Tuesday, October 27, 2020
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कहानी एक अब्दुल की जिसे टीवी एंकर दंगाई बनाता है… उसकी मौत से फायदा किसको?

अगर अब्दुल अमानुल्ला की बात ही मानेगा कि मजहब विशेष को तो निकाला जा रहा है, तो जाहिर है कि उसे यही अमानुल्ला कल को मशाल थमा कर सड़क पर उतार देगा। अब्दुल सड़क पर उतर जाएगा, क्योंकि उसके पास सही सूचना है ही नहीं। उसे तो लगेगा कि जब देश से निकाल ही देंगे सारे अब्दुल को, तो सारे अब्दुल इस देश को जला कर ही क्यों न बाहर जाएँ।

रविवार शाम तक खबर फैलाई गई थी कि जामिया के तीन छात्र-छात्राएँ ‘पुलिस के हमले’ में मारे गए हैं। डिटेल में खबर फैलाई गई कि नाम क्या है, किस कोर्स में था, कहाँ का था। मुझे सात बजे पता चला, मैं रुका रहा क्योंकि लग रहा था खबर फर्जी होगी। तीन घंटे बाद भी जब मीडिया में इस खबर को सबने नहीं चलाया तो समझ गया कि झूठी होगी। आम आदमी पार्टी के मुखपत्र ‘जनता का रिपोर्टर’ ने छापी। शायद इस उम्मीद में कि सही निकल जाए तब तो मोदी की पुलिस की ऐसी की तैसी हो जाएगी।

दूसरी खबर जो फैलाई गई वो ‘पुलिस ने खुद बस में लगाई आग’। ये काम सिसोदिया ने किया। पीले डब्बे में कुछ ढोते हुए पुलिस का एक जवान तेजी से आता है और एक खड़ी बस की खिड़की से उसे भीतर फेंक देता है। आदमी और डब्बे पर लाल घेरा बना कर बता दिया गया कि ‘पुलिस अपने संरक्षण में बस जला रही है’। विडियो भी जारी हुआ।

हालाँकि विडियो में डब्बा फेंकने से बस में आग कब लगी, ये नहीं दिखा। दूसरी बात, आग लगानी होती है तो तेल छिड़का जाता है, डब्बा समेत खिड़की से फेंका नहीं जाता। तीसरी बात, आज के दौर में जब हर हाथ में फोन है, 50x ज़ूम का कैमरा है, पब्लिक विडियो बना रही है, उस वक्त पुलिस बस में आग लगा देगी? कमाल की थ्योरी है यार!

तीसरी खबर जो फैली, और अभी भी फैल रही है, कि लाइब्रेरी में पुलिस घुस कर मार रही है बच्चों को। मैंने जितने विडियो देखे, सब में तोड़-फोड़ हो रही है, शोर हो रहा है। एक में अंग्रेज़ी में कह रहा है ‘तोड़फोड़ (rioting) मत करो यार’, दूसरे में टेबल के नीचे घुसा एक बच्चा कह रहा है, ‘यार अपना ही नुकसान क्यों कर रहे हो?’ किसी भी विडियो में पुलिस लाइब्रेरी के भीतर नहीं है। मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा कि पुलिस घुसी हो, पर मेरे पास वैसा विडियो नहीं आया।

चौथी खबर, जो कुछ ही मीडिया वाले दिखा रहे हैं, ‘दो लोगों को पुलिस की गोली लगी है’। एक सफदरजंग में है, दूसरा जामिया नगर के होली फ़ैमिली हॉस्पिटल में। पुलिस ने बार-बार अपनी तरफ से गोली चलाने की बात का खंडन किया है और कहा है कि सिर्फ आँसू गैस के गोले दागे गए। पुलिस, वीसी और छात्रों के समूह ने ये बात स्वीकारी है कि हिंसा करने वाले लोग ‘लोकल’ थे।

जब लोकल आदमी यूनिवर्सिटी के बच्चों का विरोध हायजैक कर सकता है, पत्थर फेंक सकता है, आग लगा सकता है, तो फिर कट्टे से फायर करने में उसे कितना समय लगेगा? बच्चों के मरने की खबर किसने फैलाई थी? क्या कोई इंतज़ार में था किसी की मौत का? आप समझ सकते हैं कि एक बच्चे की मौत से इस आंदोलन को कितना माइलेज मिलता। फिर दो सौ रुपए की गोली, किसी बिल्डिंग से चलाना कितना दुरूह कार्य होगा?

बयान कौन दे रहा है? हिजाब ओढ़े लदीदा और आयशा का सच सामने आ चुका है। इन्हें तो बाकायदा तैयार किया गया था। काम होते ही अचानक मीडिया का हर पत्रकार इन्हें मलाला बनाने को क्यों आतुर है? विडियो से सच पकड़ में आता है तो क्रॉप करके दिखाया जाता है। ‘हिन्दुओं से आजादी’ का नारा ‘छात्रों ने नहीं लगाया’ कह कर झूठ बोला जाता है।

जिन्हें सच जानना है, इंटरनेट का इस्तेमाल करें। मैं क्या कह रहा हूँ, वो क्या लिख रहे हैं, वो क्या बोल रही है, इस पर मत जाइए। विडियो दिखा कर पुलिस पर आग लगाने का इल्जाम हो, या लाइब्रेरी तोड़ने का, ये तो देखिए कि आग लगी भी है कि नहीं, पुलिस लाइब्रेरी में है भी कि नहीं?

लोगों के मरने की बातें हों तो ये देखिए कि कहाँ से ऐसी खबर आ रही है। क्या बड़े मीडिया हाउस चला रहे हैं? क्या सारे लोग चला रहे हैं? गोली लगने की बात हो तो ये भी देखिए कि कौन कह रहा है, नकारिए मत, लेकिन और पहलू भी देखिए कि हर तरफ कैमरे के समय में, दिल्ली में, पुलिस छात्रों पर गोली चलाएगी क्या? कश्मीर में पुलिस गोली नहीं चलाती, और दिल्ली में गोली चलाएगी?

फेसबुक के पुरोधाओं की बातों पर तो बिलकुल मत विश्वास कीजिए। चाहे वो मैं ही क्यों न होऊँ। मैं जो कह रहा हूँ, उसमें सिर्फ वन लाइनर इल्जाम हैं, तंज हैं, घृणा है, या फिर उसको सपोर्ट करने वाले तर्क और तथ्य भी हैं? अगर हैं तो क्या इंटरनेट पर ही उसी को सही साबित करने वाली बातें हैं? फिर शेयर कीजिए, या विचार बनाइए।

कहानी अब्दुल की

जबरदस्ती का भावुक हो कर आँख नम करने वाली पोस्ट मैं भी लिख सकता हूँ कि सुबह अब्दुल से दूध लेने गया, तो वो मुझसे पूछने लगा कि भैया मैं क्या करूँ, मेरे पास तो आधार कार्ड भी नहीं। मैं ये लिख सकता हूँ कि रामेश्वर ने कहा कि उसके तीन लाख दोस्तों ने कहा कि नागरिकता कानून बहुत सही है। जबकि सच्चाई यह है ऐसे तमाम अब्दुल या रामेश्वर, जिनकी आँखों में खुशी या गम आपको देखने होते हैं, और वो आपको इसके लिए ‘जज’ करेंगे, आपको ‘दूसरे खेमे’ का मान लेंगे, तो ये दिक्कत रुबीना और पूजा की है, आपकी नहीं।

अब्दुल को दूध दे कर पैसे लेने से मतलब रखना चाहिए और एक जगह से ही आ रही खबरों की जगह प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की बातों पर भी ध्यान देना चाहिए कि कानून क्या है। अगर अब्दुल अमानुल्ला की बात ही मानेगा कि मजहब विशेष को तो निकाला जा रहा है, तो जाहिर है कि उसे यही अमानुल्ला कल को मशाल थमा कर सड़क पर उतार देगा। अब्दुल सड़क पर उतर जाएगा क्योंकि उसके पास सही सूचना है ही नहीं।

उसे तो लगेगा कि जब देश से निकाल ही देंगे सारे अब्दुल को, तो सारे अब्दुल इस देश को जला कर ही क्यों न बाहर जाएँ। वहीं अब्दुल का मित्र कृष्ण यह देख कर दुखी हो जाएगा कि उसके मित्र को देश से निकालने की साजिश चल रही है। कृष्ण ने भी ये नहीं देखा कि दूसरे लोग क्या कह रहे हैं। कृष्ण भी अब्दुल के मशाल के कपड़े को पेट्रोल में गीला कर रहा है।

कृष्ण पेट्रोल लिए है, तो मीरा भी आ जाती है। मीरा को लगता है कि कृष्ण आग लगा रहा है, तो वो भी लगाएगी। अब्दुल, कृष्ण और मीरा को सूचना का अभाव दंगाई बना देता है। न वो मशाल देने वाले से पूछते हैं कि सरकार उनके साथ ऐसा क्यों कर रही है, या सरकार के बारे में सरकार से ही पूछ लें, या सरकार का ट्विटर देख लें, न मशाल देने वाले को अब्दुल के परिवार की चिंता है कि इस आगजनी में कल को अब्दुल पकड़ा गया, तो उसकी दुकान का क्या होगा? उसकी बहन रजिया स्कूल की फीस कैसे देगी?

अब्दुल टीवी भी देखता है लेकिन अब्दुल की भी दिक्कत वही है जो कन्हैया की है, वो एक ही तरह के चैनल देखता है, एक ही तरह की बातें पढ़ता है, एक ही तरह के लोगों का पोस्ट शेयर करता है। एक को लगता है कि राम मंदिर उसके सारे कष्टों का निवारण कर देगा, दूसरे को लगता है कि हिन्दू तो बस तलवार तेज कर रहे हैं, और एक दिन तो उन्हें काट ही देंगे।

वो एक ही चैनल देखता है जहाँ उसे बताया जा रहा होता है कि डर का माहौल है, कोलकाता से केरल तक लोग ‘संघर्ष और विरोध’ कर रहे हैं। उसे बताया जाता है कि पढ़े-लिखे लोग भी सड़कों पर हैं। परचून की दुकान वाला अब्दुल सोचने लगता है कि जामिया में तो जुबैदा का बड़ा लड़का पढ़ता था जो कि फलाँ कम्पनी में छत्तीस लाख के पैकेज पर है।

अब चैनल के एंकर में उसे मसीहा दिखने लगता है कि यही सही बात कह रहा है। जबकि एंकर अब्दुलों को 6 साल से तैयार कर रहा है। एंकर बेचारा इस बात से परेशान है कि उसने एक पार्टी के खिलाफ इतना जहर उगला है कि वो चाह कर भी अब सच बोल नहीं सकता, इसलिए वो हर दिन एक सीढ़ी नीचे उतर जाता है। उसे शो भी चलाना है इसलिए अब्दुल को वो कहता है कि ‘आखिर इतने लोग विरोध कर रहे हैं, तो कुछ तो बात होगी।’

अब्दुल परेशान हो जाता है, क्योंकि एक मिनट के मोंटाज में बारह जगहों की भीड़ दिखा कर उसे बता दिया जाता है कि 20 करोड़ लोग डरे हुए हैं। अब्दुल ने 22 रुपए के दूध की थैली बेची है, जो 2004 में साढ़े छः रुपए की आती थी, बीस करोड़ लोगों के बारे में सोचना उसे परेशान कर जाता है। अब अब्दुल नागरिकता कानून और नेशनल सिटिजन रजिस्टर जैसी बातों को भूल चुका होता है। एंकर सफल हो चुका है।

अब अब्दुल पूरी तरह से सहमत है कि उससे कागज माँगे जाएँगे, जो कि उसके पास है ही नहीं। जबकि अब्दुल के पास उसकी बोर्ड परीक्षा का कागज होगा, जमीन का कागज होगा, जमीन के सालाना रसीद का कागज होगा, उसके वार्ड कमिश्नर के रिकॉर्ड में उसकी वोटिंग स्लिप होगी, उसके पास राशन कार्ड होगा… लेकिन एंकर की आवाज ने अब्दुल को कन्विन्स कर दिया है कि उसके पास कुछ नहीं है। एंकर ने उसे इतनी बार ये कह दिया है कि अब्दुल दूसरे अब्दुलों से ये कहते दिखता है कि ‘हमारे पास तो कागज हैं ही नहीं, हम लोग कहाँ जाएँगे’। ‘मैं’ कब ‘हम लोग’ बन गया, अब्दुल को पता ही नहीं चला।

अब्दुल ने अपने कागज की जिम्मेदारी तो ली ही, अब सोसायटी के सारे अब्दुलों के कागज के न होने का भी जिम्मा अब्दुल ने ले लिया है। अब अब्दुल को याद दिलाया जाता है कि बाबरी तोड़ी और उसी को कोर्ट ने जमीन दे दी। अब्दुल को यह नहीं बताया जाता कि बाबरी किस चीज को तोड़ कर तामील हुई थी। अब्दुल को बताया जाता है कि अगस्त में 370 हटा दिया गया।

अब्दुल को पता भी नहीं कि 370 है क्या? वो कश्मीर सुन कर भावुक हो जाता है और अचानक से कश्मीर के लिए चिंतित हो जाता है। फिर अब्दुल को कहा जाता है कि तीन तलाक में भी सरकार बताएगी कि अब्दुल तलाक दे या नहीं। अब्दुल चिंतित हो जाता है और भूल जाता है कि उसका निकाह तक नहीं हुआ है। फिर अब्दुल को कहा जाता है कि तबरेज को मार दिया ‘उन लोगों’ ने। फिर जुनैद और अखलाक की कहानी भी दो-दो लाइन में बता दी जाती है।

अब्दुल भावुक से अब भावावेश की स्थिति में आ जाता है। अंकित सक्सेना, भारत यादव, ध्रुव त्यागी आदि की कहानी अब्दुल ने रायते की बूँदी बेचते वक्त अपने कस्टमर्स से सुनी हुई थी, लेकिन वो उस वक्त भूल जाता है क्योंकि नई कहानियों ने पुरानी को ढकेल कर बाहर कर दिया है।

कृष्ण के साथ होने से उसे बल मिलता है कि वो मजहबी उन्मादी नहीं है, वरना हिन्दू उसके साथ क्यों होता! उसे लगता है कि विरोध-प्रदर्शन तो संवैधानिक अधिकार है, क्योंकि मीरा ने उसे आर्टिकल 14 के बारे में बताया है, या शायद आर्टिकल 19 था वो। जो भी था, अब्दुल जो कर रहा है, वो उसका संवैधानिक अधिकार है, ऐसा अब्दुल मानता है। एंकर ने भी कहा है कि विरोध तो संवैधानिक अधिकार है।

अब्दुल जो बात नहीं जानता, वो यह है कि अमानुल्ला की पूरी योजना में वो एक पैदल सिपाही है जिसके मरने से उसे राजनैतिक लाभ मिलेगा और उसका घाटा कुछ भी नहीं। अब्दुल मशाल ले कर आगे बढ़ता है, फिर वो देखता है कि संवैधानिक तरीके में तो पत्थर भी फेंका जा सकता है। वो दूसरे हाथ से पत्थर उठा कर जोर से फेंकता है। वो पत्थर किसी पुलिस वाले को लगती है, वो ICU पहुँच जाता है।

पुलिस भी आँसू गैस के गोले दागती है, अब्दुल गुस्सा हो जाता है कि पुलिस संवैधानिक अधिकार पर हमला क्यों कर रही है। अब्दुल बगल खड़ी बस में आग लगा देता है। बहुत शोर होता है। तभी उसके व्हाट्सएप्प ग्रुप में खबर आती है कि कोटा के शाकिर को मार दिया गया है पुलिस के द्वारा। अब्दुल को गुस्सा आता है। वो भीड़ के साथ हमला करने आगे बढ़ता है। उसी भीड़ में कमर से कोई पिस्तौल निकालता है और भागते अब्दुल की पीठ में उतार देता है।

अब्दुल गिर जाता है, उसकी आँखों के सामने स्कूल जाती रजिया का चेहरा घूमता है, उसके माता-पिता की तस्वीर नाचती है, उसकी आँख बंद होने लगती है, लोग उसके ऊपर लात रख कर भाग रहे होते हैं। भीड़ छँटने के बाद अब्दुल मरा हुआ पाया जाता है। उसकी मौत से किसको, क्या फायदा हुआ यह देखने के लिए उसे बहुत लम्बा इंतजार करना पड़ेगा।

इसलिए, अब्दुल मत बनिए। जिस फोन के व्हाट्सएप पर मैसेज आता है, उसी फोन पर बड़े ही आसान शब्दों में कानून के बारे में विडियो और लेख पड़े हुए हैं। आग लगवाने वाले वातानुकूलित स्टूडियो में सूट पहन कर बैठे हुए हैं। उन्होंने दसियों दंगे देखे हैं, करवाए हैं। उनके लिए आपका अस्तित्व भी नहीं क्योंकि वो आपकी मौत की खबर एक टिकर पर चला देगा और सरकार को कोस देगा, फिर भूल जाएगा।

मशाल से अँधेरा भी छँटता है, और घर भी जलाए जा सकते हैं। चुनाव आपका है क्योंकि कमर में पिस्तौल खोंसे वो आदमी आपको जब गोली मारेगा तो आपको पता भी नहीं चलेगा।

इस उन्माद, मजहबी नारों के पीछे साजिश गहरी… क्योंकि CAA से न जयंती का लेना है और न जोया का देना

जामिया में मजहबी नारे ‘नारा-ए-तकबीर’, ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ क्यों लग रहे? विरोध तो सरकार का है न?

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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