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फ़ोटो फ़ीचर: भारतीय संस्कृति की थाती समेटे ‘संस्कृति ग्राम’ व ‘संस्कृति कुम्भ’ का वर्चुअल टूर

कुम्भ की महिमा का गान और सनातन संस्कृति का बखान करने के लिए मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ द्वारा उद्घाटन के बाद से ही गंगा पार प्रयागराज का अरैल स्थित ‘संस्कृति ग्राम’ आगन्तुकों के स्वागत के लिए धर्म और संस्कृति से जुड़ी कई मनोरम झाँकियों के साथ तैयार है। आप यहाँ सनातन परम्परा और संस्कृति के साथ ही कुम्भ के इतिहास से भी परिचित होंगे। इतना ही नहीं लोक संस्कृति की मनोरम झाँकियाँ देखनी हो, लोकगीतों की ताल पर झूमना हो तो पधारिए ‘संस्कृति कुम्भ’ जो अपनी पूरी भव्यता के साथ प्राचीन से नवीन भारत की तमाम खूबियों को समेटे आपकी राह देख रहा है।

यू. पी. नहीं देखा तो क्या देखा! (तस्वीर – ज्ञान प्रकाश पाण्डेय)

चलिए ले चलता हूँ, आपको एक वर्चुअल टूर पर ‘संस्कृति ग्राम’ की छोटी सी झलक के साथ संस्कृति कुम्भ दिखाने –


यहाँ शास्त्रीय संगीत से लेकर विभिन्न लोक कलाओं की झलक देखने को मिलेगी।

केवट प्रसंग- प्रभु राम केवट को गले लगाते हुए (तस्वीर – ज्ञान प्रकाश पाण्डेय)

राम मर्यादा पुरुषोत्तम माने गए हैं। बेशक़ उलझी हो उनकी अपनी ही जन्म नगरी कोर्ट-कचहरी में, पर उनकी गाथा सबको आत्मसात कर, वंचितों और असहायों को सदैव विजय की प्रेरणा देती रहेगी।

राम वन गमन (तस्वीर – ज्ञान प्रकाश पाण्डेय)

जंगल का जीवन बहुत सुखदायी तो कभी नहीं रहा होगा। पर पिता के वचन रक्षार्थ 14 वर्ष का वनवास। संयम, साहस, जीवटता का प्रतीक।

चल रहा महाभारत का रण (तस्वीर – ज्ञान प्रकाश पाण्डेय)

महाभारत की कई घटनाएँ आपको महामानव कृष्ण की याद दिलाएँगी। जीवन की निस्सारता और ‘जो है वही है’ के रूप में गीता का सस्वर ज्ञान सुनाएँगी। रामायण और महाभारत हमारे दो ऐसे महाकाव्य हैं, जिसमें जीवन के हर संग्राम में यशस्वी होने के बीज सूत्र हैं।

काली दह में कालिया नाग का मान मर्दन करते हुए श्री कृष्ण (तस्वीर – ज्ञान प्रकाश पाण्डेय)

कृष्ण न सिर्फ़ लीलाधर थे बल्कि मानव जीवन की सम्पूर्णता का पर्याय भी

जनक नन्दनी सीता माँ (तस्वीर – ज्ञान प्रकाश पाण्डेय)

संस्कृति ग्राम में न सिर्फ़ रामायण-महाभारत के प्रसंग, बल्कि समुद्र मन्थन से लेकर, पाषाण काल, आदिमानव से आधुनिक मानव और उसकी सांस्कृतिक विकास यात्रा भी देखने को मिलेगी

जीवन को व्यस्थित करने का पहला प्रयास (तस्वीर – ज्ञान प्रकाश पाण्डेय)

कभी सोचिएगा कि आदिकाल में, पुरापाषाण काल में कैसा रहा होगा जीवन… आदिकाल की उन कठिनाइयों को उकेर कर कलाकृतियों के माध्यम से उस दौर के जीवन को बखूबी समझाने की कोशिश

मराठा शान के प्रतीक शिवाजी (तस्वीर – ज्ञान प्रकाश पाण्डेय)

…और भी थे जो लड़े सनातन संस्कृति की आन-बान-शान के लिए

सनातन परम्परा को शब्द संसार में बाँधकर मानवता को सौंप देने वाले महापुरुष
(तस्वीर – ज्ञान प्रकाश पाण्डेय)

तुलसी, बाल्मीकि से लेकर संस्कृति को अक्षुण्ण रखने वाले ऐसे ही कई और भी महापुरुषों की झाँकी

पूरा पाषाण काल (तस्वीर – ज्ञान प्रकाश पाण्डेय)

ये तो पूरी प्रदर्शनी की छोटी-सी झलक है। ‘संस्कृति ग्राम’ में सिंघु घाटी की सभ्यता, वैदिक काल की ऋचाएँ, रामायण युग, कृष्ण लीला, महाभारत काल की प्रमुख घटनाएँ, बुद्ध एवं महावीर के त्याग और ज्ञान की सांस्कृतिक विरासत, मौर्य काल, शुुंग एवं कुषाण काल, गुप्त काल, वर्धन साम्राज्य, भारत में मंदिर वास्तु का विस्तार, भक्ति काल, इंडो-इस्लामिक कला एवं स्थापत्य, मराठा साम्राज्य, 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, एवं सामाजिक जागरूकता से जुड़े आंदोलन तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी कुछ ऐसी कहानियाँ जो इस देश की सनातन, गौरवशाली परम्परा का प्रतिनिधित्व करती हैं, विभिन्न कलाकृतियों, पेंटिंग एवं जीवन्त कलाकारों के माध्यम से प्रदर्शित की गई हैं।

भारतीय लोक कला संस्कृति का अनूठा संगम संस्कृति कुम्भ

इतना ही नहीं, इस बार कला कुम्भ में देश-विदेश के नाट्य एवं लोक कलाकारों का जमावड़ा भी हो रहा है। ये कलाकार विभिन्न मंचों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। 16 फरवरी 2019 तक चलने वाले कार्यक्रम में भारत सहित 12 देशों के कलाकार अपने देशों की शैलियों में रामलीला का मंचन करेंगे। संस्कृति विभाग में अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक योगेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि इंडोनेशिया, त्रिनिदाद, थाईलैंड, रूस, मलेशिया, श्रीलंका, मॉरीशस, सूरीनाम, नेपाल, बांग्लादेश एवं न्यूजीलैंड के लोक कलाकार मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जीवनगाथा ‘रामलीला’ की प्रस्तुति देंगे

चंद कौड़ियों के लिए जब पादरी ने कर दिया था कैथोलिक लड़कियों का सौदा

सोलह साल की लड़की को सिर्फ 150 पौंड के लिए बेच दिया गया। उस मासूम की आह, दर्द और कराह को किसी ने नहीं सुना, बस उसका शारीरिक-शोषण होता रहा।

पाँच दशक पहले की किसी वारदात पर खोजबीन करने निकलेंगे तो क्या हाथ आएगा? जिन मलयाली कैथोलिक लड़कियों ने मेट्रिक की परीक्षा पास कर ली हो, ऐसी लड़कियों को पादरियों ने रोजगार के अवसर के नाम पर बुलाना शुरू किया था। बीस लड़कियों का ऐसा पहला दल 1963 में केरल से विदेशों में भेजा गया और 1972 से इनके साथ दुर्व्यवहार की कहानियां सुनाई देने लगीं। ‘द गार्डियन’, ‘द टाइम्स’ और ‘वाशिंगटन पोस्ट’ जैसे अख़बारों/प्रकाशनों में जर्मनी भेजी गई इन लड़कियों की कहानियाँ आने से मामला प्रकाश में आया।

इसके बावजूद भारत में इनके बारे में कोई चर्चा करना किसी को ज़रूरी नहीं लगा। रॉयटर्स की फ़ेलोशिप के लिए लंदन गए फ़िल्मकार राजू ई राफ़ेल को सन 2000 में जब इसका पता चला तो उन्होंने इस विषय पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की सोची। के राजगोपाल के साथ मिलकर उन्होंने इस विषय पर ‘अरियाप्पेदथा जीवीथांगल’ नाम की डॉक्यूमेंट्री बनाई। इसे बनाना कोई आसान काम नहीं था, क्योंकि शुरूआती दलों में गईं कई लड़कियों की या तो मृत्यु हो चुकी थी, या लौटकर वो कहीं दूरदराज के क्षेत्रों में मिशनरी काम कर रही थीं।

पादरी ने किया था 16 साल की किशोरी का सौदा

सोलह साल की जिस लड़की को पादरी ने सिर्फ 150 पौंड के लिए बेच दिया हो, उस किशोरी की तकलीफ की कल्पना करना भी मुमकिन नहीं। जब फ़िल्मकार उन बची हुई ननों से मिले तो हालात काफ़ी बदल चुके थे। कुछ मलयाली ननें भावनात्मक मुश्किलों से उबर पाई थीं। उनमें से कुछ अब वहाँ की चर्च में ऊँचे ओहदों पर हैं। कई ऐसी भी थीं जिनका मानसिक स्वास्थ बिगड़ गया। मजहब के नाम पर हुए ऐसे शोषण के बारे में आम तौर पर भारत में कोई बात नहीं होती। अक्सर इसे अल्पसंख्यक समुदाय का विशेषाधिकार मान लिया जाता है।

फिल्म के लिए शोध करने का काम जोस पुन्नापरम्बिल के जिम्मे था। लम्बे समय जर्मनी में रहने के कारण उनकी जान पहचान भी अच्छी थी। उनका कहना है कि अनोखी बात ये है कि कभी चंद पाउंड के लिए जर्मनी भेजी जा रही मलयाली ननों का ही अब वहाँ के चर्च में दबदबा है। जर्मन लोग मज़हबी कामों में अब कम रूचि लेते हैं, इसलिए उनकी गिनती घटती जा रही है। सिर्फ शोषण की कहानी तक ही अपनी डॉक्यूमेंट्री को सीमित रखने के बदले राजू ई राफ़ेल ने कहानी का अंत तक पीछा किया।

जो ननें जर्मनी भेजी गई थीं, उनमें से कुछ अपने गाँव लौटकर अब सेवानिवृत्त जीवन बिताती हैं। उन्हें तलाशते हुए राजू महाराष्ट्र, केरल और मध्यप्रदेश के गावों तक पहुँच गए। चालीस मिनट की इस फिल्म की विश्वसनीयता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि फ़िल्मकार ने शुरुआती बैच में गई कई ननों से मुलाकात और बातचीत भी रिकॉर्ड कर रखी है। ये एक ऐसी पुरानी कहानी है जो न चाहते हुए भी बार-बार उभर आती है।

‘स्पॉटलाइट’ फिल्म से सामने आया था पादरियों का काला कारनामा

दुनिया भर में चर्च के कैथोलिक पादरियों द्वारा किए जा रहे यौन-शोषण पर कुछ साल पहले ‘स्पॉटलाइट’ नाम की फिल्म बनी थी। ऑस्कर जीतने वाली ये फ़िल्म मुख्य धारा की चर्चा में कभी नहीं आई। “बॉस्टन ग्लोब” के शोध के आधार पर बनी इस फ़िल्म के पहले और बाद में कैथोलिक चर्च सिर्फ यौन शोषण के मामलों में करोड़ों का जुर्माना भर चुका है।

हाल ही में भारत में भी ऐसे मामले प्रकाश में आने लगे हैं। गौर करने लायक ये भी है कि ऐसे मुद्दों पर जब बरसों पहले सिस्टर जेसमी ने “ऐमन” (Amen) नाम की किताब लिखी थी तब उन्हें और उनकी किताब को चौतरफा विरोध झेलना पड़ा था।

भारत में ननों के शारीरिक शोषण पर आवाज़ उठाने का मतलब सांप्रदायिक होना क्यों?

भारत में आमतौर पर ननों के बलात्कार जैसे मामलों को भी सांप्रदायिक रंग देकर बहुसंख्यक समुदाय को नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता रहा है। झाबुआ नन बलात्कार काण्ड (1998) में भी तब के मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने ऐसा करने की कोशिश की थी। बाद में पता चला कि बलात्कारियों में से 12 तो स्थानीय ईसाई आदिवासी ही थे! करीब-करीब ऐसा ही हाल में एक वृद्ध नन के बलात्कार के मामले में हुआ था। इस मामले में बाद में बंगलादेशी घुसपैठिए गिरफ्तार कर लिए गए। गिरफ्तारियों से पहले तक जॉन दयाल जैसे एवेंजलिस्ट इसके लिए हिन्दुओं को कसूरवार बताते रहे थे।

जालंधर के बिशप फ्रांको मुलक्कल पर नन के बलात्कार के अभियोगों के बाद से तो जैसे गटर से कोई ढक्कन ही हट गया है। देखने लायक ये होगा कि स्थापित मीडिया किसका साथ देती है? क्या उसमें सच का साथ देने की हिम्मत बची भी है? स्थापित किए गए नैरेटिव के सुविधाजनक माहौल में आराम से बैठकर खुद को निष्पक्ष घोषित करने का विकल्प भी खुला ही है!

26 जनवरी और 15 अगस्त के बीच का अंतर भूले जिग्नेश मेवानी

आँख मूँद कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली देने वालों में से एक नाम गुजरात में कॉन्ग्रेस पार्टी के सहयोग से विधायक बने जिग्नेश मेवानी का भी है। जिग्नेश मेवानी अक्सर प्रधानमंत्री के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करते रहे हैं। यही नहीं, ख़ुद को दलित नेता बताने वाले जिग्नेश बाबसाहब भीमराव अम्बेडकर की भी आलोचना कर चुके हैं। ताजा मामला उनके नए ट्वीट से जुड़ा है। इस ट्वीट में जिग्नेश मेवानी ने कहा,“आज प्रधानमंत्री राम लीला मैदान से देंगे भाषण। सवाल यह है कि आज ज़्यादा झूठ बोलेंगे कि 26 जनवरी के लिए हेवी डोज़ बाकी रखेंगे?”

इस ट्वीट में जिग्नेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आज रामलीला मैदान में होने वाले उनके भाषण को लेकर कटाक्ष किया है। बता दें कि रविवार (जनवरी 13, 2019) को पीएम भाजपा राष्ट्रीय परिषद की बैठक को सम्बोधित करने वाले हैं।

लेकिन, पीएम पर कटाक्ष करते समय जिग्नेश मेवानी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बीच अंतर भूल गए। अपने ट्वीट में जिग्नेश ने पूछा कि क्या प्रधानमंत्री 26 जनवरी के लिए भी कुछ बोलना बाकी रखेंगे?

ऐसा ट्वीट करते समय जिग्नेश को ये बात याद नहीं रही कि 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस पर प्रधानमंत्री का नहीं बल्कि राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है। हालाँकि, राजपथ पर होने वाले इस समारोह में प्रधानमंत्री सहित देश के सभी बड़े नेता उपस्थित रहते हैं लेकिन मुख्य अभिभाषण भारत के राष्ट्रपति का होता है। अर्थात आगामी गणतंत्र दिवस पर महामहिम रामनाथ कोविंद राष्ट्र को संबोधित करेंगे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं।

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का अभिभाषण होता है। अपने ट्वीट में मोदी की आलोचना करने के चक्कर में जिग्नेश मेवानी 26 जनवरी को 15 अगस्त समझ बैठे।

इस से पहले टाइम्स नाउ के एक एक्सक्लूसिव वीडियो में बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर की आलोचना करते हुए जिग्नेश मेवानी ने कहा था कि बाबासाहब ने जो कहा वो पत्थर की लकीर नहीं है। उनके इस बयान पर बाबासाहब के पोते प्रकाश अम्बेडकर ने भी आपत्ति जताई थी।

जब बार-बार लुटयन मीडिया ने राहुल गाँधी के राफ़ेल झूठ पर कहा ‘जिने मेरा दिल लुटया, ओहो!’

आपने अंग्रेजी मेनस्ट्रीम मीडिया में पढ़ा होगा कि संसद में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को “दिन में पाँच झूठ बोलने वाला” कहा, खासकर राफ़ेल सौदे के बारे में। लेकिन मुझे यक़ीन है कि आपने जेटली द्वारा अपने बात के समर्थन में उल्लेखित उदाहरणों को नहीं पढ़ा होगा। चाहे वो इंडियन एक्सप्रेस हो, हिंदुस्तान टाइम्स हो, द हिंदू, या द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, सभी लुटयन मेनस्ट्रीम मीडिया ने उन “उदाहरणों” को अपने रिपोर्ट्स से ग़ायब कर दिया।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है – लुटयन मीडिया कभी भी राहुल गाँधी को उनके झूठ पर घेरकर नहीं पटकती। राहुल गाँधी को ठीक से पता है कि वह बहुत सहजता से झूठ बोल सकते हैं और अंग्रेजी मेन स्ट्रीम मीडिया ऐसे समय मदहोश रहती है। उसे कुछ भी दिखाई-सुनाई नहीं देता। उनकी माँ सोनिया गाँधी के दो दशक के कार्यकाल पर, उनके ख़िलाफ़ एक शब्द भी नहीं निकला। और न ही पिछले पाँच सालों में राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ कुछ ऐसा जिसे आप आलोचना की श्रेणी में भी रख सकें। आप वित्तमंत्री जेटली के राफ़ेल पर 2 जनवरी को संसद में दिए ज़वाब के इस वीडियो (नीचे संलग्न) को देख सकते हैं और जज कर सकते हैं कि आपका न्यूज़ पेपर हर दिन आपको कैसे बेवकूफ़ बनाता है, और राहुल गाँधी का इस तरह बचाव करता है जैसे उनके ही अधीन हो।

मैं शर्त लगा सकता हूँ कि अरुण जेटली द्वारा ऑफ़सेट भागीदारों पर राहुल गाँधी के झूठ और अनिल अंबानी के रिलायंस को दिए गए फ़ेवर के बारे में दिए बयान को किसी भी मेनस्ट्रीम मीडिया में, आपने कभी पढ़ा हो। जेटली ने कहा: “राहुल गाँधी 1.30 लाख करोड़ रुपए (फ़ेवर की राशि) का हवाला देते रहते हैं। यह UPA ही थी जिसने 2005 में निर्णय लिया कि भारत में ऑफ़सेट भागीदारों को कुल ख़र्च का 30-50 प्रतिशत ही प्राप्त होगा। चूँकि, कुल सौदा ही जब 58,000 करोड़ रुपए का है, तो इस हिसाब से यह 29,000 करोड़ रुपए बैठता है। दसाँ (Dasault) ने कहा है कि रिलायंस के साथ व्यापार 10 वर्षों में, केवल 3-4 प्रतिशत या 800 करोड़ रुपए के आसपास आता है। फिर ये 1.30 लाख रुपए का आँकड़ा कहाँ से उद्धृत किया जाता है जब पूरी डील ही केवल 58,000 करोड़ रुपये की है?” क्या आपने इस तथ्य को कभी किसी मेन स्ट्रीम मीडिया में पढ़ा है?

जेटली ने राहुल गाँधी को पीएम मोदी को गलत तरीक़े से राफ़ेल सौदे में घसीटने के लिए भी लताड़ा: “(राहुल ने कहा कि) ये पूरी प्रक्रिया ही ग़लत है। दोनों पक्षों के समितियों के बीच जब कुल 74 बैठकें हुई थी, फ़िर भी न कोई निगोशिएशन समिति, न कोई रक्षा अधिग्रहण परिषद, न सुरक्षा पर कोई कैबिनेट समिति। झूठा और मनगढ़ंत आरोप सिर्फ़ एक आदमी (पीएम नरेंद्र मोदी) पर। समितियों के बैठकों के बीच ये कैसे संभव है? जबकि हमने पूरी प्रक्रिया का विवरण सर्वोच्च न्यायालय में  प्रस्तुत किया था। SC ने अपने निर्णय में कहा कि वह पूरी प्रक्रिया से संतुष्ट है।” क्या आपने इसे अपने मेन स्ट्रीम मीडिया के किसी भी न्यूज़ पेपर में पाया?

जेटली ने साफ़-साफ़ बताया कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को एक ऑफ़सेट साझेदार के रूप में क्यों नहीं चुना गया? “यूपीए ने ही HAL को अनुबंध देने से मना कर दिया था। HAL ने काम के लिए आवश्यक “2.7 घण्टे ज़्यादा मानव श्रम” की बात पर बल दिया था। जिससे न केवल कीमत बढ़ती बल्कि समय बढ़ने से पाकिस्तान और चीन भी भारत से आगे निकल जाते।” क्या आपने इसे भी कहीं पढ़ा?

“सौदे के बाद, जो प्रेस विज्ञप्ति आई थी उसमें कहा गया कि यह दो सरकारों के बीच का समझौता (inter-governmental agreement) था। यह उस कीमत से सस्ता है, जिस पर यूपीए ने बातचीत की थी।” क्या आपने इसे भी कहीं पढ़ा है?

जेटली ने राफ़ेल मूल्य निर्धारण पर झूठ बोलने के लिए कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर को फटकार लगाई और कहा था कि कम से कम बाद में तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले पढ़ लिए होते। “सुप्रीम कोर्ट ने कीमत माँगी, हमने उन्हें सीलबंद लिफाफा में दिया। उन्होंने इसे खोला और फिर निर्णय दिया कि वह मूल्य निर्धारण की न्यायिक समीक्षा से संतुष्ट है।”

जेटली ने उल्लेख किया कि राफ़ेल जेट विमानों के पहले बैच की डिलीवरी के लिए यूपीए ने 11 वर्षों के लिए अनुबंध किया था, “और वे हमसे पूछ रहे हैं कि 2016 में अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जाने पर 2018 में कोई राफ़ेल जेट क्यों नहीं दिया गया।”

जेटली ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की जाँच को सिरे से खारिज़ कर दिया, “जेपीसी नीति के मामलों में ज़रूरी है, जाँच के लिए नहीं।” इसके अलावा, जेटली ने कहा कि जेपीसी का रवैया “पक्षपातपूर्ण पार्टी लाइनों” पर है। उन्होंने बोफ़ोर्स का हवाला दिया जहाँ किकबैक को भी जेपीसी ने “रिश्वत” नहीं कहा था, और सभी आरोपों को रफ़ा-दफ़ा कर दिया था।

वित्तमंत्री जेटली ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और उनकी पार्टी ने द्वारा फैलाए गए झूठे आरोपों की कड़ी निन्दा की, “उन्होंने (राहुल गाँधी) कहा कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्राँ ने ख़ुद (रिलायंस के ऑफ़सेट पार्टनर के बारे में) उनसे कहा था। मगर फ़्रांस सरकार ने इससे इनकार कर दिया।” अरुण जेटली ने कॉन्ग्रेस द्वारा फ़र्ज़ी काग़ज़ात पेश करने के मामले का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि (पूर्व पीएम) वीपी सिंह के बेटे का सेंट किट्स में एक विदेशी बैंक खाता भी था। पाठकों, आपको यह भी पता नहीं नहीं होगा।

जेटली ने कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं को याद दिलाया। कि ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने मनमोहन सिंह के बारे में लिखा था, “जो प्रधानमंत्री पद पर हैं, लेकिन सत्ता में नहीं।” अरुण जेटली ने फिर याद दिलाया, “यह आदमी (राहुल गाँधी) बार-बार झूठ बोलता है। वह दिन में पाँच बार झूठ बोलने वाले हैं।”

संसद सत्र के दौरान कॉन्ग्रेस के सांसदों और उनके अध्यक्ष का आचरण इतना ख़राब था कि अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने हंगामा करते हुए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी से कहा, “यदि आपको सुनना नहीं हैं, तो आपको प्रश्न नहीं पूछने चाहिए।” कल फ़िर से वही सवाल दोहराएँगे।

हाँ, राहुल गाँधी ने ही राफ़ेल पर बार-बार विवाद खड़ा किया, झूठे आरोप लगाए और अब ज़वाब सुनने के लिए भी तैयार नहीं। धन्यवाद, मेनस्ट्रीम मीडिया, इस तरह से राहुल गाँधी का बार-बार ढाल बनने के लिए। उनके हर झूठ पर पर्दा डालने के लिए। आप नहीं जानते होंगे पर ऐसा मेनस्ट्रीम अंग्रेजी मीडिया अपने संपादकीय नीति के तहत ही करता है।

वित्तमंत्री अरुण जेटली के भाषण का वीडियो :

मूलतः हमारी अंग्रेज़ी साइट पर लिखे गए इस लेख का अनुवाद रवि अग्रहरि ने किया है।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने माना- सुश्रुत थे प्लास्टिक सर्जरी के जनक

प्राचीन भारतीय विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए एक बहुत ही अच्छी ख़बर है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने ये माना है कि प्लास्टिक सर्जरी की जड़ें भारत में है। आज के युग में प्लास्टिक सर्जरी का ख़ासा चलन है। हॉलीवुड के बड़े अभिनेता-अभिनेत्रियों से लेकर प्रसिद्ध खिलाड़ियों तक- कई सेलेब्रिटीज़ आज करोड़ों रुपए ख़र्च कर प्लास्टिक सर्जरी करवाते हैं ताकि वो और आकर्षक दिख सकें। लोग अपनी नाक, होंठ या गाल की संरचना में इच्छानुसार बदलाव लाने के लिए भी प्लास्टिक सर्जरी का ही सहारा लेते हैं। आज प्लास्टिक सर्जरी का बाज़ार इतना विशाल और व्यापक है कि सिर्फ अमेरिका में एक साल में इस पर 16 बिलियन डॉलर से भी ज्यादा ख़र्च किए जाते हैं।

ऐसे में अगर कोई आपको कहे कि प्लास्टिक सर्जरी की उत्पति भारत में हुई थी, तो आप एक पल के लिए चौंक जाएँगे क्योंकि ये बात न हमारे स्कूली सिलेबस में पढ़ाई जाती है और न ही आम लोगों को इस बारे में ज्यादा पता है। लेकिन प्राचीन भारत में कई सारी ऐसी चीजें है जिन पर हम गर्व कर सकते हैं। दरअसल, कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने ‘मेडिसिन का इतिहास’ (History of medicine) के अंतर्गत एक रिपोर्ट प्रकाशित किया है जहाँ प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी और इसके द्वारा नाक की संरचना में बदलाव कराए जाने की बात कही गई है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है:

“क्या प्लास्टिक सर्जरी एक मॉडर्न लक्ज़री है? यह पता चला है कि कॉस्मेटिक और पुनर्संरचनात्मक प्रक्रियाओं की जड़ें 2500 से भी अधिक वर्ष पीछे जाती हैं। यह एक सामान्य गलत धारणा है कि ‘प्लास्टिक सर्जरी’ में ‘प्लास्टिक’ एक कृत्रिम सामग्री को संदर्भित करता है जब यह वास्तव में ग्रीक शब्द, प्लास्टिकोस से निकलता है, जिसका अर्थ “ढालना” या “रूप देना है।”

कोलंबिया यूनिवर्सिटी भारत को इस खोज का श्रेय देते हुए कहा कि छठी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान, सर्जरी के जनक के रूप में प्रसिद्ध सुश्रुत नाम के एक भारतीय चिकित्सक ने चिकित्सा और शल्य चिकित्सा पर दुनिया के शुरुआती कार्यों में से एक लिखा था। सुश्रुत के महान योगदान की पुष्टि करते हुए कोलंबिया यूनिवर्सिटी आगे कहती है:

“सुश्रुत संहिता ने 1100 से भी अधिक बीमारियों के निदान बताए, सैकड़ों औषधीय पौधों के उपयोग को समझाया और सर्जरी के कई सारे तौर-तरीक़ों को समझाया। इनमे तीन प्रकार के त्वचा-ग्राफ्ट और नाक का पुनर्निर्माण भी शामिल है। सुश्रुत का ग्रंथ एक फोरहेड फ्लैप राइनोप्लास्टी का पहला लिखित रिकॉर्ड प्रदान करता है। यह एक ऐसी तकनीक है जो आज भी उपयोग की जाती है। इस से माथे के त्वचा की पूरी मोटाई का टुकड़ा नाक को फिर से बनाने के लिए उपयोग किया जाता है।”

बता दें कि महर्षि विश्वामित्र के वंश से ताल्लुक़ रखने वाले सुश्रुत को ‘फादर ऑफ सर्जरी’ कहा जाता है। उनके द्वारा लिखे गए ग्रन्थ सुश्रुत संहिता को आयुर्वेद का मूलभूत टेक्स्ट माना जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि इसे छठी शताब्दी ईसापूर्व में लिखा गया था, यानी कि आज से करीब 2500 साल पहले। आपको अगर उनके योगदान के बारे में और पढ़ना है तो आप इस रिसर्च जर्नल के कुछ हिस्से यहाँ पढ़ सकते हैं। वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब ने अपनी पुस्तक A People’s History of India 20 – Technology in Medieval India, c. 650–1750 में लिखा है कि भारत में ऐसे सर्जन हुआ करते थे जो जाँघ या गाल का मांस काटकर प्लास्टिक सर्जरी करते थे।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद ये पता चलता है कि आजकल विश्व में कई सारी ऐसी प्रसिद्ध तकनीक है, जिस की जड़ें प्राचीन भारत में हैं। महाभारत ग्रन्थ में भी सुश्रुत का ज़िक्र किया गया है और उन्हें विश्वामित्र का पुत्र बताया गया है। आज दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा भाग प्लास्टिक्स सर्जरी के बाज़ार पर निर्भर है। कई देशों से लोग प्लास्टिक सर्जरी कराने के लिए दक्षिण कोरिया का रुख करते हैं। ऐसे में इस सवाल का उठना लाज़िमी है कि क्या भारत अपने धरोहरों की सही तरीके से पहचान नहीं कर पाया? या फिर, हम अपने ही द्वारा खोजी गई तकनीकों को पूरी तरह से उपयोग में लाने और उनका प्रचार-प्रसार करने में विफल हो गए?

‘नरेंद्र मोदी का उत्साह और विदेश नीति के प्रति जुनून आखिरी बार नेहरू में देखा गया था’

अमेरिका के थिंक टैंक माने जाने वाले हडसन इंस्टीट्यूट में ‘इंडिया इनिशिएटिव’ की चीफ़ और भारतीय-अमेरिकी लेखिका अपर्णा पांडे का मानना है कि जो इच्छाशक्ति और विज़न विदेश नीति के प्रति नरेंद मोदी ने प्रधानमंत्री रहते हुए दिखाई है, वो आख़िरी बार देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु में नज़र आई थी।

नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग के चतुर्थ संस्करण के दौरान फर्स्टपोस्ट को दिए गए एक इंटरव्यू में अपर्णा पाण्डे ने नरेंद्र मोदी की विदेश नीतियों सहित भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों पर भी चर्चा की।

नरेंद्र मोदी के कारण आज देश की छवि सुधरी है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में विदेश नीति के प्रश्न पर अपर्णा पाण्डे ने कहा, “मेरा मानना ​​है कि हमारी विदेश नीति वर्षों से सततता पर जोर देती आई है, लेकिन नरेंद्र मोदी ने इसमें उत्साह और जुनून झोंकने का काम किया है। आखिरी बार विदेश नीति के प्रति इस प्रकार का जुनून पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू में देखा गया था, जो कि यह मानते थे कि जितना अधिक भारत दुनिया के देशों से जुड़ा रहेगा, उतना ही उसे फायदा होगा। भारत को बस इसके बारे में जानने के लिए लोगों की आवश्यकता थी।”

देश में वर्तमान व्यापार और निवेश पर अपर्णा ने कहा, “मोदी चाहते हैं कि दुनिया को पता चले कि हमारे पास क्षमता है। हमारे पास सुरक्षा प्रदान करने के लिए सेना है। हम दुनिया से सेवाएँ सिर्फ माँग ही नहीं रहे हैं बल्कि हम सेवाएँ प्रदान भी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को एक बड़े बाजार, एक बड़े देश, एक मित्र और सहयोगी के रूप में पेश करते हैं, जिसके साथ कोई भी व्यवसाय कर सकता है।”

मोदी के कार्यकाल में GST है बड़ा सुधार

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, “हालाँकि, नरेंद्र मोदी की समस्याएँ जस की तस हैं। अगर आप चाहते हैं कि कोई देश में आए और निवेश करे, तो आपको इसे पूरी तरह से खोलना होगा। इस तरह से मोदी के कार्यकाल में GST, दिवालिया कानून (इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड) जैसे बेहतरीन सुधार तो हुए हैं लेकिन ‘भूमि, मज़दूर और पूँजी’ जैसे व्यवसाय के तीन महत्वपूर्ण मुद्दों पर अधिक गहराई से ख़ास परिवर्तन देखने को नहीं मिला है।”

उन्होंने कहा कि भारत देश में एक दूसरी बड़ी समस्या सैन्य है, जिसे कम से कम दो दशक पहले आधुनिकीकरण की आवश्यकता थी। भारतीय सेना का निर्माण आज के लिए नहीं बल्कि 2050 के लिए होना चाहिए। अपर्णा ने बताया कि हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ पर हमारी खरीद प्रक्रिया और निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी होने के साथ जटिल और राजनीतिक भी हैं।

पाकिस्तान हमेशा भारत देश की समझौते की नीति का विरोध करता आया है

पाकिस्तान के साथ भारत के सम्बन्धों पर पर अपर्णा ने कहा कि यह बातचीत किसी भी मोड़ पर पहुँचती नहीं दिखती है। भारत ने हमेशा समझौते की बात की है, चाहे शिमला समझौता हो या फिर 1960 का सिन्धु जल समझौता हो या फिर 1988 का नाभिकीय सुविधाओं का समझौता रहा हो, पाकिस्तान हमेशा समझौते की नीति का विरोध करता है। पाकिस्तान कारगिल जैसे पीठ में चाक़ू घोंपने वाले काम कर चुका है। भारत ने फिर भी हमेशा समझौते की राह पकड़ी लेकिन फिर भी मुंबई हमले जैसे हादसे हुए। मोदी जी ने ASEAN आसियान देशों के साथ दोस्ती को मजबूत किया है।

रायसीना संवाद 2019

रायसीना डायलॉग भारत का प्रमुख वार्षिक भू-राजनीतिक और भू-स्थानिक सम्मेलन है, जिसमें विभिन्न राष्ट्रों के हितधारक, राजनेता, पत्रकार उच्चाधिकारी तथा उद्योग एवं व्यापार जगत से सम्बंधित प्रतिनिधि एक मंच पर अपने विचार साझा करते हैं। रायसीना डायलॉग का चौथा संस्करण मंगलवार (जनवरी 8, 2019) को शुरू हुआ। इसमें 93 देशों के वक्ताओं ने भाग लिया। यह भारत सरकार के विदेश मंत्रालय तथा आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) की संयुक्त पहल है। रायसीना डायलॉग का मुख्य उद्देश्य एशियाई एकीकरण एवं शेष विश्व के साथ एशिया के बेहतर समन्वय की संभावनाओं तथा अवसरों की तलाश करना है। वर्ष 2019 के रायसीना सम्मेलन का मुख्य विषय (Theme) था: “A World Reorder : New Geometries; Fluid Partnership; Uncertain Outcomes”

राहुल गाँधी को 8 साल की बच्ची ने सिखाई राफेल की A B C D…

विपक्ष द्वारा राफेल डील पर मचा कोहराम आए दिन कुछ नया ही करतब दिखाता है। या यूँ कह लीजिए कि इन करतबों में कॉन्ग्रेस का हमलावर और आक्रामक रुख़ कभी थमने का नाम ही नहीं लेता। इस तरह तो यह लगता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने तरह-तरह के करतब दिखाने वाले एक कलाकार की भूमिका में अपने वजूद को तब्दील कर लिया हो, जिसका मक़सद केवल और केवल तमाशा देखने वाली भीड़ इकट्ठी करना है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या सच में राफेल डील करतबों का मैदान बन चुका है या इसे अब तक बेवजह ही हवा दी जाती रही है। आम जनता और कॉन्ग्रेस समर्थकों के लिए भले ही यह समझ पाना मुश्किल हो कि इस डील के तहत राफेल की क़ीमत में इतना उतार-चढ़ाव क्यों है या यूँ कह लीजिए कि वो समझना ही नहीं चाहते। लेकिन एक 8 साल की बच्ची के द्वारा राफेल के गुणा-गणित को समझाना वाक़ई क़ाबिल-ए-तारीफ़ है।

आपको बता दें कि, ‘एकभारतश्रेष्ठभारत’ के ट्विटर हैंडल से एक ऐसा वीडियो शेयर हुआ है, जिसमें 8 साल की बच्ची अपनी दो ज्यॉमेट्री बॉक्स के माध्यम से यह समझाने का प्रयास कर रही है कि क्या फ़र्क है मोदी जी के राफ़ेल में और राहुल गाँधी के राफेल में। इस बच्ची ने एक बेहतर ढंग से राफेल जैसे विवादित मुद्दे को जितनी सरलता से परिभाषित किया है, वो एक मिसाल है। ट्विटर पर वायरल हुए इस वीडियो को 9 जनवरी 2019 को शेयर किया गया था।

वैसे तो विपक्ष का काम केंद्र को ग़लत निर्णय लेने से रोकने का होता है, लेकिन फ़िलहाल कॉन्ग्रेस बेवजह की भ्रामकता फैलाने में अपनी अहम भूमिका निभा रही है। जनता की नज़र में हीरो बनने की राहुल गाँधी की यह चाहत आगामी लोकसभा चुनाव के नज़दीक आने के साथ ही और परवान चढ़ती जा रही है, जिसके लिए वो ग़लत बयानों और प्रतिक्रियाओं का जमकर इस्तेमाल करते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जब कॉन्ग्रेस ने बिना वजह ही बीजेपी को घेरने की न सिर्फ़ कोशिश भर की बल्कि सरकार द्वारा लिए गए कई बेहतर फ़ैसलों में अपनी टांग भी अड़ाई।

देश की बड़ी पार्टी होने के कारण कॉन्ग्रेस की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वो देश हित में लिए जाने वाले फ़ैसलों पर अपनी आपत्ति न जताए। देश की जनता को ग़लत दिशा में ले जाने की अपनी व्यर्थ की कोशिशों पर विराम लगाएँ।  

CBI मामले में कॉन्ग्रेस को मोदी का करारा जवाब: संवैधानिक संस्थाओं को कॉन्ग्रेस कर रही है बर्बाद

दिल्ली के रामलीला मैदान में भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करते हुए देश के प्रधानमंत्री मोदी ने विरोधियों के पर जमकर हमला बोला। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा, “आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ की सरकार ने अपने यहाँ सीबीआई जैसी संस्था के एंट्री पर रोक लगा दी है। उन्होंने ऐसा कहीं किसी डर की वजह से तो नहीं किया है? आज जो लोग सीबीआई के महत्व को नकार कर रहा हैं, हो सकता है कल वही लोग आर्मी, पुलिस, कैग, कैग जैसी संस्थाओं का भी नकारना शुरू कर दें।”

प्रधानमंत्री का यह बयान तब आया है, जब विपक्षी दल के नेताओं के द्वारा सीबीआई की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने अपने इस बयान के ज़रिए विपक्षी दलों द्वारा देश के प्रतिष्ठित संस्थानों पर उठाए जा रहे सवाल का करारा जवाब दिया है। प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम के दौरान यह भी कहा कि जब गुजरात में हमारी सरकार थी, तो अमित जी को सीबीआई ने जेल में डाल दिया था। इसके बावजूद हमारी सरकार ने सीबीआई को राज्य में आने से मना नहीं किया था, क्योंकि हमें देश के कानून में भरोसा है।

इस बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा बैंक पर दवाब देकर डिफ़ॉल्टरों को कर्ज दिलाया गया। देश की आजादी के बाद 60साल में बैंकों द्वारा 18 लाख करोड़ कर्ज बाँटा गया जबकि यूपीए सरकार के अंतिम 6 सालों में 34 लाख करोड़ रूपए कर्ज के रूप में बाँटा गया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि कॉन्ग्रेस की सरकार ने अपने अंतिम 6 साल के दौरान डिफ़ॉल्टरों को पैसा देने के लिए बैंकों पर दवाब बनाया है।

जानकारी के लिए बता दें कि सीबीआई मामले में भाजपा पर सवाल उठाते हुए कपिल सिब्बल ने पिछले दिनों बयान दिया था कि तोता पिंजड़े से उड़ जाता तो, सारे राज खोल देता। सिब्बल इस तरह के बयान के ज़रिए वर्तमान सरकार पर भले ही सवाल खड़ा करने के प्रयास कर रहे हों। लेकिन कपिल सिब्बल को ऐसा बोलने से पहले खुद और अपनी पार्टी के भी गिरेबान में झाँक कर देखना चाहिए। कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार में सिब्बल मंत्री थे, तब 2जी स्कैम, कोल आवंटन स्कैम, कॉमनवेल्थ खेल गाँव स्कैम जैसे कई बड़े घोटाले हुए। इन सभी घोटाले की जाँच में सीबीआई ने कपिल साहब के बयानों वाले तोते जैसी ही भूमिका निभाई थी।   

2020 में USA को मिल सकता है पहला हिन्दू राष्ट्रपति!

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में पहली बार ऐसा हुआ है, जब राष्ट्रपति चुनावों के लिए किसी हिन्दू ने दावेदारी ठोकी। अमेरिका की पहली महिला हिन्दू कॉन्ग्रेस वुमेन तुलसी गबार्ड ने 2020 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प के ख़िलाफ़ मैदान में उतरने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी लोगो के पास कई चुनौतियाँ हैं, जिनकी वो चिंता करती हैं और उन्हें हल करना चाहती हैं। अपनी उम्मीदवारी के बारे में जानकारी देते हुए तुलसी ने ट्विटर पर कहा;

“एक-दूसरे के लिए और अपने देश के लिए जब हम एक साथ खड़े होते हैं, तो ऐसी कोई चुनौती नहीं है, जिसे हम दूर नहीं कर सकते। क्या आप मेरा साथ देंगे?”

बता दें कि तुलसी गबार्ड अमेरिकी कॉन्ग्रेस में चुनी जाने वाली पहली हिन्दू हैं। अमेरिका के हवाई प्रांत से कॉन्ग्रेस में चुनी गई तुलसी डेमोक्रैट पार्टी से ताल्लुक़ रखती हैं। 38 वर्षीय तुलसी के पिता ईसाई होने के बावजूद मंत्र ध्यान और कीर्तन में अच्छी-ख़ासी रूचि रखते हैं। उनकी माँ भी हिन्दू धर्म को ही मानती हैं। तुलसी जब किशोरावस्था में थीं, तभी उन्होंने हिन्दू धर्म अपना लिया था।

2002 में मात्र 21 वर्ष की उम्र में कॉन्ग्रेस सदस्य बन कर उन्होंने इतिहास रच दिया था। हवाई प्रांत की सबसे युवा कॉन्ग्रेस सदस्य बनने का रिकॉर्ड बना चुकीं तुलसी गबार्ड अब डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति उम्मीदवार बनने के लिए ताल ठोकेंगी। चार बार से कॉन्ग्रेस सदस्य रहीं तुलसी अमेरिका में रह रहे भारतीयों और हिन्दुओं के बीच काफ़ी लोकप्रिय हैं। इस कारण पहले से ही ये कयास लगाए जा रहे थे कि वो आगामी राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार के तौर पर हिस्सा ले सकती हैं। 2012 में reddif को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा था:

“मैंने अपने किशोरावस्था में गंभीर विचार-विमर्श और चिंतन के बाद सनातन धर्म को पूरी तरह से अपना लिया मैं बचपन से भगवद्गीता का अध्ययन कर रही हूँ। मैं अपने जीवन के हर पहलू पर कर्म योग और भक्ति योग के भगवद्गीता के सिद्धांतों को लागू करने की कोशिश कर रही हूं। और निश्चित ही मैं महाभारत, रामायण आदि से बहुत परिचित हूं।

सितम्बर 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अमेरिकी दौरे पर गए थे तब तुलसी गबार्ड ने अपनी पारिवारिक भगवद्गीता की पुस्तक उन्हें भेंटस्वरूप दी थी। ये भी जानने लायक बात है कि जब तुलसी अमेरिकी कॉन्ग्रेस में शपथ ले रही थीं, तब भी हाथ में उन्होंने गीता पकड़ी हुई थी। पीएम मोदी को ये पुस्तक भेंट करने के बाद गीता के प्रति अपने प्रेम को ज़ाहिर करते हुए तुलसी ने कहा था:

मेरे लिए इस गीता से अधिक विशेष और मूल्यवान कुछ भी नहीं हो सकता है जो मैंने बचपन से संभाल कर रखी है।”

तुलसी की ताजा घोषणा के बाद अमेरिका के कई नेताओं और विशेषज्ञों ने उनके इस फैसले का स्वागत किया है। बता दें कि अमेरिका के 200 साल से भी अधिक के लोकतांत्रिक इतिहास में अभी तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं चुनीं गई हैं। पिछले चुनावों में हिलेरी क्लिंटन डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार थीं लेकिन उन्हें डोनाल्ड ट्रम्प के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। अगर तुसली गबार्ड ये कारनामा करने में सफल होती हैं तो वो अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति होंगी।

हम मज़बूत सरकार चाहते हैं, विपक्ष मज़बूर सरकार चाहता है ताकि देश को लूट सके: PM मोदी

राजनीति में वाकई पहली बार ऐसा हुआ है कि हर राजनैतिक गुट एक-दूसरे से हाथ सिर्फ़ इसलिए मिलाते नज़र आ रहे हैं ताकि मोदी सरकार को सत्ता से हटाया जा सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (जनवरी 12, 2019) को विरोधियों को जवाब देते हुए कहा कि विपक्ष चाहता है कि सरकार कमज़ोर और मज़बूर हो जाए, जिससे देश को लूटा जा सके।

रामलीला मैदान पर भाजपा राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए, पीएम मोदी ने सपा-बसपा के गठबंधन पर भी निशाना साधा और कहा कि आजकल ‘महागठबंधन’ का नाम का अभियान चल रहा है, जोकि भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे असफल प्रयोग है। ये लोग देश में सरकार को मज़बूर बनाना चाहते हैं। इन्हें देश में मज़बूत सरकार नहीं चाहिए क्योंकि उससे इनके घोटालों की दुकाने बंद हो जाएँगी।

पीएम मोदी ने कहा- “हम एक मज़बूत सरकार चाहते हैं जिससे कि देश के किसानों को उनके फसलों का सही दाम मिल सके, विपक्ष चाहता है कि देश में मज़बूर सरकार बने ताकि वो यूरिया घोटालों को अंजाम दे सकें।”

महागठबंधन पर पीएम ने सम्मेलन में कहा कि राजनीति तर्कों के धरातल पर होती है, जबकि गठबंधन का कोई उद्देश्य होता है। ये पहली बार है जब राजनैतिक पार्टियाँ एक दूसरे के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार हैं, वो भी सिर्फ एक व्यक्ति को हराने के लिए।

इस सम्मेलन में अयोध्या विवाद पर पीएम मोदी ने कहा कि कॉन्ग्रेस चाहती ही नहीं है, कि ये विवाद कभी सुलझे। वो हर बार अपने वकीलों के ज़रिए इस इस मामले पर अटकलें लगाती रही है। इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस झूठे आरोपों का उपयोग कर CJI पर महाभियोग चलाने तक के लिए भी तैयार है। प्रधानमंत्री मोदी ने कॉन्ग्रेस की इन हरकतों पर पर भी सवाल उठाए, कि आखिर उनकी कैसी मानसिकता है जो उन्हें देशहित के हर मामले पर बीजेपी के ख़िलाफ़ खड़ा कर देती है।

इसके बाद आरक्षण बिल पर लगातार हो रही आलोचनाओं पर भी पीएम ने इस सम्मेलन पर बात की और कहा कि सरकार द्वारा उठाया गया ये कदम भले ही हर समस्या का समाधान नहीं है, लेकिन देश को एक नई दिशा पर ले जाने के लिए ये एक अच्छा कदम है। शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में आर्थिक रूप से कमज़ोर युवाओं को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्होंने ‘नए भारत’ के आत्मविश्वास को बढ़ाया है।

किसानों की परेशानियों पर बात करते हुए पीएम ने कहा कि पहले की सरकार ‘अन्नदाताओं’ को सिर्फ ‘मतदाताओं’ के रूप में ही देखती थी जबकि बीजेपी की सरकार लगातार उनके सामने आने वाली परेशानियों पर काम कर रही है। पीएम के अनुसार उनकी पार्टी लगातार किसानों की आय को 2022 तक दुगना करने के लिए प्रयासरत हैं।

इसके अलावा उन्होंने अपने संबोधन में आंध्र प्रदेश, वेस्ट बंगाल और छत्तीसगढ़ सरकार में सीबीआई से बिना अनुमति रेड मारने के अधिकार को छीन लेने का भी ज़िक्र किया। जबकि 12 साल तक लगातार यूपीए सरकार द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर भी उन्होंने गुजरात में कभी भी सीबीआई पर बैन नहीं लगाया था।