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मैंगो मैन हाजी कलीमुल्लाह के बगीचे में उगेंगे अमित ‘शाह’ नाम के खास आम

बाजार में जल्द ही आम की नई किस्म बिक्री के लिए मौजूद होगी। इसका नाम भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अमित शाह के नाम पर दिया गया है। ‘मैंगो मैन’ के नाम से जाने जाने वाले हाजी कलीमुल्लाह ने अमित शाह के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर एक आम की इस नई किस्म को ‘शाह’ नाम दिया है। इस आम के स्वाद और वजन दोनों में बढ़िया होने के दावे किए जा रहे हैं। इसके जल्द ही बाजार में आने की उम्मीद है। कलीमुल्लाह के मुताबिक अमित शाह में सामाजिक ताना-बाना बुनने और लोगों को एक मंच पर लाने की काबिलियत है।

शाह आम कुछ ही दिनों में पकने लगेगा और फिर इसे बाजार में उतारा जाएगा। पद्म श्री से सम्मानित कलीमुल्लाह का कहना है कि लोगों का आना-जाना तो लगा रहता है, लेकिन फल हमेशा ही रहते हैं और लोगों को फलों से लगाव भी होता है। आम को अमित शाह के नाम से जोड़ने का उनका मकसद यही है कि ऐसे लोगों को अच्छे काम के लिए इस फल के जरिए हमेशा याद किए जाएँगे।

जानकारी के मुताबिक, लखनऊ के पास मलीहाबाद में कलीमुल्लाह के आम के बागान हैं। वे आम की नई-नई किस्में ईजाद करने और सेलिब्रिटीज के नाम पर उनका नाम रखने के लिए जाने जाते हैं। इससे पहले वो पीएम मोदी, अभिनेत्री ऐश्वर्या रॉय बच्चन, पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, अभिनेता अमिताभ बच्चन के नाम पर आम का नाम रख चुके हैं।

हाजी कलीमुल्ला ने 2015 में आम की एक शाही किस्म का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर रखा था। उन्होंने तब कहा था, “मेरी इच्छा है कि मैं उन्हें खुद फलों के राजा को पेश कर सकूँ और मुझे भरोसा है कि वह इसे जरूर पसंद करेंगे।” मोदी आम का स्वाद अच्छा है तथा यह देखने में भी अच्छा है। कलीमुल्लाह ने कहा, “जिन्होंने भी इस आम को चखा है, चाहे वह अधिकारी हो या इस फल के पारखी, सभी ने इसकी स्वाद की तारीफ की है।”

‘Terror Monitoring Group’ बना रहे अमित शाह, आतंकी फंडिंग की तोड़ेंगे कमर

गृह मंत्री अमित शाह जिहादियों की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए संबंधित एजेंसियों की सदस्यता वाला एक विशेष समन्वय समूह बना रहे हैं। जम्मू-कश्मीर सीआईडी के अतिरिक्त डीजीपी की अध्यक्षता में गठित ‘टेरर मॉनिटरिंग ग्रुप’ (टीएमजी) नामक इस समूह की जिम्मेदारी घाटी के जिहादियों को मिल रही आर्थिक सहायता को काटना होगा। इसके लिए संयुक्त कदम उठाने में यह समूह, जिसमें आतंकरोधी गतिविधियों से जुड़ी लगभग हर केंद्रीय एजेंसी (रॉ के अतिरिक्त) के प्रतिनिधि बतौर सदस्य शामिल होंगे, सक्रिय भूमिका निभाएगा। इस ग्रुप के सदस्यों में आईबी, NIA, सीबीआई, CBIC, CBDT और ED के अधिकारी शामिल होंगे।

एजेंसियाँ देंगी टीएमजी को जानकारी

टीएमजी का खाका गृह मंत्रालय में इस तरह से खींचा गया है कि इसमें शामिल प्रतिनिधि अपनी-अपनी एजेंसियों द्वारा दहशतगर्दों के खिलाफ उठाए जा रहे क़दमों की जानकारी टीएमजी के ज़रिए एक-दूसरे की एजेंसियों के साथ साझा करेंगे। इससे एजेंसियों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान में कमी, जिसे दशकों से भारतीय सुरक्षा तंत्र में गंभीर चुनौती माना जाता रहा है, के भी समाधान की उम्मीद की जा सकती है। टीएमजी के सदस्यों में गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक इंटेलिजेंस ब्यूरो, नैशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के अलावा सेंट्र्रल बॉर्ड ऑफ इनडायरेक्ट टैक्स ऐंड कस्टम्स, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ डायरेक्ट टैक्स, प्रवर्तन निदेशालय के प्रतिनिधि सदस्य होंगे।

शाह की नज़रों में कश्मीर

कश्मीर की दहशतगर्दी गृह मंत्रालय का प्रभार संभालने के क्षण से ही गृह मंत्री अमित शाह की प्राथमिकताओं में है। उन्होंने पद ग्रहण करने के तुरंत बाद सर्वप्रथम कश्मीर मुद्दे पर जानकारी ली थी। इससे पहले लोकसभा निर्वाचन के समय भी जब महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्ला-फारूख अब्दुल्ला कश्मीर में अनुच्छेद 370/35-A हटाने पर भारत से अलगाव, कश्मीर में प्रधानमंत्री पद की वापसी आदि जैसे बयान दे रहे थे तो भी उन्होंने इस पर कड़ा रुख अख्तियार किया था। ऐसे में माना जा रहा है कि उनकी निगाहें कश्मीर में बड़ी कार्रवाई पर हैं। 4 जून को राज्यपाल सत्य पाल मलिक ने उन्हें कश्मीर के ताज़ा हालात से अवगत कराया है। इस दौरान उन्होंने राज्यपाल से अमरनाथ यात्रा की भी सुरक्षा और अन्य प्रबंधों के संबंध में जानकारी ली।

ममता से बातचीत को सशर्त तैयार हुए डॉक्टर, जगह खुद तय करेंगे

पश्चिम बंगाल में हड़ताल कर रहे डॉक्टर शनिवार (जून 15, 2019) को सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ सशर्त वार्ता के लिए तैयार हो गए हैं। जूनियर डॉक्टरों ने कहा कि वो ममता बनर्जी के साथ बातचीत और चर्चा करने के लिए तैयार हैं, लेकिन इसके लिए जगह वो खुद तय करेंगे। उनका कहना है कि ममता बनर्जी ने उन लोगों को बंद कमरे में बैठक करने के लिए बुलाया है, लेकिन वो बंद कमरे में उनके साथ बैठक कैसे कर सकते हैं, क्योंकि इस लड़ाई में पूरा राज्य उनके साथ है। इससे पहले उन्होंने राज्य सचिवालय में बनर्जी के साथ बैठक के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था और इसकी बजाय उनसे गतिरोध सुलझाने को लेकर खुली चर्चा के लिए एनआरएस मेडिकल कॉलेज अस्पताल आने को कहा था।

हालाँकि, शनिवार (जून 15, 2019) को जूनियर डॉक्टरों के संयुक्त फोरम की ओर से प्रवक्ता ने कहा, “हम हमेशा से बातचीत के लिए तैयार हैं। अगर मुख्यमंत्री एक हाथ बढ़ाएँगी तो हम हमारे 10 हाथ बढ़ाएँगे। हम इस गतिरोध के खत्म होने की तत्परता से प्रतीक्षा कर रहे हैं।” डॉक्टरों का कहना है कि ये मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए अहंकार की लड़ाई बन चुकी है, लेकिन उनके लिए ये अस्तित्व की लड़ाई है। डॉक्टरों ने कहा कि वो चाहते हैं कि जिस जूनियर डॉक्टर परिबाहा मुखोपाध्याय पर हमला किया गया, उनसे ममता बनर्जी मुलाकात करें, क्योंकि ये कोई अचानक हमला नहीं था, बल्कि सुनियोजित तरीके से किया गया हमला था।

इसके साथ ही, डॉक्टरों ने ममता बनर्जी की उस बात को भी झूठ बताया, जिसमें ममता ने कहा था कि जब वो एसएसकेएम हॉस्पिटल गईं थी, तो उन पर हमला हुआ था। डॉक्टरों ने कहा कि ये झूठ है। ममता बैरीकेड के घेरे में थीं और वो लोग न्याय की माँग करते हुए सिर्फ नारे लगा रहे थे। गौरतलब है कि, ममता ने डॉक्टरों की तुलना पुलिस से की थी, जिसका जवाब देते हुए डॉक्टरों ने कहा कि वो पुलिस का सम्मान करते हैं, लेकिन उन लोगों को ट्रेनिंग और हथियार दिए जाते हैं, डॉक्टरों को हथियार चलाने के लिए ट्रेंड नहीं किया जाता है।

डॉक्टरों ने कहा कि मुख्यमंत्री कहती हैं कि उन्होंने इस मसले पर राज्यपाल से बात की है, लेकिन राज्यपाल बयान जारी करके कहते हैं कि उनके फोन का ममता बनर्जी जवाब नहीं दे रही हैं। साथ ही डॉक्टरों ने ये भी कहा कि हड़ताल की वजह से बंगाल के लोगों की सेवा नहीं कर पाने का उन्हें दुख है।

सोमालिया में विस्फोट, 11 की मौत, अल क़ायदा से जुड़े संगठन अल-शबाब ने ली जिम्मेदारी

सोमालिया की राजधानी मोगादिशू में हुए दो बम धमाकों में 11 लोगों की मौत हो गई और 25 अन्य घायल हो गए। देश के पुलिस प्रमुख ने शनिवार को यह जानकारी दी। अलकायदा से जुड़े आतंकवादी संगठन अल-शबाब ने हमलों की जिम्मेदारी ली है।

जनरल बशीर अब्दी मोहम्मद ने मोगादिशू में पत्रकारों को बताया कि पहला कार बम धमाका राष्ट्रपति भवन के नजदीक सुरक्षा चौकी पर हुआ जिसमें 9 लोगों की मौत हो गई। दूसरा कार बम धमाका हवाई अड्डे के नजदीक सुरक्षा चौकी पर हुआ जिसमें चालक और उसके साथी की मौत हो गई। इससे पहले अक्टूबर 2017 में मोगादिशू में हुए धमाके में 500 लोगों की मौत हो गई थी, जिसकी जिम्मेदारी अल शबाब ने ली थी।

खबर के मुताबिक, पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक रिपोर्ट में, संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा अभियानों में वृद्धि का उल्लेख किया और कहा कि अल-शबाब प्रशिक्षण ठिकानों और एसेंबली प्वाइंट्स को निशाना बनाने वाले एयर स्ट्राइक की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। गुटेरेस ने कहा कि सोमालिया तीन दशकों के गृह युद्ध, चरमपंथी हमलों और अकाल के बाद एक कार्यशील राज्य बनने की दिशा में प्रगति कर रहा है, लेकिन असुरक्षा, राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार इसकी प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

अक्षयपात्र विवाद: The Hindu की पहले लीपापोती, फिर मामला ‘सलटाने’ का दावा

अक्षयपात्र मामले में The Hindu फिर विरोधाभासी बयानबाजी के ज़रिए अपना गला छुड़ाने की फ़िराक में दिख रहा है। पहले इस्कॉन द्वारा संचालित अक्षयपात्र फाउंडेशन के खिलाफ लगभग आधारहीन आरोप लगाने, फिर प्रबंध संपादिका मालिनी पार्थसारथी और चेयरमैन एन राम के बीच उस रिपोर्ट को लेकर हुई नूराकुश्ती के बाद फिर से अख़बार इस मसले पर दोतरफ़ा बयानबाज़ी को लेकर सामने है। एक तरफ़ अख़बार के आंतरिक ‘लोकपाल’ ने मामले में एन राम का अड़ियल रुख दोहराते हुए गत 10 जून को मामले की अख़बार की कवरेज में कोई खोट मानने से इंकार कर दिया था, दूसरी ओर मालिनी पार्थसारथी ने ट्वीट कर दावा किया है कि अक्षयपात्र फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने उनसे और दैनिक संपादन देखने वाले संपादक सुरेश नंबात से मिल कर मामले का ‘समाधान’ निकाल लिया है। इसके बाद उनके इस ट्वीट को रीट्वीट करते हुए अक्षयपात्र के ट्रस्टी टीवी मोहनदास पई ने उन्हें समाधान के बारे में विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करने का दावा किया है, जिसे अक्षयपात्र के ट्विटर हैंडल से रीट्वीट किया गया है।

हिन्दूफ़ोबिक हिटजॉब के लिए निशाने पर था The Hindu

The Hindu ने 31 मई को एक ‘विस्तृत’ रिपोर्ट छाप कर दावा किया था कि गौड़िया वैष्णव संस्था इस्कॉन द्वारा संचालित हिन्दू एनजीओ अक्षयपात्र फाउंडेशन कर्नाटक के बच्चों को बिना प्याज-लहसुन का खाना परोस कर उनपर ‘अपनी विचारधारा थोप रहा है’, और बच्चे उसका बनाया हुआ खाना खाना ही नहीं चाहते, और इसलिए वह खाना कम खा रहे हैं (और अतः उनका विकास नहीं हो रहा, मिड डे मील स्कीम का औचित्य ही नहीं बच रहा, और यह बच्चों के साथ अन्याय है कि ‘ब्राह्मणवादी, शाकाहारवादी श्रेष्ठताबोध’ का दर्शन उन पर खाने के ज़रिए थोपा जा रहा है)। इस दावे की पुष्टि के लिए महज़ दो-चार बच्चों से ‘बातचीत’ कर निष्कर्ष को ब्रह्मसत्य की तरह पेश कर दिया। इसके अलावा अक्षयपात्र फाउंडेशन के जवाब को भी पूरी तरह प्रकाशित करने की बजाय केवल अपनी मनमर्जी से बनाया हुआ उसका ‘साराँश’ सुना दिया

इसके बाद लोगों ने सोशल मीडिया पर जब The Hindu की भद्द पीटनी शुरू की तो समाचार पत्र में से दो तरह की आवाज़ें आने लगीं। एक ओर प्रबंध संपादिका मालिनी पार्थसारथी ने इसे खराब पत्रकारिता मानते हुए इसका ठीकरा संपादक सुरेश नंबात और रिपोर्ट की लेखिका अर्चना नातन के सर फोड़ दिया। दूसरी ओर समाचार पत्र के चेयरमैन और राफेल मामले में घोटाला साबित करने के लिए संवेदनशील दस्तावेजों की चोरी के बाद फोटोशॉप करने के लिए कुख्यात एन राम ने इन दोनों के बचाव में आ कर विरोध करने वालों को साम्प्रदायिक और कट्टर करार देना शुरू कर दिया

‘आंतरिक लोकपाल’ की रिपोर्ट को हरी झंडी, लेकिन मालिनी का मामले के ‘समाधान’ का दावा?

The Hindu के ‘पाठकों के संपादक’ (Readers Editor) (एक तरह से खबरों के ‘आंतरिक लोकपाल’) ए एस पन्नीरसेल्वन ने अपने कॉलम में अक्षय पात्र पर रिपोर्ट को क्लीन चिट देते हुए कहा कि एक ‘पत्रकारी खोज’ को ‘विचारधारा के प्रिज़्म’ से बदनाम किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर मोहनदास पई के इस कॉलम को ट्वीट कर उसकी आलोचना और उसे लीपापोती बताने पर मालिनी पार्थसारथी का जवाब आया कि अक्षयपात्र फाउंडेशन के प्रतिनिधि उनसे और सुरेश नंबात से The Hindu के कार्यालय में आकर मिले और मामले का ‘समाधान’ हो गया है:

इस पर मोहनदास पई ने जवाबी रीट्वीट कर उनसे ‘समाधान’ के बारे में जानकारी सार्वजानिक करने को कहा, जिसे अक्षय पात्र के ट्विटर हैंडल ने भी रीट्वीट किया।

अगर मालिनी पार्थसारथी का मामले का समाधान हो जाने का दावा सही है तो फाउंडेशन के ट्रस्टी उनसे समाधान की जानकारी सार्वजानिक करने को क्यों कह रहे हैं? और उसे अक्षय पात्र द्वारा रीट्वीट क्यों किया जा रहा है?

हमने इस मामले में संबंधित पक्षों (The Hindu, मालिनी पार्थसारथी, मोहनदास पई, और अक्षयपात्र फाउंडेशन) से संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया, परन्तु यह खबर प्रकाशित किए जाने तक मोहनदास पई से संपर्क स्थापित नहीं हो पाया है, और बाकियों के उत्तर हमारे संपादकीय मंडल को प्राप्त नहीं हुए हैं। उनका उत्तर मिलने पर हम उसे भी प्रकाशित करेंगे।

‘ममता की पुलिस की वजह से मर गया मेरा बेटा, डॉक्टर मदद करना चाहते थे’

पश्चिम बंगाल में चल रही डॉक्टरों की हड़ताल में अपने बेटे को खोने वाले अभिजित मलिक ने आरोप लगाया है कि उनके बेटे की मौत की वजह स्थानीय पुलिस थी, जिसने उन्हें अस्पताल के अंदर नहीं जाने दिया। उन्होंने बताया कि जूनियर डॉक्टर उनके बेटे की मदद करना चाहते थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग को चार बार फ़ोन किया गया था लेकिन फोन किसी ने नहीं उठाया।

चाइल्ड स्पेशलिस्ट की तलाश में भटक रहे थे

अभिजित मलिक ने बताया कि वह सागर दत्ता अस्पताल से रेफर करने के कागज़ लिए-लिए चाइल्ड-स्पेशलिस्ट अस्पताल की तलाश में भटक रहे थे। 11 जून को पैदा हुए उनके नवजात बेटे को साँस लेने में समस्या थी। जब समस्या बहुत बढ़ गई तो 12 को सागर दत्ता अस्पताल के डॉक्टरों ने उन्हें किसी शिशु विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाने की सलाह दी।

अभिजित बताते हैं कि वह अपने बच्चे को कई अस्पतालों में लेकर गए लेकिन हड़ताल के कारण कहीं भी उनके बेटे को भर्ती नहीं किया गया। अंततः इलाज के आभाव में उनके नवजात शिशु ने 13 जून को दम तोड़ दिया। उत्तर परगना में उन्होंने पत्रकारों को यह भी बताया कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग में इस बाबत किया गया फ़ोन भी नहीं उठा।

“आरजी कर मेडिकल, चितरंजन में पुलिस ने हमें घुसने नहीं दिया। मैंने उन्हें बताया कि मेरा बच्चा गंभीर हालत में है, मेरे पास सागर दत्ता कॉलेज से बेहतर इलाज के लिए कहीं और ले जाने के कागज़ात हैं। जूनियर डॉक्टरों ने अपनी ओर से भरसक प्रयास किया, हमारी सहायता करने की पूरी कोशिश की, वह रो रहे थे, लेकिन पुलिस ने हमें अंदर नहीं आने दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को भी चार बार फ़ोन किया लेकिन किसी ने फ़ोन नहीं उठाया।”

दो डॉक्टरों की मॉब लिंचिंग के बाद से हड़ताल

पश्चिम बंगाल में एनआरएस अस्पताल में एक दूसरे मजहब के मरीज की हृदयघात से मृत्यु हो जाने के बाद उसके तीमारदारों द्वारा भीड़ जुटाकर जूनियर डॉक्टरों पर हमला बोल दिया गया था। दो डॉक्टरों को इतनी गंभीर चोटें आईं कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। इसके बाद इसके विरोध में पहले तो एनआरएस के और फिर पूरे प्रदेश में जूनियर डॉक्टर बड़ी तादाद में हड़ताल पर चले गए हैं। डॉक्टरों के अनुसार उनकी बस इतनी माँग है कि ममता बनर्जी हमले के आरोपितों को तुरंत गिरफ़्तार करवाएँ और डॉक्टरों की अस्पताल में सुरक्षा सुनिश्चित करें।

इस हड़ताल के दौरान पश्चिम बंगाल के सरकारी अस्पताल के 700 से ज्यादा डॉक्टरों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। ऐसा उन्होंने हड़ताल कर रहे जूनियर डॉक्टरों के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए किया। इससे पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है।

तुम्हारी क़िस्मत में विंग कमांडर अभिनंदन का जूठा कप ही है, वर्ल्ड कप नहीं: देखें वीडियो

रविवार (16 जून) को ‘ICC वर्ल्ड कप 2019’ का मैच भारत-पाकिस्तान के बीच खेला जाना है। यह मैच मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड में खेला जाना है। जहाँ एक तरफ इस मैच पर दुनिया की नज़रें होंगी, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान अपने विज्ञापनों के ज़रिए भारतीय टीम को नीचा दिखाने की कोई कसर बाक़ी नहीं रख रहा है। इन दिनों सोशल मीडिया पर एक विज्ञापन ख़ूब वायरल हो रहा है, इसमें विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान के डुप्लीकेट को दिखाकर भारतीय टीम पर तंज कसा गया।

इस विज्ञापन में एक मॉडल बात करता दिखता है जिसे भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान का लुक दिया गया था। इस वीडियो में कुछ सवाल पूछे जाते हैं जिसके जवाब में वो मॉडल कहता है, “I am sorry, I am not supposed to tell you this” (मुझे माफ़ कीजिए। मैं आपको इसकी जानकारी नहीं दे सकता।) इस वीडियो में विंग कमांडर की भूमिका निभाने वाला मॉडल ठीक उसी अंदाज़ में चाय पीने का ढोंग करता दिखता है, जैसे एक वीडियो विंग कमांडर वास्तव में चाय पीते नज़र आए थे, जब वो पाकिस्तान में थे। भारत ने इसी वीडियो का मुँहतोड़ जवाब कुछ नए अंदाज़ में दिया है, जो इस समय चर्चा में बना हुआ है:

विज्ञापन के इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि एक नाई की दुकान पर भारतीय टीम के समर्थक को पाकिस्तानी टीम का समर्थक ‘फ़ादर्स डे’ की बधाई देते हुए तोहफे़ में एक रूमाल देता है, और कहता है कि भारतीय टीम के हारने के बाद आपको मुँह छिपाने के काम आएगा और कहता है कि ये खेल बड़ा ज़ालिम है, एक ही दिन में बेटा, बाप बन जाता है। ये तंज भारतीय टीम के समर्थकों के लिए किया गया था।

इसके बाद पाक समर्थक नाई को इशारा करता है कि वो अफ़रीदी के स्टाइल में उसकी दाढ़ी बना दे। लेकिन, नाई और भारतीय समर्थक के बीच आँखों ही आँखों में कुछ ऐसा इशारा होता है, जिसका परिणाम यह निकलकर सामने आता है कि पाक समर्थक की दाढ़ी विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान के स्टाइल में बना देता है।

इसके बाद भारतीय टीम का समर्थक अपना दाँव चलता है और तोहफ़े में मिले उसी रूमाल को पाक समर्थक की ओर बढ़ाकर कहता है कि लो यह रुमाल मुँह छिपाने के काम आ जाएगा। साथ ही कटाक्ष भी करता है कि बड़ा ही मज़ेदार है यह खेल और सिर्फ़ एक दिन लगता है बाप को बेटे को समझाने में। इतना ही नहीं, भारतीय समर्थक ने पाक पर निशाना साधते हुए यहाँ तक कहा कि तुम्हारी क़िस्मत में विंग कमांडर अभिनंदन का जूठा कप ही है, वर्ल्ड कप नहीं।

यहाँ हिंदी पर बवाल है वहाँ नेपाल के स्कूलों में चीनी भाषा पढ़ाना अनिवार्य, चीनी सरकार दे रही सैलरी

नेपाल के कई स्कूलों में छात्रों के लिए चीनी भाषा मेंडारिन सीखना अनिवार्य कर दिया गया है। खबर के मुताबिक, चीनी सरकार ने नेपाल सरकार से कहा है बच्चों को मेंडारिन सिखाने वाले शिक्षकों को चीनी सरकार वेतन देगी। नेपाल के 10 बड़े स्कूलों के प्राचार्य और स्टाफ ने बताया कि चीनी भाषा पहले ही अनिवार्य विषय के रूप में शामिल। इसके शिक्षकों की सैलरी काठमांडू में चीनी दूतावास से दी जाती है। एलआरआई स्कूल के फाउंडर शिवराज पंत ने कहा कि पोखरा, धुलीखेल और देश के कुछ अन्य हिस्सों में कई निजी स्कूलों में भी चीनी भाषा को विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है।

सरकारी पाठ्यक्रम विभाग के सूचना अधिकारी गणेश प्रसाद भट्टारी ने इस बारे में बात करते हुए कहा, ‘‘स्कूलों को विदेशी भाषा पढ़ाने की अनुमति है। मगर वे किसी भी विषय को विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य नहीं कर सकते हैं। यदि कोई विषय अनिवार्य करना भी है तो इसका निर्णय सरकार करती है। यह अधिकार स्कूलों के पास नहीं है।’’

वहीं, युनाइटेड स्कूल के प्राचार्य कुलदीप नुपेन ने बताया कि उन्होंने 2 साल पहले ही मेंडारिन को अनिवार्य विषय के तौर पर लागू कर दिया था। इसके लिए चीनी दूतावास ने मुफ्त में शिक्षक मुहैया कराए जाने की बात कही थी। नेपाल में स्कूलों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने का जिम्मा सरकार के पाठ्यक्रम विकास केंद्र के पास है। स्कूल में चीनी भाषा पढ़ाए जाने की जानकारी उनके पास है। मगर उन्होंने मुफ्त में मिल रहे मेंडारिन शिक्षकों को देखते हुए इस भाषा को अनिवार्य कर दिया।

शुवातारा स्कूल के प्राचार्य ख्याम नाथ तिमसिना ने एएनआई से बात करते हुए कहा कि उनका मानना है कि बच्चों को अपनी पसंद बताने की अनुमति मिलनी चाहिए और यदि कोई जापानी या जर्मन पढ़ाना चाहे, तो वो उनका भी स्वागत करेंगे। इसके साथ ही एपेक्स लाइफ स्कूल के प्राचार्य हरि दहल ने बताया कि वो चीनी शिक्षकों को सिर्फ उनके आने-जाने और भोजन का भत्ता देते हैं।

कॉन्ग्रेस ने सोशल मीडिया पोस्ट के कारण युवक को किया गिरफ्तार, पत्रकार से जवाब-तलब, योगी को घेरने वाले यहाँ मौन

छत्तीसगढ़ में कॉन्ग्रेस सरकार ने हाल ही में सोशल मीडिया पोस्ट पर एक वीडियो शेयर करने के मामले में मांगीलाल अग्रवाल नाम के व्यक्ति को गिरफ्तार किया था। मांगीलाल द्वारा शेयर की गई वीडियो में दावा किया गया था कि भूपेश भगेल की सरकार का इंवर्टर बनाने वाली कंपनियों से साँठ-गाँठ ही छत्तीसगढ़ में बिजली जाने का मुख्य कारण हैं।

इस वीडियो से भूपेश सरकार इतनी आहत हुई कि अग्रवाल के ऊपर उन्होंने राजद्रोह का मुकदमा दायर किया। इस मामले के मद्देनजर मानक गुप्ता नाम के पत्रकार ने एक ट्वीट किया था। जिसमें पत्रकार ने कहा था कि मांगीलाल की गिरफ्तारी के बाद हुए विरोध के कारण सरकार ने उनके ऊपर से राजद्रोह की धारा हटा ली है, लेकिन फिर भी उन्हें अब भी हिरासत में रखा गया है।

मानक गुप्ता के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

इस ट्वीट के बाद मानक ने मांगीलाल की रिहाई की माँग करते हुए, छत्तीसगढ़ में कटती बिजली के बारे में लिखा, “चिलचिलाती गर्मी में आपकी सरकार बिजली काटे और आम आदमी कराह भी नहीं सकता।”

आम आदमी के नजरिए से देखें तो पत्रकार मानक का ये पोस्ट बेहद आम था। लेकिन उनके इस पोस्ट ने छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस को इतनी ठेस पहुँचाई कि उन्होंने मानक के ट्वीट को टारगेट करते हुए न्यूज 24 से अपने ट्वीट में कुछ सवाल कर डाले। छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस ने न्यूज 24 को टैग करते हुए सवाल किया कि वह तत्काल स्पष्ट करें कि उनके एंकर @manakgupta द्वारा फैलाए जा रहे झूठ पर चैनल का क्या रुख है? अपने ट्वीट में छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस ने संस्थान से ये भी सवाल पूछा कि क्या यह चैनल का विचार है या एंकर का निजी विचार?

अब ऐसे मे हैरान करने वाली बात ये है कि जो कॉन्ग्रेस सरकार कुछ दिन पहले तक सीएम योगी पर टिप्पणी करने पर गिरफ्तार हुए पत्रकार की गिरफ्तारी का विरोध कर रही थी, वो आज खुद पर उँगली उठने पर इतना क्यों बौखला गई है? क्यों सिर्फ़ एक पोस्ट शेयर करने पर एक व्यक्ति पर न केवल राजद्रोह का मुकदमा लगा दिया गया बल्कि उस व्यक्ति के समर्थन में उठी पत्रकार की आवाज को भी दबाने के लिए संस्थान को टैग करके उनकी टिप्पणी पर जवाब माँगा गया। अभिव्यक्ति की आजादी का तर्क देकर जो लोग न जाने कितनी देश विरोधी आवाजों को वाजिब ठहरा चुके हैं, वे अपनी सत्ता शासित प्रदेश में क्यों लोगों की आवाजों को गला घोंटकर, ट्रोल करके या उन्हें गिरफ्तार कर चुप करना चाहते हैं?

घमंडी, फासीवादी, सांप्रदायिक, स्वेच्छाचारी, हिंसक, असंवैधानिक, तानाशाह, भ्रष्ट, अलगाववादी: यही हैं ममता

ममता बनर्जी चक्रवात फोनी के प्रदेश की दहलीज पर होने के बाद भी देश के प्रधानमंत्री का फ़ोन नहीं उठातीं, प्रदेश के डॉक्टरों के हड़ताल में जलने के बाद भी राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी के फ़ोन का जवाब नहीं देतीं। क्या यह उनका घमंडी होना नहीं है?

अपने काफ़िले से निकल कर लोगों के सामान्य से अभिवादन ‘जय श्री राम‘ पर भड़क उठतीं हैं। डॉक्टरों को चार घंटे में हड़ताल खत्म कर न लौटने की सूरत में वह ‘परिणाम भुगतने’ की चेतावनी देतीं हैं। क्या यह फ़ासीवादी होने की निशानी नहीं है?

हिन्दुओं के साथ नकारात्मक और समुदाय विशेष के साथ ममता बनर्जी सकारात्मक भेदभाव करतीं हैं। इंद्रधनुष के लिए बंगाली शब्द ‘रामधोनु’ को वह किताबों में ‘रोंगधोनु’ करवा देतीं हैं, और मुहर्रम के दिन दुर्गा पूजा के मूर्ति विसर्जन में बाधा उत्पन्न करतीं हैं। क्या यह सांप्रदायिक होना नहीं दिखाता है?

विपक्ष के कद्दावर नेताओं, योगी आदित्यनाथ से लेकर अमित शाह तक को वह बंगाल में कदम तक रखने से रोकने की कोशिश करतीं हैं। भाजपा के पोस्टर फड़वा देतीं हैं, और उनके रिश्तेदारों को हवाई अड्डे पर रोकने की हिमाकत करने वाले पुलिस वालों पर कार्रवाई करतीं हैं। ऐसा करने वाला शासक स्वेच्छाचारी हुआ या नहीं?

पश्चिम बंगाल की सड़कों पर विरोधियों की खुलेआम, बेधड़क ‘लिंचिंग’ होती है। हिंसा इतनी ज्यादा है कि एक-तिहाई से ज्यादा पंचायती सीटों पर तृणमूल के प्रत्याशियों के खिलाफ कोई खड़ा ही नहीं होता। क्या यह इस बात का सबूत नहीं कि ममता बनर्जी की राजनीति हिंसक है?

लोगों को मीम के लिए जेल भेजा जा रहा है, प्रोफेसरों पर मंदिर में (वह भी प्रदेश के बाहर) पूजा करती अपनी माँ की तस्वीर डालने पर साम्प्रदायिक हिंसा का मामला दर्ज हो रहा है। अगर ममता बनर्जी असंवैधानिक और लोकतंत्र-विरोधी न होतीं तो वह ऐसा क्यों करतीं?

इसमें कोई दोराय नहीं हो सकती कि बंगाल में ममता का शासन तानाशाह का है। नौकरशाही उनके पैरों तले है, पुलिस उनके राजनीतिक बलप्रयोग का ही विस्तार है, और उसे वह बदले में केंद्रीय जाँच एजेंसियों से भी महफूज़ रखतीं हैं। डॉक्टरों की हड़ताल का इस हद तक खिंचना उनकी तानाशाही का ही एक और उदाहरण है।

नारदा, सारधा, रोज़ वैली के घोटाले में उनका नाम आता है। भ्रष्टाचार ने उनकी पार्टी को लील लिया है। यह ममता के भ्रष्ट होने का नाकाफ़ी सबूत है?

पश्चिम बंगाल में जिहादियों और दहशतगर्दो के नेटवर्क फल-फूल रहे हैं। जमात-उल-मुजाहिदीन ने राज्य में जड़ें जमा लीं हैं। वर्धमान जैसे जिलों के मदरसे कट्टरपंथ पढ़ा रहे हैं। इस्लामिक स्टेट से जुड़े संगठन ने बंगाल के लिए बाकायदा ‘अमीर’ नियुक्त किया है, जो बंगाल में जिहाद करेगा और नए लोगों की भर्ती देखेगा। ममता बनर्जी में और एक अलगाववादी में क्या अंतर है?

अब इन सारे ‘बोल्ड’ में लिखे गए विशेषणों को इकठ्ठा करिए: घमंडी, फासीवादी, सांप्रदायिक, स्वेच्छाचारी, हिंसक, असंवैधानिक, लोकतंत्र-विरोधी, तानाशाह, भ्रष्ट, अलगाववादी- यह सारे शब्द ज़रा याद करिए आखिरी बार किस इंसान के लिए सुने थे! नरेंद्र मोदी। और मेरी चुनौती है कि लुटियंस मीडिया के ममता बनर्जी को इनमें से एक भी शब्द कहने का एक भी उदाहरण मुझे दिखा दिया जाए।

इकोसिस्टम क्या है? इकोसिस्टम सत्तासीन सरकार नहीं होता। इकोसिस्टम राजनीतिज्ञों, मीडिया, बुद्धिजीवियों, वकीलों, नौकरशाहों, संस्थानों के अध्यक्षों, सांस्कृतिक ‘नवाबों’ आदि का झुण्ड होता है, जो एक ही एजेंडा चलाने के लिए इकट्ठे होते हैं।

राजनीतिज्ञों (राहुल गाँधी, महबूबा मुफ़्ती, उमर अब्दुल्ला, अखिलेश यादव, मायावती आदि), पत्रकारों (शेखर गुप्ता, राजदीप सरदेसाई, सागरिका घोष, बरखा दत्त आदि), वकील (प्रशांत भूषण आदि), बौद्धिक (राम चंद्र गुहा, फैज़ान मुस्तफा, राजमोहन गाँधी इत्यादि), संस्थानिक अध्यक्ष (पूर्व चुनाव आयुक्त, पुलिस आयुक्त, कॉलम लिखने वाले पूर्व मुख्य न्यायाधीश), सांस्कृतिक ‘नवाब’ (जावेद अख्तर, कमल हासन आदि) की ट्विटर टाइमलाइन देखिए। देखिए कि उन्होंने ममता पर कभी साम्प्रदायिक, स्वेच्छाचारी, भ्रष्ट होने या लिंचिंग को बढ़ावा देने का आरोप लगाया हो। ऐसा कैसे है कि ममता बनर्जी के बारे में इन लोगों की राय उसके बिलकुल विपरीत है, जो ममता के बारे में देश के लगभग हर तबके में आमराय होगी?

यह इकोसिस्टम सवालों से बचने के लिए पलट कर प्रतिप्रश्न के बहाने कुतर्क (whataboutery) में उस्ताद है। बंगाल की हर हिंसा में तृणमूल के साथ बराबर का भागीदार भाजपा को बना देता है। सांप्रदायिकता में भी यही रवैया अपनाता है।

लेकिन इस बार इकोसिस्टम फँस गया है। डॉक्टरों का आक्रोश भाजपा के माथे नहीं मढ़ा जा सकता। राज्य की आम जनता ही ममता के खिलाफ उतर आई है। भाजपा और संघ के खिलाफ सांप्रदायिकता और लिंचिंग के नाम पर चाहे जितना प्रोपेगैंडा कर लिया जाए, आप लाखों लोगों का आक्रोश कैसे झेलोगे? हाल ही में हुए लोकसभा निर्वाचन में वह आम जनता ही थी जो इकोसिस्टम के खिलाफ उठ खड़ी हुई और उसे आईना दिखा दिया। और एक बार फिर यह आम जनता ही है जो इस गिरोह को बेपर्दा कर रही है।

जैसा कि एक कहावत में कहा गया है, कुछ लोगों को हर समय बेवकूफ बनाया जा सकता है, लेकिन सभी लोगों को हर समय बेवकूफ़ नहीं बनाया जा सकता।

(आशीष शुक्ला के मूल लेख का हिंदी में अनुवाद किया है मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने)