शुक्रवार (मई 24, 2019) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने राष्ट्रपति कोविंद को इस्तीफा सौंप दिया। राष्ट्रपति ने सभी का त्यागपत्र स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री से नई सरकार बनने तक पद पर बने रहने का आग्रह किया है। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हुई, जिसमें 16वीं लोकसभा को भंग करने का प्रस्ताव पारित किया गया।
16 वीं लोकसभा का कार्यकाल 3 जून को समाप्त हो रहा है और 17वीं लोकसभा का गठन 3 जून से पहले किया जाना है। ऐसे में नए सदन के गठन की प्रक्रिया तीनों चुनाव आयुक्तों के राष्ट्रपति से मिलने के बाद शुरू होगी जब वह नवनिर्वाचित सदस्यों की सूची राष्ट्रपति को सौंपेंगे।
बता दें लोकसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की ऐतिहासिक जीत के बाद नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसी सिलसिले में आज शनिवार को एनडीए की संसदीय दल की बैठक शाम 5 बजे बुलाई गई है जिसमें गठबंधन के सभी नवनिर्वाचित सांसद शामिल होंगे। इस बैठक में औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसदीय दल का नेता चुना जाएगा। संसदीय दल के नेता को ही राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री के रूप में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है।
लोकसभा चुनाव 2019 न्यूज़: NDA संसदीय दल की बैठक शनिवार को, बीजेपी ने विजयी सांसदों को दिल्ली बुलाया – nda parliamentary party will meet on saturday, formally can elect modi as their leader https://t.co/ung7Xxsygb
नवभारत टाइम्स की खबर के मुताबिक इस बात को लेकर अटकलें तेज हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई कैबिनेट में किसे कौन सा पद मिलेगा। ऐसे में केंद्रीय कैबिनेट की एक बैठक भी हुई जिसमें सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी, निर्मला सीतारमन, मेनका गांधी, पीयूष गोयल, प्रकाश जावड़ेकर आदि शामिल हुए। स्वास्थ्य खराब होने के कारण अरुण जेटली इस बैठक में शामिल नहीं हुए थे। खबरों के अनुसार मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अरुण जेटली वित्त मंत्री का कार्यभार नहीं लेंगे। इसका कारण उनकी बिगड़ी सेहत बताया जा रहा है। ऐसे में हो सकता है केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल को वित्त मंत्रालय या दोनों मंत्रालयों का प्रभार दिया जाए। इसके अलावा अमित शाह को रक्षा मंत्री का पद सौंपा जा सकता है।
देश की सबसे हाई-प्रोफाइल सीट भोपाल से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह की जीत का दावा करने वाले और उनकी जीत के लिए 5 क्विंटल मिर्ची से यज्ञ करने वाले महामंडलेश्वर वैराग्यानंद गिरी महाराज उर्फ़ मिर्ची बाबा इन दिनों गायब चल रहे हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही बाबा की तलाश की जा रही है, लेकिन अभी तक कोई भी उनसे संपर्क नहीं कर पाया है। उम्मीदें लगाईं जा रही हैं कि शायद मिर्ची बाबा अंडरग्राउंड हो गए हैं।
मध्य प्रदेश की भोपाल लोकसभा सीट पर भाजपा की साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को करीब तीन लाख वोट से करारी शिकस्त दी है। दिग्विजय सिंह ने जीतने के लिए पूजा-पाठ का सहारा लिया था। पर इसका भी कोई असर नहीं हुआ।
दिग्विजय सिंह को भोपाल सीट से विजयी बनाने के लिए महामंडलेश्वर स्वामी वैराग्यानंद ने कुल 5 क्विंटल मिर्च डालकर एक विशाल हवन किया था और वहीं प्रतिज्ञा ली थी कि अगर कॉन्ग्रेस ये सीट हारती है, तो वह इसी हवनकुण्ड में समाधि ले लेंगे। कॉन्ग्रेस के हारने के बाद स्वामी वैराग्यानंद उर्फ मिर्ची बाबा को लोग खोजना शुरू कर चुके हैं, पर वह कहाँ हैं इसके बारे में कोई पता ही नहीं चल रहा।
मिर्ची बाबा का फोन भी चुनाव परिणाम आने के बाद से बन्द ही बता रहा है। बता दें कि मध्य प्रदेश की 29 सीट पर भाजपा ने अपना परचम लहराया है। एक मात्र छिंदवाड़ा सीट ही कॉन्ग्रेस के हिस्से आई है। राज्य की सत्ता में होते हुए कॉन्ग्रेस की इतनी बड़ी हार पार्टी आलाकमान को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
दिग्विजय सिंह के लिए सिर्फ मिर्ची बाबा ने ही नहीं, बल्कि भाजपा से राज्यमंत्री रह चुके कम्पयूटर बाबा ने भी करीब 7 हजार साधू-संतों के साथ हवन-यज्ञ किया था। जिसके बाद बाबा और दिग्विजय सिंह पर चुनाव आयोग का कहर भी फूटा था, क्योंकि बाबा ने यज्ञ और प्रचार में खर्च हुई धनराशि का हिसाब नहीं दिया था। ऐसे में आयोग ने यज्ञ और साधु-संतों द्वारा दिग्विजय सिंह के पक्ष में किए प्रचार-प्रसार का पूरा खर्च भी दिग्विजय सिंह के ही खाते में जोड़ दिया था।
लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के एसपी-बीएसपी गठबंधन को मिली करारी हार से निराश समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बड़ी कार्रवाई की है। इस कार्रवाई के तहत अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सभी पार्टी प्रवक्ताओं को अपने पद से हटा दिया है। ये निकाले गए प्रवक्ता वही हैं, जो पार्टी का पक्ष रखने के लिए न्यूज चैनल्स पर बैठे नजर आते थे। मीडिया रिपोर्टस् के अनुसार पार्टी के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने इस बारे में एक प्रेस रिलीज जारी कर सभी न्यूज चैनल्स से आग्रह किया है कि वह इन प्रवक्ताओं को अपने चैनल में डिबेट के लिए ना बुलाएँ।
Samajwadi Party chief Akhilesh Yadav dismisses the nomination of all the panelists of the party, and asks the media houses to not invite any SP office-bearer for debates. pic.twitter.com/CRK60X6Exh
जिन प्रवक्ताओं के खिलाफ अखिलेश यादव ने ये निर्णय लिया है, उनमें जूही सिंह, नावेद सिद्दीकी, जगदेव सिंह यादव, सुनील सिंह जैसे कई बड़े नाम भी शामिल हैं। न्यूज़ चैनल्स के साथ-साथ इस चिट्ठी को प्रवक्ताओं के पास भी भेज दिया गया है।
लोकसभा चुनाव में न केवल जातीय गणित फेल हुआ है, बल्कि वंशवादी राजनीति को भी भारी झटका लगा है। राजनीतिक परिवार से आने वाले अधिकांश उम्मीदवारों को इस बार हार का सामना करना पड़ा है। उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर हुए चुनाव में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी व राष्ट्रीय लोकदल के महागठबंधन के बावजूद भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर 62 सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि 2 सीटों पर उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल ने जीत हासिल की।
संसद के सेंट्रल हॉल में कल शाम 5 बजे बीजेपी संसदीय दल की बैठक होगी जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बीजेपी संसदीय दल का नेता चुना जाएगा। बीजेपी संसदीय दल की बैठक के बाद एनडीए की बैठक होगी। इस बैठक में उद्धव ठाकरे, रामविलास पासवान समेत सभी एनडीए नेता और सांसद रहेंगे। इस बैठक में भी नरेंद्र मोदी को एनडीए का नेता चुना जाएगा। इसके बाद मंत्रिमंडल गठन और पोर्टफोलियो को लेकर अमित शाह कल और परसों अलग-अलग एनडीए सहयोगियों के साथ भी विचार विमर्श करेंगे।
Please note that the National Democratic Alliance (NDA) Parliamentary Party will meet in Central Hall tomorrow, 25 May, at 5pm.
बता दें कि इस बार लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले इतिहास रच दिया है। पार्टी ने अकेले अपने दम पर 303 सीट पर विजय हासिल की है, जो बहुमत से कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद बीजेपी ने एनडीए के घटक दलों को साथ लेकर चलने की बात कही है। वहीं इस बार के चुनाव में यूपीए को 82 और महागठबंधन को महज 15 सीट हासिल हो पाई हैं।
आज केंद्रीय मंत्रियों के बैठक के बाद 16वीं लोकसभा भंग करने का प्रस्ताव पास हो गया। पीएम मोदी ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को सौंप दिया है। राष्ट्रपति ने इस्तीफा स्वीकार कर लिया है और नरेंद्र मोदी और मंत्रिपरिषद से अनुरोध किया है कि वे नई सरकार के पद ग्रहण करने तक बने रहे।
फ़र्ज़ी फ़ैक्ट-चेक और इंटरनेट पर घूमने वाले मीम की ‘सच्चाई’ खोजने में महारत प्राप्त वेबसाइट AltNews ने फिर ऐसा कारनामा किया है जिसकी जितनी निंदा की जाए वो कम है। AltNews के संस्थापक, प्रतीक सिन्हा ने खूंखार आतंकवादी ज़ाकिर मूसा के अपराधों पर पर्दा डालते हुए उसे आतंकवादी न कहकर ‘अलगाववादी’ के रूप में प्रदर्शित किया। बता दें कि 23 मई को, जम्मू और कश्मीर में आतंकवादी ज़ाकिर मूसा को भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया। मूसा हिज़्बुल का पूर्व कमांडर था और फ़िलहाल अल-क़ायदा से जुड़े आतंकी संगठन अंसार ग़ज़ावत-उल-हिंन्द का सरगना था। वो इस्लाम से जुड़े प्रोपेगेंडा चलाने के लिए जाना जाता था।
जहाँ एक तरफ़, मूसा को ढेर करने की ख़बर को लोगों ने सुरक्षाबलों की क़ामयाबी के रूप में देखा, तो दूसरी तरफ़ मीडिया गिरोह के कुछ ऐसे बड़े लोग मूसा की मौत की ख़बर को पचा नहीं सके। इनमें से एक नाम द वायर की वरिष्ठ संपादक आरफ़ा ख़ानम शेरवानी का है। मूसा की मौत पर BTVI के संपादक आदित्य राज कौल ने जब यह ख़बर शेयर की, जिसमें उन्होंने लिखा कि यह भारतीय लोकतंत्र की जीत है, तो आरफ़ा को यह बात बर्दाश्त नहीं हुई और जवाब में लिखा कि अब राइट विंगर्स (RW) ट्रोल्स और RW पत्रकारों के बीच अंतर करना कठिन है।
It’s tough to differentiate between RW trolls and RW journalists now. Most certainly new depths are waiting to be plumbed for Modi Media. https://t.co/ROjLzIEMaA
न्यूज़ 24 के संपादक मानक गुप्ता ने अरफ़ा के एक हिंदी ट्वीट का जवाब देते हुए हिंदी में ही जवाब दिया, जो 22 मई को पोस्ट किया गया था। उन्होंने लिखा था कि वह (मूसा) अब नहीं आएगा, और अगर कोई भी उससे मिलना चाहता है, तो वह ख़ुद ऊपर चला जाए।
वो अब नहीं नहीं आ पाएगा. जो उससे मिलना चाहता है, ख़ुद भी ऊपर जाएगा
(वैसे मैडम #ZakirMusa की बात नहीं कर रही हैं ?) Zakir Musa
लेकिन, प्रतीक सिन्हा, जो इन दिनों अपने चुटकुलों, मीम्स और फ़ोटो की काँट-छाँट कर फ़ैक्ट-चेक का दावा करने के लिए फेमस है, उसके लिए इतना पर्याप्त नहीं था। सिन्हा ने आतंकवादी ज़ाकिर मूसा को एक आतंकवादी की जगह ‘अलगाववादी’ के रूप में संदर्भित किया। यह मामला सतही तौर पर मामूली-सा लग सकता है, लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। अलगाववादी एक ऐसा व्यक्ति होता है जो एक समूह, समाज, संस्कृति या धर्म को तोड़ने का समर्थन करता है, उसे अलगाववादी कहा जाता है। अलगाववादी अपनी माँग रखने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वो तरीक़े क़ानून के ख़िलाफ़ नहीं हो सकते। उदाहरण के लिए, ऐसे कई अलगाववादी हैं जो केवल अहिंसक तरीकों का उपयोग करते हैं।
दूसरी ओर, आतंकवादी हिंसा के ज़रिए आतंक पैदा करते हैं, नागरिकों और सशस्त्र बलों को निशाना बनाते हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ज़ाकिर मूसा जैसे इस्लामी आतंकवादी इस्लामी शासन स्थापित करने के लिए लोगों में ख़ौफ़ पैदा करते हैं। इसलिए, एक आतंकवादी संगठन के सरगना को अलगाववादी नेता कहना न केवल भ्रम फैलाने जैसा है, बल्कि आतंकवादियों द्वारा मानवता पर किए गए क्रूर अत्याचारों पर पर्दा डालने के भी समान है, जो किसी अपराध से कम नही।
मीम से अब जीजा-साली शायरी और अकबर बीरबल के चुटकुलों के फैक्ट चेक से अपनी वृत्ति चलाने वाले प्रतीक सिन्हा ने उसी ट्वीट में एक शब्द का इस्तेमाल किया जो उसके कुत्सित कार्यों और निकृष्टता के हिसाब से हास्यास्पद है। प्रतीक सिन्हा ने अपनी नीचता की सीमा कई बार लाँघते हुए कई बार नवजात शिशु की जानकारी से लेकर किशोर वय बालकों तक की जानकारी डॉक्सिंग के जरिए इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दी है, जिसके कारण उस लड़के को इस्लामी कट्टरपंथियों ने जान से मारने की धमकी तक दी। ऐसा निहायत ही बेशर्म व्यक्ति जब ‘classy’ शब्द का इस्तेमाल करता है तो विडम्बना घास चरने चली जाती है।
काबुल की एक मस्जिद में शुक्रवार (मई 24, 2019) की नमाज के दौरान विस्फोट में अफगानिस्तान के एक प्रतिष्ठित धार्मिक विद्वान की मौत हो गई और अन्य 16 लोग घायल हो गए। अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि विस्फोट कैसे हुआ। विस्फोट पूर्वी काबुल में अल-तक्वा मस्जिद में हुआ जहाँ मावलावी रैहान इमाम थे। जुमे की नमाज में और वो भी रमजान के पवित्र महीने में अच्छी-खासी संख्या में लोग शामिल होते हैं।
TOLOnews: In an explosion at a mosque in Paktia Kot area in Kabul’s PD9 during Friday prayers, Mawlawi Samiullah Raihan, the imam of the mosque was killed and nine other people were wounded https://t.co/pOlR4kppiD
गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता नसरत रहीमी ने कहा, ‘‘दुर्भाग्यपूर्ण रूप से विस्फोट में मावलावी रैहान मारे गए और 16 अन्य नमाजी घायल हो गए।” विस्फोट दोपहर को करीब 01:20 मिनट पर हुआ। पुलिस प्रवक्ता फिरदौस फरामर्ज ने रैहान के मारे जाने की पुष्टि की और कहा कि जाँचकर्ता विस्फोट की प्रकृति की जाँच कर रहे हैं।
लोकसभा चुनाव-2019 में कुछ सीटों पर चुनावी लड़ाई किसी जंग से कम नहीं रही, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और दिग्विजय के बीच की चुनावी लड़ाई भी न सिर्फ एक साध्वी और एक नेता की लड़ाई थी बल्कि यह लड़ाई सीधे-सीधे सच और झूठ के बीच थी। घटनाक्रमों और परिस्थितियों ने इसे एक तरह से धर्मयुद्ध में बदल दिया था। यह धर्म और अधर्म की लड़ाई बन चुकी थी।
जीत के समीकरण को समझने से पहले यदि आँकड़ों पर नज़र डालें तो साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता ‘दिग्गी राजा’ अर्थात मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और साथ ही ‘हिन्दू आतंक’ के झूठ को स्थापित करने में सारी हदें पार करने वाले दिग्विजय सिंह को 3,64,822 वोटों के अंतर से हराया। लोकसभा चुनाव 2019 में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को कुल 8,66,482 और दिग्विजय सिंह को 5,01,660 वोट मिले। प्रज्ञा ठाकुर को इस सीट पर 60% से भी ज्यादा वोट मिले हैं। बीएसपी कैंडिडेट माधो सिंह अहिरवार को 11,277 और नोटा को कुल 5,430 वोट मिले हैं।
साध्वी प्रज्ञा की जीत उम्मीद जगाने वाली है और साथ ही बहुतों के प्रोपेगेंडा को करारा तमाचा भी, इस चुनाव में साध्वी प्रज्ञा की जीत क्यों बड़ी है और दिग्विजय सिंह की हार ज़रूरी, ऐसा क्यों कहा जा रहा है? यह जानने के लिए हमें कुछ घटनाक्रमों को सिलसिलेवार समझना होगा।
कायदे से, साध्वी प्रज्ञा की जीत की बुनियाद दिग्गी राजा ने खुद ही रख दी थी, जब रखी थी तो सोचा भी नहीं था कि ‘भगवा आतंक’ से लेकर हिंदुत्व और उसके प्रतीकों के प्रति नफ़रत का जो बीज वो बो रहे हैं, एक दिन जब वृक्ष बनेगा तो क्या होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कल इसी के नीचे दबकर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की हत्या हो जाएगी? अगर कोई सोचे की सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाकर या किसी शांतिप्रिय धर्म की मूल अस्मिता से खिलवाड़ कर, देश में लम्बे समय तक अपनी खोखली राजनीति को ज़िंदा रख पाएगा तो वह गफ़लत में है। बेशक पहले चल गया हो या छिप गया हो, लेकिन जब एक बार नक़ाब हटता है तो कहीं भी मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ता। दिग्विजय सिंह के साथ यही हुआ।
कॉन्ग्रेस काल में उन्होंने हिंदुत्व को कलंकित करने का जो षडयंत्र रचा था, उसका भंडाफोड़ तो होना ही था। हुआ भी और कॉन्ग्रेस अपने ही बिछाए जाल में बुरी तरह फँस गई।
साजिश के बीज
मालेगाँव में बम विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा को 2008 में गिरफ्तार किया गया। उन पर इलज़ाम यह था कि उनके नाम पर जो स्कूटर रजिस्टर्ड था उसका इस्तेमाल धमाके की घटना को अंजाम देने के लिए हुआ है। हालाँकि, बाद में यह बात सामने आई कि दो साल पहले ही उसे उन्होंने बेच दिया था।
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने उन्हें इस मामले में क्लीन चीट दे दी है, अदालत ने उनके खिलाफ मकोका (MCOCA) के तहत आरोप हटा दिए हैं और अब उन पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है। इस मामले में बम्बई उच्च न्यायालय ने उन्हें 2017 में जमानत दे दी थी और तब से वह जमानत पर हैं।
थोड़ा पीछे से शुरू कर वर्तमान परिस्थियों पर आते हैं
कॉन्ग्रेस ने सहनशीलता और सहिष्णुणता की गौरवशाली परम्परा वाली सनातन धर्म के वाहकों को हिंदुत्व के दायरे में समेटकर और उसमें भी बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए संघ और भाजपा के ‘भगवा’ के प्रति लगाव को देखते हुए उसे बदनाम करने के लिए हिन्दुओं को बदनाम करना चाहा, इसके लिए भी उसने संघ या बीजेपी से किसी भी तरह से जुड़े अधिकारियों और भगवाधारी साध्वी और संतों को चुना। शायद यह सोचकर कि इस कदम से मुस्लिम मतदाताओं को बीजेपी से पूरी तरह से अलग कर दिया जाए, उनमें अनचाहा डर बैठा दिया जाए। ताकि उनका वोट और समर्थन तो हासिल हो ही साथ ही जातिगत समीकरण की वजह से दलित और वंचित उनके साथ ही रहेंगे या इनके वोटों के ठेकेदारों को कॉन्ग्रेस मिलाकर रखेगी और योजना के मुताबिक बाकी का नैरेटिव वामपंथी बुद्धिजीवी और उनके खेमें के पक्षकार स्वतः पूरी कर देंगें।
लम्बे समय से सत्ता में होने की वजह से कॉन्ग्रेसी दिग्गजों और उनके रणनीतिकारों को ठीक से पता था कि जनता को कैसे बेवकूफ बनाना है, उसे कब कौन से सब्जबाग दिखाने है या सिर्फ योजनाएँ बना देनी है, कहाँ से और कैसे पूरा होगा, इससे कोई सरोकार नहीं है या कोई भी उल-जलूल वादा कर सत्ता पर अधिपत्य जमाए रखना है। क्योंकि तब तक कॉन्ग्रेस के दिग्गजों से कठिन सवाल करने वाले ‘निष्पक्ष’ पत्रकार नहीं थे। जो थे वो स्टूडियो से ही पार्टी का मोर्चा संभालने वाले ‘पक्षकार’ थे। आज भी ऐसे लोग उसी नमक का क़र्ज़ उतारते नज़र आ जाते हैं।
खैर, सबने अपनी भूमिका निभाई, ‘भगवा आतंक’ अस्तित्व में आया लेकिन तमाम ‘निष्पक्ष’ लिबरल पत्रकार मानवता के सीने पर मूँग दलने वाले नक्सलियों, अलगाववादियों, उग्रवादियों का न धर्म ढूँढ पाए और न उनका कोई प्रतीक ही सामने ला पाए जिससे जनता इन्हें ठीक से पहचान सके। यहाँ तक कि यही मीडिया कश्मीर से लेकर देश के लगभग हर कोने में आत्मघाती हमलावरों व आतंकियों का भी कोई धर्म नहीं ढूँढ पाई थी। और तो और, उनके मानवाधिकारों की रक्षा में लगातार कैम्पेनिंग करती रही। यहाँ तक कि अफजल गुरु की फाँसी पर रोक लगाने के लिए भी आधी रात उसी गिरोह के कुछ भटके हुए लोग सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए थे।
देश को खोखला करने और राष्ट्रवाद को गाली बना देने में जिन लोगों ने कॉन्ग्रेस का साथ दिया था, उन सबने अपनी कीमत वसूली। परिणामस्वरुप कॉन्ग्रेस अपने ही घोटालों के बोझ से दबने लगी। देश की जनता को सारा खेल समझ आने लगा। जाँच एजेंसियाँ जो कॉन्ग्रेस के दबाव में हिंदुत्व को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा थी, आरोप पत्र तक दाखिल करने में असमर्थ होने लगीं। आरोप तो थे लेकिन सबूत नदारद। आप झूठ गढ़ सकते हैं, अपने दुष्प्रचार की मदद से उसे जनता के बीच फैला भी सकते हैं, लेकिन कोर्ट का क्या? उसे तो नैरेटिव नहीं बल्कि सबूत चाहिए। शायद पहले लगा हो कॉन्ग्रेस को कि वह भी मैनेज हो जाएगा क्योंकि इससे पहले कॉन्ग्रेसी दिग्गज नेताओं को संस्थाओं की स्वायत्तता से खेलने में महारत हासिल था।
समय बदल रहा था, अब 2012-2013 के बाद से ही देश में सोशल मीडिया का तेजी से उभार और विस्तार हो रहा था। कॉन्ग्रेसी गिरोह के विरोध में भी कुछ मीडिया हाउस अस्तित्व में आ चुके थे या कॉन्ग्रेस से तंग आकर, जो सच है उसे निष्पक्षता से कहने का साहस दिखाने को तैयार हो गए थे। क्योंकि जनता सड़कों पर थी और आक्रोश चरम पर। यहाँ तक कि RVS मणि जैसे कुछ नौकरशाहों ने भी अपनी किताब में जो सच था उसे जनता के सामने ले आने का निश्चय कर लिया था। RVS मणि ने अपनी किताब ‘हिन्दू टेरर’ में इस पूरे षड्यंत्र का पर्दाफाश किया है।
वर्त्तमान परिदृश्य: अधर्म के खिलाफ धर्म की जंग
लगभग 30 साल से बीजेपी जिस भोपाल से जीतती आ रही थी। जब वहाँ से कॉन्ग्रेस ने दिग्विजय सिंह को उतारा तो यह दिग्गी राजा को सबक सिखाने और साथ ही देश के सामने इस मामले से जुड़ी सच्चाइयों को पब्लिक डोमेन में लाने के लिए, उन्हें बहस का मुद्दा बनाने के लिए, बीजेपी के पास यह सुनहरा मौका था, जब एक षड्यन्त्रकारी के सामने एक पीड़िता को खड़ा कर दिया जाए, जिसने 9 साल तक इस षड्यंत्र की यंत्रणा सही है। हर वह दर्द झेला है जो एक साध्वी महिला को तोड़ देने के लिए और एक झूठ को स्थापित करने के लिए रचा गया था।
अमित शाह ने भोपाल से साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी की घोषणा करते हुए कहा था कि यह ‘कथित भगवा आतंकवाद’ की अवधारणा के खिलाफ ‘सत्याग्रह’ है। बाद में अपनेकई बयानों पर विवादों में घिरीं प्रज्ञा सिंह की उम्मीदवारी पर सवाल उठने लगे तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने नई दिल्ली में पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा था कि साध्वी को भाजपा का उम्मीदवार बना कर पार्टी ने कोई गलती नहीं की है। शाह ने कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं पर ‘भगवा आतंकवाद’ की अवधारणा गढ़ने का सीधे-सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि साध्वी प्रज्ञा की भाजपा से उम्मीदवारी ‘भगवा या हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा’ के खिलाफ भाजपा का सत्याग्रह है।
लोकसभा उम्मीदवार घोषित होने के पहले साध्वी प्रज्ञा ने भी एक सवाल के जवाब में कहा था, ‘‘मैं धर्मयुद्ध के लिए तैयार हूँ।” प्रज्ञा ने दिग्विजय सिंह को ऐसे हिंदू विरोधी नेता की संज्ञा दी जो हिंदुओं को आतंकवादी बताते हैं। प्रज्ञा ने जनता से अपील की थी वह उनका साथ दें, उनकी जीत धर्म की जीत है।
हालाँकि, यह भी कहा जा रहा हैं कि 1984 दंगों के आरोपित कमल नाथ भी दिग्गी राजा को किनारे लगाना चाहते थे, इसलिए भी उनको भोपाल जैसी कठिन सीट दी गई। जबकि दिग्विजय ने भोपाल से लड़ने में अनिच्छा जताई थी। लेकिन कमलनाथ की बदौलत अब तो तय था कि दिग्विजय को भोपाल से ही लड़ना है, पार्टी ने घोषणा कर दी। 10 साल तक उसी मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री अगर भागता तो भी जीत साध्वी की होती।
अब मरता क्या न करता, साध्वी प्रज्ञा के हिंदुत्व वाले सेंटीमेंट को बेअसर करने के लिए और एक बार फिर हिन्दुओं को भरमाने के लिए कंप्यूटर बाबा से लेकर मिर्ची बाबा के नेतृत्व में हठयोग से लेकर मिर्ची यज्ञ तक सारे जतन किए, यहाँ तक पार्टी अध्यक्ष जनेऊधारी राहुल गाँधी की तरह मंदिरों के चक्कर भी लगाए, लेकिन कुछ काम नहीं आया। उनका सारा नाटक, पार्टी के फ़र्ज़ी नारे से लेकर चुनावी वादे भी बेअसर रहे।
साध्वी प्रज्ञा की जीत दिग्गी जैसे धूर्त नेताओं के साथ-साथ उन तमाम ‘पक्षकारों’ के लिए भी करारा तमाचा है, जो उन पर आरोप सिद्ध न होने के बावजूद, यहाँ तक कि NIA की अदालत से बरी होने, मकोका हटाए जाने के बाद जब वह कानून सम्मत तरीके से 2017 से जमानत पर बाहर हैं, उनको लगातार इस तरह से पेश करते रहें जैसे वह एक खूँखार किस्म की आतंकी है। जबकि ऐसे ही पत्रकारों के लिए सजायाफ्ता लालू जैसे लोग सामाजिक न्याय के ‘मसीहा’ बने हुए हैं। ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ में उन्हें प्रधानमंत्री उम्मीदवार नज़र आ रहा है।
जबकि, कोर्ट का साफ मानना है कि जब तक आरोप सिद्ध न हो तब तक कोई भी अपराधी नहीं होता, अगर आरोप लगना ही अपराधी होने का सबूत है तो ऐसे ‘पक्षकारों’ और ‘चाटुकारों’ के लिए जमानत पर चल रहे पूरे खानदान में ‘प्रॉमिसिंग प्राइममिनिस्टर’ नज़र नहीं आना चाहिए। 1984 के दंगो को खुला समर्थन देने वाले प्रधानमंत्री के लिए आज भी ‘मिस्टर क्लीन’ का ताज पहनाने के लिए न्यौछावर हो जाने वाले, और उसी दंगे के आरोपित कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया तो किसी के कंठ से कोई भी कठिन सवाल नहीं फूटा। और न ही देश में विरोध की कोई लहर उठी, न कोई अवार्ड वापसी हुई। उसी दंगे के आरोपित यशपाल सिंह आदि को भी उसी चश्में से देख सकें तो आरोपित और अपराधी का घालमेल करें, नहीं तो निष्पक्षता का मुखौटा उतारकर, यह स्वीकार करें कि हम पत्रकार नहीं बल्कि ‘पारिवारिक पक्षकार’ हैं। जो बीजेपी से जुड़े मामलों में जज और परिवार से जुड़े मामलों के ताउम्र वकील हैं।
खैर, जनता ने साध्वी प्रज्ञा को संसद में भेजकर और कॉन्ग्रेस के तमाम फ़र्ज़ी वायदों को धता बताते हुए एक बार फिर उसका सूपड़ा साफ कर और दिग्गी राजा जैसे धूर्त नेताओं को उसके किए की, प्रतीकात्मक ही सही, सजा देकर अपना मत और जनमत ज़ाहिर कर दिया है। लेकिन उन ‘पक्षकारों’ को कौन सजा देगा जो लगातार पत्रकारिता की आड़ में झूठ परोस रहे हैं और लगातार जनता की आड़ लेकर अपनी नफरत और कुंठा को देश की आवाज़ बना कर परोस रहे हैं? क्या उनके लिए भी कोई सजा है?
शायद सीधे-सीधे नहीं पर उनके झूठ का नकाब उतरना और उनका बार-बार झूठा साबित होना ही आने वाले समय में उनकी प्रासंगिकता को ख़त्म कर देने के लिए पर्याप्त है। कहते हैं कि अगर एक बार किसी की विश्वसनीयता ख़त्म हो गई तो उसकी कही हर बात सिर्फ मनोरंजन का साधन रह जाती है और ऐसे नेता और ‘पक्षकार’ पत्रकार ताश की गड्डी का महज एक जोकर होकर रह जाते हैं, जो होते तो हैं लेकिन ज़रूरी नहीं, उनके बिना भी धूमधाम से खेल जारी रहता है।
शुक्रवार (मई 23, 2019) की सुबह मेरठ के किठौर थानाक्षेत्र में दो पक्षों के युवकों में आपसी झड़प की खबर आई। अमर उजाला में प्रकाशित खबर के मुताबिक पुलिस ने बताया है कि एक दुकान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारों को लेकर अनुसूचित जाति व गुर्जर समाज के युवकों के बीच कहा-सुनी हुई।
ये घटना गुरुवार शाम की है। हालाँकि, उस समय मामले को शांत करा दिया गया। लेकिन, शुक्रवार को ये बात बढ़ गई और अनुसूचित पक्ष के युवक क्षेत्र के मंदिर पर आए। यहाँ दोबारा ऐसी ही किसी बात को लेकर विवाद शुरू हो गया।
दोनों पक्षों के युवक लाठी-डंडे लेकर एक दूसरे को मारने के लिए खड़े हो गए। थोड़ी ही देर बाद वहाँ मार-पीट शुरू हो गई। सूचना मिलने पर पुलिस मौक़े पर आई। दोनों पक्षों को समझाकर मामले को शांत कराया गया। इस घटना को देखने के बाद गाँव में पुलिस तैनात कर दी गई है। खबर के अनुसार सीओ आलोक कुमार सिंह व थाना प्रभारी प्रेमचंद सिंह पुलिस फोर्स के साथ मौके पर मौजूद हैं।
बता दें कि यह पहला मौक़ा नहीं है जब नारों को लेकर ऐसी आपसी झड़प देखने को मिली हो। कुछ समय पहले मोदी विरोधी नारे लगने के कारण मेरठ के थाना लिसाड़ीगेट क्षेत्र में भी लोग भड़क गए थे और दूसरे पक्ष के साथ मारपीट की नौबत आ गई थी।
गुजरात के सूरत के तक्षशिला कॉम्पलेक्स में चलने वाले इंस्टीट्यूट में शुक्रवार (मई 24, 2019) को भीषण आग लग गई। आग इतनी भीषण थी कि इसमें झुलसने से 15 लोगों की मौत हो गई है, जिसमें एक टीचर के शामिल होने की भी खबर है। आग लगने के बाद हालात ऐसे बन गए की कुछ लोग तो जान बचाने के लिए इस चार मंजिला इमारत से नीचे कूद पड़े। आग को बुझाने के लिए दमकल की 18 गाडियाँ और दमकल विभाग के 50 कर्मचारी मौके पर पहुँचे। फिलहाल, आग पर काबू पा लिया गया है। लेकिन अभी भी कई लोगों के इमारत में फँसे होने की बात कही जा रही है।
Gujarat: A fire breaks out on the second floor of a building in Sarthana area of Surat; 18 fire tenders at the spot. More details awaited.
खबर के मुताबिक, कुल 50 बच्चे ट्यूशन सेंटर में मौजूद थे। हालाँकि, अभी तक आग लगने के कारणों का पता नहीं चल पाया है। लेकिन बिल्डिंग से लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने का काम जारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हादसे पर संवेदना व्यक्त की। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि सूरत में आग की त्रासदी से बहुत पीड़ा हुई। इस हादसे में प्रभावित हुए लोगों के परिवारों के साथ उनकी सहानुभूति है, साथ ही उन्होंने घायलों के जल्द ठीक होने की कामना की। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने गुजरात सरकार और स्थानीय अधिकारियों से प्रभावित लोगों को हर संभव सहायता प्रदान करने के लिए भी कहा है।
Extremely anguished by the fire tragedy in Surat. My thoughts are with bereaved families. May the injured recover quickly. Have asked the Gujarat Government and local authorities to provide all possible assistance to those affected.
जानकारी के मुताबिक, आग तक्षशिला कॉम्पलेक्स के दूसरी मंजिल के इंस्टीट्यूट में लगी है। आग लगने के बाद कॉम्पलेक्स में अफरातफरी मच गई। राज्य के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने हादसे में आहत हुए लोगों के लिए ₹4लाख रुपए की आर्थिक मदद की घोषणा की है और साथ ही उन्होंने मामले की जाँच के आदेश भी दिए हैं।
कल यानि 23 मई 2019 को लोकसभा चुनाव का परिणाम घोषित हुआ जिसमें भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला तो वहीं कॉन्ग्रेस को करारी शिकस्त मिली। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी रहने वाली पार्टी कॉन्ग्रेस की आज ये स्थिति हो गई है कि उसे 50 का आँकड़ा पार करने में भी पसीने छूट गए। इस बार भाजपा 303 सीटों पर विजयी हुई तो वहीं कॉन्ग्रेस महज 52 सीटें ही अपने कब्जे में कर पाई। लोकसभा चुनाव प्रचार की कमान संभालते हुए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने आक्रामक प्रचार किया, ताबड़तोड़ रैलियाँ की और रोड शो कर भीड़ भी जुटाई। इंटरव्यू के जरिए भी लोगों तक अपनी बात पहुँचाने की कोशिश की। मगर उनकी मेहनत वोट में नहीं बदल पाई।
जमीनी स्तर पर संगठन और ठोस रणनीति के अभाव में राहुल गाँधी को अपनी पुश्तैनी सीट अमेठी में भी हार का सामना करना पड़ा। यहाँ पर भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने 54,731 वोटों से राहुल गाँधी को मात दी। कॉन्ग्रेस की हार के पीछे की एक वजह कुशल नेतृत्व का न होना भी है। कॉन्ग्रेस ने महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, केरल और तमिलनाडु सहित कई राज्यों में गठबंधन में चुनाव लड़ा। इन प्रदेशों में आखिरी वक्त तक सीट को लेकर सहयोगियों से सामंजस्य का अभाव दिखा। इसके अलावा कॉन्ग्रेस ने कुछ ऐसे भी काम किए जिसकी जरूरत ही नहीं थी:
न्याय योजना
कॉन्ग्रेस ने अपना चुनावी घोषणापत्र जारी करते हुए न्याय योजना की घोषणा की। इस न्याय योजना के तहत कॉन्ग्रेस ने 25 फीसदी गरीबों के खाते में ₹6 हजार प्रतिमाह के हिसाब से ₹72 हजार सालाना भेजने का वादा किया। फिलहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कई ऐसी योजनाएँ चल रही हैंं, जिसमें पैसा सीधे लोगों के खाते में पहुँच रहा है। इन योजनाओं में किसान सम्मान निधि योजना, प्रधानमंत्री जन-धन योजना, मुद्रा योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना आदि शामिल है, तो जाहिर सी बात है कि जब इतनी सारी योजनाएँ पहले से ही चालू हैं और जनता को इनका फायदा मिल रहा है, तो भला कोई राहुल गाँधी की न्याय योजना में दिलचस्पी क्यों दिखाएगा? और शायद यही वजह रही कि जनता ने कॉन्ग्रेस की न्याय योजना को पूरी तरह से नकार दिया। इसकी जगह कॉन्ग्रेस ने कुछ और किया होता, जो कि अभी तक मौजूदा सरकार ने नहीं किया है, तो शायद तस्वीर कुछ और होती।
राफेल डील
राफेल डील को लेकर कॉन्ग्रेस लगातार पीएम मोदी पर हमलावर रही। जब से ये डील हुई है, राहुल गाँधी बिना किसी तथ्य, और आधार के ‘चौकीदार चोर है’ का नारा देकर पीएम मोदी को चोर कहते रहे। राहुल गाँधी ने खुद भी इस बात को माना है कि उनके पास राफेल से जुड़ा कोई भी डिटेल नहीं है। इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें साफ तौर पर देखा जा सकता है कि राफेल डील में हुए घोटाले को लेकर लंबा-लंबा बोलने वाले राहुल गाँधी से जब ये पूछा जाता है कि अगर केंद्र में उनकी सरकार आती है, तो क्या वो राफेल डील को रद कर देंगे? तो इसका जवाब देते हुए राहुल गाँधी कहते हैं कि उनके पास राफेल डील के डिटेल्स नहीं हैं। वो एयरफोर्स से इसके बारे में बात करेंगे, उसके बाद ही कोई फैसला करेंगे। अब यहाँ पर सवाल उठता है कि जब आपके पास इसका डिटेल नहीं है, तो फिर आप किस आधार पर पीएम मोदी को चोर बोल रहे थे? सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल डील को क्लीन चिट देने के बावजूद राहुल गाँधी ने लगातार चौकीदार चोर है नारा देकर पीएम मोदी को चोर बोला। इतना ही नहीं, राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कह दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी पीएम मोदी को चोर माना। जिसके लिए उन्हें कोर्ट की तरफ से फटकार मिली और फिर माफी भी माँगनी पड़ी।
घोषणापत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ की बात जनता को नहीं आई पसंद
जहाँ देशभर में हर तरफ राष्ट्रवादी माहौल हो, उस बीच कॉन्ग्रेस द्वारा राजद्रोह क़ानून (124a) को खत्म करने और सशस्त्र सेना (विशेषाधिकार) अधिनियम (1958) यानी AFPSA क़ानून में संशोधन और धारा 370 को खत्म न करने जैसे मुद्दों को घोषणापत्र में जगह देना पार्टी को महँगा पड़ गया। हालाँकि, उन्होंने इस घोषणा के माध्यम से अल्पसंख्यकों को लुभाने और एंटी बीजेपी वोट को साधने की भरपूर कोशिश की, मगर उनका ये दाँव बहुसंख्यक राष्ट्रवादी वोटरों को रास नहीं आया और इस दाँव की वजह से वोटरों के बीच कॉन्ग्रेस की देश-विरोधी छवि बनी। राहुल गाँधी द्वारा टुकड़े टुकड़े गैंग का समर्थन करना भी भारी पड़ गया।
राजद्रोह को परिभाषित करने वाली धारा 124a को खत्म करने का मतलब है- देश में मौजूद देशविरोधी तत्वों को खुली छूट देना, उन्हें देश विरोधी नारे लगाने की अनुमति देना, टुकड़े-टुकड़े गैंग को देश-विरोधी कृत्यों के लिए प्रोत्साहित करना। देश के किसी सामान्य नागरिक को भी समझ आ सकता है कि ये कदम देश की एकता और अखंडता को मजबूत करने के पक्ष में तो बिल्कुल भी नहीं है, बल्कि इससे तो देश की अखंडता पर संकट ही मंडराता नज़र आया। कश्मीर घाटी में सेना की मौजूदगी को कम करने, सशस्त्र बलों के अधिकारों की समीक्षा करने की बात कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कही। जो कि जनता को बिल्कुल भी पसंद नहीं आया और उन्होंने कॉन्ग्रेस को ठुकरा दिया।
इसके साथ ही कॉन्ग्रेस ने सुरक्षा और मानवाधिकारों के संतुलन हेतु कानूनों में उचित बदलाव की भी घोषणा की थी। कश्मीर में ऐसा देखा गया है कि वहाँ पर मानवाधिकार केवल आतंकियों का देखा जाता है सेना के जवानों का नहीं। इसलिए कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में मानवाधिकार की बात करने से निश्चित रूप से आतंकियों को फायदा पहुँचाने जैसी बात हुई। यहाँ पर सशस्त्र बलों के अधिकारों की समीक्षा करने का स्पष्ट संकेत सुरक्षा बलों के अधिकार में कटौती करने से है। जनता को ये बात अच्छी तरह से समझ में आ गया था कि यदि कॉन्ग्रेस सत्ता में आई, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं कि वर्तमान समय में कश्मीर में हो रहे ऑपरेशन ऑल आउट पर विराम लगता।
वहाँ सुरक्षाबलों को हर छोटे-बड़े एक्शन के लिए सरकार से ऑर्डर लेने की जरूरत पड़ती और ये तो सामान्य सी बात है कि जिस कश्मीर में इतनी भारी मात्रा में सुरक्षाबलों की तैनाती के बावजूद पुलवामा और उरी जैसी बड़ी आतंकवादी घटनाएँ घटित हो जाती हैं, उस कश्मीर में सुरक्षाबलों की संख्या कम करना और सुरक्षाबलों के अधिकार में कटौती करना निश्चित रूप से देश को कमजोर करने वाला, सेना का मनोबल तोड़ने वाला और देश-विरोधी ताक़तों को मजबूती देने वाला फैसला होता। यदि वास्तव में ऐसा हो जाता तो निश्चित रुप से अलगाववादियों के हौसले बुलंद होते और सेना पर पत्थरबाजी करने वाले बेखौफ होकर और अधिक संख्या में पत्थरबाजी करने सड़क पर उतर जाते। इसलिए जनता ने कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लिया और उनके इस कदम को राष्ट्रविरोधी बता सिरे से नकार दिया।
अब बात करते हैं अनुच्छेद 370 की। देश भर में इस समय “एक देश एक क़ानून” का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। जनता कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 को लेकर जागरूक हो रही है और इसे हटाने की पक्षधर है, क्योंकि 370 कहीं-ना-कहीं कश्मीर को भारत से अलग करता है। किसी भी देश में एक संविधान और एक क़ानून होना ही आदर्श स्थिति होती है। देश की बहुसंख्यक जनता अनुच्छेद 370 हटाने को लेकर खासे उत्साहित है तथा बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में इसे हटाने की बात भी कही। ऐसे में 370 हटाने को लेकर लोगों की अपेक्षाएँ बीजेपी से और भी ज्यादा बढ़ गई। वहीं, कॉन्ग्रेस ने अपने मेनीफेस्टो के जरिए घोषणा करती है कि यदि वो सत्ता में आती है, तो 370 को कभी खत्म नहीं होने देंगी। इससे जनता के बीच ये संदेश गया कि कॉन्ग्रेस एक देश में दो अलग-अलग कानून को लागू रखना चाहती है, इससे ना तो देश का भला होता और ना ही कश्मीरी लोगों का। ऐसे में देश की जागरुक जनता ने कॉन्ग्रेस को सत्ता से दूर रखना ही उचित समझा।
इसके अलावा बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान सबूत माँगना भी कॉन्ग्रेस के हार की एक अहम वजह रही। जिस तरह से कॉन्ग्रेस पार्टी ने पुलवामा हमले के बाद किए गए एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाया और सबूत माँगा, वो लोगों को रास नहीं आया। सेना की कार्रवाई पर सवाल उठाना, उनके मनोबल को गिराना, सेना को लेकर उल-जुलूल टिप्पणी करना, सेना को लेकर सियासत करना पार्टी को काफी महँगा पड़ गया। पार्टी मोदी विरोध की आड़ में देश विरोध पर उतर आई थी, जो कि जनता को पसंद नहीं आया, क्योंकि देश के नागरिक के लिए देश की गरिमा से बढ़कर कुछ नहीं होता है, जो कि शायद कॉन्ग्रेस पार्टी समझ नहीं पाई। मगर जनता ने उन्हें अपने मताधिकार के प्रयोग से अच्छी तरह से समझा दिया।
प्रधानमंत्री की छवि बिगाड़ने की भरपूर कोशिश
राहुल गाँधी ने एक इंटरव्यू के दौरान विवादित बयान देते हुए कहा था कि पीएम मोदी की ताकत उनकी इमेज है और वो उनकी इमेज को खराब कर देंगे। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री की छवि को बिगाड़ने के लिए MODILIE शब्द को लेकर दावा भी किया था कि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इस शब्द को डिक्शनरी में स्थान दिया है। जिसका तीन अर्थ बताया गया था। पहला अर्थ- बार-बार बदला सच, दूसरा अर्थ- ऐसा झूठ जो आदतन बोला जाता है और तीसरा अर्थ- लगातार झूठ बताया गया था। जबकि इंटरनेट पर सर्च करने पर आपको ये शब्द कहीं नहीं मिलेगा, क्योंकि जो तस्वीर राहुल गाँधी ने शेयर की थी, उसमें छेड़-छाड़ की गई थी। हालाँकि, ऑक्सफॉर्ड डिक्शनरी ने खुद राहुल गाँधी के इस ट्वीट पर रिप्लाई करते हुए स्पष्ट कर दिया था कि उनकी डिक्शनरी में ऐसा कोई शब्द नहीं है और शेयर की गई तस्वीर झूठी तस्वीर है। इससे राहुल गाँधी का एक और झूठ सामने आया।
प्रियंका गाँधी का अपमानजनक व्यवहार
कॉन्ग्रेस का इस चुनाव के हारने के पीछे पार्टी की महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा के व्यवहार की भी भूमिका रही। उनके अपमानजनक व्यवहार की वजह से ही उत्तर प्रदेश के भदोही की कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नीलम मिश्रा ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और उनके साथ ही कई अन्य कार्यकर्ताओं ने भी हाथ का दामन छोड़ दिया। पार्टी के महासचिव होने के नाते आपका काम है कि आप आपने कार्यकर्ताओं की शिकायतें दूर करें, उन्हें सहज करें, न कि सरेआम बेइज्जती करें, जो कि नीलम मिश्रा के साथ किया गया। नीलम मिश्रा ने भदोही में चुनावी सभा के बाद प्रियंका से वहाँ के पार्टी के प्रत्याशी रमाकांत यादव की शिकायत करते हुए कहा था कि वो जिला कॉन्ग्रेस के साथ बिल्कुल भी तालमेल नहीं रख रहे हैं। नीलम की इस शिकायत का निवारण करने की बात तो दूर, उल्टा प्रियंका ने तो उन्हें सरेआम बेइज्जत ही कर दिया और कहा कि अगर आप लोग अपमानित महसूस कर रहे हैं, तो करते रहिए। अब जब पार्टी की महासचिव अपने ही कार्यकर्ताओं के साथ इस तरह से पेश आएगी और उनकी समस्याओं का समाधान न करके अपमानित करेगी, तो फिर वो पार्टी देश की जनता की परेशानियों को कैसे दूर करेगी?
प्रियंका चतुर्वेदी का पार्टी छोड़कर जाना
कॉन्ग्रेस पार्टी में अंतर्विरोध और असंतोष की खाई तो काफी समय से गहराती जा रही है। पार्टी के नेता शकील अहमद की बगावत, फायरब्रांड मोदी-विरोधी अल्पेश ठाकोर के इस्तीफ़े और सहयोगी मुख्यमंत्री कुमारास्वामी के बेटे की उम्मीदवारी के खिलाफ होने पर 7 नेताओं के निष्कासन जैसे मामलों से जूझने वाली पार्टी को एक और झटका तब लगा, जब पार्टी की तेज-तर्रार प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने पार्टी में मेहनती लोगों की जगह बदमाशों को तरजीह देने की बात कहते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया। प्रियंका की बातोंं से साफ दिखा कि कॉन्ग्रेस में महिला सम्मान को किस तरह से दरकिनार किया गया। कॉन्ग्रेस की हार में कहीं न कहीं ये भी एक वजह रही।
गठबंधन की आड़ में वोटरों को गुमराह करना
मोदी विरोध के नाम पर एकजुट होने का ढोंग करने वाली कॉन्ग्रेस समेत सभी विपक्षी पार्टियाँ मौका-बेमौका एक दूसरे पर हमलावर होती नज़र आई। हालाँकि इनकी अंदरुनी खटपट साफ तौर पर जनता को दिखी। मोदी विरोध में कभी कॉन्ग्रेस पार्टी गठबंधन (सपा-बसपा) के साथ एक पाले में नज़र आई तो कभी राहुल गाँधी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव को पीएम मोदी की रिमोट से चलने वाले बताकर तंज कसते दिखाई दिए। इससे जहाँ विपक्षी एकता के दावे खोखले नज़र आए, तो वहीं वोटर भी कनफ्यूज हुए। जिसका खामियाजा इन्हें भुगतना पड़ा। इसके अलावा एक और चीज जो देखने को मिली, वो ये कि गठबंधन के नेता किसी एक नेता के प्रधानमंत्री बनने के नाम पर एकमत नहीं थे, राहुल गाँधी के पीएम बनने पर भी नहीं। सभी नेता खुद ही प्रधानमंत्री बनने के लिए लालायित दिखे। तो ऐसे में जनता को इनके बीच की आपसी खटपट साफ तौर पर दिखी और उन्हें समझते देर नहीं लगी कि जब ये आपसी कलह ही नहीं सुलझा पा रहे हैं, तो फिर देश की सत्ता कैसे संभालेगे?
पार्टी के दिग्गज नेताओं की फिजूल बयानबाजी ले डूबी पार्टी को
कॉन्ग्रेस की इस हार में इनके दिग्गज नेताओं का भी अहम योगदान रहा। इन्होंने पार्टी को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इनमें से कुछ नाम प्रमुख है:
सैम पित्रोदा:- चुनावी माहौल के बीच जहाँ पार्टियाँ अपने मतदाता को लुभाने की कोशिश करती नजर आती है, वहीं गाँधी परिवार के बेहद करीबी और इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा के 1984 के सिख दंगे को लेकर दिया हुआ बयान ‘हुआ तो हुआ’ कॉन्ग्रेस को बैकफुट पर ला दिया। 1984 का दंगा कॉन्ग्रेस शासनकाल का एक कलंक है, जिस पर पार्टी बात करने से कतराती है और दूर रहने की कोशिश करती है, मगर पित्रोदा ने उस पर ही इस तरह का बयान देकर कॉन्ग्रेस को बुरी तरह से डुबो दिया। इससे जनता के बीच पार्टी की संवेदनहीन छवि का संदेश गया। इसके अलावा पित्रोदा ने पुलवामा हमले पर बड़ा बयान देते हुए कहा था कि पुलवामा हमले के लिए पूरे पाकिस्तान पर आरोप लगाना सही नहीं है और साथ ही उन्होंने मुंबई हमले के लिए पूरे पाकिस्तान को दोषी बताने को भी गलत करार दिया।
मणिशंकर अय्यर:- इन्होंने तो जैसे कॉन्ग्रेस की नैया डुबोने की कसम ही खा रखी थी। ये पिछले काफी समय से कॉन्ग्रेस को हराने में अपना योगदान देते आ रहे हैं। मणिशंकर ने साल 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी के लिए ‘चायवाला’ शब्द का प्रयोग किया। जिसकी काफी आलोचना हुई और पार्टी बुरी तरह हार गई। मगर मणिशंकर इतने पर नहीं माने, उन्होंने साल 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी के लिए ‘नीच’ शब्द का इस्तेमाल कर कॉन्ग्रेस को हराने में एक बार फिर से अपनी भूमिका निभाई। और एक बार फिर इस लोकसभा चुनाव में उनकी वापसी नीचता वाले बयान के साथ हुई। जिसका खामियाजा कॉन्ग्रेस को भुगतना पड़ रहा है। हालाँकि, मणिशंकर अय्यर एक बार फिर से अपने मकसद में कामयाब हुए।
नवजोत सिंह सिद्धू:– सिद्धू ने बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान सेना द्वारा की गई कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि सेना वहाँ पर पेड़ उखाड़ने गई थी क्या? इसके साथ ही उन्होंने पीएम मोदी पर कई विवादित टिप्पणी की। उन्होंने पीएम मोदी को चूड़ी खनकाने वाली दुल्हन से लेकर काला अंग्रेज, फेकू नंबर वन, दर्शनीय घोड़ा बताते हुए एक और विवादित बयान दिया था कि ऐसा छक्का मारो कि मोदी बाउंड्री पार चला जाए। जनता को इनकी स्तरहीन बयानबाजी पसंद नहीं आई और उन्होंने कॉन्ग्रेस को ही बाउंड्री पार पहुँचा दिया।
शत्रुघ्न सिन्हा:– इनके एक और नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने मोहम्मद अली जिन्ना को देश की आजादी का नायक और कॉन्ग्रेस को जिन्ना की पार्टी कह दिया।
मल्लिकार्जुन खड़गे:– वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, “जहाँ भी वह (मोदी) जाते हैं, कहते हैं कि कॉन्ग्रेस को लोकसभा चुनाव में 40 सीटें भी नहीं मिलेंगी। क्या आपमें से कोई भी इसे मानता है? अगर हमें 40 सीटें मिल गईं तो क्या मोदी दिल्ली के विजय चौक में फाँसी लगा लेंगे?”
प्रियंका गाँधी:– कॉन्ग्रेस महासचिव ने भाषा की मर्यादा लांघते हुए पीएम मोदी को दुर्योधन कह दिया और साथ ही कहा, “इनसे (मोदी) बड़ा कायर, इनसे कमजोर प्रधानमंत्री मैंने जिंदगी में नहीं देखा है।”
वहीं, कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने पीएम मोदी को तुगलक तो हार्दिक पटेल ने यमराज कहा। इसके साथ ही हरियाणा के सिरसा में प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने राहुल गाँधी की उपस्थिति में पीएम को रावण बताया और सुशील शिंदे ने पीएम मोदी की तुलना हिटलर से करते हुए तानाशाह तक कह दिया। वहीं, लोकसभा चुनाव के परिणाम साफ तौर पर ये संकेत दे रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा का मुकाबला करने के लिए कॉन्ग्रेस को पूरी तरह बदलना होगा। कॉन्ग्रेस के मौजूदा संगठन, रणनीति और कार्यकर्ताओं की बदौलत भाजपा को शिकस्त देना बेहद मुश्किल है। अगर कॉन्ग्रेस को सियासी मैदान में भाजपा से मुकाबला करना है, तो पार्टी को बिना कोई वक्त गंवाए गलतियों से सीखते हुए बड़े बदलाव करने होंगे।