चीन पर लगातार आरोप लग रहे हैं कि वह कोरोना वायरस को लेकर सच छिपा रहा है और उसने दुनिया को गुमराह किया है। यहाँ तक कि उसने अपने उन नागरिकों को भी नहीं बख्शा, जिसने चीन के झूठ के खिलाफ आवाज बुलंद करने की कोशिश की। एक नए दस्तावेज में खुलासा हुआ है कि वुहान में कोरोना वायरस पर रिपोर्टिंग करने वाली एक महिला पत्रकार को चीन ने पाँच साल के लिए जेल भेज दिया है।
37 साल की झांग झान (Zhang Zhan) को बीते मई महीने में गिरफ्तार किया गया था। वह तभी से जेल में हैं। उन पर आरोप हैं कि उन्होंने झगड़ा करने की कोशिश की और प्रशासन के लिए मुश्किलें खड़ी कीं। चीन हमेशा सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ इन्हीं आरोपों का इस्तेमाल करता रहा है और इससे संबंधित धाराओं में उन्हें जेल भेजता रहा है।
चीनी मानवाधिकार रक्षकों (CHRD) के अनुसार, वह 14 मई को लापता हो गई और एक दिन बाद पता चला कि उसे शंघाई में पुलिस ने हिरासत में लिया था। उन्हें 19 जून को शंघाई में औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया था और तीन महीने की नजरबंदी के बाद उन्हें अपने वकील से मिलने की अनुमति दी गई थी। सोमवार (नवंबर 17, 2020) को जारी अभियोग पत्र में कहा गया है कि झांग झान ने टेक्स्ट वीडियो और अन्य मीडिया जैसे वीचैट, ट्विटर और यूट्यूब के माध्यम से गलत जानकारी फैलाई थी।
उन पर ये भी आरोप है कि उन्होंने विदेशी मीडिया को इंटरव्यू दिया और वुहान की खबरें लीक कीं। चाइनीज ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स (CHRD) के मुताबिक गिरफ्तारी के खिलाफ उन्होंने भूख हड़ताल भी की। 18 सितंबर को उनके वकील का फोन आया कि उन पर आरोप तय किए गए हैं।
झांग झान को पहले दो मौकों पर हिरासत में लिया गया था
झांग झान को 2018 में इसी तरह के आरोप में हिरासत में लिया गया था। सितंबर 2019 में उसे शंघाई पुलिस ने बुलाया था और बाद में हांगकांग का समर्थन करने के लिए “झगड़ा करने” के संदेह में आपराधिक हिरासत में लिया गया था और फिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। नवंबर 2019 में रिहा होने से पहले उन्हें दो बार मानसिक चिकित्सा संबंधी परीक्षण से गुजरना पड़ा।
अन्य पत्रकार जिन्हें हिरासत में लिया गया था
ऐसा नहीं है कि झांग झान कोरोना वायरस पर रिपोर्टिंग करने के लिए गिरफ्तार होने वाली पहली पत्रकार हैं, इस साल कई अन्य पत्रकारों को भी गिरफ्तार किया गया है। एक पूर्व वकील से पत्रकार बने चेन क्विशी को जनवरी में गिरफ्तार किया गया था। क्विश के लापता होने की रिपोर्ट देने के लिए ली ज़हुआ को फरवरी में वुहान जाने के बाद गिरफ्तार किया गया था। उन्हें अप्रैल में रिहा किया गया। वुहान निवासी फांग बिन उसी समय के आसपास लापता हो गए, लेकिन उनके बारे में कभी कुछ जानकारी सामने नहीं आई।
यूपी पुलिस की ATS ने दो संदिग्ध बांग्लादेशी आतंकियों को सहारनपुर से गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार संदिग्ध आतंकियों के नाम इकबाल और फारुख हैं। पुलिस ने दोनों आरोपितों के पास से फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड समेत तमाम अन्य दस्तावेज बरामद किए है। दोनों आरोपितों को एटीएस ने कोर्ट में पेश किया। जहाँ से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।
UP ATS has arrested two Bangladesh nationals for staying illegally. Fake Aadhaar card, voter card and driving licence recovered from them
यूपी एटीएस के एडीजी डीके ठाकुर (ADG DK Thakur) ने बताया कि सहरानपुर की कमेला कॉलोनी से चटगाँव बांग्लादेश के रहने वाले दो सगे भाइयों मोहम्मद इकबाल और मोहम्मद फारुख को एटीएस ने गिरफ्तार किया है। ये दोनों अवैध रूप से सहारनपुर में रह रहे थे। इसके साथ दोनों आरोपितों ने सहारनपुर के एड्रेस पर पासपोर्ट, आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पासबुक, जाति और आय प्रमाणपत्र भी बनवा लिए थे।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों के मोबाइल फोन में कई विदेशी संदिग्धों के नंबर एक्टिवेट मिले हैं। अधिक जानकारी देते हुए यूपी एटीएस के एडीजी डीके ठाकुर ने यह भी बताया कि मोहम्मद इकबाल और मोहम्मद फारुख मोबाइल फोन के जरिए बांग्लादेश, अमेरिका, सऊदी अरब, इटली, ब्रिटेन, ऑस्ट्रिया, म्यांमार के लोगों के संपर्क में थे। साथ ही उन्होंने बताया कि पुलिस फोन से मिले विदेशियों के नंबरों पर हुई बातचीत का ब्यौरा जुटाने में लगी है और इनके सहरानपुर में रहने के मकसद पर पूछताछ की जा रही है।
पहले भी फर्जी दस्तावेज के मामले में दोनों भाई 2 साल की जेल काट चुके हैं। जेल से बाहर आने के बाद दोनों अपने वतन लौटने के बजाए भारत में एक्टिव थे और यूपी के सहारनपुर में रह रहे थे।
एटीएस एडीजी के मुताबिक, दोनों आरोपित साल 2013 में अवैध रूप से भारत में रहने के आरोप में पश्चिम बंगाल में गिरफ्तार किए गए थे और लगभग दो साल जेल में रहे हैं। जेल से रिहा होने के बाद इन दोनों को बांग्लादेश के लिए निर्वासित कर दिया गया था। इसके बाद दोनों साल 2015 में दोबारा अवैध रूप से सीमा पार कर भारत आ गए और दलालों के माध्यम से सहारनपुर के पते पर फर्जी वोटर आईडी, आधार कार्ड और पासपोर्ट बनवा लिया।
रिपोर्ट के अनुसार पुलिस को आशंका है कि इकबाल और फारुख दिल्ली में गिरफ्तार आतंकियों के संपर्क में थे। दरअसल, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने सोमवार रात जम्मू-कश्मीर के बारामूला और कुपवाड़ा के रहने वाले आतंकी अब्दुल लतीफ मीर और अशरफ खटाना को गिरफ्तार किया था। जिनके पास से पुलिस ने दो सेमी ऑटोमैटिक पिस्टल और 10 जिंदा कारतूस जब्त किए थे।
वहीं जाँच पड़ताल में आतंकियों के कनेक्शन पाकिस्तान से भी पाए गए थे। रिपार्ट के अनुसार पकड़े गए आतंकी दिल्ली में किसी बड़े हमले के मिशन पर थे। वहीं तफ्तीश में यह भी पता चला था कि कोरोनाकाल में ये दोनों उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित देवबंद गए थे। देवबंद कनेक्शन मिलने के बाद ही ATS सक्रिय हुई थी।
लॉकडाउन प्रतिबंधों में ढील के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था उम्मीद से अधिक तेजी से रिकवर कर रही है। अब रेटिंग एजेंसियाँ भी भारत की जीडीपी ग्रोथ के लिए अपने अनुमान को बढ़ा रही हैं। मूडीज के बाद ग्लोबल रिसर्च फर्म और रेटिंग एजेंसी गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने भी वित्त वर्ष 2021 के लिए भारत की जीडीपी के अनुमान में सुधार किया है। गोल्डमैन सैक्स ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए भारत की जीडीपी के अनुमान को -10.3 कर दिया है।
गौर करने वाली बात यह है कि गोल्डमैन सैक्स सितंबर महीने में भारतीय अर्थव्यवस्था में -14.8 फीसदी गिरावट का अनुमान किया था, लेकिन अब इसमें 4.5 फीसदी के सुधार के संकेत दिए हैं। बड़ी बात यह है कि एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट अगले वित्त वर्ष 2021-22 में जीडीपी में 13 फीसदी सुधार आने का अनुमान किया है।
एजेंसी के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज रिकवरी के संकेत दिखने लगे हैं। अक्टूबर माह में जहाँ परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स(PMI) ग्रोथ के मामले में 13 साल के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए 58 अंक तक पहुँच गया है। वहीं, पिछले 6 महीने में पहली बार सितंबर में इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन इंडेक्स (IIP) में 0.2 फीसदी के तेजी देखने को मिली है। मूडीज के बाद अब ग्लोबल रिसर्च फर्म और रेटिंग एजेंसी गोल्डमैन सैक्स ने भी वित्त वर्ष 2021 के लिए भारत के जीडीपी पूर्वानुमान में सुधार किया है।
अमेरिकी ब्रोकरेज फर्म गोल्डमैन सैक्स ने प्रभावी वैक्सीन की घोषणा के चलते अनुमान में सुधार किया है, जो प्रभावी नीतियों और गतिशीलता प्रदान कर सकता है। हालाँकि, इससे पहले सितंबर में गोल्डमैन सैक्स ने कहा था कि अगले वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी में 10.9 फीसदी का सुधार आएगा। रेटिंग एजेंसी गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि अगले वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेजी से ग्रोथ करेगी, लेकिन पिछले वित्त वर्ष के मुकाबल वित्त वर्ष 2021 में भारतीय अर्थव्यवस्था में -10.3 की गिरावट देखने को मिलेगी।
हाल ही में 12 नवंबर को रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत के लिए वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान आर्थिक गतिविधियों में आने वाली कमी के अनुमान को संशोधित किया है। मूडीज ने अब भारतीय अर्थव्यवस्था में 8.9 फीसदी गिरावट आने का अनुमान जताया है, जबकि पहले उसने 9.6 फीसदी गिरावट आने का अनुमान लगाया था।
भारतीय रिजर्व बैंक के नए अध्ययन के अनुसार, यदि अर्थव्यवस्था में सुधार की वर्तमान गति बरकरार रही तो भारतीय अर्थव्यवस्था वित्तीय वर्ष 2020-21 की तीसरी तिमाही यानी अक्टूबर से दिसंबर में ही गिरावट के दौर से बाहर आ जाएगी और फिर विकास दर बढ़ने लगेगी।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि मार्च से अक्टूबर 2020 तक सरकार द्वारा आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत दी गई विभिन्न राहतों से तेजी से गिरती हुई अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिला है। साथ ही सरकार की ओर से जून 2020 के बाद अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे खोलने की रणनीति के साथ राजकोषीय और नीतिगत कदमों का अर्थव्यवस्था पर अनुकूल असर पड़ा है। यद्यपि अभी देश महामारी से उबरा नहीं है, लेकिन अर्थव्यवस्था ने तेजी हासिल करने की क्षमता दिखाई है।
दिल्ली में कोरोना संक्रमण का कहर लगातार बढ़ रहा है। जिसको लेकर एक तरफ जहाँ केजरीवाल सरकार के स्वास्थ्य मंत्री दिल्ली में दोबारा से लॉकडाउन लगाने से इनकार कर रहे थे वहीं आम आदमी पार्टी प्रमुख और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल लॉकडाउन फिर से लगाने की तैयारी में लगे है। सीएम और स्वास्थ्य मंत्री के दोहरे बयान ने दिल्ली जनता को उलझा कर रख दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, सीएम ने तेजी से फैलते संक्रमण को देखते हुए मंगलवार (17 अक्टूबर, 2020) को कहा, अगर भीड़भाड़ कम नहीं हुई तो बाजार बंद करने की अनुमति के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाएगा। CM ने कहा कि दरअसल दिल्ली में मामले बढ़ रहे हैं ऐसे में हम केंद्र सरकार को एक सामान्य प्रस्ताव भेज रहे हैं कि यदि आवश्यक हो तो दिल्ली सरकार उन बाजारों को कुछ दिनों के लिए बंद कर सकती है, जहाँ कोविड प्रोटोकॉल्स का पालन नहीं किया जा रहा है और वे एक स्थानीय हॉटस्पॉट बन रहे हैं।
सीएम ने यह भी कहा, “जब कुछ सप्ताह पहले दिल्ली में कोरोना की स्थिति में सुधार हुआ, तो शादी में शामिल होने वाले लोगों की संख्या 200 कर दी गई। अब इसे वापस लिया जा रहा है और केवल 50 लोगों को अनुमति दी जाएगी। यह प्रस्ताव एलजी के पास भेजा गया है।”
गौरतलब है कि सीएम का यह बयान दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन द्वारा कल की गई टिप्पणी के बाद आया है, जिसने लोगों को काफी हैरान कर दिया। दरअसल, दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने सोमवार को कहा था कि राजधानी में कोविड की तीसरी लहर खत्म हो गई है। उन्होंने कहा था कि लॉकडाउन लगाने का कोई प्लान नहीं है।
पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि, “दिल्ली में फिर से लॉकडाउन नहीं लगाया जाएगा। मुझे नहीं लगता कि अब यह प्रभावी कदम होगा। सभी का मास्क पहनकर बाहर निकलना ही फायदेमंद होगा।”
गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय पर सामने आया जब दिल्ली में 28 अक्टूबर से कोरोना वायरस के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है। वहीं कोरोना वायरस के एक दिन में पहली बार 5,000 से 8000 अधिक नए मामले सामने भी आए। हालाँकि, बीते 2 दिनों से मामलों में कमी भी देखी गई है, लेकिन इसके पीछे कम कोविड-19 टेस्ट को वजह बताया जा रहा है। बता दें भारत में दिल्ली एक मात्र ऐसा राज्य है जहाँ सबसे ज्यादा संक्रमण के मामले सामने आ रहे है।
उल्लेखनीय है कि अगस्त के महीने में कोरोनावायरस के बढ़ते प्रसार को लेकर दिल्ली सरकार ने ‘बाहरी’ लोगों को दोषी ठहरा रही थी। जिसके बाद दिल्ली के हालात को सुधारने के लिए गृह मंत्री अमित शाह को संक्रमण को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाना पड़ा था। वहीं इस बार भी केंद्र सरकार ने दिल्ली में बेकाबू होते हालात को देखते हुए ठोस कदम उठाने का फैसला लिया है। शाह ने राष्ट्रीय राजधानी में बढ़ते मामलों की जाँच के लिए 300 अतिरिक्त आईसीयू बेड की व्यवस्था, आरटीपीआर परीक्षणों को दोगुना करने और घर-घर सर्वेक्षण सहित कई उपायों की घोषणा की है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि नगर निगमों में से कुछ अस्पतालों को कोविड अस्पतालों में परिवर्तित किया जाएगा। साथ ही मैनपावर बढ़ाने के लिए डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को बुलाया गया है। एमएचए के अनुसार, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों से लगभग 75 अर्धसैनिक चिकित्सक और कुछ 250 पैरामेडिक्स पहले ही दिल्ली आ चुके हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने एक बार फिर से जबरदस्त जीत हासिल की तो वहीं महागठबंधन को करारी हार मिली। चुनाव नतीजों से असंतुष्ट प्रोपेगेंडाबाज फर्जी नैरेटिव से जदयू, बीजेपी और एनडीए में शामिल अन्य दलों द्वारा कड़ी मेहनत से हासिल की गई जीत को मटियामेट करने की कोशिश में जुटे हैं।
कॉन्ग्रेस, राजद और अन्य पार्टी के महागठबंधन के जीतने की कामना करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों में से कई ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिनके लिए इस जीत को पचा पाना काफी मुश्किल हो रहा है। बिहार चुनावों में जदयू और बीजेपी के खिलाफ ध्रुवीकरण अभियान चलाने के बाद अब ये लोग नया प्रोपेगेंडा लेकर आए हैं। इस बार उनका इरादा पीएम मोदी, बीजेपी और जेडीयू को मुस्लिम विरोधी के रूप में दिखाने का है। उन्होंने कहा कि एनडीए से एक भी मुस्लिम विधायक नहीं बना।
“Bihar has for the first time since Independence got a ruling coalition without a single MLA from its largest minority community.” Bihar alliance without a single elected Muslim – Telegraph India https://t.co/2MrAwcXuep
वामपंथी ऑनलाइन वेबसाइट ‘द वायर’ की पत्रकार ने ‘द टेलीग्राफ’ की एक रिपोर्ट शेयर करते हुए बिहार विधानसभा में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं बनने के लिए एनडीए गठबंधन को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताने का प्रयास किया। आरफा ने ट्वीट किया, “आजादी के बाद बिहार में पहली बार ऐसा हुआ है जब अपने सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के एक भी विधायक के बिना सत्ताधारी गठबंधन बना।”
कई अन्य वामपंथी ‘बुद्धिजीवी’ और मीडिया पोर्टलों ने भी बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को मुस्लिम विरोधी साबित करने के लिए इसी लाइन को आगे बढ़ाया है। उनका यह प्रयास ये दिखाने के लिए था कि भाजपा देश के समुदाय विशेष को असंतुष्ट करने का काम कर रही है।
उनका यह प्रयास स्वाभाविक रूप से देश के समुदाय विशेष के बीच के फैले छद्म भय को ट्रिगर करने के लिए किया जाता है ताकि उन्हें भाजपा और उसके सहयोगियों के खिलाफ वोट करने के लिए जुटाया जा सके। इसी तरह का पैंतरा उस समय भी आजमाया गया था जब बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को निरस्त कर दिया और नागरिकता संशोधन अधिनियम को पारित किया था। वामपंथियों द्वारा भाजपा को एक ऐसी पार्टी के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया, जो मुस्लिमों की विरोधी है। ऐसा करके, वे अपने पसंदीदा दलों- कॉन्ग्रेस और अन्य वामपंथी दलों को उबारने की कोशिश कर रहे हैं, जो भारतीय राजनीतिक परिदृश्य के भितरघात के कारण पतन की ओर अग्रसर हैं।
हालाँकि, जब मीडिया संगठनों और वामपंथी विचारकों ने बिहार विधानसभा चुनावों में जदयू-भाजपा गठबंधन पर शून्य मुस्लिम प्रतिनिधित्व का दोष लगाया, तो यहाँ पर ध्यान देने वाली बात है कि उन्होंने जो दोष लगाया है, उसके पीछे कोई तर्क भी है या फिर वो सिर्फ सच्चाई को छुपाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।
सच्चाई यह है कि एनडीए गठबंधन के सबसे बड़े गठबंधन सहयोगियों में से एक, जदयू ने हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनावों के लिए 11 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। हालाँकि, इनमें से एक भी मुस्लिम उम्मीदवारों को जीत हासिल नहीं हो सकी।
बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू द्वारा मैदान में उतारे गए मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन
सबा जफर ने जदयू के लिए अमौर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और 22.72 प्रतिशत वोट हासिल किए। हालाँकि, वह एआईएमआईएम उम्मीदवार अख्तरुल ईमान से हार गईं, जिन्होंने 51 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया।
Source: Election Commission
अररिया में, कॉन्ग्रेस पार्टी के उम्मीदवार अबिदुर रहमान ने जेडीयू उम्मीदवार शगुफ्ता अजीम पर व्यापक जीत दर्ज की।
Source: Election Commission
ठाकुरगंज में जदयू के मोहम्मद नौशाद आलम ने 11.46 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि राजद उम्मीदवार ने 41.48 प्रतिशत वोट हासिल कर विधानसभा चुनाव जीत लिया।
Source: Election Commission
जदयू द्वारा मुस्लिम उम्मीदवार के लिए कोचाधामन की कहानी भी निराशाजनक थी। जदयू के मुजाहिद आलम एआईएमआईएम उम्मीदवार मुहम्मद इज़हार असफी से हार गए, जिन्होंने लगभग 50 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किए।
Source: Election Commission
बिहार के कांति में राजद के उम्मीदवार मुहम्मद इजरायल मंसूरी ने जदयू के उम्मीदवार मोहम्मद जमाल को पटखनी दी।
Source: Election Commission
सिकटा विधान सभा क्षेत्र से जदयू के खुर्शीद फिरोज अहमद को सीपीआई (एमएलएल) के उम्मीदवार बीरेंद्र प्रसाद गुप्ता को लगभग 14,000 वोटों के अंतर से हराया।
Source: Election Commission
जदयू के एक और मुस्लिम उम्मीदवार मोहम्मद शरफुद्दीन राजद उम्मीदवार चेतन आनंद से शेहर निर्वाचन क्षेत्र में हार गए।
Source: Election Commission
दरभंगा ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र में राजद प्रत्याशी ललित कुमार यादव और जदयू के फारुकी फातमी के बीच घनिष्ठ चुनावी रस्साकशी देखने को मिली। हालाँकि, अंत में यादव विजयी होकर उभरे।
Source: Election Commission
मरौरा जिले में, राजद के जितेंद्र कुमार रे ने जदयू के अल्ताफ आलम को काफी अंतर से हराया।
Source: Election Commission
महुआ में चुनाव परिणाम मारहरा से अलग नहीं था। यहाँ भी मुकेश कुमार रौशन ने जदयू के मुस्लिम उम्मीदवार अश्मा परवीन को करारी हार दी।
Source: Election Commission
बिहार के डुमरांव में, सीपीआई (एमएलएल) के उम्मीदवार अजीत कुमार सिंह ने चुनाव जीता, जदयू की अंजुम आरा को बढ़िया अंतर से हराया।
Source: Election Commission
राजनीतिक दल उम्मीदवारों की जीत को प्राथमिकता देते हैं
इस तरह से उपरोक्त परिणामों से स्पष्ट है, एनडीए गठबंधन के सहयोगियों द्वारा मैदान में उतारे गए मुस्लिम उम्मीदवारों में से कोई भी विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब नहीं हुआ। जदयू ने 43 सदस्यों को विधानसभा भेजा। अगर जदयू के सभी 11 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीत जाते, तो उनके पास विधानसभा की 54 सीटें होतीं, और उनमें से 20 प्रतिशत मुस्लिम होते।
राजनीतिक दल उन उम्मीदवारों का चयन करते हैं जो चुनाव जीतने की सबसे अधिक संभावना रखते हैं। बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों का चयन करना, लेकिन उनमें से एक को भी विधानसभा में नहीं लाना कहीं से भी समझदारी की रणनीति नहीं है। इसलिए, बिहार विधानसभा में एनडीए में मुस्लिम विधायकों के न होने को लेकर गुमराह किया जा रहा है। क्योंकि ऐसा उम्मीदवारों की कमी की वजह से नहीं बल्कि उनके न जीतने की वजह से हैं।
बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर के लिए सच बोलना जितना मुश्किल है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है सच्चाई स्वीकारना। कट्टरपंथी भीड़ द्वारा की गई हिंसा और उनकी कट्टरता पर हमेशा से लीपापोती और पर्दा डालने वाली स्वरा ने एक बार फिर देशद्रोहियों के प्रति अपने मन में छिपे प्यार को उजागर किया है। स्वरा भास्कर ने मंगलवार को दावा किया कि मुंबई के आज़ाद मैदान दंगों के दौरान दंगाइयों द्वारा अमर जवान स्मारक पर हमला करने वाली तस्वीरें असली नहीं बल्कि ‘फोटोशॉप्ड’ हैं।
बता दें विवादों से घिरी रहने वाली स्वरा भास्कर ने ट्विटर पर एक यूजर द्वारा की गई टिप्पणी का जवाब देते हुए यह दावा किया। दरअसल, एक यूजर ने अमर जवान ज्योति को लात मारते और उसका अपमान करते हुए कुछ फ़ोटो पोस्ट करते हुए लिखा, “जिस दिन तुमने अमर जवान को अपने पैरों से मारा, तभी से मैं मुस्लिमों से नफरत करने लगा।” वहीं इस पोस्ट का जवाब देते हुए स्वरा ने सीधे शब्दों में लिखा,”घटिया फोटोशॉप” मतलब आधुनिक टेक्निक्स द्वारा बनाई गई फ़ोटो। जबकि यह तस्वीर फोटोशॉप नहीं थी।
बता दें इन मशहूर तस्वीरों को मिड-डे के फोटोग्राफर अतुल कांबले ने 11 अगस्त, 2012 को क्लिक किया था। म्यांमार में रखाइन दंगों के विरोध में इस्लामिक संगठन रज़ा अकादमी ने इसके खिलाफ अपने समुदाय के लोगों को बरगलाया जिसके बाद आजाद मैदान में दंगे भड़क उठे। माना जाता है कि रोहिंग्याओं को उक्त दंगों के दौरान बहुत नुकसान हुआ था।
फोटोग्राफर अतुल कांबले द्वारा क्लिक फ़ोटो.1
यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि इन तस्वीरों की प्रामाणिकता को लेकर बहस करने का कोई मतलब नहीं है। आज़ाद मैदान में हुए दंगे और उससे पहले हुई हिंसा के इतने वर्षों बाद भी मुंबई के इतिहास पर एक धब्बा बने हुए है।
रज़ा अकादमी द्वारा लोगों को भड़काने और बरगलाने की वजह से हुए इन आत्मघाती दंगों के कारण, लोगों का गुस्सा जमकर इस इस्लामिक संगठन पर फूटा था। हालाँकि, आज भी लिबरल गिरोह अपने पापों पर पर्दा डालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।
फोटोग्राफर अतुल कांबले द्वारा क्लिक फ़ोटो.2
उल्लेखनीय है कि उदारवादियों ने भी इतनी बेशर्मी से इन बातों से इंकार नहीं किया कि हिंसा हुई या यह आरोप लगाया गया कि ये तस्वीरें प्रामाणिक नहीं हैं। स्वरा भास्कर ने बिना किसी जानकारी या यूँ कहूँ तो इस्लामिक गतिविधियों पर पर्दा डालने के लिए इन तरह की हरकतें की है। असल में ऐसा भी हो सकता है कि 2012 में हुए दंगों को लेकर उनका ज्ञान कोसों दूर हो।
वहीं इस बीच कट्टरपंथियों के अपराधों पर पर्दा डालने और उनकी साइड लेने वाली स्वरा जैसे अन्य लोगों ने उनके ट्वीट को लाइक किया है। इन लोगों में द वायर के प्रोपेगेंडा पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने भी स्वरा के पोस्ट को लाइक किया है। जिसका स्क्रीनशॉट सामने आया है। हालाँकि, आरफा खानम द्वारा किए लाइक पर एक यूज़र ने उन्हें जमकर लताड़ा। आरफा पर तंज कसते हुए यूजर ने कहा कि मैडम हमें पता है कि आप तस्वीरों को फोटोशॉप करने में एक्सपर्ट है लेकिन यह तस्वीरें असली है। जहाँ आपके जिहादी दोस्तों ने मुंबई में अमर जवान ज्योति को ध्वस्त कर दिया था।
Madam @khanumarfa i know u r expert in Photoshop pics but this are real pics where ur jihadi frnds destroyed amar jawan jyoti in mumbai(2012) pic.twitter.com/PXlkBsX2hD
बहरहाल, यह सब प्रमाणित करता है कि हमारी तथाकथित पॉपुलर हस्तियाँ पूरी तरह से सार्वजनिक जीवन की वास्तविकताओं को लेकर अनाड़ी हैं। अगर कोई गंभीरता से दावा कर सकता है कि आज़ाद मैदान दंगे की तस्वीरें फर्जी है, तो इसके आगे क्या है? वह दिन दूर नहीं जब उनमें से कुछ यह दावा करेंगे कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के पारित होने के बाद एक भी मजहबी भीड़ ने दंगा नहीं किया था। लेकिन अब तो हम यह भी नहीं कह सकते क्योंकि ये लोग पहले से ही इस बात को साबित करने में तुले हुए है।
गौरतलब है कि लिबरल्स ने हर बार मजहबी भीड़ द्वारा किए गए हिंसा या हिंदुओं के प्रति उनके नफरत को छुपाने, लीपापोती करने या पर्दा डालने का काम किया है। वहीं जब इनके करतूतों के सबूत पब्लिक में सामने आते है तो ये लिबरल्स मिल कर उसे फर्जी साबित करने में लग जाते है। जिनमें स्वरा भास्कर भी एक है। वहीं अगर इनका बस चलता तो इस्लामवादियों द्वारा एक शिक्षक के सर को धड़ से अलग करने वाली घटना को भी ये फर्जी साबित कर देते।
लेकिन हम पहले से ही जानते थे कि जिस तरह से लिबरल गिरोह तो इस बात से भी इनकार करते है कि कश्मीरी पंडितों ने नरसंहार और बर्बरता मुस्लिमों के अत्याचार की वजह से अतीत में झेला हैं। वहीं यही बेशर्मी अब स्वरा भास्कर ने यह इनकार करते हुए किया है कि अमर जवान स्मारक पर आजाद मैदान के दंगों के दौरान हमला किया गया था।
रेख्ता ने दीपावली के त्योहार पर भी अपने मजहबी मानसिक मवाद को साहित्य का रंग देने की कोशिश करते हुए इसे ईद बताया है। रेख्ता ने एक पोस्टर के जरिए दिवाली और इससे जुड़े कुछ प्रचलित शब्दों को उर्दू शब्दकोश देने की कोशिश की और इसी बहाने इसमें मजहबी अजेंडा को साध लिया।
रेख्ता ने इस पोस्टर में जो शब्द दिए वो दिवाली, उपहार, उत्सव, छुट्टियाँ…. तो थे ही, साथ ही इनमें सबसे आखिर में ‘वायु प्रदूषण’ भी था। बड़ी ही चालाकी से रेख्ता ने यह पोस्टर बाजार में उतारा और दिवाली को ईद बताने के साथ ही इससे जुड़े शब्द में ‘एयर पॉल्यूशन’ भी जोड़ा गया। लेकिन रेख्ता के इस पोस्टर में अभी एक अधूरापन है।
जो एक शब्द रेख्ता इस पोस्टर में जोड़ना भूल गया वह था- मजहबी अजेंडा! रेख्ता को अजेंडा शब्द को भी उर्दू शब्दकोश में जगह देनी चाहिए। इसके साथ ही, ऐसी कई शब्द और भी हैं, जिन्हें उर्दू शब्दकोश में जगह चाहिए मगर फतवे और कट्टरपंथियों के भय से शायद रेख्ता ऐसा करने से डरता है।
मजहबी चेतना के ध्वजवाहकों को इसमें कुछ कट्टर मजहबी टार और पशुओं के खून से सने हुए ‘आयोजनों’ को भी लोगों को समझाने योग्य बनाना चाहिए। कुछ ऐसे त्यौहार, जिनसे मिलता-जुलता शब्द ‘दरिया-ए-ख़ूँ’ हो सकता है। और यदि रेख्ता ऐसा नहीं कर सकता, तो इसे हिंदी में ‘खून की नदी बहाने का त्योहार’ बताया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा करने से गंगा-जमुनी तहजीब को ठेस लगने का भी भय है। गंगा-जमुनी तहजीब की गली बेहद संकरी और इकतरफा ही रही है। दिवाली की अमावस को ईद बताना सेक्युलर और प्रोग्रेसिव है जबकि किसी एक मजहबी त्योहार की साहित्यिक व्याख्या इस देश के सेक्युलर फेब्रिक को तहस-नहस करने के लिए काफी है।
वास्तव में, रेख्ता का मकसद दीपावली की शुभकामना देने का कभी नहीं रहा। यह हर त्योहार के इस्लामीकरण की ही एक कड़ी है। यह उसी विचारधारा की विष्ठा है, जो इस बात पर जोर देने का प्रयास करती है कि अकबर के शासन में यहाँ दीपावली मनाई जाती थी। मगर इस बात पर जोर देना वह भूल जाते हैं कि दिवाली तो भारत में तब भी मनाई जाती थी जब अकबर भ्रूण की अवस्था में भी नहीं रहा होगा। दिवाली इस देश में अकबर से पहले भी थी और उसके बाद भी हमेशा मनाई जाती रहेगी। हिन्दुओं का यह पवित्र त्योहार रेख्ता की कलाबाजी से पहले भी मौजूद था, और रेख्ता के बाद भी रहेगा। इसके बीच मजहबी और वाम-उदारवादी प्रोपगेंडा के लिए कोई जगह नहीं रहती।
इसी तरह, हिंदी भी उर्दू के बिना कहीं श्रेष्ठ और सम्पन्न भाषा रही है और आगे भी रहेगी। भारत को उर्दू ने नहीं बल्कि उर्दू को भारत ने शरण दी है यह बात दिमाग से निकाली नहीं जानी चाहिए। ताजमहल का महिमामंडन, बिरयानी, रसगुल्ले से लेकर जलेबी तक का ‘मुगलीकरण’ कर सांस्कृतिक वर्चस्व की जंग को अब भाषा के वर्चस्व में बदलने का कारनामा लेफ्ट-लिबरल्स को भी खूब लुभाता है।
रेख़्ता का वह पोस्टर जिसमें दिवाली को ईद बताया गया है
उर्दू-हिंदी को मौसेरी बहनें बताने वालों के शब्दकोश में दीपावली के लिए भी एक शब्द नहीं है। जिस संस्कृति का झंडाबरदार बनने रेख्ता निकला है, वह ‘संस्कृति’ होली से लेकर दिवाली तक में अपनी मौजूदगी ठूँसकर किसी तरह प्रासंगिक बने रहना चाहती है।
अगर दीपावली ‘ईद-ए-चरागाँ’ है तो फिर रेख्ता इस बात का जवाब क्यों नहीं देता कि अमावस की रात कौन सा चाँद निकलता है जो दीपावली को ईद बता दिया गया? जिस उर्दू का शब्दकोश इकलौते त्योहार के ही इर्दगिर्द शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाता है, उसे किसी हिमालयी सभ्यता के कंधे से कंधा मिलाने की ठरक को शांत करने से पहले अपने खुद के विकास पर मेहनत करनी चाहिए।
इसके अलावा, दिवाली के मिलते-जुलते शब्दों में ‘एयर पॉल्यूशन’ को जगह देने से पहले ‘खून से सनी गलियों’ के लिए एक दूसरी आसमानी किताब तैयार की जानी चाहिए। वह ‘सभ्यता’ और संस्कृति के क्रूर उदाहरण मिलता-जुलता भी नहीं बल्कि उस आयोजन का ही परिचय भी है, रेख्ता को उस पर गर्व होना चाहिए क्योंकि आखिर वह उस संस्कृति का हिस्सा है। यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि दिवाली से अगर प्रदूषण होता है तो बकरियों को रेतने से कौन सी आकशगंगा की ओजोन परत आकर पृथ्वी के चारों और सुरक्षा कवच खड़े कर देते हैं?
दिवाली की बधाई के बहाने अपने मजहबी अजेंडा को परोसने पर रेख्ता की खूब फजीहत भी हुई। यही वजह है कि रेख्ता ने भरपूर गालियाँ खाने के बाद अपना ये पोस्टर भी हटा लिया। हालाँकि, उस पोस्टर में एक अधूरापन है। अभी कुछ मजहबी त्योहारों के नामकरण की कमी रेख्ता के शब्दकोश में बनी हुई है। अगले सीजन से पहले रेख्ता को उनके नामकरण पर मेहनत करनी चाहिए।
कहते हैं कि जब मति भ्रष्ट हो तो एक के बाद एक गलतियाँ करते हैं। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कॉन्ग्रेस की हालत भी कुछ ऐसी ही है। बिहार चुनाव में महागठबंधन की हार की अघोषित जिम्मेदार कॉन्ग्रेस अब जम्मू-कश्मीर की अलगाववादी पार्टियों के गुपकार समझौते में शामिल हो गई है।
इन अलगाववादी दलों के नेताओं का देश विरोधी एजेंडा किसी से छिपा नहीं है, कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे में इनके साथ अलगाववाद की मुहिम में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होने का ये फैसला कॉन्ग्रेस के लिए उसकी ताबूत में अंतिम कील साबित होगी।
कॉन्ग्रेस का गुपकार प्रेम
जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद के चुनाव होने वाले हैं ऐसे में अनेकों ना-नुकर करने के बाद गुपकार गठबंधन की पार्टियों ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि इन पार्टियों का कॉन्ग्रेस ने भी समर्थन किया है और अलगाववाद के इस गठबंधन में शामिल होकर ही वो भी चुनाव लड़ेगी।
एक राष्ट्रीय पार्टी का अलगाववादी नेताओं के साथ प्रेम, देश और जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक भविष्य के लिए एक चिंताजनक बात है और ये आगे चलकर साबित करेगा कि कॉन्ग्रेस दोमुँहेपन की पराकाष्ठा को पार कर चुकी है l
अलगाववादी है गुपकार गठबंधन
कॉन्ग्रेस ने जिस गुपकार गठबंधन में शामिल होने का फैसला किया है उसकी हकीकत किसी को भी हैरान कर सकती है कि देश की राष्ट्रीय पार्टी ऐसा कदम केवल सत्ता के लिए कैसे उठा सकती है। गुपकार का मुख्य एजेंडा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 और 35-A बहाली है। ये लोग तब तक भारतीय झंडे को हाथ नहीं लगाने की बात करते हैं जब तक अनुच्छेद -370 बहाल नहीं हो जाता।
इस गठबंधन में जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी समेत कई क्षेत्रीय अलगाववादी पार्टियाँ हैं, जिसमें उमर अब्दुल्ला, फारुक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, सज्जाद लोन आदि शामिल हैं। इन नेताओं का कहना है कि वो इस बहाली के लिए चीन से भी मदद लेने को खुशी-खुशी तैयार हैं। वहीं, ये लोग कश्मीरी युवकों को नौकरी के अभाव में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए भड़काते हैं, जो कि इनके देश विरोधी एजेंडे को दर्शाता है।
कॉन्ग्रेस के लिए मुसीबत
जो नेता अपने देश के मुद्दों के लिए दुश्मन देशों से मदद माँगते हो वो देशद्रोही ही तो कहलाएँगे और इनके साथ कॉन्ग्रेस का गठबंधन उसकी प्रकृति को दर्शाता है कि असल में वो कितने निचले स्तर तक जा चुकी है। राजनीतिक जमीन के लिए देशद्रोही नेताओं के साथ जाकर उनकी पंक्ति में खड़ी हो गई है जिससे उस पर भी लोगों ने देशद्रोही होने का ठप्पा लगाना शुरू कर दिया है।
हाल हीं में कॉन्ग्रेस को बिहार चुनावों में हार का मुँह देखना पड़ा है। केवल हार ही नहीं… बिहार में कॉन्ग्रेस के कारण ही महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव के सीएम बनने की ‘संभावनाएँ’ खत्म हुई हैं जिसके चलते अब बाकी पार्टियाँ भी कॉन्ग्रेस से सतर्क हो गई हैं। चुनाव नतीजों को चार दिन नहीं हुए कि कॉन्ग्रेस को उसके ही गठबंधन के साथियों ने दबे मुँह लताड़ना भी शुरू कर दिया है।
आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी का बयान इसकी परिणति है जिन्होंने कहा कि जब बिहार में चुनाव अपने चरम पर था, तब राहुल गाँधी बहन प्रियंका गाँधी के साथ उनके शिमला वाले घर में पिकनिक मना रहे थे। क्या पार्टी ऐसे चलती है? ये बयान बताता है कि कॉन्ग्रेस से अब उसके सहयोगी भी पीछा छुड़ाएँगे।
यूपी के 2017 विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन कर सत्ता में वापसी करने के इरादे रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अरमानों पर जब कॉन्ग्रेस की वजह से पानी फिरा तो उन्होंने भी साफ कर दिया है कि वो भविष्य में किसी भी चुनाव में देश की बड़ी राजनीतिक पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव नहीं लड़ेंगे। उन्होंने कॉन्ग्रेस का नाम नहीं लिया लेकिन अखिलेश का इशारा उसी तरफ था।
यहीं नहीं कॉन्ग्रेस के अपने लोग भी अब ये कहने लगे हैं कि कॉन्ग्रेस की वर्किंग कमेटी को ठोस कदम उठाने होंगे। कई लोगों ने तो एक बार फिर कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष बनने के लिए राहुल गाँधी को आगे किया है जबकि वरिष्ठ नेता और अधिवक्ता कपिल सिब्बल का कॉन्ग्रेस की कार्यप्रणाली से मोह भंग हो रहा है और वो जमकर पार्टी की आलोचना करने लगे हैं।
सिब्बल ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व ने शायद हर चुनाव में पराजय को ही अपना नियति इमान लिया है। उन्होंने कहा था कि बिहार ही नहीं, उपचुनावों के नतीजों से भी ऐसा लग रहा है कि देश के लोग कॉन्ग्रेस पार्टी को प्रभावी विकल्प नहीं मान रहे हैं। इसके अलावा पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं ने अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को पत्र लिखा था। इस पत्र में भी राहुल और प्रियंका के शिमला में छुट्टी मनाने पर जोर दिया गया था।
जब राजनीतिक रूप से कॉन्ग्रेस को केवल असफलता ही मिल रही है और उसके साथी उसका हाथ झटक रहे हैं तो उसका जम्मू-कश्मीर की अलगाववादी पार्टियों के साथ गुपकार गठबंधन में शामिल होना एक आत्महत्या के बराबर ही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कॉन्ग्रेस का ये फैसला न केवल जम्मू-कश्मीर बल्कि पूरे देश में उस पर भारी पड़ेगा और संकट में पड़े कॉन्ग्रेस के राजनीतिक भविष्य के लिए ये ताबूत में आखिरी कील का काम करेगा।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस तरफ इशारा किया है। उन्होंने गुपकार गैंग और कॉन्ग्रेस पर हमला करते हुए कहा कि गुपकार गैंग कश्मीर को आतंक युग में ले जाना चाहता है। इतना ही नहीं अमित शाह ने ये भी कहा कि अगर गुपकार गैंग देश के मूड के साथ नहीं आता है, तो जनता उसे डुबो देगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (नवंबर 17, 2020) को ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन को संबोधित किया। पीएम मोदी ने इस दौरान आतंकवाद को दुनिया की सबसे बड़ी समस्या बताते हुए नाम लिए बिना पाकिस्तान पर निशाना साधा। पीएम मोदी ने कहा, ”आतंकवाद आज विश्व के सामने सबसे बड़ी समस्या है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आतंकवादियों को समर्थन और सहायता देने वाले देशों को भी दोषी ठहराया जाए, और इस समस्या का संगठित तरीके से मुकाबला किया जाए।”
आतंकवाद आज विश्व के सामने सबसे बड़ी समस्या है।
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आतंकवादियों को समर्थन और सहायता देने वाले देशों को भी दोषी ठहराया जाए और इस समस्या का संगठित तरीके से मुकाबला किया जाए: पीएम @narendramodi
पीएम मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व व्यापार संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार पर जोर देते हुए कहा है कि इन संस्थाओं की क्रेडिबिलिटी और विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। इसकी वजह है कि समय के साथ इनमें बदलाव नहीं आया। ये अभी भी 75 साल पुरानी सोच पर हैं। भारतीय सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता है। इसमें हमें ब्रिक्स साथियों के सहयोग की जरूरत है।
This is the 75th anniversary of UN. India has been a core supporter of multi-laterism & in Indian tradition, the entire world is considered a family.
पीएम मोदी ने कहा, ”हमने ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत एक व्यापक सुधार प्रक्रिया को शुरू किया है। यह कैंपेन इस विश्वास पर आधारित है कि आत्मनिर्भर भारत कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए फोर्स मल्टीपल्यार हो सकता है और ग्लोबल वैल्यू चेन्स में मजबूत योगदान दे सकता है। इसका उदहारण हमने COVID के दौरान भी देखा, जब भारतीय फार्मा उद्योग की क्षमता के कारण हम 150 से अधिक देशों को आवश्यक दवाइयाँ भेज पाए। हमारी वैक्सीन उत्पादन और डिलीवरी क्षमता भी इस तरह मानवता के हित में काम आएगी।”
Due to the strength of India’s pharma sector, we were able to provide medicines to over 150 countries during COVID-lockdown era.
Our vaccine production and delivery ability will help mankind in the same way: PM @narendramodi
12वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने एक तरफ जहाँ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की जमकर तारीफ की तो दूसरी तरफ चीनी राष्ट्रपति का जिक्र भी नहीं किया। ब्रिक्स की भूमिका को अहम बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ब्रिक्स संगठन में शामिल देश वैश्विक अर्थव्यवस्था के इंजन है।
इस वर्ष दूसरे विश्व युद्ध की 75वीं वर्षगांठ पर हम वीरगति पाए सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं। भारत से भी 2.5 मिलियन से अधिक वीर इस युद्ध में यूरोप, अफ्रीका, और साउथ ईस्ट एशिया जैसे कई फ्रंट्स पर सक्रिय थे: पीएम @narendramodi
प्रधानमंत्री ने कहा, “इस वर्ष दूसरे विश्व युद्ध की 75वीं वर्षगाँठ पर हम वीरगति पाए सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं। भारत से भी 2.5 मिलियन से अधिक वीर इस युद्ध में यूरोप, अफ्रीका, और साउथ ईस्ट एशिया जैसे कई फ्रंट्स पर सक्रिय थे।” प्रधानमंत्री ने कहा, “2021 में BRICS के 15 वर्ष पूरे हो जाएँगे। पिछले सालों में हमारे बीच लिए गए विभिन्न निर्णयों का मूल्यांकन करने के लिए एक रिपोर्ट बना सकते हैं। 2021 में अपनी अध्यक्षता के दौरान हम BRICS के तीनों स्तंभों में intra-BRICS सहयोग को मजबूत करने का प्रयत्न करेंगे।”
India feels that reforms in the UN Security Council is very important. We expect support from our BRICS partners on this issue. Several other international organizations aren’t functioning according to the contemporary realities. Institutions such as WTO, IMF,WHO need improvement pic.twitter.com/MNeeb5C9En
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि विश्व एक संकट से गुजर रहा है। ब्रिक्स में सुधार की जरुरत है। IMF, WTO, WHO में भी सुधार की जरुरत है।
पीएम मोदी ने आगे कहा, “इस कठिन कार्यकाल में, रूस के नेतृत्व में, लोगों से लोगों के कनेक्शन को बेहतर बनाने के लिए कई पहल की गईं जैसे कि ब्रिक्स फिल्म समारोह, युवा वैज्ञानिकों की बैठकें आदि की गई। ब्रिक्स के अपने नेतृत्व के दौरान, भारत ब्रिक्स देशों के बीच डिजिटल स्वास्थ्य और पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देगा।”
मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी पर अपनी हालिया कार्रवाई में चैनल के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को कारण बताओ नोटिस भेजा है। यह नोटिस पालघर लिंचिंग केस और बांद्रा में प्रवासियों की भीड़ इकट्ठा होने पर की गई ‘सांप्रदायिक टिप्पणियों’ को लेकर है।
इस बार उन्हें रविवार को शाम 4 बजे वर्ली के असिस्टेंट पुलिस कमिशनर और स्पेशल एग्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने को कहा गया है। इतना ही नहीं, इससे पहले रिपब्लिक टीवी के एडिटर अर्णब गोस्वामी से ‘अच्छे बर्ताव’ के लिए एक बॉन्ड साइन करने को भी कहा गया था।
सीआरपीसी की धारा 108 के तहत एसीपी (वर्ली) सुधीर जंबावड़ेकर ने डिमांड की थी कि अर्णब गोस्वामी अपने अच्छे बर्ताव को सुनिश्चित करने के लिए बॉन्ड साइन करें। असिस्टेंट कमिशनर ने एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट के रूप में अपनी शक्तियों का प्रयोग किया था जो उन्हें संवेदनशील सामग्री को प्रकाशित किए जाने के संदेह में किसी से अच्छे व्यवहार के लिए सुरक्षा की माँग करने का अधिकार प्रदान करता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अर्णब गोस्वामी को कारण बताओ नोटिस भेज कर पूछा गया है कि आखिर क्यों उनसे एक साल के समय के लिए 10 लाख का बॉन्ड राशि नहीं भरवाना चाहिए, वो भी एक गारंटर के साथ जिसकी समाज में एक अच्छी खासी पहचान हो और अर्णब का बर्ताव कंट्रोल करने में सक्षम हो।
SC ने दी थी अर्णब गोस्वामी को बेल
गौरतलब है कि अभी हाल ही में पिछले बुधवार (नवंबर 11) को सुप्रीम कोर्ट में अर्णब गोस्वामी की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को गलत बताया था। इसके बाद अर्णब को रिहाई देने के लिए मुंबई पुलिस को निर्देशित किया गया था।
अर्णब गोस्वामी और दो अन्य आरोपितों को 50,000 रुपए के बांड पर अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया था। कोर्ट ने पुलिस आयुक्त को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया था कि आदेश का तुरंत पालन किया जाए।
जमानत पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर हम आज इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करते हैं तो बर्बादी की राह पर बढ़ जाएँगे। उन्होंने यह भी कहा था कहा कि किसी की विचारधारा अलग हो सकती है और वो चैनल नहीं देखे, लेकिन संवैधानिक अदालतें अगर ऐसी आज़ादी की सुरक्षा नहीं करती हैं तो वो बर्बादी की राह पर बढ़ रही है।