हरिद्वार में चल रहे कुंभ की दुर्भावनापूर्ण इरादे के साथ सोशल मीडिया पर सेक्युलरों ने कुंभ तुलना निजामुद्दीन मरकज़ के तबलीगी जमात से की है। जबकि दोनों ही घटनाओं में मूलभूत अंतर है।
रेडियो चुप है। कोई ब्लैक स्क्रीन नहीं है। कहीं पेंट हुए चेहरे नहीं हैं और कोई मीम नहीं है। सिर्फ़ चुप्पी है। यही चुप्पी तुम्हारे रक्षक की हकीकत है। ये चुप्पी ही आज का शो है।
कैपिटल हिल वाले अगर दंगाई थे तो दिल्ली के उपद्रवी संत कैसे हुए? ट्रम्प की आलोचना हो रही थी तो राहुल-प्रियंका की निंदा क्यों नहीं? ये दोहरा रवैया अपनाने वाले आज भी फेक न्यूज़ फैलाने में लगे हैं।
लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) HS पनाग पनाग चाहते हैं कि सेना को लेकर जम कर राजनीति हो, उसे बदनाम किया जाए, दुष्प्रचार हो, लेकिन सेना को इसका जवाब देने का हक़ नहीं हो क्योंकि ये राजनीतिक हो जाएगा।
लादेन को एक 'पिता-पति' बताने वाले 'दी क्विंट' को स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन पर यह बताने की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस हुई कि वह एक ‘सिगार पीने वाले सन्यासी’ थे।