सत्य यही है कि बंदूक लेकर टहलने वाले किसी भी बाप, बेटे, दामाद या जीजा को सिर्फ इसलिए जस्टिफाय नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी बिटिया आठ साल की है जिसे सफ़ेद कबूतरों का उड़ना देखना अच्छा लगता है।
भारत आज पेड़ लगाने के मामले में विश्व के सभी रिकॉर्ड तोड़ रहा है। केवल 24 घंटों में ही भारत में 5 करोड़ पेड़ लगाए जाते हैं। हाल ही में NASA की रिसर्च और नेचर सस्टेनेबिलिटी में छपे लेख के अनुसार आज के समय की तस्वीर और 1990 के मध्य के समय की तस्वीर को साथ देखा गया
चुनाव आयोग में एक अजीबो-गरीब शिक़ायत आंध्र प्रदेश में चित्तूर ज़िले से की गई है जहाँ रामाकुप्पम मंडल में तेलगू देशम पार्टी (TDP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि हर सरकारी दफ़्तर से जल्द से जल्द छत वाले पंखे हटवाए जाएँ।
ऐसे में सिर्फ एक व्यक्ति बचता है जो अभी प्रधानमंत्री है, और आगे भी हर हाल में प्रधानमंत्री बनना चाहता है। जिसके पास न अब सत्ता और षड्यंत्रों के अनुभवों की कमी है, न संसाधनों की, न समर्थकों की, न ऊर्जा की, न मुद्दों की और न ही दिलेरी की।
नेहरू ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता ठुकरा कर 'दोस्त' चीन का नाम सुझाया। सेनाधिकारियों ने चीन के मंसूबे बताए तो उल्टा उन्हें ही झिड़क दिया। अंबेडकर की बातों को नज़रअंदाज़ किया। सरदार पटेल की राय भी नहीं मानी। आज भारत उसके दंश झेल रहा।
भाजपा के ग्राम प्रधान के साले के ससुर के किसी बयान को उठा कर भाजपा के झूठ के रूप में प्रचारित कर एक-एक घंटे का शो कर लेने वाली तथाकथित पत्रकारों की इस जमात ने राहुल-भंडारी कनेक्शन पर आँखें मूँद ली। इन्हे साँप सूंघ गया।
राहुल गाँधी की दादी से लेकर पिताजी तक के राजनीतिक दंभ को बिहार और यूपी ने ही चकनाचूर किया है। लेकिन विदेशी पढ़ाई के कारण शायद राहुल को इन ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी नहीं होगी। सामाजिक समस्याओं का राजनीतिकरण शाह बानो की तरह कहीं कॉन्ग्रेस की कब्र न खोद दे इस बार!
कानून व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर देश ने कभी किसी रिलिजियस आइडेंटिटी को ऊपर नहीं माना है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में इंदिरा गाँधी ने स्वर्ण मंदिर में मिलिट्री ऑपरेशन करने की भी इजाज़त दे डाली थी।
अरविन्द केजरीवाल सपोर्ट देना चाह रहे हैं, आगे पीछे घूम रहे हैं, मीटिंग कर रहे हैं, पब्लिक जगहों से आवाज लगा रहे हैं, और एक बेवफ़ा सनम राहुल हैं कि लेना ही नहीं चाह रहे सपोर्ट।