बिहार में रविवार की सुबह एक बड़ा रेल हादसा हुआ। हादसे में बिहार के जोगबनी से नई दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल जा रही सीमांचल एक्सप्रेस की 11 बोगियां पटरी से उतर गईं। अभी तक की जानकारी में 7 लोगों मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य घायल हैं।
#SpotVisuals: Total 11 coaches affected due to #SeemanchalExpress derailment in Bihar's Sahadai Buzurg, earlier this morning. 3 out of 11 coaches had capsized. 7 people have lost their lives in the incident pic.twitter.com/FSLbEYKxGc
रेलवे अधिकारियों के अनुसार यह हादसा संभवत: पटरी के टूट जाने की वजह से हुआ है। यह हादसा हाजीपुर-बछ़वाड़ा रेल सेक्शन के बीच सहदोई स्टेशन के पास हुआ। हादसे के वक्त ट्रेन फूल स्पीड में थी और पटरी से उतरने के बाद बोगियाँ एक के ऊपर एक चढ़ गई।
रेलवे द्वारा हादसे संबधित जानकारी के लिए जारी किए गए नंबर:
Smita Vats Sharma, Additional Director General PR (Rail) on #SeemanchalExpress: We are focusing on rescue and relief operations right now. Railway Accident Medical Van along with team of doctors are at site. Two teams of NDRF have also reached the spot. pic.twitter.com/iiYzaXCt2Z
इस बीच रेलवे ने इस हादसे पर मुआवजे का ऐलान कर दिया है। ऐलान के अनुसार, मृतकों के परिजनों को 5 लाख रुपए जबकि गंभीर रूप से घायलों को 1 लाख रुपए तक मुआवज़ा दिया जाएगा। मामूली रूप से जख्मी को 50 हजार रुपए का मुआवजा मिलेगा। इसके साथ ही रेलवे ने हादसे के जाँच के आदेश भी दे दिए हैं।
1 फरवरी को समूचे विश्व में ‘वर्ल्ड हिजाब डे’ मनाया गया। इस दिन हिजाब के महत्वों पर भी बात की गई और कई देश के कोनों-कोनों में इस पर समारोह का भी आयोजन हुआ। इन समारोह में जो मुख्यत: बातें हुईं, वो यह कि आख़िर मुस्लिम महिलाओं को हिजाब क्यों पहनना चाहिए। इस ‘क्यों’ के एक ज़वाब में हिजाब को मुस्लिम महिलाओं की पहचान बताया गया।
इस दिन को पूरे विश्व में मनाने का एक उद्देश्य है कि सभी धर्मों और विभिन्न पृष्ठभूमि की महिलाओं को एक दिन के लिए हिजाब पहनने और उसे अनुभव करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। साल 2013 में नजमा खान के द्वारा इस वार्षिक कार्यक्रम की स्थापना की गई थी।
आज हिजाब को न केवल इस्लामिक देशों में बल्की अन्य देशों में भी मुस्लिम महिलाओं की छवि का प्रतिबिंब माना जाता है। ऐसे में अब ज़रा सोचिए कितना कठिन होता होगा उन मुस्लिम महिलाओं के लिए खुद को हिजाब से अलग कर पाना, जो इसे अपने जीवन में जगह नहीं देना चाहती हैं और खुली हवाओं में खुले सिर घूमने की तमन्ना रखती हैं।
हिजाब पहनना किसी विशेष समुदाय की महिलाओं के लिए सिर्फ तभी तक ‘माय लाइफ, माय रूल्स’ का हिस्सा बन सकता है, जब तक उन पर वो थोपा न जाए। जब इससे धार्मिक कुरीतियों और पितृसत्ता की बू आने लगे तो इसे जितनी जल्दी मुमकिन हो, उतारकर फेंक देना चाहिए।
लगभग 6 साल होने को है, जब इरान की एक महिला मसीह अलीनेज़ाद ने हिज़ाब के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू किया था। अपने हिजाब को उतारकर इस महिला ने कार की स्टेयरिंग पकड़कर सोशल मीडिया पर अपनी फोटो अपलोड की थी। जिसके बाद सोशल मीडिया पर कई महिलाओं ने उनके समर्थन में अपनी तस्वीरें भी साझा करनी शुरू की थी।
मसीह ने अपनी किताब ‘द विंड इन माय हेयर’ में लिखा है कि वो इरान के एक ऐसे मुस्लिम परिवार में पली-बढ़ी हैं, जिसमें एक लड़की को अपना सर घर के लोगों के आगे भी ढककर रखना होता था। उन्होंने अपनी संस्कृति में औरतों के साथ होती नाइंसाफ़ी को महसूस किया था। अपनी किताब में मसीह ने बताया कि वो मूक लोगों की आवाज़ बनना चाहतीं थी लेकिन इरान में रहते हुए वो हमेशा ही मूक रहीं।
मसीह 2009 से ही यूएस में रह रही हैं। वो गिरफ्तारी की डर की वजह से यूएस से इरान चाहकर भी नहीं जा पाती हैं। वो बताती हैं कि उनके पिता ने उनसे बात भी करनी बंद कर दी है।
आज मसीह के इस आंदोलन से 1000 से ज्यादा महिलाएँ जुड़ चुकी हैं। मतलब साफ़ है कि हिजाब का मामला स्वेच्छा से जुड़ा हुआ तो बिलकुल भी नहीं है।
ईरान की ही राजधानी तेहरान में साल 2017 से 2018 के बीच में लगभग 35 से अधिक हिजाब के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करती महिलाओं को गिरफ्तार किया गया। साथ ही इस बात की भी धमकी दी गई कि अगर कोई भी महिला हिजाब के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करती पाई गई, तो उसे दस साल के लिए जेल में भी डाला जा सकता है।
अब ऐसी स्थिति में सोचिए अंतराष्ट्रीय स्तर पर इस दिन को मनाना क्या वाकई में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर बात करना है या उनकी स्थिति को और भी दयनीय बनाना है।
हिजाब आज मुस्लिम महिलाओं के लिए और भी ज्यादा विमर्श का विषय है क्योंकि बाज़ार से लेकर खेल जगत तक और खेल से सौंदर्य तक हर क्षेत्र में हिजाब को ढाल बनाकर मुस्लिम महिलाओं को इसमें जकड़े रखने की पुरज़ोर कोशिशें की जा रही हैं।
हाल ही में नाइकी जैसी बड़ी कंपनी ने एथलिट के लिए एक डिज़ाइनर हिजाब तैयार किया, जिसको बनाने के पीछे तर्क था कि एथलिट जिसमें सहज है, वो वैसे ही खेले। नाइकी के इस कदम पर तथाकथित नारीवादी लोग वाह-वाही करते नहीं थके।
लेकिन, सोचिए ज़रा! हिजाब की जकड़ मुस्लिम महिलाओं पर कितनी होगी कि जिस बाज़ार का काम हमें विकल्प मौजूद कराना है, वो भी हिजाब के मसले पर सीमित हो गया। ये किसी विशेष धर्म की कुरीतियों को बढ़ावा देना नहीं तो और क्या है कि अब दौड़ के मैदान में भी एक लड़की ‘खिलाड़ी’ बनकर नहीं बल्की ‘मुस्लिम खिलाड़ी’ बनकर दौड़ेगी।
नाइकी ही एक ऐसा नाम नहीं है, जिसने हिजाब को मुस्लिम महिलाओं की सहज़ता से जोड़ा हो। इसी दिशा में पिछले साल ऐसा काम इंडोनेशिया के डिज़ाइनर अनिएसा हसीबुआँ ने किया था और उस समय भी हिजाब को न्यूयॉर्क फ़ैशन वीक में बहुत वाहवाही मिली थी।
अब सोचिए अगर हर स्तर पर इसी तरह से मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब की अनिवार्यता को आधुनिक रूप दे-देकर पेश किया जाएगा तो आने वाले समय में ये ‘मुस्लिम महिलाएँ’ खुद के भीतर की महिला को मारकर सिर्फ ‘मुस्लिम’ को ही जिंदा रख पाएँगी।
आज देश-विदेश में हिजाब को लेकर जो कॉन्सेप्ट चल रहा है, वो बिल्कुल ऐसा है ही कि विश्व के कोने-कोने में लड़कियों को ‘जंजीर’ से छुड़ाने की जगह उनके हाथ-पाँवों को ‘डिजाइनर जंजीरों’ से जकड़ दिया जाए। ताकि वे मॉडर्न बनने की चाह में खुद के अधिकारों पर बात करना बिलकुल बंद कर दें और उसी आबो-हवा में साँस भरें, जिसकी कण-कण से केवल गुलामी की गंध आती हो।
जिस दिशा में हिजाब को इस्लाम का हिस्सा बताकर डिज़ाइनर तरीके से पेश किया जा रहा है, उसी दिशा में जरा दूसरे पहलू पर गौर करें और सोचें कि क्या होगा? जरा सोचिए कैसा लगेगा अगर कोई कंपनी हिंदू धर्म के लिए डिज़ाइनर चिता बनवाए, ताकि कोई सती होकर चिता पर जलना चाहे? सभी धर्मों के अनुरूप बाल विवाह के मंडप भी डिज़ाइनर बनाए जाएँ! कन्या भ्रूण हत्या के लिए डिज़ाइनर इक्विप्मेंट्स बनाए जाएँ! जरा सोचिए।
और ऐसा इसलिए ताकि हर उस कुरीति को जिंदा रखा जाए, जिससे महिलाओं का दमन होता आया है। इसके लिए बाजार को आखिर करना ही क्या है, सिर्फ मूल वस्तु और भाव में डिजाइन को ठूँस देना है। 10-20 जगहों पर समारोह करवा देना है और ट्विटर जैसी बड़ी कंपनियों के सीइओ के हाथ में कुछ भी लिखकर तख्ती पकड़वा देनी है। जरा सोचिए, वो बाजार कितना ख़ौफनाक होगा?
गुजरात में मेहसाणा जिले के ऊँझा विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेसी विधायक आशाबेन पटेल ने पार्टी में अंदरूनी कलह का हवाला देते हुए अपना इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने अपना इस्तीफ़ा विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र त्रिवेदी को सौंपा, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफ़े को स्वीकार कर लिया। बता दें कि, पटेल का इस्तीफ़ा देना कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए एक झटका माना जा रहा है, क्योंकि बीजेपी के गढ़ वाली सीट पर इन्होंने 2017 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज़ की थी। बता दें कि महेसाणा जिले में 7 विधानसभा सीटे हैं, जिसमें से चार सीटें बीजेपी के पास जबकि तीन कॉन्ग्रेस के पास है।
आशाबेन पटेल ने पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी को पत्र लिखकर अपने इस्तीफ़े की जानकारी दी। इसके बाद मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मैंने अंदरूनी कलह और पार्टी नेतृत्व के मुझे नजर अंदाज करने के चलते इस्तीफ़ा दिया है।’’ उन्होंने कहा कि पिछले एक साल में राज्य के विकास के लिए दिए गए किसी भी बात को पार्टी ने गौर नहीं किया।
बीजेपी में शामिल होने को लेकर पूँछे एक सवाल पर उन्होंने कहा कि वह पहले निर्वाचन क्षेत्र के लोगों से इसके बारे में पूछेंगी फिर कोई निर्णय लेंगी। वहीं इस्तीफ़े को लेकर कॉन्ग्रेस राज्य इकाई के अध्यक्ष अमित चावड़ा ने इसे आशा पटेल का निजी स्वार्थ बताया। बता दें कि इससे पहले कॉन्ग्रेस विधायक कुंवरजी बावलिया कॉन्ग्रेस का दामन छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गईं थीं।
बंग्लादेश के गाज़ीपुर में गाय चोरी करते हुए रंगे हाथ पकड़े जाने पर दो लोगों को भीड़ ने अपने गुस्से का शिकार बना लिया। भीड़ द्वारा पीटाई किए जाने के बाद मौके पर दोनों आरोपितों की जान चली गई। कालियाकेर पुलिस स्टेशन के प्रमुख, एमडी आलमगीर ने कहा कि मारे गए दोनों लोग एक गिरोह का हिस्सा थे, जिसने शनिवार तड़के अपज़िला के नौला इलाके से मवेशी चुराने की कोशिश की थी।
भीड़ द्वारा मारे गए दोनों मृतकों की उम्र 25 से 30 वर्ष के बीच थी। हालाँकि, पुलिस को दोनों ही मृतकों की पहचान करने में काफ़ी समय लगी।
पुलिस ने बताया कि नओला व अताबा क्षेत्र के रहने वाले मोहम्मद शाजान अपने साथी के साथ लोगों के घरों से गाएँ चुराने का काम करते थे। पुलिस ने बताया कि मारे गए दोनों चोरों द्वारा छह गायों की चोरी की गई थी।
इस क्षेत्र में गायों की चोरी करने के बाद चोरों का यह गिरोह बरियाबाहा इलाके के अब्दुस समद के घर में घुसा, लेकिन मौके पर घर के लोगों को चोरों की मौजूदगी का अहसास हुआ और फिर शोर मचाने पर पास पड़ोस में रहने वाले लोगों की नींद खुल गई।
इसके बाद गाँव के मस्जिद से चोर के गाँव में एक घोषणा की गई , जिसके बाद भारी संख्या में स्थानीय लोग घटनास्थल पर पहुँच गए। मौके पर मौजूद लोगों ने दो चोरों को पकड़ लिया। उनमें से एक की घटनास्थल पर ही पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, जबकि दूसरे ने अस्पताल पहुँचने के बाद दम तोड़ दिया।
इस घटना के समय मौके पर मौजूद ग्रमीणों ने बताया कि इस चोर गिरोह के अन्य सदस्य एक ट्रक पर मवेशी रखकर भाग गए।
आपको बता दें कि भारत में यदि यह घटना घटी होती तो लोग इस घटना को भी सांप्रदायिक बनाने में लग जाते, ऐसे लोगों को बंग्लादेश के इस घटना से समझने की ज़रूरत है कि गायों की रक्षा के लिए सिर्फ़ भारत में ही नहीं बल्कि बंग्लादेश जैसे मुस्लिम देश में भी गौरक्षक हैं।
चीन और पाकिस्तान सीमा पर तैनात सेना के जवान अब अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल कर सकेंगे। दरअसल, रक्षा मंत्रालय ने सेना में आधुनिकीकरण को लेकर एक अहम फै़सला लिया है। सरकार ने अमेरिका से करीब 73,000 अत्याधुनिक राइफ़लें ख़रीदने को मंजू़री दे दी है। बता दें कि राइफ़लों की ख़रीद का ये प्रस्ताव लंबे समय से अटका हुआ था। रिपोर्ट की मानें तो इसका इस्तेमाल क़रीब 3,600 किलोमीटर लंबी सीमा पर तैनात जवान करेंगे।
यूरोपीय देशों में हो रहा है इस राइफ़ल का इस्तेमाल
बता दें कि, अमेरिकी सुरक्षा बल अत्याधुनिक असॉल्ट राइफ़ल प्रयोग करते हैं, साथ ही कई अन्य यूरोपीय देश भी इन राइफ़लों का इस्तेमाल सुरक्षा के लिए कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो यह अनुबंध एक सप्ताह में तय हो सकता है। अमेरिकी कंपनी को सौदा तय होने की तारीख से 1 साल के अंदर इन राइफ़लों को भारत भेजना होगा। अमेरिका द्वारा निर्मित ये राइफ़लें इंसास राइफ़लों का स्थान लेंगी।
बता दें कि, अक्टूबर 2017 में सेना ने क़रीब 7 लाख राइफ़लों, 44,000 लाइट मशीन गन और क़रीब 44,600 कार्बाइन को खरीदने की प्रक्रिया शुरू की थी। जिसके बाद लगभग18 महीने पहले सेना ने स्वदेशी असॉल्ट राइफल का फायरिंग टेस्ट करते हुए उसे फेल कर दिया था। इसके बाद सेना ने विदेशी कंपनियों से राइफ़लें ख़रीदने की माँग की थी।
मोदी सरकार के अंतरिम बजट में महिला सशक्तिकरण पर कॉन्ग्रेस के नेताओं की प्रतिक्रिया देश की महिलाओं के प्रति उनके वास्तविक रवैए को बताता है। यह बताता है कि किस तरह से विपक्ष में रहकर अच्छे कामों को कोसना चाहिए। बजट के बाद तमाम कॉन्ग्रेसी नेताओं ने ‘महिला सशक्तिकरण’ को लेकर अपने हिसाब से बिना सिर-पैर के सरकार पर निशाना साधा। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री जयंत पाटिल ने कहा कि मोदी सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कुछ नहीं किया है।
इन्हें नहीं लगता है कि सरकार के बजट में ‘उज्ज्वला योजना’ के तहत ₹30 करोड़ की वृद्धि से देश की महिलाएँ सशक्त होंगी। क्योंकि यह मुद्दा तो गैस चूल्हे से जुड़ा है। इन्हें यह भी नहीं पता है कि ‘राष्ट्रीय क्रेच योजना’ में सरकार ने ₹20 करोड़, महिला शक्ति केंद्रों की योजना में ₹35 करोड़, विधवा घरों के लिए ₹7 करोड़ की वृद्धि की है।
इसके बाद भी इनको सरकार की ‘महिला सशक्तिकरण’ को लेकर किया जा रहा प्रयास नहीं दिख रहा है, क्योंकि ये विपक्ष में हैं और इस लिहाज़ से आलोचना करना इनका जन्म-सिद्ध अधिकार है। सवाल उठता है कि जिस सरकार ने आने वाले तीन-चार महीने के बजट में महिलाओं के लिए इतना कुछ किया उसको लेकर वह कॉन्ग्रेस कैसे ताने दे सकती है जिसने 60 सालों तक देश में राज किया हो?
शायद इस बात को यूपी कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता अंशु अवस्थी भी भूल गए, तभी उन्होंने भी आँख बंद करते हुए कह दिया कि मोदी सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर गंभीर नहीं है। जबकि सरकार ने महिलाओं की सशक्तिकरण को बजट में पूरी वैल्यू दी।
बजट में इस बार सरकार ने 2019-20 में ‘महिला सुरक्षा’ और ‘सशक्तिकरण मिशन’ के लिए ₹1330 करोड़ आवंटित किए हैं। इसके अलावा सरकार ने ‘प्रधानमंत्री मातृत्व योजना’ के तहत महिलाओं की मैटरनिटी लीव 12 हफ़्ते से बढ़ाकर मातृत्व अवकाश की अवधि को 26 हफ़्ते कर दिया है। सरकार के इन तमाम प्रयासों के बावजूद भी कॉन्ग्रेस के इन नेताओं को लगता है कि सरकार महिलाओं को लेकर गंभीर नहीं है। सही मायने में इनके लिए महिला सशक्तिकरण के मायने अलग हैं।
तेलंगाना में वस्त्रहरण का पोस्टर लगाकर किया गया महिलाओं का अपमान
दरअसल, सरकार के बजट में नुक्स निकालने वाले कॉन्ग्रेसी नेताओं के लिए महिलाओं का अपमान करना ही उनका सशक्तिकरण है। तभी तो तेलंगाना में इनके द्वारा चुनाव आयोग पर निशाना साधने के लिए एक पोस्टर लगाया जाता है, जिसमें दौपद्री का वस्त्रहरण किया जा रहा था। पोस्टर के माध्यम से तेलंगाना में लोकतंत्र को द्रौपदी और धृतराष्ट्र को चुनाव आयोग के रूप में कॉन्ग्रेस द्वारा प्रदर्शित किया गया था।
अब आप इनके ‘महिला सशक्तिकरण’ की सोच को इस पोस्टर लगाने के आधार पर अंदर तक आसानी से समझ सकते हैं, क्योंकि यही वो पार्टी है जिसने ऐसी हरक़त करते हुए हिंदू-मुस्लिम महिलाओं का न सिर्फ़ अपमान किया बल्कि, महिलाओं के प्रति अपनी सोच को भी उजागर किया।
महिला से अभद्रता करने वाले कॉन्ग्रेस के पूर्व सीएम कैसे समझ सकते हैं महिला सशक्तिकरण?
बीते दिनों कर्नाटक के पूर्व सीएम और कॉन्ग्रेसी नेता सिद्धारमैया का एक महिला से अभद्रता करने का मामला सामने आया था। जिसमें वो केवल इस बात को लेकर महिला से अभद्रता कर बैठते हैं क्योंकि उन्हें अपने बेटे के ख़िलाफ़ कुछ भी सुनना अच्छा नहीं लगता है। दरअसल, मामला सिर्फ़ इतना था कि महिला ने सीएम के विधायक बेटे की शिक़ायत लेकर उनके पास पहुँची थी। इस पर सिद्धारमैया ने महिला से न सिर्फ़ अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया बल्कि हाथापाई के दौरान उस महिला से माइक तक छीन लिया। इस हाथापाई में उक्त महिला का दुपट्टा तक सिद्धरमैया के हाथों से गिर गया और अपने इस कृत्य के लिए उन्होंने माफ़ी माँगना तक उचित नहीं समझा।
ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी बन पड़ता है कि अगर सीएम जैसे पद पर रह चुके कॉन्ग्रेसी नेताओं का व्यवहार इस क़दर ज़मीन छूता है, तो सोचिए छुट-भइए नेता महिलाओं के बारे में क्या सोच रखते होंगे? कहते हैं देखने वाले को पत्थर में भी ईश्वर दिख जाता है और न देखने वालों के लिए वह महज़ एक पत्थर ही होता है। ठीक वैसी ही स्थिति कॉन्ग्रेसी नेताओं की है जिन्हें मोदी सरकार के बजट में महिलाओं की सुविधाओं से संबंधित योजनाएँ और व्यवस्थाएँ नज़र नहीं आती।
केंद्र सरकार ने आज (2 फरवरी 2019) ऋषि कुमार शुक्ला को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) का नया निदेशक नियुक्त कर दिया है। ऋषि कुमार मध्य प्रदेश काडर के 1983 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। उनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय चयन समिति की पिछले नौ दिनों में दो बार हुई बैठक के बाद की गई।
1983 बैच के मध्य प्रदेश काडर के आईपीएस अधिकारी फिलहाल मध्य प्रदेश पुलिस आवास निगम के अध्यक्ष हैं। बता दें कि ऋषि शुक्ला, आलोक वर्मा का स्थान लेंगे, जिन्हें 10 जनवरी 2019 को पद से हटा दिया गया था।
आपको बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा की गई बैठकों में 1983-85 बैचों से संबंधित 80 योग्य अधिकारियों में से 30 आईपीएस अधिकारियों को शॉर्टलिस्ट किया गया था। इनमें से जिन पाँच के नाम पर विचार किया जा रहा था उनमें मध्य प्रदेश के पूर्व डीजीपी ऋषि कुमार शुक्ला (1983 बैच), सीआरपीएफ प्रमुख आर आर भटनागर (1984 यूपी), एनएसजी प्रमुख सुदीप लखटकिया (1984 यूपी), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंसेज के निदेशक जावेद अहमद (1985 यूपी) और पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो के प्रमुख महेश्वरी (1984 यूपी) शामिल थे।
शुक्रवार (1 फरवरी 2019) को विधानसभा में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम पर चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने अपना आपा खो दिया और बीजेपी विधायकों को धमकी तक दे डाली। जानकारी के मुताबिक़ चंद्रबाबू नायडू ने बीजेपी विधायकों को धमकी दी और कहा कि अगर वो राज्य के साथ हुए अन्याय में केंद्र सरकार का साथ देंगे तो आंध्र प्रदेश में उन्हें ‘स्वतंत्र रूप से’ आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा।
चंद्रबाबू नायडू की नाराज़गी बीजेपी नेता पी विष्णु कुमार राजू से है जब वो राज्य में स्वीकृत विभिन्न केंद्रीय संस्थानों की सूची बना रहे थे। नायडू का आरोप है कि बीजेपी नेता ने उन सभी संस्थानों को सूची से बाहर कर दिया था जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा आंध्र प्रदेश के लिए मंज़ूरी मिल गई थी।
नायडू ने तल्ख अंदाज़ में कहा कि भगवा पार्टी के सदस्यों को शर्म नहीं आ रही है और केंद्र को समर्थन देने के बावजूद राज्य के साथ घोर अन्याय हो रहा है। राज्य के विकास के लिए उनकी कोई प्रतिबद्धता नज़र नहीं आती। नायडू ने पी विष्णु कुमार पर निशाना साधते हुए कहा कि वो जन प्रतिनिधि होने के लिए अयोग्य हैं। नायडू ने पूछा, ”आख़िर वो पैसा किसका है? एक नए राज्य के लिए, केंद्र को सभी संस्थानों को पैसा देना चाहिए। मुझे बताएँ कि हैदराबाद, दिल्ली, तमिलनाडु और गुजरात में कितने संस्थान हैं। उनकी तुलना करो। क्या आप तमाशा कर रहे हैं? इसके बाद नायडू ने कहा कि मेरा ख़ून उबल रहा है।”
कथित तौर पर, जब बीजेपी विधायकों ने उनकी टिप्पणी पर आपत्तियाँ जताईं, तो नायडू ने कहा, “आपकी आपत्तियों की परवाह कौन करता है?”
इसके बाद एक अनोखे अंदाज़ में नायडू ने कहा कि वह अमेरिकी नेताओं बिल क्लिंटन और हिलेरी क्लिंटन को नाम से बुलाते हैं, लेकिन उन्होंने पीएम मोदी को ‘सर’ कहकर संबोधित किया, बावजूद इसके कि प्रधानमंत्री उनसे उम्र में छोटे हैं।
उन्होंने कहा कि वह राज्य के लिए न्याय की माँग करेंगे और इसके लिए वो आगामी 11 फरवरी को एक ‘दीक्षा’ आयोजित करेंगे।
यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि चंद्रबाबू नायडू का यह रूप तब सामने आया जब उन्हें लोकतंत्र के संरक्षण और फासीवादी ताक़तों को हराने से संबंधित बताया गया। पश्चिम बंगाल में आयोजित, यूनाइटेड इंडिया की रैली के दौरान नायडू ने दावा किया था कि नरेंद्र मोदी देश की लोकतांत्रिक भावना को नष्ट कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी पर “फासीवादी” आरोप लगाने वाले ख़ुद फासीवादी हैं, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यहाँ तक कि ममता बनर्जी जिनके शासनकाल में पश्चिम बंगाल राज्य में लोकतंत्र के संरक्षण को लेकर बीजेपी कार्यकर्ताओं की बड़े स्तर पर राजनीतिक हत्याएँ हुई हैं।
प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद नरेंद्र मोदी ने मई 2014 में कहा था, “माँ गंगा की सेवा करना मेरे भाग्य में है।” यही नहीं न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने गंगा के प्रति अपनी चिंता प्रकट करते हुए कहा था, “अगर हम गंगा को साफ़ करने में क़ामयाब हो जाते हैं तो इससे देश की 40 प्रतिशत आबादी के लिए एक बड़ी मदद होगी।”
प्रधानमंत्री के पद पर बैठने के कुछ ही समय बाद नरेंद्र मोदी ने जून 2014 में गंगा को पुनर्जीवित करने के लिए महत्वाकांक्षी ‘नमामि गंगे’ परियोजना को प्रारंभ किया। सरकार बनने के बाद अपने पहले ही बजट में मोदी सरकार ने ₹2037 करोड़ ‘नमामि गंगे‘ परियोजना के लिए स्वीकार किया था। इसके साथ ही अगले पाँच सालों में गंगा की सफ़ाई के लिए 20 हजार करोड़ रूपए खर्च करने की मंजूरी सरकार द्वारा दी गई थी।
सरकार की गंगा के प्रति गंभीरता का पता इसी बात से चलता है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए मोदी सरकार ने अलग से एक मंत्रालय ही बना दिया है। ‘नमामि गंगे’ योजना पर सरकार की गंभीरता और विपक्ष के आरोप प्रत्यारोप के बीच ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने ग्राउंड पर जाकर हक़ीक़त जानने की कोशिश की। वाराणसी व प्रयागराज के इस ग्राउंड रिपोर्ट को आप तीन खंडों में पढ़ पाएंगे। इसका पहला हिस्सा आप यहाँ पढ़ रहे हैं।
बाबतपुर हवाई अड्डे से बाहर आते हुए अंग्रेज़ीदाँ लोग, फर्श पर बिछे कालीन व एयर पोर्ट की चकाचौंध को देखकर एक पल के लिए मुझे भरोसा ही नहीं हो रहा था कि मैं बिस्मिल्ला ख़ान के बनारस में हूँ। लेकिन जैसे ही मैं हवाई अड्डे से बाहर निकलकर पार्किंग की तरफ़ बढ़ने लगा दीवारों पर लगी पान की पीक और बनारसी लोगों के अल्हड़ अंदाज़ को देखकर मुझे अहसास हो गया कि मैं सच में मस्तमौला बनारसी लोगों के बीच पहुँच गया हूँ।
आज से दो साल पहले के जिस बनारस को हमने देखा था, वो और आज के बनारस में बहुत फर्क़ आ गया है। हालाँकि, यह बात अलग है कि अंधरा पुल के संकरे रास्ते से गुजरते हुए आज भी हमें जाम का सामना करना पड़ता है, लेकिन कुछ ही समय बाद शहर की चमचमाते सड़कों पर एक्सलेटर दबाकर गाना गुनगुनाते हुए ड्राइवर जाम में लगने वाले समय को मैनेज कर लेता है।
होटल में थोड़ा आराम करने के बाद काशीनाथ सिंह की किताबों में वाराणसी के जिस अस्सी घाट को पढ़ा था, उसे देखने के लिए मैं अपने साथियों के साथ अस्सी घाट पर पहुँच गया। शाम के समय अस्सी घाट पर बैठकर दूर क्षितिज पर डूबते सूर्य को देखना निश्चित रुप से मेरे अंदर एक सकारात्मक उर्जा का संचार कर रहा था।
मेरे नजदीक बैठा एक आदमी मेरी ही तरह गंगा के उस छोर पर डूबते सूर्य के अलौकिक सौंदर्य को महसूस कर रहा था। कुछ ही देर में हमारी बातचीत शुरु हो गई फिर उसने बताया कि उसका नाम धीरेंद्र प्रताप है और वह बनारस के ही लंका क्षेत्र में रहते हैं।
वाराणसी के अस्सी घाट की सफाई तस्वीरों में देखी जा सकती है
धीरेंद्र ने ही मुझे बातचीत के दौरान देश की अध्यात्मिक और सांस्कृतिक नगरी वाराणसी के बारे में बताना शुरु कर दिया। उन्होंने बताया कि दरअसल वाराणसी का ही अपभ्रंश नाम बनारस है। धीरेंद्र के मुताबिक ‘वरूणा’ और ‘असि’ नाम की दो नदियाँ शहर से होकर बहती है, इसी वजह से इस शहर का नाम वाराणसी रखा गया है। यह बात अलग है कि गंगा से मिलने वाली यह दोनों ही नदि एक नाले का रुप ले चुकी है।
जब हमने धीरेंद्र से पूछा कि क्या मोदी जी के आने से बनारस में कुछ बदलाव हुआ है! इस सवाल के जवाब में धीरेंद्र कहते हैं कि आज जहाँ आप बैठे हैं पहले यहाँ चारों तरफ़ गंदगी का अंबार था, लेकिन अब आपको कहीं गंदगी नज़र नहीं आएगी। इसके साथ ही धीरेंद्र कहते हैं कि गंगा का पानी भी पहले की तुलना में अब काफ़ी साफ़ हुआ है। शहर के नाले की गंदगी को गंगा में गिरने से रोक दिया गया है। लेकिन जैसे ही हमने पूछा कि आप चुनाव में वोट किस पार्टी को करेंगे तो धीरेंद्र थोड़ा मुस्कराते हैं और फिर कहते हैं कि अभी मोदी को ही चांस मिलना चाहिए।
धीरेंद्र से बात करने के बाद हमने महसूस किया कि गंगा के उस पार सूर्यास्त होकर अंधेरा छा चुका है लेकिन अस्सी घाट पर शानदार लाइटिंग व्यवस्था की वजह से घाट जगमगा रहा है। धीरेंद्र ने बातचीत में मुझे बताया कि वो ब्राह्मण हैं। बनारस में ब्रह्मणों के ज्यादातर वोट मोदी के यहाँ से चुनाव लड़ने से पहले भी भाजपा के मुरली मनोहर जोशी को ही जाता रहा है।
ऐसे में धीरेंद्र से बात करने के बाद भले ही लोगों की राय जानने के लिए मेरी उत्सुकता बढ़ गई, लेकिन उनसे बात करने के बाद मुझे बहुत ज्यादा संतुष्टि नहीं मिली। इसीलिए मैंने कुछ और लोगों से बात करना उचित समझा।
धीरेंद्र के बाद मैंने घाट पर मौजूद मल्लाह जाति से ताल्लुक रखने वाले गोरखनाथ साहनी से बात करना उचित समझा। गोरखनाथ ने बताया कि ‘नमामि गंगे’ योजना ने काशी के साथ मेरी निजी जिंदगी को भी बदलकर रख दिया है। गोरख की मानें तो गंगा घाट की सफाई के बाद उनकी आमदनी तीन से चार गुणा अधिक हो गई है। पहले कम लोग अस्सी घाट की तरफ़ घूमने के लिए आते थे लेकिन जबसे घाट की सफ़ाई हुई है, घाट पर आने वाले लोगों की संख्या बढ़ गई है। गोरखनाथ से जब पूछा गया कि राहुल गाँधी बोल रहे हैं, “मोदी चोर है।” इतना सुनते ही गोरखनाथ बोल उठते हैं कि ‘चोर के दाढ़ी में तिनका’ आपने सुना है। जो चोर होते हैं उन्हें दूसरे को चोर ही समझते हैं।
इसके साथ ही अखिलेश व मायावती के सवाल पर गोरखनाथ ने कहा कि अब जात-पात में समाज को बाँटने का समय नहीं रहा है। सीधी सी बात है कि इस सरकार ने मेरे हित में कुछ काम किया है इसलिए माँझी समाज के लोग मोदी जी को ही वोट करेंगे।
इसके बाद घाट पर ही गंगा आरती को देखते समय हमारी मुलाकात गोरखपुर के मदन मिश्रा और उनके परिवार से हुई। मदन जी के बजाय मैंने उनकी पत्नी क्षमा मिश्रा से बात करना ज्यादा उचित समझा। ऐसा इसलिए क्योंकि महिलाएँ सरकार के बारे में क्या सोच रही है, यह जानना बेहद जरूरी है।
वाराणसी घाट पर गंगा में डुबकी लगाते लोग
क्षमा मिश्रा से जब हमने पूछा कि योगी और मोदी की जोड़ी उत्तर प्रदेश में काम कर रही है! इस सवाल के जवाब में क्षमा मिश्रा कहती है कि एक बच्चा को पैदा होने के बाद 20 साल तक पालना-पोसना होता है, तब दो दशक बाद आपके मेहनत का परिणाम दिखता है। मोदी सरकार को आए अभी बस 5 साल हुआ है, ऐसे में मोदी को अभी औऱ समय दिया जाना चाहिए। यदि हम मोदी को ओर कुछ समय देंगे तो फिर सारे विश्व में सिर्फ हम ही हम होंगे।
कॉन्ग्रेस पार्टी ने अभी हाल में प्रियंका गाँधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश के महासचिव की जिम्मेदारी दी है। यही नहीं गोरखपुर ओर बनारस से उनके चुनाव लड़ने की बात भी चारों तरफ सुनाई दे रही है। ऐसे में जब हमने क्षमा मिश्रा से इस संदर्भ में पूछा तो उन्होंने का ‘शेर के मुँह में चूहा’, इतना कहने के बाद थोड़ा ठहर कर क्षमा ने कहा कि जनता विकास चाहती है और मोदी के सामने प्रधानमंत्री पद के लिए कोई दूसरे जोर के उम्मीदवार नहीं हैं। ऐसे में इस बार भी मोदी को ही केंद्र सरकार के लिए चुना जाना चाहिए।
इस बातचीत के बाद अब हमलोग घाट से सीधे होटल के लिए निकल गए। कल सुबह मुझे वाराणसी के कुछ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को देखने के लिए जाना था। ऐसे में हम आपको अपने ग्राउंड रिपोर्ट के अगले सीरिज में बताएंगे कि दो साल पहले और अभी के गंगा में क्या बदलाव हुआ है। सरकार के द्वारा शुरू की गई ‘नमामि गंगे योजना’ कितनी सफल या असफल हुई है। हजारों करोड़ खर्च के बाद जमीनी हकीकत क्या है?
रिपब्लिक टीवी के एक स्टिंग में चौकाने वाले खुलासे किए गए हैं। चैनेल के अनुसार 1990 में अयोध्या में मुलायम सिंह सरकार की पुलिस ने अनगिनत हिन्दू कारसेवकों को मौत के घाट उतार दिया था। स्टिंग में यहाँ तक दावा किया गया है कि मारे गए कारसेवकों का हिन्दू रीति से अंतिम संस्कार भी नहीं किया गया था बल्कि आँकड़े छिपाने के लिए उनको दफना दिया गया था।
स्टिंग के वीडियो में तत्कालीन जन्मभूमि थाना प्रभारी SHO वीर बहादुर सिंह को यह कहते सुना जा सकता है कि अधिकांश लोगों को दफ़न करने का आदेश दिया गया था। मारे गए कारसेवकों में से कुछ को ही जलाया गया था। उस समय की मुलायम सिंह सरकार ने बहुत कम कारसेवकों के मारे जाने का दावा करने का षड्यंत्र रचा था।
स्टिंग में यह भी कहा गया कि उस समय मुलायम सरकार ने साज़िशन केवल 16 कारसेवकों के मारे जाने का दावा किया था लेकिन यह संख्या सैकड़ों में थी। रिपब्लिक टीवी के अनुसार सरकार ने गलत संख्या बताने के लिए ही कुछ कारसेवकों को जलाने की बजाय दफना दिया था।
30 अक्टूबर और 2 नवम्बर 1990, आज़ादी के बाद के इतिहास कि वह दो काली तारीखें है, जब रामजन्मभूमि पर खड़े निहत्थे कारसेवकों पर सेक्युलर स्टेट ने गोली चलवाई थी।
2016 में मुलायम ने यह ख़ुद स्वीकार किया था कि कारसेवकों पर गोली चलवाना, मुस्लिमों की भावनाओं की रक्षा के लिए ज़रूरी था। हालाँकि उन्होंने बाद में यह भी कहा था, “मुझे अफ़सोस है कि मैंने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया।” मुलायम सिंह के अनुसार मुस्लिम अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए कारसेवकों पर गोली चलवाना ज़रूरी था इसलिए उस समय ऐसा करना पड़ा। मुलायम सिंह उस समय मुस्लिमों का भरोसा जीतना चाहते थे इसलिए उन्होंने ऐसा निर्णय लिया था।
पूर्वाग्रह से ग्रसित मीडिया का ये दृढ़ एजेंडा रहा है कि हिन्दुओं के प्रति जघन्य से जघन्य अत्याचार को भी छिपा ले जाने को अपनी महानता समझते हैं। कितना भयानक है कि जहाँ बुरी तरह से हिन्दुओं को मारा गया था, उस पर भी ये सभी तथाकथित स्वतंत्र पत्रकार मौन रहे। कमाल की बात ये है कि देश में ऐसे राजनेता आज भी सेक्युलरिज़्म के मसीहा बने हुए हैं।