चोट हलाला, पॉलीगेमी, तलाक पर की जाती है, दर्द इन्हें होता है: मिलिए ‘The Wire’ की आरफा खानम जी से

आरफा जैसों को पहचानने का एक और तरीका ये है कि वो इस्लामी मजहबी नारों का महिमामंडन करते रहते हैं और हिंदुत्व के प्रतीकों का जी भर अपमान करते हैं। जैसे, आरफा ने 'ला इलाहा इल्लल्लाह' को ऊर्जा देने वाला स्लोगन बताया था और इसी आरफा ने हनुमान जी के पोस्टर को 'डर फैलाने वाला' करार दिया था।

प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ की आरफा खानम शेरवानी के ताज़ा आर्टिकल्स और न्यूज़ आइटम्स को आप देखेंगे तो पाएँगे कि पिछले दो महीने से ख़ुद को पत्रकार बताने वाली इस महिला का एक ही उद्देश्य है और वो है शाहीन बाग़ के उपद्रवियों का महिमामंडन करना। वीडियो और आर्टिकल्स के जरिए आरफा ने शाहीन बाग़ के एक-एक दंगाई को देवता तुल्य साबित करने के लिए जो परिश्रम किया है, उससे साफ़ दिखता है कि सीएए विरोध के नाम पर कुछ और हो रहा है। अभी ख़बर आई है कि 120 करोड़ रुपए इस्लामिक कट्टरवादियों ने इस विरोध प्रदर्शन में लगाए। मोदी के विरोध के लिए अमेरिकी उद्योगपति जॉर्ज सोरोस भी 100 करोड़ डॉलर दे रहे हैं।

वित्तीय संसाधन को भाजपा विरोधियों तक पहुँचा कर उन्हें देश विरोध के लिए उकसाना अब एक नई रणनीति दिख रही है, जिसकी पल-पल पोल भी खुल रही है। जिस शाहीन बाग़ का महिमामंडन करके आरफा ने पिछले 2 महीने गुजारे हैं, उसी शाहीन बाग़ का मुख्य साज़िशकर्ता शरजील इमाम भारत के टुकड़े-टुकड़े कर के पूरे उत्तर-भारत को अलग-थलग करने की मंशा रखता है। ये तो एक बानगी भर है। आरफा और शरजील जैसे हज़ारों लोग जुड़े हैं इस दंगे से, जिनकी मंशा इसी तरह खतरनाक है।

आरफा खानम शेरवानी उन लोगों में से एक है, जो आज के दौर की तुलना जर्मनी की नाज़ी सरकार से करते हैं। और हाँ, मोदी और हिटलर के बीच समानताएँ ढूँढ़ते-ढूँढ़ते तो ये उस मामले में पीएचडी कर चुके हैं। आरफा जैसों की नज़रों में 2014 का चुनाव विश्व युद्ध-1 था और 2019 के चुनाव विश्व युद्ध-2। नाजी से तुलना करने वाले ये भी ख़ूब समझते हैं कि वो रोज 5 बार मोदी को गाली देकर भी चैन से घर में बैठ सकते हैं क्योंकि लोकतंत्र पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है, कमजोर नहीं। अनुराग कश्यप सरीखे तो गालियाँ बक कर भी आराम कर रहे होते हैं।फिर भी, आरफा ने मोदी और हिटलर की तुलना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

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आरफा खानम शेरवानी हाल ही में इसीलिए चर्चा में आई हैं, क्योंकि उन्होंने दंगाइयों को सलाह दी है कि वो लक्ष्य सफल होने तक अपनी मुस्लिम पहचान को सामने न लाएँ। यानी, अभी आम आदमी बन कर प्रदर्शन करें और समय आते ही अपना असली कट्टरपंथी चेहरा ले कर हाजिर हो जाएँ। मुस्लिमों को उनकी सलाह है कि घर पर खूब मजहबी व कट्टरवादी नारे पढ़ कर आएँ क्योंकि उनसे इन्हें ऊर्जा मिलती है। लेकिन, बाहर में मुस्लिम ऐसा दिखाएँ जैसे कि वो आम आदमी हैं ताकि अन्य लोग भी उनके प्रदर्शन में जुड़ सकें। जाहिर है, समय आते ही हर दंगाई को शरजील इमाम बन कर अपना असली चेहरा सामने लाने को कहा जाएगा।

जब मुस्लिमों की कुरीतियों के बारे में बात की जाती है तो आरफा खानम शेरवानी को मिर्ची लग जाती है और वो एक पल भी नहीं लगाती अपने मजहब और समाज की कुरीतियों को जायज ठहराने में। जब जायरा वसीम ने अल्लाह और इस्लाम का रोना रोते हुए एक्टिंग को अलविदा कहा था, तब कॉन्ग्रेस नेता व वरिष्ठ वकील मनु सिंघवी ने पूछा था कि हलाला जायज और एक्टिंग हराम, क्या ऐसे तरक्की करेगा हिंदुस्तान? जायरा वसीम को क्या जबरदस्ती अभिनय में लाया गया था? वो आई तब उन्हें ‘अल्लाह और इस्लाम’ का ख्याल नहीं रहा। सिंघवी के इस जायज सवाल पर भड़की आरफा ने पूछा कि क्या राहुल गाँधी अपनी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के इस बयान का समर्थन करते हैं?

इनकी हिटलरवादी सोच देखिए। दूसरों को हिटलर कहने वाली आरफा का मानना है कि किसी नेता को एक शब्द भी बोलने के लिए अपनी पार्टी के मुखिया से अनुमति लेना आवश्यक है वरना उसे मुँह खोलने का अधिकार नहीं। क्या किसी पार्टी का नेता तभी बोलेगा जब उसकी पार्टी का अध्यक्ष उसे अनुमति देगा? असली तानाशाही तो यही है, जिसे आरफा जैसे लोग बढ़ावा देते हैं। सिंघवी के जवाब से आरफा को और मिर्ची लगी। वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने लताड़ते हुए कहा कि जब तक आरफा जैसे लोग मुस्लिम समाज में प्रभावी रहेंगे, तब तक मुसलमान पिछड़े के पिछड़े ही रहेंगे। बात सही है। आरफा और शरजील जैसों की बातों पर ‘इंशाअल्लाह’ कहने वाला समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

और हाँ, लिबरल गैंग का सबसे पहला कर्त्तव्य यही होता है कि किसी मंदिर, संत, देवता और हिंदुत्व को बदनाम करना। आरफा खानम शेरवानी ने इस काम के लिए गोरखनाथ मंदिर को चुना। क्योंकि इस क़दम से देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य के मुख्यमंत्री को बदनाम किया जा सकता है और साथ ही भाजपा, हिंदुत्व और मंदिर को भी बदनाम किया जा सकता है। आरफा ने झूठ फैलाते हुए लिखा कि फलाँ नवाब ने गोरखनाथ मंदिर के लिए ज़मीन दी थी। आरफा भूल गईं कि गोरखनाथ मंदिर का 800 वर्षों का इतिहास रहा है, जब उनके फलाँ नवाब के दादा भी पैदा नहीं हुए थे।

आरफा जैसों को पहचानने का एक और तरीका ये है कि वो इस्लामी मजहबी नारों का महिमामंडन करते रहते हैं और हिंदुत्व के प्रतीकों का जी भर अपमान करते हैं। जैसे, आरफा ने ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ को ऊर्जा देने वाला स्लोगन बताया था और इसी आरफा ने हनुमान जी के पोस्टर को ‘डर फैलाने वाला’ करार दिया था। सीएए विरोधी प्रदर्शन में ‘ला इलाहा इल्ललाह’ का इस्तेमाल क्यों हुआ, ये छिपा नहीं है। ख़ुद जामिया की हिजाबी छात्राएँ आयशा और लदीदा ने कहा था कि अब समय आ गया है जब सेक्युलर नारों से तौबा किया जाए और इस्लामी नारे लगाए जाएँ। उनकी नज़र में जिन्हें ये नारे पसंद नहीं, वो मुस्लिमों के साथ नहीं हैं।

यही तो उस शरजील इमाम की भी सोच है, जिसके पीछे असम की पुलिस, ईटानगर का क्राइम ब्रांच और केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ लगी हुई हैं। वो भी तो कहता है कि अब मुस्लिमों के साथ कौन है और कौन नहीं, ये मुसलमान अपने शर्तों पर तय करेंगे। अर्थात, मुस्लिम बोलेंगे कि तुम फलाँ नारे लगाओ और फलाँ काम करो, तभी हमारे साथ माने जाओगे। वहीं सदियों से चले आ रहे ‘जय श्री राम’ से उन्हें दिक्कत है। आरफा और शरजील जैसों के बयानों में आयशा और लदीदा जैसों के जहर का छौंक लग जाता है तो स्पष्ट दिख जाता है कि न तो ये ‘आंदोलन’ है और न ही सीएए या एनआरसी से इनका कोई लेना-देना है। इन्हें बस इस्लामी मजहबी कट्टरता स्थापित करनी है, अराजकता फैलानी है।

जब कोई मुस्लिम नेता कुछ गलतबयानी करता है, तब उनका बचाव करने के लिए सबसे पहले आरफा जैसी कथित ‘Muslim Influencer’ ही आगे आती है। एक महिला होकर आरफा ने आज़म ख़ान की महिलाविरोधी टिप्पणी का बचाव किया, जो ये दिखाता है कि ये वामपंथी अथवा इस्लामिक कट्टरवादी महिलाधिकार का सिर्फ़ ढोंग रचाते हैं। इन्हें महिलाओं की कोई चिंता नहीं। आज़म ने जया प्रदा के लिए ‘खाकी चड्डी’ जैसी घृणित टिप्पणी की और आरफा ने इसका बचाव किया। बचाव में आरफा ने कहा कि आज़म ने अमर सिंह को भी तो बोला। यही लोग जब कैंडल लेकर महिलाओं के हित की बात करते हुए सड़क पर उतरते हैं, तो उनके इस कृत्य को ढोंग नहीं तो और क्या कहा जाए?

जेएनयू और जामिया में छात्रों के हितों की बात करने का दावा करने वाली इसी आरफा ने बीएचयू के छात्रों को बदनाम करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फरहान अख्तर जैसों का साथ देते हुए उन छात्रों को बदनाम किया गया था। इससे पता चलता है कि ये वामपंथी और कट्टरवादी इस्लामी एक्टिविस्ट्स छात्रों और युवाओं के भी पक्षधर नहीं हैं, अपने सहूलियत के हिसाब से सिर्फ़ उनका इस्तेमाल करते हैं। अब जब उनका दिखावटी चोला पूरी तरह उतर चुका है, वो तिरंगा झंडा और संविधान का सहारा लेकर ख़ुद को पाक-साफ़ साबित करने को जुटे हैं। वही संविधान, जिसके बारे में शरजील कहता है कि उससे मुस्लिमों को कोई उम्मीद नहीं है।

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