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कश्मीरी बच्चे की कविता में दिखा हिन्दुस्तान-प्रेम, पाकिस्तान और अलगाववादियों को नहीं भाएँगे ये सुर

कश्मीर के जो हालात हैं उससे पूरी दुनिया वाक़िफ़ है। आए दिन हमलों की गिरफ़्त में रहने वाला कश्मीर कभी पाकिस्तान की छद्म हरक़तों का शिकार होता है, तो कभी अलगाववादी नेताओं की देश-विरोधी विचारधाराओं की भेंट चढ़ता है। इन्हें अक्सर यह कहते पाया गया है कि कश्मीर की जनता भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के साथ की कामना करती है। पाकिस्तान भी आए दिन ऐसी बयानबाज़ी करता रहता है जिसमें उसकी कुटिल चाल स्पष्ट दिख जाती है। ऐसे माहौल में एक मासूम बच्चे ने अपनी एक कविता के माध्यम से पाकिस्तान और अलगाववादी नेताओं के गाल पर ज़ोरदार तमाचा मारने का काम किया है।

इस कविता में कश्मीरी बच्चे ने ‘भारत देश’ के लिए मानों अपना दिल ही निकालकर सामने रख दिया हो। देशभक्ति की ऐसी अनूठी मिसाल, वो भी इतनी सी उम्र में कम ही देखने को मिलती है। हिन्दूस्तान को ऐसे बच्चों पर बड़ा नाज़ है, जिनकी मासूमियत भले ही नफ़रत के साये में पल रही हो, लेकिन उनका दिल हिन्दुस्तान के लिए धड़कता है।

कश्मीरी बच्चे की यह कविता देश और बाकी दुनिया के लिए संदेश है कि जिस भारत के सीने को पाकिस्तान हमेशा से ही छलनी करता आया है, उसकी असलियत तो बच्चे भी जानते हैं। ये कविता ऐसे ही लोगों के लिए मुँहतोड़ जवाब है जो कहते हें कि कश्मीर की जनता भारत की बजाए पाकिस्तान के साथ रहना चाहती है।

आइये इस बच्चे की कविता की चंद पंक्तियों पर ग़ौर करते हैं, जिसमें उसने दुनिया को बताना चाहा है कि उसके दिल और दिमाग में केवल भारत ही बसता है…

क्‍या पूछता है मुल्‍क में किसका नज़ारा है
मेरी नज़रों में देखों मुल्‍क का दिलकश नज़ारा है
मेरे हाथों की रेखाओं में नक्‍शे हिंद सारा है
खूं के आख़िरी कतरे ने हिंदुस्‍तान पुकारा है
मेरा दिल है मेरी जां है मेरी आँखों का तारा है
ये हिंदुस्‍तान, ये हिंदुस्‍तान ये हिंदुस्‍तान हमारा है
ये हिंदुस्‍तान, ये हिंदुस्‍तान ये हिंदुस्‍तान हमारा है

भारत, देश के ऐसे बच्चों पर हमेशा गर्व करता है, जिसकी देशभक्ति आसमान छूती है। ऐसे बच्चे एक मिसाल क़ायम करने की दिशा में होते हैं जिनका कोमल मन केवल प्रेम का देना जानते हैं।

अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ चुनाव मैं लड़ूँगा – Bigg Boss के विवादित कंटेस्टेंट ने किया ऐलान

टीवी जगत के चर्चित रिएलिटी टीवी शो ‘बिग बॉस’ के सीज़न 10 के सबसे विवादित कंटेस्टेंट स्वामी ओम अपने विवादित बयानों को लेकर हमेशा ही चर्चा में रहते हैं। स्वयंभू बाबा स्वामी ओम एक बार फिर से सुर्ख़ियों में तब आ गए, जब उन्होंने रविवार (24 मार्च 2019) को एक बयान देते हुए कहा कि वह नई दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे ।

‘बिग बॉस’ के प्रतिभागी रहे स्वामी ओम दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के ‘हिंदू-विरोधी’ रवैये के ख़िलाफ़ लड़ेंगे। स्वामी ओम का कहना है कि जिस तरह से केजरीवाल ने कुछ दिनों पहले ट्वीट करते हुए आम आदमी पार्टी के चुनाव चिन्ह ‘झाड़ू’ को हिंदू धर्म के प्रतीक ‘स्वास्तिक’ का पीछा करते हुए दिखाया था, वो हिंदुओं की भावना के साथ खिलवाड़ है। इससे गुस्साए स्वामी ओम ने अब चुनाव में अरविंद केजरीवाल की नीतियों के ख़िलाफ़ ताल ठोंकने का मन बना लिया है। स्वामी ओम कहते हैं कि बीते शनिवार को तमाम हिंदू संगठनों की बैठक के बाद उनका नाम चुनाव लड़ने के लिए प्रस्तावित किया गया है।

बता दें कि स्वामी ओम अपने बड़बोलेपन की वजह से कई शो और कार्यक्रम में पिट भी चुके हैं। बिग बॉस में भी वो हमेशा अपनी हरक़तों और विवादित बयानों की वजह से सुर्ख़ियों में रहे। उनकी हरक़तों से तंग आकर बिग बॉस शो ने बीच शो से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। बाहर निकलने के बाद स्वामी ओम ने शो के होस्ट सलमान ख़ान और बिग बॉस के मेकर्स पर तमाम गंभीर आरोप लगाए, मगर वो आज तक अपने किसी भी आरोप को साबित नहीं कर पाए।

ग़ौरतलब है कि दिल्ली की राजनीति में नई दिल्ली की लोकसभा और विधानसभा सीट को अहम माना जाता है । क्योंकि यहाँ से दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं और इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी इसी विधानसभा सीट जीतती आई हैं । फिलहाल दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का क़ब्ज़ा है।

ICU में 29 साल की महिला का डॉक्टर समेत 3 लोगों ने किया रेप: शादाब मुख्य आरोपित, नियाजू और नर्स भी शामिल

उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक प्राइवेट नर्सिंग होम में 3 लोगों (डॉक्टर समेत) पर 29 वर्षीय महिला के बलात्कार का आरोप लगा है। साथ ही 1 नर्स पर भी इस दुष्कर्म में शामिल होने का इल्ज़ाम है। इस मामले में पुलिस ने अब तक तीन आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया है जबकि एक अब भी फ़रार है।

पुलिस का कहना है कि 21 मार्च को सांस की परेशानी होने के कारण महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ महिला की जाँच के बाद फैटी लीवर की परेशानी सामने आई। पीड़िता के पति ने पुलिस को अपनी शिक़ायत में बताया कि नर्सिंग होम में उसकी पत्नी को एडमिट करने के बाद पहले नर्स ने उसे एक नशे का इंजेक्शन लगाया और बाद में 3 लोगों ने उसके साथ गैंग रेप किया।

पीड़िता के मुताबिक उसे इसकी जानकारी तब हुई जब उसे होश आया और उसने अपने पास वार्ड ब्वॉय को लेटा हुआ देखा। इसके बाद वह चिल्लाई, लेकिन जब तक महिला का पति आईसीयू में पहुँचा तब तो आरोपित वहाँ से भाग चुका था। इन सबके बाद पीड़िता की ओर से पुलिस में FIR दर्ज करवाई गई।

इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक पुलिस ने बताया है कि यह मामला धारा 376 के तहत 4 लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज हुआ है। आरोपितों के नाम नियाजू (20), अशोक मलिक (35), शादाब (23) और लक्ष्मी (50) हैं। शादाब को इस पूरे मामले का मुख्य आरोपी बताया जा रहा है।

बता दें कि पीड़िता को मेडिकल जाँच के लिए भेज दिया गया है और अब रिपोर्ट आने का इंतज़ार है। ग़ौर करने वाली बात है कि मेरठ के अस्पताल में हुए बलात्कार का यह पहला मामला नहीं हैं। पिछले साल नवंबर में भी रिटायर्ड फौजी की बीमार 60 वर्षीय पत्नी के साथ नशे के इंजेक्शन को लगाकर रेप किए जाने का मामला सामने आया था, जिसके बाद कंपाउंडर को देर रात पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किया गया था।

‘बाप-बेटी’ ने कश्मीर दिया, अब नाती-पोते पाक के लिए कर रहे बैटिंग!

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के मुख्य सलाहकार सैम पित्रोदा का पुलवामा हमले में पाकिस्तान को क्लीन चिट देना और भारतीय सेना के पराक्रम पर सवाल उठाना, यह क्या यह अनजाने में दिया गया व्यक्तिगत बयान है? यदि यह मान भी लें कि सैम पित्रोदा की उम्र हो चली है, इसलिए उनकी जुबान फिसल गई तो अभी कुछ दिन पूर्व राहुल गाँधी ने भी सार्वजनिक रूप से टीवी के कैमरों के सामने दुर्दांत आतंकवादी मसूद अजहर को जी लगाकर सम्मानित किया था। कॉन्ग्रेस की ओर से इस पर सफाई नहीं आई और इस मुद्दे को गोलमोल करने का प्रयास किया गया। दावा किया जाता है कि राहुल गाँधी 50 साल की उम्र में भी अभी नवयुवक हैं, इसलिए कॉन्ग्रेस यह भी नहीं कह सकती कि उम्र के कारण उनकी याददाश्त कमजोर हो गई है और उनसे अनजाने में यह भूल हुई है।

पाकिस्तान के पक्ष में और भारत के विरोध में बैटिंग करने वाले शीर्ष कॉन्ग्रेसियों की सूची लंबी भी है और पुरानी भी। दिग्विजय, मणिशंकर अय्यर, नवजोत सिंह सिद्धू, शशि थरूर जैसे तमाम नाम हैं, जो निश्चित समयांतराल पर पाकिस्तान-परस्त बयानबाजी करके भारतीय हितों के विरुद्ध पाकिस्तान के दावे को न केवल मजबूत करते हैं, बल्कि भारत के लोगों, भारत की सेना और भारत की संवैधानिक संस्थाओं का मनोबल गिराने का प्रयास करते हैं।

यह सवाल अक्सर उठता है कि आखिर कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष नेता इस तरह की ‘गलती’ बारबार और जानबूझकर क्यों करते हैं? इसकी तह में जाने के लिए आपको कॉन्ग्रेस के इतिहास को खंगालना होगा और इस इतिहास में नेहरू परिवार के प्रभुत्व के काल को ठीक से देखना होगा।

आजादी के बाद नेहरू कॉन्ग्रेस को एक तरह अपने परिवार की प्राइवेट कंपनी में बनाने में कामयाब हो गए और प्रधानमंत्री के रूप में उनके हाथ में देश की तकदीर लिखने का जिम्मा आया तो देखिए जरा किस तरह उन्होंने भारतीय हितों की अनदेखी करके पाकिस्तान के आतंक का पक्ष लिया। आजादी मिलते ही पाकिस्तान ने कबाइलियों के वेश में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। यह सूचना दिल्ली पहुंची, पर उस हमले को जानबूझकर अनदेखा कर दिया और हमलावरों ने कश्मीर में हजारों की संख्या में हिंदू, सिख और बौद्धों को हमलावरों ने मार डाला। यहाँ तक कि महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा। कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि​ सिंह ने भारत से कश्मीरियों को नरसंहार से बचाने की सहायता भी माँगी, लेकिन नेहरू ने उनकी गुहार भी नहीं सुनीं। नेहरू ने स्वयं 2 नवंबर 1947 को आकाशवाणी पर संबोधन में यह स्वीकार किया कि पाकिस्तानी कश्मीर में नरसंहार कर रहे थे, लेकिन उन्होंने कोई दखल नहीं दिया। परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान ने कश्मीर के एक हिस्से पर अनधिकृत कब्जा कर लिया। दखल देने का उनका इरादा भी नहीं था। इसी संबोधन में नेहरू ने यह भी कहा कि वह कश्मीर पर भारत का दावा नहीं करते हैं, स्थिति सामान्य होने पर वे वहाँ जनमत संग्रह कराएँगे और कश्मीर की जनता यदि पाकिस्तान के साथ जाना चाहे तो रायशुमारी देने के लिए स्वतंत्र है।

तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल नेहरू के एक तरह ही पाकिस्तान-परस्ती से दुखी भी थे और गुस्सा भी। सरदार पटेल पाकिस्तान को जवाब देने के लिए सेना भेजना चाहते थे, लेकिन नेहरू ने इनकार कर दिया। इसके बाद नेहरू के विरोध के बाद भी सरदार पटेल ने अर्द्ध सैन्य बलों को हमलावरों से निपटने के लिए लगाया और हमलावरों को खदेड़ा। बाद में नेहरू को सरदार पटेल के आगे झुकना पड़ा और सेना लगाई गई। जब भारत पाकिस्तान को धूल चटाकर कश्मीर को अपने नियंत्रण में लेने सफलता की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा था तो सरदार पटेल के विरोध के बावजूद नेहरू इस मामले को स्वयं ही संयुक्त राष्ट्र परिषद में लेकर चले गए और इस मसले को विवादित बनाकर कश्मीर पर पाकिस्तान के दावे को एक तरह से मान्यता दिला दी। इस तरह नेहरू ने पटेल जी की इच्छा के विरुद्ध युद्धविराम कराकर पाकिस्तान की भरपूर मदद की। नेहरू ने कुछ ऐसा ही तब किया जब भारत को 1953 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थायी सदस्यता मिल रही थी, लेकिन उन्होंने इसे ठुकराकर चीन का नाम आगे बढ़ा दिया, जबकि चीन उस समय भी भारत के खिलाफ शत्रुतापूर्ण व्यवहार कर रहा था और भारतीय भूभागों पर अ​नधिकृत रूप से दावा ठोंक रहा था।

मजे की बात यह है कि इतिहास की इस पर्त पर से पर्दा किसी और ने नहीं, बल्कि आज पाकिस्तानी बोल बोलने वाले कॉन्ग्रेसी नेता और संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव डॉ. शशि थरूर ने हटाया था। डॉ थरूर ने अपनी पुस्तक ‘नेहरू द इन्वेंशन आफ इंडिया’ में लिखा है कि ‘जिन भारतीय राजनयिकों ने इस संबंध में फाइलें देखी हैं, वे कहते हैं कि नेहरू ने स्थाई सदस्यता का प्रस्ताव ठुकरा दिया था।’ पुस्तक में उल्लेख है कि नेहरू ने कहा कि चीन एक महान राष्ट्र है और चीन की कीमत पर भारत को स्थायी सदस्यता नहीं चाहिए।

भारत को नुकसान पहुंचाकर भी पाकिस्तान की मदद करने का नेहरू का सिलसिला यहीं नहीं रुका। जब पूरा देश विरोध कर रहा था और तत्कालीन जनसंघ सिंधु नदी जल बंटवारा की प्रस्तावित संधि का मुखर विरोध कर रहा था, नेहरू 19 सितम्बर, 1960 को कराची गए और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करके यह अन्यायपूर्ण संधि कर ली। कभी ऐसा सुना है कि किसी चीज का बंटवारा किया जाए और जिसकी आबादी 85 प्रतिशत हो उसको 20 प्रतिशत से भी कम हिस्सा मिले, जबकि जिनकी आबादी 15 प्रतिशत हो उन्हें 80 प्रतिशत हिस्सा मिले? किंतु नेहरू द्वारा भारत के हितों को किनारे रखकर शत्रुता निभा रहे देश पाकिस्तान को अपनी भूमि से गुजरने वाली उन नदियों का लगभग शत-प्रतिशत जल दे​ दिया, जिन नदियों का स्रोत या तो भारत में है अथवा जो भारत के उच्च क्षेत्र अर्थात जिनका प्रवाह भारत से पाकिस्तान की ओर है। जबकि देश के बंटवारे के समय भारत के पास 39 करोड़ जनसंख्या और पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) सहित पाकिस्तान की कुल आबादी लगभग 6 करोड़ थी। बावजूद इसके भारत के खिलाफ नेहरू ने पाकिस्तान के साथ यह विसंगतिपूर्ण संधि की।

इस संधि के अनुसार तीन पश्चिमी नदियों सिंधु, चिनाब और झेलम का नियंत्रण पूरी तरह से पाकिस्तान को दे दिया गया। पूर्वी नदियों व्यास, रावी और सतलुज का नियंत्रण भारत को मिला, लेकिन इसमें भी भारत के पानी के प्रयोग का अधिकार सीमित कर दिया गया। सिंधु जल संधि दुनिया का ऐसा सबसे उदार समझौता माना जाता है, जहाँ नदियों के जलसंसाधन के स्वामी देश ने उस संसाधन पर अपनी संप्रभुता स्वयं ही एक ऐसे देश को अनावश्यक रूप से और देश की जनता के साथ अन्याय करते हुए सौंप दी, जिसके निर्माण का आधार ही भारत के विरुद्ध विध्वंसात्मक विष था। इतना ही नहीं, नेहरू ने संधि में यह भी व्यवस्था की कि जब तक पाकिस्तान अपने यहाँ इन नदियों के जल के संग्रहण व वितरण की प्रणाली विकसित नहीं कर लेता भारत 12,780 करोड़ (आज की रुपए की विनियम दर के अनुसार) रुपए पाकिस्तान को मुआवजा देगा। पाकिस्तान पर कॉन्ग्रेस की मेहरबानी का आलम यह थ कि आजादी के बाद आई इनकी सरकारों ने अपने 20 प्रतिशत हिस्से के पानी का एक भी बूंद इस्तेमाल नहीं लिया और इतनी बड़ी मात्रा में भारत की जनता का धन पाकिस्तान को मुआवजे के रूप में दिया।

कॉन्ग्रेस पार्टी के पाकिस्तान परस्ती की एक और घटना का उल्लेख करना समीचीन होगा। यह सर्वविदित है कि इंदिरा गाँधी के शासन में कॉन्ग्रेस ने भिंडरवाले को न केवल प्रश्रय दिया, बल्कि सुविधा और संरक्षण भी दिया। जबकि खुफिया एजेंसियाँ यह रिपोर्ट दे रही थीं कि भिंडरवाले और उसका खालिस्तान आंदोलन पंजाब को भारत से अलग करने के लिए पाकिस्तान और उनकी आईएसआई द्वारा तैयार किया गया षड्यंत्र है। इंदिरा की पाकपरस्ती का यह तथ्य भी हमें भूलना नहीं चाहिए। भारतीय सुरक्षा बलों ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को धूल चटाते हुए न केवल पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बाँट दिया, बल्कि पाकिस्तान के जनरल समेत 93000 पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण करना पड़ा। भारत के पास सुनहरा मौका था कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को मुक्त करा लिया जाता। तत्कालीन विदेशी प्रेक्षकों ने कहा है कि तत्कालीन पाकिस्तान प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो अपने सैनिकों को छुड़ाने के लिए पीओके छोड़ने को तैयार थे। पर इंदिरा ने भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों की राय मानने के बजाय हारे हुए पाकिस्तान को प्लेट में सजाकर ‘उपहार’ दिया और वह था संधि में यह प्रावधान शामिल करवाना कि कश्मीर मसले के हल तक पाकिस्तान वहाँ अपनी सेना रख सकती है। जबकि इससे पूर्व अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत पीओके में पाकिस्तान को कश्मीर में सैन्य हस्तक्षेप की अनुमति नहीं थी। यह एक तरह से पाकिस्तान को कश्मीर का एक हिस्सा आधिकारिक रूप से देने जैसा था।

यह समाचार आप अक्सर पढ़ते होंगे कि कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पाकिस्तान की तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं और पाकिस्तान का दौरा कर भारत की सरकार को अस्थिर करने की खुलेआम अपील करते हैं।

इतने सारे ऐतिहासिक तथ्य और आज की कॉन्ग्रेस का व्यवहार और नीति तमाम संदेहों को उत्पन्न करती हैं।

मोदी सरकार ने पहली बार सिंधु जल प्रणाली के जल का उपयोग भारत की जनता व किसानों के लिए करने पर दीर्घकालिक योजना तैयार की है। 2014 में सरकार बनने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि, सिंचाई और जलसंसाधन को लेकर एकीकृत व लक्षित प्राथमिकताओं के साथ दीर्घकालिक योजनाएँ बनाईं। सरकार ने इस ओर ध्यान देते हुए तय किया कि भारत के हिस्‍से का पानी अब पाकिस्‍तान नहीं जाएगा। इस पानी को रोककर हरियाणा में पानी की किल्‍लत दूर की जाएगी तथा पानी को राजस्‍थान तक ले जाया जाएगा। केंद्र सरकार उत्‍तराखंड में तीन बांध भी बनाने जा रही ​है, ताकि भारत की तीन नदियों का पाकिस्तान जाने वाला पानी यमुना में लाकर इस क्षेत्र की कृषि सिंचाई व पेयजल समस्या को दूर किया जा सके।

यह ध्यान देने योग्य है कि जिस दिन से सिंधु के जल को भारत के लोगों तक पहुँचाने की योजना का खुलासा हुआ है कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने संधि का हवाला देते हुए ऐसा रूदन किया, मानो वे भारत नहीं, पाकिस्तान के राजनीतिज्ञ हों।

इसलिए कॉन्ग्रेस और इसके नेताओं द्वारा भारतीय सेना का अपमान करने अथवा उसके पराक्रम पर सवाल उठाने या फिर भारतीय हितों के विरुद्ध पाकिस्तान और पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के पक्ष में बैटिंग करना यह सोचने पर विवश करती है कि कॉन्ग्रेस ऐसा अनजाने में नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति के तहत नेहरू की नीति का अनुसरण करते हुए करती है।

खतरनाक चक्रवात से जूझकर भारतीय नौसेना ने बचाई 192+ लोगों की जान, हजारों को पहुँचाई राहत सामग्री

भारतीय नौसेना के जवान केवल भारतीय सीमा की ही सुरक्षा के लिए तट पर नहीं रहते हैं बल्कि भारत से कई किलोमीटर दूर देशों में भी अपने पराक्रम का परचम लहराते हैं। इसका हालिया उदाहरण इस समय मोजाम्बिक में देखने को मिल रहा है। यहाँ पर भारतीय नौसेना के जवान खतरनाक चक्रवात का सामना कर रहे लोगों के लिए किसी मसीहे की तरह बनकर पहुँचे हैं।

विदेश मंत्रालय ने खुद अपने एक बयान में इस बात की जानकारी दी है कि मोजाम्बिक में राहत अभियान के चलते अब तक भारतीय सेना के लोगों ने वहाँ के 192 लोगों की जान को सुरक्षित बचा लिया है और अपने चिकित्सकीय शिविरों में ले जाकर 1,381 लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सहायता दी है।

विदेश मंत्रालय ने बताया कि मोजाम्बिक के आग्रह पर भारत ने तत्काल कार्रवाई की और नौसेना की तीन पोतों (आईएनएस सुजाता, आईएनएस सारथी और आईएनएस शारदुल) को बीरा बंदरगाह भेज दिया। मंत्रालय द्वारा जारी बयान में बताया गया कि अब तक नौसेना के जवानों द्वारा 192 से अधिक लोगों को बचाया जा चुका है। साथ ही 1381 लोगों को मेडिकल मदद भी मुहैया कराई जा चुकी है।

इसके साथ ही देश की नौसेना ने भयानक चक्रवात से 36 भारतीयों को भी राहत दी है। इस चक्रवात में अधिकांश मौतें बीरा शहर में हुई हैं। यहाँ बिजली लाइनों के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद बंदरगाह हब और सोफाला प्रांत की लाइटें लगभग कट गई हैं। हवाई अड्डों को भी बंद कर दिया गया है।

बता दें पिछले शुक्रवार (मार्च 15, 2019) को मध्य मोजाम्बिक के तट से चक्रवात टकराने के कारण वहाँ तेज हवाएँ चलने लगीं थीं और भारी बारिश भी शुरू हो गई थी। इस प्राकृतिक आपदा ने देश से एक हिस्से को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया और कई हजार किमी तक का क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आ गया। अब तक इस चक्रवात से मरने वालों की संख्या लगभग 676 हो चुकी है। इसके अलावा मोजाम्बिक के क़रीब 90000 लोगों को आश्रय स्थलों में ले जाया गया है, जबकि हजारों अन्य बाढ़ के पानी में फँसे हुए हैं। बता दें कि भारत समेत यहाँ अन्य देशों ने भी राहत पहुँचाने का प्रयास किया है।

ट्रम्प ने किया ISIS के ख़त्म होने का दावा लेकिन कहाँ गया ₹173 करोड़ का इनामी आतंकी बगदादी?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक नक्शा दिखा कर मीडिया को यह तो बता दिया कि खूँखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) का ख़ात्मा हो चुका है लेकिन इसका मुखिया बगदादी कहाँ है, यह अब भी एक चर्चा का विषय है। बता दें कि बगदादी पर 173 करोड़ रुपए का इनाम है। ड्रम्प के घोषणानुसार, सीरिया के सभी क्षेत्रों को आईएस के चंगुल से मुक्त करा लिया गया है। अधिकारियों ने भी ट्रम्प के दावे की पुष्टि करते हुए बताया कि अब कुछ ही ऐसे इलाक़े हैं, जहाँ छिटपुट लड़ाके बचे हुए हैं। इसी के साथ ख़लीफ़ा शासन के अंत की भी घोषणा की गई। असल में सीरिया के कुछ भाग में आईएस के कब्ज़े के कारण उसे दुनियाभर में आतंकी हमलों को अंजाम देने के लिए एक ठिकाना मिल गया था। आख़िरकार लाखों बम के प्रयोग और कई नागरिकों की मृत्यु के बाद आईएस का सफाया हुआ।

इसके अलावा कुर्द नेतृत्व वाले सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज (SDF) के प्रवक्ता मुस्तफा बाली ने ट्वीट कर कहा कि ‘बागुज मुक्त हो गया है और इसी के साथ आईएस के खिलाफ सैन्य जीत हासिल कर ली गई है।’ बागुज में आईएस के कब्ज़े वाले क्षेत्र को मुक्त कराने के साथ ही आतंकवादियों के कथित ख़लीफ़ा का भी अंत हो गया है। आईएस ने इलाके में अपने कब्ज़े के दौरान बड़े पैमाने पर नरसंहार मचाया और इनका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर भी फैलाया। आईएस के वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल होते थे और इससे आतंकियों को लोगों के भीतर डर बैठाने में कामयाबी मिल जाती थी।

वर्ष 2014 में इराक के सिंजार क्षेत्र में आतंक मचाने के दौरान बगदादी के आतंकी संगठन ने यजीदी धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की हजारों महिलाओं और लड़कियों को बंधक बनाया और उनका यौन शोषण किया। इनमें से कई आज तक लापता हैं। आईएस का अब सीरिया या इराक में किसी भी क्षेत्र पर कब्ज़ा नहीं है, लेकिन वह अब भी इन दोनों देशों में आतंकवादी हमले कर रहा है। बता दें कि आईएस से जुड़े कई आतंकी भारत में भी पकड़े गए थे। एनआईए ने आईएस से जुड़े एक मॉड्यूल का पर्दाफाश किया था। इसमें इंजीनियर से लेकर मौलवी तक शामिल थे। अब आईएस के ख़ात्मे के ऐलान के बाद अधिकारियों ने राहत की साँस ली होगी।

आईएस सरगना बगदादी इराक के समारा की एक मस्जिद में मौलवी था। बगदादी को विद्रोह भड़काने के आरोप में दक्षिण इराक के बक्का कैंप में चार वर्षों तक जेल में रखा गया था। जेल में बगदादी कथित इस्लामिक राज्य की स्थापना करने का मन बना चुका था। उसके मन में इसके लिए ख़तरनाक और खुराफाती योजना तभी तैयार होने लगी थी जब 2010 में बगदादी रिहा हुआ और आईएसआईएस का मुखिया बना। बगदादी का इराक, सीरिया, साइप्रस, जॉर्डन, लेबनान, फिलिस्तीन, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर ‘द इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरासान’ बनाने का सपना था। बगदादी 2014 में पहली बार जनता के सामने आया था।

रूस के रक्षा मंत्रालय के बयान में कहा गया था कि यह हमला आईएस के गढ़ रक्का के पास किया गया था और वहाँ आईएस नेता अबू बकर अल बगदादी भी मौजूद था। सेना कई तरीकों से यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वो मारा गया है या नहीं। लेकिन, रूसी सेना इस मामले में बगदादी के मारे जाने की कोई पुख्ता सबूत नहीं दे पाई। अब देखना यह है कि अधिकारियों के इन दावों में कितनी सच्चाई है। जब तक बगदादी की कोई ख़बर नहीं मिलती, तब तक आईएसआईएस को लेकर डर बना रहेगा।

मोदी बीफ बिरयानी खा कर सो गए थे क्या : ओवैसी

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। हैदराबाद लोकसभा क्षेत्र के प्रत्याशी और वर्तमान सांसद ओवैसी ने पूछा, “जब पुलवामा का हमला हुआ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या बीफ बिरयानी खा कर सो रहे थे।”

ओवैसी ने यहीं नहीं रुके आगे बोलते रहे, “हिन्दुस्तानी एयर फ़ोर्स बालाकोट में बम गिरा आई। अमित शाह कहते हैं कि 250 लोग मारे गए। राजनाथ सिंह कहते हैं कि एनटीआरओ ने 300 मोबाइल टैप किए थे। आपने बालाकोट में 300 मोबाइल तो देख लिए पर अपनी नाक के नीचे पुलवामा में 50 किलो आरडीएक्स की स्मगलिंग नहीं देख पाए?’ शनिवार को एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा। ‘मैं प्रधानमंत्री मोदी और राजनाथ सिंह जी से यह पूछना चाहता हूँ कि जब यह सब हो रहा था तो वे क्या बीफ बिरयानी खा कर सो रहे थे?”

अपनी लड़ाई देश से सेक्युलरिज्म मिटाने की चाह रखने वालों के खिलाफ बताते हुए ओवैसी ने कहा कि भाजपा और कॉन्ग्रेस में कोई अंतर नहीं है।

ओवैसी ने अपने भड़काऊ भाषण में आगे कहा, ‘अगर कोई कहे कि देश में दो राष्ट्रीय दल हैं तो मैं उन्हें ना कहू दूँगा क्योंकि एक राष्ट्रीय पार्टी भाजपा है दूसरी ड्योढ़ी (1.5) भाजपा है। भाजपा और कॉन्ग्रेस में कोई अंतर नहीं है।’ ओवैसी ने आगे कहा। ‘मेरी लड़ाई उन सभी ताकतों से है जो देश से भाईचारा और सेक्युलरिज्म खत्म करना चाहतीं हैं।’

दो लड़कियों के जबरन धर्मान्तरण पर Pak मंत्री ने की सुषमा को ट्रोल करने की कोशिश, हुए बेइज्जत

पाकिस्तान में दो लड़कियों के जबरन इस्लामिक धर्मान्तरण का मामला सामने आया है। इस घटना का संज्ञान लेते हुए केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग से रिपोर्ट माँगी। पाकिस्तान के सिंध में होली की शाम हुई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को लेकर गंभीर सुषमा स्वराज ने ट्वीट करते हुए भारतीय उच्चायोग को टैग किया और इस सम्बन्ध में एक रिपोर्ट देने का निर्देश दिया।

ज्ञात हो कि होली की पूर्व संध्या पर दो किशोर हिंदू लड़कियों, 13 वर्षीय रवीना और 15 वर्षीय रीना का अपहरण करके उन्हें पाकिस्तान के सिंध प्रांत में अपने उम्र से बहुत बड़े मुस्लिम पुरुषों से जबरन शादी करने के लिए मजबूर किया गया। हिन्दू किशोरियों पर हुए इस अत्याचार ने पूरे विश्व में लोगों को पाकिस्तान में हिन्दुओं के हालात पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया।

लड़कियों के पिता का दिल दहला देने वाला वीडियो अब वायरल हुआ है। इसमें वो बेबस होकर दहाड़े मारकर रो रहे हैं और पुलिस के सामने अपनी शिकायत दर्ज कराने और दोषियों पर कार्रवाई करने का अनुरोध कर रहे हैं। इनकी दोनों बेटियों का अपहरण कर लिया गया है और उनका धर्मांतरण कर निकाह करा दिया गया। सुषमा स्वराज के ट्वीट के बाद पाकिस्तान के मंत्री फवाद चौधरी ने उन्हें ट्रोल करने की कोशिश की।

पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने ट्वीट कर सुषमा स्वराज पर तंज कसते हुए कहा कि ये इमरान ख़ान का नया पाकिस्तान है, मोदी का भारत नहीं है जहाँ अल्पसंख्यकों के साथ अत्याचार किया जाता है। शेखी बघारते हुए पाकिस्तानी मंत्री ने कहा कि उन्हें पाकिस्तान के झंडे में स्थित सफ़ेद रंग से भी उतना ही प्रेम है। साथ ही उन्होंने कहा कि आशा है, आप भारतीय अल्पसंख्यकों के मामले में भी ऐसी ही सक्रियता दिखाएँगी। इसके बाद सुषमा स्वराज ने ट्वीट कर फवाद चौधरी को करारा जवाब दिया।

सुषमा स्वराज ने पाक मंत्री से कहा कि उन्होंने सिर्फ़ हिन्दू लड़कियों के जबरदस्ती इस्लामिक धर्मान्तरण को लेकर भारतीय उच्चायोग से एक रिपोर्ट माँगी है। सुषमा ने कहा कि इतना ही आपको बेचैन करने के लिए काफ़ी हो गया। उन्होंने इसे पाक मंत्री की दोषी मानसिकता का परिचायक बताया। सुषमा स्वराज के इस ट्वीट के बाद लोगों ने पाकिस्तानी मंत्री को बेइज्जत किया और जम कर लताड़ लगाई।

बता दें कि रवीना और रीना नामक नाबालिग हिंदू लड़कियों के पिता पुलिस स्टेशन के सामने रोए, गिड़गिड़ाए और विरोध भी किए। वायरल हुए वीडियो में पिता को यह कहते हुए सुना जा सकता है, “आप मुझे गोली मार सकते हैं, मैंने बहुत सब्र किया, लेकिन अब मैं अपनी बेटियों के वापस आने तक यहाँ से नहीं जाऊँगा”।

इसी बीच, सिंध प्रांत के कई हिंदुओं ने कथित तौर पर अपहरणकर्ताओं के खिलाफ शिकायत दर्ज करने से इनकार करने के बाद पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। पाकिस्तान में हिंदू देश के सबसे वंचित और सबसे ज्यादा सताए गए अल्पसंख्यकों में से एक हैं। घटना के बाद, केंद्रीय विदेश मंत्री ने रविवार को पाकिस्तान के सिंध प्रांत में होली की पूर्व संध्या पर दो हिंदू लड़कियों के अपहरण पर विवरण मँगाया है।

सुषमा स्वराज की ज़ोरदार प्रतिक्रिया के बाद बौखलाए पाकिस्तानी मंत्री फवाद चौधरी को कोई जवाब नहीं सूझा तो उन्होंने गुजरात और जम्मू की रट लगानी शुरू कर दी। बिना सबूत भारत में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का रोना रोकर फवाद ने एक बार फिर से अपनी बेइज्जती कराई।

चाहे सपना चौधरी सच में कॉन्ग्रेसी बनीं थीं या नहीं, कॉन्ग्रेस के लिए यह अशुभ प्रकरण ही है

आज सुबह से यह समझ नहीं आ रहा है कि सपना चौधरी कॉन्ग्रेस में शामिल हुई या नहीं हुईं- केजरीवाल के 28 सीटों वाले गठबंधन से लेकर सालों तक चली तुलसी-मिहिर की कट्टी-मिट्ठी-कट्टी में भी इतना सस्पेंस नहीं रहा होगा, जितना सपना चौधरी ने एक दिन में कर दिया!

कभी खबर आई कि न केवल सपना चौधरी कॉन्ग्रेस में शामिल हो गईं हैं, बल्कि वे ‘गौतम गंभीर से बड़ा ‘कैच’ भी हैं’।

हालाँकि, यह आकलन किस आधार पर है, इस पर भी सवाल ज़रूर उठेगा- क्योंकि एक तो गौतम गंभीर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट खेल चुके हैं , दिल्ली के रणजी में और कोलकाता के आईपीएल स्टार थे, और फेसबुक पर 63 लाख से ज्यादा उनके पेज पर ‘लाइक्स’ हैं, वहीं  सपना चौधरी एक क्षेत्रीय नायिका-गायिका हैं, और उनके पेज पर 3 लाख से भी कम लाइक्स हैं।

कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े सूबाई सरदार ने भी इसकी तस्दीक कर दी थी।

फिर शुरू हुआ ट्विस्ट पे ट्विस्ट

फिर ऐसा लगा कि सपना ने कॉन्ग्रेस का सपना तोड़ दिया क्योंकि एएनआई की खबर आ गई सपना के हवाले से कि वह किसी कॉन्ग्रेस-वॉन्ग्रेस में शामिल नहीं हुई हैं।

फिर कॉन्ग्रेस ने जारी किए ‘सबूत’, और अपनी दोतरफा हँसी उड़वाने का इंतजाम कर लिया:

कॉन्ग्रेस के लिए हर ओर फजीहत का आलम  

अगर यह मान भी लें कि सपना चौधरी ने कॉन्ग्रेस सदस्यता का फॉर्म भरा था और बाद में पीछे हट गईं, तो भी कॉन्ग्रेस का यह ‘सबूत’ जारी करना उसी तरह है जैसे कोई दूल्हा शादी से उठ कर जा रही दुल्हन के पीछे रोते-पीटते भागता है।

ज़ाहिर तौर पर अपने कदम पीछे खींच कर सपना चौधरी ने यह ज़ाहिर कर दिया कि उन्हें कॉन्ग्रेस में शामिल होने की ‘भूल’ का अहसास हो गया है, और वह उस भूल से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहीं हैं। और जो इन्सान आपको एक liability (मुसीबत) के तौर पर देख रहा हो, उसकी कभी आपमें रही दिलचस्पी का सबूत क्या जारी करना?

यह “उसने सच में मुझसे flirt किया था; देखो screenshot” ब्रेकअप के बाद सोशल मीडिया पर झगड़ रहे 18-19 साल के युवाओं को शोभा देता है, 135 साल के होने जा रहे राजनीतिक दल को नहीं। क्या ‘चिरयुवा’ राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाने के बाद पूरी कॉन्ग्रेस ने ही खिजाब लगाना शुरू कर दिया है? भारत अपने सबसे पुराने राजनीतिक दल से इससे ज्यादा मैच्योरिटी डिज़र्व करता है।

जब बनी थी बॉलीवुड की अपनी राजनीतिक पार्टी, किसको था ख़तरा, कौन डरा, किसने धमकाया, क्या हुआ अंजाम?

भारत में राजनीति और फ़िल्म जगत का बहुत ही गहरा नाता रहा है। कभी किसी नेता के यहाँ अभिनेताओं के जुटान की ख़बर आती है तो कभी किसी अभिनेता या अभिनेत्री के चुनाव लड़ने की ख़बर आती है। दक्षिण भारत में एमजीआर, जयललिता और एनटीआर जैसे फ़िल्मी सितारों ने राजनीति में लम्बी पारियाँ खेली और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे। हाल ही में सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हासन ने भी राजनीति में एंट्री की घोषणा की है। ऐसे में, क्या आपको पता है कि भारतीय अतीत में फ़िल्मी सितारों ने ख़ुद की राजनीतिक पार्टी बनाई थी और उस समय सबसे बड़े स्टारों में से एक रहे देव आनंद को अध्यक्ष बनाया गया था। वो आपातकाल का दौर था। कॉन्ग्रेस सरकार की सख्ती और क्रूरता से तंग इन सितारों ने राजनीतिक पार्टी की स्थापना की थी। आगे जानिए क्या हुआ इनका भविष्य?

आपातकाल ख़त्म होने के बाद जनता सरकार का दौर आया।। 1977 में बनी जनता सरकार के पतन के बाद फिर से नए चुनाव का ऐलान हुआ। स्थान था मुंबई स्थित ताज होटल और तारीख थी 14 सितंबर, 1979 भ्रष्टाचारी नेताओं के ख़िलाफ़ अभियान की शुरुआत करने का दावा करते हुए देव आनंद ने नेताओं को ‘सबक सिखाने के लिए’ नेशनल पार्टी के स्थापना की घोषणा की। देव साहब अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘रोमांसिंग विथ लाइफ’ में लिखते हैं, “जिस देश से हम प्यार करते हैं- उसके लिए, क्यों न हम एक राजनीतिक पार्टी बनाएँ? ऐसा इसीलिए किया गया ताकि भारत की बिगड़ती हुई राजनीतिक व्यवस्था को उसी तरह सुन्दर बनाया जा सके, जैसा हम अपनी फ़िल्मों को भव्य बनाने के लिए करते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के साथ देव आनंद के अच्छे रिश्ते थे

इस पार्टी को कई बड़े-बड़े फ़िल्मी सितारों ने ज्वाइन किया। रामायण फेम रामानंद सागर, शत्रुघ्न सिन्हा, वी शांताराम, हेमा मालिनी, संजीव कुमार जैसी फ़िल्मी शख्सियतों ने इस पार्टी को ज्वाइन किया। देव आनंद के कई क़रीबी लोगों व उनके भाई द्वारा कई टीम बनाए गए ताकि पार्टी का संविधान व नीतियाँ तैयार की जा सके। चुनावी घोषणापत्र और मेम्बरशिप अभियान के लिए भी कमेटी बनाई गई। और ऐसा नहीं है कि इस पार्टी को ठंडी प्रतिक्रिया मिली। असल में फिल्मीं सितारों की लोकप्रियता का ऐसा प्रभाव था कि भारी संख्या में लोग नेशनल पार्टी से जुड़े। मीडिया द्वारा उस पार्टी को ख़ास तवज्जो नहीं दी गई और पत्रकारों ने इसे फ़िल्म प्रमोशन का एक जरिया माना। लेकिन, जो लोग वहाँ उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थित थे, उनका कहना था कि देव आनंद गुस्से से लाल थे और भ्रष्टाचार, ग़रीबी इत्यादि को मिटाने की बातें कर रहे थे।

देव आनंद के उस भाषण को देखने वाले पत्रकारों ने आज की राजनीतिक नेताओं से तुलना करते हुए दावा किया कि उनके भाषण में कई ऐसी चीजें थी जो आज पीएम नरेंद्र मोदी और दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल कहा करते हैं। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद मुंबई के शिवाजी पार्क में एक रैली भी हुई। इस रैली में जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने भी शिरकत की थी। आपको बता दें कि उस दौरान विजयलक्ष्मी पंडित अपनी भतीजी इंदिरा से ख़ासी ख़फ़ा थी। जब आपातकाल लगा था, तब वो अपनी बेटी के साथ लंदन में थीं और वहीं उन्हें ये समाचार प्राप्त हुआ। उनके घर पहुँचने पर उनकी निगरानी होने लगी थी और उनके फोन टेप किए जाने लगे थे। उनके क़रीबी लोगों ने भी आपातकाल के डर से उनसे मिलना-जुलना बंद कर दिया था।

बाएँ से दाएँ: दिलीप कुमार, जवाहरलाल नेहरू, देव आनंद और राज कपूर

विजयलक्ष्मी पंडित का इस रैली में भाग लेना आश्चर्य वाली बात नहीं थी क्योंकि आपातकाल के बाद भी उन्होंने विपक्षी पार्टियों के प्रचार में अपना पूरा दम-ख़म झोंक दिया था। उन्होंने पूरे भारत का बृहद दौरा किया था ताकि इंदिरा गाँधी को हराया जा सके। मीडिया में पहले ही अफवाहों का दौर चल निकला था। पत्रकार इस उधेड़बुन में लगे थे कि किस दिग्गज नेता को कौन सा अभिनेता टक्कर देगा। चौधरी चरण सिंह के ख़िलाफ़ धर्मेंद्र के लड़ने की बात सामने आ रही थी। पटौदी परिवार के किसी व्यक्ति के भोपाल से और दारा सिंह के अमृतसर से लड़ने की ख़बर चल निकली थी। हालाँकि, इन अफवाहों से कुछ देर के लिए ही सही लेकिन कॉन्ग्रेस और जनता दल के नेताओं की पेशानी पर बल तो पड़े थे। तभी तो दोनों दलों के नेताओं ने नेशनल पार्टी को चुनाव से दूर रहने की चेतावनी दी थी।

फ़िल्म निर्माता आईएस जोहर ने तो ख़ुद को तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण के ख़िलाफ़ प्रत्याशी भी घोषित कर दिया था। उन्होंने एक इंटरव्यू में राज नारायण को जोकर बताते हुए ख़ुद की जीत का दावा किया था और ख़ुद को राज नारायण से भी बड़ा जोकर बताया था। लेकिन, नेशनल पार्टी का जितना ज़ोर-शोर से उद्भव हुआ, उतनी ही तेज़ी से पराभव भी। जैसा कि सर्वविदित है, फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों के कई व्यवसाय में रुपए लगे होते हैं, उन्हें शूटिंग के लिए स्थानीय सरकारों की अनुमति की ज़रूरत पड़ती है। कुल मिलाकर देखें तो फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों को अगर अपना व्यवसाय चलाना है तो उन्हें नेताओं की ज़रूरत पड़नी तय है। शायद, यही नेशनल पार्टी के पराभव का कारण भी बना। राज नारायण ने तो जोहर के हाथ-पाँव तोड़ने की बात तक कह दी थी।

अभिनेता और अभिनेत्री सरकार व नेताओं की धमकियों के कारण पीछे हटने लगे। उन्हें अपना हित नज़र आने लगा। जहाँ उनके लाखों-करोड़ों रुपए दॉंव पर लगे हों, वहाँ उन्हें नेताओं से दुश्मनी लेना सही नहीं लगा। नेताओं ने अपनी धमकियों में उन्हें परिणाम भुगतने की भी चेतावनी दी थी। यहाँ तक कि रामानंद सागर भी अलग हट लिए। अकेले पड़े देव आनंद के पास राजनीतिक सपनों को विराम देने के अलावा और कोई और चारा न बचा। ख़ुद देव आनंद के नेहरू और वाजपेयी से अच्छे रिश्ते थे। ख़ुद को एमजीआर से प्रेरित बताने वाले देव आनंद ने बाद में लिखा भी कि वह इंदिरा गाँधी के तौर तरीकों से नाराज़ थे। आपको बता दें कि जब पीएम वाजपेयी बस लेकर पाकिस्तान गए थे, तब उन्होंने देव आनंद को भी उस यात्रा का हिस्सा बनने के लिए बुलाया था।

तो ये थी एक पूर्ण रूप से बॉलीवुड की पार्टी के उदय और अस्त की कहानी। नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया तो चली गई लेकिन कई अभिनेताओं-अभिनेत्रियों ने राष्ट्रीय व अन्य पार्टियों के जरिए चुनावी समर में क़दम रखा। शत्रुघ्न सिन्हा, सुनील दत्त और चिरंजीवी जैसे अभिनेता केंद्र सरकार में मंत्री बने। विनोद खन्ना, हेमा मालिनी और हाल ही में मनोज तिवारी भी राजनीति में सफल हुए। महानयक अमिताभ बच्चन ने भी राजनीति में हाथ आजमाया लेकिन विवादों के कारण उनकी पारी असफल रही। जया बच्चन सपा से जुड़ी। इसी तरह कई फ़िल्मी सितारों ने राजनीति से अपना वास्ता बनाए रखा लेकिन उत्तर भारतीय सितारों ने अलग राजनीतिक पार्टी नहीं बनाई।