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मध्य प्रदेश में फर्जीवाड़ा गैंग चला रहे थे 2 कॉन्ग्रेस नेता, FIR दर्ज होते ही हुए फरार: जमीनों के जाली कागज बनाकर ऊँचे दामों पर बेचते थे, जानिए कैसे हुआ खुलासा

मध्य प्रदेश के जबलपुर में कॉन्ग्रेस के 2 नेता जमीन फर्जीवाड़ा गैंग चला रहे थे। यह गिरोह खाली जमीनें देख कर उनके उत्तराधिकारी के कागज बनवाता था और उन्हें बेच देता था। इस फर्जीवाड़े का खुलासा जबलपुर विकास प्राधिकरण (JDA) ने किया है। अब पुलिस इसके मास्टरमाइंड दो कॉन्ग्रेस नेताओं को तलाश रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस ने मामले के उजागर होते ही कयाज उर्फ शुभम ठाकुर को गिरफ्तार किया था। कयाज जबलपुर विकास प्राधिकरण में एक जमीन के उत्तराधिकार के लिए पहुँचा था। लेकिन शक के बाद उसके खिलाफ जाँच हुई और इसमें गड़बड़ी पकड़ में आई। कयाज ने इसके बाद पूरा मामला बयान किया।

कयाज ने बताया कि मनोज नामदेव और जतिन राज नाम के दो कॉन्ग्रेस नेता इस पूरे गैंग को चला रहे हैं। कयाज को भी यह कागज इन्हीं दोनों ने बना कर दिए थे। इनमें से जतिन राज यूथ कॉन्ग्रेस का नगर अध्यक्ष रह चुका है। पुलिस ने इस मामले में शनिवार (19 अप्रैल 2025) को पुलिस ने दोनो कॉन्ग्रेस नेता के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद पुलिस ने इन कॉन्ग्रेस नेताओं को पकड़ने के लिए प्रयास किए लेकिन यह फरार हो चुके हैं। उन्हें यह मामला खुलने का पता ही चल गया था। अब उनकी तलाश के लिए छापेमारी हो रही है। इस फर्जीवाड़े की भी और जानकारी जुटाई जा रही है।

रिहायशी इलाकों की जमीन होती थी निशाने पर

पुलिस पूछताछ में शुभम ने बताया कि दोनों कॉन्ग्रेस नेता जबलपुर शहर के रिहायशी इलाकों में खाली जमीनों की रेकी करते थे और पता करते थे कि इनकी स्थिति क्या है। जिन जमीनों का कोई उत्तराधिकारी नहीं होता था, उनके फर्जी कागज तैयार करवाते थे।

इन कागजों में यह खुद को उत्तराधिकारी बनवा लेते थे। इसके बाद यह JDA से उस जमीन का मालिकाना हक़ ले लेते थे। कुछ दिन बाद जमीन बेच दी जाती थी और इससे होने वाले मुनाफे को बाँट दिया जाता था। हालाँकि, इस बार यह खेल खुल गया।

फर्जीवाड़ा करते हुए ही हुआ खुलासा

यह मामला भी कयाज के फर्जीवाड़ा करते हुए ही खुला। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, कयाज ने JDA में बताया कि योजना क्रमांक 5-14 में पाँच हज़ार स्क्वायर फिट का प्लॉट है, जिसके स्वामी केपी लटोरिया हैं। उसने यहाँ जानकारी दी कि कुछ महीने पहले उनका और उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया।

इसके बाद कयाज ने दावा किया कि वह केपी लटोरिया का बेटा है। उसने इसके बाद उत्तराधिकारी बनाए जाने की माँग की। उसने यहाँ आधार कार्ड और पैन कार्ड भी दिखा दिए। लेकिन अफसर को दस्तावेज़ कुछ संदिग्ध लगे। इसीलिए सभी दस्तावेजों की जाँच कराई गई और वे फर्जी निकले।

जाँच में सामने आया कि केपी लटोरिया को कई बार नोटिस जारी किया जा चुका है। परंतु जवाब नहीं मिलने पर पता लगा कि उनकी कोई संतान ही नहीं थी। इसके बाद JDA ने पुलिस को मामले की शिकायत की। पुलिस ने फर्जीवाड़े समेत कई धाराओं में उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।

मंदिरों के बाद अब कनाडा का ऐतिहासिक गुरुद्वारा भी खालिस्तानियों की घृणा का शिकार, दीवारों पर लिखे- खालिस्तान जिंदाबाद, किल मोदी: कमिटी बोली- वे खौफ पैदा करना चाहते हैं

कनाडा के वैंकूवर में एक बड़े गुरुद्वारे खालिस्तानी आतंकियों ने हमला कर दिया। उन्होंने रात के अँधेरे में गुरुद्वारे पर भारत विरोधी नारे लिखे। वैंकूवर के ही एक हिन्दू मंदिर पर भी ऐसे ही भड़काऊ नारे लिखे गए। आरोप है कि कुछ दिन पहले इस गुरुद्वारे ने खालिस्तानियों को अपने नगर कीर्तन में शामिल नहीं होने दिया था, इसलिए यह घटना हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वैंकूवर के रॉस स्ट्रीट गुरुद्वारे पर शनिवार (19 अप्रैल, 2025) को सुबह तीन बजे हमला हुआ। इस दौरान एक ट्रक में बैठ कर आए कुछ लोगों ने गुरुद्वारे की दीवाल पर ‘किल मोदी’, ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ समेत बाकी भारत विरोधी नारे लिखे। यह लोग इसके बाद भाग गए।

डराने के लिए किया हमला

सुबह गुरुद्वारे का प्रबन्धन करने वाल खालसा दीवान सोसायटी को इस विषय में पता चला। उसने पुलिस को इस मामले में सूचना दी है। पुलिस अब इस घटना की जाँच कर रही है। खालसा दीवान सोसायटी ने इसे कट्टरपंथियों का काम बताया है।

सोसायटी ने हमले के बाद जारी एक बयान में कहा, “खालिस्तान की वकालत करने वाले सिख अलगाववादियों के एक छोटे समूह ने ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ जैसे विभाजनकारी नारे लिखकर हमारे गुरुद्वारे की पवित्र दीवारों को खराब कर दिया।” सोसायटी ने कहा कि यह घटना ऐसे समय में तब और दुखद है जब वह खालसा सजना दिवस मनाने वाले हैं।

गुरुद्वारे से जुड़े लोगों ने कहा कि खालिस्तानी यह काम इसलिए कर रहे हैं ताकि वह लोगों के दिमाग में डर बैठा सकें और सिखों में विभाजन पैदा कर सकें। बताया गया है कि इस हमले से एक सप्ताह पहले बैसाखी के मौके पर इस गुरुद्वारे ने नगर कीर्तन का आयोजन किया था, इसमें खालिस्तानियों को आने से रोक दिया गया था। यह गुरुद्वारा 1906 में स्थापित किया गया था।

मंदिर पर भी हमला

माना जा रहा है कि इसी के चलते खालिस्तानी भड़के हुए थे। वैंकूवर में सिर्फ गुरुद्वारा ही नहीं बल्कि एक मंदिर पर भी ऐसा ही हमला शनिवार को ही किया गया। मंदिर से जुड़े लोगों ने बताया है कि यह हमले पूर्व नियोजित हो सकते हैं ताकि सिख और हिन्दू आपस में बंट जाएँ।

मामले में पुलिस को भी सूचना दे दी गई है। वैंकूवर पुलिस के प्रवक्ता स्टीव एडिसन ने कहा है कि अभी वह किसी की पहचान इस मामले में नहीं कर पाए हैं। उन्होंने कहा है कि पुलिस इस मामले में जाँच कर रही है और जल्द ही इस विषय में सूचना देगी।

लगातार हो रहे हमले

कनाडा में मंदिर और गुरुद्वारों पर हमले का यह कोई पहला मामला नहीं है। 4 नवम्बर को भी कनाडा के ब्रैम्पटन में हिंदू मंदिर में श्रद्धालुओं पर खालिस्तानी समर्थकों की भीड़ द्वारा हमला किया गया था। इस दौरान, मंदिर में मौजूद श्रद्धालुओं पर लाठी-डंडे बरसाए गए और महिलाओं व बच्चों को भी नहीं बख्शा गया था।

इससे पहले जुलाई 2024 में भी कनाडा के एडमॉन्टन के बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर में तोड़-फोड़ की गई थी। यहाँ के बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर पर सुबह-सुबह भारत विरोधी नारे लिखे गए थे। अगस्त, 2023 कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में खालिस्तानियों द्वारा एक बार फिर हिंदू मंदिर को निशाना बनाया गया था।

सितम्बर, 2023 में कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में दुर्गा मंदिर पर खालिस्तानी हमला हुआ था। कनाडा में इससे पहले रही जस्टिन ट्रूडो की सरकार लगातार खालिस्तानियों को इन हमलों के बाद बचाती आई थी। वर्तमान में भी उनकी ही पार्टी की सरकार है और खालिस्तानियों को प्रश्रय मिला हुआ है, जिससे ऐसी घटनाएँ हो रही हैं।

भारत ने लगातार ऐसे मामलों को कनाडा के सामने उठाया है। हालाँकि, सिख वोटों के लिए पार्टियों के दबाव में पुलिस भी कार्रवाई नहीं करती है।

सवाल- इस्लाम की नजर में मूर्ति पूजा और बच्ची के रेप में से बड़ा गुनाह क्या? जवाब: मूर्ति पूजा… वायरल Video में जो बता रहा कल का हाफिज, मुफ्ती भी वही बताते हैं

सोशल मीडिया पर एक मुस्लिम व्यक्ति की वीडियो वायरल है। इस वीडियो में वह पत्रकार को बता रहा है कि इस्लाम में रेप इतना बड़ा गुनाह नहीं है, जितना बड़ा गुनाह मूर्ति पूजा है। अगर एक शख्स रेप करे तो अल्लाह उसे माफ कर देगा, मगर अगर कोई मूर्ति पूजा करके शिर्क करे तो अल्लाह उसे माफ नहीं करेगा।

इस वीडियो को देखने के बाद सवाल उठने लगे कि ये व्यक्ति किस तरह की तालीम दे रहा है। लोग पूछने लगे कि क्या इस्लाम का सच यही है कि उनके लिए रेप गुनाह नहीं है।

हमने इस मुस्लिम व्यक्ति की ओरिजनल वीडियो खोजी तो पता चला कि वायरल वीडियो में दिख रहे व्यक्ति का नाम एहसान है, और उसका दावा है कि वह ‘हाफिज’ रह चुका है। ‘द राष्ट्रनीति’ के पत्रकार सुमित तिवारी इनसे वक्फ पर राय लेने गए थे। जहाँ बातों-बातों में इन्होंने इस्लाम की आलोचना करते हुए ये टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इस्लामी तालीम के साथ बाकी पढ़ाई भी जरूरी है ताकि सही-गलत पता चले।

वीडियो में 9:00 मिनट से 9:50 तक में सुन सकते हैं कि मुस्लिम व्यक्ति बताता है कि इस्लाम की नजर में एक तरफ अगर रेप हो रहा हो और एक तरफ मूर्ति पूजा हो रही हो तो इस्लाम मूर्ति पूजा को ज्यादा गलत मानता है। आगे मुस्लिम व्यक्ति इसका कारण बताते हुए कहता है कि ऐसा इसलिए होता है कि अल्लाह ने कहा है- “अगर एक तरफ शख्स ने कोई भी गुनाह किया हो और वो माफी माँग ले तो मैं माफ कर दूँगा, लेकिन अगर शिर्क किया हो, जैसे दूसरे को खुदा मानता हो, तो वो ज्यादा बड़ा गुनाह है।”

इस वीडियो में ‘हाफिज’ ने कई और मुद्दों पर भी बात की है। उन्होंने जगह-जगह पर इस्लाम की आलोचना की है। उन्होंने बताया कि उन्हें हमेशा सिखाया गया कि जितने बच्चे हो जाएँ ठीक, लेकिन जब उनके 8 से 6 बच्चे हुए और उन्होंने अपनी बीवी की हालत देखी तो उन्हें पता चला कि बच्चे करने से कुछ नहीं होता, उन्हें पालने की भी व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अलावा उन्होंने वक्फ बोर्ड को लेकर भी कहा कि उन्हें आज तक इससे कोई फायदा नहीं हुआ।

रही बात गुनाह वाले बयान की तो गौरतलब हो कि कुछ दिन पहले ऐसा ही सवाल दारुल उलूम के डायरेक्टर व इस्लामी स्कॉलर डॉक्टर मुफ्ती यासिर नदीम अल वजीदी से भी किया गया था। पूछा गया था कि मूर्ति पूजा ज्यादा बड़ा गुनाह या रेप। इस पर उस मुफ्ती ने बिन दो मिनट भी सोचे ये कहा था कि बलात्कार से बड़ा गुनाह मूर्ति पूजा है। इंसानी नजरिए से रेप बड़ा गुनाह लग सकता है, लेकिन हकीकत में मूर्ति पूजा गुनाह है।

तमंचे वाली ‘जिकरा डॉन’ के इशारे पर चाकुओं से गोद दिया गया था 17 साल का कुणाल, सीलमपुर मर्डर में दिल्ली पुलिस ने 7 को किया गिरफ्तार: हत्या के बाद से दहशत में हैं हिंदू

दिल्ली के सीलमपुर में हिन्दू लड़के कुणाल की हत्या मामले में पुलिस ने 7 लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए जाने वालों में मुख्य आरोपित लेडी डॉन जिकरा भी है। पुलिस को पता चला है कि जिकरा के भाई पर 6 महीने पहले हुए हमले का बदला लेने के लिए कुणाल की हत्या की गई थी। पुलिस अब इन आरोपितों की उम्र का सत्यापन कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस की पूछताछ में जिकरा ने बताया है कि उसके भाई साहिल पर दीवाली के समय हमला हुआ था। जिकरा ने बताया है कि यह हमला कुणाल के 2 दोस्तों ने किया था। उनके नाम शंभू और लाला है। इस हमले के बाद से लाला फरार चल रहा है।

जिकरा से पूछताछ में पुलिस को मालूम हुआ है कि हमले से पहले उसके भाई साहिल ने कुणाल से लाला का पता पूछा था। साहिल को जब कुणाल ने लाला के विषय में नहीं बताया तो उसी की चाकू घोंप कर हत्या कर दी गई। यह भी पता चला है कि इस हत्या की साजिश जिकरा ने खुद ही रची थी और भाइयों को इसके लिए उकसाया था।

वहीं इस मामले की जाँच की कड़ी में पुलिस ने 7 लोगों को पकड़ा है। मुख्य आरोपित जिकरा और साहिल को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। आशंका जताई जा रही है कि गिरफ्तार हुए कुछ लोग अभी नाबालिग हो सकते हैं, इसलिए उनकी आयु का सत्यापन हो रहा है।

दिल्ली पुलिस को जिकरा की रिमांड 19 अप्रैल, 2025 को मिली थी। उसे 2 दिन की रिमांड पर भेजा गया था। अब उसके भाई साहिल को भी रिमांड पर लेकर पूछताछ की जाएगी। यह भी सामने आया है कि जिकरा आर्म्स एक्ट के मामले में जेल भी जा चुकी है। घटना से 15 दिन पूर्व ही वो जेल से बाहर आई थी। 

रील बनाने की शौक़ीन जिकरा सीलमपुर की ही रहने वाली है। अपने साथ तमंचा लेकर चलती रही है। इंस्टाग्राम पर भी उसके 15,000 से अधिक फॉलोवर्स हैं। पुलिस को यह भी पता चला है कि जिकरा एक और गैंगस्टर हाशिम बाबा की बीवी के साथ रहती थी। इस दौरान वह अपना गैंग भी बना रही थी।

गौरलतब है कि 16 अप्रैल, 2025 को घर से बाहर दूध लेने के लिए निकले कुणाल की हत्या चाकुओं से गोद कर दी गई थी। इसके बाद सीलमपुर में काफी विरोध प्रदर्शन भी हुए थे। लोगों ने आरोप लगाया था कि यहाँ हिन्दुओं का जीना मुहाल है। अब इस मामले में जाँच और कार्रवाई चल रही है।

‘हिंदुओं की आबादी 50% से भी कम, अब बचाव के लिए मिले लाइसेंसी हथियार’ : मुर्शिदाबाद में BJP विधायक ने निकाली ‘हिंदू बचाओ’ रैली, गवर्नर भी बोले- ‘यहाँ हालात बर्बर’

मुर्शिदाबाद हिंसा के बाद पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने बंगाली हिंदुओं के लिए एक ‘हिंदू बचाओ’ रैली निकाली। इस दौरान उन्होंने ग्राम रक्षा कमेटी बनाने की माँग की और साथ ही ये भी कहा कि हिंदुओं को उनकी सुरक्षा के लिए लाइसेंसी हथियार दिए जाने चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, “मेरे ख्याल में ग्राम रक्षा समिति का गठन किया जाना चाहिए और उसके बाद आम लोगों को उनकी सुरक्षा के लिए लाइसेंसी हथियार मुहैया कराए जाने चाहिए, क्योंकि वहाँ बांग्लादेश की सीमा है।”

भाजपा नेता ने जोर देकर कहा, “मेरी दूसरी माँग यह है कि चुनाव के दौरान वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए, क्योंकि मुर्शिदाबाद में हिंदुओं की आबादी अब 50 प्रतिशत से कम है।”

उन्होंने हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में रोके जाने को लेकर कहा, “मैं जमीनी हकीकत जानता हूँ। वे केवल विपक्ष के नेता को मुर्शिदाबाद जाने से रोक रहे हैं, जबकि बाकी सभी को अनुमति है। मैंने इसके खिलाफ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। मामले की जल्द ही सुनवाई होगी।”

इस माँग के अलावा अपने ट्वीट में सुवेंदु अधिकारी ने मुर्शिदाबाद के पीड़ितों की व्यथा बताते हुए दो घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कैसे समशेरगंज के धूलियान में गणेश घोष और छाया सिंह के परिवार को निशाना बनाया गया और उनकी जमापूँजी में आग लगा दी गई। किसी ने नया घर बनाने के लिए पैसा इकट्ठा किया था तो किसी ने बेटी की शादी के लिए

सुवेंदु अधिकारी ने बताया कि उन्होंने दोनों परिवार की मदद कर दी है। एक को पाँच लाख और एक को डेढ़ लाख रुपए दे दिए हैं। लेकिन ये सोचने वाली बात है कि ये दोनों परिवार का वक्फ से संबंध नहीं था। इनका अपराध बस ये था कि ये हिंदू हैं।

बता दें कि बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने भी 18 अप्रैल को मुर्शिदाबाद में हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा किया था। हालात देखने के बाद उन्होंने मुर्शिदाबाद के हालातों को ‘अजीब और बर्बर’ बताया।

उन्होंने कहा कि लोगों की सुरक्षा के लिए उन्होंने अपनी माँगे रख दी हैं। जल्द ही रिपर्ट राज्य सरकार और केंद्र सरकार को दी जाएगी। अभी हाल ये है कि लोगों का भरोसा टीएमसी से उठ गया है। चुनाव से पहले हिंसा बंगाल में आम हो गई है। एक समुदाय अपनी ताकत दूसरे पर थोपने की कोशिश कर रहा है।

‘सीमाओं को लाँघ रहा है सुप्रीम कोर्ट, धार्मिक युद्ध भड़काने का जिम्मेदार’: MP निशिकांत दुबे-दिनेश शर्मा के बयान से BJP ने किया किनारा, नड्डा बोले- ये उनके निजी विचार

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा के सुप्रीम कोर्ट को लेकर दिए गए बयान से पार्टी ने किनारा कर लिया है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा है कि दोनों के बयान उनके निजी विचार हैं और इनसे पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है। निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट पर न्यायिक दखल का आरोप लगाया था।

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में लिखा, “भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा का न्यायपालिका एवं देश के चीफ जस्टिस पर दिए गए बयान से भारतीय जनता पार्टी का कोई लेना–देना नहीं है। यह इनका व्यक्तिगत बयान है, लेकिन भाजपा ऐसे बयानों से ना तो कोई इत्तेफाक रखती है और ना ही कभी भी ऐसे बयानों का समर्थन करती है। भाजपा इन बयान को सिरे से खारिज करती है।”

गौरतलब है कि झारखंड के गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने वक्फ कानून और राष्ट्रपति को दिए गए फैसले को लेकर बयान दिया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधते हुए कहा था कि अगर शीर्ष अदालत को ही कानून बनाना है तो संसद और राज्य विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि कोर्ट कैसे राष्ट्रपति को आदेश दे सकता है।

सांसद निशिकांत दुबे ने ANI को दिए बयान में कहा, “देश में धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जा रहा है। अगर हर बात के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना ही पड़े तो संसद और विधानसभाएँ बंद कर देनी चाहिए।”

उन्होंने चीफ जस्टिस संजीव खन्ना पर भी तंज कसा था। उन्होंने कहा था कि चीफ जस्टिस संजीव खन्ना इस देश में गृह युद्ध के लिए जिम्मेदार हैं। उनके साथ ही इस पर उत्तर प्रदेश के पूर्व डिप्टी सीएम और वर्तमान में राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा ने भी कहा था कि संसद को कोई चुनौती नहीं दे सकता, यह बात संविधान में साफ़ लिखी हुई है।

दिनेश शर्मा ने कहा, “लोगों में यह आशंका है कि जब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान लिखा था, तो उसमें विधायिका और न्यायपालिका के अधिकार स्पष्ट रूप से लिखे गए थे… भारत के संविधान के अनुसार, कोई भी लोकसभा और राज्यसभा को निर्देश नहीं दे सकता है और राष्ट्रपति पहले ही इस पर अपनी सहमति दे चुके हैं। कोई भी राष्ट्रपति को चुनौती नहीं दे सकता, क्योंकि राष्ट्रपति सर्वोच्च हैं।”

भाजपा के इन सांसदों के बयान से किनारा करने के बाद भी विपक्ष उस पर हमलावर है। AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने न्यापालिका को धमकी देने का आरोप लगाया है। वहीं AAP ने भी भाजपा सांसदों पर कार्रवाई की माँग की है।

क्यों हो रहा विवाद?

हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल के विधेयकों को रोकने से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए राष्ट्रपति की ‘जेबी वीटो’ से जुड़ी शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी। अदालत ने राष्ट्रपति से कहा था कि वह राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयकों पर तीन माह के भीतर फैसला लें। इस फैसले के कुछ दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून को लेकर कई टिप्पणियाँ की। इसके बाद से ही न्यायपालिका के दखल को लेकर चर्चा चालू हो गई। 

बलात्कारियों से सहानुभूति और रेप पीड़िताओं को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति: भारत की अदालतें खोज रहीं नए-नए तरीके, अपराधियों की जमानत के कई खतरे

न्यायपालिका को हिंसा और दुर्व्यवहार के शिकार लोगों की रक्षा करने का काम सौंपा गया है। हालाँकि, भारतीय अदालतों ने कई मौकों पर यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़ितों को दोषी ठहराकर और अपराधियों को शादी या राखी बाँधने जैसे बेहद बेतुके कारणों से ज़मानत देकर इस भरोसे को तोड़ दिया है। इसके कई मामले सामने आ चुके हैं। इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो आदेश बेहद चिंतनीय हैं।

इसी हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि किसी लड़की का स्तन दबाना, उसके पायजामे का नाड़ा खींचना और लड़की को खींचकर ले जाना रेप का प्रयास नहीं है। उसके बाद नोएडा की एक युवती के साथ रेप के मामले में इस हाई कोर्ट ने कहा था कि पीड़िता ने खुद ही ‘मुसीबत को आमंत्रित किया’। अदालत ने आरोपित को जमानत भी दे दी। मेडिकल रिपोर्ट में युवती के हाइमन फटने की बात थी, लेकिन रेप की नहीं।

दरअसल, नोएडा की एक छात्रा ने सितंबर 2024 में अपने साथ हुए बलात्कार की शिकायत की थी। इस फैसले की हर तरफ आलोचना हुई। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई ने कहा, “इस हाईकोर्ट में क्या हो रहा है? अब उसी हाईकोर्ट के दूसरे जज ऐसी बातें कह रहे हैं। इस तरह की टिप्पणियाँ क्यों की जा रही हैं? ये मामले बहुत संवेदनशील है, इन मामलों में सावधान रहने की जरूरत है।”

हालाँकि, मुसीबत आमंत्रित करने वाली टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार सिंह ने दी थी। इससे पहले जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने कासगंज यौन उत्पीड़न मामले में कहा था कि किसी लड़की के स्तन को पकड़ना, उसके पायजामे के नाड़े को तोड़ना और पुलिया के नीचे खींचना… रेप या रेप के प्रयास का अपराध नहीं है। ऐसी टिप्पणियाँ देश भर की अदालतों से आती रहती हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर विवाद

मार्च 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर मिश्रा की एकल पीठ ने एक नाबालिग के रेप के मामले में फैसला दिया कि उसका स्तन पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खोलना ‘बलात्कार का प्रयास’ नहीं है। हाई कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में बलात्कार के प्रयास का आरोप नहीं बनता, क्योंकि अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होता है कि आरोपितों की कार्रवाई अपराध करने की तैयारी से आगे बढ़ चुकी थी, जो कि साबित नहीं हुआ।

अदालत ने कहा था कि बलात्कार के प्रयास और अपराध की तैयारी के बीच अंतर को सही तरीके से समझना चाहिए। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश को संशोधित करते हुए निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह आरोपितों के खिलाफ धारा 376 (बलात्कार) के बजाय धारा 354-बी (निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन हमला) के तहत नया आदेश जारी करे।

बाद में बवाल हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने इसका संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट के इस फैसले पर संवेदनहीन और घिनौना बताते हुए इस पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अपने आदेश में कहा, “हमें यह कहते हुए कष्ट हो रहा है कि (इलाहाबाद हाई कोर्ट की) विवादित आदेश में की गई कुछ टिप्पणियाँ निर्णय लिखने वाले जज की ओर से संवेदनशीलता की पूर्ण कमी को दर्शाती हैं।”

कल्पना कीजिए कि आरोपित ने पीड़ित एक नाबालिग लड़की को घसीटा, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ा और फिर भी अदालत के लिए यह बलात्कार का प्रयास नहीं माना जाता। प्रवेशात्मक यौन हमला बलात्कार है और जिसे अदालत ने ‘तैयारी’ कहा है उसे बलात्कार का प्रयास माना जाना चाहिए। हालाँकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसे ‘गंभीर यौन हमला’ माना।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने नाबालिग से बलात्कार के आरोपित को दी जमानत

इसी तरह बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी एक फैसला दिया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 17 फरवरी 2025 को 14 वर्षीय लड़की से बलात्कार के आरोपित 24 वर्षीय एक युवक को जमानत दे दी थी। जस्टिस मिलिंद जाधव की पीठ ने कहा था कि पीड़िता ‘स्वेच्छा से’ आरोपित के साथ चार दिन रही और उसे ‘अपने कृत्यों के परिणाम’ की समझ थी।

कोर्ट ने पीड़िता के बयान को आधार बनाया, जिसमें उसने सहमति से संबंध होने की बात कही थी। हालाँकि, कानून कहता है कि18 साल से कम उम्र की सहमति मान्य नहीं होती। कोर्ट ने कहा था कि पॉस्को की धाराएँ गंभीर हैं, लेकिन न्याय के उद्देश्य से जमानत दी जा सकती है। इस फैसले की भी आलोचना हुई, क्योंकि नाबालिग का ब्रेनवॉश या दबाव में बयान देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।  

रेप का आरोपित बेल पर बाहर आने के बाद फिर किया रेप

अक्टूबर 2023 में आसिफ उर्फ ​​छोटे बाबू नामक 22 वर्षीय व्यक्ति ने एक 17 वर्षीय लड़की का अपहरण किया और फिर उसका बलात्कार किया। आरोपित जमानत पर बाहर आने के बाद उसने 5 फरवरी 2025 को उत्तर प्रदेश के भदोही में एक लड़की का फिर से अपहरण किया और उसका रेप किया। इससे पहले वह 8 महीने जेल में रह चुका था।

ठाणे की पॉस्को कोर्ट ने दिया बेल

महाराष्ट्र के ठाणे स्थित पॉक्सो कोर्ट ने अप्रैल 2025 में 15 वर्षीय एक लड़की के अपहरण और उसका यौन शोषण के आरोपित को ज़मानत दे दी थी। जज डीएस देखमुख ने माना था कि पीड़िता और आरोपित के बीच सहमति से प्रेम संबंध बने थे और लड़की इसके परिणामों को समझने के लिए ‘काफी परिपक्व’ थी।

ओडिशा में बलात्कार के आरोपित ने जेल से बाहर आकर पीड़िता की हत्या की

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले में पुलिस ने एक नाबालिग लड़की की हत्या के आरोप में कुनू किशन नामक व्यक्ति को 11 दिसंबर 2024 को गिरफ्तार किया था। आरोपित ने उसी लड़की के साथ बलात्कार के किया था और उस मामले में वह अगस्त 2023 में गिरफ्तार किया गया था। जमानत पर रिहा होने के बाद उसने लड़की पर अपने पक्ष में बयान देने का दबाव डाला।

हालाँकि, लड़की ने उसकी बात मानने से इनकार कर दिया। इसका बदला लेने के लिए आरोपित कुनू किशन ने पीड़िता की हत्या कर दी। इतना ही नहीं, आरोपित ने पीड़िता के शव के टुकड़े करके जिले के अलग-अलग हिस्सों में फेंक दिए। पुलिस का कहना है कि जेल में रहते हुए ही उसने हत्या की योजना बना ली थी।

केरल हाईकोर्ट ने पॉक्सो केस खारिज की

साल 2021 में केरल के एक व्यक्ति पर 17 वर्षीय लड़की के अपहरण और बलात्कार का मामला दर्ज हुआ था। बाद में दोनों ने शादी कर ली और अब उनके दो बच्चे हैं। जुलाई 2024 में केरल हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने आरोपित के खिलाफ दर्ज पॉक्सो के मामले को रद्द कर दिया था।

इसके पीछे तर्क देते हुए जस्टिस बदरुद्दीन ने कहा था कि बलात्कार और पॉस्को मामलों में समझौता कानूनन स्वीकार्य नहीं है, लेकिन इस मामले में मानवीय आधार पर केस खारिज किया गया, ताकि पारिवारिक जीवन और बच्चों की भलाई प्रभावित न हो। इस तरह अदालत बलात्कार की पीड़िता से शादी करना बलात्कारी के अपराध को माफ कर देता है।

बलात्कार के आरोपित ने पीड़िता के पिता और भाई की हत्या की

मार्च 2024 में हरियाणा के 19 वर्षीय मुकुल कुमार नाम के रेप के आरोपित ने 14 वर्षीय बलात्कार पीड़िता के रेलकर्मी पिता और 8 वर्षीय भाई की धारदार हथियार से हत्या कर दी। इन हत्याओं के बाद पीड़िता ने पिता के फोन से अपने दादा को वॉयस मैसेज भेजकर घटना की जानकारी दी। आरोपित पीड़िता का पड़ोसी था और उस पर पहले से बलात्कार का आरोप था।

बेल के लिए MP हाईकोर्ट ने आरोपित को पीड़िता से ‘राखी’ बँधवाई

जुलाई 2020 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न के आरोपित को जमानत देने की शर्त पर पीड़िता से राखी बँधवाने का आदेश दिया। इस फैसले ने न्याय की मर्यादा तोड़ते हुए आरोपित को ‘भाई’ के रूप में पेश किया और यौन हमले को महत्वहीन बना दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2021 में इस फैसले पर रोक लगाते हुए इसे ‘अपमानजनक’ बताया था।

‘क्या आप पीड़िता से शादी करेंगे?‘: रेप के आरोपित से सुप्रीम कोर्ट का सवाल

मार्च 2021 में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) एसए बोबडे की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट बेंच ने बलात्कार के आरोपित एक सरकारी कर्मचारी से पूछा था, “क्या आप पीड़िता से शादी करेंगे?” पीड़िता आरोपित की रिश्तेदार थी और जब वह नाबालिग थी, तब आरोपित ने उसका बलात्कार किया था। बेंच बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा आरोपित को अग्रिम जमानत दिए जाने के खिलाफ़ याचिका पर सुनवाई की थी।

तब तत्कालीन CJI ने पूछा था, “क्या आप उससे (पीड़िता से) शादी करेंगे? हम आपको शादी करने के लिए मजबूर नहीं कर रहे हैं। अगर आप करेंगे तो हमें बताएँ। अन्यथा, आप कहेंगे कि हम आपको उससे शादी करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।” इस टिप्पणी पर देशभर में भारी विरोध हुआ था। इसके बाद CJI बोबडे ने सफाई दी थी कि उनकी पूछताछ न्यायिक रिकॉर्ड पर आधारित थी।

जस्टिस बोबड़े ने कहा था कि आरोपित ने यह वचन दिया था कि वह नाबालिग लड़की (पीड़िता) के 18 वर्ष की हो जाने के बाद उससे विवाह करेगा। आरोपित ने बताया था कि वह पीड़िता से शादी करना चाहता था, लेकिन पीड़िता ने इनकार कर दिया था। इसके बाद उसने कहीं और विवाह कर लिया। इसके बाद शीर्ष अदालत ने आरोपित को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दे दी थी।

कर्नाटक हाईकोर्ट का विवादित फैसला: ‘पीड़िता का व्यवहार आदर्श नहीं’

जुलाई 2020 में राकेश बी बनाम कर्नाटक राज्य मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपित  को जमानत दे दी। जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित ने पीड़िता की गवाही पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसका व्यवहार एक “आदर्श” बलात्कार पीड़िता जैसा नहीं था। कोर्ट ने पूछा कि पीड़िता रात 11 बजे आरोपित से मिलने क्यों गई, शराब पीने पर आपत्ति क्यों नहीं जताई, और उसे सुबह तक क्यों रुकने दिया।

कर्नाटक हाई कोर्ट के जज ने कहा कि उसका यह कहना कि वह थक गई थी और सो गई, “भारतीय महिला के लिए अनुचित” है। इस फैसले ने पीड़ितों से ‘भावनात्मक रूप से आदर्श’ प्रतिक्रिया की अपेक्षा और उनके आचरण पर न्याय को टालने की मानसिकता को उजागर किया।

कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायाधीश ने पीड़िता पर की थी टिप्पणी

जुलाई 2020 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महिला के साथ बलात्कार के आरोपित व्यक्ति राकेश बी. को जमानत दे दी थी। न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित ने पीड़िता की गवाही को ‘विश्वास करने में थोड़ा मुश्किल’ माना था कहा था कि पीड़िता का व्यवहार किसी भी तरह से एक अनिच्छुक, भयभीत और पीड़ित के व्यवहार के जैसा नहीं था।

जज ने पीड़िता से यह भी पूछा कि वह रात 11 बजे अपने अधिकारी से क्यों मिलने गई और उसने आरोपित के साथ शराब पीने पर आपत्ति क्यों नहीं जताई। इसके अलावा, कोर्ट ने पीड़िता से यह भी पूछा कि उसने आरोपित को सुबह तक अपने साथ क्यों रहने दिया।

जज ने पूछा, “उसने (पीड़िता ने) स्पष्टीकरण दिया था कि वह इस कृत्य के बाद थक गई थी और सो गई थी। यह एक भारतीय महिला के लिए अनुचित है… यह उस तरह नहीं है जिस तरह से हमारी महिलाएँ बलात्कार के बाद प्रतिक्रिया करती हैं।”

दरअसल, न्यायालय ने सुझाव दिया कि बलात्कार पीड़ितों को विश्वसनीय दिखने के लिए भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के अनुरूप होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो उन पर ‘विश्वास करना कठिन’ है और आरोपित को उसके साथ रहने या शराब पीने की अनुमति देने के लिए पीड़िता को दोषी ठहराना उचित है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर महिलाएँ देर रात तक पुरुषों को अपने आसपास रहने देती हैं तो यह बलात्कार का जोखिम उठाने जैसा है।

निष्कर्ष

न्यायपालिका के बयान और उनके द्वारा की गई विवादित टिप्पणियाँ उन पर सवाल खड़े करती हैं। उदाहरण के तौर पर ‘पर्याप्त परिपक्व’ जैसी टिप्पणियाँ और बलात्कारियों को पीड़ितों से शादी की अनुमति देना नाबालिगों को खतरे में डालता है। अदालतें जब ‘प्रेम संबंध’ का हवाला देकर फैसले सुनाती हैं या बलात्कारियों को जमानत देती हैं तो न केवल असंवेदनशीलता दिखाती हैं बल्कि पीड़ितों की सुरक्षा को भी खतरे में डालती हैं।

जमानत पर छूटे अपराधियों द्वारा दोबारा बलात्कार और हत्या जैसे मामले पीड़ितों में डर और अविश्वास पैदा करते हैं। इससे पता चलता है कि न्यायपालिका अक्सर अभियुक्तों के ‘पुनर्वास’ या महिलाओं के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रहों (नकारात्मक सोच) को न्याय से ऊपर रखती हैं, जिससे यौन हिंसा के मामलों में सजा की जगह दंड से मुक्ति की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है।

न्यायपालिका जब पीड़ितों को उनके मित्रों से मिलने या ‘पर्याप्त’ प्रतिरोध नहीं करने के लिए दोषी ठहराती हैं तो स्थिति और भी खराब हो जाती है। इस तरह अदालतें अपराधियों की जवाबदेही को कम करके न्याय प्रणाली पर भरोसे को कम करती हैं। साल 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म निर्देशक महमूद फारूकी को संदेह का लाभ देकर बरी करते हुए कहा था कि ‘कमज़ोर ‘ना’ भी ‘हाँ’ हो सकती है’।

कोर्ट ने कहा था, “महिलाओं के व्यवहार के उदाहरण अज्ञात नहीं हैं कि एक कमज़ोर ‘नहीं’ का मतलब ‘हाँ’ हो सकता है।” दरअसल, अदालतें बलात्कार पीड़ितों से कमज़ोर दिखना, विनम्र होना, दुर्व्यवहार का ‘काफी मजबूती से’ विरोध करना जैसे व्यवहार या इससे भी ज्यादा की उम्मीद करती हैं। अगर ऐसा नहीं होता है तो ‘मुसीबत को आमंत्रित किया’ जैसी टिप्पणियाँ की जाती हैं।

अदालतें जब पीड़िता को ही ‘आदर्श पीड़िता’ साबित करने की कोशिश करती हैं तो उनके लिए न्याय पाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि इससे न्याय की गंभीरता कम हो जाती है। इसका परिणाम ये होता है कि आरोपित को जमानत मिल जाती है और फिर वे बाहर आकर कभी पीड़ित एवं उसके परिवार की हत्या कर देते हैं तो कभी फिर से अपराध को अंजाम देते हैं।

POCSO के मामलों में, जहाँ पीड़ित नाबालिग होती हैं, ज़मानत देने में नरमी और भी गंभीर हो जाती है। ऐसे मामलों में कानून मानता है कि आरोपित तब तक दोषी है, जब तक कि वह अन्यथा साबित न हो जाए। इसके बावजूद अदालतों ने कई मामलों में अवास्तविक सबूत या पीड़िता के प्रतिरोध के सबूतों की माँग की है। इससे बलात्कारी हतोत्साहित नहीं होंगे।

भारतीय न्यायिक प्रणाली में एक समस्या है और यह समस्या पुरुष वर्चस्व की हो सकती है। केवल 14% उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और कुल केवल 9.3% न्यायाधीश महिलाएँ हैं। दरअसल, पितृसत्तात्मक सोच पितृसत्तात्मक परिणामों को जन्म देती है। इस सोच से न्यायिक व्यवस्था भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती है।

साल 2021 में अपर्णा भट बनाम मध्य प्रदेश राज्य केस में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के दौरान पीड़िता के पहनावे, व्यवहार या नैतिकता पर टिप्पणी करने से मना किया और संवेदनशील रवैया अपनाने की बात कही थी। हालाँकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट सहित कई हालिया फैसले दिखाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की ये गाइडलाइंस आज तक प्रभावी नहीं हो पाई हैं। इसलिए न्यायाधीशों की संवेदनशीलता का प्रशिक्षण अनिवार्य होना चाहिए।

सबसे अहम बात यह है कि पीड़िता को दोषी ठहराने की मानसिकता समाप्त होनी चाहिए और अदालतों को निर्णय केवल तथ्यों और सबूतों के आधार पर देना चाहिए, न कि पीड़िता के चरित्र पर। जब तक न्यायपालिका में गंभीर सुधार नहीं होते, तब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट जैसे अपमानजनक आदेश सामने आते रहेंगे। महिलाओं को निर्णय नहीं, न्याय मिलना चाहिए।

(इस रिपोर्ट को श्रद्धा पांडेय ने मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा है। पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक करें)

‘इस बर्बर घटना से हम व्यथित, खुलेआम घूम रहे अपराधी’: भारत ने हिंदू नेता की हत्या पर बांग्लादेश को फटकारा, कहा – ये चिंताजनक पैटर्न का हिस्सा

बांग्लादेश के दिनाजपुर जिले के बसुदेवपुर गाँव में गुरुवार (17 अप्रैल 2025) को हिंदू समुदाय के नेता भावेश चंद्र रॉय की हत्या कर दी गई। पुलिस ने बताया कि 58 साल के भाबेश का अपहरण कुछ बाइक सवारों ने उनके घर से किया था। उसके बाद उनका शव बरामद हुआ।

इस पूरे मामले पर भारत के विदेश मंत्रालय ने युनुस सरकार को जमकर लताड़ा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर लिखा, “बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक नेता भाबेश चंद्र रॉय के अपहरण और नृशंस हत्या की खबर ने हमें बेहद व्यथित किया है। यह घटना एक बड़े और चिंताजनक पैटर्न का हिस्सा है, जहाँ अंतरिम सरकार (मोहम्मद यूनुस) के शासनकाल में हिंदू अल्पसंख्यकों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है, और पहले की ऐसी घटनाओं के अपराधी अब भी खुलेआम घूम रहे हैं। हम इस बर्बर घटना की कड़ी निंदा करते हैं और एक बार फिर अंतरिम सरकार को याद दिलाते हैं कि वह हर अल्पसंख्यक, विशेषकर हिंदुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी से मुँह न मोड़े और बहानेबाज़ी या भेदभाव करना बंद करे।”

बांग्लादेश की ओर से पश्चिम बंगाल में हुई चुनावी हिंसा पर टिप्पणी की गई थी। केंद्रीय विदेश मंत्रालय ने इसके जवाब में कहा कि ढाका सदाचार का पाठ पढ़ाने की बजाए अपने देश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए।

हत्या से पहले के 30 मिनट

भावेश चंद्र रॉय ‘बांग्लादेश पूजा उडजापान (उपासना) परिषद’ की बिराल इकाई के उपाध्यक्ष और क्षेत्र में हिंदू समुदाय के नेता थे। भावेश की पत्नी शांतना का कहना है कि किडनैपिंग से पहले एक कॉल आई थी।

इसके 30 मिनट बाद चार लोग मोटरसाइकल पर आए और भाबेश को अगवा कर लिया गया। वह लोग उनको नाराबारी गाँव ले गए, जहाँ उनके साथ बेरहमी से मारपीट हुई। जब उन्हें वापस भेजा गया तो वह अचेत अवस्था में थे। अस्पताल तक पहुँचने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

इस घटना पर बिरला पुलिस थाने के प्रभारी अब्दुस सबूर ने बताया कि केस दर्ज करने की तैयारी अभी चल रही है। संदिग्धों का कुछ पता नहीं चल पाया है।

अंगुली, अंगूठा और प्राइवेट पार्ट… जानिए क्या होता है ‘डिजिटल बलात्कार’ : गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती फ्लाइट अटेंडेट हुई शिकार, हॉस्पिटल का कर्मचारी गिरफ्तार

गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में एयरलाइन कर्मचारी का यौन उत्पीड़न करने वाला आरोपित गिरफ्तार हो गया है। वह इसी अस्पताल का कर्मचारी था। उसकी पहचान दीपक कुमार के तौर पर हुई है। वह ICU में तैनात था। उस पर अब ‘डिजिटल रेप’ का आरोप लगा है। डिजिटल रेप सामान्य रेप से अलग आरोप माना जाता है।

आरोपित दीपक कुमार को शुक्रवार (18 अप्रैल, 2025) को गिरफ्तार किया गया था। उसे गुरुग्राम पुलिस ने कई CCTV और बाकी चीजों की जाँच करने के बाद पकड़ा है। दीपक कुमार बिहार के मुजफ्फरपुर का रहने वाला है और उसने पाँच महीने पहले ही मेदांता अस्पताल में नौकरी चालू की थी। अब वह डिजिटल रेप के आरोप में गिरफ्तार हुआ है।

क्या होता है डिजिटल रेप?

आमतौर पर जब किसी शब्द के आगे डिजिटल लग जाता है, तो हम समझते हैं कि यह मामला तकनीक से जुड़ा होगा। तकनीक से ही जुड़े होने के साथ हम इसे विशेष तौर पर इंटरनेट से जुड़ा समझते हों। डिजिटल लेनदेन हो या डिजिटल मीटिंग, इसके ऐसे उदाहरण हैं। लेकिन यहाँ मामला थोड़ा अलग है।

डिजिटल रेप का तकनीक से कोई भी लेना-देना नहीं है। दरअसल, डिजिटल रेप यौन उत्पीड़न के एक प्रकार को कहते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी महिला के गुप्तांगों में बिना सहमति के उंगली या अँगूठे आदि का प्रवेश करवाता है तो इस डिजिटल रेप की संज्ञा दी जाती है।

डिजिटल रेप शब्द में ‘डिजिटल’ का उपयोग उँगलियों या अँगूठे के उपयोग के लिए किया जाता है। दरअसल, यह शब्द अंग्रेजी के शब्द ‘डिजिट’ से आया है, जहाँ इसका अर्थ संख्या होता है। डिजिटल रेप को भारत में रेप का ही एक प्रकार माना जाता है, भले ही इसमें पुरुष के गुप्तांग का उपयोग ना हुआ हो।

क्या है डिजिटल रेप की भारत में सजा?

डिजिटल रेप को पहले भारतीय कानूनों में छेड़छाड़ की श्रेणी में रखा जाता था। इन्हें रेप का दर्जा नहीं दिया जाता था। हालाँकि, 2012 के बाद से कानूनों में बड़े बदलाव किए गए हैं। कानून के अनुसार, कोई व्यक्ति अगर किसी महिला की मर्जी के बगैर उसके गुप्तांग या फिर मुंह में तक किसी भी तरह की चीज का प्रवेश उसकी सहमति के बिना करवाता है, तो यह रेप ही माना जाएगा।

अब अगर कोई व्यक्ति डिजिटल रेप का दोषी पाया जाता है तो उस 5 साल तक की सजा जा हो सकती है। यह सजा कुछ मामलों में बढ़ भी सकती है। यह सजा के प्रावधान IPC के अलावा बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाए गए कानून POCSO के उल्लंघन पर भी होती है।

‘डिजिटल रेप’ जैसे अपराधों को लेकर अब कोर्ट भी कड़ा रवैया अपनाते हैं। फरवरी, 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने एक व्यक्ति को 2 वर्ष की एक मासूम से डिजिटल रेप करने के दोषी को 25 वर्ष की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने कहा था कि भले ही दोषी व्यक्ति ने पीड़ित के गुप्तांगो को लेकर कोई अपराध नहीं किया। कोर्ट ने ₹13.5 लाख का मुआवजा पीड़ित को दिया था।

गुरुग्राम का मामला डिजिटल रेप क्यों?

गुरुग्राम के अस्पताल में रेप का आरोप लगाने वाली एयरलाइन कर्मचारी ने बताया था कि उसके साथ ICU में यह हरकत हुई थी। पीड़िता ने पुलिस को बताया था कि ICU में भर्ती होने के दौरान वह कुछ देख नहीं पा रही थी लेकिन अवचेतन अवस्था में होने के चलते सब कुछ सुन रही थी।

पीड़िता ने बताया कि आरोपित ने पहले ICU में आकर वहाँ रखे सामान के विषय में जानकारी ली। पीड़िता के अनुसार, उसे यह जानकारियाँ वहाँ पर मौजूद 2 नर्स दे रही थीं। आरोपित ने इसके बाद पीड़िता के कमर पर लगाए गए बैंड का नाप पूछा। लेकिन कुछ देर बाद वह स्वयं ही नाप लेने के लिए आ गया।

पीड़िता ने बताया कि इसके बाद आरोपित ने चादर के नीचे से हाथ डाला और उसका यौन उत्पीड़न किया। चूंकि, आरोपित ने हाथ का से यह अपराध अंजाम दिया, इसलिए इसे डिजिटल रेप की श्रेणी में रखा गया है। यह पूरी घटना 6 अप्रैल, 2025 को हुई। पीड़िता ने स्वस्थ होने के बाद यह बात अपने पति और पुलिस को बताई। पुलिस ने इसके बाद दीपक कुमार को पकड़ा।

‘युसूफ पठान बाहरी, वोटर्स के साथ खेल रहे खेल’ : मुर्शिदाबाद हिंसा के बाद TMC सांसद का रवैया देख पार्टी नेताओं ने ही लताड़ा, कहा- तौर-तरीके नहीं बदले तो नहीं मिलने देंगे टिकट

पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद 11-12 अप्रैल को एक तरफ जब हिंसा की आग में जल रहा था, तब दूसरी तरफ इस जिले की बहरामपुर सीट से तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद युसूफ पठान चाय की चुस्की लेते हुए सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड कर रहे थे। उनकी इस हरकत की वजह से नेटीजन्स ने उनकी खूब आलोचना की थी, मगर अब खबर है कि उनकी खुद की पार्टी के सदस्य भी उन्हें इस हरकत के लिए लताड़ रहे हैं।

फोटो साभार: इंस्टाग्राम

जानकारी के मुताबिक, मुर्शिदाबाद में हिंसा के बाद जब तृणमूल कॉन्ग्रेस पर सवाल उठने शुरू हुए तो पार्टी नेताओं ने प्रभावित इलाकों में शांति बैठकें करने का प्रयास किया। सांसद अबू ताहिर खान और खलीलपुर रहमान समेत स्थानीय पार्टी नेता इसमें शामिल थे, मगर युसूफ पठान इन बैठकों से गायब थे। न उन्होंने हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा किया, न ही इस पर कोई बात रखी। उनके इस अनुचित व्यवहार को देख साथी पार्टी नेता उखड़ गए। उन्होंने युसूफ पठान को ‘बाहरी’ तक करार दिया।

युसूफ पठान ‘बाहरी’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सांसद अबू ताहिर खान ने कहा, “वह (यूसुफ पठान) बाहरी व्यक्ति हैं और राजनीति में नए हैं। उन्होंने अब तक इससे दूर रहना ही बेहतर समझा। लेकिन इससे लोगों में गलत संदेश जाता है। हमारे सांसद, विधायक और यहाँ तक ​​कि बूथ कार्यकर्ता भी लोगों से संपर्क कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “समसेरगंज में शांति बैठक थी। मैं वहाँ पहुँचने के लिए 100 किलोमीटर की यात्रा की। खलीलुर रहमान के साथ-साथ कई टीएमसी विधायक भी वहाँ मौजूद थे। लेकिन वह (यूसुफ पठान) अनुपस्थित थे। कोई यह नहीं कह सकता कि यह मेरा क्षेत्र नहीं है और यह मेरे लोग नहीं हैं और इसलिए मैं नहीं जाऊँगा।”

‘यही हालात रहे तो नहीं मिलने देंगे अगली बार टिकट’

वहीं भरतपुर से टीएमसी विधायक हुमायूँ कबीर ने युसूफ पठान को घेरते हुए कहा कि युसूफ ने मतदाताओं के साथ खेल खेला है। कबीर बोले, “वह गुजरात में रहने वाले एक प्रसिद्ध क्रिकेटर हैं। उन्होंने (कॉन्ग्रेस नेता) अधीर रंजन चौधरी को लोकसभा चुनाव में लोगों के वोटों से हराया था। यह सज्जन अब मतदाताओं के साथ खेल खेल रहे हैं। वह अपनी मर्जी से काम कर रहे हैं।

उन्होंने ये भी कहा कि अगर पठान ने अपने तौर-तरीके नहीं बदले तो वह पार्टी हाईकमान से अगले चुनाव में उन्हें टिकट देने के लिए कहेंगे। कबीर ने चेतावनी देते हुए कहा, “यूसुफ पठान को सांसद बने हुए लगभग एक साल हो गया है। अगर वह अपना व्यवहार नहीं बदलते और लोगों तक पहुँचने की कोशिश नहीं करते तो मैं उनके खिलाफ पार्टी के शीर्ष नेताओं से संपर्क करूँगा। मैं यह सुनिश्चित करने की कोशिश करूँगा कि अगली बार उन्हें पार्टी का टिकट न मिले।”

TMC सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने साझा की लंच की तस्वीर

गौरतलब है कि पिछले दिनों वक्फ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद बंगाल में कट्टरपंथी तत्वों ने जमकर उपद्रव मचाया था। इस दौरान हिंदुओं के घरों, दुकानों को निशाना बनाया गया था। उस समय युसूफ पठान ने इंस्टा पर फोटो डाली थी जिसमें उन्होंने चाय और शांत माहौल की तारीफ की थी।

फोटो साभार: इंस्टाग्राम

इसी हरकत पर सब उनपर भड़के हैं, मगर मालूम हो कि युसूफ पठान अकेले टीएमसी सांसद नहीं है जिन्होंने इस मामले में असंवेदनशीलता दिखाई हो। टीएमसी के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने भी 13 अप्रैल को अपने भोजन की तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली थी और लोगों से पूछा था- “पालोंग साग (पालक)। टेंगरा माछ (कैटफ़िश) झाल। रविवार के लंच में आप क्या खा रहे हैं?”

डेरेक ओ ब्रायन के इस पोस्ट के बाद तमाम लोगों ने उनसे मुर्शिदाबाद हिंसा पर चुप रहने की वजह पूछी और उनकी हरकत की आलोचना की।