रवीश को ये भी बताना था कि दिल्ली की पूरी जीडीपी का कितना प्रतिशत शिक्षा को जा रहा है। वो बताएँगे तो पता चल जाएगा कि यह 2 प्रतिशत से कम है, लेकिन रवीश यह नहीं बताएँगे।
जिन NDTV के लिए पसीना बहा कर प्रोपेगेंडा फैलाते-फैलाते बाल सफ़ेद कर दिए, अब उसी NDTV ने रवीश के ब्लॉग को वेबसाइट पर एक कोने में छोटी सी जगह में ढकेल दिया है। क्या रवीश के शो की गिरती TRP के कारण उन्हें अपने ही संस्थान में किनारे किया जा रहा है? दुःखद। निंदनीय।
बजट आ चुका है और स्टूडियो में चर्चा हो रही है। रात में प्राइम टाइम भी होगा जब बजट पर विश्लेषण होगा। हमारे पास रवीश कुमार के बजट की लीक हुई स्क्रिप्ट आ गई है जिसे हमने इस बार न्यूज़लौंडी के झबरा कुत्ते से सुँघवा कर सत्यापित किया है।
मैं इस बजट को सांप्रदायिक मानता हूँ। यकीन मानिए आज इस बजट के दौरान गाँधी जी होते तो इसे पास नहीं होने देते। बजट तो हर साल आता है, जाता है, लेकिन अल्पसंख्यक के मुद्दे पर सभी चुप्पी साध लेते हैं। अंत में सवाल यही कि क्या इस बजट के पैसे से गरीब का पेट भर जाता है?
आम तौर पर आप देखेंगे कि पुलवामा में 40 सीआरपीएफ जवानों को उड़ाने वाले आदिल अहमद डार जैसे आदमी के साथ भी रवीश जैसा मीडिया एक अलग तरीके से ट्रीटमेंट करता है।
सत्यान्वेषी पत्रकार रवीश कालजयी मुस्कान लेकर जरा देर से अपने प्राइम टाइम में आए लेकिन इससे पहले ही उनकी घातक टुकड़ियों के सिपहसालार ध्रुव राठी से लेकर शेहला रशीद और स्वरा भास्कर ट्विटर पर गोडसे और गो** में तालमेल बैठाते नजर आए।
दीपक चौरसिया और रवीश कुमार दोनों ही वरिष्ठ पत्रकार हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि दोनों की सैलरी अलग-अलग जगह से आती है। लेकिन हैं दोनों ही पत्रकार। शायद शाहीन बाग वाले इस बात को समझ नहीं पाए। तभी एक तरफ वो रवीश के साथ याराना रखते हैं जबकि दीपक चौरसिया के साथ मारपीट की जाती है।
रवीश ने कही, इमरान ने सुनी। रवीश की सलाह इमरान ने मानी। अब इमरान ख़ान न अख़बार पढ़ेंगे और न ही टीवी देखेंगे। उन्होंने न्यूज़ शो देखना बंद कर दिया है। रवीश लगातार अपने 'प्राइम टाइम' में कहते हैं कि टीवी न देखें और अख़बार न पढ़ें। उन्हीं अख़बारों की ख़बर वो शेयर भी करते हैं।