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योगेंद्र यादव का दावा: अबकी बार 272 पार, आएगा तो मोदी ही

लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम को लेकर एक कौतूहल का माहौल होना लाज़मी है। उसके पीछे वजह यही है कि हर कोई यह जानना चाहता है कि देश में आख़िर सरकार किसकी बनेगी। कई लोगों ने तो अभी से यह दावा करना शुरू कर दिया है कि 2019 में पीएम मोदी ही वापसी करेंगे और जनता-जनार्दन उन्हीं के हाथों देश की बागडोर सौंपेगी।

इधर, आम आदमी पार्टी छोड़कर स्वराज इंडिया पार्टी की नींव रखने वाले योगेन्द्र यादव ने एक वेबसाइट को बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में वापसी के तीन रास्ते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि 6 महीने पहले उन्होंने संकेत दिया था कि बीजेपी को 100 सीटों का घाटा हो सकता है। लेकिन, बालाकोट एयरस्ट्राइक का बाद स्थिति बदल गई है। आज की स्थिति में अब बीजेपी बढ़त की ओर आगे बढ़ गई है। योगेंद्र यादव ने NDA को 272 सीटों का आंकड़ा पार करने का संकेत दिया।

इससे पहले योगेंद्र यादव ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय भी नतीजों को लेकर कहा था कि आम आदमी पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगभग 40 सीटें जीतेगी और हो सकता है कि यह 50 का आँकड़ा भी पार कर जाए। इसके बाद जो परिणाम सामने आया वो वास्तव में चौंकाने वाला था। आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीत कर सरकार बनाई थी।

Exit Poll: लोकसभा चुनाव 2014 में सिर्फ एक का ही तुक्का लगा था, बाकी हुए थे फिसड्डी

देश में किसकी सरकार बनेगी और किसकी नहीं, ये सवाल तब तक उत्सुकता बनाए रखता है जब तक इसकी तस्वीर पूरी तरह से साफ़ नहीं हो जाती। सभी चरणों में मतदान की प्रक्रिया सम्पन्न होने के बाद एग्जिट पोल के आँकड़े सामने आने शुरू हो जाते हैं। हालाँकि, एग्जिट पोल के आँकड़ों पर बहुत अधिक भरोसा तो नहीं किया जा सकता क्योंकि यह अधिकांश बार ग़लत साबित हो जाते हैं। इस लेख में हम लोकसभा चुनाव 2014 और 2009 के एग्जिट पोल के बारे में बात करेंगे और यह जानने का प्रयास करेंगे कि उस समय जिन एजेंसियों ने एग्जिट पोल के जो आँकड़े पेश किए थे, वो कितने सटीक और कितने ग़लत सिद्ध हुए थे।

क्या होता है एग्जिट पोल

एग्जिट पोल की प्रक्रिया चुनावी सर्वे से होकर गुजरती है। चुनावी सर्वे के तहत चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों को लेकर मतदाताओं से बातचीत की जाती है और अनुमान लगाया जाता है कि आख़िर चुनाव परिणाम किस दल के पक्ष में जा सकता है। इसकी सैंपलिंग के लिए चुनावी सर्वे करने वाली एजेंसी के लोग मतदाताओं से उनकी राय लेते हैं और उनसे विकास से जुड़ी बातचीत करते हैं। कई बार बातचीत का यह डाटा एक प्रकार के फॉर्म को भरवाकर भी इकट्ठा किया जाता है। इसमें उम्र, आयु वर्ग, जाति, क्षेत्र आदि का उल्लेख होता है। इस सर्वे के लिए क्षेत्र के आधार पर लोगों की संख्या तय की जाती है और उनसे राय ली जाती है। एग्जिट पोल के आँकड़ें हमेशा आखिरी चरण के मतदान के बाद दिखाए जाते हैं – यह चुनाव आयोग के द्वारा दिया गया स्पष्ट दिशा-निर्देश है।

लोकसभा चुनाव 2014: एग्जिट पोल

2014 के लोकसभा चुनाव के एग्जिट पोल को समझने के लिए नीचे दी गई टेबल पर नज़र डालते हैं।

2014न्यूज़ 24(टुडे चाणक्य) टाइम्स नाउ(ORG)CNN IBN(CSDS)हेडलाइंस टुडे(ITG सिसरो)इंडिया टीवी (सी वोटर)NDTVABP(नील्सन)कुल सीटें
NDA340 (+/-14)249270-282272 (+/-11)289279281336

UPA
070 (+/-9)14892-102115 (+/-5)101103097059

इस टेबल के अनुसार देखा और समझा जा सकता है कि टुडे चाणक्य के अलावा किसी भी एजेंसी का एग्जिट पोल सटीक नहीं था। इसलिए एग्जिट पोल को लेकर मीडिया के साथ-साथ जनता की उत्सुकता तो रहती है लेकिन यह उम्मीदों पर भी खरी उतरे, इसकी संभावना नहीं के बराबर मान के चलनी चाहिए।

लोकसभा चुनाव 2009: एग्जिट पोल

अब लोकसभा चुनाव 2009 के एग्जिट पोल पर भी नज़र डालते हैं और समझते हैं कि क्या उस समय भी यही स्थिति थी जो साल 2014 में थी।

2009ABPटाइम्स नाउNDTVहेडलाइंस टुडेकुल सीटें
NDA197183177180160
UPA199198216191262

देश में दो बार सम्पन्न हुए लोकसभा चुनाव के एग्जिट पोल पर नज़र डालने के बाद यह पता चलता है कि विभिन्न एजेंसियों द्वारा जुटाए गए आँकड़ें एकदम सटीक नहीं होते। इनमें से कुछ आँकड़ें तो बिल्कुल ही ग़लत साबित हो जाते हैं। चुनाव प्रक्रिया सम्पन्न होने के बाद जहाँ एक तरफ़ जनता की नज़र टीवी पर दिखाए जा रहे एग्जिट पोल के गुणा-गणित पर रहती है, वहीं दूसरी तरफ़ राजनीतिक दलों के बीच भी इन आँकड़ों को लेकर काफ़ी हलचल बनी रहती है।

कॉन्ग्रेस विधायक की गाड़ी ने बाइक को मारी टक्कड़, 3 वर्षीय बच्ची की मौत, माता-पिता अस्पताल में भर्ती

तेलंगाना से एक बहुत ही दुःखद ख़बर आई है। राज्य के कॉन्ग्रेस विधायक की गाड़ी द्वारा बाइक को टक्कर मारने के कारण न सिर्फ़ एक तीन वर्षीय बच्ची की मृत्यु हो गई बल्कि उसके माता-पिता भी गंभीर रूप में घायल हो गए। ये घटना मुलुगु ज़िले के जीडीवागु इलाक़े की है। कॉन्ग्रेस विधायक दनसरी अनुसूया उर्फ़ सीताक्का की गाड़ी ने एक बाइक को टक्कर मार दी। दोनों ही गाड़ियाँ अपोजिट दिशा से आ रही थी, जिसके बाद उनमें टक्कर हुई। बाइक को के. अरुण नामक व्यक्ति चला रहे थे। उनके साथ उनकी पत्नी विजया और 3 साल की बेटी श्रवंती उनके साथ बाइक पर उपस्थित थे।

बच्ची श्रवंती की सिर में गंभीर चोट लगने के कारण मृत्य हो गई, वहीं उसके माता-पिता गंभीर रूप से घायल होकर नज़दीकी सरकारी अस्पताल में भर्ती हैं। बच्ची को उसके माता-पिता नज़दीकी आँगनबाड़ी केंद्र में दाखिल कराने जा रहे थे। विधायक ने बाद में डैमेज कण्ट्रोल करने के लिए बच्ची के माता-पिता से मिलकर अफ़सोस ज़ाहिर किया और वित्तीय मदद देने का आश्वासन भी दिया। विधायक ने कहा, “यह एक बहुत ही दुःखद दुर्घटना है, जहाँ एक बच्ची को इसका शिकार बनना पड़ा। दुःख की इस घड़ी में मैं उसके माता-पिता के साथ खड़ी हूँ।

इधर मुलुगु पुलिस ने धारा 304A के तहत मामला दर्ज कर लिया है। इसके अलावा धारा 337 के तहत भी मामला दर्ज किया गया है। पुलिस के अनुसार, विधायक की गाड़ी को ज़ब्त कर लिया गया है और आगे की कार्रवाई के लिए जाँच की जा रही है।

अगस्त 2018 में भी इसी तरह की घटना हुई थी, जब कन्दुकुर के विधायक पोथुला रामाराव की गाड़ी से टकरा कर 2 लोगों की मौत हो गई थी। ये दुर्घटना विजयवाड़ा एयरपोर्ट के नज़दीक स्थित केसरपल्ली जंक्शन पर हुई थी। विधायक की गाड़ियों द्वारा आंध्र और तेलंगाना में इस तरह की दुर्घटनाओं में तेज़ी आना अच्छा संकेत नहीं है। कुछ महीनों पहले तेलुगु सुपरस्टार जूनियर एनटीआर के पिता और पूर्व मंत्री नंदामुरी हरिकृष्णा की भी एक कार दुर्घटना के दौरान मृत्यु हो गई थी। दुर्घटना के समय उनकी कार काफ़ी तेज़ गति से जा रही थी।

प्रचार के लिए ब्लाउज़ सिलवाई, 20 साड़ियाँ खरीदी, ताकि बड़े मुद्दों पर बात कर सकूँ: स्वरा भास्कर

लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण के मतदान जारी हैं। इस लोकसभा चुनाव में कुछ लोकसभा सीटें विशेष चर्चा का विषय बनी रहीं। इन्हीं में से एक थी बिहार से बेगूसराय लोकसभा सीट। बेगूसराय में इस बार कुछ ऐसे चेहरे देखने को मिले, जिनके दिलों में देश के टुकड़े-टुकड़े होता देखने के ख्वाब और जुबान पर ‘क्रांति’ है।

बेगूसराय में इस बार टुकड़े-टुकड़े गैंग के कामरेड कन्हैया कुमार भी राजनीति में अपना भाग्य आजमा रहे हैं। उनके इस सपने को साकार करने में उनका साथ देने स्वरा भास्कर भी पहुँची थी।

अप्रैल 29 को चौथे चरण के चुनाव में बेगूसराय से निपटने के बाद ‘वीरे दी वेडिंग’ फिल्म के एक ‘सीन विशेष’ के कारण चर्चा का विषय बनी कम्युनिस्ट प्रचारक और पार्ट टाइम बॉलीवुड एक्ट्रेस स्वरा भास्कर को आज टाइम्स ऑफ़ इंडिया को एक इंटरव्यू में खुलकर अपने मन की बात करते हुए देखा गया। स्वरा भास्कर ने इस इंटरव्यू में यह भी दावा किया कि उन्होंने चुनाव प्रचार के लिए 20 साड़ियाँ खरीदीं।

‘जूलरी खरीदी ताकि बड़े मुद्दों पर बात करने वाली नजर आऊँ’

इंटरव्यू के दौरान स्वरा भास्कर ने स्वीकार करते हुए बताया कि उन्हें प्रचार के लिए बुलाया गया क्योंकि वो हीरोइन हैं और इस वजह से ही उन्हें एक इमेज बनाना आवश्यक था। इसी छवि को बनाने के लिए उन्होंने 20 साड़ियाँ खरीदीं और और कुछ जूलरी खरीदी ताकि ‘बड़े मुद्दों पर’ बात की जा सके।

स्वरा भास्कर ने कहा, “मुझे मालूम था कि लोग मुझे इसलिए बुला रहे हैं क्योंकि मैं हीरोइन हूँ। जैसे ही मुझे पता चला कि मैं प्रचार करुँगी, मैंने जाकर तुरंत 20 साड़ियाँ खरीद ली और अपना वॉर्डरोब मेंटेन कर लिया। मैंने ब्लाउज़ सिलवा लिए, जूलरी ले ली, लुक ठीक किया। मैं सुबह उठकर अपने बालों  को सुखाया करती थी मेकअप करती थी, और एअररिंग्स पहनती थी। मुझे पता था कि मीडिया वाले मेरी फोटो और इंटरव्यू लेने आएँगे, जिससे कि मैं आवश्यक मुद्दों पर बात कर सकूँ।”

टाइम्स ऑफ़ इंडिया पर स्वरा जी के बयान का स्क्रीनशॉट

फिल्म इंडस्ट्री के राजनीतिकरण पर स्वरा भास्कर ने कहा, “फिल्म इंडस्ट्री का पहले से ही राजनीतिकरण किया जा चुका है। FTII, सेंसर बोर्ड में होने वाली नियुक्तियों को ही देख लीजिए और जिस प्रकार से राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाते हैं।  हर सरकार अपने लोगों को संसथान में बिठाती है।”

स्वरा भास्कर की मम्मी इरा भास्कर UPA के दौरान थी सेंसर बोर्ड की सदस्य

बता दें कि स्वरा भास्कर कि मम्मी इरा भास्कर, जो कि JNU में सिनेमा स्टडीज की प्रोफेसर हैं, UPA सरकार के दौरान सेंसर बोर्ड की सदस्य हुआ करती थी और जनवरी 2015 में CBFC प्रमुख लीना सैमसन के इस्तीफे के बाद उन्होंने यह सदस्यता त्याग दी थी। उन पर कॉन्ग्रेस चाटुकार होने के भी आरोप लगे थे।

‘मैं ‘विचारक कलाकार’ हूँ’

स्वरा भास्कर ने अपने इंटरव्यू में आगे बताया कि वो एक ‘विचारक कलाकार’ हैं और इस वजह से वो अपने कैंडिडेट का पक्ष मजबूत करने में समर्थ हैं। इसके बाद स्वरा भास्कर ने वीरे दी वेडिंग फिल्म के अपने उस मशहूर सीन पर चर्चा की, जिसके कारण उन्हें एक अलग पहचान मिली थी। स्वरा ने कहा कि उस सीन को चुनाव प्रचार में उतारा गया जो कि सेक्सिज़्म का उदाहरण है और वो इससे थोड़ा ‘हर्ट’ भी हुईं।

हास्यास्पद बात ये है कि सेक्सिज़्म की बात कहने वाली स्वरा भास्कर, अपनी सहकर्मी को ‘सौ टका टंच माल’ कहने वाले कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह को भी समर्थन दे चुकी  हैं।

EXIT Poll: इंतजार होगा खत्म, इन 8 जगहों से मिलेगी पूरी जानकारी

लोकसभा चुनाव-2019 रविवार (मई 19) को सातवें चरण के मतदान के साथ 6 बजे तक सम्पन्न हो जाएगा। सातवें-चरण के मतदान में 7 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 543 में से शेष 59 निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं।

अभी से लोग मतदान के शाम 6 बजे के आसपास समाप्त होने का इंतज़ार कर रहे हैं। तमाम मीडिया ग्रुप एग्जिट पोल की तैयारी कर चुके हैं, सबका दावा है कि सबसे सही एग्जिट पोल उन्हीं का है। वैसे देखा जाए तो आज तक कभी भी किसी का एग्जिट पोल पूरी तरह से सही नहीं (एकाध मौकों को छोड़कर) हुआ है। आपको 2014 का एग्जिट पोल भी याद होगा, तब भी एक को छोड़ बाकी सभी बहुत बड़े पैमाने पर गलत साबित हुए थे, खैर इस बार भी, News18-IPSOS, India Today-Axis, Times Now-CNX, NewsX-Neta, Republic Bharat-Jan Ki Baat, Republic-CVoter, ABP-CSDS और Today’s Chanakya आज अपना-अपना एग्जिट पोल जारी करेंगे। 23 मई को चुनाव आयोग द्वारा अंतिम परिणाम घोषित किए जाने से पहले और 19 मई (रविवार) शाम 6 बजे के बाद से सब की अपनी-अपनी भविष्यवाणियाँ जारी होंगी। इस बार किसका एग्जिट पोल सही है, है तो कितना और किसका अंतिम परिणाम से बहुत दूर रहा, इसका पता भी 23 को काउंटिग के बाद ही चलेगा।

क्या होता है एक्जिट पोल

एग्जिट पोल मतदान केंद्रों से बाहर निकलने के तुरंत बाद मतदाताओं के सर्वेक्षण पर आधारित होता है। आमतौर पर, समाचार पत्रों और TV चैनलों के लिए काम करने वाली निजी सर्वेक्षण फर्म या संस्थाएँ मतदाताओं से पूछती हैं कि उन्होंने वास्तव में किसे वोट दिया और यह मानते हुए कि उन्हें सही उत्तर मिले हैं, वे परिणाम के रुझान की भविष्यवाणी करते हैं। एग्जिट पोल पर आधारित चुनावी भविष्यवाणियों ने पिछले एक दशक में टेलीविजन की पहुँच को भारत में डिजिटल समाचार पोर्टलों के बढ़ने के साथ काफी बढ़ा दिया है। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ऐसे एग्जिट पोल अक्सर फेल होते हैं, जिसकी बड़ी वजह है सैंपल साइज का छोटा होना और दूसरा जिनसे पूछा गया – उन्होंने कितना सही जवाब दिया। उदाहरण के लिए, 2014 में टुडे चाणक्य ने एनडीए के लिए 340 सीटें और भाजपा के लिए 291 का अनुमान लगाया था, जो लगभग सही परिणाम के करीब थे। इसके अलावा अन्य सभी एग्जिट पोल एकदम गलत साबित हुए थे।

यह जानना जरूरी है कि एग्जिट पोल पर चुनाव आयोग बेहद सख्त है। लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के आधे घंटे बाद, अर्थात 19 मई को एग्जिट पोल का प्रसारण शाम 6 बजे के आसपास किया जा सकता है। चुनाव आयोग के द्वारा पहली बार, 2019 के लोकसभा चुनावों में, वेबसाइटों और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को भी कवर किया गया है। चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों में यह स्पष्ट है कि टीवी, रेडियो चैनल, केबल नेटवर्क, वेबसाइट या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रत्येक चरण के मतदान से पहले के 48 घंटे की अवधि के दौरान उनके द्वारा प्रसारित किए जाने वाले कार्यक्रमों की सामग्री में किसी भी पार्टी या उम्मीदवार की जीत की संभावना को बढ़ावा देने या कम करने के रूप में कोई भी विचार या अपील संबंधी सामग्री प्रसारित नहीं की जा सकती है।

खैर, कुछ ही घंटों में एग्जिट पोल आने वाले हैं, इसके बाद 23 मई तक तरह-तरह के एनालिसिस किए जाएँगे, कौन कितना सही या गलत है इसका पता तो अंतिम परिणाम के साथ ही चलेगा।

इमरान, तुफ़ैल, रमज़ान और निज़ामुद्दीन द्वारा ज़िंदा जलाए गए युवक की मौत, प्रशासन मुस्तैद

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में बीते मंगलवार की देर रात कोतवाली देहात क्षेत्र में इमरान, तुफ़ैल, रमज़ान और निज़ामुद्दीनमें द्वारा जिंदा जलाने के कारण बुरी तरह से झुलसे युवक की रविवार को लखनऊ में मौत हो गई है। युवक विष्णु गोस्वामी की मौत की सूचना मिलते ही खोरहंसा गाँव में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है। इलाक़े में घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए एहतियातन पुलिस अधिकारी कैम्प कर रहे हैं।

बता दें कि लखनऊ में गोंडा के चिस्तीपुर गाँव में एक व्यक्ति को आग लगाकर जान से मारने की कोशिश करने वाले चार अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर उनके ख़िलाफ मामला दर्ज कर लिया गया था। पुलिस ने इस मामले में इमरान, तुफ़ैल, रमजान उर्फ़ मास्टर व निज़ामुद्दीन के ख़िलाफ़ जानलेवा हमले समेत कई धाराओं के तहत रिपोर्ट दर्ज की थी। बाद में इनकी गिरफ़्तारी भी हुई।

ख़बर के अनुसार, पुलिस ऑफ़िसर जितेन्द्र दूबे ने बताया कि विष्णु कुमार गोस्वामी अपने पिता रामदी गोस्वामी को बुलाने के लिए जमुनिया बाग बाज़ार गए थे। वापसी के दौरान दोनों पिता-पुत्र गोंडा-अयोध्या राजमार्ग पर स्थित क़स्बे में सड़क किनारे लगे नल पर पानी पीने लगे। इसी दौरान किसी बात को लेकर पिता-पुत्र की बहस इन्हीं चारों लोगों से हो गई। आपसी बहस इतनी बढ़ गई कि नौबत मारपीट तक आ पहुँची।

विवाद बढ़ता देख विष्णु गोस्वामी ने पिता को अलग छोड़ दिया और ख़ुद चारों से उलझ गया। इस बीच इमरान, तुफ़ैल, रमजान उर्फ़ मास्टर व निज़ामुद्दीन में से किसी एक ने पास खड़े टैंकर से पेट्रोल निकाला और विष्णु पर डालकर उसे आग के हवाले कर दिया। इस जानलेवा हमले में वो काफ़ी अधिक झुलस गया। इसके बाद उसे गंभीर हालत में ज़िले के अस्पताल में भर्ती किया गया। इसके बाद पुलिस की सुरक्षा में विष्णु को लखनऊ भेज दिया गया है।

बता दें कि यह आपसी विवाद दो समुदायों के बीच हुआ था, ऐसे में यह घटना साम्प्रदायिक हिंसा का सबब ना बन जाए, इसलिए क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल के साथ-साथ पीएसी की भी तैनाती की गई है।

विष्णु के बयान के आधार पर पुलिस अधीक्षक आरपी सिंह ने घटना स्थल पर पहुँचकर चारों आरोपितों की गिरफ़्तारी के लिए चार टीमें गठित की और उनकी गिरफ़्तारी के निर्देश जारी किए। गिरफ़्तारी के निर्देश जारी होने के बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और साथ ही उस टैंकर को भी बरामद कर लिया जिससे पेट्रोल निकाला गया था।

फ़िलहाल, विष्णु गोस्वामी का ईलाज लखनऊ के केजीएमयू अस्पताल में चल रहा था, जहाँ अभी भी उनकी हालत नाज़ुक बनी हुई थी। बुधवार को नगर मजिस्ट्रेट आलमबाग ने अस्पताल में पहुँचकर उनका बयान दर्ज किया था। अपने बयान में विष्णु ने बताया था कि वो अपने पिता को बुलाने गया था, तभी किसी बात को लेकर उसकी बहस इन चारों से हो गई। आपसी बहस इतनी बढ़ गई कि उस पर पेट्रोल छिड़ककर उसे मारने की मंशा से आग लगा दी।

मेरी जगह CM बनना चाहते हैं ‘वो’, बिगाड़ रहे हैं कॉन्ग्रेस की छवि: कैप्टेन अमरिंदर

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने अपने कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू पर बड़ा आरोप लगाया है। इसके साथ ही पंजाब कॉन्ग्रेस की कलह सतह पर आती दिख रही है। हाल ही में नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी ने कहा था कि कैप्टेन के कारण उन्हें लोकसभा चुनाव में टिकट नहीं दिया गया। अपनी पत्नी का बचाव करते हुए सिद्धू ने कहा कि वे कभी झूठ नहीं बोलतीं। पंजाब के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू से जब उनकी पत्नी के आरोपों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी नैतिक रूप से इतनी मजबूत हैं कि वह कभी झूठ नहीं बोल सकती हैं। हालाँकि, मुख्यमंत्री ने पटियाला में इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें अमृतसर या बठिंडा सीट से कॉन्ग्रेस के टिकट की पेशकश की गई लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था।

अब नवजोत सिंह सिद्धू पर हमला बोलते हुए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा, “सिद्धू मेरी जगह सीएम बनना चाहते हैं। सिद्धू कॉन्ग्रेस की छवि बिगाड़ रहे हैं, पार्टी को उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए। अगर वह असली कॉन्ग्रेसी होते तो वह अपनी शिकायतों के लिए पंजाब चुनाव का वक्त नहीं चुनते।” कैप्टेन ने साथ ही कॉन्ग्रेस आलाकमान कर अनुशासनहीनता बर्दाश्त न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यह पार्टी हाईकमान तय करेगा कि क्या कार्रवाई करनी है? सिद्धू को बचपन से जानने की बात करते हुए कैप्टेन ने कहा कि उन्हें सिद्धू से कोई निजी दुश्मनी नहीं है। कैप्टेन ने कहा कि सिद्धू संभवतः महत्वकांक्षी हैं और वो मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।

कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने पटियाला में वोट डालने के बाद मीडिया से अनौपचारिक बातचीत करते हुए ये बातें कही। चुनाव से पहले भाजपा छोड़ कर कॉन्ग्रेस में गए सिद्धू चुनाव परिणाम कॉन्ग्रेस के पक्ष में आने के बाद उप-मुख्यमंत्री बनना चाहते थे लेकिन उन्हें पर्यटन एवं सांस्कृतिक मंत्रालय दिया गया। नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी ने कहा था कि कैप्टेन सोचते हैं कि वह पिछले वर्ष 2018 में अमृतसर में हुए ट्रेन हादसे की वजह से नहीं जीत पाएँगी। नवजोत कौर ने पार्टी की पंजाब मामलों की प्रभारी आशा कुमारी को भी अपने आरोपों के लपेटे में लिया।

कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने अपने मताधिकार का प्रयोग करने के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए आगे कहा कि राज्य में क़ानून व्यवस्था शांतिपूर्ण है और कॉन्ग्रेस अकाली-भाजपा को शिकस्त देगी। अमृतसर में कॉन्ग्रेस पार्टी ने वर्तमान सांसद गुरजीत सिंह को शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार हरदीप सिंह पुरी के सामने उतारा है। हरदीप सिंह पुरी वर्तमान मोदी सरकार में केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य राज्यमंत्री हैं। पंजाब में आज सोमवार (मई 19, 2019) को लोकसभा चुनाव के अंतिम और सातवें चरण के तहत मतदान चल रहा है। दोपहर 1 बजे तक राज्य में 38% मतदान की ख़बर है।

लंगोट पहन पेड़ से उलटा लटक पत्तियाँ क्यों नहीं चबा रहे PM मोदी? मीडिया गिरोह के ‘मन की बात’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (मई 19, 2019) को अपने आध्यात्मिक दौरे के तहत केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिर में जाकर दर्शन किए। इन प्राचीन मंदिरों के दर्शन करने के साथ ही मोदी ने हिमालय में एकांतवास में भी समय बिताया और गुफा में ध्यान धरा। प्रधानमंत्री की ध्यान की मुद्रा में तस्वीरें भी वायरल हुईं और इसके बाद मीडिया एवं लिबरल गिरोह में इसे लेकर हंगामा मच गया। नेताओं को मज़ारों पर चादर चढ़ाने और मुस्लिम वाली टोपी पहन कर इफ़्तार पार्टी करते देखने के आदि इन लिबरलों को प्रधानमंत्री का यह आध्यात्मिक दौरा पसंद नहीं आया। पीएम ने मीडिया से बात करते हुए ख़ुद कहा कि वे पहले भी मंदिरों के दर्शन करते रहे हैं लेकिन इस तरह से एकांतवास में समय बिताने का अवसर उनके लिए काफ़ी दिनों बाद आया है।

प्रधानमंत्री की बात भी सही थी क्योंकि उन्होंने चुनाव प्रचार से लेकर आम दिनों में भी कई मंदिरों के दर्शन किए, समय-समय पर काशी जाकर गंगा आरती में भाग लिया और कुम्भ में भी स्नान किया। लेकिन, अब उनका यह कार्यकाल लगभग पूरा हो चुका है और एक व्यापक चुनाव प्रचार ख़त्म कर उन्होंने सरकार और पार्टी, दोनों के ही नेतृत्व का सफलतापूर्वक संचालन किया है। अब जब चुनाव परिणाम आने तक उनके पास थोड़ा-बहुत खाली समय है, जिसे उन्होंने सनातन परंपरा का पालन कर बिताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे अवसरों पर या तो भगवा वस्त्र धारण करते हैं या फिर स्थानीय वेश-भूषा में होते हैं। इससे स्थानीय परंपरा को भी प्रचार का एक माध्यम मिलता है।

हिमाचल में पीएम ने पहाड़ी टोपी पहनते हैं, नागालैंड में उनकी वेशभूषा जनजातीय समूहों जैसी होती है और कश्मीर में वे कश्मीरी परिधान में नज़र आते हैं। सोशल मीडिया पर इसके लिए उनका ख़ूब मज़ाक उड़ता रहा है और लोगों ने उन्हें बहुरुपिया से लेकर मदारी तक की संज्ञा दी। लेकिन, जहाँ भारत में हज़ारों परम्पराओं का सामूहिक अस्तित्व है, ऐसे समय में कई ऐसी परम्पराएँ और संस्कृतियाँ हैं, जिनसे देश के ही लोग अवगत नहीं हैं। देश के एक कोने में प्रभावी परम्पराओं के बारे में देश के दूसरे कोने के लोगों को कुछ पता ही न हो, भारत जैसे विशाल देश में ऐसे बहुत से मामले देखने को मिलते हैं। अगर प्रधानमंत्री इन संस्कृतियों व परम्परों को अंतरराष्ट्रीय पहचान देते हैं, तो उनका स्वागत होना चाहिए।

ये रही वेशभूषा की बात, जिसकी चर्चा करनी इसीलिए ज़रूरी थी क्योंकि आप ट्विटर खंगालेंगे तो आपको कई ट्वीट उन्हें मदारी और बहुरुपिया कहते हुए मिल जाएँगे। अब आते हैं ऐसे लोगों पर, जिन्हें प्रधानमंत्री के चश्मे से दिक्कत है। जी हाँ, मोदी विरोध का आलम यह है कि अब वह अपना चश्मा कब उतरेंगे और कब नहीं, यह भी गिरोह विशेष के सदस्य तय करना चाह रहे हैं। चश्मा पहन कर ध्यान लगाने को लेकर गिरोह विशेष के निशाने पर आए मोदी को अपनी आध्यात्मिक साधना कैसे करनी चाहिए और क्या-क्या पहनना चाहिए, वे वामपंथी भी अब इस पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें सनातन हिन्दू परंपरा पर कोई विश्वास ही नहीं। ऐसा पहली बार हो रहा है जब कई पत्रकार साधना एवं ध्यान एक्सपर्ट्स की तरह व्यवहार कर रहे हैं।

कुछ लोगों की समस्या इस बात को लेकर भी थी कि मोदी के लिए लाल दरी क्यों बिछाई गई। हो सकता है कि मंदिर में उनके जाने के लिए प्रशासन ने कुछ विशेष इंतजाम किए हों, क्योंकि वह प्रधानमंत्री हैं। और सबसे बड़ी बात, एक दरी भर बिछा देने से किसी को दिक्कत क्यों होनी चाहिए? लिबरल गिरोह के लोग आज साधना, अध्यात्म, सनातन परंपरा की पूजा पद्धतियों और ध्यान के तरीकों पर प्रकाश डाल रहे हैं, भले ही उन्होंने कभी पहले इस पर बात किया भी हो या नहीं। अगर मोदी ‘दिखावे’ के लिए योग करने से संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग दिवस की घोषणा कर देते हैं, तो अगर ये दिखावा भी है (जैसा कि गिरोह विशेष का मानना है) तो सही है।

तो फिर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्या करना चाहिए? कैसे ध्यान धरना चाहिए? साधना करने का तरीका क्या होना चाहिए? उनके साथ कितने कैमरे जाने चाहिए? उन्हें कैसे वस्त्र पहनने चाहिए? लिबरल गिरोह को शायद तब शांति मिलती जब पीएम मोदी लाल लंगोट पहन कर किसी नागा साधु की तरह पेड़ से उलटा लटक कर पत्तियाँ चबाते हुए तपस्या कर रहे होते। लेकिन नहीं, हो सकता है कि तब लिबरल गिरोह यह कहता कि उन्होंने दधीचि की तरह अपनी हड्डियाँ क्यों नहीं बाहर निकालीं? गिरोह विशेष को ख़ुश करने के लिए मोदी को हिमालय पर नहीं बल्कि हिन्द महासागर में 12,000 फ़ीट नीचे गहरे पानी में पैठ कर साधना करनी चाहिए। लेकिन, यहाँ फिर से कैमरे वाली दिक्कत आ जाती है।

अगर पीएम मोदी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की तरह बिना बताए चोरी-छिपे निकल जाते हैं तो इस पर हज़ारों लेख लिखे जाएँगे कि मोदी कहाँ गए हैं और किस जगह पर छुट्टियाँ मना रहे हैं। अगर मोदी के किसी दौरे में कैमरों व प्रेस को अनुमति नहीं दी जाती है तो प्रेस की स्वतंत्रता से लेकर भारत में मीडिया के पतन तक, न जाने कितनी चर्चाएँ चालू हो जाएँगी। मीडिया में पूछा जाएगा कि आखिर मोदी ऐसा क्या कर रहे हैं कि उन्होंने प्रेस को रोक दिया है? क्या नरेंद्र मोदी ईवीएम में गड़बड़ी करने के लिए चुनाव आयोग के साथ गुप्त बैठक कर रहे हैं? कुल मिलाकर बात यह है कि मीडिया को कवरेज की अनुमति दे दी जाए तो यही मीडिया के लोग पूछते हैं कि कैमरा लेकर साधना करने गए थे क्या? जब अनुमति नहीं दी जाए, तब ये अपना रोना शुरू कर देते हैं।

मोदी नागा साधु बन जाएँ, भरी दुपहरी में लंगोट पहन कर घर-घर भिक्षा माँगते हुए ज़मीन पर दण्डवत करते हुए आगे बढ़ें, तब शायद उनकी साधना को सच्ची मानी जाए। लेकिन नहीं, हो सकता है तब गिरोह विशेष की चर्चा का विषय यह हो कि मोदी भगवान शिव की तरह तांडव करते हुए डमरू क्यों नहीं बजा रहे हैं? ऐसे डिज़ाइनर पत्रकारों को समझना चाहिए कि वह देश के प्रधानमंत्री हैं, उनके घर का नौकर नहीं कि वे जैसा चाहें वैसा करवा सकें। पद की भी कुछ मर्यादाएँ होती हैं और कुछ चीजें व्यक्तिगत सोच पर निर्भर करती है, यही तो हिन्दू धर्म की विशेषता है। वरना, कल होकर यह भी पूछा जा सकता है कि जब तक मोदी ख़ुद को बेल्ट से पीटते हुए नहीं घूमेंगे, उनका आध्यात्मिक दौरा अधूरा रहेगा।

दल बदलू कॉन्ग्रेस प्रत्याशी ने बनारस में अटल जी को कहा महान

लोकसभा चुनाव के सातवें चरण में आज (मई 19, 2019) 8 राज्यों के 59 सीटों पर मतदान जारी है। इस चरण के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी भी आता है। हालाँकि, यहाँ से पीएम मोदी के खिलाफ कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी के मैदान में उतरने की उम्मीद जताई जा रही थी, मगर कॉन्ग्रेस ने इस सीट से अजय राय को मैदान में उतारकर पीएम मोदी को चुनौती दी है।

अजय राय ने रविवार (मई 19, 2019) को अंतिम चरण के लिए चुनाव शुरू होने से पहले बात करते हुए इस बार के चुनाव को पिछले चुनाव की अपेक्षा आसान बताया। उनका कहना है कि पीएम मोदी ने कुछ भी नहीं किया है और लोगों ने उनके लंबे और झूठे वादों को देख चुके हैं।

इस दौरान अजय राय पीएम मोदी की आलोचना करते-करते पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तारीफ कर बैठे। उन्होंने वाजपेयी को बड़े हृदय के व्यक्ति बताते हुए कहा कि वो हर किसी को साथ लेकर चलते थे। भाजपा के पूर्व नेता अजय राय ने कहा कि जब वो भाजपा में मंत्री थे, उस समय अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा थी। वो भाजपा, मोदी और अमित शाह की भाजपा नहीं थी, जो कॉरपोरेट संस्कृति पर चलती है और पार्टी के नेताओं का सम्मान नहीं करती है। इसके साथ ही राय ने नई भाजपा (मोदी-अमित शाह वाली) पर पार्टी के पुराने नेताओं- लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी का सम्मान न करने की भी बात कही।

गौरतलब है कि, भाजपा छोड़ सपा में और फिर सपा छोड़कर कॉन्ग्रेस में शामिल होने वाले अजय राय साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भी वाराणसी सीट से चुनाव लड़ा था। इस दौरान अरविंद केजरीवाल दूसरे नंबर पर रहे, तो वहीं अजय राय मात्र 75 हजार वोट के साथ तीसरे नंबर पर रहे और उनकी जमानत भी जब्त हो गई थी। कॉन्ग्रेस ने इस बार एक बार फिर से इसी जमानत जब्त प्रत्याशी को पीएम मोदी के खिलाफ मैदान में उतारकर जीत का दावा कर रही है।

वहाँ मोदी नहीं, सनातन आस्था अपनी रीढ़ सीधी कर रही है, इसीलिए कुछ को दिक्कत हो रही है

कुछ बेचारों की मानसिक स्थिति पर दया आती है जो मोदी को कोसते भी हैं, और उसकी तस्वीर भी शेयर कर रहे हैं। ये वैसे ही मूर्ख हैं जो कहते हैं मुद्दों पर बात नहीं होती। जब मुद्दों पर बात नहीं होती तो तुम क्या कर रहे हो? क्या पीएम के आने पर रेड कार्पेट का प्रोटोकॉल नहीं है? क्या यही आदमी पत्रकारों को अपने पीछे आने से मना कर दे तो तुम ही ‘फ़्रीडम ऑफ प्रेस’ की नौटंकी नहीं करोगे?

क्या जो मीडिया वाले इन तस्वीरों को दिखा रहे हैं, और रो भी रहे हैं, वो ये चुनाव नहीं कर सकते थे कि उनके यहाँ ये तस्वीरें नहीं दिखाई जाएँगी?

मोदी गया केदारनाथ, वो हिन्दू है, उसकी आस्था है। तुम्हें उसकी आस्था को नौटंकी कहने का कोई हक नहीं है क्योंकि तुम भी एक नागरिक के तौर पर फेसबुक पर नौटंकी ही कर रहे हो। तुमने बस रोना रोया है कि मोदी ये कर रहा है, वो कर रहा है। लेकिन तुमने एक भी बार तार्किक होकर, सही आँकड़ों के साथ (पिछली सरकार के आँकड़ों की तुलना में) मोदी को घेरने की कोशिश नहीं की।

सबसे सही बात तो यह है कि तुम आला दर्जे के घमंडी और नकारे लोग हो जिनके पास कहने को कल्पनाशीलता के अलावा कुछ नहीं है। घमंडी इसलिए कि तुम्हें तुम्हारे वश में होने वाले सारे कार्य सर्वोत्तम और गजब के दिखते हैं, वही कोई दूसरा करता है तो वो नौटंकी हो जाती है। मोदी के केदारनाथ जाने या ध्यान में बैठने पर मीम बनाइए, हँसिए लेकिन दो मिनट के मजाक के बाद अपनी जमीन तलाशिए कि उसके वहाँ जाने से किसको क्या फर्क पड़ रहा है।

किसी ने लिखा कि ध्रुवीकरण हो रहा है। मुझे अच्छे से पता है कि उसने बस लिखने के लिए लिख दिया क्योंकि ध्रुवीकरण किसने किया है और कैसे होता है इसकी जानकारी उसे तो बिलकुल नहीं होगी। ध्रुवीकरण किसी के मंदिर में जाने से नहीं होता। फिर तो सारे लोग मंदिर गए हैं, ऐसे में ध्रुवीकरण स्वतः निरस्त हो जाता है। ये बात और है कि अपनी मूर्खता में लोग सिर्फ मोदी के मंदिर जाने पर ध्रुवीकरण देख लेते हैं, बाक़ियों में नहीं।

मोदी ही इस चुनाव का अकेला ध्रुव है, और ध्रुवीकरण उसकी नीतियों, योजनाओं, विकास कार्यों से हुआ है न कि उसके मंदिर जाने से। वो लोग उच्च कोटि के मूढ़मति हैं जिन्हें लगता है कि भाजपा, जिसका घोषित अजेंडा हिंदुओं का पक्षधर होना है, उसे ध्रुवीकरण के लिए मंदिर जाने की जरूरत होगी।

भाजपा या मोदी मंदिर कब नहीं गया? जो नए-नए मंदिर जाना शुरु करते हैं, उनकी कोशिश होता है ध्रुवीकरण। जो समुदाय विशेष में डर बिठाकर यह कहते हैं कि मोदी आएगा तो तुमको काट दिया जाएगा, वो ध्रुवीकरण की कोशिश है। ध्रुवीकरण मंदिर जाना नहीं है।

इंटेलेक्चु‌ल लेजिटिमेसी और फेसबुक पर प्रासंगिक बने रहने, ज्ञानी कहलाने और एक खास गिरोह के लोगो में स्वीकार्यता पाने के लिए आप भले ही मोदी की हर बात पर लेख लिखिए, लेकिन ध्यान रहे कुतर्कों, ठिठोलियों और मीम्स की उम्र छोटी होती है।

मोदी प्रधानमंत्री भी है और हिन्दू भी। उसे इस देश का संविधान एक व्यक्ति के तौर पर भी और एक प्रधानमंत्री के तौर पर भी मंदिरों में घूमने की इजाज़त देता है। वो न भी चाहे फिर भी प्रोटोकॉल के तहत उसकी सुरक्षा का घेरा उसके साथ ही जाएगा। जैसे कि राहुल गाँधी कुछ भी नहीं है, फिर भी उसकी सुरक्षा का खर्च भी सरकार वहन करती है।

इसलिए, अगर आपकी लाइन ये है कि मोदी मंदिर क्यों गया तो जवाब है कि ऐसा करना ग़ैरक़ानूनी नहीं है। अगर आपकी लाइन ये है कि इससे वोटर इन्फ्लूएन्स होते हैं तो आपको राजनीति की कुछ भी जानकारी नहीं है और आप दूसरों के शब्द चुराकर मायकल बनने के लिए फेसबुक पर कुछ भी लिखते रहते हैं। अगर आपको यहाँ ध्रुवीकरण दिखता है तो आपको ध्रुवीकरण कैसे होता है इस पर जानकारी जुटाने की जरूरत है।

भगवा कपड़े धारण करना, मंदिर में जाना और ध्यान करना किसी का व्यक्तिगत चुनाव है। आप भी छुट्टियों में घूमने जाते हैं, आपका पड़ोसी आपको कहे कि ये चोरी के पैसों से घूमने जाते हैं, तो आपको बहुत अच्छा नहीं लगेगा। प्रधानमंत्री जब इफ़्तार पार्टी देते थे तो सेकुलर हो जाते थे, आज कोई अपनी आस्था से कहीं जा रहा है तो आपको कष्ट क्यों हो रहा है?

आपको कष्ट दो कारणों से होता है। पहला इस कारण से कि आपको यह पच नहीं रहा कि कोई व्यक्ति तय परिपाटी से अलग तुष्टीकरण की नीतियों से परे, अपनी आस्था को ऐसे दिखाता है जैसे वो प्रतीक हो उन करोड़ों लोगों के लिए जिनकी आस्था को ही साम्प्रदायिक बना दिया गया। हमने वो दौर झेला है जब हिन्दू होना ही साम्प्रदायिक होना माना जाता है, और एक हिस्से से अभी भी वही तर्क चल रहा है।

दूसरा कारण है कि जिन लोगों ने मोदी की आलोचना से फेसबुक या सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनाई थी, उनके पास अब बोलने को कुछ भी नहीं बचा। उन्होंने इस पूरे पाँच साल में, बिना किसी आधार के रेटरिक (कल्पनाशील बातों) पर ध्यान दिया है। किसी ने कुछ लिख दिया, तो उन्होंने भी लिख दिया। धीरे-धीरे आलोचना का स्तर गिरता गया, और वो कब एक कम्पल्सिव सायकॉलोजिकल डिसॉर्डर के रूप में भीतर घुस गया इन लोगों को पता तक नहीं चला।

अब ये मोदी की हर बात में, हर तस्वीर में नुक़्स निकालने लगे। वही कार्य मोदी के विरोध में खड़ा अपराधी करे, घोटालेबाज़ पार्टी करे, आतंकियों का हिमायती करे, नक्सली करे तो वो सब ‘पोलिटिकल स्ट्रोक’ से लेकर ‘समझदारी’, ‘रणनीति’, ‘मोदी की राजनीति का जवाब देनेवाला’ हो जाता है, लेकिन मोदी के करने पर उसमें सारी नकारात्मक बातें निकाल ली जाती हैं।

अब ये तथाकथित बुद्धिजीवी कहीं जा नहीं सकते। ये चाह कर भी सेंसिबल बातें लिख नहीं सकते क्योंकि ये अपने ही सर्कल से डिसऑन कर दिए जाएँगे। इन्हें अपने ही दायरे से भगा दिया जाएगा। इनकी मजबूरी है कि अपने गिरोह के विचारों की लाइन में प्रलाप करते रहना ताकि दस लोग कहें कि ‘वाह मैडम, क्या गजब लिखा है’, ‘वाह सर, काश आपको ये भक्त पढ़ते तो उनकी आँखें खुल जातीं।’

एक बात और है, ऐसे लोग निजी जीवन में आपको सेंसिबल बातें करते नजर आएँगे। वो कहेंगे कि हाँ, अभी तो मोदी ही काम कर रहा है, बाक़ियों को तो जनता देख चुकी है। ऐसे लोगों की बातें रिकॉर्ड कर के पब्लिक के सामने रख दिया जाए तो पता चलेगा कि इनके सर्कल के अधिकतर लोग सोशल मीडिया पर मजबूरी में मोदी को गरियाते हैं।

ये लोग अपने ही प्रोजेक्शन से लड़ रहे हैं। ये दस-बीस-पचास लोगों की लाइक के लिए लिखते हैं। इनके पोस्ट एक मजबूरी का परिणाम हैं क्योंकि इनके दूसरे पोस्ट की कमेंट पर कोई लिख देगा कि ‘आपने तो मोदी की केदारनाथ यात्रा पर कुछ तड़कता-भड़कता लिखा ही नहीं’। आपमें फिर लिखने का कम्पल्शन जगेगा कि आपके गिरोह के बाकी लोगों ने तो लिख दिया, आप तो पीछे रहे गए। आप अपने ही नकली प्रोजेक्शन से बँध गए हैं। आप चुप रहेंगे तो आपकी मंडली कमेंट कर-कर के आपकी जान खा जाएगी, अगर सच बोल देंगे, तार्किक हो जाएँगे तो आपकी विचारधारा वाले आपको तुरंत ही त्याग देंगे। आपको एक लाइन में कह दिया जाएगा कि ‘ये भी संघी निकला’, ‘ये तो भक्त हो गए’।

इसलिए, भले ही मोदी निजी तौर पर अपनी आस्था निभा रहा है, लेकिन आपको मीडिया के वहाँ होने के कारण सब कुछ स्टेज्ड दिखेगा। इसलिए, मोदी भले ही सच में ध्यान कर रहा हो, लेकिन आप तो दुनिया के सबसे बड़े सर्वज्ञ हैं तो आपको मालूम हो जाएगा कि वो भीतर बैठ कर अमित शाह के साथ ताश खेल रहा है। आपको आधा सेकेंड नहीं लगता किसी की आस्था को नौटंकी कहने में, वो सिर्फ इसलिए को सामने वाला हिन्दू है, सहिष्णु है, उसके धर्म में विरोध के मत का भी सम्मान है।

उसके खड़े होने पर आपको दिक्कत है क्योंकि जब वो उठता है तो वो हिन्दुओं की सामूहिक आस्था पर सुव्यवस्थित तरीके से लगातार की जा रही क्षति को सही करने के लिए उठता है। आप अपने निजी विचार रखिए कि ‘मैं तो मंदिर जाता/जाती हूँ तो फोटो नहीं खिंचाता/खिंचाती’ लेकिन आपको मीडिया द्वारा ली गई तस्वीरों (या खुद ही ली गई तस्वीरों) पर आपत्ति करने का कोई अधिकार नहीं।

अगर मोदी ने आपके घर के मंदिर में घुस कर प्रार्थना करने का ढोंग रचा। आपको मोदी के मंदिर जाने से निजी तौर पर कठिनाई का सामना करना पड़ा, तो आप लिखिए कि आपको निजी क्षति पहुँची है। आप अपने सीमित ज्ञान के आधार पर पूरे भारत का स्वघोषित प्रतिनिधि मत बनिए क्योंकि आपको फेसबुक पर आने वाले बीस लाइकों के अलावा कोई नहीं जानता।

आस्था निजी होती है। ये इतनी व्यक्तिगत बात है कि आप अपनी कैसे दिखाते हैं, कैसे छुपाते हैं, इस पर सिर्फ और सिर्फ आपका हक है। आपको इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि मैं किसी देवता की पूजा कैसे करता हूँ। आपको इस पर नकारात्मक टिप्पणी करने का कोई हक नहीं है कि मोदी वहाँ क्यों गया क्योंकि मोदी की आस्था, प्रधानमंत्री होते हुए भी, उतनी ही निजी है जितनी आपका अपनी बिटिया के लिए प्रेम। इसमें बाहरी व्यक्ति की कोई जगह नहीं है कि आप उसे कैसे देखते हैं, कैसे दिखाते हैं।

अंत में, आपमें से कितने लोग मंदिर जाते हैं और तस्वीरें नहीं लगाते? आपकी हैसियत हो, या संसाधन हों तो आप उस पर चालीस मिनट का प्रोग्राम बना कर टीवी पर चलवा देंगे। आत्ममुग्ध फेसबुकिया बुद्धिजीवी पीढ़ी जब मोदी को ‘कैमरा ऑब्सेस्ड’ कहता है तो बड़ा क्यूट लगता है।