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राहुल गाँधी ने फिर विदेश जाकर किया देश को बदनाम, चुनाव प्रणाली से लेकर EC पर भी उठाए सवाल: BJP नेता बोले- ये जॉर्ज सोरोस के एजेंट, सिर्फ ‘भारत विरोधी’ काम करेंगे

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग को लेकर अमेरिका में विवादित बयान दिया है। राहुल गाँधी ने दावा किया है कि चुनाव आयोग समझौता कर चुका है। उन्होंने इस बयान में महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। राहुल गाँधी 2 दिन के लिए अमेरिका गए हुए हैं।

उन्होंने विदेशी धरती पर भारत का यह आंतरिक मुद्दा ब्राउन यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान उठाया। उन्होंने दावा किया कि देश की चुनावी प्रणाली में ‘बड़ी समस्या’ है। राहुल गाँधी ने कहा, “सरल शब्दों में कहूँ तो महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में जितने लोगों ने वोट डाले, उतने वयस्क (बालिग) लोग महाराष्ट्र में है ही नहीं और यह एक तथ्य के आधार पर कह रहा हूँ।”

राहुल गाँधी ने दावा किया, “शाम 5:30 बजे तक के मतदान आँकड़े उपलब्ध थे, लेकिन 5:30 बजे से 7:30 बजे के बीच जब मतदान समाप्त हो जाना चाहिए था, लेकिन इसके बाद भी 65 लाख अलग से वोट डाले गए थे।”

राहुल गाँधी ने इसे भौतिक रूप से असंभव बताया और कहा, “एक व्यक्ति को वोट डालने में लगभग 3 मिनट लगते हैं, तो यदि हम हिसाब लगाए तो इसका मतलब है कि लोग आधी रात 2 बजे तक वोट डालने के लिए लाइन में खड़े थे और मतदान पूरी रात चलता रहा, जो कि सच नहीं है।”

राहुल गाँधी ने चुनाव में मत प्रतिशत बढ़ने का यह मुद्दा चुनाव आयोग द्वारा स्पष्टीकरण दिए जाने के बाद भी उठा रहे हैं। महाराष्ट्र चुनाव के बाद दिसम्बर, 2024 में भी राहुल गाँधी ने यही बातें कहीं थी। इसके बाद चुनाव आयोग ने बताया था कि मतदान के अंतिम आँकड़े में वोटिंग के दिन आए आँकड़ों से बदलाव संभव है।

राहुल गाँधी के इस बयान को लेकर भाजपा अब हमलावर हो गई है। उनके भारत विरोधी बयान पर निशाना साधते हुए भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “जो राहुल गाँधी अपने ही देश में मतदाताओं का विश्वास नहीं जीत सकते, वे विदेश जाकर भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे है।”

भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने राहुल गांधी को ‘लोकतंत्र विरोधी और ‘भारत विरोधी’ बताया। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी जॉर्ज सोरोस के एक एजेंट है, जो हमेशा विदेशी धरती पर देश को बदनाम करते हैं, आग उगलते हैं।

यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब राहुल गाँधी ने विदेश में भारत और उसकी एजेंसियों को लेकर विवादित बातें की हो। इससे पहले वह सितम्बर, 2024 में अमेरिका दौरे के दौरान भी भारतीय लोकतंत्र को लेकर कई ऐसी ही बातें कह चुके हैं। उन्होंने इस दौरान भारत की तुलना सीरिया और ईराक से कर दी थी।

डर से घर छोड़ भाग गए थे हिन्दू, कोई तोड़फोड़ नहीं हुई: मुर्शिदाबाद हिंसा पर TMC विधायक अमीरुल इस्लाम का बयान, बोले- हमारे शहर में ‘सामान्य’ हो रही स्थिति

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में इस्लामी कट्टरपंथियों के डर के चलते सैकड़ों हिन्दू पलायन कर गए थे, लेकिन राज्य में सत्तारूढ़ TMC इसे मानने को तैयार नहीं है। TMC के एक विधायक ने कहा है कि वह हिन्दू घबरा कर चले गए और उन्हें हिंसा से कोई डर नहीं था। TMC के विधायक अमीरुल इस्लाम ने यह बातें कहीं है। उन्होंने तोड़फोड़ की बात भी नकार दी है।

अमीरुल इस्लाम मुर्शिदाबाद के उसी शमशेरगंज से विधायक हैं, जहाँ सबसे अधिक हिंसा इस्लामी कट्टरपंथियों ने की थी। अमीरुल इस्लाम ने रविवार (20 अप्रैल, 2025) को हिंसा प्रभावित धुलियान और बाक़ी इलाकों का दौरा किया। उनके साथ TMC के और भी नेता थे।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमीरुल इस्लाम ने कहा, “इन लोगों (हिन्दुओं) को वापस नहीं लाया गया, वे स्वेच्छा से वापस आए हैं… उनके इलाके में घरों में तोड़फोड़ नहीं की गई, वे सिर्फ डर के मारे भाग गए। और अब वे घर लौट रहे हैं… हमारा शहर सामान्य स्थिति की ओर लौट रहा है।”

मुर्शिदाबाद में डर के चलते भागे हिन्दुओं को वर्तमान में राज्य की पुलिस वापस ला रही है। अमीरुल इस्लाम ने इन्हीं के वापस लाए जाने पर यह दावे किए हैं। जहाँ उन्होंने कोई हमला ना होने का दावा किया है वहीं हालिया रिपोर्ट्स ने बताया है कि उन्होंने इस दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा मारे गए हिन्दू चंदन दास और हरगोबिन्द दास के परिजनों से भी मुलाक़ात की।

अमीरुल इस्लाम के साथ पहुँचे MP समीरुल इस्लाम ने यहाँ पर भी अड़ियल रवैया अपनाए रखा। उन्होंने कहा कि चंदन दास का परिवार अभी मुआवजा नहीं स्वीकार कर रहा है लेकिन बाद में यह कर लेगा। चंदन दास के परिवार ने ममता सरकार द्वारा दिया गया ₹10 लाख का मुआवजा ठुकरा दिया था।

समीरुल इस्लाम ने कहा है कि जब सब बाहरी लोग चले जाएँगे तो इनके पास लोकल ही बचेंगे। इससे पहले भी TMC के नेता मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा के ऊपर लीपापोती करते आए हैं। हालाँकि, इससे यहाँ के हिन्दुओं का खौफ नहीं जा रहा है।

गौरलतब है कि 11 अप्रैल, 2025 को मुर्शिदाबाद के धुलियान और शमशेरगंज इलाकों में वक्फ कानून के विरोध के नाम पर इस्लामी भीड़ ने भारी हिंसा की थी। इस हिंसा के दौरान हिन्दुओं के घरों-दुकानों को निशाना बनाया गया था। 3 हिन्दू मार भी दिए गए थे। इसके बाद मुर्शिदाबाद से बड़ी संख्या में हिन्दू मालदा और झारखंड भाग गए थे।

इन हिन्दुओं ने बताया था कि इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें महिलाओं के रेप के बदले जीवित छोड़ने की बात कह रहे थे। उन्होंने BSF और बाकी केन्द्रीय सुरक्षाबलों के मुर्शिदाबाद में स्थायी रूप से तैनात किए जाने की माँग की थी।

सूअर के गोश्त जैसा है इजरायली सामान, बहिष्कार करो: संभल में मंदिर-मदरसों पर चिपकाए पोस्टर – शादाब, गुलफाम समेत 7 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के संभल जिले के नरौली कस्बे में दुकानों की दीवारों पर ‘फ्री गाजा, फ्री फिलिस्तीन’ जैसे पोस्टर चिपकाने के मामले में पुलिस ने सात लोगों को गिरफ्तार किया है। इन पोस्टरों में मुसलमानों से इजरायली सामान का बहिष्कार करने की अपील भी की गई है। पोस्टर में ऐसे सामानों को भी दिखाया गया है, जिनसे दूर रहने और खरीदारी ना करने की सलाह दी गई है।  

बनियाथार एसएचओ रामवीर सिंह ने रविवार (20 अप्रैल 2025) को पीटीआई को बताया कि पुलिस ने आरोपितों की पहचान कर उनमें से 7 लोगों को पकड़ा है। आरोपितों में मोहम्मद शादाब, मोहम्मद रिहान, गुलफाम, मोहम्मद सलीम, समीर, याकूब, और सलमान शामिल हैं। इन पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने, हिंसा फैलाने और धार्मिक भावनाओं को भड़काने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और वीडियो के आधार पर 200 से अधिक उपद्रवियों के पोस्टर जारी किए हैं, जिनकी पहचान की जा रही है। इनमें से 11 और उपद्रवियों की पहचान हो गई है। सभी आरोपितों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमें दर्ज किए गए हैं। आपको बता दें कि ‘फ्री गाजा, फ्री फिलिस्तीन’ के पोस्टर मंदिर, दुकानों, बिजली के खंभों और मदरसों की दीवारों पर चिपकाए गए थे।

पुलिस के अनुसार, कुछ दिन पहले कस्बे की दुकानों की दीवारों पर यह पोस्टर देखे गए, जिनमें एक विशेष समुदाय से इज़रायली सामान का बहिष्कार करने की अपील भी की गई थी। थाना प्रभारी रामवीर सिंह ने कहा कि जिन दुकानों की दीवारों पर ये पोस्टर लगे थे, उनके मालिकों से भी पूछताछ की गई।

घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए बजरंग दल के संयोजक नितिन शर्मा ने पत्रकारों से कहा कि पोस्टरों में मुसलमानों से अपील की गई थी कि वे सिर्फ मुस्लिम दुकानदारों से ही खरीदारी करें, जो समाज में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने की मानसिकता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा, “ये केवल पोस्टर नहीं हैं, बल्कि यह एक खतरनाक सोच है जो ज़िले में फैल रही है। पश्चिम बंगाल की तरह यहाँ भी हिन्दुओं के ख़िलाफ़ माहौल बनाया जा रहा है। अगर प्रशासन ने समय पर कार्रवाई नहीं की, तो विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे सँगठन खुद मोर्चा संभालेंगे।”

ग़ौरतलब है कि अक्टूबर 2023 में हमास के नेतृत्व वाले चरमपंथियों द्वारा दक्षिणी इजरायल में हमला किए जाने के बाद इजरायल ने गाज़ा में सैन्य अभियान शुरू किया था, जिसमें 1,200 लोगों की मौत हुई थी और 251 को बंधक बना लिया गया था। इसके बाद से इज़रायली हमले में अब तक 51,000 से अधिक फिलीस्तीनी नागरिकों की मौत हो चुकी है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं। यह जानकारी एपी ने गाज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय के हवाले से दी है।

इस घटना के बाद प्रशासन ने इंटरनेट सेवाएँ 48 घंटे के लिए बंद कर दी हैं। पुलिस और प्रशासन इस मामले की गंभीरता से जाँच कर रहे हैं और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की योजना बना रहे हैं।

बार-बार सो जाता है हिन्दू, संघ उन्हें 100 सालों से जगा रहा: लखनऊ में गरजे RSS सरकार्यवाह, बोले- भारत को नहीं बनाना हिंदू राष्ट्र, ये पहले से है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले कहा है कि भारत पहले से ही हिन्दू राष्ट्र है। संघ सरकार्यवाह ने बताया है कि हिन्दू जागृत नहीं रहते और यह काम हर बार किसी महापुरुष को करना पड़ता हैं। उन्होंने यह सारी बातें लखनऊ में एक संघ कार्यक्रम में कहीं।

लखनऊ में आयोजित एक RSS के एक कार्यक्रम में रविवार (20 अप्रैल, 2025) को संघ सरकार्यवाह होसबाले ने कहा, “संघ बीते 100 वर्षों से हिन्दू समाज को जागृत कर रहा है। इसलिए संघ लगातार 100 वर्षों से बढ़ रहा है। संघ भारत को हिन्दू राष्ट्र नहीं बना रहा, यह पहले से हिन्दू राष्ट्र है।”

उन्होंने आगे कहा, “संघ जातियों में बनते हिन्दू को राष्ट्रीय हिन्दू बना रहा है। वह अकेले हिन्दू को शक्तिशाली बना रहा है।” उन्होंने इस दौरान कहा कि भारत अब वापस उठ रहा है और यह विश्व के कल्याण के लिए ही उठ रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की उन्नति किसी को दास बनाने के लिए नहीं होगी।

उन्होंने इस दौरान हिन्दुओं में चेतना की कमी को लेकर बात की। उन्होंने कहा, “हिन्दू समाज के साथ एक समस्या है कि इसे कोई महापुरुष जगाता है। मगर वह फिर सो जाता है। ऐसा एक नहीं कई बार हुआ है। हिन्दू समाज को बार-बार जगाना पड़ता है… ऐसा ही काम डॉ हेडगेवार ने किया है। संघ ने हमेशा हिन्दुओं को जगाया है।”

लखनऊ में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने स्वयंसेवकों को लोगों के साथ मिलकर काम करने के लिए कहा। RSS के इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्वयंसेवक पूरे उत्तर प्रदेश से शामिल हुए थे। RSS इस समय उत्तर प्रदेश में काफी एक्टिव है।

RSS सरकार्यवाह से पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत भी उत्तर प्रदेश के दौरे पर थे। उन्होंने इस दौरान उत्तर प्रदेश में हिन्दुओं की एकता की प्रशंसा भी की थी। अलीगढ़ में उन्होंने कहा था कि उत्तर प्रदेश में हिन्दू एकजुट हैं और इसी कारण से प्रदेश का माहौल बदला है। RSS मुखिया ने ऐसी एकता देश में बनाए जाने की बात की थी।

77 साल के बुजुर्ग को पीटा, घसीटकर अस्पताल से बाहर किया: पद से हटाया गया ‘रेड क्रॉस’ का कर्मचारी और डॉक्टर, मध्य प्रदेश पुलिस ने दर्ज की FIR

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में 77 वर्षीय साल के एक बुज़ुर्ग व्यक्ति के साथ सरकारी अस्पताल में डॉक्टर द्वारा मारपीट और दुर्व्यवहार किया गया है। घटना गुरुवार (17 अप्रैल 2025) की है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में दिख रहा है कि डॉक्टर एक अन्य व्यक्ति के साथ बुज़ुर्ग को घसीटते हुए अस्पताल से बाहर ले जा रहा है और उसके साथ मारपीट कर रहा है।

पीड़ित का नाम उद्धवलाल जोशी है और वह नौगाँव शहर के रहने वाले हैं। वे अपनी पत्नी के इलाज के लिए जिला अस्पताल पहुँचे थे। जोशी ने आरोप लगाया है कि उन्होंने समय पर पर्ची कटवाई और लंबी कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतज़ार किया। इस दौरान वे डॉक्टर राजेश मिश्रा के पास पहुँचे और उनसे बुजुर्ग होने की वजह से थोड़ा जल्दी देखने की विनय किया।

आरोप है कि डॉक्टर राजेश मिश्रा ने बुजुर्ग की बात सुनकर भड़क गए और चीखने-चिल्लाने लगी। इसी दौरान उन्होंने बुजुर्ग व्यक्ति को थप्पड़ और लात मारी और अस्पताल के कर्मियों को बुलाकर बाहर निकलवा दिया। अस्पताल के कर्मियों ने बुजुर्ग को घसीटते हुए अस्पताल से बाहर निकाल दिया। वायरल वीडियो में ये साथ दिख रहा है कि बुजुर्ग जमीन पर गिरा हुआ है और अस्पताल कर्मी उनका हाथ खींच रहे हैं।

इस घटना को लेकर बुजुर्ग जोशी ने डॉक्टर राजेश मिश्रा के खिलाफ स्थानीय नौगाँव थाने में एफआईआर भी दर्ज करवाई है। डॉक्टर राजेश मिश्रा जिला अस्पताल छतरपुर में अस्थि रोग विशेषज्ञ एवं संविदा स्नातकोत्तर चिकित्सा अधिकारी हैं। अपनी शिकायत में बुजुर्ग जोशी ने बताया कि वह अस्पताल में अपनी 70 वर्षीया पत्नी का इलाज कराने के लिए आए थे। इसी दौरान यह घटना हुई।

वहीं, अस्पताल प्रशासन ने इस घटना को लेकर अलग ही पक्ष रखा है। सिविल सर्जन जीएल अहिरवार कहना है कि उस समय अस्पताल में भीड़ ज़्यादा थी और जोशी ने कतार तोड़ते हुए सीधे डॉक्टर के पास पहुँचने का प्रयास किया। इसके बाद उनकी डॉक्टर से बहस शुरू हो हुई। उन्होंने दावा किया कि बुजुर्ग के साथ कोई मारपीट नहीं हुई है और डॉक्टर ने सिर्फ अनुशासन बनाए रखने के लिए आपत्ति जताई थी।

प्रशासन ने डॉक्टर राजेश मिश्रा का संविदा खत्म कर पद से हटाते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है। वहीं, बुजुर्ग को घसीटने वाले रेड क्रॉस कर्मचारी राघवेंद्र खरे को भी हटा दिया गया है। वहीं, जाँच में डॉक्टर मिश्रा द्वारा बुजुर्ग के साथ मारपीट की घटना को सही पाया गया है। मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग द्वारा कहा गया है कि डॉक्टर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

वहीं, कॉन्ग्रेस ने इस घटना को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की है। पार्टी ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) हैंडल पर वीडियो शेयर करते हुए इसे ‘अमानवीय और घटिया व्यवहार’ बताया है। कॉन्ग्रेस ने लिखा, “प्रदेश की भाजपा सरकार इस घिनौने व्यवहार पर चुप्पी साधे बैठी है। यह पहला मामला नहीं है, जब अस्पतालों में मरीजों को अपमान और पीड़ा का सामना करना पड़ा हो। राज्य में सेवा अब यातना में बदल गई है।”

रिजवान ने विधवा हिंदू महिला को फँसा कर मुस्लिम बनाया, महीनों तक करता रहा रेप: भाई संग मिल पीड़िता की 17 साल की बेटी का भी किया गैंगरेप, बिजनौर में गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश पुलिस ने बिजनौर में एक विधवा महिला और उसकी 17 साल की नाबालिग बेटी को अपनी हवस का शिकार बनाने वाले रिजवान को गिरफ्तार कर लिया है। ब्यूटी पार्लर चलाने वाली हिंदू महिला को रिजवान ने पहले अपने प्रेमजाल में फँसाया, उसके बाद उसका इस्लाम में धर्मांतरण कराकर मुस्लिम बना दिया। इतना ही नहीं, रिजवान के साथ-साथ उसके भाई ने भी किशोरी से दुष्कर्म किया।

मामला बिजनौर के नगर कोतवाली थाना क्षेत्र का है। हिंदू महिला के पति का पाँच साल पहले निधन हो गया था। उसकी 17 की एक बेटी है। परिवार का पालन-पोषण करने के लिए वह ब्यूटी पार्लर चलाती है। इसी दौरान उसकी मुलाकात जुलाहा मुहल्ले के रहने वाले रिजवान से हुई। रिजवान से महिला को अपने झाँसे में ले लिया और प्यार-मुहब्बत का नाटक करके उससे निकाह करने की बात कही।

महिला रिजवान की बातों में आ गई। रिजवान ने निकाह के नाम पर महिला का धर्म परिवर्तन करा दिया और उसका मुस्लिम नाम रख दिया। इसके बाद वह महिला से लगातार रेप करता रहा। इसके कारण महिला गर्भवती हो गई। इस बीच रिजवान ने पीड़ित महिला की 17 साल बेटी को निशाना बनाना शुरू कर दिया। आरोप है कि पिछले साल 10 अगस्त को ब्यूटी पार्लर गई तो रिजवान ने उसकी बेटी से रेप किया।

इतना ही नहीं, रिजवान ने अपने छोटे भाई इमरान से भी नाबालिग लड़की का रेप करवाया। आरोपितों ने नाबालिग लड़की को धमकाया कि अगर उसने इस बारे में अपनी माँ या किसी अन्य को बताया तो वे उसे और उसकी माँ की हत्या कर देंगे। उन लोगों ने पीड़िता पर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला। आखिरकार पीड़िता ने घटना के बारे में अपनी माँ को बताया और कोतवाली थाने में संपर्क किया।

अपनी शिकायत में पीड़िता ने रिजवान और उसके भाई इमरान पर गैंगरेप करने, जान से मारने की धमकी देने, जबरन धर्म परिवर्तन कराने सहित कई शिकायतें कीं। शिकायतों के आधार पर पुलिस ने दोनों आरोपितों के खिलाफ पॉक्सो, गैंगरेप और धर्म परिवर्तन कानून विभिन्न कानून की अलग-अलग धाराओं में मामला दर्ज कर लिया। पुलिस ने रिजवान को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि इमरान फरार है।

जेल में PM मोदी और अमित शाह, पंजाब अलग देश: ‘खालसा डे परेड’ के दौरान कनाडा में खालिस्तानियों का उत्पात, तिरंगे का भी अपमान

कनाडा के सरे शहर में शनिवार (19 अप्रैल 2025) को वार्षिक खालसा दिवस वैसाखी परेड का आयोजन किया गया, जिसमें भारत विरोध नारे लगाए गए। परेड में 5,50,000 से अधिक लोग शामिल हुए थे। इस परेड में खालिस्तान के झंडे और भारत विरोधी पोस्टरों को लहराया गया। इन पोस्टरों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के ‘वॉन्टेड’ बताया गया था।

बता दें कि सन 1699 में सिख धर्म के 10वें एवं अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने खालसा की स्थापना वैशाखी के दिन की थी। इसी के सम्मान में यह आयोजन किया जाता है। यह सिखों का सबसे बड़ा आयोजन है, जो दुनिया के सबसे बड़े आयोजनों में से एक है। यह सिख एकता और विविधता का उत्सव है, लेकिन अलगाववादियों ने इसे भी नहीं छोड़ा। सरे शहर में यह 1998 से निकाला जा रहा है।

परेड के प्रवक्ता मोनिंदर सिंह ने परेड को एकता, विविधता और साझा खुशी की सुंदर अभिव्यक्ति बताया। उन्होंने कहा, “सरे नगर कीर्तन सिख समुदाय के लिए अपने इतिहास, प्रथाओं, मानवाधिकारों और संप्रभुता के प्रति प्रतिबद्धता को साझा करने का एक अवसर है।” हालाँकि, इस कार्यक्रम में कई लोगों के लिए संप्रभुता का मतलब खालिस्तान आंदोलन से था।

इस परेड में एक बड़ा ट्रेलर ट्रक भी शामिल किया गया था, जिस पर जेल बनाया गया था। इस ‘जेल’ के अंदर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और विदेश मंत्री जयशंकर के पुतले नारंगी रंग की वर्दी में थे। ‘जेल’ के बगल में उन्हें सिखों का दुश्मन बताते हुए उनकी गिरफ्तारी की माँग करने वाले पोस्टर लगाए गए थे। उन पर खालिस्तानी आतंकवादी निज्जर की हत्या का आरोप लगाया गया था।

ट्रक पर एक और पोस्टर था, जिसमें लिखा था ‘भारत को विभाजित करो’। इसमें 1 नवंबर 2025 को वैंकूवर में ‘खालिस्तान जनमत संग्रह’ की भी घोषणा की गई थी। परेड के दौरान ‘मोदी राजनीति को मार डालो’, ‘निज्जर को किसने मारा? भारतीय सरकार’ जैसे नारे लगाए गए। परेड में भारतीय ध्वज का भी अपमान किया गया। तिरंगे को झाँकियों के पीछे लटकाया गया था, जमीन को छू रहा था।

खालिस्तानी आतंकवादी संतोख सिंह खेला भी परेड में मौजूद था। उसने मंच से पंजाब को भारत से अलग कर खालिस्तान बनाने की बात कही। परेड में हरदीप सिंह निज्जर और कनिष्क बम विस्फोट के मास्टरमाइंड तलविंदर सिंह परमार सहित कई आतंकवादियों का जश्न मनाया गया। यह घटना सरे में लक्ष्मीनारायण मंदिर और वैंकूवर में गुरुद्वारे पर खालिस्तानियों द्वारा भारत विरोधी और खालिस्तान समर्थक नारे कुछ ही घंटों बाद हुई।

लक्ष्मीनारायण मंदिर पर फिर हमला

कनाडा के सरे में 19 अप्रैल को लक्ष्मीनारायण मंदिर पर हमला किया गया। मंदिर की दीवारों और दरवाजों पर खालिस्तान समर्थक नारे लिख गए दिए गए। इसके साथ ही तोड़फोड़ भी की गई है। मंदिर समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि ये हमले पूर्व नियोजित हो सकते हैं, ताकि सिख और हिन्दू समाज आपस में बँट जाएँ। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच शुरू की है।

कनाडा में मंदिर और गुरुद्वारों पर हमले का यह कोई पहला मामला नहीं है। 4 नवम्बर को भी कनाडा के ब्रैम्पटन में हिंदू मंदिर में श्रद्धालुओं पर खालिस्तानी समर्थकों की भीड़ द्वारा हमला किया गया था। इस दौरान, मंदिर में मौजूद श्रद्धालुओं पर लाठी-डंडे बरसाए गए और महिलाओं व बच्चों को भी नहीं बख्शा गया था।

रॉस स्ट्रीट गुरुद्वारे पर हमला

सरे के मंदिर के अलावा, वैंकुवर के खालसा दीवान सोसाइटी गुरुद्वारा (रॉस स्ट्रीट गुरुद्वारा) पर खालिस्तान समर्थक और भारत विरोधी नारे लिख दिए गए। गुरुद्वारा प्रबंधन ने इसका आरोप ‘चरमपंथी ताकतों’ पर लगाया है। वहीं, सरे स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर के दिवारों को भी ऐसे ही अपवित्र कर दिया गया। उधर, सरे में उसी दिन खालसा दिवस वैशाखी परेड में खालिस्तानी झंडे लहराए गए।

रॉस स्ट्रीट गुरुद्वारा प्रबंधन का का कहना है, “खालिस्तान की वकालत करने वाले सिख अलगाववादियों के एक छोटे समूह ने ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ जैसे विभाजनकारी नारे लगाकर हमारी पवित्र दीवारों को खराब कर दिया। यह कृत्य उन चरमपंथी ताकतों द्वारा चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा है, जो कनाडाई सिख समुदाय के भीतर भय और विभाजन पैदा करना चाहते हैं।”

दिल्ली पुलिस और फायर ब्रिगेड ने कबूली जज के घर कैश मिलने की बात: नहीं किया जब्त, ऊपर से वीडियो भी डिलीट करवा दिया – अब आया जवाब

इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आवास पर 14 मार्च को आग की घटना के बाद पाए गए कैश को लेकर कई सवाल उठे थे। इसके बाद मामले की जाँच के लिए बनी कमेटी की उपस्थिति में घटनास्थल पर उस दौरान मौजूद रहे पुलिसकर्मियों से पूछताछ की गई।

पूछताछ के दौरान सबसे मुख्य प्रश्न यह था कि आवास पर मिली नकदी को जब्त क्यों नहीं किया गया और घटना के तुरंत बाद पहुँचे पुलिसकर्मियों के फोन से वीडियो क्यों डिलीट किया गया। इसपर जवाब देते हुए अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में कोई FIR ही दर्ज नहीं हुई थी।

यही कारण है कि नकदी जब्त नहीं की गई लेकिन इस मामले की जानकारी उनके द्वारा सीनियर अधिकारियों को दी गई थी, जिन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी घटना के बारे में सूचना दी थी। वहीं वीडियो डिलीट करने के बारे में उनका कहना है कि वीडियो गलत हाथों तक न जाए इसलिए सीनियर अधिकारियों के निर्देश पर वीडियो डिलीट कराया गया था।

FIR और जब्ती पर उठे सवाल

दिल्ली पुलिस ने इस मामले में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की। पुलिस अधिकारियों ने जाँच समिति को बताया कि उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श आवश्यक होता है। इसीलिए, बिना FIR के नकदी की जब्ती नहीं की गई। इसके अलावा, घटनास्थल पर मौजूद कर्मचारियों के मोबाइल फोन से वीडियो क्लिप वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर हटा दिए गए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे गलत हाथों में न जाए।

वही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने, एक कार्यक्रम के दौरान कहा, “उन्होंने जब्ती में शून्य दर्ज किया। चूँकि हम एफआईआर दर्ज नहीं कर सकते, तो जब्ती कैसे हो सकती है? एफआईआर केवल मुख्य न्यायाधीश की अनुमति से ही दर्ज की जा सकती है, हमें समिति के निर्णय का इंतजार करना चाहिए।”

न्यायमूर्ति वर्मा का बयान

जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने आवास पर किसी भी नकदी की मौजूदगी से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि आग लगने के समय वो और उनकी पत्नी दिल्ली में नहीं थे, और उनकी बेटी और निजी सचिव ने दमकल सेवा को सतर्क किया था। उन्होंने यह भी कहा कि आग बुझने के बाद उनके परिवार के सदस्यों और कर्मचारियों को कोई नकदी नहीं दिखाई दी।

जाँच समिति की कार्रवाई

जाँच समिति ने 30, तुगलक क्रीसेंट स्थित जस्टिस वर्मा के आवास का दौरा किया और उस कमरे का निरीक्षण किया जहाँ आग लगी थी। समिति ने दिल्ली पुलिस आयुक्त, डीसीपी (नई दिल्ली जिला), अतिरिक्त डीसीपी, और अन्य संबंधित अधिकारियों के बयान दर्ज किए। इन सभी ने अपने बयानों में उल्लेख किया कि आग में जले हुए बैग में नकदी थी।

भाजपा MP निशिकांत दुबे पर चले अवमानना का मुकदमा, वकील अनस तनवीर ने अटॉर्नी जनरल को लिखा पत्र: कहा- उनके बयान भड़काऊ

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलाने के लिए देश के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी को पत्र लिखा गया है। यह पत्र सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने लिखा है। वकील ने कहा है कि सांसद दुबे के यह बयान भड़काऊ और अपमानजनक हैं। AG वेंकटरमणी से निशिकांत दुबे के खिलाफ यह मामला चलाने की अनुमति माँगी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पत्र सुप्रीम कोर्ट में वकील अनस तनवीर ने लिखा है। इस पत्र में लिखा गया है, “उन्होंने लापरवाही से देश में अशांति के लिए CJI को जिम्मेदार ठहराया है और इस प्रकार उन्होंने देश की सबसे बड़ी अदालत को बनाम किया है। उन्होंने इससे जनता में गुस्सा और असंतोष भड़काने का प्रयास किया है।”

AG वेंकटरमणी को भेजे गए गए पत्र में कहा गया है कि सांसद निशिकांत दुबे का बयान निराधार है और यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर हमला है। यही दावे करते हुए निशिकांत दुबे के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए AG वेंकटरमणी से मंजूरी माँगी गई है।

अनस तनवीर ने का अवमानना का यह पत्र दुबे के हाल ही में सुप्रीम कोर्ट पर दिए गए बयानों को लेकर लिखा है। निशिकांत दुबे हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रपति के लिए डेडलाइन सेट करने और वक्फ कानून के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश देने को लेकर मुखर रहे हैं।

उन्होंने राष्ट्रपति के लिए डेडलाइन सेट करने के मुद्दे पर कहा था, “क़ानून यदि सुप्रीम कोर्ट ही बनाएगा तो संसद भवन बंद कर देना चाहिये।” इसके अलावा ANI को दिए एक बयान में उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियाँ राष्ट्रपति करता है, ऐसे में अदालत उन्हें आदेश कैसे दे सकती है।

निशिकांत दुबे ने इसके अलावा वक्फ मुद्दे के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाने के चलते सुप्रीम कोर्ट को लेकर कहा था, “देश में धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जा रहा है। अगर हर बात के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना ही पड़े तो संसद और विधानसभाएँ बंद कर देनी चाहिए।”

निशिकांत दुबे के इन बयान के बाद न्यायिक दखल को लेकर चर्चा और तेज हो गई है। हालाँकि, उनके इन दोनों बयानों से भाजपा ने किनारा कर लिया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा है कि यह निशिकांत दुबे की निजी राय है और इससे पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है।

उर्दू साइनबोर्ड में ‘गंगा-जमुनी तहजीब’, हिजाब में ‘मुस्लिम लड़कियों की सुरक्षा’: मिलिए जस्टिस सुधांशु धूलिया से, परिचित होइए उनकी न्यायिक भावुकता से

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उर्दू को गंगा-जमुनी तहजीब का सबसे अच्छा नमूना बताते हुए महाराष्ट्र में एक नगरपालिका के साइनबोर्ड में उसके इस्तेमाल की अनुमति दी थी। मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा था कि कहा था कि भाषा एक संस्कृति है और इसे लोगों को विभाजित करने का कारण नहीं बनना चाहिए। जस्टिस धूलिया के कई निर्णयों में यह परिलक्षित है।

दरअसल, भारत के विशाल लेकिन विविधता से वंचित न्यायपालिका में जस्टिस सुधांशु धूलिया जैसे नाम कानूनी पहलू से कम, आदर्शवाद के आइने में फैसले के लिए अधिक चर्चित हैं। जस्टिस धूलिया का कर्नाटक हिजाब विवाद और अकोला नगर परिषद के उर्दू साइनबोर्ड मामले में भावनात्मक विश्वासों और चयनात्मक धर्मनिरपेक्षता की ओर झुकाव स्पष्ट तौर पर परिलक्षित हुआ।

महाराष्ट्र का उर्दू साइनबोर्ड मामले में भावनात्मक बहाव

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2025 को महाराष्ट्र अकोला नगर परिषद के भवन में उर्दू साइनबोर्ड लगाने की रोकने की माँग वाली याचिका को खारिज कर दिया था। जस्टिस धूलिया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए उर्दू की शान में कसीदे पढ़े। पीठ ने तो यहाँ तक कह दिया कि अलग-अलग भाषा सीखने से ‘हम अधिक उदार, सहिष्णु और दयालु’ बनते हैं।

न्यायाधीश धूलिया ने कहा था, “भाषा विचारों के आदान-प्रदान का एक माध्यम है, जो अलग-अलग विचारों और मान्यताओं वाले लोगों को करीब लाती है। यह उनके बीच विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए।आइए हम उर्दू और हर भाषा से दोस्ती करें। उर्दू भारत के लिए विदेशी नहीं है। इसका जन्म भारत में हुआ और यहीं इसका विकास हुआ है।”

कोर्ट ने आगे कहा था, “उर्दू के खिलाफ पूर्वाग्रह इस गलत धारणा से उपजा है कि उर्दू भारत के लिए विदेशी है। यह राय गलत है, क्योंकि मराठी और हिंदी की तरह उर्दू भी एक इंडो-आर्यन भाषा है। यह एक ऐसी भाषा है, जिसका जन्म इसी देश में हुआ है। उर्दू भारत में अलग-अलग सांस्कृतिक परिवेश से जुड़े लोगों की ज़रूरत के कारण विकसित और फली-फूली।”

न्यायमूर्ति धूलिया ने अपने फैसले की शुरुआत मौलूद बेन्ज़ादी के एक कथन से की। उन्होंने कहा था, “जब आप कोई भाषा सीखते हैं, तो आप सिर्फ़ एक नई भाषा बोलना और लिखना ही नहीं सीखते। आप खुले विचारों वाले, उदार, सहिष्णु, दयालु और सभी मानव जाति के प्रति विचारशील होना भी सीखते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “हमारी अवधारणाएँ स्पष्ट होनी चाहिए। भाषा धर्म नहीं है। भाषा धर्म का प्रतिनिधित्व भी नहीं करती। भाषा किसी समुदाय, क्षेत्र, लोगों की होती है, किसी धर्म की नहीं। भाषा विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम है जो विभिन्न विचारों और विश्वासों वाले लोगों को करीब लाती है और यह उनके विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मसले पर भाषाई एकता पर निर्णय देने के बाद इसे उर्दू के महत्व को बताने में बदल दिया। न्यायमूर्ति धूलिया ने अपने फैसले को प्रशासनिक या कानूनी तर्क की कसौटी पर कसने के बजाय इसे भाषाई बहुलता और सांस्कृतिक एकता की बात करने लगे। इस तरह की टिप्पणी कानूनी कम और राजनीतिक ज्यादा नजर आती है।

कर्नाटक हिजाब मामले में जस्टिस धूलिया की असहमति

साल 2022 में कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब पहनकर जाने को लेकर विवाद उभरा हुआ था। आखिरकार यह मामला कर्नाटक हाई कोर्ट पहुँचा। उस समय कर्नाटक हाई कोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में समान ड्रेस कोड लागू करने के राज्य सरकार के आदेश बरकरार रखा था। कर्नाटक हाई कोर्ट के इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस धूलिया ने असहमति जाहिर की थी।

उस दौरान जस्टिस धूलिया ने शिक्षण संस्थानों में हिजाब-बुर्का पहनकर जाने के पूरे विमर्श को मुस्लिम बालिकाओं की सुरक्षा के इर्द-गिर्द घूमा दिया। उन्होंने संविधान में दिए गए समान अधिकार के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक प्रतीकवाद एवं उसके दूरगामी परिणामों पर विचार करने से इनकार कर दिया। इस तरह छूटों को देश में अक्सर मुस्लिम तुष्टीकरण के रूप में देखा जाता है।

दरअसल, साल 2022 में भाजपा की नेतृत्व वाली तत्कालीन कर्नाटक सरकार ने स्कूल-कॉलेज की परिक्षाओं में मुस्लिम लड़कियों को बुर्का-हिजाब पहनकर आने पर रोक लगा दिया था। तब मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया था। उनकी शह पर कुछ मुस्लिम लड़कियों ने सरकार के इस निर्णय का विरोध किया था और हिजाब पहनकर जाने पर अड़ी रहीं।

यह पूरा मामला स्कूल-कॉलेज में विद्यार्थियों के बीच एकरूपता और अनुशासन लाने की कोशिश की कवायद थी। हालाँकि, कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला बता दिया और राजनीतिक मौका देखकर विपक्ष और वामपंथी-उदारवादी बुद्धिजीवियों ने इसे राजनीतिक रंग दे दिया। वे भारत में ‘धर्मनिरपेक्षता खतरे में’ है का राग अलापने लगे। हर तरफ से सरकार पर दबाव बनाया जाने लगा।

इतना ही नहीं, शैक्षणिक अनुशासन को मौलिक अधिकारों से जोड़ दिया गया। हर तरफ से एक दबाव बनाने की कोशिश की जाने लगी। इसके विरोध में मुस्लिम कर्नाटक हाई कोर्ट पहुँचे, लेकिन उन्हें वहाँ राहत नहीं मिली। हाई कोर्ट ने स्कूल-कॉलेजों में हिजाब पर सरकार के लगाए प्रतिबंध को बरकरार रखा। इसके बाद मुस्लिमों ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों वाली पीठ ने सुनवाई की और आखिरकार विभाजित फैसला सुनाया। इसमें जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक हिजाब प्रतिबंध को बरकरार रखा, जबकि न्यायमूर्ति धूलिया ने इसके खिलाफ फैसला दिया। जस्टिस धूलिया ने कहा था कि मुस्लिम लड़कियों से हिजाब उतारने के लिए कहना उनकी निजता एवं गरिमा पर हमला और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा से वंचित करना है।

जस्टिस धूलिया ने कहा था, “हमारे स्कूल, खासकर प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज आदर्श संस्थान हैं, जहाँ हमारे बच्चों को… देश की समृद्ध विविधता को समझने की आवश्यकता है, उन्हें सलाह और मार्गदर्शन की आवश्यकता है, ताकि वे सहिष्णुता और समायोजन के हमारे संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करें, खासकर उन लोगों के प्रति जो अलग भाषा बोलते हैं, अलग भोजन खाते हैं या यहाँ तक कि अलग कपड़े या परिधान पहनते हैं!”

जस्टिस धूलिया ने आगे कहा था, उन्होंने कहा, “यही वह समय है जब उन्हें हमारी विविधता से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इस विविधता का आनंद लेना चाहिए और इसका जश्न मनाना चाहिए। यही वह समय है जब उन्हें यह एहसास होना चाहिए कि विविधता में ही हमारी ताकत है। हमारी संवैधानिक स्कीम के तहत हिजाब पहनना केवल एक विकल्प का मामला होना चाहिए।”

जस्टिस धूलिया ने हाई कोर्ट के इस निष्कर्ष पर भी आपत्ति जताई कि मुस्लिम विद्यार्थी कक्षा के भीतर अपने मौलिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा था, “स्कूल सार्वजनिक स्थान है, फिर भी स्कूल और जेल या सैन्य शिविर के बीच समानता स्थापित करना सही नहीं है। अगर हाई कोर्ट द्वारा उठाया गया मुद्दा स्कूल में अनुशासन के बारे में था तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए, लेकिन यह स्वतंत्रता और गरिमा की कीमत पर नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने कहा था, “एक प्री यूनिवर्सिटी स्कूली छात्रा से उसके स्कूल गेट पर हिजाब उतारने के लिए कहना, उसकी निजता और गरिमा पर आक्रमण है। यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 21 के तहत उसे दिए गए मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। अपनी गरिमा और निजता का यह अधिकार वह अपने निजी जीवन में रखती है, यहाँ तक कि अपने स्कूल गेट के अंदर या अपनी कक्षा में भी।”

इसके परिणामों पर चर्चा करते हुए जस्टिस धूलिया ने कहा था कि हिजाब पर प्रतिबंध के कारण कुछ छात्राएँ बोर्ड परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पाई हैं और कई अन्य को संभवतः मदरसों में आवेदन करना पड़ा है, जहाँ शिक्षा का समान मानक नहीं मिल सकता है। उन्होंने पूछा था, “स्कूल प्रशासन और राज्य को जवाब देना चाहिए कि उनके लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है- एक बालिका की शिक्षा या ड्रेस कोड लागू करना!”

उन्होंने फैसले में उन्होंने विस्तार से लिखा था, “आज भारत में सबसे अच्छी चीजों में से एक है एक लड़की का अपनी पीठ पर स्कूल बैग लटकाए हुए सुबह स्कूल के लिए निकलना। वह हमारी उम्मीद है, हमारा भविष्य है। यह भी एक सच्चाई है कि एक लड़की के लिए अपने भाई की तुलना में शिक्षा प्राप्त करना आज बहुत मुश्किल है।”

उन्होंने आगे कहा था, “भारत के गाँवों और अर्ध शहरी क्षेत्रों में, एक लड़की के लिए अपने स्कूल बैग को पकड़ने से पहले अपनी माँ के दैनिक कामों जैसे सफाई और कपड़े धोने में मदद करना आम बात है… इसलिए इस मामले को एक लड़की द्वारा अपने स्कूल पहुँचने में पहले से ही सामना की जाने वाली चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि हिजाब पहनना धार्मिक प्रथा का मामला हो सकता है या नहीं भी हो सकता है, लेकिन यह अभी भी विवेक, विश्वास और अभिव्यक्ति का मामला है। अगर लड़की कक्षा में भी हिजाब पहनना चाहती है तो उसे रोका नहीं जा सकता। जस्टिस धूलिया ने कहा था, “इससे उसका रूढ़िवादी परिवार उसे स्कूल जाने की अनुमति देगा। उन मामलों में उसका हिजाब ही उसकी शिक्षा का टिकट है।”

जस्टिस धूलिया अपने फैसले के जरिए बताना चाह रहे थे कि स्कूल में अनुशासन बनाए रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण एक रूढ़ीवादी परिवार की लड़की के विश्वास एवं उसकी अभिव्यक्ति को बनाए रखना है, क्योंकि उसका परिवार उसे स्कूल भेज रहा है। यह एक सामाजिक एवं व्यवहारिक सोच हो सकती है, लेकिन न्यायिक सोच इससे इतर संविधान एवं कानून पर टिका होता है। उनका तर्क इस्लामवादियों की सोच के बेहद करीब है।

जस्टिस धूलिया का अलग रूख

जस्टिस धूलिया का कुछ ऐसा ही रूख संविधान के अनुच्छेद 39(बी) के मामले को लेकर भी था। दरअसल, अनुच्छेद 39(बी) पर एक महत्वपूर्ण फैसले में पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने दिग्गज न्यायाधीश कृष्ण अय्यर की लंबे समय से चली आ रही व्याख्या को पलट दिया था। अय्यर के 1978 में अपनी व्याख्या में कहा था कि निजी संपत्ति को ‘समुदाय के भौतिक संसाधनों’ का हिस्सा माना जा सकता है।

तत्कालीन सीजेआई चंद्रचूड़ ने इस पर असहमति जताई थी। उन्होंने कहा था, “न्यायमूर्ति अय्यर ने अपनी महान विरासत के बावजूद संविधान की व्यापक और अनुकूलनीय भावना के साथ अन्याय किया।” चंद्रचूड़ ने संवैधानिक लचीलेपन को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया था। CJI चंद्रचूड़ की टिप्पणियों को जस्टिस धूलिया ने ‘कठोर और अनुचित’ कह दिया था। ये कुछ एक ही ढर्रे पर चलने वाली बात जैसी थी।

कानून के बजाय भावना पर जोर

जस्टिस सुधांशु धूलिया ने अपने कई निर्णयों में संविधान की व्याख्या सार्वभौमिक न्यायिक के सिद्धांतों के बजाय भावानात्मक एवं मानवतावाद को ध्यान में रखकर दिया। ये कुछ ऐसा ही है जैसे युद्धग्रस्त सीरिया का कोई समूह भारत में आ जाए और उसके जीवन के परवाह करते हुए उसे भारत में अवैध रूप से रहने एवं जीवकोपार्जन के लिए अनुमति दे दी जाए।

जस्टिस धूलिया के निर्णयों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं निजी गरिमा की आड़ में हिजाब का बचाव करना हो या सार्वजनिक भवन के साइनबोर्ड पर उर्दू का लिखा होना सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बताना हो, उनके फैसले संवैधानिक पहलू के बजाय विश्व दृष्टिकोण एवं मानवतावाद को अधिक दर्शाते हैं, जो एक संप्रभु देश के लिए हर समय उपयुक्त नहीं होता है।

न्यायपालिका में सहानुभूति का आधार उसके परिणामों के परिप्रेक्ष्य में न्यायिक व्यवस्था के इर्द-गिर्द बने कानून सीमा के अंदर संतुलित रहना चाहिए। यह न्याय का सिद्धांत भी है। निर्णयों में कानून की व्याख्या, संबंधित केस की विवरण के बजाय अगर सामाजिक बहसों को शामिल किया जाता रहा तो अदालतों के निर्णय बाहरी जनप्रभाव से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते।