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सवाल- कितनी लड़कियों से थे रिलेशन, इंदौर के रेपिस्ट कोच मोहसिन खान का जवाब- बहुत सारी लड़की… 25-30 से थे संबंध: पीड़िताओं का कलावा कटवाता था, मुस्लिम बनने का डालता था दबाव

मध्य प्रदेश के इंदौर में लड़कियों को शूटिंग सिखाने वाले कोच मोहसिन खान ने पुलिस जाँच में अपने कांड कबूल किए हैं। उसने माना है कि 25 से 30 लड़कियों का उत्पीड़न किया है। उसके कबूलनामे का वीडियो आया है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, वीडियो में मोहसिन ये कहते हुए नजर आ रहा है कि इंदौर के अलावा कुछ अन्य जिलों में भी उसने लड़कियों का फायदा उठाया। उसके कई लड़कियों के साथ संबंध भी थे।

इंदौर के अन्नपूर्णा इलाके में शूटिंग कोच मोहसिन खान ड्रीम ओलंपिक एकेडमी चलाता है। उस पर 20 मई 2025 से अब तक 5 FIR दर्ज हो चुकी है। आखिरी शिकायत उसके घर पर काम करने आई लड़की ने सोमवार (26 मई 2025) को दर्ज करवाई है।

पीड़िता ने शिकायत में कहा था कि मोहसिन और उसके दो दोस्तों फैजान और इमरान ने 15 दिनों तक बंधक बना कर उसके साथ रेप किया था। उस समय उसकी उम्र महज 17 साल थी।

मोहसिन को पॉक्सो एक्ट और अन्य धाराओं में पुलिस ने गिरफ्तार कर 7 दिन की रिमांड पर भेजा था। पूरे मामले की जाँच के लिए पुलिस कमिश्नर ने 6 सदस्यीय कमेटी भी गठित की है। पुलिस की जाँच में पता चला है कि आरोपित के मोबाइल में 100 से ज्यादा अश्लील वीडियो हैं।

मोहसिन के साथ पुलिस FIR में नामजद अन्य लोगों की तलाश में भी लगी हुई है। इस कड़ी में बुधवार (28 मई 2025) की सुबह इंदौर के खजराना इलाके में इमरान के फोन की लोकेशन मिली। पुलिस ने दबिश देकर गिरफ्तार कर लिया है।

मोहसिन खान की गिरफ्तारी के बाद से उसका पूरा परिवार फरार है। पुलिस को उसके मामा और दो बड़े भाइयों-इमरान और साजिद की अब भी तलाश है।

पुलिस ने मोहसिन की एकेडमी को सील कर सीसीटीवी फुटेज जब्त कर लिए हैं। लड़कियों द्वारा उपलब्ध साक्ष्य की भी जाँच करवाई जा रही है। साथ ही पुलिस ने एकेडमी में आने वाली 40 से अधिक लड़कियों की सूची तैयार की है। उनसे भी पूछताछ की जाएगी।

अब तक पड़ताल में पता चला है कि मोहसिन खान लड़कियों के हाथ से कलावा खुलवाकर उन्हें गोमांस खिलाता था। फोटो-वीडियो बना लेता था और फिर वायरल करने की धमकी देकर अपने पास बुलाता था। इस केस में भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी संज्ञान लिया है और 7 दिन के भीतर रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

इस मामले को उजागर करने में बजरंग दल ने भी अहम भूमिका निभाई थी। पीड़िताओं में से एक ने बजरंग दल से सहायता माँगी थी। इसके बाद दल ने कई दिनों तक एकेडमी पर नजर रखी और जाँच के दौरान उन्हें कई वीडियो और बयान मिले।

बजरंग दल के जिला मंत्री ने बताया कि मोहसिन के फोन में 150 से भी ज़्यादा हिंदू युवतियों के फोटो और वीडियो मिले हैं। पुलिस उसके फोन से मिले हर एक डेटा की गहन पड़ताल कर रही है। इसके अलावा उसके बैंक खातों की पड़ताल की जा रही है। उसमें लड़कियों की ओर से भेजे गए पैसों के ट्रांजैक्शन मिले हैं। आगे भी जाँच जारी है।

बांग्लादेश में हिंदुओं के घर मुस्लिमों ने फूँके- मोहम्मद यूनुस ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट को माना सत्य, पर वामपंथी मीडिया को ‘मसाला’ देने के फेर में खुद बन गए मजाक

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की खबरें लगातार सामने आ रही हैं, खासकर जब से 5 अगस्त 2024 को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया। इस बीच मुहम्मद यूनुस की सरकार न सिर्फ इन हमलों को नजरअंदाज कर रही है, बल्कि इन्हें छिपाने और झूठा ठहराने की कोशिश भी कर रही है।

यूनुस ने हाल ही में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट को निशाना बनाया, जिसमें जेसोर जिले के दहार मसिहती गाँव में हिंदू घरों को मुस्लिम भीड़ द्वारा जलाए जाने की बात कही गई थी। लेकिन यूनुस ने इस घटना को सांप्रदायिक हिंसा मानने से इनकार कर दिया और इसे महज ‘बिजनेस विवाद’ करार दिया।

क्या है पूरा घटनाक्रम, क्यों देनी पड़ रही सफाई

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट (बांग्लादेश में हिंदुओं पर फिर टूटा मुस्लिम भीड़ का कहर, घरों में लगाई आग-मचाई लूटमार: इस बार लोकल नेता की मौत को बनाया हिंसा का बहाना) में बांग्लादेशी अखबार प्रोथोम आलो के हवाले से बताया कि 22 मई को दहार मसिहती गाँव में एक मछली पालन के लिए जमीन के विवाद को लेकर बीएनपी की किसान शाखा के नेता तारिकुल इस्लाम की हत्या हो गई। इसके बाद मुस्लिम भीड़ ने बदले की कार्रवाई में गाँव के 20 से ज्यादा हिंदू घरों को आग के हवाले कर दिया। दो दुकानें जला दी गईं और चार अन्य को तोड़-फोड़ दिया गया। इस हमले में 10 से ज्यादा लोग घायल हुए।

प्रोथोम आलो के पत्रकार ने बताया कि गाँव के हर हिंदू घर को जलाकर राख कर दिया गया। छह वाहन, पाँच बाइक और एक वैन भी नष्ट कर दी गई। हमलावरों ने एक 25 साल के हिंदू युवक सागर बिस्वास को अगवा कर लिया, जिसे बाद में छुड़ाया गया। पीड़ितों ने बताया कि पहले 4-5 लोगों ने हमला किया, फिर 150 से ज्यादा लोग शामिल हो गए और घरों को लूटकर, तोड़-फोड़ कर आग लगा दी।

झूठ बोलकर इस्लामी कट्टरपंथियों का बचाव कर रहे यूनुस

यूनुस ने इस घटना को सांप्रदायिक हिंसा मानने से साफ इनकार किया। उन्होंने बीबीसी और डीडब्ल्यू जैसे वामपंथी मीडिया के हवाले से दावा किया कि यह कोई सांप्रदायिक मामला नहीं, बल्कि तारिकुल की हत्या के बाद ‘गुस्साए ग्रामीणों’ की प्रतिक्रिया थी।

हैरानी वाली बात यह है कि जब तारिकुल की हत्या की बात आई, तो यूनुस ने हत्यारों को ‘हिंदू ग्रामीण’ कहा, लेकिन जब हिंदू घरों को जलाने की बारी आई, तो हमलावर सिर्फ ‘गुस्साए ग्रामीण’ बन गए। यह साफ दिखाता है कि यूनुस का मकसद हिंदुओं को बदनाम करना और मुस्लिम भीड़ को बचाना है।

यूनुस ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट पर हमला बोला, जिसमें लिखा था, “मुस्लिम भीड़ ने स्थानीय नेता की मौत के बाद हिंदू घरों को आग लगाई, यूनुस के राज में अराजकता जारी।” यूनुस ने इस खबर को गलत ठहराने की कोशिश की, लेकिन ऑपइंडिया की रिपोर्ट में कोई गलती नहीं थी।

यह पूरी तरह प्रोथोम आलो की खबर पर आधारित थी, जिसमें तथ्य साफ थे। यूनुस ने न तो इस रिपोर्ट के तथ्यों को गलत ठहराया, न ही कोई ठोस सबूत दिया। उनकी पूरी कोशिश थी कि ऑपइंडिया और अन्य भारतीय मीडिया, जो हिंदुओं पर हमलों की सच्चाई उजागर कर रहे हैं, उन्हें बदनाम किया जाए।

वामपंथी मीडिया की आड़ में सच्चाई छिपाने की कोशिश

यूनुस ने बीबीसी और डीडब्ल्यू जैसे वामपंथी मीडिया का सहारा लिया, जो हमेशा से हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को कम करके दिखाते हैं। ये मीडिया हाउस ‘फैक्ट-चेक’ के नाम पर सच्चाई को दबाने की कोशिश करते हैं।

इनका पुराना तरीका है- पहले हिंसा को पूरी तरह नकारो, अगर वह न चले तो उसे ‘राजनीतिक विवाद’ बताकर कमजोर कर दो। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले साफ तौर पर सांप्रदायिक हैं, लेकिन यूनुस और उनके वामपंथी मीडिया सहयोगी इसे ‘बिजनेस विवाद’ या ‘राजनीतिक तनाव’ बताकर सच को छिपा रहे हैं।

ऐसा ही इतिहास में हुआ है। जैसे औरंगजेब के मंदिर तोड़ने को कुछ इतिहासकार ‘राजनीतिक कदम’ बताते हैं, न कि धार्मिक असहिष्णुता। कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार को भी ‘राजनीतिक समस्या’ कहा जाता है, जबकि आतंकवादी खुलेआम इसे धार्मिक जंग कहते हैं। बांग्लादेश में भी यही हो रहा है। यूनुस और उनके समर्थक मीडिया हिंदुओं पर हमलों को झूठा या बढ़ा-चढ़ाकर बताया हुआ कहकर बच रहे हैं।

यूनुस की नाकामी और इस्तीफे की खबरें

यूनुस न सिर्फ हिंदुओं पर हमलों को छिपा रहे हैं, बल्कि उनकी सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। उनकी अंतरिम सरकार न तो ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव करा पाई है, न ही देश में अमन-चैन ला पाई है। अब खबरें हैं कि बढ़ते असंतोष के बीच यूनुस इस्तीफा दे सकते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, वह अपनी नाकामी छिपाने के लिए भारत विरोधी भावनाएँ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। उनके सहयोगी महमूदुर रहमान मन्ना ने दावा किया कि यूनुस ने देश को ‘भारतीय आधिपत्य’ के खिलाफ एकजुट होने को कहा। यह साफ दिखाता है कि यूनुस अपनी नाकामी का ठीकरा भारत पर फोड़कर अपनी साख बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

ऑपइंडिया पर हमला कर एक्सपोज हो गए मोहम्मद यूनुस

ऑपइंडिया ने जो बताया, वह पूरी तरह तथ्यों पर आधारित था। उनकी रिपोर्ट प्रोथोम आलो की खबर पर आधारित थी, जिसमें साफ था कि हिंदू घरों को निशाना बनाकर जलाया गया। ऑपइंडिया ने न सिर्फ इस घटना को उजागर किया, बल्कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे लगातार हमलों की सच्चाई को भी सामने लाया।

यूनुस का ऑपइंडिया पर हमला उनकी हताशा दिखाता है, क्योंकि वह नहीं चाहते कि उनकी सरकार की नाकामी और हिंदुओं पर अत्याचार की सच्चाई दुनिया के सामने आए। ऑपइंडिया ने निष्पक्ष पत्रकारिता की है और यूनुस के झूठ को बेनकाब करने में अहम भूमिका निभाई है।

यूनुस की सरकार हिंदुओं पर हो रहे हमलों को न सिर्फ नजरअंदाज कर रही है, बल्कि उन्हें छिपाने और गलत ठहराने की कोशिश भी कर रही है। ऑपइंडिया की रिपोर्ट पूरी तरह सही थी, जिसे यूनुस ने बिना किसी सबूत के गलत बताने की कोशिश की। वामपंथी मीडिया के साथ मिलकर वह हिंदुओं पर हमलों को ‘बिजनेस विवाद’ या ‘राजनीतिक तनाव’ बताकर सच को दबा रहे हैं। लेकिन सच को ज्यादा देर तक छिपाया नहीं जा सकता। ऑपइंडिया और अन्य भारतीय मीडिया ने बांग्लादेश में हिंदुओं की दुर्दशा को सामने लाकर सराहनीय काम किया है। यूनुस को अपनी नाकामी छिपाने की बजाय हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इस लेख का भावानुवाद किया है श्रवण शुक्ल ने।)

तुर्क ऐसा है, तुर्क वैसा है… ये केवल बॉलीवुड की फिल्मों का बकवास है, असल में नंबर वन ‘चमन’ मुल्क है तुर्की: पाकिस्तानी गधों से भी हैं गए गुजरे

तुर्की के लोग पाकिस्तान की जनता से भी ज़्यादा मूर्ख और बुद्धू हैं। 2015 में तुर्की ने रूस के लड़ाकू विमान सुखोई को मार गिराया था। उसके बाद रूस में लोगों ने तुर्की के दूतावास के सामने प्रदर्शन और तोड़फोड़ की। स्वाभाविक रूप से, इसका जवाब तुर्की ने देने की सोची।

तुर्की के लोगों ने जवाब में रूसी झंडे जलाने का कार्यक्रम भी शुरू किया। लेकिन ये मूर्ख रूस और नीदरलैंड के झंडों में अंतर नहीं कर पाए और रूसी झंडे की जगह डच झंडा जला दिया। बिना किसी कारण के झंडा जलाए जाने के चलते नीदरलैंड के लोग तुर्की से नाराज़ हो गए। उन्होंने पूरे देश में हज़ारों तुर्की झंडे जला दिए।

इतना करने के बाद भी उनका गुस्सा कम नहीं हुआ। जब तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन 2017 में नीदरलैंड गए, तो डच सरकार ने उन्हें विनम्रता से कह दिया कि ‘इधर से फूट लो!’ यह सुनकर तुर्की के लोग फिर से भड़क गए, सड़कों पर उतर आए और फिर से झंडे जलाने लगे।

लेकिन मूर्खों के कोई गाँव भले ना होते हों, देश जरूर होता है। इसी का उदाहरण देते हुए उन्होंने डच का विरोध करने को इस बार डच के बजाय फ्रांसीसी झंडे जलाए। उसके बाद, आपने सोचा होगा कि फ्रांसीसी लोग तुर्की के झंडे जलाएँगे।

उन्होंने इसका और भी कड़ा जवाब दिया। उन्होंने तुर्की के झंडे का एक डोरमैट बनाया और उसे रौंद दिया। 2018 में कुवैत में एक व्यक्ति ने अपनी तुर्की की नौकरानी को मार डाला। तुर्की ने अपनी खुफिया एजेंसी से हत्यारे की एक फोटो मँगाई। तुर्की ने इस फोटो अपने टीवी पर बड़े धूमधाम से दिखाया।

उन्होंने यह भी घोषणा की कि वे मोसाद की तरह उसे ढूंढ कर मारेंगे। लेकिन इन तुर्की लोगों ने ‘गौर से देखो इस दरिंदे को’ वाली फोटो समेत जो खबर चलाई, उसमें उन्होंने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून-जे-इनको दिखा दिया। उन्होंने राष्ट्रपति के साथ ट्रम्प कि बेटी को भी दिखाया था। इसके बाद तुर्की की बड़ी लानत-मलानत हुई।

तुर्की के पेपर को इसके बाद माफी माँगनी पड़ी। हालाँकि, इसके बाद भी अगले 2 महीने तक कोरिया में टॉयलेट पेपर पर तुर्की का झंडा लगा रहा। ऐसे देश के लिए चुप रहना ही बेहतर था। लेकिन इस बीच उन्होंने अजरबैजान के लिए आर्मेनिया से झगड़ा किया और अपनी मिसाइलों और विमानों का मज़ाक उड़वाया।

फिर पाकिस्तान की मदद करने आए और उनके ड्रोन की इज्जत में मिट्टी में मिलवा दी। ऊपर से बहिष्कार की वजह से तुर्की का व्यापार और आय भी रसातल को गई। खैर! इस कहानी से सीख मिलती है: ‘तुर्क ऐसा है और तुर्क वैसा है’, ऐसी बकवास सिर्फ़ बॉलीवुड की फिल्मों में होती है। अन्यथा, तुर्की नंबर एक का ‘चमन’ देश है।

‘रीजनरेटिव ब्रेकिंग’ को नहीं समझ पाए कॉन्ग्रेसी, उड़ाने लगे रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का ‘मजाक’: जानिए कैसे काम करती है यह तकनीक, कितनी होगी बिजली की बचत?

26 मई को कई कॉन्ग्रेस समर्थकों ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का मजाक उड़ाया। इनका मानना है कि लोकोमोटिव इंजन के ब्रेकिंग सिस्टम के जरिए बिजली पैदा करने और उसे वापस ट्रांसमिशन लाइनों में ट्रांसफर करने के बारे में रेल मंत्री ने झूठ बोला।

अश्विनी वैष्णव ने कहा था, ” ये जो नया इंजन है, जब चलता है तो ऊपर के तार से बिजली लेता है, और जब रुकता है तो अपने जेनेरेटर से बिजली लेता है और ये बिजली वापस ट्रैक के ऊपर लगे तारों में भेजता है।”

ये बयान दाहोद में 9000 HW के पहले लोकोमोटिव इंजन के लॉन्च के दौरान रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के बारे में बात करते हुए दी थी।

कॉन्ग्रेस समर्थकों ने तकनीक को समझे बिना उनका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया। एक्स पर एक पोस्ट में एमॉक ने लिखा, “ट्रेन तार से बिजली लेती है और जब ड्राइवर ब्रेक लगाता है तो वह उसी तार में वापस बिजली भेजती है, अश्विनी वैष्णव। कोई इतने आत्मविश्वास के साथ ऐसी मसखरी कैसे कर सकता है?”

पत्रकार पीयूष राय, जो अपनी मर्जी से या फिर गलती से इस तकनीक से अंजान थे। उन्होने लिखा, “मैं अभी भी इसे समझने की कोशिश कर रहा हूँ। रेल मंत्री ने यह काम तब किया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंच पर थे।”

एक और कॉन्ग्रेस समर्थक हैंडल ‘यूनाइटेड विद आईएनसी’ ने लिखा, “ट्रेन तार से बिजली लेती है और जब चालक ब्रेक लगाता है तो वह उस बिजली को उसी तार में वापस भेज देती है – अश्विनी वैष्णव, रील मंत्री।”

विवादास्पद एक्स हैंडल वी द्रविड़ियन ने लिखा, “दुखद तथ्य यह नहीं है कि अश्विनी वैष्णव मोदी की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि यह है कि वे मोटे तौर पर कह रहे हैं कि ट्रेन को तार से करंट मिलता है और जब पायलट ब्रेक लगाता है, तो इंजन बिजली को वापस तार में भेज देता है। देवियो और सज्जनों, हम मंत्रियों के साथ नहीं रह रहे हैं। हम एक क्वांटम दायरे में रह रहे हैं जहाँ अश्विनी वैष्णव निकोलस टेस्ला हैं।”

वी द्रविड़ियन हैंडल दक्षिण भारत से संचालित होता है, जहाँ जाहिर तौर पर तकनीक का बोलबाला है, फिर भी ये सोच दिखी।

अश्विनी वैष्णव का बयान

दाहोद में इलेक्ट्रिक इंजन फैक्ट्री के उद्घाटन के अवसर पर बोलते हुए, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे यह प्लांट आधुनिक इंजीनियरिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का प्रतीक है।

उन्होंने बताया कि नए लोकोमोटिव सिर्फ़ इंजन से कहीं बढ़कर हैं – वे बिना किसी शोर, कंपन के ‘चलते-फिरते कंप्यूटर सेंटर’ हैं और इनमें एयर-कंडीशन्ड केबिन और ऑनबोर्ड शौचालय भी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ये इंजन चलते समय ओवरहेड तारों से बिजली खींचते हैं और ब्रेक लगाने पर रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के जरिए उसी तारों को बिजली वापस भेजते हैं।

उन्होंने कहा, “जब ट्रेन चलती है, तो वह ओवरहेड वायर से बिजली खींचती है। जब ब्रेक लगाए जाते हैं, तो इंजन जनरेटर में बदल जाता है और ओवरहेड वायर को बिजली वापस भेजता है। यह आधुनिक तकनीक का चमत्कार है।”

भारत ने रीजेनरेटिव ब्रेकिंग तकनीक से लैस अपना पहला 9000 HW इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव पेश किया है। यह रेलवे नवाचार में एक बड़ी उपलब्धि है। इंजन को पीएम मोदी ने राष्ट्र को समर्पित किया और इसे गुजरात के दाहोद में बनाया गया है। इंजन का कोडनेम, डी9, दाहोद-9000 है।

21,405 करोड़ रुपये की लागत वाली इस इकाई से अगले दशक में 1,200 लोकोमोटिव बनाने की उम्मीद है, जिनमें से प्रत्येक 75 किमी/घंटा की औसत गति से 4,600 टन तक का भार ढोने में सक्षम है। भारतीय रेलवे इन इंजनों को निर्यात करने पर भी विचार कर रहा है।

रीजेनरेटिव ब्रेकिंग क्या है?

रीजेनरेटिव ब्रेकिंग एक परिपक्व और प्रभावी तकनीक है जो धीमी होने के दौरान ट्रेन की गतिज ऊर्जा को बिजली में बदल देती है। पारंपरिक गतिशील ब्रेकिंग सिस्टम में, ऊर्जा आमतौर पर गर्मी के रूप में बर्बाद हो जाती है। हालाँकि, रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के मामले में, ऊर्जा इलेक्ट्रिक मोटर्स में करंट को उलट देती है, जिससे ट्रेन के धीमे होने पर वे जनरेटर में बदल जाती हैं।

जितना बिजली का उत्पादन होता है, उसे फिर से बिजली वितरण प्रणाली में भेजा जाता है, जहाँ इसका उपयोग अन्य ट्रेनों या स्टेशन सुविधाओं को बिजली देने के लिए किया जा सकता है।

यह तकनीक एसी सिस्टम पर चलने वाली इलेक्ट्रिक ट्रेनों में विशेष रूप से प्रभावी है, जहाँ इसे न्यूनतम अतिरिक्त लागत के साथ लागू किया जा सकता है। डीसी-संचालित प्रणालियों को कम वोल्टेज स्तर और ग्रिड को बिजली वापस करने की सीमित क्षमता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, हालाँकि अपग्रेड से उनकी दक्षता में सुधार हो सकता है।

बजरंग बली के जन्मस्थान को कब्जे में लेना चाहती थी कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार, अंजनेय मंदिर के मुख्य पुजारी को हटाने की रची साजिश: SC ने एक्शन पर लगाई रोक

कर्नाटक के कोप्पल में भगवान हनुमान के जन्मस्थान माने जाने वाले श्री अंजनेय मंदिर का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। कॉन्ग्रेस सरकार ने मंदिर के मुख्य पुजारी विद्यादास बाबाजी को हटाकर मंदिर पर कब्जा करने की कोशिश की थी। हालाँकि कॉन्ग्रेस सरकार की मंशा पर पानी फिर गया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उसके इस फैसले पर रोक लगा दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि विद्यादास बाबाजी मंदिर में पूजा-पाठ करते रहेंगे और उन्हें मंदिर परिसर में एक कमरे में रहने की सुविधा दी जाएगी। यह फैसला मार्च 2025 के घटनाक्रम के बाद आया, जब सरकार ने पुजारी को हटाने की कोशिश तेज कर दी थी।

बजरंग बली के जन्मस्थान पर कब्जे की कोशिश

तुंगभद्रा नदी के तट पर अंजनेय पहाड़ी पर स्थित श्री अंजनेय मंदिर को बजरंग बली का जन्मस्थान माना जाता है और यह हिंदुओं के लिए बेहद पवित्र है। विद्यादास बाबाजी इस मंदिर के मुख्य पुजारी हैं और उनका रामानंदी समुदाय पिछले 120 साल से मंदिर में पूजा-पाठ करता आ रहा है। लेकिन 2018 में कर्नाटक सरकार ने कथित तौर पर गैरकानूनी तरीके से मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। जिला कलेक्टर ने कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1997 की धारा 23 के तहत मंदिर को अपने कब्जे में लेने का आदेश दिया। इसके बाद विद्यादास को हटाने की कोशिश शुरू हुई।

विद्यादास ने इस फैसले के खिलाफ कर्नाटक हाई कोर्ट में याचिका दायर की। 14 फरवरी 2023 को हाई कोर्ट ने अंतरिम आदेश दिया कि विद्यादास को मंदिर में पूजा करने से नहीं रोका जाए और उनके खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया जाए। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने इस आदेश की अनदेखी की। मार्च 2025 में कोप्पल के डिप्टी कमिश्नर और असिस्टेंट कमिश्नर ने चुनाव आयुक्त के साथ मंदिर पहुँचकर विद्यादास को पूजा करने से रोका और एक नए पुजारी को नियुक्त करने की कोशिश की। याचिका के मुताबिक, अधिकारियों ने विद्यादास को धमकाया और अपमानित किया।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

विद्यादास के वकील विष्णु शंकर जैन ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि कॉन्ग्रेस सरकार हाई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर रही है। उन्होंने बताया कि मुख्य पुजारी विद्यादास को न सिर्फ पूजा करने से रोका गया, बल्कि उनके निवास की बिजली काट दी गई और उन्हें मंदिर से हटाने के लिए साजिश रची गई। याचिका में यह भी आरोप है कि कुछ कर्मचारियों ने विद्यादास को ‘गाँजा’ (कैनबिस/ड्रग्स) केस में फँसाने की कोशिश की।

जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने मामले को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा, “कर्नाटक सरकार हाई कोर्ट के 14 फरवरी 2023 के आदेश का पालन करे। विद्यादास को मंदिर में पुजारी के तौर पर काम करने और एक कमरे में रहने की इजाजत दी जाए। अगर इस आदेश का पालन नहीं हुआ, तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा।” कोर्ट ने सरकार को नोटिस भी जारी किया।

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार पर उठ रहे गंभीर सवाल

ये पूरा मामला कॉन्ग्रेस सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है। हिंदू समुदाय का मानना है कि यह मंदिर उनकी आस्था का केंद्र है और सरकार का इसे अपने कब्जे में लेना धार्मिक परंपराओं के साथ खिलवाड़ है। विद्यादास ने हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की थी, लेकिन 9 अप्रैल 2025 को हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हिंदू समुदाय के लिए राहत भरा है। हालाँकि कोर्ट का अंतिम फैसला बाकी है। फिलहाल विद्यादास बाबाजी मंदिर में पूजा-पाठ जारी रख सकते हैं।

‘कावेरी’ इंजन की रूस में हो रही टेस्टिंग, UCAV एयरक्राफ्ट में लगेगा: सोशल मीडिया में फंड कैम्पेन के बाद आई नई जानकारी, रिपोर्ट में बताया- तेजस-AMCA में भी इंटीग्रेट करने का प्लान

सोशल मीडिया में वर्तमान में Fund Kaveri Engine (फंड कावेरी इंजन) का ट्रेंड चल रहा है। नेटीजेंस की माँग है कि भारत के स्वदेशी फाइटर इंजन प्रोग्राम कावेरी को और भी फंड स मुहैया करवाए जाएँ। इस बीच इसको लेकर एक सकारात्मक खबर सामने आई है।

ANI की एक खबर के अनुसार, कावेरी इंजन की वर्तमान में रूस में टेस्टिंग चल रही है। यह टेस्टिंग DRDO कर रहा है। अभी कावेरी इंजन को 25 घंटे और टेस्ट किया जाना है। इसके बाद यह भारत के स्टेल्थ अटैक ड्रोन UCAV में इंटीग्रेट किया जाएगा। UCAV को भारत में बनाया जा रहा है और इसके भी जल्द अंतिम रूप लेने की संभावना है।

रिपोर्ट बताती है कि कावेरी इंजन की टेस्टिंग के लिए रूस की एजेंसियों ने स्लॉट भी मुहैया करवा दिए हैं। यह टेस्टिंग रूस की राजधानी मॉस्को के निकट एक टेस्ट फैसिलिटी में हो रही है। यहाँ इस कावेरी इंजन को एक IL-76 कार्गो एयरक्राफ्ट पर लगाया जाता है और अलग-अलग पैमानों पर जाँच की जाती है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि DRDO इसे आगे UCAV के अलावा भारत के स्वदेशी एयरक्राफ्ट LCA तेजस में भी इंटीग्रेट करने की योजना पर काम कर रहा है। DRDO इसी के साथ इसे भारत के पाँचवी पीढ़ी के एयरक्राफ्ट AMCA में भी इंटीग्रेट करने पर विचार कर रहा है।

रूस में टेस्टिंग का कारण भारत के पास इससे जुड़ा इन्फ्रा नहीं होना है। कावेरी या ऐसा कोई भी इंजन बड़े कार्गो विमानों पर टेस्ट किया जाता है। इन्हें ‘टेस्टबेड’ कहा जाता है। भारत के पास कोई ऐसा टेस्टबेड नहीं है। इसके चलते कावेरी इंजन की टेस्टिंग भारत में नहीं हो पाती।

फंड कावेरी इंजन अभियान चलाने वालों की माँग है कि भारत ऐसा ही एक टेस्टबेड तैयार करे। इसके अलावा जिन भी टेस्टिंग सुविधाओं के लिए भारत को विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है, उन्हें भी भारत में विकसित किया जाए। यदि यह इंजन पूरी तरह से विकसित हो जाता है तो भारत को विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

क्या है कावेरी इंजन?

‘कावेरी’ उस इंजन प्रोग्राम का नाम है, जिसे डिफेन्स रिसर्च एंड डेवेलपमेंट आर्गेनाईजेशन (DRDO) भारत के लिए विकसित कर रहा है। DRDO की GTRE लैब इसे बना रही है। योजना है कि यह कावेरी इंजन आने वाले समय में हमारे स्वदेशी लड़ाकू विमानों में लगाया जाएगा।

इस पर लम्बे समय से काम चल रहा है। कुछ तकनीकी सीमाओं और कभी कभार फंडिंग की कमी के चलते यह प्रोजेक्ट लटका हुआ है। सबसे पहले कल्पना की गई थी कि कावेरी इंजन को भारत के अपने लड़ाकू विमान LCA तेजस में लगाया जाएगा।

कावेरी इंजन के समय पर तैयार ना हो पाने और इसका प्रदर्शन आशानुरूप ना होने के चलते इसे LCA तेजस प्रोग्राम से अलग कर दिया गया था। इसके LCA तेजस में अमेरिकी कम्पनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के बने F404 इंजन लगाए गए हैं।

भारत अब बड़ी संख्या में तेजस विमान बना रहा है लेकिन अमेरिकी कम्पनी GE इंजन की डिलीवरी में देरी कर रही है। इसके चलते नए तेजस मार्क-1A विमानों का निर्माण धीमी गति से हो रहा है। इसका सीधा प्रभाव भारत की एयरफ़ोर्स पर पड़ रहा है, जो विमानों की कमी से जूझ रही है।

पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने वालों के इंटरव्यू हो रहे रद्द, वीजा पर लगी रोक: ट्रंप की नई विदेश नीति में फिलिस्तीन-गाजा के समर्थकों पर निशाना

ट्रंप प्रशासन ने एक और बड़ा फैसला लिया है, जिसका असर दुनियाभर के उन छात्रों पर पड़ेगा जो अमेरिका में पढ़ना चाहते हैं। अब अमेरिका ने अपने दूतावासों को स्टूडेंट और एक्सचेंज विजिटर वीजा (F, M, J कैटेगरी) के लिए नए अपॉइंटमेंट लेने से रोक दिया है। यह कदम अमेरिकी विदेश डिपार्टमेंट द्वारा विदेशी छात्रों की सोशल मीडिया जाँच को और सख्त करने की तैयारी का हिस्सा है।

क्यों लिया गया यह फैसला?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बताया कि एक समीक्षा के बाद छात्र वीजा आवेदकों की सोशल मीडिया जाँच के लिए नए नियम बनाए जाएँगे। जब तक ये नए नियम नहीं आ जाते, तब तक दूतावासों को नए वीजा अपॉइंटमेंट शेड्यूल करने से रोका गया है। हालाँकि, पहले से तय किए गए अपॉइंटमेंट चलते रहेंगे।

यह फैसला ट्रंप प्रशासन की सख्त इमिग्रेशन नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वे लोगों को देश से बाहर भेजने (डिपोर्टेशन) और छात्र वीजा रद्द करने की कोशिश कर रहे हैं। प्रशासन खासकर उन छात्रों और ग्रीन कार्ड धारकों को निशाना बना रहा है जो फिलिस्तीन का समर्थन करते हैं या गाजा में इजरायल की कार्रवाई की आलोचना करते हैं। प्रशासन उन्हें अमेरिकी विदेश नीति के लिए खतरा और हमास समर्थक मानता है।

अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, नए सोशल मीडिया जाँच के लिए दूतावासों को अपने काम करने के तरीकों में बदलाव करना होगा। उन्हें हर मामले में लगने वाले समय और संसाधनों को ध्यान में रखकर ही अपॉइंटमेंट देने को कहा गया है। दूतावासों को अमेरिकी नागरिकों की सेवाओं, इमिग्रेंट वीजा और धोखाधड़ी रोकने पर ज्यादा ध्यान देने की सलाह दी गई है।

सरकार क्या कह रही है?

अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता टैमी ब्रूस ने इस फैसले पर सीधे टिप्पणी करने से मना कर दिया, लेकिन उन्होंने कहा कि अमेरिका देश में आने वाले हर व्यक्ति की जाँच के लिए हर तरीका अपनाएगा। उन्होंने कहा, “हम यह जानने के लिए हर संभव कोशिश करेंगे कि आने वाला व्यक्ति कौन है, चाहे वह छात्र हो या कोई और।”

पहले भी ऐसे मामले

ट्रंप के आलोचकों ने इस कदम को अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) पर हमला बताया है। हाल ही में, टफ्ट्स यूनिवर्सिटी की एक तुर्की छात्रा को गाजा में इजरायल की कार्रवाइयों की आलोचना करने वाले एक लेख के कारण छह हफ्तों तक लुइसियाना के एक इमिग्रेशन डिटेंशन सेंटर में रखा गया था। बाद में एक फेडरल जज ने उसे जमानत दे दी।

पिछले हफ्ते भी, ट्रंप प्रशासन ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को अंतरराष्ट्रीय छात्रों को दाखिला देने से रोकने की कोशिश की थी। हार्वर्ड में लगभग 6,800 अंतरराष्ट्रीय छात्र हैं, जो कुल छात्रों का 27% हैं। प्रशासन ने हार्वर्ड की नीतियों में बड़े बदलाव की माँग की थी, जिसके विरोध के बाद यह कदम उठाया गया।

‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ लिखने वाली छात्रा को बॉम्बे हाईकोर्ट ने दी रिहाई, कहा- उसका जीवन बर्बाद हो रहा: ऑपरेशन सिंदूर पर सरकार को बताया था ‘फासीवादी’, कश्मीर को ‘अधिकृत’ बताया था

पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने के लिए चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद 19 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्रा खाजीदा शेख ने सोशल मीडिया पर मिशन क लेकर आपत्तिजनक बातें लिखीं। इसे लेकर उसके निष्कासन और गिरफ्तारी पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार (26 मई 2025) को महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई है।

खाजीदा शेख इस समय महाराष्ट्र के यरवडा जेल में बंद है। हाईकोर्ट ने उसकी तत्काल रिहाई के आदेश देकर कॉलेज से निष्कासन को भी रद्द कर दिया है।

जम्मू-कश्मीर में 22 अप्रैल 2025 को आतंकियों ने 20 से ज्यादा हिंदू पर्यटकों को धर्म पूछकर मार दिया। इसके बाद भारत ने जवाबी एक्शन में ‘आपरेशन सिंदूर’ चलाकर पाकिस्तान में बसे 9 आतंकी ठिकानों को धवस्त कर दिया था। छात्रा ने इसकी आलोचना की थी।

क्या था मामला

खाजीदा शेख पुणे में सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय से संबद्ध एक निजी संस्थान- सिंहगढ़ अकादमी ऑफ इंजीनियरिंग की द्वितीय वर्ष की छात्रा है। 7 मई 2025 को खाजीदा ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म इंस्टाग्राम पर स्टोरी में एक पोस्ट साझा की।

इसमें पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद भारत सरकार के जवाबी एक्शन ऑपरेशन सिंदूर की आलोचना करते हुए पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लिखा। इसके बाद 9 मई को उसे गिरफ्तार किया गया।

इंस्टाग्राम पर छात्रा ने पाकिस्तान का समर्थन करते हुए आतंकी ठिकानों पर सटीक निशानों को लिए भारतीय सरकार को ‘फासीवादी’ कहा। पोस्ट में आगे छात्रा ने भारत के आत्मरक्षा के अधिकार को ‘बलि का बकरा’ कहकर खारिज कर दिया।

छात्रा ने अपनी याचिका में यह दावा किया था कि उसने अपनी पोस्ट को दो घंटे के अंदर डिलीट कर दिया था। इसके बावजूद उसे ऑनलाइन धमकियाँ मिली और गिरफ्तारी की गई।

अपने निष्कासन और गिरफ्तारी पर खाजीदा ने एक याचिका दायर की थी। इसमें उसने दावा किया कि कॉलेज से उसका निष्कासन ‘अवैध और मनमाना’ है।

जस्टिस ने पूछा, क्या कर रहे?

याचिका की सुनवाई के दौरान जस्टिस गोडसे ने सरकार से कहा, “आप एक छात्रा की जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं। यह कैसा व्यवहार है? कोई अपनी बात रखता है तो आप उसकी जिंदगी बर्बाद कर देंगे? बिना कोई स्पष्टीकरण माँगे आप छात्रा को निष्कासित कैसे कर सकते हैं?”

छात्रा की वकील फरहाना शाह ने कोर्ट तत्काल राहत की माँग करते हुए दलील दी कि उस समय छात्रा की सेमेस्टर परीक्षाएँ चल रही थीं। उस समय उसका निष्कासन अनुचित है।

कॉलेज के वकील ने इस पर सुझाव दिया कि उसे पुलिस सुरक्षा में परीक्षा देने की अनुमति दी जाए। अदालत ने वकील के इस सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया और कहा, “वह कोई अपराधी नहीं है।”

‘शिक्षा के उद्देश्य’ पर बात करते हुए जस्टिस गौरी गोडसे ने कहा, “एक शैक्षणिक संस्थान की भूमिका क्या होती है? क्या यह केवल एकेडमिक शिक्षा के लिए है या फिर युवाओं सही मार्गदर्शन और सुधारने के लिए?”

जस्टिस गोडसे ने आगे पूछा, “आप एक विद्यार्थी तैयार करना चाहते हैं या एक अपराधी?”

सुनवाई के बाद कोर्ट ने राज्य को आदेश दिया कि छात्रा की रिहाई की प्रक्रिया सरल कर इस बात को सुनिश्चित करे कि छात्रा बिना डरे या किसी पुलिस सुरक्षा के अपने बचे हुए एक्जाम्स दे। जस्टिस गोडसे ने कहा, “उसे परीक्षा देने से रोका नहीं जा सकता। साथ ही पुलिस की निगरानी में परीक्षा देने के लिए भी मजबूर नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने इस बात की भी अनुमति दी कि इस मामले को आपराधिक रिट में बदला जा सकता है या फिर जरूरत पड़ने पर नई याचिका दायर की जा सकती है।

अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में छात्रा ने सरकार पर आरोप लगाए थे कि सीमा पार आतंकवाद का उपयोग कर सरकार अपनी विफलता छुपा रही है। इसके लिए पोस्ट में भड़काऊ तरीके से ‘अधिकृत कश्मीर’ कहा गया है। ये सीधे तौर पर जम्मू और कश्मीर पर भारत की संप्रभुता के लिए चुनौती से कम नहीं है।

अपने एक अन्य पोस्ट में, छात्रा ने विवादित द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की खुले तौर पर प्रशंसा की थी, जबकि पहलगाम आतंकी हमलों के पीड़ितों के लिए भारत के एक्शन को ‘हिंदुत्व आतंक’ कहकर ‘निर्दोष’ लोगों के खिलाफ राज्य-प्रायोजित प्रतिशोध कहा था।

असल में छात्रा ने अपनी पोस्ट में जिन्हें ‘निर्दोष’ कहा था, वे वास्तव में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी थे, जिन्हें ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत की जवाबी हवाई हमलों में निशाना बनाया गया था।

CJI संजीव खन्ना ने की महाभियोग की सिफारिश, मानसून सत्र में जस्टिस यशवंत वर्मा पर होगा फैसला: घर पर मिला था पैसों का पहाड़, अब जा सकती है कुर्सी

दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज, जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ा एक बड़ा अपडेट सामने आया है। उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव अब केंद्र सरकार की ओर से संसद में लाए जाने की संभावना है। यह फैसला उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जाँच समिति की रिपोर्ट के बाद आई है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पूर्व चीफ जस्टिस (CJI) संजीव खन्ना की सिफारिश को राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष को भेज दिया है। इस सिफारिश में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की बात कही गई थी।

जानकारी के मुताबिक, चूंकि पूर्व CJI की रिपोर्ट में महाभियोग की सिफारिश है, इसलिए अब इस प्रस्ताव को संसद के आगामी मानसून सत्र में पेश किया जाएगा। मानसून सत्र जुलाई के तीसरे सप्ताह तक शुरू होने की उम्मीद है।

सरकार इस मामले पर विपक्षी दलों से भी सहमति बनाने की कोशिश करेगी, क्योंकि किसी जज को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित करना होता है।

आखिर क्या है पूरा मामला?

यह मामला जस्टिस यशवंत वर्मा पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से जुड़ा है। 14 मार्च 2025 को उनके सरकारी आवास पर आग लगने के दौरान बड़ी मात्रा में कैश मिलने की बात सामने आई थी। इन आरोपों की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 22 मार्च 2025 को एक तीन सदस्यीय आंतरिक समिति का गठन किया था।

इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी एस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस अनु सिवरमन शामिल थीं। समिति ने कई गवाहों के बयान दर्ज किए और 3 मई 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों को विश्वसनीय पाया गया।

रिपोर्ट सामने आने के बाद, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को जांच रिपोर्ट भेजते हुए जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की। हालाँकि, जस्टिस वर्मा से इस्तीफा देने को कहा गया था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उन्हें 20 मार्च 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया था और उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को वहाँ जज के रूप में शपथ ली, लेकिन उन्हें अभी तक कोई काम नहीं सौंपा गया है।

हाल ही में, 26 मई 2025 को, सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत जस्टिस वर्मा पर समिति की रिपोर्ट माँगने वाली एक याचिका को भी खारिज कर दिया था।

महाभियोग की प्रक्रिया कैसे काम करती है?

संविधान के अनुसार, किसी संवैधानिक अदालत के न्यायाधीश को केवल गलत व्यवहार साबित होने पर या ‘अक्षमता’ के आधार पर ही हटाया जा सकता है। न्यायाधीश जाँच अधिनियम, 1968 में इसके लिए पूरी प्रक्रिया बताई गई है।

प्रस्ताव पेश करना- किसी जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में कम से कम 100 सदस्यों और राज्यसभा में कम से कम 50 सदस्यों के समर्थन से ही पेश किया जा सकता है।

जाँच समिति का गठन- यदि किसी भी सदन में महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो अध्यक्ष/सभापति एक तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन करते हैं।

रिपोर्ट और बहस- यदि समिति जज को दोषी पाती है, तो उसकी रिपोर्ट सदन द्वारा अपनाई जाती है और फिर जज को हटाने पर बहस होती है।

वोट और राष्ट्रपति का आदेश- सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित होने के लिए, लोकसभा और राज्यसभा दोनों में ‘उपस्थित और वोट करने वाले’ कम से कम दो-तिहाई सदस्यों को हटाने के पक्ष में वोट करना होता है। साथ ही, पक्ष में वोटों की संख्या प्रत्येक सदन की ‘कुल सदस्यता’ के 50% से अधिक होनी चाहिए। यदि संसद ऐसा वोट पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति जज को हटाने का आदेश जारी करते हैं।

यह देखना होगा कि सरकार इस मामले पर किस तरह आगे बढ़ती है और क्या संसद में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित हो पाता है।

जिस साध्वी को तोड़ नहीं पाई दिग्विजय सिंह की पुलिस, उनको राष्ट्रपति ने पद्म भूषण का दिया सम्मान: दिया था- ‘हाँ हम हिंदू हैं, हिंदुस्तान हमारा है’ का नारा, भाषण के बिकते थे कैसेट

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देश में अलग-अलग क्षेत्रों में योगदान देने वाली हस्तियों को सम्मानित किया है। राष्ट्रपति भवन में आयोजित नागरिक अलंकरण समारोह के दूसरे चरण में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने वर्ष 2025 के लिए पद्म पुरष्कार प्रदान किए।

यह समारोह मंगलवार (27 मई, 2025) को राष्ट्रपति भवन में हुआ। इस समारोह में दिवंगत डॉ. शारदा सिन्हा, ओसामू सुजुकी, डी नागेश्वर रेड्डी समेत 68 हस्तियों को सम्मानित किया गया। इस दौरान साध्वी ऋतंभरा को भी सामाजिक कार्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

राष्ट्रपति से पद्म भूषण सम्मान पाने वाली साध्वी ऋतंभरा ने राम मंदिर आंदोलन में विशेष भूमिका निभाई थी। आंदोलन के दौरान उनके भाषणों की गूँज देशभर में फैली। उनके भाषण इतने प्रसिद्ध थे कि बाजार में इसके कैसेट्स बेचे जाने लगे। ‘महाकाल बनकर दुश्मन से टकराएँगे, जहाँ बनी है मस्जिद, मंदिर वहीं बनाएँगे’ जैसे नारों को सुनकर देशवासी के हौसले बुलंद हो जाते थे।

लेकिन राम जन्मभूमि को वापस पाने का साध्वी ऋतंभरा का संघर्ष आसान नहीं था। उन्हें नीचा दिखाने की तमाम कोशिशें तत्कालीन सरकारों ने की थी। मुस्लिम तुष्टिकरण की मसीहा इन सरकारों ने इस तरह का माहौल बनाया जैसे वह साध्वी न होकर कोई आतंकी हों।

साध्वी ऋतंभरा को आंदोलन के दौरान ईसाई मिशनरियों के खिलाफ बोलने पर कॉन्ग्रेसी दिग्विजय सिंह की सरकार ने गिरफ्तार भी कर लिया था। इसके बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वह राम मंदिर बनाने के हक में लड़ती रहीं। 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन से पहले साध्वी ने आंदोलन से जुड़ी यादें ताजा की थी। इस दौरान उन्होंने सरयू का जल हाथ में लेकर राम मंदिर निर्माण का संकल्प वाली बात भी दोहराई थी।

साध्वी ने सामाजिक कार्यों में हमेशा सबसे आगे आकर काम किया। राम मंदिर आंदोलन के बाद उन्होंने वृंदावन में 2001 में वात्सल्य ग्राम की स्थापना की। यह अनाथ बच्चों और बुजुर्गों के लिए एक ऐसा घर है, जहाँ हर परिवार में माँ, मौसी और भाई-बहन का वातावरण होता है। यहाँ बच्चे उन्हें दीदी माँ कहकर उन्हें बुलाते हैं। इसी के साथ साध्वी बालिका सैनिक स्कूल और आदिवासी बेटियों के लिए स्कूल जैसी कई संस्थाएँ भी संचालित करती हैं।