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‘पोर्टल में गंभीर खामियाँ, दिख रही गोपनीय जानकारी’: री-एग्जाम से पहले सवालों में NEET, दुबई के छात्र के सुझावों को NTA-IIT ने माना; पढ़ें- मध्यम वर्ग के लिए क्यों चुनौती है ये सिस्टम

NEET, JEE जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएँ केवल एक परीक्षा नहीं होतीं, बल्कि लाखों छात्र-छात्राओं और उनके परिवारों के सपनों, संघर्षों और वर्षों की मेहनत का परिणाम होती हैं। ये दोनों परीक्षाएँ भारत में मेडिकल और इंजीनियरिंग में एडमिशन तय करती हैं।

मध्यमवर्गीय परिवार में परीक्षा सिर्फ छात्र नहीं दे रहा होता, पूरा परिवार देता है। ऐसे में जब दुबई के छात्र रेनेल अनिल ने परीक्षा व्यवस्था में खामियों और छात्रों से जुड़े मुद्दों की ओर राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी यानी NTA का ध्यान खींचा और बताया कि क्या-क्या परीक्षा प्रणाली में दिक्कतें हैं, तो उनकी बातों को गंभीरता से लिया गया। इतना ही नहीं एनटीए के साथ साथ आईआईटी संस्थानों ने भी उनके सहयोग के लिए आभार जताया।

क्या किया 12वीं में पढ़ने वाले अनिल ने

दुबई में रहने वाले 12वीं क्लास के CBSE स्टूडेंट अनिल ने JEE एडवांस्ड और NEET के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की जाँच की। दोनों पोर्टल्स में गंभीर कमियाँ मिलने के बाद उसने अपनी जानकारी भारत की नेशनल साइबरसिक्योरिटी रिस्पॉन्स टीम यानी CERT-In को दी और फिर जो कुछ भी पता चला था, उसे X पर शेयर किया।

गल्फ न्यूज के मुताबिक उसने बताया, “दोनों प्लेटफॉर्म्स में घुसने में मुझे लगभग तीन से चार घंटे लगे। ऐसा करने के बाद, मैंने CERT-In को कमियों के बारे में बताया और फिर X (ट्विटर) पर इसके बारे में पोस्ट किया। इसी तरह लोगों को इसके बारे में पता चला।”

अनिल ने कहा कि उसने माता-पिता को भी कोई बात नहीं बताई थी। उन्हें भी हैकर की हेडलाइन से पता चला। उसके मुताबिक, पिता का बैकग्राउंड टेक का है, इसलिए उन्हें सब समझ आ गया और उन्हें काफी गर्व हुआ।

अनिल को क्या पता चला?

अनिल ने दो अलग-अलग तरह की कमियाँ पाई। JEE एडवांस्ड 2026 के मामले में समस्या पब्लिकली एक्सेस किए जा सकने वाले क्लाउड स्टोरेज के गलत कॉन्फ़िगरेशन की थी। बिना किसी ऑथेंटिकेशन के, बड़ी संख्या में उम्मीदवारों का डेटा ओपन था। इसमें 179600 रिजल्ट रिकॉर्ड और 187300 एडमिट-कार्ड PDF शामिल थे, जिनमें उम्मीदवारों के नाम, जन्म तिथि और मोबाइल नंबर मौजूद थे।

अनिल ने बताया, ” उन्होंने सभी रिजल्ट और एडमिट कार्ड एक ही सर्वर पर स्टोर किए थे, और उस सर्वर के सेटअप में ही गड़बड़ी थी। उसी गड़बड़ी का फायदा उठाकर वह सारा डेटा एक्सेस और हासिल कर पाया।”

NEET सिस्टम में एक अलग की समस्या थी। इसके सुपर-एडमिन पोर्टल पर बहुत कमजोर क्रेडेंशियल (लॉगिन जानकारी) का इस्तेमाल किया गया था। अनिल के मुताबिक, इन कमियों का फायदा उठाकर वह न सिर्फ छात्रों की गोपनीय जानकारी देख सकता था, बल्कि उनके माता-पिता के बारे में जानकारी ले सकता था।

अनिल ने अपनी खोज की जानकारी देते समय काफी सावधानी बरती। उन्होंने सार्वजनिक पोस्ट में निजी जानकारी और तस्वीरों को हटा दिया और बताया कि JEE के किसी भी उम्मीदवार का पूरा डेटा लीक नहीं हुआ था। उन्होंने केवल पुष्टि करने के मकसद से कुछ फाइलें डाउनलोड कीं और बाद में उन्हें डिलीट कर दिया।

CBSE की खामी को भी उजागर किया

अनिल ने न सिर्फ NEET और JEE को कमियों की जानकारी दी, बल्कि सीबीएसई का ऑनमार्क मूल्यांकन पॉर्टल की कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया। निसर्गा नाम के एक दूसरे एथिकल हैकर के साथ काम करते हुए, उन्होंने सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली और ऑनमार्क मूल्यांकन पोर्टल में खामी की पहचान की।

ये खामी बोर्ड परीक्षा के प्रश्न पत्रों को जाँचने से जुड़ा है। उन्होंने पाया कि कॉपी चेक करने वाले जाँचकर्ताओं के ईमेल, यूजर्स नाम, पासवर्ड, फोन नंबर, संस्थान विवरण और विषय आवंटन सभी अंदर घुसते ही मिल गए। अपने एक्सेस की वजह से वे इवैल्यूएटर अकाउंट्स तक पहुँच पाए, जहाँ स्कैन की गई आंसर स्क्रिप्ट और लाइव मार्किंग इंटरफेस उपलब्ध थे। उन्होंने इसकी जानकारी तुरंत CERT-In को दी। इसके बाद पोर्टल को ठीक करके ऑफलाइन कर दिया गया।

IITs, NTA ने तुरंत लिया संज्ञान

पोर्टल में कमियाँ उजागर होने के बाद अधिकारियों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, जिसकी अनिल ने तारीफ की। उनका कहना है कि IITs और NTA के आईटी स्टाफ ने अनिल से संपर्क करके उन्हें धन्यवाद दिया, और तकनीकी जानकारी माँगी। उन्होंने खामियों को दुरुस्त करने के लिए कदम उठाए। IIT रुड़की ने X पर सार्वजनिक रूप से इस खामी को स्वीकार किया।

अनिल ने कहा, “अब तक प्रतिक्रिया तारीफ़ करने वाली रही है। वे अब समस्याओं को हल करने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है कि वे बात सुनने के लिए तैयार हैं और समस्याओं को तेजी से हल भी कर रहे हैं।”

इसके बाद कई IITs (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी) ने X पर आधिकारिक बयान जारी किए, जिनमें कहा गया कि उन्होंने उन उम्मीदवारों की मदद के लिए आपातकालीन तकनीकी सुधार किए जो अपने एडमिट कार्ड तक नहीं पहुँच पा रहे थे। इन सुधारों के कारण क्लाउड स्टोरेज सिस्टम में थोड़ी देर के लिए मामूली मिसकॉन्फिगरेशन हो गया था।

इसकी जानकारी भी अनिल ने ही दी। उन्होंने गलत कॉन्फिगरेशन की पहचान की और बताया कि वे संबंधित डेटाबेस को एक्सेस कर सकते हैं। इस समस्या को तुरंत ठीक कर दिया गया और डेटा तक एक्सेस को सीमित कर दिया गया।

अनिल अकेले ऐसे हैकर नहीं हैं। वह भारत में युवा एथिकल हैकर्स के एक छोटे लेकिन बढ़ते हुए नेटवर्क का हिस्सा हैं, जो देश के एजुकेशन टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बारीक नजर रखे हुए हैं। अनिल का कहना है कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और मेटा जैसी बड़ी कंपनियाँ कमियों का पहले से पता लगाने के लिए एथिकल हैकर्स को काम पर रखती हैं, उसी तरह भारत सरकार को चाहिए कि गलत हैकर्स के वहाँ तक पहुँचने से पहले बड़े प्लेटफॉर्म्स की कमियों को दूर करने के लिए वे एथिकल हैकर्स की मदद लें, ताकि सभी परीक्षाएँ निष्पक्ष और त्रुटिहीन हो सके।

इसमें कोई बदमाश हैकर सेंध लगा कर नुकसान न पहुँचा सके। पेपर लीक जैसी घटनाएँ न हो और रिएक्जाम का दंश छात्रों को न सहना पड़े।

NEET परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के विवाद के बाद NTA ने NEET UG 2026 परीक्षा रद्द की। इसके प्रश्न पत्र बनाने वाले कथित शिक्षकों से पूछताछ हो रही है। कई शहरों के तार इससे जुड़े हैं। ऐसा भी कहा जा रहा है कि 2025 में भी पेपर लीक हुए थे, इसकी जाँच भी की जा रही है। 2024 में पेपर लीक को लेकर काफी हँगामा हुआ था यानी यह एक बार की बात नहीं है। इससे परीक्षा की विश्वसनीयता खतरे में है। अब पोर्टल की ये कमी सामने आई है। एनटीए को ऐसी डिजिटल कमियों से भी जल्द से जल्द निपटना होगा।

अभी तक एनटीए ने क्या-क्या कदम उठाए हैं

NEET UG 2026 के रिएक्जाम को लेकर NTA ने इस बार परीक्षा की सुरक्षा, पारदर्शिता और छात्र-छात्राओं की सुविधाओं को लेकर कई बड़े कदम उठाए हैं। इनमें से अधिकांश कदम पेपर लीक विवाद और छात्रों की शिकायतों के बाद लागू किए गए हैं। 21 जून को होने वाली NEET UG 2026 की परीक्षा अवधि बढ़ाकर 195 मिनट (3 घंटे 15 मिनट) कर दी है। इससे छात्रों को प्रश्न हल करने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा।

क्वेश्चन पेपर को दोबारा डिजाइन किया गया है ताकि पढ़ने और उत्तर देने में आसानी हो। साथ ही रफ वर्क के लिए अधिक जगह भी दी गई है। फर्जी अभ्यर्थियों और डुप्लीकेट आवेदन रोकने के लिए आवेदन प्रक्रिया में Aadhaar e-KYC और Live Photo Capture अनिवार्य किया गया है। परीक्षा केंद्रों पर कई स्तर की सुरक्षा लागू की है, जिसमें बायोमेट्रिक सत्यापन, कड़ी जाँच, CCTV निगरानी और दूसरे सुरक्षा प्रोटोकॉल शामिल हैं। CCTV फुटेज को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाएगा।

देशभर में परीक्षा कर्मियों और केंद्र कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया, ताकि किसी भी स्तर पर लापरवाही न हो। सोशल मीडिया पर निगरानी रखी जा रही है। Telegram पर पेपर लीक की खबरों को देखते हुए इसपर अस्थायी प्रतिबंध 22 जून 2026 तक लगाया गया है। इसके अलावा Telegram के मैसेज-एडिटिंग फीचर को 30 जून 2026 तक बंद करने का निर्देश दिया गया है। NTA का कहना है कि पहले इस फीचर का इस्तेमाल कथित पेपर लीक के फर्जी सबूत बनाने और छात्रों को गुमराह करने के लिए किया गया था।

इस सब कवायद के बीच अहमदाबाद में बिहार के एक 19 साल के युवक को गिरफ्तार किया गया है। उस पर NEET पोर्टल पर लगभग 150 NEET उम्मीदवारों के अकाउंट्स को गैर-कानूनी तरीके से एक्सेस करके, उन्हें मिलने वाला रिफंड का पैसा अपने बैंक अकाउंट में ट्रांसफर करने का आरोप है। उसने बताया है कि NEET-UG उम्मीदवारों के अकाउंट्स का अनधिकृत एक्सेस पाने के लिए सिक्योरिटी की कमियों और कमजोर पासवर्ड्स का फायदा उठाया।

अब सरकार और परीक्षा करवाने वाली NTA और IITs को इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। JEE की परीक्षाओं में नकल भी एक बड़ी समस्या माना जा रही है। JEE Advance 2026 के रिजल्ट में छात्रों के दोनों पाली के नंबरों में बड़े अंतर पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

मध्यम वर्ग की उम्मीदें और NEET-JEE का दबाव

ये परीक्षाएँ सिर्फ एक बच्चे के सपनों को उड़ान नहीं देता, बल्कि पूरा परिवार गर्व से सीना ऊँचा कर घूमता है। यही वजह है कि परीक्षा में अच्छा परफॉर्म नहीं करने पर कई छात्र-छात्राएँ डिप्रेशन में भी चले जाते हैं। ऐसी स्थिति भी समाज के लिए ठीक नहीं है। इसलिए छात्रों को विश्वास होना चाहिए कि उनके साथ ‘न्याय’ होगा। ऐसे न्याय के लिए तकनीकी खामियों को ठीक करना बेहद जरूरी है। सार्थक सुझाव और तथ्य आधारित संवाद व्यवस्था में सुधार ला सकते हैं। छात्रों को केवल परीक्षार्थी के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।

भारत में NEET-JEE की तैयारी करने वाले अधिकांश छात्र मध्यम वर्गीय या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं। लाखों परिवार अपने बच्चों के डॉक्टर बनने के सपने को पूरा करने के लिए बचत करते हैं। उससे कोचिंग, स्टडी मटेरियल्स, हॉस्टल, आने-जाने का खर्चा समेत दूसरे खर्चों की तैयारी वर्षों से करते हैं। माता-पिता अपनी निजी जरूरतों की बातें नहीं करते, उन्हें तो बस बच्चों के सपने को उड़ान देनी होती है, वे अपने अहम खर्चों में भी कटौती करने से नहीं हिचकते।

ऐसी परिस्थितियों में छात्रों को बेहतर परीक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और सुरक्षित परीक्षा केंद्र, समय पर जानकारी और मानसिक रूप से अनुकूल माहौल मिलना उनका अधिकार है। यदि परीक्षा प्रणाली में कोई कमी या अव्यवस्था होती है, तो उसका सबसे बड़ा बोझ उन्हीं छात्रों और परिवारों पर पड़ता है जिन्होंने वर्षों तक काफी मेहनत की है।

NEET जैसी परीक्षाओं की विश्वसनीयता केवल प्रश्नपत्र की गोपनीयता से तय नहीं होता, बल्कि छात्रों के अनुभव से तय होते हैं। इसलिए परीक्षा प्रक्रिया में की पारदर्शिता, सुरक्षित और सुविधाजनक परीक्षा केंद्र, शिकायतों का तुरंत समाधान करने की व्यवस्था जरूरी है।

अनिल जैसे छात्रों की कोशिश यह याद दिलाती है कि शिक्षा व्यवस्था तब बेहतर बनती है, जब छात्रों की आवाज को सम्मान दिया जाता है। आखिरकार जिन युवाओं के कंधों पर देश का भविष्य टिका हुआ है, उन्हें निष्पक्ष, पारदर्शी और छात्र-केंद्रित परीक्षा प्रणाली मिलनी ही चाहिए। NTA और IITs ने जिस तरह से अनिल की बातों को गंभीरता से लिया और सकारात्मक जवाब दिया, इससे पता चलता है कि ये संस्थाएँ अपने काम को लेकर बेहद संजीदा हैं और अपनी कमियों को सुनने के लिए भी तैयार हैं।

38 की उम्र में भी समय से आगे चल रहा है एक आदमी, जिसका नाम है- लियोनेल मेसी: FIFA World Cup 2026

कैनसस सिटी की उस रात, लगभग 69 हजार दर्शकों से भरे एरोहेड स्टेडियम में एक विश्व चैंपियन अपना अभियान शुरू करने उतरा था। लेकिन मैच खत्म होने तक चर्चा अर्जेंटीना की जीत की नहीं, उस आदमी की थी, जिसने दो दशकों से फुटबॉल को अपनी निजी कहानी बना रखा है।

16 जून 2026 की रात, जब अर्जेंटीना ने अल्जीरिया को 3-0 से हराया, तब स्कोरबोर्ड पर सिर्फ तीन गोल दर्ज हुए। इतिहास की किताबों में शायद इससे कहीं ज्यादा लिखा जाएगा। क्योंकि यह रात फिर एक बार लियोनेल मेसी (Lionel Messi) की थी।

एक स्टेडियम, जो अर्जेंटीना बन गया

अमेरिका के मिसौरी राज्य में स्थित एरोहेड स्टेडियम उस शाम किसी विदेशी मैदान की तरह नहीं लग रहा था। नीले-सफेद रंग की लहरें स्टैंड्स में इस तरह फैली थीं, मानो ब्यूनस आयर्स का कोई हिस्सा अटलांटिक पार कर यहाँ आ पहुँचा हो।

अल्जीरिया ने गेंद पर 52 प्रतिशत कब्जा रखा। आंकड़ों में देखने पर यह मुकाबला संतुलित लग सकता है। लेकिन फुटबॉल में कुछ आँकड़े झूठ बोलते हैं।

अल्जीरिया के शॉट्स ऑन टार्गेट: शून्य।
अर्जेंटीना के गोल: तीन।
और तीनों पर एक ही हस्ताक्षर: मेसी।

पहला गोल: जब समय पीछे लौट गया

17वें मिनट में रोड्रिगो डी पॉल ने लंबा पास डाला।

मेसी ने गेंद को नियंत्रित किया। तीन स्पर्श। एक नज़र। और फिर बॉक्स के बाहर से बाएँ पैर का ऐसा शॉट, जिसने हवा को चीरते हुए गोलपोस्ट का रास्ता चुना।

गोलकीपर लुका जिदान ने हाथ लगाया, लेकिन सिर्फ इतना कि गेंद की दिशा बदलने के बजाय उसकी सुंदरता बढ़ जाए। उस पल स्टेडियम में बैठे हजारों दर्शकों ने शायद एक साथ सोचा होगा: यह 2026 नहीं, 2012 का मेसी है। या शायद 2015 का।

या शायद वह मेसी, जो किसी कैलेंडर का मोहताज ही नहीं।

दूसरा गोल: महान खिलाड़ी सिर्फ सुंदर गोल नहीं करते

60वें मिनट में एलेक्सिस मैक एलिस्टर का शॉट आया। लुका जिदान ने बचाव किया। लेकिन महान खिलाड़ी वहीं होते हैं, जहाँ गेंद गिरती है।

रिबाउंड सीधे मेसी के पास पहुँचा और उन्होंने बिना किसी नाटक के गेंद को जाल में डाल दिया। यह वह गोल था, जो बताता है कि प्रतिभा सिर्फ कला नहीं, आदत भी होती है.. परफ़ेक्शन भी आदत होती है।

तीसरा गोल: और फिर कहानी पूरी हो गई

76वाँ मिनट। निकोलस गोंजालेज़ ने गेंद पीछे छोड़ी। बॉक्स के किनारे खड़े मेसी ने एक बार देखा और फिर बाएँ पैर से गेंद को डिफेंडरों के बीच से ऐसे निकाला, जैसे सुई धागे के बीच रास्ता बनाती है।

गेंद निचले कोने में गई। गोलकीपर स्थिर। डिफेंडर स्थिर। स्टेडियम विस्फोटित। हैट्रिक पूरी। और शायद फुटबॉल का सबसे पुराना सवाल भी; कि आखिर यह आदमी कब रुकेगा?

जिदान का बेटा और मेसी की कहानी

फुटबॉल कभी-कभी लेखकों से बेहतर पटकथाएँ लिखता है। अल्जीरिया के गोलपोस्ट के सामने खड़े थे Luca Zidane। उनके पिता Zinedine Zidane उस पीढ़ी के नायक थे, जिसने विश्व फुटबॉल पर राज किया। वहीं सामने खड़े थे मेसी।

दो युग एक ही फ्रेम में थे। और अंत में कहानी फिर उसी आदमी के नाम रही, जिसने लगभग हर युग को पार कर लिया है।

सिर्फ हैट्रिक नहीं, इतिहास भी

इस रात की सबसे बड़ी बात सिर्फ तीन गोल नहीं थे। यह मेसी का पहला विश्व कप हैट्रिक था।
यह उनका छठा विश्व कप है: पुरुष फुटबॉल के इतिहास में ऐसा करने वाले पहले खिलाड़ी।

उन्होंने विश्व कप में अपने गोलों की संख्या 16 तक पहुँचा दी और महान जर्मन स्ट्राइकर Miroslav Klose की बराबरी कर ली। 38 वर्ष की उम्र में विश्व कप हैट्रिक करने वाले सबसे उम्रदराज खिलाड़ी भी बन गए।

2006 में विश्व कप में पहला गोल।
2026 में विश्व कप में हैट्रिक।
बीच में 20 साल।
फुटबॉल के अधिकांश करियर शुरू होकर खत्म हो जाते हैं। लेकिन मेसी का अभी भी चल रहा है।

मगर अर्जेंटीना के लिए इसका क्या मतलब?

स्कोरलाइन कहती है कि अर्जेंटीना ने आसान जीत हासिल की। मैदान कहता है कि अर्जेंटीना अभी भी विश्व चैंपियन जैसी दिखती है। एनजो फर्नांडीज़, मैक एलिस्टर और डी पॉल के मिडफील्ड ने खेल को नियंत्रित रखा। अल्जीरिया ने बहादुरी दिखाई, लेकिन महरेज की टीम कोई वास्तविक खतरा पैदा नहीं कर सकी। और जब आपके पास मेसी जैसा खिलाड़ी हो, तो अकसर इतना ही काफी होता है।

आखिरी दृश्य

80वें मिनट में मेसी को मैदान से बाहर बुलाया गया। पूरा स्टेडियम खड़ा हो गया। तालियाँ गूँजती रहीं। कुछ खिलाड़ी करियर बनाते हैं। कुछ ट्रॉफियाँ जीतते हैं। कुछ रिकॉर्ड तोड़ते हैं।

और फिर कुछ दुर्लभ लोग होते हैं, जिनके लिए स्टेडियम खड़ा हो जाता है, क्योंकि दर्शकों को एहसास होता है कि वे सिर्फ मैच नहीं देख रहे। वे इतिहास को गुजरते हुए देख रहे हैं। 16 जून 2026 की रात, कैनसस सिटी में, फुटबॉल ने फिर याद दिलाया:

विश्व कप बदलते रहते हैं।
महान टीमें आती-जाती रहती हैं।
लेकिन मेसी की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है।

‘AI के दौर में भी मानवीय संवेदनाएँ पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत’: ऑपइंडिया की पूजा राणा को ‘उत्कृष्ट युवा पत्रकार’ का देवऋषि नारद सम्मान, इस साल 12 को मिले पुरस्कार

इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र की ओर से दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में रविवार (16 जून 2026) को देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले 12 पत्रकारों और कंटेन्ट क्रिएटर्स को नवाजा गया। इनमें ऑपइंडिया की वरिष्ठ सह संपादक पूजा राणा को ‘उत्कृष्ट युवा पत्रकार’ की श्रेणी में सम्मानित किया गया।

देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान 2026 से सम्मानित हुए पत्रकारों का चयन प्रक्रिया में निर्णायक मंडल में डीडी न्यूज की महानिदेशक ममता वर्मा, अमर उजाला समूह के वरिष्ठ सलाहकार संपादक राज किशोर, एनडीटीवी इंडिया के प्रबंध संपादक रोहित विश्वकर्मा, नेटवर्क 18 के समूह संपादक (कन्वर्जेंस) ब्रजेश कुमार सिंह, आईटीवी नेटवर्क की मैनेजिंग डायरेक्टर ऐश्वर्या पंडित और ब्लू क्राफ्ट फाउंडेशन के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट हरीश चंद्र बर्णवाल शामिल रहे। जूरी ने सभी प्रविष्टियों का मूल्यांकन करने के बाद 12 श्रेणियों के विजेताओं का चयन किया।

इन पत्रकारों को मिला सम्मान:

  • ऑपइंडिया की वरिष्ठ सह संपादक पूजा राणा को उत्कृष्ट युवा पत्रकार
  • नो द नेशन की संपादक गरिमा उप्रेती को उत्कृष्ट स्त्री सरोकार/महिला संवेदना पत्रकारिता
  • किसान तक की हिमानी दीवान को उत्कृष्ट ग्रामीण/पर्यावरण पत्रकारिता
  • द पेम्फलेट के प्रभात रंजन मिश्रा को उत्कृष्ट साहसिक पत्रकार
  • प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे को उत्कृष्ट डिजिटल पत्रकार
  • दैनिक जागरण के निहाल सिंह को उत्कृष्ट पत्रकार (प्रिंट)
  • पीटीआई वीडियो के डॉ. राम किंकर सिंह को उत्कृष्ट पत्रकार (टीवी)
  • शाश्वत पाणिग्राही को उत्कृष्ट स्तंभकार
  • हिंदुस्तान समाचार के संपादक रामानुज शर्मा को उत्कृष्ट अभिनव पत्रकार
  • पब्लिक मित्र के विमल त्यागी को उत्कृष्ट कंटेन्ट क्रिएटर (यूट्यूब)
  • मयंक बालियान को उत्कृष्ट कंटेन्ट क्रिएटर (एक्स)
  • मनोज्ञा तिवारी को उत्कृष्ट कंटेन्ट क्रिएटर (इंस्टाग्राम)

इस समारोह में एनडीटीवी के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ राहुल कंवल मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। अपने संबोधन में राहुल कंवल ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में भी पत्रकारिता की मूल भावना को कोई तकनीक प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि देवऋषि नारद की तरह पत्रकारों को लोगों के बीच जाकर उनकी बात सुननी चाहिए और घटनाओं के संदर्भ को समझना चाहिए। यही मानवीय संवेदनाएँ पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत हैं।

साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने मुख्य वक्ता के तौर पर कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों का दायित्व समाज की सच्चाई को सामने लाना है ताकि सकारात्मक और जागरूक समाज का निर्माण हो सके। उन्होंने पत्रकारों से अपील की कि वे हर समस्या को केवल राजनीतिक नजरिए से न देखें और खबरों के माध्यम से राष्ट्रीय हितों तथा मानवता के मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास करें।

इसके अलावा संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर, दिल्ली प्रांत प्रचारक विशाल और दिल्ली प्रांत सह कार्यवाह राजेश कुमार भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

PM सूर्य घर योजना में लखनऊ बना देश का नंबर-1 सोलर जिला, नागपुर-सूरत को पछाड़ा: समझें कई श्रेणियों में शीर्ष स्थान पाकर कैसे UP ने बनाया ऐतिहासिक कीर्तिमान

उत्तर प्रदेश ने सौर ऊर्जा (Solar Energy) के क्षेत्र में एक ऐसी ऐतिहासिक छलांग लगाई है, जिसने पूरे देश को हैरान कर दिया है। नई दिल्ली में आयोजित पीएम सूर्य घर पुरस्कार समारोह में उत्तर प्रदेश ने विभिन्न श्रेणियों में शीर्ष स्थान हासिल कर अपना परचम लहराया है। इस गौरवशाली उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश अब सिर्फ आबादी में ही नहीं, बल्कि क्लीन और ग्रीन एनर्जी के मामले में भी देश का अगुआ बन चुका है।

लखनऊ ने नागपुर और सूरत को पछाड़ा

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर राज्य की राजधानी लखनऊ से आई है। जिला स्तर पर सोलर इंस्टॉलेशन (Solar Installation) के मामले में लखनऊ ने पूरे देश में पहला स्थान प्राप्त किया है। कभी देश की सोलर कैपिटल कहे जाने वाले गुजरात के सूरत और महाराष्ट्र के नागपुर जैसे बड़े औद्योगिक शहरों को पीछे छोड़ते हुए लखनऊ देश का नंबर वन सोलर डिस्ट्रिक्ट बन गया है।

आधिकारिक पोर्टल के ताजे आँकड़ों के मुताबिक, लखनऊ में कुल 1,52,041 आवेदन आए, जिनमें से रिकॉर्ड 1,07,755 सोलर इंस्टॉलेशन पूरे किए जा चुके हैं। इस शानदार काम की बदौलत लखनऊ में 381.87 MW की भारी-भरकम सोलर क्षमता स्थापित हुई है, और जनता को 72,794.87 लाख रुपए की सब्सिडी जारी की जा चुकी है।

इस रेस में दूसरे नंबर पर रहे नागपुर में 92,483 इंस्टॉलेशन हुए, जबकि तीसरे पायदान पर खिसके गुजरात के सूरत शहर में 1,26,491 आवेदनों में से 87,748 घरों पर ही सोलर पैनल लग पाए, जिसकी क्षमता 334.93 MW दर्ज की गई है।

विभिन्न श्रेणियों में उत्तर प्रदेश ने मारी बाजी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी ‘पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ के तहत उत्तर प्रदेश ने राष्ट्रीय स्तर पर कई बड़े पुरस्कार अपने नाम किए हैं। राज्यवार वेरी हाई कंज्यूमर बेस (Very High Consumer Base) श्रेणी में उत्तर प्रदेश को देश भर में पहला स्थान मिला है। इसके साथ ही सर्वाधिक उपभोक्ता आवेदन (Maximum Consumer Applications), सबसे ज्यादा सोलर इंस्टॉलेशन और अधिकतम वेंडर रजिस्ट्रेशन (Maximum Vendor Registration) जैसी बेहद महत्वपूर्ण श्रेणियों में भी यूपी ने देश के सभी राज्यों को पछाड़कर पहला पायदान कब्जाया है। बता दें कि यूपी सरकार बुंदेलखंड को सोलर एनर्जी का हब बना रही है, जिससे पूरे बुंदेलखंड की खाली पड़ी जमीनों का अच्छा इस्तेमाल भी हो रहा है।

हालाँकि अगर कुल राज्यवार इंस्टॉलेशन की बात करें, तो उत्तर प्रदेश ने ‘टॉप थ्री स्टेट इंस्टॉलेशन’ श्रेणी में देश में तीसरा स्थान हासिल किया है, जबकि इस सूची में गुजरात पहले नंबर पर बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की यह कामयाबी राज्य के शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में सौर ऊर्जा के प्रति लोगों की तेजी से बढ़ती जागरूकता और सरकारी तंत्र के प्रभावी क्रियान्वयन का जीता-जागता सबूत है।

पीएम और सीएम की जोड़ी के विजन से हुआ यह चमत्कार

उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने इस शानदार कामयाबी पर बेहद खुशी जताई और इसका पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कुशल नेतृत्व को दिया। उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक मुकाम उत्तर प्रदेश के निवासियों, ऊर्जा विभाग के अधिकारियों, बिजली कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों के सामूहिक और दिन-रात के कठिन परिश्रम का परिणाम है।

ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने कहा, “उत्तर प्रदेश आज देश के भीतर सौर ऊर्जा क्रांति का सबसे बड़ा अग्रदूत बनकर उभरा है। सौर ऊर्जा न सिर्फ हमारे राज्य के आम नागरिकों को प्रदूषण मुक्त और बेहद सस्ती बिजली उपलब्ध करा रही है, बल्कि यह ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक बहुत बड़ा कदम है। राज्य सरकार भविष्य में भी सौर ऊर्जा को हर घर तक पहुँचाने के लिए अपनी योजनाओं को और तेज करेगी।”

उत्तर प्रदेश और गुजरात के कुछ अन्य जिलों का तुलनात्मक प्रदर्शन

अगर हम दोनों राज्यों के कुछ अन्य प्रमुख जिलों के प्रदर्शन पर नजर डालें, तो स्थिति बेहद दिलचस्प नजर आती है-

गुजरात का प्रदर्शन: सूरत के अलावा राजकोट में 1,00,920 आवेदन आए और 76,444 इंस्टॉलेशन किए गए। वहीं पाटन में 13,605, साबरकांठा में 22,338 और सुरेंद्रनगर में 16,310 घरों को सौर ऊर्जा से कवर किया गया है।

पीएम सूर्य योजना के ताजा आधिकारिक आँकड़े

उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन: लखनऊ के अलावा राज्य के अन्य जिलों में भी काम तेजी से चल रहा है। मथुरा में 6,321, खीरी में 6,990, ललितपुर में 3,872, मैनपुरी में 2,636 और महाराजगंज में 2,762 इंस्टॉलेशन पूरे किए जा चुके हैं।

पीएम सूर्य योजना के ताजा आधिकारिक आँकड़े

क्यों गेमचेंजर साबित हो रही है यह योजना?

‘पीएम सूर्य घर योजना’ उत्तर प्रदेश के आम परिवारों के लिए एक वरदान साबित हो रही है। इस योजना के तहत घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने के लिए सरकार की तरफ से भारी सब्सिडी दी जा रही है। इससे न सिर्फ आम आदमी का बिजली बिल शून्य (जीरो) हो रहा है, बल्कि लोग अपनी जरूरत से ज्यादा पैदा होने वाली बिजली को वापस ग्रिड को बेचकर हर महीने कमाई भी कर रहे हैं। लखनऊ के नंबर वन बनने की सबसे बड़ी वजह यही है कि यहाँ के लोगों ने इस आर्थिक और पर्यावरणीय फायदे को बहुत जल्दी अपनाया और सरकारी विभागों ने भी वेंडर रजिस्ट्रेशन को आसान बनाकर काम में जरा भी ढील नहीं दी।

अमेरिका-ईरान शांति समझौते से भारत को फायदा ही फायदा, कच्चे तेल की कम कीमतों से मिलेगी महँगाई से राहत-मजबूत होगा रुपया: समझें विकास की पटरी पर कैसे बढ़ेगी इकोनॉमी की रफ्तार

अमेरिका और ईरान के बीच हुआ ऐतिहासिक शांति समझौता (US–Iran Preliminary Peace Accord) न केवल मध्य पूर्व (West Asia) के लिए, बल्कि पूरी दुनिया और विशेष रूप से भारत के लिए एक बहुत बड़ी राहत लेकर आया है। मार्च 2026 में शुरू हुए इस युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz – हॉर्मुज जलडमरूमध्य) को बंद किए जाने से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छूने लगी थीं, जिससे भारत में महँगाई और आर्थिक मंदी का खतरा मंडराने लगा था।

अब इस शांति समझौते के बाद भारत के नीति-निर्माताओं और आम जनता ने राहत की सांस ली है। आइए बहुत ही सरल शब्दों में गहराई से समझते हैं कि इस ऐतिहासिक पीस डील का भारत की अर्थव्यवस्था, कूटनीति और आम आदमी की जेब पर क्या असर पड़ेगा।

कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट से आम जनता को सबसे बड़ी राहत

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% से 88% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। जब मार्च में युद्ध शुरू हुआ, तो ब्रेंट क्रूड (कच्चा तेल) की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार चली गई थीं। लेकिन जैसे ही 15 जून 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा शांति समझौते की घोषणा की गई, तेल बाजारों में नरमी आ गई।

पेट्रोल-डीजल के दाम होंगे कम: इस डील के बाद कच्चे तेल के दाम तेजी से गिरकर $75-$80 प्रति बैरल के दायरे में आने की उम्मीद है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होगा, तो भारत में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ी कटौती देखने को मिलेगी।

महँगाई (Inflation) पर लगेगी लगाम: भारत में माल ढुलाई (Transport) पूरी तरह डीजल पर निर्भर है। तेल सस्ता होने से ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट कम होगी, जिससे फल, सब्जियाँ, राशन और रोजमर्रा के सामानों की कीमतें नीचे आएँगी।

कंपनियों की चाँदी: विमानन कंपनियाँ (जैसे इंडिगो), पेंट उद्योग, टायर निर्माता और केमिकल कंपनियों की लागत बहुत कम हो जाएगी, क्योंकि इन सभी उद्योगों में कच्चे तेल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का खुलने से सप्लाई चेन होगी सुरक्षित

भारत के लिए इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का दोबारा पूरी तरह से खुलना है। यह समुद्र का एक ऐसा संकरा रास्ता है जहां से दुनिया का 20% और भारत का लगभग आधा कच्चा तेल, एलपीजी (LPG) और एलएनजी (LNG) गुजरता है।

युद्ध के दौरान जब ईरान ने इस रास्ते की नाकेबंदी कर दी थी, तब भारत में घरेलू गैस (LPG) के सिलेंडर महँगे हो गए थे। अब यह रास्ता पूरी तरह सुरक्षित और टोल-फ्री हो गया है। इससे जहाजों को लंबा रास्ता तय नहीं करना पड़ेगा, जिससे शिपिंग का भाड़ा (Freight Cost) और समुद्री बीमा (Insurance Premium) बहुत कम हो जाएगा। इसका सीधा फायदा यह होगा कि भारत में खाद्यान्न, ऊर्जा और अन्य जरूरी सामानों की सप्लाई चेन बिना किसी रुकावट के सुचारू रूप से चलेगी।

भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपए को मजबूती

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत को तेल खरीदने के लिए बहुत ज्यादा अमेरिकी डॉलर चुकाने पड़ते हैं। इससे भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) बढ़ जाता है और डॉलर की माँग बढ़ने के कारण भारतीय रुपया कमजोर होने लगता है।

अर्थशास्त्र का सीधा गणित कहता है कि कच्चे तेल की कीमत में हर $10 की गिरावट से भारत के आयात बिल में सालाना लगभग 1.5 से 2 लाख करोड़ रुपये की बचत होती है।

इस पीस डील से डॉलर की माँग घटेगी, जिससे भारतीय रुपया मजबूत होगा। शांति समझौते की खबर आते ही रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर 94.67 के स्तर पर आ गया और आने वाले दिनों में इसके और मजबूत होने की उम्मीद है।

शेयर बाजार में बूम और ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद

युद्ध की अनिश्चितता के कारण भारतीय शेयर बाजार (Sensex और Nifty) पर जो दबाव बना हुआ था, वह अब पूरी तरह खत्म हो गया है। डील की पुष्टि होते ही भारतीय बाजारों ने शानदार बढ़त के साथ वापसी की है।

इसके अलावा, महँगाई कम होने से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरों में कटौती (Rate Cuts) करने का रास्ता साफ हो गया है। ऐसी उम्मीद है कि साल 2026 की दूसरी छमाही में आरबीआई ब्याज दरें घटा सकता है। ब्याज दरें घटने से आम आदमी के लिए होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई (EMI) सस्ती हो जाएगी।

भारत को होने वाले 5 बड़े कूटनीतिक और आर्थिक फायदे

इस शांति समझौते से भारत को न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक मोर्चे पर भी कई बड़े फायदे होने जा रहे हैं-

चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) को मिलेगी नई जिंदगी: भारत ने मध्य एशिया और यूरोप तक पहुँचने के लिए ईरान में चाबहार बंदरगाह को विकसित किया है। अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से यह प्रोजेक्ट कई बार सुस्त पड़ जाता था। अब अमेरिका और ईरान के बीच रिश्ते सामान्य होने से भारत बिना किसी हिचकिचाहट के चाबहार बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान और रूस तक अपना व्यापारिक नेटवर्क (INSTC – उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा) मजबूत कर सकेगा।

किसानों के लिए सस्ती खाद: भारत अपनी कृषि के लिए खाड़ी देशों (Gulf Countries) से भारी मात्रा में उर्वरक और उसके कच्चे माल का आयात करता है। युद्ध के कारण खाद की सप्लाई प्रभावित हो रही थी, जिससे भारत में खेती की लागत बढ़ने का डर था। अब रास्ते साफ होने से खाद का आयात सस्ता और आसान होगा, जिससे सीधे तौर पर भारत के करोड़ों किसानों को फायदा पहुँचेगा।

खाड़ी में रहने वाले 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा: मध्य पूर्व या खाड़ी देशों में भारत के लगभग 1 करोड़ से अधिक नागरिक रहते हैं और काम करते हैं। वहाँ से आने वाला रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। युद्ध छिड़ने से इन प्रवासियों की सुरक्षा और नौकरियों पर खतरा मंडराने लगा था। इस समझौते से वहाँ शांति बहाल होगी, जिससे भारतीय प्रवासियों का रोजगार और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।

द्विपक्षीय व्यापार और निर्यात में सुधार: युद्ध की वजह से मार्च और अप्रैल के महीनों में खाड़ी देशों को होने वाले भारत के निर्यात में भारी गिरावट आई थी। भारत के इंजीनियरिंग सामान, कपड़ा (Textiles), रसायन और बासमती चावल का एक बड़ा बाजार मिडिल ईस्ट है। शांति स्थापित होने से भारतीय निर्यातकों के ऑर्डर फिर से बहाल होंगे और भारत का एक्सपोर्ट बिजनेस तेजी से बढ़ेगा।

कूटनीतिक संतुलन बनाने में मिली बड़ी कामयाबी

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती कूटनीतिक स्तर पर थी। भारत के अमेरिका और ईरान, दोनों के साथ बेहद मजबूत संबंध हैं। युद्ध की स्थिति में भारत पर अमेरिका की तरफ से ईरान के खिलाफ जाने और रूस से तेल न खरीदने का भारी दबाव था। इस समझौते ने भारत को उस सैंडविच’ स्थिति से बाहर निकाल लिया है। अब भारत बिना किसी वैश्विक दबाव के अपनी मर्जी से ईरान, रूस और अमेरिका के साथ संतुलित रणनीतिक साझेदारी बढ़ा सकता है।

कुल मिलाकर अमेरिका-ईरान शांति समझौता भारत के लिए हर मोर्चे पर एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ साबित होने जा रहा है। इससे न केवल भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा, बल्कि घरेलू बाजार में महँगाई कम होगी, शेयर बाजार को नई ऊँचाई मिलेगी और आम आदमी की जेब पर पड़ रहा बोझ भी काफी कम हो जाएगा। विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रहे देश के लिए साल 2026 की यह सबसे सकारात्मक वैश्विक खबर है।

‘ऐसा तो हर जगह होता है’ से ‘कॉम्प्रोमाइज करना होगा’ तक: कैसे सामान्य बनाया जाता रहा कास्टिंग काउच का मुद्दा? संचिता उगले की मौत के बाद फिर उठे सवाल

मनोरंजन की दुनिया हर दिन लाखों लोगों को सपने बेचती है। टीवी स्क्रीन पर दिखते चेहरे, रेड कार्पेट, सोशल मीडिया की चमक, इंटरव्यू, फैन फॉलोइंग और सफलता की कहानियाँ, ये सब मिलकर एक ऐसी दुनिया की तस्वीर बनाते हैं जहाँ पहुँच जाना ही मानो जीत माना जाता है। लेकिन हर चमक के पीछे एक ऐसा हिस्सा भी होता है जो कैमरे से बाहर रहता है।

वहाँ संघर्ष है, असुरक्षा है, लगातार तुलना है, और कई बार ऐसी परिस्थितियाँ भी जिनके बारे में लोग खुलकर बात नहीं करना चाहते। हाल में अभिनेत्री संचिता उगले की मौत की खबर सामने आने के बाद एक बार फिर मनोरंजन उद्योग के भीतर के दबावों पर चर्चा शुरू हुई।

इस घटना के बाद अभिनेत्री आँचल खुराना ने जो कहा, उसने बहस को एक ऐसे विषय की तरफ मोड़ दिया जो वर्षों से मौजूद है, मगर हर बार नई घटना के साथ फिर लौट आता है।

आँचल ने अपने वीडियो में कहा कि लोग सिर्फ पर्दे पर दिखने वाली मुस्कान देखते हैं, लेकिन कलाकारों के हिस्से का डर, लगातार रिजेक्शन, काम खोने की चिंता और पेशेवर दबाव नहीं देखते। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार कलाकारों को ऐसे फैसलों के सामने खड़ा कर दिया जाता है जहाँ आत्मसम्मान और अवसर एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं।

यहीं से चर्चा फिर उस शब्द तक पहुँचती है, जो दशकों से फिल्म और टीवी इंडस्ट्री के साथ जुड़ता रहा है- कास्टिंग काउच। एक ऐसा शब्द, जो सिर्फ फिल्मी गॉसिप नहीं बल्कि उन अनुभवों, आरोपों और बहसों का हिस्सा बन गया, जिनमें काम, पहचान और व्यक्तिगत सीमाओं के बीच की रेखाएँ धुंधली होने लगती हैं।

एक शब्द जिसने पर्दे के पीछे की दुनिया को नाम दिया

‘कास्टिंग काउच’ ऐसे बर्ताव को माना जाता है, जिसमें किसी को काम दिलाने के बदले उससे यौन संबंध बनाने की माँग की जाती है। आज कास्टिंग काउच शब्द बहुत सामान्य लगता है, लेकिन इसकी कहानी पुरानी है। इस शब्द का शुरुआती दर्ज इस्तेमाल 24 नवंबर 1937 को अमेरिकी मनोरंजन पत्रिका Variety में माना जाता है।

उस समय इसे ऐसे संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था जिससे संकेत मिलता था कि मनोरंजन उद्योग में काम के बदले निजी या यौन अपेक्षाएँ कोई अनजानी बात नहीं थीं।

इसके बाद 1956 में ब्रिटिश फिल्म मैगजीन Picturegoer ने चार हिस्सों की एक चर्चित रिपोर्ट प्रकाशित की- ‘The Perils of Show Business’। इसमें कई अभिनेत्रियों ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि कैसे करियर में तरक्की या एक मौके के लिए भी उन्हें डायरेक्टर और प्रोड्यूसर से यौन संबंध बनाने का वादा करना पड़ता था

Picturegoer पत्रिका ने 14 जुलाई, 1956 के अंक के कवर पेज पर फिल्म उद्योग की कास्टिंग काउच के बारे में अपनी चार-भाग वाली श्रृंखला की घोषणा की (फोटो साभार: slate)

जब चुप्पियाँ टूटनी शुरू हुईं

भारत में लंबे समय तक कास्टिंग काउच को फिल्मी अफवाह या इंडस्ट्री की खुली हुई सच्चाई की तरह देखा जाता रहा। 2005 में एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हुई। बाद के वर्षों में कई कलाकारों ने अपने अनुभव साझा किए।

फिर 2017–18 में हॉलीवुड निर्माता हार्वे वाइंस्टीन विवाद और उसके बाद शुरू हुए #MeToo आंदोलन ने दुनिया भर में माहौल बदल दिया। हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने #MeToo को सोशल मीडिया पर व्यापक रूप दिया और इसके बाद हजारों महिलाओं ने अपने अनुभव सार्वजनिक किए।

भारत में भी इस अभियान के दौरान कई महिलाएँ सामने आईं। इसी दौरान अभिनेत्री और फिल्म निर्देशक नीना गुप्ता ने अपनी आत्मकथा ‘सच कहूँ तो’ में भी मनोरंजन जगत की उन परिस्थितियों का जिक्र किया, जिनका सामना महिलाओं को अपने करियर के दौरान करना पड़ सकता है

सभी मामलों में एक समान बात दिखी- पद, पहचान या प्रभाव रखने वाले लोगों पर निजी सीमाएँ पार कर सेक्सुअल फेवर माँगने, कपड़े उतारकर पूरा फिगर दिखाने के आरोप।

किसी ने साथ सोने तो किसी ने ब्रेस्ट दिखाने को किया मजबूर

समय के साथ कई अभिनेत्रियों और कलाकारों ने सार्वजनिक रूप से अपने अनुभव साझा किए। अंकिता लोखंडे ने बताया था, “मेरे साथ बॉम्बे में ही कास्टिंग काउच हुआ था। मैंने साउथ फिल्म के लिए ऑडिशन दिया था। मुझे कॉल आया कि आप साइन करने आ जाओ। मैं बहुत खुश थी, मुझे भी डाउट था कि इतनी आसानी से कैसे हुआ?”

उन्होंने आगे कहा,  “जब मैं साइन करने गई तो मुझे सिर्फ अंदर बुलाया गया और मेरी कॉर्डिनेटर को रुकने को कहा गया। मुझे बोला गया- तुम्हें कॉम्प्रोमाइज करना होगा’ मैं उस समय सिर्फ 19 साल की थी। तभी मेरा हिरोइन बनने वाला फेज चल रहा था। मैंने पूछा कि कौन सा कॉम्प्रोमाइज करना होगा। तो उन्होंने कहा कि आपको प्रोड्यूसर के साथ सोना पड़ेगा।”

इसी तरह सुरवीन चावला ने बताया था कि जब वो टेलीविजन जगत में अपना करियर बनाने की कोशिश कर रही थीं तब भी उन्होंने मुंबई में अपनी पहली फिल्म की मीटिंग के दौरान कास्टिंग काउच को फेस किया था। इस घटना के बाद उन्हें खुद पर डाउट हो गया था। उनसे उनकी अपीयरेंस, वजन, कमर, छाती के साइज पर प्रश्न किए गए थे।

आराधना शर्मा ने बताया था कि कास्टिंग एजेंटों में से एक ने उनके साथ गंदी हरकत की। इस घटना ने उनको जिंदगी भर के लिए इतना डरा दिया कि उनको किसी पर भी विश्वास नहीं होता था। यहाँ तक कि वो अपने पिता के साथ भी अनकंफर्टेबल हो गई थीं।

मुस्कान वार्ष्णेय ने बताया कि जब वह 16 साल की थी तब उन्होंने ऑनलाइन इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्हें साड़ी पहनने के लिए बोला गया। और फिर ऑडिशन में उन्हें अचानक ब्लाउज उतारने को कहा गया। तब मुस्कान ने कहा कि वह सहज नहीं हैं। मुस्कान ने बताया कि एक ही व्यक्ति ने उन्हें बार-बार ऐसा करने को कहा।

सोनल वांगुलकर ने बताया था, साल 2018 में मुझे राजा बजाज के ऑफिस में एक रोल के लिए ऑडिशन के लिए बुलाया गया। राजा एक फेमस डायरेक्टर और फोटोग्राफर हैं। उस वक्त मैंने ऑडिशन दिया लेकिन पूरी तरह से तैयार न होने की वजह से मैं ठीक से डॉयलॉग बोल नहीं पाई। इसके बाद उन्होंने मुझे शूट में सहायता की ताकि मैं कुछ सीख पाऊँ।”

सोनल बताती हैं कि उन्हें पहले उस शूट का हिस्सा बनाया गया जिसकी वो हिस्सा नहीं थीं। बाद में उनसे कुछ कपड़े ट्राई करने को कहे गए। इस दौरान जबरन उनकी ब्रेस्ट पर क्रीम लगाई गई। उन्हें ये अजीब लगा और मन में डर बैठ गया। इसके बाद राजा ने उनके साथ भी घटिया हरकतें की।

उन्होंने कहा, “उसने मुझे कहा कि ये तंत्र विद्या मुझे उसके साथ बिना कपड़ों के करनी होगी। पूरी तरह से नग्न होकर मंत्र जाप करना होगा। मैं कुछ समझ पाती उससे पहले वो मेरी टीशर्ट उतारने लगा, लेकिन तब मैंने उसे धक्का देकर खुद को बचाया और वहाँ से भागने में कामयाब रही।”

शिव्या पठानिया ने कहा कि उनसे काम के बदले सेक्सुअल फेवर्स माँगे गए थे। इसी तरह मनीषा रानी ने बताया कि एक व्यक्ति ने खुद को बड़े शो से जुड़ा बताकर रात को उसके घर आने का दबाव बनाया। कनिष्का सोनी, प्रीती सूद और शालिनी पांडे जैसे कई नाम भी समय-समय पर अपने अनुभव साझा करते रहे हैं।

जब समझौते को सामान्य बताने वाले सरोज खान जैसे लोगों के बयान सामने आए

कास्टिंग काउच पर चर्चा जितनी पीड़ितों के अनुभवों से बनी, उतनी ही उन बयानों से भी बनी जिन्होंने लोगों को चौंकाया। 2018 में कोरियोग्राफर सरोज खान का बयान सबसे ज्यादा विवाद में आया। उन्होंने कहा था कि कास्टिंग काउच नई बात नहीं है और सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित नहीं है।

कोरियोग्राफर सरोज खान ने सांगली में एक न्यूज चैनल के कार्यक्रम में बॉलीवुड में कास्टिंग काउच होने की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि यह काम नया नहीं है। यह सदियों से चला आ रहा है। फिल्म इंडस्ट्री में दुष्कर्म के बाद लड़कियों को छोड़ नहीं दिया जाता, बल्कि उन्हें काम और रोजी-रोटी भी दी जाती है।

उनके समर्थन में कॉन्ग्रेस नेता रेणुका चौधरी ने कहा था कि ऐसी चीजें सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री नहीं बल्कि कई क्षेत्रों में मौजूद हैं और इसे कड़वी सच्चाई की तरह स्वीकार करना चाहिए।

दक्षिण भारतीय अभिनेता चिरंजीवी के एक बयान पर भी विवाद हुआ। उन्होंने कहा था, “ये एक बहुत अच्छी इंडस्ट्री है। अगर कुछ लोग यहाँ सफल नहीं हो पाए, या कुछ कहते हैं कि इंडस्ट्री में नकारात्मक लोग हैं, या किसी को बुरे अनुभव हुए हैं, तो मेरा मानना है कि इसके लिए कहीं न कहीं उनकी अपनी गलती भी होती है।”

उन्होंने आगे कहा, “अगर आप सख्त और गंभीर रहते हैं, तो कोई भी आपका गलत फायदा नहीं उठा सकता। तब कास्टिंग काउच जैसी कोई चीज नहीं होगी। ये आपके व्यवहार पर निर्भर करता है। आपकी असुरक्षा की वजह से आपको लग सकता है कि शायद ऐसे ही व्यवहार करना चाहिए। अगर आप प्रोफेशनल तरीके से पेश आते हैं, तो सामने वाला भी वैसा ही व्यवहार करेगा। ये इंडस्ट्री एक आईने की तरह है- आप जैसा दिखाते हैं, वही वापस दिखता है।”

कास्टिंग काउच पर राखी सावंत ने भी अजीबो-गरीब बयान दिया था। राखी ने अपने फिल्म इंड्रस्टी के शुरुआती दिनों के अनुभवों को साझा करते हुए कहा था, “मैंने भी कास्टिंग काउच का सामना कर के आगे बढ़ी हूँ। राखी सावंत ने कहा है कि बॉलीवुड में कास्टिंग काउच होता है, लेकिन यहाँ यह पूरी तरह इच्छा पर निर्भर है और कोई किसी का बलात्कार नहीं करता।”

राखी ने कहा कि उनकी पहचान की कई लड़कियों ने काम के लिए खुद को प्रोड्यूसर के आगे सौंप दिया, तो इसके लिए प्रोड्यूसर पर इलजाम नहीं लगाया जा सकता। इन बयानों ने एक बड़ा सवाल पैदा किया कि अगर किसी समस्या को ‘ऐसा तो हर जगह होता है’ कहकर सामान्य बना दिया जाए, तो क्या उससे समस्या कम होती है या उसकी गंभीरता हल्की पड़ जाती है?

यह कहानी सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं रही

कास्टिंग काउच की चर्चा अक्सर महिलाओं के संदर्भ में होती है, लेकिन कई पुरुष कलाकारों ने भी ऐसे अनुभव साझा किए हैं। टीवी अभिनेता अंकित सिवाच ने बताया कि वह भी कास्टिंग काउच का सामना कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि उनसे न्यूड फोटोज माँगे गए थे।

अंकित ने आगे बताया, “मुझसे ऐसी पार्टियों में आने के लिए कहा जाता था, जिसमें ​मेरा कोई काम ही नहीं होता था। यह एक तरह से प्रताड़ना थी, क्योंकि मैं इसके लिए तैयार नहीं था।”

इसके अलावा हैदराबाद के मॉडल कृष्णा मोनाला ने कास्टिंग काउच के बारे में बयान दिया था कि कुछ निर्देशकों ने उन्हें अपने साथ सोने के लिए कहा। वे अकेले ऐसे एक्टर नहीं, इससे पहले गायक सोनू निगम ने भी एक पत्रकार पर फिजिकल रिलेशन बनाने की कोशिश का आरोप लगाया था।

प्रियंका चोपड़ा ने भी एक बातचीत में कहा था कि पुरुष कलाकार भी कई बार ऐसे दबावों का सामना करते हैं, हालाँकि वे कम बोलते हैं। इससे एक और परत सामने आती है- शोषण हमेशा एक ही दिशा में नहीं होता, लेकिन शिकायत करने में डर लगभग हर जगह समान दिखता है।

निष्कर्ष: कास्टिंग काउच सिर्फ उस मानसिकता का सवाल है जो शोषण को सामान्य बनाती है

जब प्रभावशाली लोग यह कहते हैं कि ‘ऐसा तो हर जगह होता है’, ‘ये नया नहीं है’, ‘कोई मजबूर नहीं करता’, ‘अगर आप सख्त रहें तो कुछ नहीं होगा’, तब समस्या सिर्फ एक बयान नहीं रह जाती, वह एक मानसिकता बन जाती है। ऐसी मानसिकता शोषण की जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर डाल देती है जो पहले से कमजोर स्थिति में है।

कास्टिंग काउच को बढ़ावा सिर्फ वे लोग नहीं देते जो सत्ता या मौके का गलत इस्तेमाल करते हैं, बल्कि वे बयान भी देते हैं जो इस समस्या को सामान्य या व्यक्तिगत चुनाव बताकर उसकी गंभीरता कम कर देते हैं। जब सरोज खान इसे ‘सदियों से चल रही चीज’ बताकर यह कहती हैं कि यह सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित नहीं है, तो सवाल उठता है कि क्या किसी समस्या का पुराना होना उसे स्वीकार करने का कारण बन सकता है।

इसी तरह जब चिरंजीवी यह कहते हैं कि अगर कोई प्रोफेशनल और सख्त रहे तो उसका गलत फायदा नहीं उठाया जा सकता, तो इससे जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर चली जाती है जो पहले से अवसर और दबाव के बीच खड़ा है। वहीं राखी सावंत का यह कहना कि यह इच्छा पर निर्भर है और इसके लिए पूरी तरह प्रोड्यूसर को दोष नहीं दिया जा सकता, शक्ति के असंतुलन और करियर के दबाव को नजरअंदाज करता दिखाई देता है।

यही मानसिकता कास्टिंग काउच को खत्म करने के बजाय उसे जगह देती है। क्योंकि जब प्रभावशाली लोग शोषण को मजबूरी, समझौता या सामान्य प्रक्रिया की तरह पेश करते हैं, तब शिकायत करना और भी मुश्किल हो जाता है। किसी भी पेशेवर क्षेत्र में काम का आधार प्रतिभा और योग्यता होनी चाहिए, न कि पावर, दबाव या निजी समझौते।

PM नरेंद्र मोदी के 4399 दिन: यात्रा एक ऐसे जननेता की, जिनके लिए राजनीति है राष्ट्रनिर्माण की साधना, सेवा का दायित्व

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में बुधवार (10 जून 2026) का दिन एक ऐतिहासिक दिवस के रूप में अंकित हो गया है। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने प्रधानमंत्री पद पर 4,399 लगातार दिन पूर्ण करते हुए भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने की गौरवपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की है। यह केवल एक रिकॉर्ड नहीं, यह भारत की जनता के अटूट विश्वास, लोकतंत्र की शक्ति और राष्ट्रसेवा में समर्पित एक जीवन की तपस्या का प्रतीक है।

भारत जैसे विशाल, विविध और जीवंत लोकतंत्र में जनविश्वास प्राप्त करना अपने आप में बड़ी बात है; लेकिन उस विश्वास को निरंतर बनाए रखना, उसे सेवा, परिश्रम और परिणामों से और मजबूत करते जाना असाधारण नेतृत्व की पहचान है। मोदी जी की यह यात्रा इसी असाधारण नेतृत्व की यात्रा है। यह यात्रा एक ऐसे जननेता की है, जिसने सत्ता को कभी अधिकार नहीं माना, बल्कि सेवा का दायित्व माना; जिसने राजनीति को कभी प्रतिष्ठा का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की साधना बनाया।

बीते वर्षों में भारत ने केवल सरकार बदलते नहीं देखी, भारत ने शासन की सोच बदलते देखी है। पहले योजनाएँ बनती थीं, अब योजनाएँ लोगों के जीवन तक पहुँचती हैं। पहले गरीब व्यवस्था के दरवाजे पर खड़ा रहता था, अब व्यवस्था गरीब के द्वार तक पहुँचती है। पहले विकास कुछ क्षेत्रों और कुछ वर्गों तक सीमित दिखता था, अब विकास का केंद्र अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति है।

मोदी जी के नेतृत्व में गरीब के जीवन में सम्मान आया है। करोड़ों परिवारों को पक्का घर मिला, माताओं-बहनों को धुएँ से मुक्ति मिली, शौचालयों ने गरिमा दी, बिजली ने घरों में उजाला किया, नल से जल ने सुविधा पहुँचाई, बैंक खातों ने गरीब को आर्थिक व्यवस्था से जोड़ा, आयुष्मान भारत ने स्वास्थ्य सुरक्षा का भरोसा दिया और मुफ्त राशन ने कठिन समय में गरीब के चूल्हे को जलाए रखा। यह केवल योजनाएँ नहीं हैं; यह उन परिवारों की आँखों में दिखने वाला विश्वास है, जो पहली बार महसूस कर रहे हैं कि सरकार सचमुच उनके साथ खड़ी है।

मोदी जी ने यह सिखाया है कि विकास तभी सार्थक है, जब वह गरीब के जीवन में परिवर्तन लाए। आँकड़े तभी महत्वपूर्ण हैं, जब वे किसी माँ की चिंता कम करें, किसी किसान को संबल दें, किसी युवा को अवसर दें, किसी बहन को सम्मान दें और किसी गरीब परिवार को भविष्य के प्रति भरोसा दें।

उनसे मैंने यह सीखा है कि नेतृत्व का अर्थ सबसे आगे खड़े होकर श्रेय लेना नहीं, बल्कि सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक परिणाम पहुँचाना है।

मैंने उनसे सीखा है कि संवेदनशीलता राजनीति की कमजोरी नहीं, सुशासन की सबसे बड़ी शक्ति है।

मैंने उनसे सीखा है कि बड़ा निर्णय वही ले सकता है, जिसके मन में गरीब की छोटी-से-छोटी पीड़ा के लिए भी जगह हो।

मैंने उनसे सीखा है कि राष्ट्रसेवा में थकान का कोई स्थान नहीं होता। हर दिन, हर क्षण और हर निर्णय भारत माता के चरणों में समर्पित होना चाहिए।

और सबसे महत्वपूर्ण, मैंने उनसे सीखा है कि राजनीति का सर्वोच्च स्वरूप सत्ता नहीं, साधना है।

आज भारत का गरीब केवल लाभार्थी नहीं, विकास यात्रा का सहभागी है। आज भारत का युवा केवल अवसरों की प्रतीक्षा करने वाला युवा नहीं, बल्कि अवसरों का निर्माण करने वाला युवा है। आज भारत की महिलाएँ केवल योजनाओं की प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की अग्रणी शक्ति हैं। आज भारत का किसान केवल अन्नदाता नहीं, आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला है।

मोदी जी के नेतृत्व में भारत ने इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में अभूतपूर्व गति देखी है। नए एक्सप्रेसवे, नए हाइवे, नए एयरपोर्ट, आधुनिक रेलवे स्टेशन, वंदे भारत ट्रेनें, मेट्रो नेटवर्क, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर और सीमावर्ती क्षेत्रों तक मजबूत कनेक्टिविटी इन सबने नए भारत की गति, शक्ति और आकांक्षा को नया आकार दिया है। आज विकास केवल महानगरों तक सीमित नहीं है; छोटे शहर, कस्बे, गाँव और सीमांत क्षेत्र भी राष्ट्र की प्रगति के केंद्र में हैं।

डिजिटल भारत की क्रांति ने भी सामान्य नागरिक के जीवन को बदल दिया है। जनधन, आधार और मोबाइल की शक्ति से पारदर्शी शासन संभव हुआ। DBT ने लाभ को सीधे नागरिकों तक पहुँचाया। UPI ने दुनिया को दिखाया कि भारत केवल तकनीक अपनाने वाला देश नहीं, बल्कि तकनीक को जनकल्याण का माध्यम बनाने वाला देश है। आज छोटे दुकानदार से लेकर बड़े उद्यमी तक, गाँव के युवा से लेकर वैश्विक निवेशक तक, सभी नए भारत की डिजिटल शक्ति को अनुभव कर रहे हैं।

भारत ने आत्मनिर्भरता की दिशा में भी नए आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाए हैं। रक्षा उत्पादन हो, मैन्युफैक्चरिंग हो, स्टार्टअप्स हों, स्पेस टेक्नोलॉजी हो या सेमीकंडक्टर और इनोवेशन की नई संभावनाएँ, भारत अब केवल बाजार नहीं, निर्माता बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आज भारत का युवा ‘कर सकता है’ के आत्मविश्वास से भरा है। यही आत्मविश्वास विकसित भारत की सबसे बड़ी पूँजी है।

मोदी जी ने भारत को यह भी सिखाया कि विकास और विरासत साथ-साथ चल सकते हैं। एक ओर देश आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इनोवेशन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर अपनी संस्कृति, सभ्यता, योग, आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय गौरव को भी पूरी दृढ़ता से विश्व के सामने रख रहा है। काशी विश्वनाथ धाम से लेकर अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर तक, केदारनाथ से लेकर महाकाल लोक तक, भारत ने अपनी आत्मा से जुड़कर आधुनिकता की ओर बढ़ना सीखा है।

आज विश्व मंच पर भारत की स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत, सम्मानित और प्रभावशाली है। भारत अब केवल वैश्विक चर्चाओं का हिस्सा नहीं है, बल्कि कई विषयों पर दिशा देने वाला राष्ट्र है। जलवायु परिवर्तन हो, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर हो, आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट दृष्टिकोण हो, वैश्विक स्वास्थ्य हो, आपदा के समय मानवीय सहायता हो या ग्लोबल साउथ की आवाज, भारत आज जिम्मेदार, संवेदनशील और आत्मविश्वासी वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा है।

G20 की सफल अध्यक्षता ने दुनिया को भारत की संगठन क्षमता, सांस्कृतिक शक्ति और वैश्विक दृष्टि का परिचय दिया। योग आज विश्व की साझी विरासत बन चुका है। भारत की वैक्सीन क्षमता और आपदा के समय सहायता की भावना ने दुनिया को दिखाया कि भारत की शक्ति केवल अपने लिए नहीं, मानवता के लिए है। आज जब दुनिया भारत की ओर देखती है, तो उसे एक ऐसा राष्ट्र दिखाई देता है जो अपनी जड़ों से जुड़ा है, भविष्य के लिए तैयार है और विश्व कल्याण की भावना रखता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि नया भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करता। सीमाओं की मजबूती, सैनिकों के सम्मान, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता ने भारत की सुरक्षा नीति को नई दृढ़ता दी है। आज भारत की आवाज में संयम भी है और संकल्प भी।

यह सब केवल नीतियों का परिणाम नहीं है। इसके पीछे वह नेतृत्व है जो दिन-रात काम करता है, जो चुनौतियों से घबराता नहीं, जो आलोचनाओं से विचलित नहीं होता और जो हर निर्णय में भारत के भविष्य को देखता है। मोदी जी के नेतृत्व की सबसे बड़ी प्रेरणा यही है कि वे हर उपलब्धि के बाद भी रुकते नहीं, हर सफलता के बाद भी और बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं।

4,399 दिन केवल कैलेंडर की गिनती नहीं हैं। ये दिन सेवा के हैं, संघर्ष के हैं, संकल्प के हैं, अनुशासन के हैं, तपस्या के हैं और करोड़ों भारतीयों के विश्वास के हैं। इन दिनों में भारत ने नीतियों का परिवर्तन देखा, व्यवस्थाओं का परिवर्तन देखा, कार्यसंस्कृति का परिवर्तन देखा और सबसे बढ़कर राष्ट्रीय आत्मविश्वास का पुनर्जागरण देखा।

आज इस ऐतिहासिक क्षण पर मन में गर्व भी है, भावुकता भी है और गहरी कृतज्ञता भी।

गर्व इस बात का है कि हम ऐसे भारत के निर्माण के साक्षी हैं, जो अपने सामर्थ्य को पहचान रहा है।

भावुकता इस बात की है कि एक साधारण पृष्ठभूमि से निकला व्यक्ति अपने परिश्रम, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति से करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा बन गया है।

कृतज्ञता इस बात की है कि देश को ऐसा नेतृत्व मिला है, जिसने शासन को सेवा, विकास को जनभागीदारी और राजनीति को राष्ट्रसाधना का माध्यम बनाया है।

आज यह केवल आदरणीय प्रधानमंत्री जी को बधाई देने का अवसर नहीं है। यह हम सबके लिए आत्ममंथन और संकल्प का अवसर है। क्या हम अपने दायित्वों में उतनी ही निष्ठा, उतनी ही विनम्रता और उतने ही परिश्रम से काम कर रहे हैं? क्या हमारे हर निर्णय के केंद्र में अंतिम व्यक्ति है? क्या हमारी हर कोशिश राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखती है?

मोदी जी की यात्रा हम सभी को यही प्रेरणा देती है कि सार्वजनिक जीवन में सबसे बड़ा पद नहीं, सबसे बड़ा धर्म सेवा है। सबसे बड़ी शक्ति अधिकार नहीं, कर्तव्य है। और सबसे बड़ी उपलब्धि व्यक्तिगत सफलता नहीं, राष्ट्र के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन है।

आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हृदय से बधाई और कोटि-कोटि शुभकामनाएं।

ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, असीम ऊर्जा और दीर्घायु प्रदान करें। आपके नेतृत्व में भारत विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और विश्वगुरु भारत के संकल्प को अवश्य साकार करेगा।

यह यात्रा सेवा की है।

यह यात्रा संकल्प की है।

यह यात्रा विश्वास की है।

यह यात्रा भारत के आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की है।

भारत माता की जय।

चालीस बरस का पहरेदार: एक आदमी की जिद के आगे लाल तूफान बेअसर, वोज़िन्हा के चमत्कार से काबो वर्दे ने स्पेन को ड्रॉ पर रोका

एक चालीस वर्षीय खिलाड़ी सोमवार (15 जून 2026) की रात अपने वतन का नायक बन गया। गुजरी रात वैश्विक फुटबॉल की सबसे बड़ी टीमों में गिने जाने वाली स्पेन को विश्व कप में अपने अभियान की शुरुआत करनी थी। मुकाबला था विश्व कप में पहली दफा उतरने जा रही काबो वर्दे से। काबो वर्दे, जो कि फीफा की वैश्विक रैंकिंग में 67वें स्थान पर है।

कुराकाओ को जिस अंदाज में जर्मनी ने रौंदा था, उससे सभी को यही उम्मीद थी कि कुछ ही ऐसा अटलांटा में होने जा रहे स्पेन बनाम काबो-वर्दे के ग्रुप एच के मुकाबले में भी दर्शकों को देखने को मिलेगा। परन्तु सोमवार रात जिस जुझारू अंदाज में स्पेन के विरुद्ध नब्बे मिनटों तक काबो-वर्दे के खिलाड़ियों ने खेला, यह निश्चित रूप से ही फीफा विश्व कप के इतिहास में इक लोककथा सा अंकित हो गया।

बीती रात अटलांटा के मर्सिडीज-बेंज स्टेडियम में खेले गए मुकाबले में अपनी पारंपरिक लाल जर्सी पहने ‘ला रोज़ा’ की टीम एक ही मकसद के संग मैदान में उतरी; कैसे भी यह मुकाबला जीतकर एक जीत से टूर्नामेंट में शुरुआत करनी चाहिए। मगर अपनी सफेद जर्सियाँ पहने मैदान पर मौजूद काबो-वर्दे के खिलाड़ियों ने कल एक इतनी बड़ी टीम के खिलाफ न सिर्फ शानदार प्रदर्शन किया बल्कि आने वाले मैचों के लिए स्पेन के तमाम विरोधियों को उनकी कमियाँ भी बता दी।

कोच लुई डे ला फुएन्ते ने 4-1-2-3 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान पर उतारा। मिडफील्ड में रोड्री के संग पेड्री और फैबियान रुईज़ मौजूद थे। मगर कोच ने शायद अपनी अटैकिंग लाइन में खिलाड़ियों का ग़लत चुनाव किया। सेंट्रल फॉरवर्ड ओयारजाबाल का साथ देने के लिए विंगर्स के रूप में फेराँ तोरे और गावी को मैदान पर उतारा गया, जबकि नीको, यमाल, विक्टर मुनोज़ जैसे खिलाड़ी बेंच पर मौजूद थे। शायद कोच ने एहतीयातन भी ऐसा कदम उठाया क्योंकि यमाल भीषण रूप से चोटिल होने के चलते कुछ माह से खेल से दूर थे। क्योंकि वह वापसी कर रहे हैं, सीधे उनको मैदान पर उतारना एक बड़ी ग़लती हो सकती थी।

खैर, दोनों राष्ट्रों के राष्ट्रीय-गान के पश्चात रेफरी ने व्हिस्ल बजाई। मैच शुरू हुआ। मैच के शुरुआती क्षणों से ही नन्हें अफ्रीकी देश काबो-वर्दे के खिलाड़ी एक सुगठित यूनिट के तौर पर डिफेंड कर रहे थे। उनका मकसद बस कैसे भी स्पेन को गोल स्कोर करने से रोकना था। और, वो इसमें सफल भी रहे। काबो-वर्दे ने क्या कमाल का डिफेंसिव फुटबॉल खेला। आपको जानकर अचरज होगा कि स्पेन ने पूरे मैच में गोल पर कुल तेईस हमले किए जिसमें से मात्र आठ निशाने पर रहे। उन आठ के आठ हमलों को गोलकीपर वोज़िन्हा ने गोल में बदलने से रोक दिया। चालीस वर्षीय वोज़िन्हा स्पेन और जीत के मध्य के दीवार की भांति खड़े हो गए थे।

स्पेनिश जहाज़ी बेड़ा लगातार आक्रमण करता रहा मगर अंत में स्कोर 0-0 ही रहा। वह वोज़िन्हा के गोलपोस्ट को भेदने में नाकाम रहे। हालाँकि इसमें बड़ी भूमिका ओयारजाबाल, फेराँ तोरे और फाबिएन रुईज की खराब फिनिशिंग की भी रही, जिन्होंने गोल करने के कई आसान मौके गँवाए। यही एक औसत और बेहतरीन खिलाड़ी के मध्य अंतर पैदा करता है। एक बड़ा खिलाड़ी कठिन से कठिन मौकों को भी भुनाने में माहिर होते हैं। याद कीजिए पिछले संस्करण के फाइनल में कीलिएन एमबाप्पे का प्रदर्शन। स्पेनिश टीम आज वोज़िन्हा के शानदार प्रदर्शन के साथ साथ अपनी खराब फिनिशिंग के चलते मैच जीतने से वंचित रह गई।

वोज़िन्हा, जिन्होंने कल रात चालीस की उम्र में विश्व कप में पर्दापण किया, अपने खेल के बूते संपूर्ण फुटबॉल जगत की आँखों के तारे बन गए। मैच पश्चात उन्होंने कहा,”मैं मैच के बाद इसलिए रो पड़ा क्योंकि मैंने ज्यादातर जीवन अपने दादा-दादी के संग बिताया और आज वो ही यहाँ नहीं हैं। कुछ वर्ष पहले मैंने उन्हें खो दिया। मेरी माँ वीजा की अड़चनों और उसमें लगने वाले पैसों के चलते मुझे खेलता देखने नहीं आ सकी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं जीवन में कुछ ऐसा भी कर सकूँगा।”

वहीं ओमार मारमूश व मोहम्मद सालाह की इजिप्ट ने ग्रुप ज़ी के मैच में केविन डि ब्रुएना की बेल्जियम को 1-1 से रोक कर अंक बाँटने के लिए मजबूर कर दिया। यह एक बराबरी का मुकाबला रहा।

इसके बाद लॉस एंजिलिस में खेले गए ग्रुप ज़ी के अगले मैच में ईरान और न्यूज़ीलैंड ने 2-2 का ड्रॉ खेलकर अंक बाँटे। देखने वाली बात यह रही कि ईरान की टीम ने, जिसके खिलाड़ियों ने अमेरिकी हमलों के चलते गुजरे फरवरी से कोई क्लब फुटबॉल नहीं खेली थी, दो दफा मैच में पिछड़ कर भी वापसी की। शुरुआत में जरूर स्टेडियम के भीतर और बाहर सरकार विरोधी नारे लगे परन्तु ईरानी समर्थकों ने मैच शुरू होते ही खेल और राजनीति को अलग रखा। जब जब ईरान के खिलाड़ियों ने गोल स्कोर किए, स्टेडियम ‘ईरान-ईरान’ के नारों से गुंजायमान हो उठा।

गौरतलब है कि अमेरिकी नागरिकों ने भी मैच की पूर्व संध्या पर खुलकर ईरानी समर्थकों का स्वागत करा था व कहा था कि उन्हें हम अपने देश में कोई समस्या नहीं होने देंगे। खेल इस सब से बहुत बड़ा है। इस मैच के ड्रॉ रहने के चलते अब ग्रुप ज़ी में हर टीम ने एक-एक अंक जुटा लिया है।

वहीं पिछली दफा अर्जेंटीना को टूर्नामेंट में अपने शुरुआती मैच में 2-1 से हरा कर सनसनी फैलाने वाली सऊदी अरब की टीम ने फिर इस दफा एक उलटफेर कर दिया है। सऊदी अरब ने मियामी में खेले गए ग्रुप एच के मुकाबले में मार्सेलो बिएल्सा की उरुग्वे को 1-1 की बराबरी पर रोक अपने ग्रुप में एक जरूरी अंक जुटा लिया।

अब आगे मंगलवार (16 जून 2026) के दिन कुल पाँच मैच खेले जाने हैं। भारतीय समयानुसार आज रात साढ़े बारह बजे सितारों से सजी फ्रांस की टीम सेनेगल के विरुद्ध मैदान में उतरेगी। ज्ञात रहे कि दोनों ही राष्ट्रों के मध्य मैदान में एक इतिहास जुड़ा हुआ है। सन् 1998 की विश्व कप विजेता फ्रांस को सन् 2002 में सेनेगल ने ग्रुप स्टेज में हरा कर घर का टिकट कटाने पर मजबूर कर दिया था। हालाँकि इस मुकाबले में भी सेनेगल को कमजोर नहीं आँका जा सकता परन्तु फ्रेंच लड़ाके जरूर हिसाब चुकता करने की भावना से प्रेरित होकर मैदान में उतरेंगे।

इराक अपने से मजबूत नॉर्वे के विरुद्ध मैदान में उतरेगी तो वहीं ऑस्ट्रिया का सामना होगा जॉर्डन से।

फिर होंगे दो बहुप्रतीक्षित मुकाबले। अपना अंतिम विश्व कप खेलने जा रहे हमारी पीढ़ी के दो सितारे क्रिश्चियानो रोनाल्डो और लिओनेल मेस्सी आज टूर्नामेंट में अपना पहला मैच खेलेंगे। रोनाल्डो की पुर्तगाल एक फेवरेट के तौर पर कॉन्गो के विरुद्ध मैदान में उतरेगी। वहीं कोच स्कालोनी की अर्जेंटीनी टीम कन्सास सिटी स्टेडियम में अल्जीरिया का सामना करेगी।

राजा मेहदी अली खान ने 1964 में आई फिल्म ‘वो कौन थी’ के लिए एक गीत लिखा था, जिसे संगीत दिया था मदन-मोहन ने। भारत रत्न लता मंगेशकर जी की जादुई आवाज की चाशनी में डूबे, दिल को चीर कर रख देने वाले, उस गीत में चंद पंक्तियां इस प्रकार हैं, ‘लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो, शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो। हमको मिली हैं आज ये घड़ियाँ नसीब से, जी भर के देख लीजिये हमको क़रीब से। फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो, फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो।’

मेस्सी और रोनाल्डो वह खिलाड़ी हैं जिन्हें देखते हुए ब्राजील की तंग सड़कों से लेकर देहरादून के नेहरू ग्राम तक नन्हें बच्चों ने खेल को अपनाने का ख्वाब देखा। क्या यूरोप, क्या दक्षिण अमेरिका, क्या एशियाई महाद्वीप; बेहद छोटे कस्बों से निकले इन दोनों ही खिलाड़ियों ने पिछले दो दशकों में संपूर्ण विश्व पर राज़ किया और अपने खेल से करोड़ों लोगों के दिल जीते।

एक खूबसूरत परीकथा समाप्त होने जा रही है। एक हसीं ख्वाब टूटने जा रहा है। इस विश्व कप के बाद मेस्सी-रोनाल्डो की प्रतिद्वंद्विता सदैव के लिए थम जाएगी। उससे पहले हमें जरूर इन दोनों ही जादूगरों को एक अंतिम दफा खेलते हुए देख लेना चाहिए। कौन जाने, इस जन्म में फिर मुलाकात हो न हो।

वेस्टर्न सूट आउट, ‘बंदी जैकेट’ इन… अंग्रेजों की विरासत को पीछे छोड़ भारतीय परंपरा की ओर बढ़ी सेना, जानें- नई यूनिफॉर्म पॉलिसी में क्या-क्या हुए बदलाव?

भारतीय सेना ने अंग्रेजों के जमाने की सभी पहचान को पीछे छोड़ते हुए अब भारतीय परंपराओं के अनुरूप वर्दी को अपनाने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। भारतीय सेना ने 174 पेज वाली ‘आर्मी यूनिफॉर्म 2026’ मैनुअल जारी किया है, जिसका उद्देश्य औपनिवेशिक परंपराओं को कम से कम करना, भारतीय पहचान को बढ़ावा देना और सैनिकों के लिए अधिक व्यावहारिक और आधुनिक ड्रेस नियम बनाना है।

नए नियम के तहत औपचारिक कार्यक्रम में बंदी जैकेट को शामिल किया गया है। चमकीली पाउच बेल्ट हटाई गई हैं, साथ ही मूँछ, टैटू, मेकअप को लेकर सख्त मानक तय किए गए हैं। सेना के अधिकारियों का मानना है कि ये बदलाव सेना को अपनी पहचान मजबूत करने के साथ- साथ उसकी रेजिमेंटल विरासत और पेशेवर मूल्यों को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएगी।

पुराना ड्रेस कोड और नए ड्रेस कोड में अंतर

पहले आधिकारिक सिविल कार्यक्रमों में सैन्य अधिकारियों को पश्चिमी लाउंज सूट (Western Lounge Suit) और टाई पहनना जरूरी था, लेकिन अब वेस्टर्न सूट की जगह भारतीय संस्कृति से जुड़ी ‘बंदी जैकेट’ पहनने की आधिकारिक अनुमति दी गई है।

सर्दियों में सभी रैंक के सैनिक पारंपरिक ऊनी वी-नेक स्वेटर और जर्सी (legacy ड्रेस पैटर्न 3A) पहनते थे। ये दूसरे विश्वयुद्ध के वक्त लागू किए गए थे, जिसे अब हटा दिया गया है और उसकी जगह ड्रेस 3बी के तहत आधुनिक ‘बैटल जैकेट’ और अंगोला शर्ट के साथ-साथ सिर पर ‘बेरे कैप’ को शामिल किया गया है। इस बदलाव को जून 2029 तक पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा।

विंटर जैकेट और वर्दी पीस स्टेशनों यानी शांति वाले सैन्य क्षेत्रों और मुख्यालयों में तैनात सैनिकों के लिए खास तौर पर लागू किए गए हैं। युद्ध क्षेत्रों या फील्ड में तैनात सैनिक अपनी तय कॉम्बैट (लड़ाकू) यूनिफॉर्म ही पहनेंगे। कॉम्बेट यूनिफॉर्म में भी 7A नाम से नया ड्रेस कोड जोड़ा गया है। इसमें टी-शर्ट शामिल है। 7B यूनिफॉर्म सर्दियों का कॉम्बेट जैकेट है। विंटर सेरिमोनियल में अधिकारियों के लिए 1C नाम से नई ड्रेस जोड़ी गई है। अब तक 1C ड्रेस जवानों और जेसीओ पहनते थे, लेकिन अब इसे अधिकारी भी पहनेंगे।

आधुनिक विंटर जैकेट इंडियन एयरफोर्स और इंडियन नेवी पहले से ही इस्तेमाल कर रही हैं। अब इंडियन आर्मी ने भी इसे अपना लिया है। इससे सेना के तीनों अंगों के नियमों में एकरूपता आ जाएगी।

नए ‘आर्मी यूनिफॉर्म्स-2026’ के तहत औपचारिक अवसरों पर बंद-गले वाली ‘बंदी जैकेट’ पहनना है, वहीं सेरेमोनियल पाउच बेल्ट को हटाया गया है और परेड के दौरान रिव्यूइंग अधिकारियों के लिए तलवार साथ रखना वैकल्पिक होगा। अगर तलवार न रखना चाहें, तो न रखें।

महिलाओं के यूनिफॉर्म में बदलाव

महिला अधिकारियों को सफेद रंगों की साड़ी पहनना है अथवा सफेद दुपट्टे के साथ कुर्ता-सलवार पहन सकते हैं या टखनों तक की लंबाई वाली स्ट्रेट पैंट पहनने की अनुमति होगी। हालाँकि बिना आस्तीन वाले कुर्ते, पलाजो या दूसरे कैज़ुअल लोअर पहनने पर साफ तौर पर मनाही है।

महिला सैनिकों और अधिकारियों को कॉस्मेटिक्स से जुड़े कड़े नियमों का पालन करना होता है। इसे और कड़ा करते हुए
लिपस्टिक, रंगीन नेल पॉलिश, बिंदी और नोज पिन पहनने पर भी रोक लगा दी गई है। उन्हें सिंदूर लगाने की छूट होगी, लेकिन कैप पहनने पर वह दिखाई न दे।

टैटू पर रोक और मूँछों की लंबाई तय

नए नियमों के अनुसार, टैटू और शरीर पर पियर्सिंग की अनुमति नहीं होगी। यूनिफॉर्म में सैनिक किसी भी तरह का ब्रेसलेट नहीं पहन सकेंगे। किसी भी तरह का धार्मिक प्रतीक पहनने पर रोक है, हालाँकि कलावा बाँधने यानी रक्षा सूत्र के साथ साथ सिखों की धार्मिक पहचान वाली चीजों को लेकर छूट दी गई है।

नए नियम में मूँछों की लंबाई तय कर दी गई है। यह 12 सेंटीमीटर से अधिक नहीं हो सकती। सभी सैन्य अधिकारी या जवान यूनिफॉर्म में रहते हुए डिओडोरेंट और परफ्यूम का इस्तेमाल नहीं कर सकते, हालाँकि आफ्टर-शेव लोशन इस्तेमाल करने की इजाजत है।

‘रॉयल’ शब्द हटाया गया

सेना ने अपनी आधिकारिक शब्दावली से ‘रॉयल’ जैसे ब्रिटिश दौर के कई पुराने शब्दों को भी हटा दिया है। सेना में स्वदेशीकरण की मुहिम को पाँच साल पहले नई गति तब मिली थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘कंबाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस’ को संबोधित किया था। उन्होंने सशस्त्र बलों को निर्देश दिया था कि वे ब्रिटिश रीति-रिवाजों को समाप्त करें तथा अपने सिद्धांतों, प्रक्रियाओं और परंपराओं में भारतीय मूल्यों को आधिकारिक तौर पर स्थान दें।

कब-कब ड्रेस कोड में हुआ बदलाव

आजादी से पहले अंग्रेजों के जमाने में भारतीय सैनिक लाल रंग की ड्रेस पहना करते थे। इसे बाद में बदलकर खाकी कर दिया गया। आजादी के बाद और देश के बंटवारे को देखते हुए भारतीय सैनिकों को पाकिस्तानी फौजियों से अलग पहचान देना जरूरी था। इसे देखते हुए ‘ऑलिव ग्रीन’ रंग की ड्रेस कोड लागू की गई।

साल 2005-06 में फ्रांसीसी वुडलैंड डिजाइन से प्रेरित होकर भारतीय सैनिकों के लिए कैमोफ्लाज पैटर्न अपनाया गया। सैनिकों के कॉम्बैट यूनिफॉर्म में बड़ा बदलाव 2022 में आया। उस वक्त खास पिक्सल पैटर्न वाली नई डिजिटल कैमोफ्लाज कॉम्बैट यूनिफॉर्म अपनाई गई। इसके तहत नया पैटर्न और बेहतर फैब्रिक आया।

इसका मकसद यूनिफॉर्म को युद्ध क्षेत्रों और फील्ड के सैनिकों की जरूरत को पूरा करना और आरामदायक बनाना था। 2022 की डिजिटल कॉम्बैट यूनिफॉर्म से आगे बढ़कर ‘आर्मी यूनिफॉर्म 2026’ सेना की पूरी ड्रेस संस्कृति को बदलने वाला सबसे बड़ा सुधार माना जा रहा है।

ड्रेस कोड में क्यों किया गया बदलाव

भारतीय सेना के ड्रेस कोड में लगातार बदलाव किए जा रहे हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक विरासत से सेना को मुक्त कराना बहुत जरूरी है। देश की सदियों पुरानी संस्कृति और पहचान को बढ़ावा देने के लिए सरहद पर तैनात सैनिकों की वर्दी को उसके अनुरूप बनाना भी उतना ही जरूरी है।

भारत के विकास और आधुनिकरण की छाप हमारे सैनिकों की वर्दी से भी दिखेगी, जब वह मौसम और सैन्य जरूरतों के मुताबिक अपने ड्रेस पहनेंगी। अब जब पैंट में ज्यादा पॉकेट होंगे तो सामानों को रखने में आसानी होगी। मौसम की मार का भी असर सैनिकों पर नहीं पड़ेगा। इस सबके बीच सेना के तीनों अंगों के सैनिकों के ड्रेस में एकरूपता देश की आन-बान और शान को बढ़ाएगा।

FIFA World Cup 2026: जर्मनी की जीत खबर थी, कुराकाओ का जश्न ‘कहानी’

कभी-कभी खेल हमें वह उम्मीद लौटा देते हैं, जिसकी तलाश हम दुनिया की बड़ी-बड़ी खबरों में करते फिरते हैं।

बीते कुछ साल में दुनिया ने युद्ध देखे, राजनीतिक उथल-पुथल देखी, आर्थिक अनिश्चितताएँ देखीं और समाजों के भीतर बढ़ती बेचैनियाँ भी देखीं। ऐसे दौर में जब बहुत से लोगों को लग रहा था कि फीफा विश्व कप-2026 शायद पिछले संस्करणों जैसी ऊर्जा और उत्साह नहीं जगा पाएगा, तब इस प्रतियोगिता ने धीरे-धीरे अपनी असली ताकत दिखानी शुरू कर दी है।

यह फीफा विश्व कप अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन मैदान पर जो कहानियाँ जन्म ले रही हैं, वे बता रही हैं कि फुटबॉल सिर्फ़ एक खेल नहीं है। यह उम्मीद का उत्सव है। यह उन राष्ट्रों का मंच है जो अपने सपनों के साथ यहाँ पहुँचे हैं। और यह उन करोड़ों लोगों का साझा अनुभव है जो नब्बे मिनट के भीतर हार, जीत, साहस और चमत्कार, सब कुछ एक साथ देख लेते हैं।

इसी क्रम में ग्रुप ई में चार बार की विश्व विजेता जर्मनी ने विश्व कप पदार्पण कर रहे कुराकाओ के विरुद्ध अपने अभियान की शुरुआत की…

शुरू के तीस मिनट तक मैच बेहद ही रोमांचक रहा। मैच के छठे मिनट में ही पच्चीस वर्षीय मिडफील्डर फेलिक्स न्मेचा ने गोल दाग जर्मनी को जरूरी बढ़त दिला दी थी। जर्मन खेमा मैदान के दोनों छोरों से लगातार विरोधी गोलपोस्ट पर हमले किये जा रहा था। परन्तु कुराकाओ की टीम बेहतरीन तरीके से अपने गोलपोस्ट की रक्षा कर रही थी। मजा तो तब आ गया जब कुराकाओ के लिए उनके अटैकिंग मिडफील्डर कोमेनेन्सिया ने मैच के इक्कीसवें मिनट में एक मौका मिलते ही गेंद को गोलपोस्ट के भीतर सरका दिया। हालाँकि तभी हाइड्रेशन ब्रेक हो गया और इस ब्रेक ने कुराकाओ की लय तोड़ दी। डिफेंस लाइन के खिलाड़ी श्लौटरबैक ने बेहतरीन हेडर लगा जर्मनी को पुनः बढ़त दिला दी और स्कोर 2-1 हो गया।

फिर तो जर्मन टीम ने ताबड़तोड़ हमलों की बरसात कर दी। इन हमलों का कुराकाओ की टीम के पास कोई जवाब न था। जर्मन खिलाड़ी थोड़ी-थोड़ी देर बाद लगातार गोल स्कोर करते रहे। मैच का फाइनल स्कोर रहा 7-1। जर्मनी ने इस विश्व कप में एक शानदार जीत से शुरुआत की।

ग्रुप स्टेज के सबसे बेहतरीन मैचों में से एक बीती रात जापान और हॉलेंड के मध्य खेला गया। टेक्सास प्रांत के डल्लास के किसी विशालकाय पॉलिहाऊस से दिखने वाले स्टेडियम में एक ओर गहरी नीली जर्सी पहने जापान की टीम खड़ी थी, जिनका सामना था अपने पारंपरिक गहरी नारंगी रंग की जर्सी में मैदान में उतरी ‘रोनाल्ड कोमान’ की नीदरलैंड्स से। रोनाल्ड कोमान की नीदरलैंड्स कई अहम खिलाड़ियों के चोटिल होने के चलते अपेक्षाकृत एक कमजोर खेमे के संग विश्व कप में पहुँची है। डीप लाइंग मिडफील्डर की भूमिका में अपने जादूगर फ्रैंकी डी यांग को रख कोमान ने 4-1-2-3 की फॉर्मेशन के संग टीम को मैदान में उतारा। नीदरलैंड्स शुरू से ही गेंद को अपने कब्जे में रख रही थी। जापान ने पिछले विश्व कप की ही भांति यहाँ भी शुरुआती व्हिस्ल बजते ही अपना दमखम दिखाया और नीदरलैंड्स को अपने हमलों को गोल में तब्दील नहीं करने दिया। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 0-0 था।

कप्तान विरज़िल लॉन जिक ने मैच के पचासवें मिनट पर गोल लगा कर अपनी टीम को काँटे की टक्कर वाले इस मुकाबले में अहम बढ़त दिलाई। परन्तु विरज़िल लॉन ज़िक के इस गोल के ठीक छह मिनट बाद ही नाकामुरा ने मैदान की बाई छोर से मूव बनाकर एक बेहद शानदार गोल स्कोर कर अपनी टीम की इस मैच में वापसी करा दी। परन्तु ऐसे ही थोड़ी ग्रुप स्टेज के इस मैच की सभी को प्रतिक्षा थी। फिर सात मिनट बाद ही ग्रेवनबर्च ने गेंद को सौमरविल की ओर बढ़ाया जिन्होंने गोल स्कोर कर वापस मैच में नीदरलैंड्स को बढ़त दिला दी। किसी नारंगी समंदर सी प्रतीत होती नीदरलैंड्स के समर्थकों की भीड़ झूमने लगी।

मैच आगे बढ़ रहा था। अब कभी भी रेफरी अंतिम व्हिस्ल बजा सकते थे। तभी अचानक ही जापान की आक्रामक पंक्ति तेज गति से सधे हुए तरीके से विरोधी गोलपोस्ट की ओर बढ़ी। उनके अटैक के चलते जापान को एक कॉर्नर किक मिली। और मैच के अंतिम क्षणों में दाईची कमाडा ने खूबसूरत हेडर लगा जापान के लिए गोल दाग स्कोर बराबर कर दिया। दाईची कमाडा का अंतिम क्षणों में दागा गया यह गोल किसी कटार की भांति था। इस गोल के चलते ग्रुप एफ के इस मैच में रैंकिंग में अपने से काफी बेहतर विरोधी के विरुद्ध जापान ने एक जरूरी अंक जुटा लिया। नीदरलैंड्स ने जहाँ गोल पर ग्यारह शॉट लगाए पर निशाने पर मात्र सात शॉट रहे। उसमें भी वह दो ही शॉट पर गोल स्कोर कर सके। वहीं जापान ने गोलपोस्ट पर कुल तीन ही शॉट लगाए और उनमें से भी दो शॉट को सफलतापूर्वक गोल में तब्दील किया। इसका ही नतीजा रहा कि नीदरलैंड्स जीत से वंचित रह गया।

उधर फिलाडेल्फिया में खेले गए ग्रुप ई के एक मुकाबले में आइवरी कोस्ट ने 1-0 से इक्वाडोर को मात दे ग्रुप में अपनी स्थिति मजबूत की। वहीं ग्रुप एफ के एक और मुकाबले में स्वीडन का सामना ट्यूनीशिया से था। स्वीडन की अटैकिंग लाइन में विक्टर ग्योकेरेज़ व एलेक्सैंडर आइसैक जैसे तेजतर्रार खिलाड़ी मौजूद हैं। लुकास बर्गवाल व एंथोनी इलांगा सरीखे होनहार खिलाड़ी बेंच पर थे। स्वीडन ने 5-1 से ट्यूनीशिया को इस मुकाबले में रौंद डाला।

ग्रुप एफ में जापान व नीदरलैंड्स के मैच के ड्रॉ रहने के चलते, इस जीत ने इस ग्रुप में स्वीडन को अच्छी बढ़त दिला दी है।

अब आने वाली रात यूरोपीयन फुटबॉल के महाकाव्य का रचयिता स्पेन अपने अभियान की शुरुआत करेगा। रात जब आसमान में तारे टिमटिमाने लगेंगे, भारतीय समयानुसार रात साढ़े नौ बजे स्पेन अटलांटा के मर्सिडीज-बेंज स्टेडियम में क्षेत्रफल व जनसंख्या के आधार पर विश्व कप के संपूर्ण इतिहास में मुख्य ड्रॉ के लिए क्वालीफाई करने वाले दूसरे सबसे छोटे राष्ट्र काबो-वर्दे के खिलाफ मैदान में उतरेगी। ग्रुप एच के इस मुकाबले पर आपकी नजर जरूर होनी चाहिए।

आगे भारतीय समयानुसार रात साढ़े बारह बजे केविन डि ब्रुएना की बेल्जियम का मुकाबला होगा मोहम्मद सालाह की इजिप्ट से तो वहीं रात साढ़े तीन बजे उरुग्वे सऊदी अरब के खिलाफ अपने सफर की शुरुआत करेगा।

शायद फुटबॉल का सबसे बड़ा जादू यही है कि यह हमें केवल गोल और परिणाम नहीं देता, बल्कि इंसानी जज़्बे की ऐसी कहानियाँ भी देता है जो स्कोरबोर्ड से कहीं बड़ी होती हैं।

कुछ ही दिन पहले ऑस्ट्रेलिया ने अपने से कहीं अधिक मजबूत मानी जा रही तुर्की की टीम को 2-0 से हराकर पूरे टूर्नामेंट को चौंका दिया था। और बीती रात जर्मनी से 7-1 की करारी हार झेलने के बावजूद कुराकाओ के समर्थक मैच खत्म होने के बाद भी अपनी टीम के लिए तालियाँ बजाते रहे। उनके लिए हार से बड़ा तथ्य यह था कि उनका छोटा-सा द्वीपीय राष्ट्र पहली बार विश्व कप के मंच पर खड़ा था।
मैच के बाद एक समर्थक ने कहा, “आज हमारा छोटा-सा देश दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल मंच का हिस्सा है। क्या खुश होने के लिए इतना काफी नहीं? वी हैव अराइव्ड, एंड वी शैल रीजॉइस दिस मोमेंट।”

यही विश्व कप की खूबसूरती है।

यह केवल ट्रॉफी जीतने वालों की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की भी कहानी है जो यहाँ तक पहुँचने भर को अपनी सबसे बड़ी जीत मानते हैं।
टूर्नामेंट अभी लंबा है। कई दिग्गज अपनी यात्रा शुरू करने वाले हैं, कई नए नायक जन्म लेंगे, कई सपने टूटेंगे और कई उम्मीदें परवान चढ़ेंगी।
फिलहाल तो यह बस शुरुआत है।

और अगर शुरुआती दिनों ने कुछ साबित किया है, तो वह यह कि आने वाले दिनों में यह विश्व कप हमें और भी यादगार कहानियाँ देने वाला है।

बने रहिए साथ, क्योंकि फुटबॉल का यह महाकाव्य अभी अपने शुरुआती अध्यायों में ही है।