैरान नज़र आ रही है क्योंकि डीएमके प्रमुख स्टालिन विपक्षी नेताओं में शायद एकमात्र प्रमुख नेता थे जिन्होंने राहुल गाँधी की प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी का खुल कर समर्थन किया था। उन्होंने कई बार राहुल को पीएम उम्मीदवार बनाए जाने की वकालत की थी। ऐसे में, लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद उसी तरह का रुख अख्तियार करना कॉन्ग्रेस के लिए चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि भाजपा ने भी अपना मिशन दक्षिण शुरू कर दिया है।

तेलंगाना और आंध्र में कॉन्ग्रेस पार्टी पहले ही अपना अस्तित्व लगभग खो चुकी है और केरल में वामपंथियों ने राहुल गाँधी द्वारा वायनाड से चुनाव लड़ने को वामपंथी दलों के ख़िलाफ़ लड़ाई के रूप में देखा था। कर्नाटक में कॉन्ग्रेस सत्ताधारी पार्टी ज़रूर है लेकिन सबसे बड़े दल भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए वो एचडी कुमारस्वामी की पार्टी के समर्थन में है जबकि जेडीएस के पास काफ़ी कम सीटें हैं।

‘मंदिर में प्रतिमाएँ तोड़ीं, लगाए ‘अल्लाहु-अकबर’ के नारे’: स्थानीय लोगों में गुस्सा, तनाव के बीच वीडियो वायरल

दिल्ली के चाँदनी चौक इलाक़े में मुस्लिम समाज के लोगों पर मंदिर में तोड़फोड़ करने का आरोप लगाया गया है। सोशल मीडिया पर लोगों ने कई वीडियो शेयर किए, जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग हंगामा करते दिखाई दे रहे हैं। दिल्ली सरकार में मंत्री रहे कपिल मिश्रा ने 2 वीडियो ट्वीट कर लिखा, “ये पाकिस्तान नहीं बल्कि दिल्ली के चावड़ी बाजार का हिन्दू मंदिर हैं। यह घटना कल की है, जब धर्म विशेष की भीड़ ने मंदिर में घुसकर वहाँ की मूर्तियों को तोड़ा है। यह काम बदमाशों या गुंडों ने नहीं बल्कि सैकड़ो स्थानीय लोगों की भीड़ ने किया है। उन्होंने अपने धर्म के नारे लगाते हुए मंदिर तोड़ा डाला।“

इस वीडियो में देखा जा सकता है कि लोग जब मंदिर पहुँचे तो उन्होंने दिखाया कि कैसे माँ काली व अन्य प्रतिमाओं के आगे लगाए गए ग्लास को तोड़ डाला गया है। इसके अलावा भगवान गणेश की प्रतिमा को भी विखंडित कर दिया गया। भगवान शिव की प्रतिमा को तोड़ डाला गया। कपिल मिश्रा ने इसी घटना से जुड़ी एक अन्य वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, “दिल्ली के हौजकाजी में कल रात एक मंदिर पर पत्थर बरसाए गए और तोड़-फोड़ की गई। पहले पूरे इलाक़े में अफवाह फैलाई गई कि एक मुस्लिम लड़के की मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) हुई है, जबरदस्ती जय श्री राम बुलवाया है। इस अफवाह के बाद संप्रदाय विशेष की मॉब जमा हुई और उस मॉब ने पहले मंदिर में और उसके बाद थाने में हंगामा किया।“

स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले साज़िश के तहत यह अफवाह फैलाई गई कि एक मुस्लिम व्यक्ति की भीड़ द्वारा हत्या (मॉब लिंचिंग) कर दी गई है और उससे जबरदस्ती ‘जय श्री राम’ बुलवाया गया है। इसके बाद गुस्साई मुस्लिम मॉब मंदिर में घुस आए और उन्होंने प्रतिमाओं को विखंडित करने के साथ-साथ मंदिर में तोड़-फोड़ की।

इस घटना के बाद स्थानीय पुलिस थाने के सामने बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई और सभी ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाते हुए देखे जा सकते हैं। मॉब ने वहाँ इस्लामी नारे लगाते हुए जम कर हंगामा बड़पाया।

जायरा वसीम के मज़हब को आधार बनाकर बॉलीवुड छोड़ने पर शिवसेना-BJP ने की आलोचना

दंगल और सीक्रेट सुपरस्टार फेम एक्ट्रेस जायरा वसीम के धर्म को आधार बनाकर एक्टिंग छोड़ने का फैसला तूल पकड़ता जा रहा है। धर्म को आधार बनाकर जायरा के ऐक्टिंग छोड़ने के फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया है। जहाँ कुछ लोगों ने इस फैसले को सही बताया है तो वहीं कुछ लोगों ने इस गलत ठहराया है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेस के नेता उमर अब्दुल्ला ने जायरा के फैसले का समर्थन करते हुए फैसले का सम्मान करने की सलाह दी है, तो वहीं शिवसेना और भाजपा ने इसकी आलोचना की है। 

शिवसेना ने जायरा के फैसले में धर्म को शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई। शिवसेना की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने एक के बाद कई ट्वीट कर धर्म के आधार पर एक्टिंग छोड़ने के फैसले की आलोचना की। प्रियंका ने ट्वीट कर लिखा, “यदि आपकी आस्था आपको आकर्षित कर रही है, तो आप इसका पालन कर सकते हैं, लेकिन कृपया धर्म को आधार बनाकर अपने करियर का फैसला ना करें। यह आपके धर्म को असहिष्णु बताता है, जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। यह जायरा वसीम के धर्म लिए भी एक बड़ा प्रतिगामी कदम है और इस गलत धारणा को और पुष्ट करता है कि इस्लाम में सहिष्णुता की जगह नहीं है।”

अपने अगले ट्वीट में प्रियंका ने कहा, “हिंदी सिनेमा में इसी आस्था के लोगों ने सफलता के कई कीर्तिमान गढ़े हैं, क्या उन्हें धर्म के बारे में पता नहीं है? कुछ ने जायरा के फैसले की विनोद खन्ना के उस फैसले के साथ बराबरी की है। जब विनोद खन्ना ने कहा था कि उनका धर्म उनके करियर के चुनाव करने के दौरान आड़े आ रहा है?”

इसके अलावा, प्रियंका ने एक और ट्वीट करते हुए कहा कि जो लोग इसकी तुलना नुसरत जहाँ के फतवे से कर रहे हैं, वो बिल्कुत गलत हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जायरा ने जब से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा है, तभी से वो कश्मीरी कट्टरपंथियों के निशाने पर रही हैं।

भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने भी धर्म के आधार पर एक्टिंग छोड़ने के फैसले को दबाव में लिया हुआ फैसला बताया। उन्होंने भी इस बात का जिक्र किया कि जायरा लगातार कट्टरपंथी समूहों के निशाने पर थीं। बता दें कि, जायरा वसीम ने रविवार (जून 30, 2019) को अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर पोस्ट लिखकर इस बात की जानकारी दी थी कि वो एक्टिंग छोड़ रही हैं। 5 साल पहले फिल्म इंडस्ट्री में आने का उनका फैसला गलत था। ये उन्हें अल्लाह के रास्ते से दूर ले जा रहा है।

कॉन्ग्रेस की मुश्किलें बढ़ीं, दिग्गज़ विधायक आनंद सिंह ने दिया इस्तीफ़ा

कर्नाटक की राजनीति में बग़ावती तेवर जारी है। एक बार फिर कॉन्ग्रेस-जेडीएस को बड़ा झटका लगा है। कॉन्ग्रेस से विजयनगर के विधायक आनंद सिंह ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफ़ा स्पीकर के आर रमेश को सौंपा है।

ऐसा माना जा रहा है कि अन्य विधायक भी उनके नक्शेक़दम पर चल सकते हैं। आनंद सिंह ने अपना इस्तीफ़ा ऐसे समय में दिया जब मुख्यमंत्री कुमारस्वामी भारत में न होकर अमेरिका में हैं। आगामी 8 जुलाई तक उनके वापस आने की संभावना है। 

इससे पहले लोकसभा चुनाव में क़रारी हार के एक दिन बाद ही कर्नाटक में राज्य कैबिनेट की बैठक में मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी के नेतृत्व पर भरोसा जताया गया था। इसके अलावा, यह भी कहा गया था कि कॉन्ग्रेस और जेडीएस के बीच गठबंधन जारी रहेगा। लेकिन उसके बाद के घटनाक्रम पर नजर डालें तो ऐसा कुछ भी प्रतीत नहीं हो रहा है।

ख़बर के अनुसार, कॉन्ग्रेस नेता परमेश्वर ने भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाया था कि वो राज्य सरकार को अस्थिर करने की कोशिश में जुटी हुई है। बीजेपी की ख़िलाफ़त करते हुए उन्होंने कहा था कि राज्य में सत्तारुढ़ गठबंधन उनके मंसूबों को सफल नहीं होने देगा। उन्होंने कहा था कि सभी विधायक एक साथ हैं और गठबंधन कुमारस्वामी के नेतृत्व के तहत काम करना जारी रखेगा और राज्य में कॉन्ग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार को कोई ख़तरा नहीं है।

बता दें कि आनंद सिंह उस समय चर्चा में आए थे जब उनके साथी विधायक कांपली गणेश ने रिसॉर्ट में उनकी पिटाई कर दी थी। रिसॉर्ट में कॉन्ग्रेस के सभी विधायकों को भाजपा में शामिल होने से रोकने के लिए ठहराया गया था। दरअसल, आनंद सिंह पिछले साल ‘ऑपरेशन लोटस’ में पकड़े गए भाजपा विधायकों में से एक थे।

जानकारी के अनुसार, पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा यह पहले ही स्पष्ट कर चुके थे कि उन्हें भाजपाा नेतृत्व ने ‘ऑपरेशन लोटस’ में शामिल न होने का निर्देश दिया है क्योंकि उनका मानना है कि राज्य की गठबंधन सरकार ख़ुद ही गिर जाएगी। वहीं, दूसरी तरफ़ आनंद सिंह का इस्तीफ़ा यह सवाल खड़ा करता है कि क्या ‘ऑपरेशन लोटस’ अभी भी जारी है।