सहारनपुर से त्यौहार के मौसम में सांप्रदायिक सौहार्द्र भंग करने का प्रयास करने की ख़बर आ रही है। यहाँ गागलहेड़ी के बेरी गाँव में स्थानीय निवासियों ने होलिका दहन कार्यक्रम के लिए होलिका रखी थी। इसमें एक मुस्लिम युवक ने बदमाशी से आग लगा दी। सांप्रदायिक सौहार्द्र भंग करने के इस प्रयास की ख़बर के फैलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण वहाँ पर जमा हो गए। गाँव में तनाव की सूचना पाते ही पुलिस मौके पर पहुँची। पुलिस ने गाँव वालों को समझा-बुझा कर शांत किया। ताज़ा सूचना के मुताबिक़ आरोपित मुस्लिम युवक को गिरफ़्तार कर लिया गया है।
अमर उजाला के स्थानीय संस्करण में छपी ख़बर
थानाध्यक्ष आदेश त्यागी ने त्वरित कार्रवाई करते हुए न सिर्फ़ आरोपित को गिरफ़्तार किया बल्कि ग्रामीणों को समझा-बुझा कर शांत करने में भी अहम भूमिका निभाई। आरोपित की गिरफ़्तारी के लिए तत्काल दो टीमें गठित कर तलाशी अभियान शुरू किया गया था। थोड़ी देर बाद आरोपित साकिब को पुलिस ने अपने शिकंजे में ले लिया। पुलिस बल को आरोपित मुस्लिम युवक को भीड़ से बचाने के लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। उसे स्थानीय लोगों के कोपभाजन का शिकार बनने से बचाने के लिए जल्दी से पुलिस थाना ले जाया गया।
थाना प्रभारी ने कहा कि गाँव में हालात सामान्य है और अब किसी प्रकार का तनाव नहीं है। पुलिस सतर्क है और किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की स्थिति में दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। बता दें कि सहारनपुर में होली के मद्देनजर शहर और देहात क्षेत्र में कड़ी सुरक्षा की व्यवस्था की गई है। जिलाधिकारी पीके पांडेय और एसएसपी बबलू कुमार ने पुलिस बल के साथ शहर के प्रमुख बाज़ारों एवं संवेदनशील क्षेत्रों में पैदल मार्च भी किया था। उन्होंने लोगों से शांति व्यवस्था कायम रखते हुए त्यौहार मनाए जाने की अपील की। इलाक़े में ख़ुफ़िया विभाग भी मिश्रित आबादी व चिन्हित गाँवों का डेटा तैयार करने में जुटा है। इस बार पुलिस के साथ-साथ लाल पगड़ी पहने चौकीदार भी गाँव-गाँव में होलिका की सुरक्षा व्यवस्था में जुटे नज़र आएँगे इलाक़े में ख़ुफ़िया विभाग भी मिश्रित आबादी व चिन्हित गाँवों का डेटा तैयार करने में जुटा है। इस बार पुलिस के साथ-साथ लाल पगड़ी पहने चौकीदार भी गाँव-गाँव में होलिका की सुरक्षा व्यवस्था में जुटे नज़र आएँगे । ।
दैनिक जागरण के स्थानीय संस्करण ने भी इस ख़बर को स्थान दिया
अन्य ज़िलों की तरह सहारनपुर में भी आज होलिका दहन के लिए बड़े स्तर पर तैयारियाँ चल रही हैं। अकेले सहारनपुर शहर में क़रीब 1400 स्थानों पर होलिका दहन का कार्यक्रम आयोजित किया जाना है। शहर भर में 28 स्थानों को चिह्नित कर संवेदनशील सूची में रखा गया है। एसपी ने बताया कि फगुआ के दिन पुलिस की मौजूदगी में नमाज़ अदा की जाएगी। नमाज़ अदा करने वाले सभी स्थानों पर पुलिस की तैनाती की जाएगी। पुलिस ने किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए रिहर्सल भी किया है। स्थानीय लोगों से मुलाक़ात कर पुलिस ने सौहार्दता बनाए रखने की अपील की।
जनता और लोकतंत्र के लिए अच्छी ख़बर। भाजपा के छत्तीसगढ़ सांसदों के लिए एक बुरी ख़बर। छत्तीसगढ़ के प्रभारी अनिल जैन के अनुसार राज्य के सभी 10 वर्तमान सांसदों को लोकसभा चुनाव 2019 के लिए टिकट नहीं दिया जाएगा। पार्टी नए चेहरों को उम्मीदवार के तौर पर उतारेगी।
बीजेपी ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं की है लेकिन अनिल जैन की मानें तो पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। वर्तमान सांसदों में कई बड़े नाम भी हैं। पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह भी राजनांदगांव सीट से सांसद हैं। रायपुर से रमेश बैस लगातार छह बार सांसदी जीते हैं। रायगढ़ से विष्णुदेव लगातार चार बार, जांजगीर से कमला देवी और महासमुंद से चंदूलाल दो-दो बार सांसद रहे है।
Chhattisgarh BJP in-charge & National General Secretary Anil Jain: BJP will change all sitting MPs in the state in this election, CEC has approved it. We will bring 11 new candidates and win on all 11 seats. pic.twitter.com/glRCKfFfgM
नए चेहरों को लाकर पार्टी एक तरह का संदेश देना चाहती है – जनता को भी और सांसदों को भी। 2003 से 2018 तक रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा ने राज्य में शासन किया था। लेकिन 2018 के आखिर में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी को बड़ी हार झेलनी पड़ी। ऐसे में सांसदों को लेकर भी वोटरों के मन में कहीं ऐंटी इन्कंबेंसी ना हो, इसलिए भी भाजपा ने नए चेहरों को उतारने का फैसला लिया है।
आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना के बाद से ही भाजपा यहाँ की 11 लोकसभा सीटों में से 10 सीटें हर बार जीतती आ रही है। प्रत्याशी बनाने के लिए पार्टी ने कई तरह का फीडबैक मंगाया है। एक तरफ जहाँ जनता की राय ली गई है, वहीं सांसदों से भी उनके द्वारा कराए गए कार्यों का ब्योरा मांगा गया है।
अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में क्रिस्चियन मिशेल के गिरफ़्तार और प्रत्यर्पित होकर भारत लाए जाने के बाद नित नए ख़ुलासे हो रहे हैं। मामले में सरकारी गवाह बने राजीव सक्सेना ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को एक पेन ड्राइव और डायरी सौंपी है। इस डायरी में अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी चॉपर सौदे में दी गई 423 करोड़ रुपए की घूस सम्बन्धी विवरण है। इनमें अगस्ता वेस्टलैंड इंटरनैशनल लिमिटेड से ट्यूनीशिया, मॉरिशस, दुबई स्थित शेल कंपनियों और स्विस बैंकों के अलावा भारत में बिचौलियों के पास धन पहुँचाने की पूरी कहानी है। इस डायरी और पेन ड्राइव के विश्लेषण के बाद कुछ और नए राज़ निकल कर आने की संभावना है।
राजीव सक्सेना वो शख़्स है, जो स्विट्ज़रलैंड में अलग-अलग बैंक एकाउंट्स को चलाता था। इन बैंक अकाउंट्स में अगस्ता वेस्टलैंड से आई किक बैक्स की रक़म डाली गई थी। 8 सितंबर 2017 (या यह 9 अगस्त 2017 भी हो सकता है) तक राजीव सक्सेना के इन बैंक अकाउंट्स में कुल ₹314 करोड़ की राशि जमा की गई थी। इस पर अभी जाँच जारी है कि आख़िर यह किक बैक्स किसके फ़ायदे के लिए की गई थी और किसके इशारे पर इन बैंक एकाउंट्स को रखा गया था।
सक्सेना की व्यक्तिगत डायरी में किन लोगों के नाम हैं, इस बारे में अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है। लोगों का मानना है कि सक्सेना ने इस पूरे घटनाक्रम में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। सक्सेना ने जाँच एजेंसी को कहा था कि उसने सिर्फ़ बिचौलियों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। उसने इस पूरे घोटाले में बड़ा किरदार होने की बात नकार दी थी। अगस्ता वेस्टलैंड हैलीकॉप्टर घोटाले में यूपीए-2 के कुछ बड़े नेताओं और अधिकारियों के नाम आने की संभावना है।
क्रिश्चियन पर भी गिरी गाज
उधर अदालत ने दलाल क्रिश्चियन मिशेल को एकांत कारावास से निकालकर सामान्य सेल में भेजने का निर्देश तिहाड़ जेल महानिदेशक (डीजी) को दिया है। अदालत ने मिशेल की सुरक्षा चाक-चौबंद रखने और तीन दिन के भीतर इसकी रिपोर्ट पेश करने का निर्देश जेल डीजी दिया है। पटियाला हाउस अदालत के विशेष सीबीआई जज अरविंद कुमार ने तिहाड़ जेल से मँगाई गई पाँच दिन की सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद कहा कि जिस ब्लॉक में मिशेल को रखा गया है, उसमें कुल पाँच सेल हैं। इनमें से चार सेल खाली हैं और एक में केवल मिशेल को रखा गया है। यह एकांत कारावास से भी ज्यादा है। एकांत कारावास एक सज़ा है, जो कैदी को मानसिक व शारीरिक रूप से परेशान करती है।
मिशेल को जिस भी जेल में रखा जाएगा, वहाँ की दो महीने की सीसीटीवी फुटेज संभाल कर रखी जाएगी। मिशेल के वकीलों ने अदालत में उसके एकांत कारावास में रखे जाने की बात कही थी। वकीलों ने कहा था कि उसे शहाबुद्दीन, छोटा राजन व कश्मीरी आतंकियों के साथ रखा गया है।
देश को पहला लोकपाल मिल गया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष (Pinaki Chandra Ghose) को देश का पहला लोकपाल नियुक्त किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, प्रख्यात कानूनविद मुकुल रोहतगी की चयन समिति ने शुक्रवार (मार्च 15, 2019) को उनके नाम की सिफारिश की थी।
Justice Pinaki Chandra Ghose appointed as Lokpal by President of India, Ram Nath Kovind. pic.twitter.com/35y2Fgyajm
लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे भी चयन समिति का हिस्सा थे, लेकिन वह चयन प्रक्रिया में शामिल नहीं हुए थे। इस कमेटी में एक चेयरमैन, एक न्यायिक सदस्य और एक गैर न्यायिक सदस्य होते हैं।
भारत के राष्ट्रपति न्यायमूर्ति ने दिलीप बी भोसले, न्यायमूर्ति पी के मोहंती, न्यायमूर्ति अभिलाषा कुमारी और न्यायमूर्ति एके त्रिपाठी को न्यायिक सदस्य नियुक्त किया गया है। इसके अलावा गैर न्यायिक सदस्यों में दिनेश कुमार जैन, अर्चना रामासुंदरम, महेन्द्र सिंह, और डॉ. आईपी गौतम को सदस्य नियुक्त किया गया। अधिसूचना के मुताबिक प्रभार लेने के साथ ही इन सदस्यों की नियुक्ति प्रभावी मानी जाएगी।
परिचय: पीसी घोष
पिनाकी चंद्र घोष का जन्म मई 28, 1952 को हुआ था और वह जस्टिस शंभू चंद्र घोष के बेटे हैं। वह सुप्रीम कोर्ट के जज रह चुके हैं और कई राज्य के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। वर्तमान में पीसी घोष, मानवाधिकार आयोग के सदस्य हैं। उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज से बीकॉम और कोलकाता यूनिवर्सिटी से LLB की पढ़ाई की है। घोष साल 1997 में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज बने और उसके बाद दिसंबर 2012 में उन्होंने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। मई 2017 में घोष सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए थे और वह 2013 से 2017 तक सुप्रीम कोर्ट के जज रहे। पीसी घोष तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की सहयोगी रहीं शशिकला को आय से अधिक मामले में दोषी ठहरा चुके हैं।
देश के पहले लोकपाल की नियुक्ति लोकपाल अधिनियम-2013 के पारित होने के 5 साल बाद की गई है। देश के पहले लोकपाल के साथ ही कॉन्ग्रेस और तमाम विपक्षी दलों को अब फिलहाल आम चुनाव तक, इस मुद्दे पर बिना किसी आरोप के ही चुनाव लड़ना पड़ेगा। लोकपाल का मुद्दा एक अहम मुद्दा था जिसे विपक्ष भ्रष्टाचार से जोड़कर सरकार को घेरती थी। आज़ादी के बाद पीसी घोष इस देश के पहले लोकपाल हैं, जिन्हें मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल रहते नियुक्त कर लिया है।
राहुल गाँधी यूँ तो मोदी को लेकर अनेकों प्रकार की बातें करते हैं, मसलन वो उनसे ‘दस मिनट भी बहस नहीं कर पाएँगे’, मोदी उनसे ‘आँख नहीं मिला पाते’, ‘चौकीदार चोर है’ इत्यादि। लेकिन इस दौरान जो उन्होंने एक ‘तथ्यात्मक आरोप’ लगाया है वह राफेल विमान सौदे में मोदी द्वारा दलाली खाने और घोटाला करने का है। मैं तथ्यात्मक इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इसके अलावा उनके बाकी सभी आरोप बतोलेबाजी ही हैं, लेकिन ‘राफेल’ तो ‘एग्जिस्ट’ करता है, हम सबको पता है, इस सौदे पर फ़्रांस सरकार के साथ वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी ने ही हस्ताक्षर किए हैं।
इस आरोप में राहुल गाँधी लगातार राफेल की कीमत को ₹1600 से लेकर ₹526 करोड़ से लेकर ₹1600 करोड़ तक का बताते हैं। अगर हम विमानों की कीमत जैसे तकनीकी विषय में न जाएँ, तो उनका मूल और फ्लैट आरोप यह है कि इसमें ₹30 हजार करोड़ का घोटाला हुआ है। अर्थात नरेंद्र मोदी ने भारत सरकार के खजाने से ₹30 हजार करोड़ लूट लिए हैं और दिलचस्प बात यह है जो राहुल गाँधी कहते हैं कि लूट के ये ₹30 हजार करोड़ नरेंद्र मोदी ने अनिल अम्बानी की जेब में डाल दिए हैं।
कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष और रॉबर्ट वाड्रा के साले राहुल गाँधी इस बात को इतनी बार दोहरा चुके हैं कि हम इस घटनाक्रम को भी इमेजिन करने लगते हैं कि आखिर कैसे यह सब हुआ होगा? नरेंद्र मोदी अकेले में तो अनिल अम्बानी को बुला नहीं सकते हैं, क्योंकि सबको पता चल जाएगा, इसलिए किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में मोदी ने सबसे नजरें बचाकर, अनिल अम्बानी को किसी कोने में ले जाकर, उसके कोट की जेब में ₹30 हजार करोड़ ठूँस दिए होंगे।
अब रेगुलर करेंसी के इतने नोट तो एक जेब में बन नहीं सकते, इसलिए यह भी मुमकिन है कि मोदी ने RBI के तत्कालीन गवर्नर ऊर्जित पटेल (गुजराती) को बोलकर ₹15 हजार करोड़ की कीमत वाले दो स्पेशल नोट छपवाए होंगे और उन्हीं नोटों को बंद मुट्ठी करके जूनियर अम्बानी की जेब में डाल दिया होगा। वैसे ही, जैसे शेयरिंग सवारियाँ ढोने वाला ऑटो ड्राईवर, आवश्यकतानुसार ट्रैफिक पुलिस वाले की मुट्ठी गर्म कर देता है, और प्रभु का तीसरा नेत्र भी इस दुर्लभ संयोग को देखने से वंचित रह जाता है।
अब अम्बानी की जेब गरम करने वाले मुद्दे की असलियत जानते हैं कि यह ₹30 हजार करोड़ का आँकड़ा आखिर आया कहाँ से, जबकि राफेल विमान सौदा ही कुल ₹58 हजार करोड़ का है? दरअसल यह ₹30 हजार करोड़ वह ऑफसेट ऑब्लिगेशन अमाउंट है, जिसे फ़्रांस की सरकार इस सौदे की शर्तों के तहत अगले पाँच से दस सालों में भारत की कम्पनियों के साथ भारत में निवेश करेगी। जिसके लिए भारत की 100 से अधिक कम्पनियों का चयन हुआ है, जिसमें रिलायंस भी एक है और इसके लिए ‘रिलायंस डिफेन्स’ ने दसॉं एविएशन कम्पनी (Dassault Aviation Company) के साथ एक ‘जॉइंट वेंचर’ बनाया है। इसके अंतर्गत ₹850 करोड़ का इन्वेस्टमेंट होगा, जिसमें रिलायंस के हिस्से का इन्वेस्टमेंट ‘सिर्फ ₹426 करोड़’ का है, जो आने वाले पाँच से दस साल के दौरान होगा। अब अगर अनिल अम्बानी यह पूरा इन्वेस्टमेंट भी डकार जाए, तब भी यह घोटाला सिर्फ ₹426 करोड़ का होगा, न कि ₹30 हजार करोड़ का, जैसा कि कॉन्ग्रेस चिरयुवा अध्यक्ष और विश्व वैमानिकी के जानकार माननीय राहुल गाँधी कहते आ रहे हैं।
यहाँ मैंने जो इस सौदे में अनिल अम्बानी की भूमिका का तकनीकी स्पष्टीकरण दिया है। एक बार अगर हम उसे भी दरकिनार कर देते हैं, और इसे ₹30 हजार करोड़ का ही घोटाला मान लेते हैं, और तब एक नजर कल की उस खबर पर डालते हैं, जो आज भी सुर्खियाँ बटोर रही है कि एक दूरसंचार सौदे में ₹500 करोड़ के कर्ज में डूबे अनिल अम्बानी को बचाने के लिए उनके बड़े भाई मुकेश अम्बानी ने उनका यह कर्जा चुकाया, वरना उन्हें 3 महीने के जेल हो सकती थी।
तब इसी एंगल से सोच लीजिए कि अगर अनिल अम्बानी के पास मोदी द्वारा उसकी जेब में ठूँसे गए ₹30 हजार करोड़ रखे होते तो क्या वह सिर्फ ₹500 करोड़ के लिए जेल जाने के मुहाने पर खड़ा होकर इस तरह से पूरी दुनिया में सरेआम जलील होना स्वीकार करता?
इन सभी कारणों से इस हवाबाजी का यह सार निकलता है कि नरेन्द्र मोदी ने बीते 5 साल में ‘आर्थिक अनियमिता’ और ‘घोटाले’ के नाम पर महज एक ‘राफेल’ करने की कोशिश की, लेकिन इसमें भी वे एक फूटी कौड़ी नहीं कमा सके, क्योंकि देश में एक जागरूक, मजबूत और रक्षा विशेषज्ञ के तौर पर राहुल गाँधी जैसा विपक्ष का नेता मौजूद था।
इसलिए, अगर आगे भी देश को मोदी-शाह जैसे शातिर चौकीदारों से बचाना है, तो आने वाले कई सालों तक विपक्ष में राहुल गाँधी जैसा एक जानकार, मँजा हुआ, सुलझा हुआ, ऊर्जावान, ओजस्वी और अविवाहित नेता ही चाहिए। इसलिए मेरी भारत की जनता से यही अपील रहेगी, खासकर युवा वर्ग से कि इस बार कॉन्ग्रेस को इतना वोट तो अवश्य दीजिएगा कि लोकसभा में उसकी कम से कम 10% सीटें आ जाएँ, ताकि उसे अधिकृत तौर पर नेता विपक्ष का पद मिल सके, जिसे कैबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल होता है। चूँकि पीएम को मिलने वाली SPG सुरक्षा पहले से ही उनके पास है… और जीने को क्या चाहिए?
कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने यह दावा किया कि अगर पुलवामा हमला न होता तो कॉन्ग्रेस के पक्ष में बहुत अच्छा माहौल लोकसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में बन चुका था। उन्होंने भाजपा पर आगामी चुनावों को ‘खाकी चुनाव’ बनाने का भी आरोप लगाया।
‘केरल में पहली बार किसानों की आत्महत्या’
पूर्व केन्द्रीय मंत्री व संयुक्त राष्ट्र राजनयिक थरूर ने भाजपा के रोजगार-सम्बंधित दावों का मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि भाजपा केवल दिल्ली में अपना रोजगार (सरकार) बचाने की चिंता में है। उन्होंने देश में किसानों की भाजपा सरकार के कार्यकाल में बदहाली पर भी चिंता व्यक्त करते हुए उदहारण दिया कि उनके गृह राज्य केरल में पहली बार 8 किसानों ने आत्महत्या कर ली है।
शशि थरूर का यह दावा हास्यास्पद भी है और अटपटा भी- हास्यास्पद इसलिए क्योंकि पहली बात तो यह केरल में पहली किसान आत्महत्या नहीं है (2001-06 में जब कॉन्ग्रेस-नीत यूडीएफ राज्य में सत्ता में था, तो खाली वैनाड जिले में 500 किसानों की आत्महत्या की खबर मीडिया ने रिपोर्ट की)।
और यह अटपटा इसलिए है कि भाजपा कभी भी केरला की सत्ता में नहीं रही- इन 8 किसानों की आत्महत्या के लिए यदि सत्ता जिम्मेदार है तो यह जिम्मेदारी वामदलों-नीत उस एलडीएफ की होनी चाहिए जिससे शशि थरूर की पार्टी कॉन्ग्रेस अपने कार्यकर्ताओं की हत्या का आरोप लगाने के बावजूद गठबंधन के लिए लालायित है।
‘हमारी ज़िम्मेदारी असली मुद्दे जनता को याद दिलाने की’
भूख, गरीबी, बीमारियों को दैनिक आतंकवाद बताते हुए शशि थरूर ने कहा कि सरकार को इन मुद्दों से भी लड़ने की आवश्यकता है, और यह भी कहा कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा और बाह्य खतरों जैसे मुद्दों को कम कर के नहीं आँक रहे हैं।
‘क्षणिक त्रासदियों पर न हों चुनाव’
तिरुवनंतपुरम से दो बार के लोकसभा सांसद और तीसरी बार के प्रत्याशी शशि थरूर ने कहा कि चुनाव पुलवामा हमले जैसी क्षणिक त्रासदियों पर नहीं, बल्कि भूख, गरीबी, बीमारियों जैसे सर्वकालिक मुद्दों पर लड़े जाने चाहिए।
मालूम हो कि गत 14 फरवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ के 40 सैनिक जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमले में मारे गए थे। पलटवार में भारत ने पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा स्थित बालाकोट में आतंकी कैम्पों पर हमला किया और 300-400 आतंकियों के मारे जाने का दावा किया।
शशि थरूर इन्हीं हवाई हमलों के बाद भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में बने सकारात्मक माहौल का ज़िक्र कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भाजपा की कोशिश ऐसा माहौल बनाने की है कि केवल भाजपा ही राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षक है जबकि कॉन्ग्रेस देश की हिफ़ाज़त को हल्के में ले रही है।
शशि थरूर का भाजपा पर चुनावों का खाकीकरण करने का आरोप एक बार फिर हास्यास्पद है। जब कॉन्ग्रेस के खुद के महत्वपूर्ण नेता कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू बालाकोट हवाई हमले पर सवाल उठाते हैं, राहुल गाँधी मोदी पर खून की दलाली का आरोप लगाते हैं, तो क्या उन्हें ऐसा करने का इशारा भाजपा की ओर से मिलता है?
‘उम्मीद है कि लोग भाजपा को उखाड़ फेंकेंगे’
शशि थरूर ने भाजपा सरकार पर फिर से बहुसंख्यकवाद फैलाने और देश के सेक्युलर सिद्धांत को कमज़ोर करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है आगामी चुनावों में देश के लोग भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकेंगे क्योंकि भाजपा सरकार दोबारा केन्द्रीय सत्ता पाने की हकदार नहीं है।
जिस तरह की दलीलें थरूर दे रहे हैं, उससे प्रतीत होता है कि उन्होंने कॉन्ग्रेस की हार स्वीकार कर ली है और कारणों को गिनाने की शुरुआत कर चुके हैं।
पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकी अड्डे को तबाह करने की भारतीय वायु सेना की कार्रवाई से चिढ़ा पाकिस्तान अब भारतीय राजनयिकों के उत्पीड़न पर उतर आया है। भारत ने पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को एक नोट जारी करते हुए कहा है कि पाकिस्तानी एजेंसियाँ इस्लामाबाद में भारतीय राजनयिकों को फिर से परेशान कर रही हैं। भारत ने मार्च के महीने से उदाहरणों को सूचीबद्ध करते हुए पाकिस्तान से इस मामले की जाँच करने को कहा है, साथ ही अधिकारियों के सुरक्षा का भरोसा देने के लिए भी कहा गया है।
India has issued a Note Verbale to Pakistan Foreign Ministry saying that Pakistani agencies are harassing and tailing Indian diplomats in Islamabad again. India has listed instances from the month of March and has also asked Pakistan to investigate the matter pic.twitter.com/kSVbOCF8UR
भारतीय राजनयिकों की खुफियागिरी करने और उन्हें तरह-तरह से परेशान करने की घटनाओं का सिलसिलेवार उल्लेख करते हुए भारत ने अपनी कड़ी आपत्ति जताई है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान में पिछले चार दिनों के अंदर भारतीय उच्चायुक्त और उप उच्चायुक्त सहित कई बड़े अधिकारियों का पीछा करने, अनुचित तरीके से सर्विलांस, झूठी फोन कॉल आदि दर्जन भर से ज्यादा घटनाएँ हुई हैं।
उच्चायोग में नौसेना के सलाहकार का भी आक्रामक तरीके से 8, 9, 10 और 11 मार्च को पाकिस्तान के सुरक्षाकर्मियों ने पीछा किया। भारतीय उच्चायोग ने पाकिस्तान से इस मामले की तत्काल जाँच की करने की माँग की है और कहा है कि इस तरह की उत्पीड़न की घटनाएँ 1961 के विएना समझौता का स्पष्ट उल्लंघन है।
गौरतलब है कि पाकिस्तान द्वारा भारतीय राजनयिकों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें पहले भी कई बार आती रही है। इससे पहले पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त अजय बिसारिया और महावाणिज्य दूतावास के अधिकारियों को गुरुद्वारा पंजा साहिब में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की अनुमति होने के बाद भी जाने से रोका गया था। इसके अलावा एक घटना में एक भारतीय राजनयिक का पीछा किया गया और गाड़ी रोक कर बदसलूकी की गई थी।
जब इनएविटेबल सामने होता है तो व्यक्ति अपने मानसिक संतुलन पर सबसे पहले हमला बोलता है। उसके कारण वो जो कार्य करता है, या बोलता है, वो विशुद्ध मूर्खता की श्रेणी में रखा जा सकता है। उदाहरण के लिए गाय की स्मगलिंग करता हुआ अपराधी, पुलिस बैरिकेडिंग पर पकड़े जाने के भय से पुलिस अफसर के ऊपर गाड़ी चढ़ाकर उसकी हत्या का भी अपराध कर देता है।
2013-14 का एक दौर याद कीजिए, जब नरेन्द्र मोदी की उम्मीदवारी तय हो चुकी थी और लहर को नकारते-नकारते विपक्ष के नेता सब तमाम प्रपंच करने लगे थे। नए झूठ गढ़े जाने लगे, प्रोपेगेंडा फैलाना चरम पर था, साम्प्रदायिकता को खूब हवा दी जा रही थी। बातें फैलाई जा रही थीं कि मोदी अगर आ गया तो दंगे हो जाएँगे, समुदाय विशेष का जीना हराम हो जाएगा, हिन्दू बहुसंख्यक लोग सड़कों पर नंगी तलवारें लेकर निकलेंगे और मार-काट करेंगे।
एक माहौल गढ़ा गया जिसमें भाजपा द्वारा कॉन्ग्रेस के निकम्मेपन और दस सालों की लूट पर वोट माँगने पर अपने गढ़ में पड़ती दरारों को कॉन्ग्रेस ने भाँप लिया था और सहयोगी दलों के साथ मिलकर प्रपंच करना शुरु किया। जिस कॉन्ग्रेस के पूरे शरीर पर देश के अधिकांश दंगों का रक्त है, जो अकेली भारतीय पार्टी है, जिसने एक अल्पसंख्यक समुदाय के साथ राजनैतिक संरक्षण में ‘पेड़ गिरने’ और ‘धरती हिलने’ के नाम पर नरसंहार किए, और वो कोर्ट द्वारा बेगुनाह साबित हो चुके व्यक्ति पर ऐसे प्रोपेगेंडा फैलाती है जैसे उसके सत्ता में आते ही भारत दंगाई कोलोजियम बन जाएगा।
लेकिन बात तो वही है कि सत्ता आपको अनुभव बहुत देती है। आपको जीतने के तरीके पता होते हैं, और आपको हराने का भी हुनर आ जाता है। आप खबरें पैदा कर सकते हैं, जब सामने वाला राम मंदिर और तुष्टीकरण न करे तो आप छेड़ते हैं कि अब राम मंदिर पर बात क्यों नहीं कर रहे! आप घाघ हो जाते हैं, आपके अंदर की धूर्तता आपके बच्चों तक जेनेटिकल स्तर तक पहुँच चुकी होती है।
ये घाघपना और आपका स्थापित तंत्र एक मुद्दा बनाता है, जिसमें क्षेत्रीय पार्टियों के उदय से आपके ट्रेडिशनल अल्पसंख्यक वोट बैंक में होते छेद पर सेलो टेप मारा जा सके। ऐसे समय में ‘डर’ की रचना सबसे कारगर होती है। तब आप न उनकी शिक्षा की बात करते हैं, न उनमें व्याप्त गरीबी की, न उनके आधारभूत विकास पर ध्यान देते हैं। क्योंकि उन्हें वैसा रखने में आपने बहुत परिश्रम किया। आपने समुदाय विशेष को गरीब, पिछड़ा, अशिक्षित रखा क्योंकि आप उस मुद्दे के गन्ने को बोते रहे, बोते रहे, काटते रहे, काटते रहे, और फिर चुनाव की मशीन में इतनी बार पेरा गया कि उसकी सिट्ठी ही बची।
जब आप लगातार एक मानसिकता बना देते हैं कि तुम अल्पसंख्यक हो, और भाजपा साम्प्रदायिक है, तो उसे तीन तलाक के निरस्तीकरण से लेकर वो सारी बातें साज़िश लगने लगती हैं जो उसी के विकास के लिए है। फिर एक घाघ नेता और धूर्त पार्टी इस ‘डर’ पर खेलना शुरु करता है। पूरे समुदाय को बताया जाता है कि ‘देखो, हम चोर ही सही, हम तो तुम्हें गरीबी-लाचारी-अशिक्षा में जीने तो दे रहे हैं, वो तो तुम्हें काट देगा’।
यह डर खूब फैलाया गया ताकि अपनी लूट, भ्रष्टाचार और निकम्मेपन की बात को छुपाया जा सके। लेकिन कारपेट के भीतर कूड़ा छुपाने की एक हद होती है। कॉन्ग्रेस का स्वीपिंग अंडर कारपेट इतना विशाल हो गया वो कारपेट कूड़े का पहाड़ बन गया, जो सबको दिख रहा था। ये पहाड़ सबको दूर से नज़र आ रहा था। फिर घाघ पार्टी के पास कोई चारा नहीं बचा: मोदी आ गया तो देश में दंगे होंगे!
मोदी तो मोदी, योगी भी मुख्यमंत्री बनकर आ गया और उत्तर प्रदेश अपने प्रशासन और अपराधियों पर लगाम कसने में नई मिसाल क़ायम कर रहा है जहाँ अपराधी खुद ही जेल में सरेंडर करने पहुँच रहे हैं। योगी को लेकर भी यही आशंका जताई गई थी कि यूपी समुदाय विशेष के लिए रहने योग्य नहीं रहेगा और दंगे होंगे। ऐसा कुछ नहीं हुआ। दंगाइयों को सजा मिल रही है, अपराधियों को पकड़ा जा रहा है और यूपी सरकार भी बेहतरी की ओर बढ़ रही है।
मोदी पूर्ण बहुमत की सरकार लेकर आ गए, कुशलता से पाँच सालों में जितना हो सकता था (पिछली सरकारों के मुक़ाबले) उससे ज़्यादा ही काम किया। बिजली, सड़क, स्वच्छता जैसे छोटे लेकिन जीवन बदलने वाले मुद्दों से लेकर वित्तीय समावेशन, विदेश नीति, जीडीपी, टैक्सेशन जैसे मुद्दों पर लगातार बेहतरी की है। लगातार भाजपा समर्थित पार्टियों की जीत यही बताती है कि मोदी और पार्टी की छवि सुधरी है, न कि उन्हें एक हिन्दुत्ववादी सरकार की तरह देखा जा रहा है जहाँ हिन्दुओं को मार-काट की खुली छूट हो।
यही कारण है कि सत्ता से दूर, चौवालीस तक सिमट चुके, छोटे दलों द्वारा सीटों के लिए लगातार नकारे जा रहे कॉन्ग्रेस और उनके नेताओं को नए झूठ की ज़रूरत महसूस हो रही है। कॉन्ग्रेस के लिए दुर्भाग्य कई स्तर का है। पहला तो यही है कि राहुल गाँधी पार्टी के अध्यक्ष हैं। दूसरा यह है कि पाँच सालों में इन्होंने जो-जो मुद्दे उठाए, सब फट के हवा हो चुके हैं, चाहे वो राफेल हो या रोजगार की बात। तीसरा यह है कि ये लोग अपनी योजना या विजन को लोगों तक पहुँचाने की बजाय मीम बनाकर मोदी की छवि बिगाड़ने में लगे हुए हैं।
चौथी बात, जो इस लेख का आधा हिस्सा है, वो यह है कि ये अब झूठ भी अपना नहीं बना पा रहे। इन्होंने कहीं सुना कि मोदी के खिलाफ कुछ कहा जा रहा है, तो चोरी-चोरी चुपके-चुपके, एक टुटपुँजिया कॉमेडियन की तरह, जो किसी कम प्रसिद्ध व्यक्ति के चुटकुले चुराकर हिट होने की फ़िराक़ में रहता है, अशोक गहलोत ने कह दिया कि अगर मोदी दोबारा आ गया तो चुनाव ही नहीं होने देगा।
ये बात गहलोत की ऑरिजिनेलिटी नहीं है, ये विशुद्ध चिरकुटों वाली हरकत है जो कि सत्तर साल के बुजुर्ग व्यक्ति को शोभा नहीं देती। इतना अनुभव गहलोत साहब कहाँ ले जाएँगे, पता नहीं चल रहा कि ऐसे मामलों में तो दिमाग लगा लें थोड़ा कि कह क्या रहे हैं! ‘हिन्दू तलवार लेकर दौड़ जाएगा’ वाली बात ही कह देते, कुछ दुसरे समुदाय वाले लोग डर के मारे वोट दे देते, लेकिन ये वाली बात अलग स्तर पर जा चुकी है!
‘चुनाव ही नहीं होने देगा’ कहकर शायद ये पूरी भारत की जनता में डर व्याप्त करना चाह रहे हैं। लेकिन कहीं ये डर बैकफायर न कर जाए! वैसे भी भारत में आदमी वोट देने से पक चुका है, और कॉन्ग्रेस के इस झूठ को सच मानकर कहीं मोदी को 60% वोट देकर अनंतकाल के लिए पीएम न बना दे! फिर ईवीएम और वीवीपैट हैक्ड है कि नौटंकी करते रहिएगा!
गहलोत ने गम्भीरता से अपनी बात रखते हुए कहा कि अगर मोदी दोबारा जीत जाता है तो या तो यहाँ चुनाव ही नहीं होंगे या भारत में रूस या चीन जैसी स्थिति हो जाएगी। गहलोत ने आगे बताया कि मोदी चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
सही बात है, चुनाव जीतने के लिए ‘किसी भी हद तक’ जाने की बात कॉन्ग्रेस से बेहतर और कौन जान सकता है! चाहे राफेल को पीटकर चुनाव में फर्जी मुद्दा बनाने की बात हो, या फिर लगातार झूठ बोलकर जनता को तमाम मुद्दों पर बरगलाने की बात हो, कॉन्ग्रेस ने अपनी कल्पनाशीलता का खूब परिचय दिया है। एक ही बात को सतहत्तर बार बोलकर, सत्य को झूठ बनाने की तकनीक भी इन्होंने अपना ली, लेकिन इनके झूठ का खोटा सिक्का चल नहीं पा रहा।
पाँच साल ही सत्ता से दूर रहने पर गहलोत शायद थोड़े ढीले भी हो गए हैं। उन्हें ये पता नहीं है कि प्रपंच को कसकर पकड़ना चाहिए ताकि लोग उनको गम्भीरता से लें। उन्होंने मोदी को पहले चुनाव नहीं होने देने की बात को लेकर घेरा, फिर अगली ही लाइन में उन्हें ‘बॉलीवुड में होते तो अपने लटके-झटकों एवं अदाओं से देश तथा दुनिया में अलग छाप छोड़ते’ कहकर दाँत निपोड़ दिया।
वैसे, दो लाइन में गम्भीरता से भाषाई और शारीरिक चिरकुटई पर उतरना कॉन्ग्रेस में ऊपर से ही नीचे बहता आ रहा है। इनके अध्यक्ष पहले प्यार से मोदी के गले पड़ने जाते हैं, फिर ‘आँख मारे वो लड़का आँख मारे’ करते नज़र आते हैं। कॉन्ग्रेस के एकमेव पैदाइशी मालिक राफेल जैसे गम्भीर मसले पर चर्चा करने की बात करने आए, उनके नुमाइंदों ने संसद में पेपर प्लेन चलाकर अपनी गम्भीरता की माचिस जलाकर छोड़ दी।
किसी भी हद तक कौन जा रहा है, ये जनता को दिखता है। प्रपंच के नए कीर्तिमान कॉन्ग्रेस रच रही है। अल्पसंख्यकों में डर फैलाने की बातें कॉन्ग्रेस कर रही है। भाषाई मर्यादाओं को कॉन्ग्रेस तोड़ रही है। लगातार छोटे दलों के पीछे पड़कर समर्थन देने की बात कॉन्ग्रेस कर रही है। क्षेत्रीय दलों द्वारा ‘दो और पाँच सीटें लो या निकल लो’ टाइप की धमकियाँ झेलकर भी कुछ न कह पाने के लिए मजबूर कॉन्ग्रेस हो रही है।
और, किसी भी हद तक कौन जा सकता है? मोदी! अरे भैया, वो जा सकता है, तुम जा चुके हो। रमाधीर सिंह की कालजयी पंक्ति ही बची है याद करने को अब, “और कितना बेइज्जत कराओगे बाप को?”
ट्विटर पर चौकीदार और बेरोजगार की लड़ाई में योद्धा अपने अपने शिविर से निकल चुके हैं। सबने अपने पिछले रिकॉर्ड और क्षमता के साथ न्याय करते करते हुए अपने-अपने टैग और प्रोफ़ेशन चुन लिए। इसमें चौकीदार बनी है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेना और बेरोजगार बनी है कॉन्ग्रेस पार्टी की कार्यकर्ता टीम!
कॉन्ग्रेस के बेरोजगारों में सबसे पहला नाम जो नजर आया, वो है राहुल गाँधी के बाद पार्टी के दूसरे युवा नेता, कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष पद के कड़े प्रतिद्वंदी और ‘पाटीदार आंदोलन फेम’ हार्दिक पटेल का। जिस हार्दिक पटेल का राजनीति में स्वागत ही एक ‘CD-काण्ड’ के साथ होता है, उसका ‘चौकीदार’ होना समाज के लिए उचित भी नहीं है।
ऑपइंडिया तीखी मिर्ची सेल द्वारा जारी ‘चुनावी बेरोजगारी’ के आँकड़े
बेरोजगार कॉन्ग्रेस
मेरा मानना है कि हार्दिक पटेल की बेरोजगारी इस देश के युवा के लिए एक मानक की तरह आदर्श बेरोजगारी घोषित की जानी चाहिए। यह युवा नेता ऐसा बेरोजगार है, जो पिछले 4-5 सालों में पाटीदार जाति के लिए आरक्षण का झंडा उठाकर बहुत ही कम समय में राष्ट्रीय केजरीवाल बनकर उभरा है। अपने इस तमाम सफर में हार्दिक पटेल CD-काण्ड जैसी एक के बाद एक बड़ी कठिनाई से गुजरे। इसके बाद ब्याह रचाया और अब 2019 के आम चुनाव से पहले अपनी सभी बड़ी जिम्मेदारियाँ निपटाने के बाद समय से अपना सेटलमेंट करने के लिए बेरोजगार हो जाना चुन चुके हैं। हार्दिक पटेल को ‘आदर्श बेरोजगार’ का दर्जा देना चुनावी घोषणापत्र में शामिल किया जाना चाहिए। कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर रहते हुए ‘दर्जा-दिलाऊ’ पत्रकारों के अभियान से यह जल्दी से संपन्न भी हो जाएगा। हार्दिक पटेल की बेरोजगारी इसलिए भी चर्चा का विषय होनी चाहिए कि बहुत ही कम समय में उन्हें देश की सबसे प्राचीन राजनीतिक पार्टी ने भर्ती किया और उसके बाद वो बेरोजगार हो गए।
बेरोजगार पत्रकार
खुद को बेरोजगार बताने की लहर मोदी लहर से ज्यादा चली है। जबकि, अगर आप आँकड़े देखें तो 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से बहुत से लोगों को रोजगार मिला है। रोजाना नरेंद्र मोदी सरकार के घोटालों के स्वप्न को सच साबित करने वालों को रोजगार मिला है, संसद में उनके गले पड़ने वालों को रोजगार मिला है। मीडिया में बैठे पत्रकारिता के समुदाय विशेष को तो सबसे ज्यादा रोजगार मिला है। जिन पत्रकारों को TRP न आने के चलते नौकरी छिन जाने का भय भी सताने लगा था, उन्होंने भी पाकिस्तान में अच्छी-खासी फैन फॉलोविंग पुलवामा आतंकी हमले के दौरान दिन-रात प्रोपेगेंडा चलाने की मेहनत कर के जुटा ली है। ये मीडिया गिरोह तो मन ही मन चाह रहा होगा कि अबकी बार फिर से नरेंद्र मोदी ही सरकार बनाएँ, ताकि इनके पास खूब रोजगार के अवसर और मुद्दे रहें। अख़बारों की ख़बरों को काट-पीटकर TV चैनल पर अपने प्रोपेगेंडा के अनुसार बनाकर प्रस्तुत करना क्या रोजगार नहीं है?
यदि इन सब रोजगार के आँकड़ों को भी नकार दिया जाए, तो 2 मिनट का समय निकालकर आप उस आदमी के बारे में सोचिए, जिसे सिर्फ इसलिए रोजगार मिला हुआ है क्योंकि एक मुद्दों से भटका हुआ मनचला पत्रकार रोज शाम को उससे अलग-अलग भाषाओं में अपने फेसबुक स्टेटस को ट्रांसलेट करवा रहा है।
बेरोजगार कॉमेडियंस
मोदी सरकार के शपथ ग्रहण करते ही रोजगार की लहर सबसे ज्यादा कॉमेडियंस के बीच देखने को मिली है। इतिहास में यह पंचवर्षीय, कॉमेडियंस का स्वर्णकाल कहलाई जाएगी। इस दौरान वो लोग भी कॉमेडियन कहलाए गए हैं, जिन्होंने रेलवे प्लेटफॉर्म पर बिकने वाली अकबर-बीरबल के चुटकुलों वाली किताब से चुटकुले पढ़कर यूट्यूब पर सुनाकर वायरल कर डाले। उनकी कॉमेडी का हुनर कॉन्ग्रेस को इतना भाया है कि राज परिवार द्वारा मोदी सरकार को गाली देने के लिए उसे अब भाड़े पर रख लिए गए।
हालाँकि, इन सभी सस्ते-महँगे कॉमेडियंस द्वारा कॉमेडी के नाम पर बनाए गए चुटकुले इतने बकवास थे कि उन्हें कॉमेडी कहा जाना ही सबसे बड़ी कॉमेडी हो पड़ी। AIB समूह के साथ इस दौरान जो घटना घटी, वो चौंका देने वाली थी। इसमें कॉमेडी ये थी कि अपने #MeToo कांडों का ठीकरा वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सर पर नहीं फोड़ सके और AIB एक नाकाम फिदायीन की तरह ‘Self Goal’ को प्राप्त हुआ। फिर भी, AIB की दुकान बंद होने का दारोमदार राहुल गाँधी ने अपने कन्धों पर संभाले रखा और जनता को कभी भी इंटरटेनमेंट में कोई कमी महसूस नहीं होने दी।
बेरोजगार फ़्रीलांस प्रोटेस्टर्स और कॉन्ग्रेस IT ट्रॉल सेल
JNU की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद से लेकर व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी में रिश्तेदरों के ग्रुप में होने वाली ‘वायरल तस्वीर‘ का फैक्ट चेक कर के अपनी दुकान चलाने वाले लोगों के रोजगार के आंकड़ों में भी ‘बूम’ नजर आया है। कभी-कभी ‘फैक्ट चेक’ की कमी के चलते इनका धंधा मंद हुआ, लेकिन यही मौका था जब उनकी रचनात्मकता से लोग खुश होते और वो अपने प्रोपेगैंडा के चितेरे प्रशंसकों की उम्मीदों पर खरे उतरे। ये सब मोदी सरकार के दौरान ही तंदुरुस्त हुए हैं। देखा जाए तो इन्हें मोदी सरकार का शुक्रगुजार होना चाहिए, जिसके विरोध में लिखने और ‘ऑन डिमांड धरना प्रदर्शन’ के कारण इनका अस्तित्व लोगों के सामने आ सका। इसी तरह से कॉन्ग्रेस और AAP का संयुक्त IT सेल प्रमुख ध्रुव राठी भी यदि खुद को बेरोजगार कह दे, तो उसे भी तुरंत कॉमेडियन का दर्जा देकर रोजगार में तब्दील कर दिया जाना चाहिए।
बेरोजगार महागठबंधन
2019 के आम चुनाव के बाद जो सड़क पार आने की स्थिति में होगा वो होगा महागठबंधन। नरेंद्र मोदी के दुबारा प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाले समाजवादी नेताजी तो अब मार्गदर्शक मंडल में ही रोजगार पाएँगे, लेकिन अखिलेश यादव और बहन मायावती के साथ यदि जनता ने कॉमेडी कर दी तो उनका ट्विटर एकाउंट में भी बेरोजगार जुड़ना तय है।
बेरोजगार आम आदमी पार्टी वालंटियर्स
आज के समय में यदि कोई सबसे ज्यादा बेरोजगार है, तो वो है नई वाली राजनीति फेम आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल। वो गिड़गिड़ाकर, रो-रो कर गठबंधन की भीख माँग रहे हैं, लेकिन गठबंधन है कि उन्हें रोजगार देने को तैयार ही नहीं है।
आप चुनावी माहौल में सिर्फ चुनावी चकल्लस की तलाश में निकले हैं, इसलिए मामले की गंभीरता से आप दूर हैं। आप बेरोजगार हार्दिक पटेल का असल मर्म नहीं जानते। कॉन्ग्रेस पार्टी में पहले से ही एक चिर युवा अध्यक्ष राहुल गाँधी अध्यक्ष पद पर मौजूद हैं। अब, जब एक पाटीदार देश के सबसे प्राचीन राजनीतिक दल में घुस चुका है, तो वो आरक्षण के बल पर अध्यक्ष पद पाने की महत्वाकांक्षा मन में पाल रहा है। अब जब तक उसे ये पद मिल नहीं जाता, उसने खुद को बेरोजगार मानने का संकल्प धारण कर लिया है। इस तरह से अभी तक कॉन्ग्रेस में सिर्फ राहुल गाँधी ही भाजपा के स्टार प्रचारक माने जाते थे लेकिन अब हार्दिक पटेल भी भाजपा की स्लीपर सेल इकाई के तौर पर देखे जाने चाहिए।
जो भी है, मगर ये VIP बेरोजगार एंटरटेनमेंट में कोई कमी नहीं आने दे रहे दे रहे हैं। आम आदमी को इससे ज्यादा और चाहिए भी क्या?
जब सरकार जनतंत्र के साधनों पर कब़्जा करने लगे और अभिव्यक्ति की स्वतत्रंता पर लगाम कसने लगे तो यह चिंता और चेतावनी की स्थिति है और यही हालात पश्चिम बंगाल में भी है। जानी-मानी उपन्यासकार और विचारक टीना बिस्वास ने मंगलवार को कोलकाता प्रेस क्लब में अपनी तीसरी पुस्तक ’द एंटागाॅनिस्ट’ के विमोचन के अवसर पर अपनी वेदना व्यक्त की।
पुस्तक विमोचन के दौरान अपने विचार प्रकट करती टीना बिस्वास
’’आधुनिक काल में पश्चिम बंगाल की राजनीति को जो चीज़ रुग्ण कर रही है उसका खुलासा करने के लिए मैंने उपन्यास को माध्यम बनाया है। एक वक्त था जब हम सबने बड़ी आशा लगाई थी कि यहाँ पर सरकार में होने वाला परिवर्तन दिखेगा, लेकिन दुर्भाग्य से वह आशा बेहद अल्प-जीवी साबित हुई।’’ बिस्वास ने बताया कि उनका जन्म बंगाली दंपत्ति के घर में हुआ और उन्होंने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में राजनीति, दर्शनशास्त्र एवं अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। उनकी तीसरी किताब ’द एंटागाॅनिस्ट’ के बारे में सांसद शशि थरूर का कहना है, ’’यह एक दिलचस्प और आविष्कारशील राजनीतिक उपाख्यान है। यह सुस्पष्ट, अभिगम्य, चपल और अत्यतं मौलिक उपन्यास है।’’
एशियन रिव्यू ऑफ बुक्स ने इस पुस्तक के लिए लिखा है, ’’राजनीतिक प्रवंचना के प्रशंसक इस व्यंग्यपूर्ण कथा को सराहेंगे, जो पश्चिम बंगाल के शासक वर्गों में फैले कपटाचरण, मीडियाई जोड़तोड़ और हत्याओं के किस्से बयां करती है।’’ पुस्तक के प्रकाशक फिंगरप्रिंट के प्रतिनिधि उपन्यास के बारे में कहते हैं, ’’व्यक्ति के संग राजनीति को निर्बाध ढंग से एक करते हुए और कल्पना को वास्तविकता के साथ मिलाते हुए ’द एंटागाॅनिस्ट’ आधुनिक राजनीति के काले एवं विसंगति भरे व्यंग्य को प्रकट करती है।’’
टीना बिस्वास बताती हैं, ’’यूनाइटेड किंग्डम में जन्म व पालन पोषण के बावजूद मेरे हृदय में बंगाली संस्कृति का विशेष स्थान है और इसीलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि मेरे तीनों उपन्यासों का पश्चिम बंगाल से गहरा नाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनतंत्र के मूल्याों में गहन विश्वास रखने वाले व्यक्ति के तौर पर मुझे, आजकल लगाए जाने वाले प्रतिबंधों से बहुत दुख होता है- चाहे वह सिनेमा पर रोक हो या फिर असहमति की आवाज़ को दबाना। सार्वजनिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में सरकार के दमन के विरुद्ध मैंने अपनी लेखनी से सदैव आवाज़ बुलंद की है।’’ द गार्जियन द्वारा टीना बिस्वास को ’स्वाभाविक लेखक’ करार दिया गया है। विख्यात राजनीतिक टिप्पणीकार व लेखक मैथ्यू डी’ऐनकाॅना ने घोषित किया है कि ’द एंटागाॅनिस्ट’ ’’एक शानदार सामाजिक व्यंग्य है। इसकी गति, दनदनाते संवाद और मेधावी अवलोकन ईवलिन वाॅ के जादुई लेखन का एहसास कराते हैं।’’
अपने उपन्यास का प्रचार करने के लिए टीना कोलकाता और दिल्ली की यात्रा कर रही हैं। बिस्वास ने पश्चिम बंगाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दमन और बिगड़ते राजनीतिक हालात के संदर्भ में कहा, “मैं समझती हूँ कि जो सही है, उसके लिए खड़े होना मेरा कर्तव्य है और इस हेतु लिखने से बेहतर तरीका और भला क्या हो सकता है।’’ टीना बिस्वास ने एक दिन पहले सोमवार को ऐमिटी यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के साथ संवाद भी किया था।