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इस्लामी आतंकियों की तरफ से पाकिस्तानी हीरो-हिरोइन करते रहे बैटिंग, पर भारतीय सेना के साथ खड़ा नहीं हो पाया बॉलीवुड: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर मौन रहे इन पतितों का इलाज क्या है?

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले में 26 हिंदुओं को मार दिया गया। मरने से पहले उनका नाम पूछा गया, प्रमाण-पत्र माँगा गया और यहाँ तक कि कपड़े उतार कर इसकी पुष्टि भी की गई। लेकिन क्या आपने इस्लामी आतंक के विरोध में बॉलीवुड के ‘तख्ती गैंग’ की आवाज सुनी?

पहलगाम हमलों में धर्म पूछने तक ही भयावता सीमित नहीं रही। इस प्रक्रिया के बाद महिलाओं के सामने ही उनके सुहाग और घर के पुरुषों को माथे पर गोली मारी गई। इस सदमे से उबर पाना शायद उन महिलाओं के लिए कभी संभव नहीं हो पाएगा। इस भावना को समझ पाना भी हर किसी के बस की बात नहीं है। फिर भी उनके संवेदना पर सहानुभूति भरे शब्दों का मरहम तो लगाया ही जा सकता है। लेकिन बॉलीवुड के ज्यादातर हस्तियों ने इसकी जरूरत नहीं समझी।

कभी साथ खड़ा होता था बॉलीवुड

अतीत में ऐसे मौकों पर हमने बॉलीवुड की बड़ी हस्तियों की आवाज सुनी है। आपातकाल के दौर में जब मीडिया की आवाज कुचलने की कोशिश हुई थी, तब भी बॉलीवुड में वैसी चुप्पी नहीं देखी गई थी, जैसा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देखने को मिला।

1948 में जब पाकिस्तान ने कश्मीर में कबायली हमले का नाम लेकर भारत पर आक्रमण किया, उस समय प्रसिद्धि के चरम पर रहे मुकेश, राज कपूर, आइएस जौहर, गीता बाली, नर्गिस, कामिनी कौशल समेत कई सितारों ने युद्ध में भारत का पलड़ा मजबूत रखने के लिए कई लाख रुपए जुटाए।

इसके बाद 1962 और 1965 के युद्ध में भी किशोर कुमार, सुनील दत्त, नर्गिस, लता मंगेश्कर, वहीदा रहमान आदि मोर्चे तक पहुँचे और भारतीय जवानों का मनोबल बढ़ाया और धन जमा किया।

1971 में हुए युद्ध में प्राण, किशोर कुमार, शम्मी कपूर, लता मंगेश्कर, वहीदा रहमान, कल्याणजी-आनंदजी और नर्गिस जैसे सितारों ने बांग्लादेश सहायता समिति बनाई। 1999 के कारगिल युद्ध में तो बॉलीवुड के सितारों में ऐसा आक्रोश था कि जवानों का साथ देने के लिए नाना पाटेकर मोर्चे तक पर चले गए थे।

कारगिल के बाद भी पाकिस्तान लगातार अपनी औकात दिखाता ही रहता है। कभी 2016 में उरी तो कभी 2019 में पुलवामा में जवानों को बेखौफ होकर मारना, 26/11 के मुंबई हमले करना या जून 2024 में वैष्णो देवी जा रही बस को निशाना बनाना, आतंकियों ने हमारे खून को पानी की तरह बहाया।

इस तरह के कई घर उजाड़ दिए, कितने ही बच्चों को अनाथ कर दिया। लेकिन देश में हुई ज्यादातर घटनाओं पर कुछ सितारों को छोड़कर बाकी ने चुप्पी साधने में बेहतरी समझी।

दुश्मन देश के अभिनेता से लें सीख

अब एक बार फिर वापस आते हैं अपने मुद्दे पर। पहलगाम आतंकी हमले हुए। कई लोग घायल हुए। कुछ अपने परिवार को हमेशा के लिए छोड़ गए। इन सभी के लिए और देश के हित में बॉलीवुड के इक्का-दुक्का लोगों ने पोस्ट किया।

पूरी ‘खान आर्मी’, ‘कपूर खानदान’, भट्ट कैंप समेत अन्य बड़े नामों ने इससे दूरी बनाई और बस अपने काम से काम रखा। वैसे आपको याद दिला दूँ कि ये वही बड़े-बड़े नाम हैं जिन्होंने कठुआ मामले में तख्ती लेकर फोटो खिंचाई थी। उस समय उन्हें खुद को हिंदू होने पर शर्म आ रही थी।

बॉलीवुड के कलाकारों को जहां एक ओर इतना समय नहीं मिल पाया कि वह देश के लिए दो लाइन ही लिख दें। वहीं दूसरी ओर, पहलगाम हमले की जवाब में जब भारत ने एक्शन लिया तो पाकिस्तान के अधिकतर बड़े-बड़े नाम अपने मुल्क के हक में खड़े नजर आए।

उनमें से कइयों ने तो बॉलीवुड में कई फिल्मों में काम भी किया है। ‘सनम तेरी कसम’ में प्रसिद्धि पा चुकी पाकिस्तानी अभिनेत्री मावरा होकेन ने तो भारत को ‘कायर’ तक की उपाधि से नवाज दिया। फवाद खान, हानिया आमिर, माहिरा खान जैसे कई नाम इनमें शामिल हैं। खास बात तो यह है कि उनके बड़ी संख्या में भारत में भी प्रशंसक हैं।

बॉलीवुड की नकली देशभक्ति

देशभक्ति को लेकर भारतीय अभिनेता अक्सर तब जागते हैं जब उनकी कोई फिल्म रिलीज होने वाली हो या फिर इससे उनका कोई निजी हित जुड़ा हुआ हो। ताजा उदाहरण आमिर खान हैं जिनकी फिल्म ‘सितारे जमीन पर’ सिनेमाघर में रिलीज होने वाली है। पहलगाम हमले से लेकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ तक की पूरी प्रक्रिया के दौरान आमिर ने चुप्पी बनाए रखी। लेकिन, फिल्म प्रमोशन से ठीक एक दिन पहले उनकी टीम ने प्रधानमंत्री के पक्ष में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए।

इसी तरह तुषार कपूर भी ‘कंपकंपी’ के प्रमोशन के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुँचे। यहाँ उनसे पाकिस्तान का साथ देने वाले देश तुर्की के बॉयकॉट पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने इससे किनारा कर लिया। हालाँकि वो ये कहना नहीं भूले कि वो ‘देश’ के साथ हैं।

बिन बोले भी कुछ लोग देश के हक में हैं

हालाँकि इन अभिनेताओं से परे बॉलीवुड में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बिना कुछ कहे देश का साथ देने में पीछे नहीं रहते। भारत के लिए अनाप-शनाप लिखने वाली मावरा को बॉलीवुड में बन रही ‘सनम तेरी कसम -2’ से मेकर्स ने निकाल फेंका। यहाँ तक कह डाला कि मावरा को एक भी रुपए नहीं दिए जाएंगे। फिल्म के अभिनेता हर्षवर्धन राणे ने भी भारत के हक में बात की।

इसके अलावा फिल्म कपूर एंड संस के गाने ‘बुद्धू सा मन’ के पोस्टर से Spotify app ने फवाद खान को फोटोशॉप कर हटा दिया। जबकि फवाद ने उस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई थी। इसी तरह ‘रईस’ फिल्म के गाने जालिमा को पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिरा खान पर शूट किया गया है। लेकिन गाने के पोस्टर से उन्हें गायब कर दिया गया है।

निष्कर्ष

बॉलीवुड में अभिनेताओं ने एक ट्रेंड चला लिया है, जिसमें हकीकत हो या फिर फिल्में- अभिनेताओं ने हिंदुओं का मजाक उड़ाना, उनके प्रतीकों पर तंज कसना, उनकी मान्यताओं पर सवाल खड़े करना, उनका सबसे पसंदीदा शौक बन गया है।

हालाँकि जब भी मुस्लिमों की बात होती है तो पूरा बॉलीवुड ‘पीड़ित’ की तरह व्यवहार करने लगता है। फिर चाहे वह सिनेमा बनाएँ या फिर उनके निजी जीवन हो, इनका दोगलापन बाहर आ जाता है और हर संभव कोशिश में यह लग जाते हैं कि किस तरह हिंदुओं को अपमानित करें और मुस्लिम संप्रदाय की आन बान शान को मजबूती से दिखा सकें।

समय के साथ आम लोगों को भी ये समझ में आने लगा है कि बॉलीवुड में प्रसिद्धि और प्रशंसकों का प्यार पाने वाले ये नाम सिर्फ अपने मतलब के लिए ही जीते हैं। इससे परे फिर चाहे आस पास के लोग हों, उनका समाज हो या देश हो, इन लोगों को कोई मतलब नहीं होता।

इसी के चलते अब सोशल मीडिया का सहारा लेकर लोग इन अभिनेताओं और उनकी फिल्मों का बॉयकॉट का हैशटैग और उन्हें ट्रोल कर नींद से जगाने काम करने लगे हैं। लेकिन हमने कई मौकों पर देखा है कि आम लोगों की यह चेतना कुछ दिनों की ही होती है। इसलिए इनके धंधे पर कुछ खास असर नहीं पड़ता है।

ऐसे में यह आवश्यक है कि बॉलीवुड की यह चुप्पी हमें हर उस मौके पर कचोटे जब भी हमें इन सितारों में सेलिब्रिटी और इनके सिनेमा में मनोरंजन दिखता है।

‘द वायर’ को भोपाल के ‘मुस्लिम गैंग’ की करतूतें उजागर होने से दिक्कत, ‘सवाब’ के लिए हिंदू लड़कियों से रेप को भूल ‘मीडिया एथिक्स’ का बजा रहा झुनझुना

भोपाल में मुस्लिमों लड़कों ने एक गैंग बनाया। इस गैंग ने एक-एक कर कई हिन्दू लड़कियों को फँसाया, उनका रेप किया, वीडियो बनाया। यहाँ तक कि उनके वीडियो पोर्न साइट्स पर बेचने का प्रयास भी किया। मुस्लिम लड़के ने पूछताछ में बताया कि यह सब ‘सवाब’ के लिए किया जाता है। इसको ज्यों का त्यों मीडिया ने लिख दिया। अब इससे प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ को दिक्कत हो गई। द वायर को इससे समस्या है कि जिन मुस्लिमों ने यह घृणित अपराध ‘सवाब’ के लिए किया, उनकी सच्चाई क्यों छापी गई।

द वायर में हुनेज़ा खान ने 16 मई, 2025 को एक लेख लिखा। इस लेख में खान ने दावा किया कि भोपाल के इस रेप मामले का मीडिया ट्रायल किया है। लड़कियों की भयावह आपबीती सुन कर बनाई गई इन खबरों से ‘मजहबी नफरत’ पैदा होती है, यह वायर ने लिखा। मुस्लिम लड़कों ने भोपाल में हिन्दू लड़कियों को गाँजा पिलाकर उनका रेप किया था, उनके वीडियो बनाए थे, सिगरेट से जलाते भी थे। यह बातें जब मीडिया संस्थानों ने बिना लागलपेट के कह दीं, तो वायर को मिर्ची लग गई। उसे यह बातें व्हाट्सएप फॉरवर्ड जैसी लगीं।

हिन्दू बच्चियों की पीड़ा वायर को व्हाट्सएप फॉरवर्ड जैसी लगती है। वायर इस घटना को हिन्दू लड़कियों के खिलाफ किए गए अपराध नहीं बल्कि ‘कथित’ तौर पर ‘कॉलेज की लड़कियों’ के साथ हुई एक घटना बताता है। यानी एक तरफ तो वह मीडिया संस्थानों पर इसलिए गुस्सा है कि उन्होंने इन मुस्लिमों की सच्चाई बताओ बताई और लोगों को जागरूक किया वहीं दूसरी तरफ वह इस पूरे अपराध को ही टोन डाउन कर देता है और सच्चाई को करीने से छुपा लेता है।

वायर कहता है कि इस तरह की रिपोर्टिंग के चलते मीडिया के ‘एथिक्स’ यानी आचार में कमी आई है। यानी अगर मीडिया हिन्दुओं की पीड़ा दिखाने लगे तो उसका एथिक्स खत्म हो जाता है। याद रखिए कि वायर वही संस्थान है जिसने भाजपा के खिलाफ एक हिट स्टोरी की थी। बाद में उसे इसे माफ़ी माँगते हुए हटाना पड़ा था। उसके साथ यह एक बार नहीं हुआ, बल्कि बार-बार उसने माफी माँगी है। उसके यहाँ अपूर्वानंद जैसे लोग लिखते हैं, जिन पर दिल्ली दंगों में शामिल होने का आरोप है।

यही वायर ‘एथिक्स’ की बात कर रहा है। यह वैसी ही बात हुई जैसे कोई डकैत इस बात की आलोचना करे कि हिंसा क्यों बुरी चीज है। वायर इसी खबर में पूरा फोकस इस बात पर शिफ्ट करना चाहता है कि यह अपराध असल में मुस्लिम लड़कों ने अपनी जिहादी मानसिकता के चलते नहीं बल्कि ‘पितृसत्ता’ के चलते किए हैं। वायर की यह मुस्लिम अपराधियों को बचाने की बेशर्मी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। वह युद्ध काल में तक भारत विरोधी प्रोपेगेंडा को हवा देता रहा है, हिन्दुओं के खिलाफ अपराध उसके लिए तो छोटी बात हैं।

जिस ‘लव जिहाद’ के हजारों मामले सामने आ चुके हैं, जिसकी शिकार हिन्दू ही नहीं ईसाई लड़कियां तक रही हैं, वह वायर को गलत लगता है। वह जिहाद का असल मतलब बताता है। असल में वायर को समस्या इस बात से नहीं है कि मीडिया के कोई स्टैण्डर्ड गिर रहे हैं, या फिर मीडिया चीजों का हौव्वा खड़ा कर रही है। उसे पीड़ा इस बात की है कि मुस्लिमों का नाम और उनके मिशन को मीडिया ने साफ़ तौर क्यों नहीं बताया।

वायर वे स्वर्णिम दिन वापस चाहता है, जब मुस्लिम आरोपित होने पर ‘मैन’, ‘शख्स’ और ‘समुदाय विशेष’ जैसे शब्द लिख कर करीने से उनका अपराध छुपा लिया जाता था। जब हिन्दू को आक्रामक दिखाया जाता था। वह वे दिन वापस चाहता है जब दंगों में मारे जाने के बाद भी हिन्दू ही अपराधी होते थे। मीडिया के स्टैण्डर्ड गिरने से अगर उसे मतलब होता तो सबसे पहले रोज झूठ का कारोबार करने वाला यह संस्थान खुद ही अपना शटर गिराता। उसकी पीड़ा दूसरी है।

भोपाल के मामले में मुस्लिम गैंग के सरगना फरहान ने पुलिस पूछताछ में बताया था कि उसे हिन्दू लड़कियों का रेप करने, उन्हें फँसाने और वीडियो के बहाने धमकाने का कोई भी पछतावा नहीं है। उसने पुलिस को बताया था कि यह इस्लाम के हिसाब से सवाब का काम है। फरहान ने पुलिस को यह भी बताया है वह हिन्दू लड़कियों का जीवन बर्बाद करना चाहते थे और इस काम को जिहाद मानते थे, इसलिए उन्हें ही निशाना बनाते थे। उसे इस बात पर गर्व है।

इस गैंग में शामिल लड़के एक दूसरे का वीडियो रेप करते हुए बनाते थे। गैंग में शामिल लड़कों के नाम फरहान, अबरार, नबील, साद और अली समेत तमाम थे। इनमें से कोई रेप करने के लिए कमरा दिलाता था तो कोई गांजा लाता था। कोई सलाह देता था कि अगर कोई हिन्दू लड़की रेप से मना करने लगे तो उसका वीडियो बेच दो। डांस एकेडमी, कॉलेज, ऑफिस समेत तमाम ऐसी जगहें थीं जहाँ से इन हिन्दू लडकियों को निशाना बनाया जाता था। लेकिन वायर के लिए यह सब सच बताना ‘घृणा’ का काम है।

वायर को अब यह दर्द होता रहेगा, क्योंकि समाज में पिछले 11 वर्षों में जो बदलाव आया है, उसने हिन्दुओं को अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए मजबूत किया है।

जिस अब्दुल के परिवार को 1 लाख देंगे राहुल गाँधी, वह तालाब पर नहाने आई ST महिला का करना चाहता था रेप: ग्रामीणों की पिटाई में मौत, झारखंड सरकार पैसा-नौकरी-घर सब देगी

झारखंड के बोकारो जिले में पुलिस को सूचना मिली की एक व्यक्ति जिसका नाम अब्दुल है, उसे कुछ लोग बंधक बनाकर पीट रहे हैं। मौके पर पहुँची पुलिस ने युवक को लोगों से छुड़ाया और उसे अस्पताल पहुँचा, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। अब्दुल का पूरा नाम अब्दुल कलाम था और उसकी उम्र 22 साल थी। आरोप है कि अब्दुल ने तालाब पर नहाने गई 27 साल की एसटी महिला को दबोच लिया और उसके साथ रेप की कोशिश की। जिसके बाद इकट्ठा हुए ग्रामीणों ने उसे बंधक बना लिया और उसकी पिटाई कर दी। अब ये पूरा मामला मॉब लिंचिंग का बताया जा रहा है और अब्दुल के लिए सोशल मीडिया पर न्याय की माँग भी की जा रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये वारदात गुरुवार (8 मई 2025) की है, जो पेंक नरेनपुर थाना इलाके में घटी। जब सटरिंग का काम करने वाला 22 साल के अब्दुल कलाम काम के सिलसिले में बोकारो ज़िले के पेंक नारायणपुर थाना क्षेत्र के कडरूखुट्ठा गाँव पहुँचा था। गाँव के ही महावीर मुर्मू की पत्नी तालाब में नहा रही थी। तभी अब्दुल वहाँ पहुँचा और महिला से छेड़छाड़ शुरू कर दी। आरोप है कि उसने दुष्कर्म की भी कोशिश की।

ऑपइंडिया के पास इस मामले की एफआईआर कॉपी मौजूद है। एफआईआर के मुताबिक, अब्दुल ने महिला को न सिर्फ पीछे से कस कर पकड़ा, बल्कि उसके स्तन भी दबोच लिए। उसने महिला को पटक दिया और रेप की कोशिश की।

महिला ने अब्दुल का हाथ काट लिया और फिर वो चिल्लाने लगी। जब तक मौके पर लोग पहुँचते, अब्दुल फरार हो गया। हालाँकि महिला के शोर मचाने पर पहुँचे लोगों और परिजनों ने उसे दौड़ाकर पकड़ लिया और पेड़ से बाँध दिया। कुछ लोगों ने उसको थप्पड़ भी जड़ें। इसके बाद लोगों ने उसकी पहचान की जानकारी ली, तो पता चला कि वो पेंच गाँव का ही अब्दुल कलाम है। इसके बाद पुलिस को बुलाकर उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया।

हालाँकि मीडिया रिपोर्ट्स और अब्दुल के चाचा की ओऱ से दर्ज कराई गई एफआईआर लिखा है कि लोगों की पिटाई से अब्दुल घायल हो गया। जब पुलिस अब्दुल को बोकारो थर्मल हॉस्पिटल लेकर अस्पताल पहुँची, तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। इस घटना को मॉब लिंचिंग यानी भीड़ द्वारा हत्या का नाम दिया गया।

अब्दुल के चाचा मो. कलीमुद्दीन ने FIR में दावा किया कि अब्दुल मानसिक रूप से बीमार था। उसका राँची और हजारीबाग में इलाज भी चला था। चाचा का कहना है कि अब्दुल कोई अपराधी नहीं था, और अगर उसने कुछ गलत किया भी, तो उसे कानून को सौंपना चाहिए था, न कि भीड़ को उसकी जान ले लेनी चाहिए थी। अब्दुल की अम्मी रेहाना खातून का रो-रोकर बुरा हाल है। वो कहती हैं कि अब्दुल उनका इकलौता सहारा था। उसके पिता कयूम अंसारी पहले ही गुजर चुके हैं, और अब वो पूरी तरह बेसहारा हो गई हैं।

अब्दुल के चाचा की शिकायत पर मॉब लिंचिंग का केस दर्ज कर रुपण माँझी, बहाराम माँझी, सुखलाल माँझी और बालेश्वर हाँसदा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। बेरमो के एसडीएम मुकेश मछुआ ने बताया कि मॉब लिंचिंग के तहत अब्दुल के परिवार को सरकार की तरफ से 4 लाख रुपये का मुआवजा, एक आवास और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी। लेकिन अब्दुल के परिवार ने 4 लाख के मुआवजे को लेने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि उन्हें पैसा नहीं, इंसाफ चाहिए।

रेप की कोशिश करने वाले अब्दुल के पक्ष में उतरी झारखंड की हेमंत सरकार

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने अब्दुल के परिवार को 1 लाख रुपये की अतिरिक्त मदद देने का ऐलान किया। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी 1 लाख रुपये की सहायता देने की बात कही। इसके अलावा, सिद्दिकी समुदाय ने अब्दुल की अम्मी को 51 हजार रुपये की मदद दी।

झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री और कॉन्ग्रेस विधायक इरफान अंसारी खुद अब्दुल के घर गए और अब्दुल की अम्मू रेहाना खातून से मुलाकात की। इरफान अंसारी ने वादा किया कि दोषियों को कड़ी सजा दी जाएगी। इरफान ने कहा, “हमारी सरकार इस मामले में गंभीर है। पीड़ित परिवार को हर तरह की मदद दी जाएगी।” डुमरी विधायक जयराम कुमार महतो, बेरमो सर्किल इंस्पेक्टर नवल किशोर, और कई स्थानीय अधिकारी भी अब्दुल के परिवार से मिलने पहुँचे।

फोटो साभार: प्रभात खबर

कॉन्ग्रेस और इंडी गठबंधन ने इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की भरपूर कोशिश की। राहुल गाँधी द्वारा मुआवजे की घोषणा और स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी का अब्दुल के परिवार से मिलना इस बात का संकेत था कि वे इस घटना को अपने वोटबैंक को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे। यह वही कॉन्ग्रेस है, जो आदिवासी समुदाय के अधिकारों की बात तो करती है, लेकिन जब बात उनकी बहन-बेटियों की इज्जत की आती है, तो चुप्पी साध लेती है।

सोशल मीडिया, खासकर X पर लोग हेमंत सरकार और राहुल गाँधी पर निशाना साध रहे हैं। लोगों का कहना है कि हेमंत सोरेन सरकार लोगों के टैक्स पेयर्स के पैसों को रेपिस्टों के परिवार को देने में खर्च कर रही है।

दूसरी तरफ, अब्दुल के समर्थक इसे मॉब लिंचिंग का मामला बता रहे हैं। वो कहते हैं कि अब्दुल को बिना सबूत के मार डाला गया।

अब्दुल के समाज के लोगों ने उसे मेहनती, मासूम, मानसिक रूप से कमजोर बताया गया। सदफ अफरीन जैसे लोगों ने इसे हिंदू-मुस्लिम का रंग देने की कोशिश की, यह कहकर कि अब्दुल को सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि वो मुस्लिम था।

इस पूरे मामले में सबसे दर्दनाक बात यह है कि पीड़िता की आवाज को हर कोई दबाने में लगा है। वो महिला, जिसके साथ अब्दुल ने घिनौनी हरकत की, वो आज मानसिक और सामाजिक आघात से गुजर रही है। उसका परिवार डर और दबाव में जी रहा है। उनके समुदाय के लोग, जो उसकी इज्जत बचाने के लिए आगे आए, वो जेल में हैं। सवाल ये है कि एक तरफ अब्दुल के परिवार को तमाम मदद मिल रही है, लेकिन दूसरी तरफ पीड़िता और उसके परिवार को हेमंत सरकार क्या दे रही है? सिर्फ जेल और सजा?

पाकिस्तान के पास दिखाने को 1 लड़ाकू विमान तक नहीं, पर दावा भारत के 6 फाइटर प्लेन गिराने का: 7 ‘पत्रकार’ ने गढ़ा प्रोपेगेंडा, ब्लूमबर्ग-रायटर्स-NYT जैसे ‘मीडिया संस्थानों’ ने फैलाया

भारत ने 7 मई, 2025 को पाकिस्तान और POK के भीतर 9 जगह आतंकी ठिकानों को मिसाइल-ड्रोन से उड़ाया। इसके बाद पाकिस्तानियों ने भारत के सैन्य अड्डे निशाने पर लेने का प्रयास किया। इसमें वह विफल हुए। भारत का इस पूरी लड़ाई के दौरान कोई भी नुकसान नहीं हुआ। हालाँकि, पाकिस्तानियों ने इस दौरान खूब भारतीय प्रोपेगेंडा किया। उन्होंने दावा किया कि इस लड़ाई के दौरान भारतीय लड़ाकू विमान गिराए गए हैं। इस दावे को बड़ा करके दिखाने में ब्लूमबर्ग, रायटर्स और CNN जैसे संस्थानों ने साथ दिया।

पाकिस्तानी लगातार भारत के जेट गिराने का दावा करते रहे। उनके मंत्रियों से लेकर फौजी और सोशल मीडिया हैंडल्स तक ने यह दावा आगे बढ़ाया। यह दावा करने वालों ने बिना किसी लड़ाकू विमान का मलबा दिखाए और कोई फुटेज वगैरह दिखाए बिना ही भारत के खिलाफ खूब प्रोपेगेंडा किया। उन्होंने AI वाली इमेजेस दिखा कर भी झूठ फैलाया। इसी प्रोपेगेंडा को धार दी ग्लोबल मीडिया आउटलेट्स में काम करने वाले पाकिस्तानी मुस्लिम पत्रकारों ने, उन्होंने इसे ऐसे दिखाया कि पाकिस्तान के दावे एकदम सत्य हैं।

इसका सबसे पहला उदाहरण है अमेरिकी मीडिया संस्थान ब्लूमबर्ग। ब्लूमबर्ग ने अपनी पाकिस्तानी दावे के ऊपर ही पूरी खबर बना दी। उसके पाकिस्तानी पत्रकार कामरान हैदर ने खबर चलाई, ‘पाकिस्तान ने कहा कि उसने भारत के पाँच लड़ाकू विमान गिराए हैं।’ इस खबर के भीतर भी पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के दावे का सहारा लिया गया। ब्लूमबर्ग ने यह रिपोर्ट पक्षपाती ना लगे, इसके लिए इसमें एक भारतीय पत्रकार अनूप रॉय का नाम भी जोड़ दिया गया। यह तरकीब लगभग सभी मीडिया संस्थानों ने अपनाई।

पाकिस्तानी पत्रकार प्रोपेगेंडा भारत

इसी तरह रायटर्स के पत्रकार सईद शाह और इदरीस अली ने भी भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा को हवा दी। रायटर्स में उन्होंने खुले तौर पर दावा किया कि चीन में बने पाकिस्तानी फाइटर जेट ने भारत के दो लड़ाकू विमान गिराए हैं। इस खबर को बनाने के लिए उन्होंने किन्हीं अनजान दो अमेरिकी अधिकारीयों का हवाला दिया। उनका यह दावा सीजफायर होने के बाद भी पुष्ट नहीं हो पाया है। हालाँकि, लड़ाई के दौरान इसके जरिए पाकिस्तान ने खूब प्रोपेगेंडा किया।

पाकिस्तानी पत्रकार प्रोपेगेंडा भारत

इसी तरह भारत विरोधी अमेरिकी मीडिया संस्थान न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा किया। उसने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर के बाद खबर छापी कि भारत ने पाकिस्तान पर हमला तो किया है लेकिन संभवतः उसके लड़ाकू विमान मार गिराए गए हैं। NYT के लिए यह खबर सलमान मसूद और जिया उर रहमान ने लिखी। यह दोनों पत्रकार पाकिस्तान के हैं और NYT ने इनके दावे बिना पुष्ट किए ही भारत विरोधी खबर चला दी।

इसी तरह एक और अमेरिकी मीडिया संस्थान CNN ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद यही राह पकड़ी। उसने भी भारत के विमान गिरने वाली खबर चलाई। यह इनपुट देने वाली उसकी पत्रकार सोफिया सैफी थी। चौंकाने वाली बात यह थी कि इन पत्रकारों ने अपने पत्रकारिता धर्म को छोड़ कर पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा चलाना चुना लेकिन इसे हवा इनके संस्थानों ने दी। यह वो संस्थान हैं जो आए दिन तथ्यों को लेकर ज्ञान बांचते हैं।

भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा चलाने की कवायद में संस्थान Nikkei Asia भी रहा। उसका पत्रकार अदनान आमिर लगातार भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा करता रहा है। आमिर इस्लामाबाद में बैठ कर पाक फ़ौज और उसके मंत्रियों का प्रोपेगेंडा चलाने में जुटा रहा। अदनान आमिर ने एक खबर में दावा कर दिया कि पाकिस्तान ने भारत के 5 फाइटर जेट गिराए हैं। इसने बताया कि चीनी विमान ने 3 राफेल और 1 MiG-29 और सुखोई-30 गिराए हैं।

भारत के खिलाफ चले इस प्रोपेगेंडा में एक समान रूप से पाकिस्तानी पत्रकारों ने फर्जी दावे किए और उन्हें विदेशी मीडिया संस्थानों ने हवा दी। जबकि असलियत यह है कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री से जब इसकी सच्चाई पूछी गई तो उन्होंने दावा कर दिया था कि यह तो सोशल मीडिया पर पड़ा है। इसको लेकर उनकी खूब फजीहत हुई थी। भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा करने में यह पाकिस्तानी पत्रकार और ग्लोबल मीडिया संस्थान पाकिस्तानी फ़ौज से भी आगे निकल गए।

इसी कड़ी में अल जजीरा ने दावा किया था कि भारत में राफेल उड़ाने वाली फाइटर पायलट शिवांगी सिंह पाकिस्तान के कब्जे में हैं। बाद में पाक फ़ौज ने ही यह दावा नकार दिया। पाकिस्तानी पत्रकारों ने भारत के खिलाफ यह खबरें चलाने के दौरान ना तथ्य परखे, ना कोई आधिकारिक सूचनाएँ ली और ना ही स्वयं सच्चाई जानने का प्रयास किया। उन्होंने सीधे तौर पर बस पाकिस्तान ने जो भी प्रोपेगेंडा किया, उसे ज्यों का त्यों छाप दिया।

यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब विदेशी मीडिया संस्थानों ने अपनी भारत घृणा खुल कर दिखाई हो। हर मौके पर वह भारत को लेकर प्रोपेगेंडा चलाते रहते हैं। कभी उनका निशाना भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी होते हैं तो कभी हिन्दू। जब पाकिस्तान के खिलाफ भारत युद्ध कर रहा था, तो उनका निशाना भारत बन गया।

राणा प्रताप सिर काट-काट करता था सफल जवानी को… हमारी विरासत कौन – श्रीराम जैसा जीवन जीने वाला धर्म रक्षक, या फिर अकबर?

बचपन में हमने एक कविता पढ़ी थी, जिसकी कुछ पंक्तियाँ आज भी जेहन में ताज़ा हैं:

“चढ़ चेतक पर, तलवार उठा रखता था भूतल पानी को
राणा प्रताप सिर काट-काट करता था सफल जवानी को”

उन पंक्तियों के माध्यम से हमने राणा प्रताप और उनके शौर्य को जाना। राजस्थान के क्षेत्रों में तो आज भी यह कहावत है-

“माई रे एहड़ा पूत जण जेणा राणाप्रताप”

(अर्थात्, लगभग 500 साल के बाद, आज भी लोगों के मन में यह इच्छा है कि उनका बेटा महाराणा प्रताप जैसा हो।)

विपरीत क्षणों में भी थामी रखी धर्म की उँगली

आपको आधुनिक युग में ऐसा कोई महापुरुष शायद ही मिलेगा, जो 500 वर्षों से लगातार वीरता, शौर्य और स्वाभिमान का प्रतीक बना हुआ है। महाराणा प्रताप आज भी उतने ही महत्वपूर्ण बने हुए हैं, जितने वो 500 साल पहले थे। 

इस परिवर्तनशील दुनिया में, सारी प्राकृतिक और मानव निर्मित चीजें अस्थाई हैं। सब कुछ एक न एक दिन खत्म हो जाना है। लेकिन, इस क्षणभंगुर दुनिया में अगर कुछ शाश्वत है, अगर कुछ स्थाई है तो वह है, स्वाभिमान और आत्मसम्मान। महाराणा प्रताप ने इसी स्वाभिमान और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। 

महाराणा ने इस देश को यह संदेश दिया कि कैसे विपरीत क्षणों में भी धर्म की ऊँगली थाम कर खड़े रहना है। उन्होंने हम भारतीयों को सदैव अपने स्वाभिमान के लिए डटे रहना सिखाया। हम अगर उनकी जीवन यात्रा देखेंगे तो उसमें कई घटनाएँ ऐसी मिलती हैं, जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। 

महाराणा प्रताप जब मेवाड़ की गद्दी पर बैठे तो अकबर की तरफ से उनको न जाने कितने प्रलोभन दिए गए, कि आप दरबार में हाज़िरी लगाइए, अकबर को बादशाह कहिए, और मुगलिया सल्तनत के झंडे के तले मेवाड़ पर शासन करिए।

जाहिर है, उस समय देश के अनेक रजवाड़े ऐसा कर रहे थे। उन रजवाड़ों ने अकबर को अपना बादशाह मान लिया था और अकबर का हुक्म मानते हुए, वो लोग अपना प्रशासन भी चलाते थे। लेकिन, प्रताप तो किसी और ही मिट्टी के बने हुए थे। उन्होंने मेवाड़ की गद्दी पर बैठते ही एकलिंग भगवान की सौगंध खाई थी कि वे मुगलों की अधीनता कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने इस धरा के स्वाभिमान और राष्ट्र के आत्मसम्मान के लिए सारे लुभावने प्रस्तावों को जूते की नोक से उड़ा दिया। उन्होंने मेवाड़ राजवंश के उस राजचिह्न को चरितार्थ किया, जिसमें कहा गया है,

जो दृढ़ राखे धर्म को
तिहि राखे करतार” (अर्थात्, जो अपने धर्म पर दृढ़ रहता है परमात्मा स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।)

मिलती-जुलती है महाराणा प्रताप और श्रीराम की जीवन-यात्रा

पूरे मध्यकाल के दौरान जब मुगलिया सल्तनत का चारों तरफ बोलबाला था, उस समय भी मेवाड़ राजवंश ने महाराणा प्रताप के नेतृत्व में भारतीय स्वाभिमान के ध्वज को लहराए रखा। यदि हम उस दौर में महाराणा प्रताप के समर्पण को ठीक से समझ लें, तो हम उस दौर को ‘मुग़ल काल’ न कहकर ‘महाराणा काल’ कहेंगे। अपनी मातृभूमि के प्रति ऐसा समर्पण, अपने धर्म के प्रति ऐसी अगाध श्रद्धा विरले ही देखने को मिलती है। 

उनके बारे में एक और रोचक बात यह है, कि कई बार महाराणा प्रताप की जीवन यात्रा, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की जीवन यात्रा से मिलती-जुलती नजर आती है।

दोनों ही राजवंश में जन्मे थे, दोनों को ही वनवास झेलना पड़ा। मातृभूमि के प्रति दोनों ही के अंदर अगाध प्रेम था। जहाँ एक तरफ महाराणा अपनी मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं, वहीं दूसरी तरफ भगवान श्री राम “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” कहते हुए जन्मभूमि को स्वर्ग से भी ऊपर का स्थान देते हैं।

भगवान राम पिता के वचनों का पालन करने के लिए सब कुछ छोड़कर जंगल के लिए प्रस्थान करते हैं तो गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं

“रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी, सदय हृदय दुख भयउ बिशेषी”

भगवान राम को जंगल जाते देख प्रजा उनके साथ जाने को तैयार हो जाती है। ठीक उसी प्रकार, जब महाराणा जंगल जाते हैं, तो उनकी प्रजा जंगल में जाने के लिए उनके पीछे-पीछे चल पड़ती है।

भगवान राम की यात्रा जब आगे बढ़ती है तो माता सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए भगवान राम ने भी जनजातियों को साथ मिलाया, वनवासियों को साथ मिलाया, दलितों को, वंचितों को, व वानर समूहों को अपने साथ मिलाया। ठीक उसी प्रकार महाराणा प्रताप ने भी अपनी मातृभूमि मेवाड़ के उद्धार के लिए हमेशा समाज के वंचित वर्गों को अपने साथ मिलाए रखा। भील समाज के साथ उनकी मित्रता की तो अनेक कथाएँ देश में आज भी प्रचलित हैं। प्रताप ने राजवंश और प्रजा के बीच की सीमाओं को धुंधला कर दिया था। भीलों के साथ मिलकर प्रताप ने मेवाड़ की एकता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया था

कभी-कभी तो ऐसा लगता है, कि इस देश में जब भी कोई महापुरुष अवतरित होता है, तो उस महापुरुष के अंदर भगवान श्री राम की चेतना स्वत: ही प्रवेश कर जाती है। शायद बहुत लोग जानते होंगे, कि महाराणा प्रताप और गोस्वामी तुलसीदास समकालीन थे। दोनों कभी मिले भी थे या नहीं, यह विद्वानों के बीच चर्चा का विषय है। लेकिन आप जब गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस पढ़ेंगे, तो तो आप पाएँगे कि उनमें कई ऐसी चौपाइयाँ हैं, जो लिखी तो भगवान राम के लिए गई थीं, लेकिन शब्दशः वैसी घटनाएँ महाराणा प्रताप के साथ भी हुईं। जैसे – जंगल जाने की घटना, वनवासियों के साथ मिलकर रावण को हराने की योजना, इत्यादि। यह इस देश की संस्कृति है, कि भगवान राम से लेकर महाराणा प्रताप तक सबने सामाजिक समरसता को सर्वोपरि रखा। बिना किसी भेदभाव के सबको अपने साथ मिलाए रखा। 

इसीलिए, हमे यह सोचना होगा कि हम अपने बच्चों को प्रताप बनाना चाहते हैं या अकबर।

महाराणा प्रताप या अकबर? हमारी विरासत कौन?

हम किसके पदचिह्नों पर अपने बच्चों को चलाना चाहते हैं? क्योंकि किसी राष्ट्र के दो विपरीत आदर्श नहीं हो सकते। यदि अकबर महान हैं, तो हमें प्रताप को भूलना होगा, और यदि महाराणा प्रताप महान हैं, तो अकबर को महान कहना बंद करना होगा। एक राष्ट्र के रूप में हमारी जिम्मेदारी है कि हम किसे महान बनाना चाहते हैं और अपने बच्चों को क्या पढ़ाना चाहते हैं। लाल किले की प्राचीर से माननीय प्रधानमंत्री जी ने देश को पंचप्रण दिए थे। उन 5 प्रणों में से एक प्रण यह भी है कि हमें अपनी विरासत पर गर्व करना है।

हमें समझना होगा कि हमारी असली विरासत कौन है। इस राष्ट्र को यह निर्णय करना होगा, कि वह अपनी विरासत के रूप में महाराणा प्रताप को मानेगा या फिर अकबर को। क्योंकि भविष्य का वटवृक्ष अतीत की जड़ों से अंकुरित होता है। यदि हमारे आदर्श उच्च नैतिकता वाले होंगे तो हमारा समाज अपने आप नैतिक बनेगा। 

यह दुर्भाग्य ही रहा है कि इतिहास में हमेशा से ही इस राष्ट्र के रणबाँकुरों को वह स्थान नहीं मिल पाया जो उन्हें मिलना चाहिए था। कई बार अनजाने में तो कई बार जानबूझ कर इतिहास को छुपाने का भरसक प्रयास किया गया। लेकिन, जैसे पत्थरों का सीना चीरकर पौधे पल्लवित हो आते हैं, वैसे ही सच भी बाहर आ ही जाता है।

साहिर लुधियानवी का शे’र भी है –

हज़ार बर्क़ गिरे, लाख आँधियाँ उट्ठें
वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं 

अब राष्ट्र अपने असली नायकों को पहचान रहा है। देश का सांस्कृतिक पुनरुद्धार हो रहा है। आज राष्ट्र अपने उन नायकों के बारे में जान रहा है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। आज आप भारत के चाहे किसी भी शहर में चले जाइए, आपको वहाँ अकबर की मूर्तियाँ नहीं दिखेंगी, लेकिन भारत के लगभग प्रत्येक शहर में आपको चेतक पर सवार महाराणा प्रताप की मूर्तियाँ जरूर दिखेंगी। लोगों के अंदर महाराणा प्रताप की ऐसी स्वीकार्यता इसीलिए भी है, क्योंकि उन्होंने मानवीय मूल्यों को सदैव शिरोधार्य रखा। जिसकी धमनियों में मातृभूमि के प्रति ऐसा अगाध प्रेम बह रहा हो, ऐसे महापुरुष को तो इतिहास भी अपने सुनहरे पृष्ठों में स्थान देने को बाध्य हो जाता है।

प्रताप ने हमें एक आशा दी कि यदि एक अकेला राजा उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली राजा से लड़ सकता है, तो आज हम भी भारत को नष्ट करने में जुटी शक्तियों को पराजित कर सकते हैं। महाराणा प्रताप का जीवन हमें यह संदेश देता है कि अस्तित्त्व के संघर्ष में कभी युद्धविराम नहीं होता। हमें लगातार सतर्कता बनाए रखनी है तथा राष्ट्र के खिलाफ उठे हर कदम का पुरजोर जवाब देना है। जब तक पृथ्वी पर एक भी भारतीय जीवित है, तब तक प्रताप जीवित रहेंगे, क्योंकि प्रताप एक भावना हैं।  प्रताप सम्मान व स्वतंत्रता की ऐसी भावना हैं, जिस पर काल की धूल कभी जम ही नहीं सकती।

उदयपुर में हिंदू सब्जी वाले पर मुस्लिमों ने तलवार से किया हमला, भीड़ इकट्ठा कर दुकान में आग लगाई दी: ‘नींबू’ विवाद में ‘कन्हैया लाल कांड’ दोहराने का प्रयास

राजस्थान के उदयपुर में एक हिन्दू सब्जी विक्रेता पर मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया। उसको तलवारों से काट कर घायल कर दिया गया। उसकी दुकान पर कट्टरपंथियों की भीड़ ने पत्थरबाजी भी की। कट्टरपंथी भीड़ ने सब्जी मंडी में आगजनी भी की। मामले में पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना शुक्रवार (16 मई, 2025) को हुई। उदयपुर की धानमंडी इलाके में स्थित सतबीर नाम के हिन्दू सब्जी विक्रेता की दुकान पर कुछ मुस्लिम युवक सब्जी खरीदने आए थे। सब्जी खरीदने के दौरान नींबू के भाव को लेकर मुस्लिमों ने झगड़ा चालू किया।

सतबीर ने उनसे जाने को कहा तो वह हमलावर हो गए। उन्होंने सतबीर के ऊपर पत्थर फेंके और गाली-गलौज की। उन्होंने आसपास की दुकानों पर भी हमला किया और उन्हें नष्ट कर दिया। सतबीर और उसके साथी जब तक इस हमले से संभलते, मुस्लिम युवक पूरी भीड़ लेकर आ गए।

इस बार उन्होंने सतबीर पर तलवारों से हमला कर उसे घायल कर दिया। रिपोर्ट्स में यह भी बताया कि भीड़ ने इसके बाद आसपास मौजूद सब्जी की दुकानों में आग लगा दी। घायल सतबीर को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, उसकी हालत गंभीर बनी हुई है।

मामले में हिन्दू संगठनों ने उदयपुर में प्रदर्शन कर कार्रवाई की माँग की है। हमला करने वाले युवक मौके से फरार हैं। पुलिस ने लोगों को आश्वासन दिया है कि वह दोषियों पर जल्द कार्रवाई करेगी। माहौल को देखते हुए अतिरक्त सुरक्षाबल तैनात कर दिए गए हैं।

उदयपुर में इस घटना ने मजहबी तनाव को फिर बढ़ा दिया है। इस हमले को 2022 में दरजी कन्हैया लाल पर हुए हमले की तरह देखा जा रहा है। कन्हैया लाल की हत्या 2 मुस्लिमों ने कर दी थी। उन्होंने कन्हैया लाल का कैमरे के सामने गला रेत दिया था। इस मामले में कन्हैया लाल का परिवार आज भी न्याय का इन्तजार कर रहा है

दहेज उत्पीड़न केस में फँसे शख्स को 26 साल बाद मिली राहत, कोर्ट ने परिवार को भी बाइज्जत बरी किया: 1999 में हुआ था केस, जज बोले- 498ए का हो रहा गलत इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और क्रुरता का आरोप लगाने वाली महिला को चेतावनी देते हुए पति और ससुराल वालों को बरी कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि क्रूरता के लिए लगे आईपीसी की धारा 498ए का दुरुपयोग किया गया है क्योंकि इसके सबूत नहीं मिले हैं कि महिला के साथ ‘क्रूरता’ की गई।

कोर्ट ने कहा कि किसी खास दिन, समय या घटना का उल्लेख किये बिना इन धाराओं को जोड़ना अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर करता है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एससी शर्मा की खंडपीठ ने पति की अपील पर सुनवाई करते हुए पति और ससुरालवालों को बरी करने का आदेश दिया। पति का पक्ष ये था कि केवल 12 दिन साथ रहने के बाद पत्नी उसे छोड़कर चली गई थी। इसके कोई मेडिकल सबूत नहीं है कि उसने पत्नी के साथ मार-पीट की जिससे उसका गर्भपात हुआ।

साल 1999 में दर्ज एफआईआर में पत्नी ने पति और ससुरालवालों पर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया था। पत्नी ने अपनी शिकायत में कहा था कि उससे 2 लाख रुपए दहेज की माँग की गई थी। उसे लात-धूँसे मारे गए, जबरन नशीले पदार्थ का सेवन कराया गया। इसकी वजह से उसका गर्भपात हो गया।

कोर्ट ने ये भी कहा कि शिकायतकर्ता मेडिकल साक्ष्य भी देने में असर्मथ रही है जिसमें उसके गर्भपात की बात हो। कोर्ट का कहना है कि बगैर सबूत के केवल भावनात्मक या मानसिक परेशानी, आईपीसी की धारा 498ए के तहत आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि आपराधिक कानून में संदेह के आधार पर फैसला नहीं होता बल्कि सबूत की आवश्यकता होती है।

दारा लक्ष्मी नारायण एवं अन्य बनाम तेलंगाना राज्य एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले का हवाला भी दिया गया। कोर्ट ने कहा कि ससुराल के किसी भी सदस्य के खिलाफ ‘क्रूरता करने का’ सबूत दिये बिना उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता और अभियोजन पक्ष उसे आधार नहीं बना सकते

कोर्ट ने पुख्ता सबूत के बिना वैवाहिक विवादों में परिवार के सदस्यों को फँसाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर किया और इस बात पर जोर दिया कि इस तरह आईपीसी की धारा 498ए का दुरुपयोग इसकी सुरक्षात्मक प्रवृति को कमजोर करता है।

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के दलील को खारिज करते हुए पति और ससुरालवालों को बरी कर दिया।

कभी तंज तो कभी सवाल… सेना के शौर्य पर कॉन्ग्रेसियों को नहीं विश्वास: बार-बार माँग रहे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का सबूत, अब की कर्नाटक MLA ने पूछा- कौन मरा, कहाँ मरा, कितने मरे

भारतीय सेना के मिशन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के पूरा होने के बाद अब कर्नाटक के कॉन्ग्रेसी MLA कोथुर मंजूनाथ ने सेना पर ही सवाल खड़ेकर दिए हैं। उनका कहना है कि ये मिशन सिर्फ एक दिखावा था। पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए लोगों को न्याय नहीं मिला।

कॉन्ग्रेस के कर्नाटक विधायक कोथुर मंजूनाथ ने बयान में कहा, “ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक दिखावा था। कुछ हुआ ही नहीं। बस दिखावे के लिए तीन चार विमान ऊपर भेजे और वापस बुला लिए।”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंजूनाथ ने पहलगाम आतंकी हमले के पीड़ितों के बारे में सवाल पूछते हुए आगे कहा, “क्या पहलगाम में मारे गए 26-28 लोगों को इंसाफ मिलेगा? क्या उन महिलाओं का दुख कम होगा? क्या यही तरीका है उनके सम्मान करने का?”

सेना पर सवाल क्यों?

जम्मू कश्मीर के पहलगाम के बैसारन घाटी में 22 अप्रैल 2025 को आतंकी हमले में 26 पर्यटकों की जान चली गई थी। आतंकियों ने सभी लोगों से धर्म पूछ कर उनके गैर-मुस्लिम होने के पुष्टि करने के बाद बेरहमी से उनको मार दिया था। मरने वालों में देश के अलग-अलग राज्यों से कश्मीर गए ज्यादातर हिंदू पर्यटक थे।

भारत सरकार ने 7 मई 2025 को जवाबी एक्शन में ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया था। इसके तहत तड़के ही भारतीय सेना ने एयर स्ट्राइक से पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में बसे 9 आतंकी ठिकानों पर मिसाइल से मत कर दिया था। इसमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन के लगभग 100 आतंकियों के मारे जाने की बात सेना ने कही थी।

सेना के इस बयान पर मंजूनाथ ने सवाल किया है। उन्होंने कहा, “इस बात की क्या पुष्टि है कि 100 आतंकवादी मारे गए? हमारी सीमा में जो घुसे, उन आतंकवादियों की पहचान क्या है?”

उन्होंने इंटेलिजेंस सिस्टम प्रणाली की सफलता पर भी तंज कसा। मंजूनाथ ने पूछा, “सीमा पर सुरक्षा क्यों नहीं थी और आतंकी कैसे भाग गए? हमें आतंकवाद की जड़ समेत तने और शाखों को भी पहचान कर खत्म करना चाहिए।”

कार्रवाई में भी परेशानी

कोथुर मंजूनाथ यही नहीं रुके। इसके बाद उन्होंने मीडिया पर भी सवाल खड़े कर दिए। वह बोले, “सारी टीवी चैनल अलग-अलग कहानी बता रहे हैं। कोई यह नहीं बता रहा है कि असल में कौन मारा गया, कहाँ मारा गया और कितने मारे गए।”

मंजूनाथ के इस बयान को सुनकर कॉन्ग्रेस की पुरानी आदत फिर फिर याद आ रही है। असल में कॉन्ग्रेसियों के पास कोई मुद्दा नहीं बचा है। उन्हें सरकार की आलोचना के लिए जब कुछ नहीं मिल रहा तो सेना पर ही सवाल उठा दिया। दिलचस्प बात तो ये है कि इस तरह की हरकतें सिर्फ कॉन्ग्रेस के विधायक या छुटभय्ये नेता ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्तर वाले नेता तक कर चुके हैं।

बात पलटने में माहिर विपक्ष

इससे पहले जब भारत सरकार पहलगाम आतंकी हमले के बाद एक्शन में समय ले रही थी तो यही विपक्ष था जिसने जमकर मोदी सरकार और भाजपा पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेला था और यहाँ तक कहा था कि सरकार कुछ नहीं करेगी। अब जब एक्शन हो चुका है और इस कार्रवाई से पूरे देश को संतुष्टि मिली है तो विपक्ष के नेता यह कह रहे हैं कि युद्ध नहीं होना चाहिए था।

इनकी दोगली बातों में मंजूनाथ का एक और बयान शामिल है। उन्होंने कहा, “कर्नाटक के लोग पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश हर जगह के नागरिकों के युद्ध के खिलाफ हैं।” साथ ही ऑपरेशन सिंदूर की कार्रवाई पर ये कह दिया कि जिन महिलाओं के सामने उनके पतियों को मारा गया यह कार्रवाई उनका दुख नहीं मिटा सकती और यह समाधान नहीं है।

शायद मंजूनाथ ने कर्नाटक के ही शिवमोगा के रहने वाले मंजूनाथ समेत कानपुर के शुभम द्विवेदी, पुणे के संतोष जगदाले और कौस्तुभ गणबोटे के घरवालों की वो खुशी और संतुष्टि का भाव चेहरे पर नहीं देखा जो ऑपरेशन सिंदूर के बाद उनके मन में था और उन्होंने इस एक्शन पर सरकार को धन्यवाद कहा था।

एक तरफ नहीं रह पा रहा विपक्ष

अगर मंजूनाथ की बात पर गौर किया जाए तो असल में एक सवाल उन्हीं से पूछा जाना बनता है कि अगर ऑपरेशन सिंदूर जैसा एक्शन आतंकी हमलों का समाधान नहीं है तो कॉन्ग्रेस के अनुसार समाधान क्या होना चाहिए।

आतंकी जब तब भारत में निर्दोष लोगों की जान ले लेते हैं। भारत के दिल में घुसकर 26/11 के मुंबई हमले कर देते हैं। सीमा की रक्षा करने वाले देश के 40 जवानों को मौत की घाट उतार देते हैं। साथ ही बेखौफ होकर यह सोचते हैं कि भारत कभी कोई एक्शन नहीं ले सकता।

ऐसे में ऑपरेशन सिंदूर की कार्रवाई कॉन्ग्रेसियों को क्यों परेशान कर रही है और वह भी तब जबकि इसमें सिर्फ आतंकियों को ही निशाना बनाया गया और दुश्मन देश पाकिस्तान की सैन्य रक्षा प्रणाली को कमजोर करने की कोशिश की गई। आम लोगों को जरा-सा भी हताहत नहीं किया गया।

सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे

मंजूनाथ कोई इकलौते कॉन्ग्रेसी नहीं हैं जो ऑपरेशन सिंदूर या सरकार पर सवाल उठा रहे होंं। विपक्ष के राजनेताओं में भारतीय सेना को लेकर कोई न कोई परेशानी होती ही रही है।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता पृथ्वीराज चौहान ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए ऑपरेशन सिंदूर को भावनात्मक लाभ लेने की का बयान दिया था। उन्होंने यह कहा था कि ऑपरेशन मिशन का नाम सिंदूर रखकर सरकार भावनात्मक लाभ लेने की कोशिश कर रही है।

इसके अलावा कॉन्ग्रेस नेता राशिद अल्वी ने भी पूछा था कि ऑपरेशन सिंदूर में क्या सभी आतंकवादी मारे गए हैं? और क्या मोदी सभी आतंकियों को खत्म कर पाएँगे। इसी तरह कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता उदित राज को भी इस मिशन के नाम पर ही परेशानी हो गई थी। उन्होंने यह बयान दे डाला था इस मिशन का नाम कुछ और होना चाहिए था क्योंकि यह एक धर्म विशेष को बताता है।

बात यही नहीं रुकती। सहारनपुर के कॉन्ग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी ऑपरेशन सिंदूर की सफलता पर सवाल उठाने में देर नहीं की थी और इस मिशन का पूरा हिसाब माँग लिया था। इमरान मसूद ने तो उरी में मारे गए जवानों के लिए जवाबी कार्रवाई में की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर भी सवाल खड़े कर दिए थे और यह कह दिया था कि पाकिस्तान सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर भारत का मजाक उड़ाता है।

यह कोई पहली बार नहीं है कि जब कॉन्ग्रेसियों ने इस तरह की बयानबाजी की हो। पार्टी के बड़े नेता सामने से तो सरकार के काम की तारीफ कर रहे हैं, लेकिन उनके नीचे बैठे विधायक और राज्य स्तरीय नेता लगातार इस तरह के बयान देकर सेना का मनोबल तोड़ने और लोगों के बीच कायम शांति व्यवस्था भंग करने की कोशिश करते रहते हैं।

भारत से बात करने को बेचैन हुआ पाकिस्तान… PM शरीफ बोले- मैं शांति वार्ता के लिए तैयार, हमें हमारा पानी चाहिए: पहले दे रहा था परमाणु बम की गीदड़भभकी, अब सीजफायर बढ़ाने को गिड़गिड़ाया

पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने दावा किया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर 18 मई तक बढ़ गया है। वहीं पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने भारत से बातचीत की पेशकश की है।

पाकिस्तान की संसद को संबोधित करते हुए इशाक डार ने कहा, “10 मई को दोनों देशों के बीच DGMO स्तर की बातचीत में 12 मई तक सीजफायर पर सहमति, 12 मई को वार्ता में 14 मई तक सीजफायर पर सहमति बनी। 14 मई को जो बात हुई उसमें 18 मई तक सीजफायर का फैसला लिया गया।”

ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान में मची तबाही और भारत की ताकत पूरी दुनिया ने देखी है। अब विदेशी मीडिया भी ये मान रहे हैं कि भारत के टारगेटेड हमले ने पाकिस्तान को बर्बाद कर दिया। सिंधु जल संधि के स्थगन के भारत के फैसले का असर भी पाकिस्तान पर गहरा पड़ा है। तपतपाती गर्मी में प्यासा रह जाने का डर पाकिस्तान को साफ नजर आ रहा है। इसलिए बातचीत के टेबल पर पाकिस्तान आने की कोशिश कर रहा है। भारत ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि ऑपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं हुआ है और सिंधु जल संधि स्थगित करने का फैसला जारी है। पाकिस्तान के साथ बात जब होगी तो आतंकवाद और पीओके पर होगी।

पाकिस्तान ने सिंधु जल समझौते के स्थगन पर पुनर्विचार करने का आग्रह भी भारत से किया था, लेकिन भारत ने ये कहते हुए मना कर दिया कि जब तक पाकिस्तान भारत की शर्तों को नहीं मानता तब तक सिंधु का जल उसे नसीब नहीं होगा।

इस परिस्थिति में ‘बेचारा’ पाकिस्तान भारत की शर्तों को मानने के लिए तैयार हो गया है। पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने 15 मई 2025 को कहा कि भारत से बातचीत करने के लिए वो तैयार हैं। शांति वार्ता में कश्मीर मुद्दा भी शामिल है। शहबाज ने कहा कि शांति की शर्तों में कश्मीर मुद्दा भी शामिल है। हालाँकि पीएम मोदी ये साफ कर चुके हैं कि वार्ता पीओके और आतंकवाद पर होगी।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने भारत के साथ टकराव में शामिल अपने देश के अधिकारियों और सैनिकों से बातचीत की। पंजाब के कामरा एयरबेस के दौरे के दौरान उन्होने शांति वार्ता की जानकारी भी दी। शहबाज शरीफ के साथ सेना प्रमुख असीम मुनीर, उप प्रधानमंत्री इशाक डार, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ मौजूद थे।

ऑपरेशन सिंदूर के तहत एयर स्ट्राइक और अस्थाई सीजफायर के बाद पीएम मोदी ने पाकिस्तान को सख्त संदेश दिए थे। 15 मई 2025 को विदेश मंत्री जयशंकर ने दो टूक कहा कि बातचीत सिर्फ तभी होगी जब पाकिस्तान अपने देश में फल-फूल रहे आतंकवाद को जड़ से खत्म करेगा। उन्होने कहा, “पाकिस्तान को मालूम है कि उन्हें क्या करना है? भारत ने आतंकियों की लिस्ट सौंप दी है। इन्हें भारत के हवाले करना होगा। जब तक आतंकवाद को पनाह मिलता रहेगा, पाकिस्तान से कोई बातचीत नहीं होगी।”

विदेश मंत्री जयशंकर ने ये भी साफ कर दिया कि 1960 में लागू सिंधु जल समझौता भी तब तक ठंडे बस्ते में पड़ी रहेगी।

5 दिन में ही डोनाल्ड ट्रंप ने लिया U टर्न, भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराने के दावे से पीछे हटे: अमेरिका का ‘जीरो टैरिफ’ वाला गुब्बारा S जयशंकर ने फोड़ा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धविराम पर अपनी भूमिका को लेकर नया बयान देकर सबको चौंका दिया है। पहले उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका की मध्यस्थता से 10 मई 2025 को भारत-पाकिस्तान में युद्धविराम हुआ, लेकिन अब वह इससे पलट गए हैं। एक कार्यक्रम में ट्रंप ने कहा, “मैं ये नहीं कह रहा कि मैंने मध्यस्थता की, लेकिन मैंने भारत-पाकिस्तान के बीच खतरनाक तनाव को कम करने में मदद की।”

ट्रंप ने पहले ट्वीट कर कहा था कि वह दोनों देशों की समझदारी और बुद्धिमत्ता से खुश हैं, जिन्होंने पूर्ण युद्धविराम पर सहमति जताई। हालाँकि, भारत ने ट्रंप के दावे को सिरे से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत-अमेरिका के बीच सैन्य तनाव पर बात हुई, लेकिन ट्रेड का कोई जिक्र नहीं था। ट्रंप ने दावा किया था कि उन्होंने दोनों देशों को ट्रेड में मदद की पेशकश की, जिसके बाद युद्धविराम हुआ।

जयशंकर ने ट्रंप के ‘जीरो टैरिफ’ वाले दावे को भी किया खारिज

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी ट्रंप के दावों को खारिज करते हुए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर स्थिति साफ की। उन्होंने कहा, “व्यापार वार्ता चल रही है, लेकिन अभी कुछ तय नहीं हुआ। कोई भी सौदा दोनों देशों के लिए फायदेमंद होना चाहिए।”

जयशंकर ने कश्मीर मुद्दे पर भारत का रुख दोहराया कि यह द्विपक्षीय मामला है और इसमें किसी तीसरे देश का दखल बर्दाश्त नहीं होगा। ऑपरेशन सिंदूर पर बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत ने आतंकी ढाँचे को नष्ट किया और पाकिस्तान को भारी नुकसान पहुँचाया। उन्होंने साफ किया कि पाकिस्तान ने भारत की सलाह को नजरअंदाज कर हमला किया, जिसका भारत ने मुँहतोड़ जवाब दिया।

निलंबित रहेगा सिंधु जल समझौता, PoK पर होगी बात

जयशंकर ने पाकिस्तान को आतंकवाद पर कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को आतंकियों की सूची सौंपनी होगी और उनके बुनियादी ढाँचे को खत्म करना होगा। साथ ही, सिंधु जल समझौता तब तक निलंबित रहेगा, जब तक सीमा पार आतंकवाद बंद नहीं होता। कश्मीर पर भारत का रुख साफ है कि अब केवल पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) की वापसी पर बात होगी।

जयशंकर ने युद्धविराम पर कहा कि यह स्पष्ट है कि गोलीबारी बंद करने की माँग पाकिस्तान की थी, क्योंकि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में अपने लक्ष्य हासिल कर लिए थे।