यूरोपीय ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACEA) ने गुरुवार (16 अक्टूबर 2025) को एक बयान जारी कर कहा कि यूरोप की कार कंपनियों के लिए जरूरी चिप्स की सप्लाई में भारी रुकावट आ सकती है, जिससे वाहन उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। यह संकट डच चिप निर्माता कंपनी नेक्सपीरिया से जुड़ा है, जो अब यूरोपीय कंपनियों को सप्लाई की गारंटी नहीं दे पा रही है।
इस संकट की शुरुआत तब हुई जब डच सरकार ने चीन की स्वामित्व वाली नेक्सपीरिया कंपनी को सीज कर दिया। यह कदम अमेरिका के दबाव में लिया गया, जिसने नेक्सपीरिया के चीन से जुड़े होने पर प्रतिबंधों की धमकी दी थी। इसके जवाब में चीन ने नेक्सपीरिया पर एक एक्सपोर्ट बैन (निर्यात प्रतिबंध) लगा दिया।
इस फैसले का असर अब यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री पर पड़ रहा है क्योंकि कारों में इस्तेमाल होने वाली जरूरी चिप्स की सप्लाई बंद होने का खतरा है। नेक्सपीरिया ने कहा है कि वह अब यूरोपीय कार कंपनियों को सप्लाई की गारंटी नहीं दे सकती। ACEA ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई है और कहा है कि अगर यह समस्या तुरंत नहीं सुलझी, तो यूरोप में वाहनों का उत्पादन रुक सकता है।
यह पूरा मामला वैश्विक स्तर पर बढ़ते राजनीतिक और व्यापारिक दबावों का नतीजा है, जिसकी जड़ें अमेरिका से जुड़ी हैं। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति काल में अमेरिका ने वैश्विक व्यापार पर दबाव काफी बढ़ा दिया था। अब उसी दबाव के चलते यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री भी संकट में आ गई है।
नेक्सपीरिया और इसका सामरिक महत्व
नेक्सपीरिया एक डच चिप निर्माता कंपनी है, जिसका मुख्यालय नीदरलैंड्स के निजमेगेन शहर में है। यह कंपनी बड़ी मात्रा में सेमीकंडक्टर बनाती है, जो दुनियाभर की कारों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और औद्योगिक मशीनों में इस्तेमाल होते हैं।
ये चिप्स बहुत हाई-टेक नहीं होतीं, जैसे GPU या AI चिप्स लेकिन ये गाड़ियों के इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट्स (ECUs) और अन्य जरूरी हिस्सों को चलाने के लिए अनिवार्य होती हैं। नेक्सपीरिया दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है जो डायोड्स, ट्रांजिस्टर और MOSFETs जैसे बेसिक चिप्स बनाती है, जो हर इलेक्ट्रॉनिक और बिजली से चलने वाले उपकरण में बड़ी मात्रा में लगते हैं।
कंपनी की शुरुआत 2017 में NXP से अलग होकर हुई थी और 2019 में चीन की विंगटेक टेक्नोलॉजी ने इसे करीब 3.6 अरब डॉलर में खरीद लिया। इस खरीद के बाद कंपनी का मालिकाना ढांचा दो हिस्सों में बँट गया। शंघाई में सूचीबद्ध कंपनी विंगटेक के पास इसके नियंत्रण है। वहीं, नेक्सपीरिया ने वैश्विक उपस्थिति के साथ अपनी परिचालन स्वतंत्रता बनाए रखी है।
हालांकि, नेक्सपीरिया ने अब भी अपनी वैश्विक पहचान और संचालन में स्वतंत्रता बनाए रखी है और इसकी मौजूदगी यूरोप, अमेरिका और एशिया के कई देशों में है। कंपनी के पास 14,000 से ज्यादा कर्मचारी हैं और इसका कारोबार अरबों डॉलर का है।
नेक्सपीरिया का उत्पादन मॉडल ऐसा है कि इसका डिजाइन और शुरुआती निर्माण यानि वेफर निर्माण यूरोप जर्मनी और ब्रिटेन में होता है और फिर अंतिम असेंबली और टेस्टिंग एशिया (चीन, मलेशिया, फिलीपींस) में की जाती है।
इसे समझने के लिए भारत की टाटा ग्रुप के सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट का उदाहरण लिया जा सकता है, जिसमें गुजरात में चिप्स का निर्माण होगा और असम में पैकेजिंग और टेस्टिंग। नेक्सपीरिया का यह हाइब्रिड मॉडल लागत में कमी और उत्पादन में तेजी लाने में मदद करता है, लेकिन यह सीमा पार निर्भरता के कारण बहुत संवेदनशील भी हो गया है।
हाल ही में कंपनी भारी राजनीतिक संकट में फंस गई है। डच सरकार ने अमेरिका के दबाव में आकर नेक्सपीरिया को जब्त कर लिया, क्योंकि इसकी मालिक कंपनी विंगटेक का चीन से गहरा संबंध है।
अमेरिका को डर है कि चीन तकनीकी कंपनियों के जरिए महत्वपूर्ण तकनीक पर नियंत्रण पा रहा है। इस कदम के जवाब में चीन ने नेक्सपीरिया पर निर्यात प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे कंपनी अब यूरोपीय कार निर्माताओं को चिप्स की सप्लाई की गारंटी नहीं दे पा रही है।
यह संकट यूरोपीय ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए बहुत बड़ा खतरा है, क्योंकि ये चिप्स उनके लिए जरूरी हैं। पहले ही COVID-19 और अन्य वैश्विक तनावों के दौरान चिप्स की भारी कमी हो चुकी है, जिससे उत्पादन रुक गया था।
अब अगर नेक्सपीरिया की सप्लाई बंद हो गई, तो यूरोप की गाड़ियों की उत्पादन लाइनें फिर से बुरी तरह प्रभावित होंगी। दूसरी कंपनियों से चिप्स लेने में कई महीने लग सकते हैं, क्योंकि हर नए पार्ट को पहले टेस्ट और अप्रूव समरूपीकरण करना पड़ता है।
नतीजा यह है कि नेक्सपीरिया, जो अब तक यूरोपीय तकनीक और चीनी उत्पादन क्षमता का बेहतरीन मेल थी, अब अमेरिका-चीन टेक युद्ध का शिकार बन गई है। इससे न केवल एक कंपनी, बल्कि पूरे यूरोपीय वाहन उद्योग के भविष्य पर संकट मंडरा रहा है।
अमेरिकी दबाव के कारण डच सरकार का अधिग्रहण हुआ
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब अमेरिका ने दुनिया भर में तकनीकी सप्लाई चेन पर चीन के प्रभाव को लेकर चिंता जताई। ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि नेक्सपीरिया पर चीन का स्वामित्व एक राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा है।
उनका मानना था कि चीन इस कंपनी के जरिए यूरोप और अमेरिका में हो रहे रिसर्च और टेक्नोलॉजी तक पहुँच सकता है। इसी वजह से अमेरिका को आशंका थी कि संकट की स्थिति में चीन इस सप्लाई का दुरुपयोग कर सकता है।
वॉशिंगटन ने जून 2025 में डच सरकार को चेतावनी दी कि अगर कंपनी में बदलाव नहीं किए गए, खासकर इसके चीनी CEO Zhang Xuezheng को लेकर, तो नेक्सपीरिया को अमेरिकी एंटिटी लिस्ट (ब्लैकलिस्ट) में डाला जा सकता है। इस लिस्ट में आने का मतलब है कि कंपनी को अमेरिकी तकनीक और उपकरणों की सप्लाई पर रोक लग जाएगी।
अमेरिका ने सितंबर 2025 में एक नया नियम जारी किया, जिसके अनुसार अगर कोई कंपनी 50% या उससे ज्यादा हिस्सेदारी किसी पहले से ब्लैकलिस्टेड कंपनी के पास है, तो वह भी अपने आप इस लिस्ट में आ जाएगी। ये नियम सीधे विंगटेक (नेक्सपीरिया की चीनी पैरेंट कंपनी) पर लागू हुआ, जिससे नेक्सपीरिया पर भी अमेरिकी निर्यात प्रतिबंध लगने लगे।
इस राजनीतिक दबाव के अलावा, नेक्सपीरिया में अंदरूनी प्रबंधन को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगे। कंपनी पर 200 मिलियन के अनावश्यक वेफर ऑर्डर जबरन करने, विरोध करने वाले अधिकारियों को निकालने और CEO Zhang की अन्य कंपनियों के साथ हितों के टकराव जैसे आरोप लगे।
डच सरकार ने 30 सितंबर 2025 को 1952 के ‘Goods Availability Act’ (जो कि शीत युद्ध के समय का आपातकालीन कानून है) का इस्तेमाल करते हुए नेक्सपीरिया का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। सरकार ने कहा कि उन्हें डर है कि कंपनी की तकनीक चीन को ट्रांसफर की जा सकती है, जिससे यूरोप में सेमीकंडक्टर की कमी और ऑटो इंडस्ट्री की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है।
इस फैसले के तहत, कंपनी को अस्थायी बाहरी प्रबंधन के तहत रखा गया और CEO Zhang को उनके सभी पदों से हटा दिया गया। एक डच अदालत ने पहले ही Zhang को कंपनी के कार्यकारी निदेशक पद से सस्पेंड कर दिया था और उनकी जगह डच बिजनेसमैन Guido Dierick को निर्णायक अधिकारों के साथ नियुक्त किया गया। साथ ही, नेक्सपीरिया के अधिकतर शेयरों का नियंत्रण एक डच वकील को सौंप दिया गया, ताकि कंपनी का संचालन स्थानीय कानूनों के तहत पारदर्शी तरीके से हो।
इस कार्रवाई में कंपनी का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया, बल्कि एक साल तक के लिए सीमित नियंत्रण लगाया गया है। इस दौरान नेक्सपीरिया कोई बड़ा बिजनेस फैसला, संसाधनों का ट्रांसफर या कर्मचारियों में बड़ा बदलाव नहीं कर सकती, जिससे कि प्रोडक्शन चलता रहे और टेक्नोलॉजी चीन न जाए।
इस कदम की विंगटेक ने कड़ी आलोचना की और इसे भूराजनीतिक पक्षपात से प्रेरित बताया। कंपनी ने कहा कि नेक्सपीरिया ने सभी स्थानीय नियमों का पालन किया है और यूरोप में भारी संख्या में लोगों को रोजगार दिया है। उन्होंने शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में एक फाइलिंग के जरिए बताया कि इस डच फैसले के कारण उनके नियंत्रण और निर्णय लेने की क्षमता पर अस्थायी असर पड़ा है।
इससे पहले भी 2022 में अमेरिका के दबाव में ब्रिटेन सरकार ने नेक्सपीरिया को अपनी न्यूपोर्ट वाली चिप फैक्ट्री बेचने के लिए मजबूर किया था, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया था। अब वही स्थिति डच इकाई में दोहराई जा रही है।
चीन का जवाबी निर्यात प्रतिबंध और यूरोप पर इसका प्रभाव
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब अमेरिका ने दुनिया भर में तकनीकी सप्लाई चेन पर चीन के प्रभाव को लेकर चिंता जताई। ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि नेक्सपीरिया पर चीन का स्वामित्व एक राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा है।
उनका मानना था कि चीन इस कंपनी के जरिए यूरोप और अमेरिका में हो रहे रिसर्च और टेक्नोलॉजी तक पहुँच सकता है। इसी वजह से अमेरिका को आशंका थी कि संकट की स्थिति में चीन इस सप्लाई का दुरुपयोग कर सकता है।
वॉशिंगटन ने जून 2025 में डच सरकार को चेतावनी दी कि अगर कंपनी में बदलाव नहीं किए गए, खासकर इसके चीनी CEO Zhang Xuezheng को लेकर, तो नेक्सपीरिया को अमेरिकी एंटिटी लिस्ट (ब्लैकलिस्ट) में डाला जा सकता है। इस लिस्ट में आने का मतलब है कि कंपनी को अमेरिकी तकनीक और उपकरणों की सप्लाई पर रोक लग जाएगी।
अमेरिका ने सितंबर 2025 में एक नया नियम जारी किया, जिसके अनुसार अगर कोई कंपनी 50% या उससे ज्यादा हिस्सेदारी किसी पहले से ब्लैकलिस्टेड कंपनी के पास है, तो वह भी अपने आप इस लिस्ट में आ जाएगी। ये नियम सीधे विंगटेक (नेक्सपीरिया की चीनी पैरेंट कंपनी) पर लागू हुआ, जिससे नेक्सपीरिया पर भी अमेरिकी निर्यात प्रतिबंध लगने लगे।
इस राजनीतिक दबाव के अलावा, नेक्सपीरिया में अंदरूनी प्रबंधन को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगे। कंपनी पर 200 मिलियन के अनावश्यक वेफर ऑर्डर जबरन करने, विरोध करने वाले अधिकारियों को निकालने और CEO Zhang की अन्य कंपनियों के साथ हितों के टकराव जैसे आरोप लगे।
डच सरकार ने 30 सितंबर 2025 को 1952 के ‘Goods Availability Act’ (जो कि शीत युद्ध के समय का आपातकालीन कानून है) का इस्तेमाल करते हुए नेक्सपीरिया का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। सरकार ने कहा कि उन्हें डर है कि कंपनी की तकनीक चीन को ट्रांसफर की जा सकती है, जिससे यूरोप में सेमीकंडक्टर की कमी और ऑटो इंडस्ट्री की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है।
इस फैसले के तहत, कंपनी को अस्थायी बाहरी प्रबंधन के तहत रखा गया और CEO Zhang को उनके सभी पदों से हटा दिया गया। एक डच अदालत ने पहले ही Zhang को कंपनी के कार्यकारी निदेशक पद से सस्पेंड कर दिया था और उनकी जगह डच बिजनेसमैन गुइडो डिएरिक को निर्णायक अधिकारों के साथ नियुक्त किया गया। साथ ही, नेक्सपीरिया के अधिकतर शेयरों का नियंत्रण एक डच वकील को सौंप दिया गया, ताकि कंपनी का संचालन स्थानीय कानूनों के तहत पारदर्शी तरीके से हो।
इस कार्रवाई में कंपनी का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया, बल्कि एक साल तक के लिए सीमित नियंत्रण लगाया गया है। इस दौरान नेक्सपीरिया कोई बड़ा बिजनेस फैसला, संसाधनों का ट्रांसफर या कर्मचारियों में बड़ा बदलाव नहीं कर सकती, जिससे कि प्रोडक्शन चलता रहे और टेक्नोलॉजी चीन न जाए।
इस कदम की विंगटेक ने कड़ी आलोचना की और इसे भूराजनीतिक पक्षपात से प्रेरित बताया। कंपनी ने कहा कि नेक्सपीरिया ने सभी स्थानीय नियमों का पालन किया है और यूरोप में भारी संख्या में लोगों को रोजगार दिया है। उन्होंने शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में एक फाइलिंग के जरिए बताया कि इस डच फैसले के कारण उनके नियंत्रण और निर्णय लेने की क्षमता पर अस्थायी असर पड़ा है।
इससे पहले भी 2022 में अमेरिका के दबाव में ब्रिटेन सरकार ने नेक्सपीरिया को अपनी न्यूपोर्ट वाली चिप फैक्ट्री बेचने के लिए मजबूर किया था, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया था। अब वही स्थिति डच इकाई में दोहराई जा रही है।
ACEA का संकट संकेत
नेक्सपीरिया ने 10 अक्टूबर 2025 को यूरोप की वाहन कंपनियों और उनके सप्लायर्स को सूचित किया कि चीन द्वारा लगाए गए एक्सपोर्ट बैन के कारण अब वह चिप्स की सप्लाई की कोई गारंटी नहीं दे सकती।
कंपनी ने कहा कि उनके पास मौजूद स्टॉक केवल कुछ ही हफ्तों तक चलेगा, इसके बाद सप्लाई पूरी तरह रुक सकती है। नेक्सपीरिया ने बताया कि हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि वे अब ऑटोमोटिव सप्लाई चेन को चिप्स देना जारी नहीं रख सकते।
We are deeply concerned by potential significant disruption to European vehicle manufacturing if the interruption of Nexperia chips supplies cannot be immediately resolved.
— ACEA (@ACEA_auto) October 16, 2025
On 10 October, #automobile manufacturers and their suppliers received notice from Nexperia outlining a… pic.twitter.com/RW8qveXCng
इस सूचना के बाद, 16 अक्टूबर 2025 को यूरोपीय ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACEA) ने एक आपात चेतावनी (distress note) जारी की। ACEA ने कहा कि नेक्सपीरिया की चिप्स के बिना ऑटो कंपनियों के सप्लायर्स जरूरी पार्ट्स और कंपोनेंट्स नहीं बना सकते, जिससे पूरे वाहन उत्पादन पर खतरा मंडरा रहा है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही बाजार में ऐसे ही चिप्स दूसरे सप्लायर्स से भी मिलते हैं, लेकिन नई कंपनियों को अप्रूव करने और उत्पादन बढ़ाने में कई महीने लग सकते हैं। इस बीच नेक्सपीरिया की चिप्स का स्टॉक खत्म हो जाएगा।
ACEA की डायरेक्टर जनरल सिग्रिड डी व्रीस ने चिंता जताते हुए कहा, “हम अचानक बहुत गंभीर स्थिति में आ गए हैं। अब हमें जल्द और व्यावहारिक समाधान चाहिए, वो भी उन सभी देशों से जो इसमें शामिल हैं।”
यूरोप की बड़ी कार कंपनियों ने भी स्थिति को लेकर सतर्कता दिखाई है। BMW ने कहा कि उसके सप्लायर नेटवर्क पर असर पड़ा है, लेकिन अभी उत्पादन रुका नहीं है। Volkswagen ने भी नेक्सपीरिया की चिप्स पर अपनी निर्भरता मानी और कहा कि वे स्थिति पर नजर रख रहे हैं।
Mercedes-Benz और Stellantis संभावित असर का आकलन कर रहे हैं और समाधान की दिशा में काम कर रहे हैं, हालांकि हर कंपनी की स्थिति अलग-अलग है। Bosch जैसी बड़ी सप्लायर कंपनियाँ, जो नेक्सपीरिया की चिप्स इस्तेमाल करती हैं, अलर्ट मोड पर हैं।
इस संकट की गंभीरता को समझते हुए नीदरलैंड्स की सरकार ने अब संवाद का रास्ता अपनाने की बात कही है। आर्थिक मामलों के मंत्री विंसेंट कर्रेमन्स ने कहा कि वह चीन के साथ इस एक्सपोर्ट बैन पर समाधान निकालना चाहते हैं और उन्हें उम्मीद है कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ेगी।
यह संकट अब सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं है। अमेरिका में भी ऑटो इंडस्ट्री पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। ऑटोमोटिव नवाचार के लिए गठबंधन, जो अमेरिकी ऑटो कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है, उसने आगामी सप्लाई संकट की चेतावनी दी है। यह दिखाता है कि आज की दुनिया में सप्लाई चेन कितनी आपस में जुड़ी हुई है, एक देश की नीति का असर पूरी दुनिया की फैक्ट्रियों पर पड़ सकता है।
ट्रम्प के आदेश यूरोप में व्यवधान पैदा कर रहे हैं
हालांकि नेक्सपीरिया चिप संकट सीधे तौर पर डच और चीनी सरकारों की कार्रवाइयों से शुरू हुआ, लेकिन इसके पीछे की मुख्य वजह हैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक व्यापार और विदेश नीतियाँ। ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और चीन के बीच चल रही टेक्नोलॉजी जंग और तेज हो गई है।
उनका प्रशासन चीन से डिकपलिंग (तकनीकी रूप से अलगाव) को प्राथमिकता दे रहा है। इसके तहत ट्रम्प सरकार ने चीन की कंपनियों को एन्टिटी लिस्ट में डालना शुरू किया और यूरोप और एशिया के सहयोगी देशों पर दबाव डाला कि वो सभी चीन से जुड़ी कंपनियों पर सख्त कदम उठाएँ।
अमेरिका ने दिसंबर 2024 में विंगटेक (नेक्सपीरिया की चीनी मूल कंपनी) को सुरक्षा कारणों से ब्लैकलिस्ट कर दिया। फिर सितंबर 2025 में नेक्सपीरिया को भी इसी लिस्ट में डाल दिया गया। अमेरिका ने नेक्सपीरिया के CEO Zhang Xuezheng को हटाने की माँग की, जिसे डच सरकार ने मान लिया और नेक्सपीरिया पर नियंत्रण ले लिया।
इस अमेरिकी दबाव ने यूरोप को बहुत मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। यूरोपीय देशों को अब अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते और चीन के साथ आर्थिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।
डच सरकार ने नेक्सपीरिया पर नियंत्रण लेने का जो फैसला किया, वह भले ही देश के अंदर गवर्नेंस समस्याओं के आधार पर लिया गया हो, लेकिन यह फैसला अमेरिकी धमकियों और दबाव से ही तेजी से लागू हुआ।
इसके जवाब में चीन ने नेक्सपीरिया की चिप्स के एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया, जिससे यूरोप में चिप्स की भारी कमी हो गई। इसका सबसे बड़ा नुकसान यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री को हो रहा है, जो पहले से ही टैरिफ, माँग में कमी और चीन की इलेक्ट्रिक कार कंपनियों से हो रही कड़ी प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है। नेक्सपीरिया की चिप्स न मिलने से उत्पादन रुकने की नौबत आ गई है।
यह सिर्फ एक उदाहरण है कि कैसे ट्रम्प की एकतरफा नीतियाँ पूरी दुनिया के लिए व्यापारिक अस्थिरता पैदा कर रही हैं। अमेरिका की चीन और रूस विरोधी नीतियों का सीधा खामियाजा उसके सहयोगी देशों, खासकर यूरोप को भुगतना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, ट्रम्प ने रूसी तेल और गैस की खरीद पर भी प्रतिबंध लगाने का दबाव डाला है, जिससे ऊर्जा के लिए रूस पर निर्भर यूरोप को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में राजू दास ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)


