राजनैतिक मुद्दे

कृषि सुधारों का UPA से NDA तक का सफर: जहाँ बीजेपी लगातार कर रही पहल वहीं कॉन्ग्रेस ने पूरे 10 साल बयानबाजी में बिताए

इन कानूनों का धरातल पर उतरने के बाद ही उनका विश्लेषण किया जा सकता है। उससे पहले, केंद्र और राज्यों के संबंधों को कमजोर करना अथवा संसद द्वारा पारित कानूनों को फाड़ना कोई लोकतांत्रिक अधिकार नही बल्कि अराजकता है।

सूअर का माँस खाने वाला, शराब पीने वाला ‘क़ायद ए आजम’, जो नमाज तक पढ़ना नहीं जानता था

जिन्ना शराब पीता था, सूअर का माँस खाता था, उर्दू नहीं बोलता था और नमाज तक पढ़ना नहीं जानता था। तमाम मजहबी विरोधाभासों के बावजूद उन्हें समुदाय विशेष ने प्रेम किया, यह चौंकाने वाली बात जरूर है।

MSP की गारंटी कृषि सहित भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देगी

MSP की गारंटी से महँगाई बढ़ेगी, निर्यात पर असर पड़ेगा, छोटे किसानों के उत्पाद गारंटी कानून के कारण घरों में सड़ जाएँगे, और भारत की अर्थव्यवस्था इससे हिल जाएगी।

राहुल तुम ‘नेहरू-दा’ हो, ‘नेरूदा’ मत बनो: अम्बानी को एक लाख करोड़ का ठेका तो यूपीए ने भी दिया था

आपको किसी ने जबरन तो नहीं कहा कि जियो का सिम ले लो और रिलायंस फ्रेश से ही सब्ज़ियाँ खरीदना? अडानी ने तो जबरदस्ती नहीं की आपके साथ? टाटा ने यह तो नहीं कहा कि मेरी कार नहीं लोगे तो मोदी को बता देंगे?

जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र की नई सुबहः पहली बार शरणार्थी, गोरखा, वाल्मीकि समुदाय के लोग भी डालेंगे वोट

इतिहास में पहली बार पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थी, गोरखा और वाल्मीकि समुदाय के लोग भी मतदान कर सकेंगे। अभी तक ये अभागे और उपेक्षित समुदाय राज्य के चुनावों में मतदान के अपने लोकतान्त्रिक अधिकार से वंचित रहे हैं।

किसान आंदोलन के समर्थन और विरोध के बीच मूल मुद्दे गौण

किसान आंदोलन का समर्थन और विरोध व्यक्तिगत इच्छा है। लेकिन, दोनों पक्षों का अपनी-अपनी बात पर एक्सट्रीम हो जाना, किसी तरह जायज नहीं।

विरोध कृषि कानूनों का, पैदावार नफरत की: किसानों की आड़ में उमर खालिद और शरजील को समर्थन के मायने

किसान आंदोलन के पीछे छिपी मंशा पर सवाल बेवजह नहीं है। चाहे वह खालिस्तानी ताकतों की घुसपैठ हो या फिर उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए दिखा समर्थन।

सीताराम को बाथरूम में किया बंद, सिंधिया को नहीं दिया समय: सोनिया गाँधी ने ‘यूज एंड थ्रो’ से 22 साल चलाया कॉन्ग्रेस

सोनिया गाँधी फ़िलहाल कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष हैं। उनके कार्यकाल में कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेताओं को किनारे लगाया गया। जानिए कैसे...ये परंपरा यूँ तो इससे भी पुरानी है, लेकिन तब नेहरू, इंदिरा और राजीव के लिए ऐसा होता था, उसके बाद सोनिया और अब राहुल के लिए यही हो रहा है।

किसानों का ‘भारत बंद’: यह शाहीन बाग मॉडल का ही बदला रूप है, आखिर क्यों सरकार को इसे देशद्रोह मानना चाहिए

हम मोदी सरकार के पिछले 6 वर्षों को याद करें तो इस दौरान कई ऐसी परिस्थितियाँ सामने आई, जिसे फर्जी तरीके से गढ़ा गया था। चाहे वो राफेल रोना होना हो या जज लोया की मौत और उसके साथ लगाए गए झूठे इल्जाम। इतना ही नहीं....

तीस हजार बाबरी बाकी है, और हम उसे ले कर रहेंगे

हर राष्ट्र में कानून बहुसंख्यकों के हिसाब से होता है और अल्पसंख्यकों को उसी दायरे के अनुकूल बनना पड़ता है। यहाँ हमेशा उल्टा होता आया है क्योंकि सर्वसमावेशन और सहिष्णुता की बात सिर्फ हिन्दुओं की ही जिम्मेदारी बन गई है।

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