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मुर्गे की दुकान पर अनवर, शाहिद ने राहुल को दी ‘जाति वाली गाली’, भड़की हिंसा: 5 हिरासत में

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के चिरैयाकोट में शनिवार (अगस्त 22, 2020) को साम्प्रदायिक तनाव जैसा माहौल पैदा हो गया। वहाँ मुर्गे की दुकान के बाहर खड़े अनवर और शाहिद ने राहुल कनौजिया उर्फ काजू के ऊपर कथित तौर पर जातिसूचक टिप्पणी की।

इसके बाद झगड़ा इतना बढ़ गया कि वहाँ देखते ही देखते कई लोग इकट्ठा हो गए। बाद में पुलिस ने घटनास्थल पर पहुँचकर मामला शांत करवाया और कुछ उपद्रवियों को हिरासत में लिया।

अमर उजाला की रिपोर्ट बताती है कि यह लड़ाई किसी बड़े मुद्दे पर नहीं भड़की थी लेकिन माहौल शांत होते-होते 10 लोग घायल हो गए। स्थिति देखते हुए पुलिस को गाँव में फोर्स की तैनाती करनी पड़ी। हालाँकि हैरानी की बात है कि दोनों तरफ से किसी पक्ष ने पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं करवाई। लेकिन बताया जा रहा है कि पुलिस ने 5 लोगों को हिरासत में लिया है और इस मामले पर आगे कार्रवाई भी की जाएगी।

पूरा मामला छपरा गाँव में मुर्गे की एक दुकान से शुरू हुआ। यहाँ गाँव के ही तीन युवक अनवर, शाहिद और राहुल उर्फ काजू कन्नौजिया खड़े थे। इस दौरान अनवर और शाहिद ने जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए राहुल को मारने की बात कही।

इतना ही नहीं, बीते 3 अगस्त को नहाने के दौरान पानी में डूबने से हुई मौत की घटना का जिक्र करते हुए लड़कों ने अपशब्दों का प्रयोग किया। इन बातों को सुन वहाँ खड़े व्यक्ति ने विरोध किया।

इस पर दोनों पक्षों के बीच कहासुनी के बाद हाथापाई हो गई। मारपीट होने पर दोनों युवकों के परिवार के सदस्य भी वहाँ पहुँचे और दोनों तरफ से जमकर ईंट-पत्थर और लाठी-डंडा चला।

घटना में एक तरफ से अंकुर (18), पंकज (50), ऊषा (55), अनूप (30), राहुल (28), निशा (30), जबकि दूसरे तरफ से साकीना (22), साबिया (45), कासिम (40), महताब (19) आदि घायल हुए।

बता दें कि 3 अगस्त के जिस मामले को लेकर दो पक्षों में बहस बढ़ी, उसमें अमन कनौजिया नाम के एक युवक की मौत हो गई थी और कनौजिया के परिवार ने इस मामले में आरोप लगाया था कि गाँव के ही दो युवक उसे नदी पर लेकर गए थे और वहाँ जबरदस्ती उसे पुल से छलांग लगवाई।

क्या तुम ला-इलाहा-इल्लल्लाह का मतलब भूल गए?- गणेश चतुर्थी पर तिलक लगाए शाहरुख को समझाया ‘इस्लाम’

गणपति उत्सव के मौके पर कई बॉलीवुड सितारे अपने घरों में भगवान गणेश की प्रतिमा लेकर आते हैं। शाहरूख खान इस सूची में सबसे चर्चित नाम हैं। इस बार भी वह गणेश चतुर्थी के मौके पर प्रतिमा घर लेकर आए। भगवान गणपति की पूजा-पाठ की, उनका विसर्जन किया। 

सभी कार्य संपन्न होने के बाद शाहरूख खान ने सोशल मीडिया पर यह जानकारी देते हुए गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएँ भी दीं। उन्होंने लिखा, “प्रार्थना और विसर्जन हो गया… इस गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश आप और आपके प्रियजनों पर कृपा बरसाएँ, आशीर्वाद और खुशियाँ। गणपति बप्पा मोरया।”

इस संदेश के बदले शाहरुख खान के फैन्स ने उन्हें बहुत सराहा। हालाँकि, इस मौके पर कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें शाहरुख के माथे पर टीका और गणपति के प्रति इतना प्रेम नहीं पचा और वह उन्हें संप्रदाय विशेष से होने के मायने समझाने लगे।

एक कामराम नाम के यूजर ने लिखा, “मुझे लगता है कि आप ला इलाहा इल इल्लाह” का मतलब भूल गए हैं। भगवान सिर्फ़ एक है, ‘अल्लाह’। दुनिया का प्यार पाने के लिए आप क्या बन गए हैं। क्या आप अपनी अगली जिंदगी के बारे में नहीं सोचते?

इसी रिप्लाई पर एक अबरार अहमद नाम का यूजर लिखता है, “वह अच्छे से जानते हैं लेकिन ये सब वह अपनी खुशी के लिए नहीं कर रहे। ये वह अपने फैन्स के लिए और अपनी पत्नी के लिए कर रहे हैं।”

इसके बाद एक शैफी अल फिराशाह नाम के यूजर ने शाहरुख ने ट्वीट पर गणपति का अपमान करने के लिए लिखा, “क्या हाथी के सिर वाला व्यक्ति वाकई होता है?”

जौहेर खान इसी बीच अपना अजेंडा चलाने के लिए बीच में लिखता है, “क्या फर्क पड़ता कि कितने उर्दू नामों ने यहाँ अपना सेकुलरिज्म साबित करने की कोशिश की। लेकिन हिंदुत्व के गुंडे (असली हिंदू नहीं) केवल तभी खुश होंगे जब वह अपने सभ्यता और परंपरा को गाली देंगे।”

जकारिया ने लिखा, “अल्लाह तुम्हारे किसी भी पाप को माफ कर सकता है। लेकिन एक चीज जिसे वह माफ नहीं कर सकता है। वह किसी के साथ भी साझेदारी।”

सैयद अब्दुल बासित ने शाहरुख खान के पोस्ट पर रिप्लाई करते हुए लिखा, “क्या तुम मुस्लिम हो? अगर हो तो यह शिर्क है। शिर्क़ का मतलब अल्लाह के अलावा दूसरे को भी मानना या बोलना जो आपने अभी बोला वो भी शिर्क है। अगर आप समझते हो।”

बता दें कि शाहरुख खान को पहली बार हिंदू त्योहार मनाने पर कट्टरपंथियों से इस्लाम की परिभाषा सुनने को नहीं मिली है। पिछली बार भी उनके पोस्ट पर ऐसा ही कुछ देखने को मिला था। उनके अलावा बॉलीवुड में कई और कलाकार हैं, जो अक्सर अपनी हिंदू देवी-देवताओं के साथ फोटो अपलोड करते हैं और कट्टरपंथी उनसे नाराज हो जाते हैं।

पिछले साल गणेश चतुर्थी के अवसर पर सैफ अली खान की बेटी और बॉलीवुड अदाकारा सारा अली खान को कट्टरपंथियों ने निशाने पर लिया था। साथ ही उनके साथ गाली-गलौच भी की थी। इसके अलावा राम जन्मभूमि की बधाई देने पर भी कई सेकुलरों का चेहरा सोशल मीडिया पर सामने आया था।

‘मैडम सोनिया जी रहेंगी अध्यक्ष… या BJP के खिलाफ अकेले लड़ने वाले श्री राहुल जी बनेंगे’ – AICC (SC) का फैसला

बस कुछ घंटे बाद… यानी सोमवार (24 अगस्त 2020) को कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की बैठक है। लेकिन इसी कॉन्ग्रेस के एक धड़े ने गाँधी परिवार (माँ-बेटे) पर मुहर लगा दी है।

अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमिटी (एआईसीसी) की अनुसूचित जाति (SC) संभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि सोनिया गाँधी को ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रहना चाहिए। क्यों रहना चाहिए? इसका भी तर्क AICC (SC) ने दे दिया है।

AICC (SC) ने रविवार (23 अगस्त को, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की बैठक से ठीक एक दिन पहले) को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से एक मीटिंग की। मीटिंग में कहा गया कि सोनिया गाँधी ने सबसे महत्वपूर्ण समय में पार्टी का नेतृत्व किया था, पार्टी को सत्ता में लाया था और एक दशक तक नेतृत्व किया था।

सोनिया गाँधी के विकल्प के तौर पर अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमिटी (एआईसीसी) की अनुसूचित जाति (SC) संभाग ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पार्टी अध्यक्ष के तौर पर सिर्फ और सिर्फ राहुल गाँधी को ही देखते हैं। क्यों? सिर्फ राहुल गाँधी ही क्यों?

AICC (SC) ने राहुल गाँधी को अध्यक्ष के तौर पर देखने के पीछे तर्क दिया कि वो यंग विजनरी लीडर हैं। राहुल गाँधी देश की जनता के लिए ईमानदारी के साथ खड़े हुए और BJP सरकार के खिलाफ (जो आम आदमी के अधिकारों को कुचल रही है) अकेले लड़े।

कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की बैठक से ठीक एक दिन पहले अनुसूचित जातियों की लॉबी ने गाँधी परिवार के लिए पासा क्यों फेंका? क्या इसका उन 23 बड़े नेताओं के द्वारा सोनिया गाँधी को लिखे पत्र से कोई कनेक्शन है? क्या प्रियंका गाँधी वाला ‘गैर गाँधी अध्यक्ष’ इंटरव्यू या राहुल गाँधी का अध्यक्ष न बनने की जिद सिर्फ एक जुमला भर था? जनता देख रही है, चंद घंटों में सब क्लियर हो जाएगा।

गरुड़ प्रकाशन से दिल्ली दंगों पर आएगी किताब, वामपंथियो और कट्टरपंथियों के दबाव में झुक गया था ब्लूम्सबरी

ब्लूम्सबरी (Bloomsbury) प्रकाशन समूह दिल्ली दंगों पर आधारित किताब Delhi Riots 2020: The Untold Story प्रकाशित करने वाला था। लेकिन इस्लामी और वामपंथियों के दबाव में आकर उसने किताब का प्रकाशन रोक दिया। अब इस किताब को गरुड़ प्रकाशन समूह प्रकाशित करेगा। इस किताब की लेखिका मोनिका अरोड़ा, सोनाली चितालकर और प्रेरणा मल्होत्रा हैं।

बीते दिन (22 अगस्त 2020) इस किताब के वर्चुअल विमोचन के दौरान ब्लूम्सबरी यूके मुख्यालय से दबाव बनाया गया। जिसके बाद प्रकाशन समूह ने अचानक ही किताब प्रकाशित करने से मना कर दिया था।  

किताब की लेखिका मोनिका अरोड़ा ने इस बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लोगों को भावना देखते हुए उन्होंने फैसला किया है कि गरुड़ प्रकाशन समूह के साथ जाएँगे। यह फ़िलहाल स्टार्टअप की तरह चल रहा है। लेखिका ने ब्लूम्सबरी प्रकाशन समूह को इस संबंध में मेल भी किया था। लेकिन वहाँ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद उन्होंने यह फैसला किया। मेल में उन्होंने साफ़ तौर पर पूछा कि क्या वह इस किताब का प्रकाशन रोक रहे हैं? वह इस बात को लिखित में दें लेकिन ब्लूम्सबरी ने फोन पर ही इस बात की जानकारी दी। यानी समझौता ख़त्म करने के लिए कोई लिखित कार्रवाई नहीं की गई।

किताब की लेखिका मोनिका अरोड़ा ने भी इस मुद्दे पर ट्वीट कर भी जानकारी दी। ट्वीट में उन्होंने लिखा “निवेदन के बाद हमसे से लिखित तौर पर कोई संवाद नहीं किया गया। हम अपनी किताब की हत्या नहीं कर सकते हैं, लोग इस किताब को खरीदना चाहते हैं। हमारे पास दूसरे प्रकाशन समूह को स्वीकार करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता है।”  

किताब की लेखिका का ट्वीट

इस बात की पुष्टि करते हुए गरुड़ प्रकाश ने भी ट्वीट किया। साथ ही उन्होंने किताब की लेखिका मोनिका अरोड़ा का आभार भी जताया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “दोस्तों! आप सभी के सहयोग के लिए धन्यवाद। आइए इस किताब को घर-घर तक पहुँचाते हैं।” इसके बाद प्रकाशन समूह ने ट्वीट करके यह जानकारी भी दी कि किताब हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषा में विमोचित की जाएगी। जल्द ही यह किताब उपलब्ध कराई जाएगी।  

उल्लेखनीय बात यह रही कि जैसे ही ब्लूम्सबरी ने किताब छापने से मना कर किया गरुड़ प्रकाशन समूह ने इसे प्रकाशित करने का प्रस्ताव दिया था।  

पूरी किताब The book of ‘Delhi Riots 2020: The Untold Story इसकी लेखिकाओं द्वारा की गई जाँच – पड़ताल और साक्षात्कार पर आधारित है। अगले महीने यह किताब प्रकाशित होनी थी। किताब की 100 प्रतियाँ लेखिका को उपलब्ध भी कराई जा चुकी थी। इसके अलावा किताब अमेज़न पर प्री ऑर्डर के लिए उपलब्ध भी थी। लेकिन जैसे ही लेखिकाओं ने भाजपा नेता कपिल मिश्रा की मौजूदगी में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए किताब विमोचन की बात कही, वैसे ही कॉन्ग्रेस समेत तमाम वामपंथी नेताओं ने इसके विरोध में अभियान चलना शुरू कर दिया।  

विलियम डेलरीमैपल जैसे वामपंथी इतिहासकारों की टीका टिप्पणी और आक्षेप के बाद ब्लूम्सबरी ने किताब प्रकाशित करने से मना कर दिया। ऐसा करने से पहले उन्होंने किताब की लेखिका को सूचित करना भी ज़रूरी नहीं समझा। गरुड़ प्रकाशन एक भारतीय प्रकाशन समूह है। इसकी शुरुआत संक्रांत सानू ने की थी और इसमें उनके साथ थे अंकुर पाठक। हाल ही में इस प्रकाशन समूह ने विवेक अग्निहोत्री की अर्बन नक्सल का प्रकाशन किया था।  

एटा में हिंदू दंपत्ति को ईसाई बनाने की कोशिश में लगा था दिल्ली का शख्स, गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश पुलिस ने रविवार (अगस्त 23, 2020) को एक शख्स को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने की कोशिश करने के आरोप में गिरफ्तार किया। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली का 30 वर्षीय मनदीप कुमार एटा में रह रहा था, जहाँ वह लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने की कोशिश कर रहा था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मनदीप कुमार ने शनिवार (अगस्त 22, 2020) को शिवसिंहपुर गाँव में हिंदू दंपती के घर पर उसे बाइबिल पढ़ाने की कोशिश की थी। आरोपित मनदीप कुमार पिछले एक महीने से अपनी पत्नी मार्गेट एंथोनी के साथ एटा में किराए के मकान पर रह रहा था।

जानकारी के मुताबिक मनदीप कुमार को शिवसिंहपुर गाँव में विनोद कुमार के घर जाते समय ग्रामीणों ने पकड़ लिया था। ग्रामीणों ने बताया कि वो मनदीप के भ्रमण के खिलाफ थे। उन्होंने विनोद को भी सलाह दी थी कि वो उसे अपने घर आने की अनुमति न दे। जैसे ही ग्रामीणों को पता चला कि मनदीप लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने की कोशिश कर रहा था, उन्होंने पुलिस को सूचित किया, जिसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस की एक टीम पूछताछ के लिए मनदीप को कोतवाली थाने ले आई। कोतवाली पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर (क्राइम) संजीव त्यागी ने कहा कि पूछताछ के दौरान, मनदीप सिंह ने स्वीकार किया है कि वह विनोद के परिवार को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने की कोशिश कर रहा था। वह एक ईसाई मिशनरी से जुड़ा है, और उसकी पत्नी मार्गेट एंथोनी भी ईसाई है।

पुलिस ने मनदीप सिंह के टारगेट विनोद से भी बात की। विनोद ने पुलिस को बताया कि वह मनदीप से प्रभावित होकर बाइबिल पढ़ रहा था। इसके साथ ही उसने ग्रामीणों के आरोपों की भी पुष्टि की।

मनदीप सिंह पर भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए के तहत मामला दर्ज किया गया है। गिरफ्तारी के बाद, मनदीप सिंह को स्थानीय अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। फिलहाल पुलिस मार्गेट एंथोनी की भी धर्मांतरण में भूमिका की जाँच कर रही है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों झारखंड के धनबाद शहर में धर्मांतरण का मामला सामने आया था। लोगों के पुनर्वास के नाम पर दो दर्जन परिवारों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बना दिया गया था। मामला सामने आने के बाद हिंदू संगठनों और स्थानीय लोगों ने इसका जमकर विरोध किया था और साथ ही प्रशासन को शिकायत भी की थी। स्थानीय लोगों ने यहाँ नवनिर्मित चर्च को घेर घंटों हंगामा किया। चर्च के ऊपर लगे धार्मिक चिन्ह (क्रॉस) को भी लोगों ने तोड़ दिया था।

एक थी रामगोपाल वर्मा की आग और एक है कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी, दोनों में बस धुआँ ही धुआँ है

​2007 में एक फिल्म आई थी। नाम था रामगोपाल वर्मा की आग। शोले से प्रेरित इस फिल्म पर बात करना वक्त और की बोर्ड के टिकटिक की बर्बादी ही है। फिर आप पूछेंगे कि मैंने इसका जिक्र क्यों किया?

असल में कॉन्ग्रेस में अध्यक्ष पद को लेकर जो कुछ चल रहा है उसे सहज तरीके से समझाने के लिए मुझे इस फिल्म से बेहतर कुछ नहीं मिला। जैसे उस फिल्म से बड़े नाम जुड़े थे पर जब पर्दा उठा तो धुआँ ही धुआँ था, वैसे ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर दिख रही रस्साकशी से जब भी पर्दा उठेगा तो गाँधी ही निकलेंगे। या तो कुर्सी पर बैठा गाँधी या फिर पर्दे के पीछे से कुर्सी को नचाता गाँधी। ठीक वैसे ही जैसे 2004-14 तक पीएम की कुर्सी नाचती रही।

यही कारण है कि एक तरफ सूत्रों ने यह खबर उड़ाई कि सोनिया गॉंधी ने अंतरिम अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है, अगले पल आधिकारिक तौर पर रणदीप सिंह सुरजेवाला ने आकर इसका खंडन कर दिया। वैसे, यह कोई नई बात नहीं है। ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब प्रियंका गाँधी ‘गैर गॉंधी अध्यक्ष’ वाले इंटरव्यू को लेकर चर्चा में थीं। फिर सुरजेवाला ने इसे साल भर पुरानी बात कह इसकी हवा निकाल दी।

क्या बिना इशारों के सुरजेवाला ने यह क्या होगा? क्या बिन इशारों के ही सूत्रों ने इस्तीफे की खबर उड़ा दी होगी?

सोमवार (24 अगस्त 2020) को कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की बैठक है। अप्रसांगिक हो चुकी कॉन्ग्रेस की इस बैठक को चर्चा में रखने के लिए पहले एक पत्र की बात सामने आई। पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं जिनमें 5 पूर्व में मुख्यमंत्री रह चुके हैं, के इस पत्र में पार्टी में बड़े बदलावों की पैरोकारी की गई। इसके बाद सूत्रों के हवाले से दिनभर मीडिया गिरोह दावे करती रही। कभी सोनिया के इस्तीफे की तो कभी दलित को पार्टी का अगला अध्यक्ष बनाने की।

पर आधिकारिक रूप से जो नेता सामने आए उन्होंने या तो सोनिया के इस्तीफे का खंडन किया या फिर यह कहा कि यदि सोनिया नहीं चाहतीं तो राहुल गाँधी को यह जिम्मेदारी सँभालनी चाहिए। ध्यान रखने की बात यह है कि पत्र लिखने वालों से लेकर सार्वजनिक तौर पर बयान देने वाले ये वही कॉन्ग्रेसी हैं, जो पिछले साल राहुल गाँधी के इस्तीफे बाद उनसे इसे वापस लेने की चिरौरी कर रहे थे। मान-मनौव्वल के बाद भी जब वे नहीं माने तो अध्यक्ष चुनने के नाम पर सोनिया गाँधी के तौर पर अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया। जबकि उस समय राहुल ने स्पष्ट शब्दों में परिवार के बाहर के किसी सदस्य को पार्टी का अध्यक्ष चुनने की पैरोकारी थी।

लेकिन, पूरी पार्टी ने ही इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। स्पष्ट है कि कॉन्ग्रेस में किसी को गैर गाँधी नहीं चाहिए। सबके निजी हित हैं और इसी से प्रेरित हो वे सक्रिय होते हैं। मसलन, मल्लिकार्जु्न खड़गे का राज्यसभा में होना गुलाम नबी आजाद से लेकर आनंद शर्मा तक के हित प्रभावित करता है। सो, आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि 23 नेताओं में आजाद का भी नाम है।

जवाहर लाल नेह​रू ने कहा था, “तेजी से बदलती दुनिया में दिमाग के जड़ हो जाने और मुगालते में रहने से ज्यादा खतरनाक कोई चीज नहीं है।” 2014 और 2019 के चुनावी सफाए ने कॉन्ग्रेस के दिमाग को ही जड़ नहीं किया है, बल्कि जमीन पर भी उसका जड़ साफ हो चुका है। पर चूॅंकि कॉन्ग्रेसियों से बेहतर मुगालते में रहने की कला कोई जानता नहीं तो समय-समय पर पार्टी-संगठन के नाम पर आपस में ही हुतूतू खेल वे जड़ की ओर लौट जाते हैं।

या जैसा कि प्रवीण झा लिखते हैं, “मेरे दफ्तर में एक बुजुर्ग हैं, लोग उम्र का सम्मान देते हैं और जब कभी उनको अपने सम्मान में कमी या फिर कोई खरोंच लगती तो वे कहने लगते- मैं छोड़ दूॅंगा सब, अपना देखे कंपनी! इससे थोड़े दिन के लिए फिर से लोग उनको भाव देने लगते।”

यह भाव पाने से ज्यादा परिवार के प्रति वफादारी साबित करने में बीस पड़ने का खेल है। मौका मिले तो मुखौटा बनने की रेस में सबसे आगे होने की दौड़ है।

नरेंद्र मोदी विरोध का इमरान खान को इनाम, ‘The Muslim 500’ ने दिया मैन ऑफ द ईयर का खिताब

जॉर्डन बेस्ड पब्लिकेशन, The Muslim 500 ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को ‘मैन ऑफ द ईयर’ घोषित किया है। विवादास्पद अमेरिकी कॉन्ग्रेस की सदस्य रशीदा तलीब को ‘वुमन ऑफ द ईयर’ का सम्मान दिया है। इसके अलावा, इमरान खान को दुनिया के 16वें सबसे प्रभावशाली मुस्लिम के रूप में भी नामित किया गया है।

रशीदा तलीब को पुरस्कृत करते हुए पब्लिकेशन ने कहा, “उन्होंने अपने पद की शपथ कुरान पर हाथ रखकर ली। यद्यपि वह अपना पहला कार्यकाल निभा रही हैं, लेकिन वह निश्चित रूप से सबसे अधिक लोकप्रिय सदस्यों में से एक हैं। खास तौर पर राष्ट्रपति ट्रम्प के कारण, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से उन पर और तीन अन्य कॉन्ग्रेस वुमन पर अमेरिका में नफरत फैलाने का आरोप लगाया और साथ ही कहा कि वे ‘जहाँ से आए थे, वहाँ वापस जाएँ’।”

इससे लगता है की रशीदा तलीब को मुख्य रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के विरोध के कारण सम्मानित किया गया है। पब्लिकेशन की तरफ से कहा गया है कि सितंबर 2019 में रशीदा ने ट्रंप के खिलाफ महाभियोग का आह्वान किया। उन्होंने भारी दबाव के सामने काफी जोश और गरिमा दिखाई है और इसने उन्हें दुनिया भर में एक प्रेरणा बना दिया है।

इसी तरह, इमरान खान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करने की वजह से पुरस्कार दिया गया प्रतीत होता है। भारत के साथ शांति स्थापित करने के उनके कथित प्रयासों की सराहना करते हुए, द मुस्लिम 500 ने कहा, “जैसा कि इमरान खान को पता है, यह वह भारत नहीं है, जो हम में से बहुत से लोग याद करते हैं और सोचते हैं। भारत के नाम पर हम महात्मा गाँधी, नेहरू के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस पार्टी या गाँधी परिवार और उनके दल के बारे में सुनते थे।”

आगे कहा गया, “भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री और उनकी सत्ताधारी पार्टी, जिसने कॉन्ग्रेस शासन को समाप्त कर दिया, उसे हिंदू वर्चस्ववादी आंदोलन- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने आकार दिया है। मोदी और उनके कई मंत्री इस आंदोलन के सदस्य बने हुए हैं, जिन्हें हिंदू धार्मिक फासीवाद के रूप में वर्णित किया जा सकता है।”

पब्लिकेशन ने कहा है कि इमरान खान ने ऐसे लोगों के साथ कोशिश की, जिनकी शांति में दिलचस्पी नहीं है। ऐसे में अब खान के प्रयासों पर वैश्विक राय बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, ताकि आरएसएस के नेतृत्व में भारत वैश्विक तौर पर अछूत बन सके।

‘मैं सीएम कैंडिडेट नहीं’: पूर्व CJI रंजन गोगोई ने असम में बीजेपी का चेहरा होने के दावों को किया खारिज

पूर्व न्यायाधीश रंजन गोगोई को लेकर विपक्ष ने दुष्प्रचार अभियान छेड़ रखा है। इसी कड़ी में आज दावा किया गया कि वे असम के अगले विधानसभा चुनावों में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। इंडिया टुडे से बातचीत में गोगोई ने इसका खंडन किया है। इससे पहले बीजेपी भी इन दावों को नकार चुकी है।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “मेरा कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है और न ही मैं चुनाव लड़ने की इच्छा रखता हूँ। किसी ने भी मुझसे इस तरह की संभावनाओं का ज़िक्र नहीं किया है।” इसके अलावा उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार करने का यह मतलब नहीं है कि वह राजनीति में शामिल होने वाले हैं। उन्होंने कहा कि सदन अपने विचार रखने का माध्यम है, यहाँ सदस्यों को अपनी बात कहने की पूरी स्वतंत्रता है। यही कारण था कि मैंने राज्यसभा का प्रस्ताव स्वीकार किया। इसका राजनीति या चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है।

दरअसल असम के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता तरुण गोगोई ने कहा था, “भाजपा राम मंदिर के फैसले की वजह से रंजन गोगोई से बहुत खुश है। नतीजतन मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें राज्यसभा के लिए निर्वाचित किया। वह (रंजन गोगोई) राज्यसभा के प्रस्ताव को ठुकरा भी सकते थे, लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति के लालच में ऐसा नहीं किया।”

इसके अलावा उन्होंने कहा था, “मैंने सूत्रों से सुना था कि भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की सूची में रंजन गोगोई का नाम सबसे आगे है। इस बात की पूरी उम्मीद है कि असम के आगामी विधानसभा चुनावों में पूर्व मुख्य न्यायाधीश भाजपा के मुख्यमंत्री प्रत्याशी हो सकते हैं।”

इनका जवाब देते हुए गोगोई ने कहा, “मैं अपनी मर्ज़ी से राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित किया गया हूँ। यह एक ज़रिया है लोकतांत्रिक मंच पर अपना नज़रिया रखने का और इसकी वजह से मैं नेता नहीं बन जाता हूँ।” उन्होंने कहा यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोगों को यह भी नहीं पता कि राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित होना और किसी राजनीतिक दल से चुने जाने पर सदन का सदस्य बनना अलग-अलग बात है।  

इससे पहले असम की भाजपा इकाई ने कॉन्ग्रेस नेता के दावों को मनगढ़ंत और झूठा बताया था। असम भाजपा के अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने कहा, “जब लोग बूढ़े हो जाते हैं तब वह इस तरह की निरर्थक बातें करने लगते हैं। हम तरुण गोगोई के बयान को इस श्रेणी में ही रखना चाहते हैं। मैं कई मुख्यमंत्रियों से पहले मिल चुका हूँ लेकिन तरुण गोगोई जैसी बेबुनियादी बातें कोई और नहीं करता है। उनकी इस बात में बिलकुल भी सच्चाई नहीं है। न जाने किस आधार पर उन्होंने इतना बड़ा दावा कर दिया।”    

गणपति की वे मूर्तियाँ… बहरीन में बुर्का वाली ने जिन्हें तोड़ा, दिव्य ने उन्हें घर में स्थापित कर किया विसर्जित

पिछले हफ्ते बहरीन के सुपरमार्केट में संप्रदाय विशेष की एक महिला का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो गणपति बप्पा की मूर्तियों को तोड़ रही थी। इससे हिंदू समुदाय में खासी नाराजगी देखने को मिली थी। ताजा जानकारी के मुताबिक भारतीय समुदाय के दिव्य पांडे ने उन विखंडित मूर्तियों का विसर्जन कर दिया है, जिसके वो हकदार थे।

ऑपइंडिया से बात करते हुए, दिव्य पांडे ने कहा कि वायरल वीडियो को देखने के बाद वे उसे अपने दिमाग से निकाल नहीं सके। वह कहते हैं, “यह चौंकाने वाला था, क्योंकि बहरीन अन्य धर्मों के सम्मान के मामले में बहुत खुले विचारों वाला है। बहरीन के लोग बहुत मिलनसार हैं। इसलिए बुर्का पहनी महिला ने जो कुछ किया वह देखना विचित्र था।”

दिव्य पांडे ने कहा कि वे किसी भी तरह से अपने घर पर गणपति की मूर्ति लाने की योजना बना रहे थे। इसलिए उन्होंने सुपरमार्केट को फोन किया और उन मूर्तियों को खरीदने की पेशकश की। उन्होंने कहा, “वे मूर्तियाँ स्थापना और विसर्जन की पात्र थीं। जब मैंने वीडियो देखा तो मैंने तुरंत सुपरमार्केट को पहचान लिया क्योंकि यह मेरी घर के बहुत पास है। मैंने वहाँ जाकर उनसे निवेदन किया कि मैं मूर्तियों की स्थापना और विसर्जन के लिए खरीदना चाहता हूँ। हालाँकि, कानूनी मामले के कारण, वे उन्हें मुझे देने में सक्षम नहीं थे।”

गणपति की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाते दिव्य पांडे

इसके बावजूद दिव्य पांडे लगातार कोशिशों में जुटे थे। गणेश चतुर्थी पर, उनके पास फोन आया कि चूँकि अब कानूनी कार्यवाही में सबूत के रूप में मूर्तियों की आवश्यकता नहीं है, इसलिए वह आकर उन्हें ले जा सकते हैं। दिव्य पांडे कहते हैं, “मैं इंतजार नहीं कर सकता था। मैं जल्दी से अपनी कार में बैठा और गणपति बप्पा को घर लाने के लिए चल पड़ा। उन्होंने कहा कि किसी को खंडित मूर्ति की स्थापना नहीं करनी चाहिए। हालाँकि मैं इसे खंडित मूर्ति नहीं मानता। क्योंकि उन्हें जान-बूझकर तोड़ा गया। मैं उन्हें घर ले आया, स्थापना किया, छोटी सी पूजा की और फिर विसर्जन के साथ गणपति बप्पा को अलविदा कहा।”

गौरतलब है कि पिछले हफ्ते सोशल मीडिया पर एक सुपरमार्केट में एक बुर्का पहने महिला की भगवान गणेश की मूर्तियों को तोड़ने का वीडियो वायरल हुआ था। कट्टरपंथी इस्लामवादियों ने ट्विटर पर मूर्तियों को तोड़ने वाली महिला की सराहना की थी। बाद में बहरीन पुलिस ने गणपति की मूर्तियों को तोड़ने वाली महिला के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 54 वर्षीय महिला पर एक समुदाय की धार्मिक भावनाओं और अनुष्ठानों का अपमान करने का आरोप लगाया गया है।

बहरीन के आंतरिक मंत्रालय ने कहा कि पुलिस ने एक दुकान को नुकसान पहुँचाने और एक संप्रदाय और उसके अनुष्ठानों को बदनाम करने के लिए महिला के खिलाफ कानूनी कदम उठाए हैं।

बाबू मोशाय ये ‘वामपंथी रसभरी’ है, हर मुद्दे पर ‘विशेषज्ञ’ बनती और फिर ट्रोल होती है

ट्विटर पर एक ट्रेंड चल रहा था देश की तथाकथित अभिनेत्री स्वरा भास्कर के नाम का! ट्विटर पर किसी हैशटैग के ट्रेंड करने की अमूमन दो ही वजहें होती हैं। पहला या तो कुछ बहुत अच्छा होता है या बहुत बुरा। दो दिन पहले यानी 21 अगस्त को एक वेब सीरीज़ आई ‘फ्लेश’ जिसमें स्वरा भास्कर ने मुख्य भूमिका निभाई है। तमाम लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि इस वेब सीरीज़ की चर्चा के चलते स्वरा भास्कर का नाम ट्रेंड कर रहा होगा।

लेकिन अफ़सोस ऐसा नहीं है। कम से से कम आभासी दुनिया की जनता यानी नेटीजन्स के ट्वीट देख कर ऐसा बिलकुल नहीं कहा जा सकता। एक ट्विटर यूज़र ने स्वरा भास्कर का ज़िक्र करते हुए ट्वीट किया है। हालॉंकि वह ट्वीट कम और मीम ज़्यादा है। इसका मतलब यह है कि स्वरा हर मुद्दे की विशेषज्ञ बन जाती है। भले मौसम हो या कुछ और। आप किसी भी मसले पर स्वरा की राय से वंचित नहीं रह सकते।

ऐसे कुछ और ट्वीट हैं जो स्वरा भास्कर को उनके अतिउत्साही रवैए के लिए अद्भुत तरीके से ट्रोल करते हैं। एक का तो कहना है कि स्वरा भास्कर भले कितनी बड़ी जानकार क्यों न हों, लेकिन लोगों को उनकी बातों में कोई रूचि ही नहीं है। लोगों को सुनना ही नहीं है कि स्वरा क्या कहना चाहती है।

यह ट्वीट कहने और सुनने के दायरे से बाहर है। इसे देख कर पूरी बात एक झटके में समझी जा सकती है।  

अब वापस लौटते हैं मूल प्रश्न पर, क्या वाकई स्वरा भास्कर हर मुद्दे पर विशेषज्ञ/एक्सपर्ट बन जाती हैं? यह सार्वभौमिक सत्य है कि एक इंसान (अगर वह इंसान है तो) सब कुछ नहीं जान सकता। लेकिन स्वरा भास्कर इसके उलट हैं। पिछले कुछ सालों की ऐसी तमाम घटनाएँ हैं। जिन्हें देखने-सुनने के बाद किसी के लिए भी समझना आसान होगा कि कैसे स्वरा भास्कर हर मुद्दे पर “मेरे को सब पता है” का नारा लगाने लगती हैं।

पहली घटना है इस साल के फरवरी महीने की। देश भर में सीएए और एनआरसी को लेकर बहस जारी थी। एबीपी न्यूज़ ने इस मुद्दे पर चर्चा कराने के लिए स्वरा भास्कर को बतौर पैनालिस्ट बुलाया। यहीं से सारा फसाद शुरू हुआ, स्वरा एक साँस में कहे जा रही थीं कि सीएए लागू हो गया है। इसके बाद एनआरसी भी लागू हो जाएगा, एनपीआर पर भी बहस शुरू हो ही गई है। इसके बाद पैनल की मॉडरेटर ने स्वरा भास्कर को टोका और साफ़ किया कि एनपीआर का नागरिकता से कोई लेना देना नहीं है, यह सीएए से पूरी तरह अलग है। एनपीआर का संबंध जनगणना से है और यह साल 2010 में भी हुआ था।

स्वरा भास्कर ने इतने के बाद में साँस नहीं ली। तब मॉडरेटर ने उनसे सवाल किया, “क्या आपने एनपीआर या एनआरसी का ड्राफ्ट पढ़ा है?” इस पर स्वरा फिर अपनी बात दोहराने लगीं कि इस सरकार ने लोगों पर सब कुछ थोपा है। यहाँ तक कि स्वरा ने सीएए से जुड़े सवालों का जवाब तक नहीं दिया। जिस क़ानून के विरोध में किए गए हर बड़े आयोजन में पूरी सक्रियता के साथ नज़र आई थीं।  

समय में थोड़ा और पीछे चलते हैं खुद के पैर पर अतिउत्साह की कुल्हाड़ी मारने की दूसरी घटना की ओर। हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्वरा भास्कर का एक वीडियो वायरल हुआ। वीडियो में स्वरा ने एक बार फिर एक साँस में कहा “मेरे पास जन्म-प्रमाण पत्र नहीं है, बाप-दादा की ज़मीन के कोई कागज़ नहीं हैं। मेरा नाम छूट गया एनआरसी से तब।” वीडियो के दूसरे हिस्से में स्वरा की बातों का जवाब दिया सद्गुरु ने।  

उन्होंने कहा यह सभी के लिए है, हम सभी को अपना पंजीयन कराना पड़ेगा। इसके लिए सरकार ने विकल्प दिए हैं आप अपना जन्म-प्रमाण पत्र दिखाइए। वह नहीं है तो स्कूल के दस्तावेज़ दिखाइए। वह भी नहीं है तो अपना राशन कार्ड दिखाइए अगर किन्हीं कारणों से वह भी नहीं है तो मतदाता पहचान-पत्र दिखाइए। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजी में कहा अगर आपके पास यह भी नहीं है “then who the hell are you।” 

स्वरा भास्कर की ट्रोलिंग सिर्फ आभासी दुनिया यांनी सोशल मीडिया तक नहीं सीमित है। अक्सर जनता उन्हें आमने-सामने भी ट्रोल कर देती है। बात है साल 2019 के मई महीने की जिस दौरान स्वरा भास्कर बेगूसराय से चुनाव लड़ रहे कन्हैया कुमार का समर्थन करने गई थीं। वह हवाई अड्डे पर पहुँची कि तभी एक युवक उनके नज़दीक आया। स्वरा को लगा कि वह सेल्फी लेना चाहता है लेकिन उसने छोटा सा वीडियो बनाया। और वीडियो में कहा चाहे जितना बोल लो “आएगा तो मोदी ही।” फिर क्या था? ट्विटर से लेकर फेसबुक तक और फेसबुक से लेकर इन्स्टाग्राम तक हर जगह वीडियो वायरल हुआ।  

19 जून 2020 को स्वरा भास्कर की एक वेब सीरीज़ आई थी ‘रसभरी’। नाम से अंदाजा लगाया जाता है इसमें क्या कुछ होगा या कहें क्या कुछ हो सकता है। इस वेब सीरीज़ की तारीफ़ करते हुए स्वरा भास्कर के पिता जी ने एक ट्वीट किया। उन्होंने अपने ट्वीट में कहा, चाहे छोटा पर्दा हो या बड़ा पर्दा। स्वरा का बहुआयामी अभिनय हर जगह उम्दा है। स्वरा ने जवाब दिया “लेकिन आप यह वेब सीरीज़ मेरे साथ बैठ कर मत देखिएगा।” 

एक बार फिर ट्विटर पर स्वरा की ट्रोलिंग शुरू हो गई। एक व्यक्ति ने तो यहाँ तक लिख दिया “जब इतनी बुरी एक्टिंग करती हो कि पिता जी को भी देखने में शर्म आ जाए। तो अभिनय छोड़ क्यों नहीं देती हो? कम से कम दर्शक तो प्रताड़ित होने से बच जाएँगे।” बाकी इस वेब सीरीज़ को रेटिंग भी कुछ ऐसी ही मिली थी कि नेटीजन्स न चाहते हुए भी ऐसी बातें कहने के लिए मजबूर हो जाते हैं।  

यह तो कुछ मौके थे जिनका ब्यौरा मौजूद है। इसके अलावा ऐसे न जाने कितने किस्से और मौके होंगे जब स्वरा भास्कर को यूँ ही ट्रोल किया जाता होगा। या स्वरा भास्कर के नाम का हैशटैग ट्विटर पर ट्रेंड करता होगा, जिसकी वजह कुछ ऐसी ही होती होगी। इस बात से भले कौन असहमत हो सकता है कि एक इंसान सब कुछ नहीं जान सकता है। भले देश के संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है।  

लेकिन उसका मतलब यह नहीं कि सामाजिक राजनीतिक मुद्दों को बिना जाने उनके बारे में कुछ भी कहा जाए। विरोध देश के लोकतंत्र का सबसे सकारात्मक पहलू है। यानी लोकतंत्र में विशेषज्ञ बनना भी आसान है लेकिन बिना तर्क, तथ्य और दलीलों के विरोध करना या विशेषज्ञ बनने का क्या अर्थ? खैर ट्रोलिंग जारी है और इसकी रफ़्तार से इतना साफ़ है कि यह जारी रहेगी। आखिर हर मुद्दे पर विशेषज्ञ बनने की कोई न कोई कीमत तो होगी ही।