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रायपुर: 9 साल की बच्ची से मदरसे के मौलवी ने किया बलात्कार, अरबी पढ़ाने आता था पीड़िता के घर

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक मदरसे में पढ़ाने वाले 25 साल के मौलवी को 9 साल की बच्ची के साथ बलात्कार करने का आरोप में गिरफ्तार किया गया है। ख़बरों के मुताबिक़ घटना रविवार (9 अगस्त 2020) की है।

पुलिस अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक़ आरोपित का नाम मौलाना अरशद रहमानी है। रायपुर शहर के खमारडीह थाना क्षेत्र में शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने अरशद रहमानी को गिरफ्तार किया। पुलिस ने बताया कि आरोपित मौलाना रहमानी पंडरी क्षेत्र के मदरसे में शिक्षक है। वह बच्ची और उसकी बहन को अरबी पढ़ाने उनके घर जाता था। आरोपित मौलाना पिछले 15 दिनों से अरबी पढ़ाने बच्ची के घर जा रहा था। रविवार के दिन उसने बच्ची को अकेला देख कर उसके साथ बलात्कार किया।   

9 साल की बच्ची ने इस घटना की जानकारी अपने घर वालों को दी। उन्होंने इस मामले में पुलिस से शिकायत दर्ज कराई। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने आरोपित मौलाना अरशद रहमानी को गिरफ्तार किया। मौलाना पर भारतीय दं संहिता की धारा 376 (बलात्कार), 506 (आपराधिक धमकी) और यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।   

पुलिस ने घटना के बारे में यह भी बताया कि आरोपित मौलाना अरशद मूल रूप से भिलाई का रहने वाला है। लेकिन पिछले लगभग 3-4 सालों से रायपुर स्थित मदरसे में रह रहा था। पुलिस ने कहा है कि इसके पहले भी मौलाना पर छेड़छाड़ के आरोप लग चुके हैं।

पिछले ही महीने भी इस तरह की एक घटना सामने आई थी। गुजरात के कच्छ जिले में एक मदरसा शिक्षक मौलाना समसुद्दीन हाजी सुलेमान जाट को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। आरोपों के मुताबिक़ मदरसा शिक्षक ने चार साल तक एक छात्रा के साथ कथित रूप से बलात्कार किया था।

ऐसे ही झारखंड के रांची में मदरसे में पढ़ने वाली 12 साल की एक बच्ची से रेप का मामला सामने आया था। आरोपित मौलाना शाहिद था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शाहिद ने बच्ची से कई बार रेप किया था। जब वह गर्भवती हो गई तो उसका जबरन गर्भपात करा दिया गया। जिस मदरसे में यह घटना हुई है वहॉं 100 से अधिक बच्चियॉं तालीम ले रही थीं। मामला सामने आने के बाद लोग अपनी बच्चियों को वापस घर बुला लिया था। इसके बाद पुलिस ने आरोपित मौलाना को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।

Maulana raped minor girl in raipur he used to teach arabic language in madarsa

आत्मनिर्भरता की रीति में बनी नई शिक्षा नीति

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को मँजूरी मिल चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट ने इस नीति को मँजूरी देते हुए कहा कि यह विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में “परिवर्तनकारी सुधार” का मार्ग प्रशस्त करेगा।

पिछले दिनों कुछ अंतरराष्ट्रीय अखबारों में खबर छपी थी कि इस नीति का विवादास्पद निर्णय यह है कि प्राथमिक स्कूल, चाहे वह निजी हों या सार्वजनिक, बच्चों को “मूल भाषा” या “क्षेत्रीय भाषा” में शिक्षित करने की आवश्यकता होनी चाहिए, ना कि अंग्रेजी में।

इस निर्णय को विवादास्पद बताते हुए वहाँ यह तर्क दिया गया है, “उच्च शिक्षा, रोजगार और अंतरराष्ट्रीय अवसरों के विस्तार के लिए अंग्रेजी भाषा की दक्षता को महत्वपूर्ण माना जाता है।” उनके द्वारा दिए गए तर्क के कुछ गूढ़ निहितार्थ हैं। जिसका सीधा संबंध देश की शिक्षण-अधिगम व्यवस्था में छिपी अंग्रेजी मानसिकता की निर्भरता को बरकरार रखने से है ना कि आत्मनिर्भर भारतीय गौरव के प्रफुल्लित और उन्मुक्त होने से।

आज का भारत नया भारत है। हमारा देश बहुभाषी है। हमारे देश में जितनी भाषाएँ एकल भारतीय संस्कृति और सभ्यता को वहन करती हैं उतनी तो बाकी पूरे विश्व की भाषाएँ पृथक निवास करती हैं। इतिहास साक्षी है कि उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में औपनिवेशिकता या किसी एक विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए जिस मानव मूल्यों पर सर्वप्रथम प्रहार किया गया, वह थी भाषा।

औपनिवेशिकता जहाँ समाज को गुलामी की जंजीरों में कैद कर देती है, वहीं विचारधारा संस्कृति के मूल्यों को बाँध लेती है। बात स्पष्ट है कि समाज में किसी भी रूप में परिवर्तन कराना हो तो भाषा को पकड़ो।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में कहीं भी इस बात का बिल्कुल ही जिक्र नहीं है कि अंग्रेजी को एकदम हटाया जाए। इस नीति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो भी विदेशी भाषा है, उसको विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाया जाए। कक्षा पाँच तक कोई भी बालक/ बालिका अंग्रेजी को पढ़कर अंतरर्राष्ट्रीय रोजगार के लिए नहीं जाता है ना ही हमारे देश में यह सिस्टम शुरू है कि कक्षा पाँच तक अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर नौकरी दी जाए।

रोजगार के लिए भी एक उम्र निर्धारित है। उस उम्र से पहले आप रोजगार नहीं कर सकते। इस नीति में दिए गए त्रि-भाषा फार्मूला से एक बात सत्य है और वह यह है कि बालक का संज्ञानात्मक और मनौवैज्ञानिक विकास के साथ-साथ संरचनात्मक देशज विकास हो।

यह सर्वविदित है कि अंग्रेजी भाषा के विद्यालय पारंपरिक रूप से अमीर भारतीय परिवारों के पक्षधर रहे हैं। अब ‘सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विकास’ की बात पूरे देश में गूँजायमान है । भाषा इसकी प्रमुख कड़ी है। आप इस बात का खुद अंदाजा लगा लीजिए कि एक मुहल्ले में रहने वाले बच्चों के बीच शाम को जब एक बच्चा उड़िया या अपनी मातृभाषा में बोले और दूसरा अंग्रेजी में तो बाल मनोविज्ञान पर क्या असर पड़ेगा।

इस नीति की आत्मा साफ है। त्रि-भाषा फॉर्मूला ना केवल हमें आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि उस गौरवमयी ऐतिहासिक संस्कृति का भी साक्षात्कार करने का मौका देगा जिसकी वैज्ञानिकता और उसको संवहन करने वाली मानव सभ्यता का प्राकृतिक स्वरूप आज भी अंग्रेजी भाषियों के लिए कॉपीराइट के रूप में जीविका चलाने तक सीमित हैं।

अगले दशक में भारत सबसे अधिक युवा संपन्न देश होगा। इस आधार पर नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में प्रत्यक्ष रूप से एक बात तय कर दी गई है कि ‘मैं भी आत्मनिर्भर हूँ’ का आत्मसंबल प्रत्येक युवा को प्रेरित करेगा। जिस गरीब वंचित और पिछड़े लोगों की केवल बात अब तक की जाती रही है, वो सबसे अधिक आँगनबाड़ी या प्राथमिक विद्यालयों से ही शिक्षित होने का प्रयास करते रहे हैं।

इस नई शिक्षा नीति में जो प्रमुख बातें विद्यमान हैं, उनमें– विद्यालय स्तर पर 2025 तक पूर्व प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण करना, मध्याह्न भोजन को पूर्ण रूप से विस्तारित करना, आँगनबाड़ी केंद्रों को और अधिक मजबूत करना, प्री-स्कूलिंग से ही सभी के लिए मूलभूत साक्षरता जिसमें विशेष रूप से भाषा और गणित गुणवत्ता शिक्षण-अधिगम पर अधिक ध्यान देना, ‘चलो स्कूल चलें’ जैसी तैयारी के लिए विशेष मॉड्यूल बनाना। एक महत्वपूर्ण, बात जो कि आज भी सबसे भयावह स्वरूप में है कि शिक्षक-बालक अनुपात को 1:30 से भी कम करना और विशेष रूप से शिक्षा अधिकार को ग्रेड-12 तक बढ़ाने की बात को लक्षित किया गया है।

पूरे देश में प्रत्येक बच्चे के लिए एकसमान और समावेशी शिक्षा का प्रावधान किया गया है, जिसमें विशेषकर शैक्षिक संरचना को लचीला और एकीकृत पाठ्यक्रम एवम् मूल्यांकन को समावेशी और प्रौद्यौगिकी सुलभ किए जाने का प्रावधान है। पाठ्यक्रम के राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा को सभी भाषाओं में सर्वसुलभ करवाया जाएगा।

पाठ्यचर्चा में वैज्ञानिक स्वभाव, नैतिक तर्क, भाषा प्रगाढ़ता, डिजिटल साक्षरता एवं अन्य विषयो को समावेशित की जाने की बात कही गई है। केवल यही नहीं, महिला, ट्रांसजेंडर, सीखने में कमजोर और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए, संप्रदाय विशेष और अन्य शैक्षिक रूप से अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहित करने के लिए हस्तक्षेप की बात की गई है।

कुछ विशेष रणनीतियाँ बनाई गई हैं, जिनमें प्रमुख हैं- राष्ट्रीय छात्रवृत्ति कोष, वंचित जिलों में विशेष शिक्षा क्षेत्र बनाना, कमजोर जिलों को वित्तपोषण और अन्य सहायता प्रदान कराना, कम प्रतिनिधित्व वाले समूहों के शिक्षकों की भर्ती, शहर में रहने वाले गरीबों पर ध्यान देना इत्यादि। इस आधार पर चलते हुए 2030 तक सभी विद्यालयों में सकल नामांकन अनुपात को शत प्रतिशत या यूँ बोलें कि पूर्ण करना रखा गया है।

उच्चतर शिक्षण-प्रशिक्षण व्यवस्था में संस्थागत पुनर्गठन और उनका समेकन करना शामिल है। अर्थात लगभग पंद्रह हजार बड़े और बहुविषयक संस्थानों में आठ सौ विश्वविद्यालयों और चालीस हजार महाविद्यालयों को एकीकृत कर दिया जाएगा। इनका वितरण मिशन नालंदा और मिशन तक्षशिला के आधार पर किया जाएगा।

मिशन तक्षशिला के द्वारा 2030 तक हर जिले में कम से कम एक उच्चतर शिक्षण संस्थान और मिशन नालंदा के तहत समान क्षेत्रीय वितरण के साथ पूरे देश में 2030 तक 100 टाइप-1 और 200 टाइप-2 के उच्चतर शिक्षण संस्थान व्यवस्थापित किए जाएँगे।

उच्चतर शिक्षण संरचना में उच्च गुणवत्ता के साथ उदार शिक्षा की बात की गई है। प्रभावी शिक्षण माध्यम के आधार पर सीखने के अनुभवों को उभारना, शिक्षा का अंतरराष्ट्रीय करण सुगम करना, प्रौद्यौगिकी का अभीष्टतम प्रयोग करना, इसके लिए एक स्वायत्त निकाय राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्यौगिकी फोरम का निर्माण करना, मुक्त और दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा देना आदि बातों का समावेश है।

शिक्षण वातावरण इस प्रकार पैदा किया जाएगा, जिससे देश में वंचित समूहों को सुगमता से शैक्षिक पहुँच प्राप्त हो सके। कई निकास विकल्पों के साथ चार और पाँच साल का एकीकृत स्नातक और परास्नातक कार्यक्रम होगा, जिसमें प्रथम वर्ष पूर्ण होने पर- सर्टिफिकेट, द्वितीय वर्ष- डिप्लोमा, तृतीय वर्ष- डिग्री, चतुर्थ वर्ष -डिग्री (ऑनर्स), पंचम वर्ष -स्नातकोत्तर की डिग्री दी जाएगी।

इनमें विषयों का चुनाव मेजर और माइनर के रूप में होगा। इसमें मेजर रूप में मुख्य विषय और माइनर रूप में वैकल्पिक विषय होंगे। एमफिल डिग्री को समाप्त कर दिया गया है। इस नीति के द्वारा अध्ययन के विषयों का रचनात्मक संयोजन इस प्रकार किया जाएगा कि स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट की शिक्षा अनुसंधान आधारित विशेषज्ञता प्रदान करे।

उच्चतर शिक्षा प्रणाली के अभिन्न अंग के रूप में व्यावसायिक शिक्षा को और अधिक विकसित किया जाएगा। इस उच्चतर शिक्षा के क्रियान्वयन, शासन और विनियमन के लिए राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक प्राधिकरण, उच्च शिक्षा अनुदान परिषद (यूजीसी का परिवर्तित और परिवर्धित स्वरूप), व्यावसायिक मानक सेटिंग बॉडीज, राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद, सामान्य शिक्षा परिषद एवं अन्य परिषदों, नियामक, प्राधिकरण, विनियमन शासन की व्यवस्था या तो परिवर्धित होगी नहीं तो नए स्वरूप से की जाएगी।

अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन की स्थापना की जाएगी जिसमें कम से कम बीस हजार करोड़ का वार्षिक अनुदान सरकार की तरफ से दिया जाएगा जो उत्तरोत्तर रूप से प्रत्येक दशक में बढ़ता रहेगा। इसका प्रमुख उद्देश्य सामाजिक विज्ञान, कला और मानविकी, प्रौद्यौगिकी और विज्ञान जैसे विषयों में अनुसंधान को प्रोत्साहित कर उसकी क्षमता को बढ़ावा देना, गुणवत्ता में उत्तरोत्तर वृद्धि करना आदि विषय शामिल हैं।

सार्वजनिक सर्वसुलभ शिक्षा के आधार पर शिक्षक शिक्षण-प्रशिक्षण व्यवस्था को बड़े ही गंभीरता से लिया गया है। विद्यालयी शिक्षा के रूप में शिक्षण व्यवस्था को चार वर्षीय पाठ्यक्रम में बदल दिया गया है। उच्चतर शिक्षण व्यवस्था को परिणाम आधारित बनाया जाएगा। इस शिक्षण व्यवस्था में और अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान विषयों को बढ़ावा दिया जाएगा।

कुल मिलाकर कहा जाए तो इस नई शिक्षा नीति-2020 में जितने भी मानक तय किए गए हैं उनमें शिष्य-शिक्षक-व्यवस्था तीनों ही अंगों के प्रत्येक पहलुओं को बहुत ही विस्तृत ढंग से सहआधारित और विकासोन्मुखी बताने का प्रयास किया गया है। विगत पाँच वर्षों में जिस अमृत को निचोड़कर नई शिक्षा नीति के रूप में देश के सम्मुख लाया गया है, उसके समुचित क्रियान्वयन को लेकर हम आशान्वित हैं।

(लेखक डॉ. संदीप कुमार पाण्डेय, रूसी अध्ययन संस्थान, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं)

‘हरामियों को देखो, मस्जिद सिंगर और एक्टर के जाने की जगह नहीं’: सबा कमर पर टूटे मजहबी कट्टरपंथी

पाकिस्तानी अभिनेत्री सबा कमर अपने एक डांस वीडियो की वजह से इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गई हैं। इस वीडियो का कुछ हिस्सा मस्जिद में शूट किया गया है। इसके बाद उन पर मामला दर्ज करने की माँग उठाई जा रही है। वीडियो में सबा कमर के साथ बिलाल सईद भी हैं।

यह वीडियो पाकिस्तान के लाहौर स्थित वजीर खान मस्जिद के भीतर शूट किया गया है। वीडियो के चर्चा में आने बाद बड़े पैमाने पर इसकी आलोचना होने लगी। लोगों का आरोप है कि इस डांस वीडियो की वजह से मस्जिद नापाक हो गई है। कट्टरपंथियों का कहना है इसके लिए अभिनेत्री सबा कमर और बिलाल सईद जिम्मेदार हैं। सबा कमर को निशाने पर लेते हुए जावेद इकबाल नाम के यूजर ने लिखा है कि मस्जिद एक्टर और सिंगर के जाने की जगह नहीं है।

साभार – ट्विटर
साभार – ट्विटर

घटना के सुर्ख़ियों में आने के बाद Punjab Auqaf & Religious Affairs Department ने वजीर खान मस्जिद के प्रबंधक को निलंबित कर दिया है। इसके अलावा सवाल भी किया है कि मस्जिद में यह सब करने की इजाज़त किसने दी? उन्होंने इस मामले की जाँच के आदेश भी दिए हैं। ज़िम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की बात कही है।

अभिनेत्री सबा कमर ने इस घटनाक्रम पर ट्वीट कर अपनी बात कही है। उन्होंने लिखा है, “हम यहाँ निकाह का वीडियो शूट कर रहे थे। शूट के दौरान पृष्ठभूमि में कोई संगीत नहीं बज रहा था।” इसके बाद उन्होंने लिखा, “BTS का वीडियो, कबूल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। हमने इस वीडियो का पोस्टर लेने के लिए मस्जिद के अंदर स्टिल लिए थे। इसमें निकाह के बाद खुश जोड़े को दिखाया गया है। इसके बावजूद हमने अगर किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाया है तो इसके लिए माफ़ी चाहते हैं। कबूल 11 अगस्त को रिलीज़ हो रही है।” 

बिलाल सईद ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा है, “मुझे अंदाजा है कि बीते दिनों में हमसे क्या हुआ और इससे आप लोगों को कितना ठेस पहुँचा है। हम लोग कलाकार भी हैं। इसलिए हम इस्लाम या किसी दूसरे धर्म, जाति और समूह का अपमान नहीं कर सकते हैं। अगर हमारी इस हरकत की वजह से किसी की भावनाओं को ठेस पहुँची है तो हम उसके लिए दिल से माफ़ी चाहते हैं।”

वीडियो शूट करने वाली कंपनी ने भी अपनी तरफ से मामले पर सफाई दी है। कंपनी ने आधिकारिक बयान में कहा हमने वीडियो शूट करने के लिए पहले इजाज़त ली थी। हमने इसके पहले भी इजाज़त लेकर मस्जिद में वीडियो शूट किया है।

मस्जिद के प्रबंधक का कहना है कि वीडियो में जो डांस नज़र आ रहा है वह मस्जिद के अंदर नहीं किया गया था। वीडियो में बदलाव करके उसे सोशल मीडिया पर डाला गया है जो कि शूटिंग से पहले का है।   

सबा कमर पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री में मशहूर अभिनेत्री हैं। बॉलीवुड में उन्होंने हिंदी मीडियम फिल्म से शुरुआत की थी। इस फिल्म में उनके साथ मुख्य अभिनेता की भूमिका दिवंगत इरफ़ान खान ने निभाई थी। सबा कमर ने ‘मैं औरत हूँ’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी, यह काफी चर्चा में भी रहा था। लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा नाम दिलाया ‘धूप में अंधेरा है’ और ‘जिन्नाह के नाम से’।  ‘मात’ धारावाहिक के लिए भी उन्हें खूब सराहना मिली थी। इसके अलावा उन्हें अपने अभिनय के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं।   

सुप्रीम कोर्ट को प्रशांत भूषण की माफी कबूल नहीं, 11 साल पहले कहा था- पिछले 16 चीफ जस्टिस में आधे करप्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (अगस्त 10, 2020) को वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ 2009 का आपराधिक अवमानना मामला खारिज करने से इनकार कर दिया। 11 साल पुराने इस केस में कोर्ट ने प्रशांत भूषण की स्पष्टीकरण और खेद मँजूर करने से इनकार कर दिया है।

बता दें कि यह केस प्रशांत भूषण की ओर से तहलका पत्रिका को दिए गए इंटरव्यू को लेकर है। इसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि भारत के पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में से आधे भ्रष्ट थे। तरुण तेजपाल उस समय तहलका पत्रिका के संपादक थे। मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त को होगी।

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की तीन सदस्यीय पीठ प्रशांत भूषण की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने अदालत से 2009 के अपने बयान के लिए “खेद” स्वीकार करने का अनुरोध किया। उन्होंने अदालत में एक लिखित बयान दिया जिसमें कहा गया कि उनके कहने का मतलब भ्रष्टाचार नहीं था, बल्कि सही तरीके से कर्तव्य न निभाने की बात थी। अदालत ने याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि अवमानना के मामले में आगे सुनवाई की जरूरत है। 

इस मामले की पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि फ्री स्पीच और कंटेम्प्ट के बीच बहुत बारीक लाइन है। अब मुद्दा ये है कि सिस्टम के सम्मान को बचाते हुए यह मामला कैसे निपटाया जाए?

कोर्ट ने प्रशांत भूषण के वकील राजीव धवन से कहा कि आप ही रास्ता बताइए। क्या आप इस तरह की अनाप-शनाप बातों को रोकने का तरीका बता सकते हैं? जवाब में धवन ने कहा कि प्रशांत भूषण पहले ही सफाई दे चुके हैं।

भूषण ने इस संबंध में शीर्ष अदालत में अपना स्पष्टीकरण पेश किया है, जबकि तहलका के संपादक तरुण तेजपाल ने माफी माँगी है। अदालत ने कहा कि वह इस मामले में विचार करेगा कि न्यायाधीशों के बारे में भ्रष्टाचार की टिप्पणी असल में अवमानना है या नहीं।

चार अगस्त को, शीर्ष अदालत ने भूषण और तेजपाल को स्पष्ट किया था कि वह मामले में अगर उनका स्पष्टीकरण या माफी स्वीकार नहीं करती है तो वह सुनवाई करेगी। वहीं, इससे पहले सुनवाई में भूषण ने 2009 में दिए अपने बयान पर खेद जताया था, लेकिन बिना शर्त माफी नहीं माँगी थी। 

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (जुलाई 21, 2020) को स्वत: संज्ञान लेते हुए प्रशांत भूषण के खिलाफ अदालत की अवमानना का केस दर्ज किया था। अपने ट्वीट में प्रशांत भूषण ने कहा था, “जब भविष्य में इतिहासकार वापस मुड़कर देखेंगे कि किस तरह से पिछले 6 वर्षों में औपचारिक आपातकाल के बिना ही भारत में लोकतंत्र को नष्ट किया गया है, तो वे विशेष रूप से इस विनाश में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका को चिह्नित करेंगे, और पिछले 4 CJI की भूमिका को और भी अधिक विशेष रूप से।”

22 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशांत भूषण को नोटिस जारी कर पूछा था कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए।

‘इसी महीने बीजेपी में शामिल हो सकते हैं शरद पवार के 12 MLA’: महाराष्ट्र के मंत्री नवाब मलिक ने बताया अफवाह

महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (एनसीपी) के 12 विधायक बीजेपी के संपर्क में हैं। वे इस महीने के अंत तक पार्टी का दामन थाम सकते हैं। यह दावा रिपब्लिक टीवी ने किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक इन विधायकों में से अधिकतर पश्चिमी महाराष्ट्र से हैं और बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में हैं।

रिपब्लिक टीवी को सूत्रों ने बताया कि एनसीपी के ये विधायक, महाविकास आघाड़ी सरकार के कामकाज के तरीके से खुश नहीं हैं। उन्हें अभी भी उन बातों को लेकर सुनाया जाता है, जब उन्होंने 2019 में महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम और पार्टी के वरिष्ठ नेता अजित पवार का समर्थन कर भाजपा साथ मिलकर अल्पकालिक सरकार बनाई थी।

बता दें कि पिछले महीने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने विपक्ष को सरकार गिराने की चुनौती दी थी। उन्होंने कहा था कि जिस किसी को उनकी सरकार गिरानी हो वो आज ही ऐसा कर सकते है। साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि उनकी सरकार तीन पहियों की रिक्शा है और ये वो गरीबों का है जिसकी स्टेयरिंग उनके हाथों मे है।

उन्होंने कहा था कि उनके गठबंधन के साथी, एनसीपी और कॉन्ग्रेस “सकारात्मक” हैं और महाविकास आघाड़ी (एमवीए) सरकार उनके अनुभव से लाभान्वित हो रही है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने ये बातें शिवसेना के मुखपत्र सामना को दिए एक इंटरव्यू में कही थी।

हालाँकि राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के 12 विधायकों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की खबरों को पार्टी के प्रवक्ता और उद्धव सरकार में मंत्री नवाब मालिक ने अफवाह और मनगढ़ंत बताया है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा के कई विधायक उनकी पार्टी के टच में हैं और वे भाजपा छोड़ एनसीपी में आना चाहते हैं।

एनसीपी नेता ने ट्वीट करते हुए कहा, “कुछ लोग 12 एनसीपी विधायकों के बीजेपी में जाने की अफवाह फैला रहे हैं। यह बेबुनियाद और मनगढ़ंत खबर है। चुनाव से पहले बीजेपी में गए विधायक एनसीपी में लौटने के लिए आतुर हैं, लेकिन इस पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। जल्द फैसला कर जानकारी सार्वजनिक की जाएगी।”

बता दें कि अक्टूबर, 2019 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी-शिवसेना के गठबंधन ने चुनाव में स्‍पष्‍ट बहुमत हासिल किया था। लेकिन इसके बावजूद इस गठबंधन की सरकार नहीं बन सकी थी। मुख्‍यमंत्री किस पार्टी का हो, इसे लेकर बीजेपी और शिवसेना में गंभीर मतभेद उभर आए थे, इसके फलस्‍वरूप शिवसेना ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया था।

इसके बाद एनसीपी नेता अजित पवार ने अपने चाचा और पार्टी प्रमुख शरद पवार के खिलाफ बगावती तेवर दिखाते हुए भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देकर गुपचुप तरीके से सरकार बना ली थी। बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस सीएम और अजित पवार डिप्टी सीएम बने थे। हालाँकि, यह सरकार सिर्फ 80 घंटे चली और दोनों को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा था।

बुर्के वाली औरतों की टीम तैयार की गई थी, DU के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने दंगों का दिया था मैसेज: गुलफिशा ने उगले राज

दिल्ली दंगों के मामले में गिरफ्तार गुलफिशा उर्फ गुल से पूछताछ में कई खुलासे हुए हैं। दिल्ली पुलिस की स्पेशल का कहना है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के प्रोफेसर अपूर्वानंद भी हिंसा की साजिश में शामिल थे। हिंसा भड़काने के लिए बुर्के वाली महिलाओं की टीम तैयार की गई थी।

दिल्ली पुलिस के मुताबिक डीयू के प्रोफेसर अपूर्वानंद भी दिल्ली हिंसा की साजिश का हिस्सा थे। जी न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली दंगों में UAPA एक्ट में गिरफ्तार आरोपित जाफराबाद की गुलफिशा उर्फ गुल ने पुलिस को दिए बयान में यह खुलासा किया है।

पुलिस का कहना है कि गुलफिशा ने उन्हें बताया है, “प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा था कि हिंसा की साजिश के लिए तैयार रहो।” हिंसा के बाद प्रोफेसर अपूर्वानंद ने गुलफिशा की तारीफ की थी।

गुलफिशा ने बताया, “हिंसा के बाद अपूर्वानंद ने मुझसे कहा था कि तुमने अच्छा काम किया है। लेकिन पकड़े जाने पर मेरा और पिंजड़ा तोड़ की सदस्यों का नाम मत लेना। प्रोफेसर ने हमे दंगों के लिए मैसेज दिया था। पत्थर, खाली बोतलें, एसिड, छुरियाँ इकठ्ठा करने के लिए कहा गया था। सभी महिलाओं को लाल मिर्च पाउडर रखने के लिए बोला था।”

गुल ने बताया कि प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी (JCC) दिल्ली में 20-25 जगह पर आंदोलन शुरू कर करवा रही है। इन आंदोलन का मकसद भारत सरकार की छवि को ऐसे पेश करना है जैसे ये खास मजहब के खिलाफ है। ये तभी होगा जब हम प्रदर्शन की आड़ में दंगे करवाएँगे।

गुल ने आगे बताया, “हम खुफिया जगह पर मीटिंग करते थे जिसमें प्रोफेसर अपूर्वानंद, उमर खालिद और अन्य मेंबर शामिल होते थे। उमर खालिद ने कहा था कि उसके PFI और JCC से अच्छे रिश्ते हैं। पैसों की कमी नहीं है। हम इनकी मदद से मोदी सरकार को उखाड़ फेंकेगे। उमर खालिद, प्रोफेसर अपूर्वानंद को अब्बा समान मानता है।”  

जानकारी के मुताबिक गुलफिशा ने हिंसा के लिए 2 व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए थे, जिनका नाम- औरतों का इंकलाब और वॉरियर था। गुलफिशा ने बताया कि साजिश के तहत वो खुद बुर्के वाली महिलाओं और बच्चों को गली-गली जाकर CAA और NRC के खिलाफ इस कदर भड़काती थी कि महिलाएँ प्रोटेस्ट में आने के लिए राजी हो जाती थीं। महिलाओं और बच्चों को प्रदर्शन में जोड़ने की वजह ये होती थी कि पुलिस महिलाओं और बच्चों को जबरन नहीं उठाएगी, जैसे शाहीन बाग में हो रहा था।

गुलफिशा के मुताबिक, उसकी दोस्ती डीयू के पिंजड़ा तोड़ ग्रुप की सदस्य देवांगना और परोमा राय से भी हुई थी। इनके जरिए गुल की मुलाकात अपूर्वानंद से हुई थी। गुलफिशा ने आगे बताया, “फ्रूट मंडी सीलमपुर में प्रदर्शन शुरू होने के बाद JCC के सदस्य हमें हर तरह से मदद करते थे और सफूरा और मिरान हैदर हमारे और दूसरे प्रदर्शन को को-ऑर्डिनेट करते थे। उमर खालिद भी हमें पैसों से मदद करते थे और भीड़ को भड़काऊ भाषण देते थे जिससे लोग धरने में जुड़े रहते थे।”

गुलफिशा ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि 22 फरवरी को चक्का जाम करने की साजिश के तहत महिलाओं को इकट्ठा कर कैंडल मार्च के बहाने हम निकले और जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे बैठ गए और रोड ब्लॉक कर दिया गया। जिसके बाद 24, 25, 26 फरवरी को जबरदस्त हिंसा हुई थी।

गुलफिशा ने अपने बयान में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे का भी जिक्र किया है। गुलफिशा ने कहा, “ट्रंप दौरे को ध्यान में रखते हुए। चाँद बाग रोड का भी ‘चक्का जाम’ व्हाट्सऐप पर पोस्ट किया गया। इसको भी प्रोफेसर अपूर्वानंद मॉनिटर कर रहे थे। इसका मकसद था कि चक्का जाम करने से हिन्दू फँस जाएँगे। वहाँ लोग गुस्से में आ जाएँगे। फिर पथराव करा देंगे। फिर भारत की हर जगह छवि खराब हो जाएगी।”

बता दें कि 4 अगस्त 2020 को दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने डीयू के प्रोफेसर अपूर्वानंद को पूछताछ के लिए बुलाया था। करीब 5 घंटे तक पूछताछ की गई थी। पुलिस ने प्रोफेसर का मोबाइल भी जाँच के लिए जब्त कर लिया था।

पूछताछ के बाद प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा था ”मैं जाँच में सहयोग कर रहा हूँ। विरोध-प्रदर्शन करना सभी का मौलिक अधिकार है। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों का समर्थन करने वालों को दंगे स्रोत बताना चिंताजनक है।”

रायबरेली की MLA अदिति सिंह ने CM योगी को बताया राजनीतिक गुरु, कभी गाँधी परिवार की थीं खास

कॉन्ग्रेस की बागी विधायक अदिति सिंह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपना राजनीतिक गुरु बताया है। अदिति हाल में पार्टी विरोधी स्टैंड को लेकर चर्चा में रही हैं।

एक जमीन से कब्जा छुड़वाने पहुँचीं अदिति सिंह ने यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ की जमकर तारीफ की और उनके आगे ही योगी जिंदाबाद के नारे भी जमकर लगाए गए।

सोमवार (अगस्त 10, 2020) को अदिति सिंह रायबरेली के सिविल लाइन चौराहे पर पहुँची थीं। वह कमला नेहरू ट्रस्ट की जमीन पर काबिज पटरी दुकानदारों को हटाए जाने का विरोध कर रही थीं। पुलिस का कहना था कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद जमीन खाली कराई जा रही है, लेकिन वह मानने को तैयार नहीं थीं। वह खुलकर दुकानदारों के पक्ष में उतर आईं।

विधायक अदिति सिंह ने सबके सामने सीएम योगी की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा, “मैं खुले मुँह से कहना चाहती हूँ कि गरीबों की जो दुकानें बची हैं वह मेरे राजनीतिक गुरु और हमारे माननीय मुख्यमंत्री महाराज योगी आदित्यनाथ की वजह से है। उनकी वजह से हम यह लड़ाई लड़ रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि गरीबों को योगी सरकार में प्रताड़ित नहीं किया जाएगा। चाहे कुछ सोसायटी या भूमाफिया लोग कितनी भी कोशिश कर लें। आप कितने लोगों को पैसे खिलाएँगे? योगी सरकार गरीबों के साथ है। अदिति सिंह के बयान पर जमकर योगी आदित्नयाथ जिंदाबाद के नारे लगे।

अदिति सिंह ने कहा कि जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संज्ञान में यह मामला आया तो उन्होंने मामले की जाँच कराने का भरोसा दिया है। उन्होंने कहा कि इस पूरे प्रकरण को जब मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाया गया तब उन्होंने त्वरित कार्रवाई का आश्वासन देते हुए भरोसा दिया है कि अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।

इस दौरान उन्होंने कमला नेहरू ट्रस्ट पर निशाना साधते हुए कहा कि जब जमीन पर कई दशक से ये दुकानदार काबिज है तो ट्रस्ट के पक्ष में ये जमीन कैसे फ्री होल्ड हो गई।

गाँधी परिवार की करीबी रहीं अदिति सिंह को बीते दिनों पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया गया था। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली की सदर सीट से विधायक अदिति सिंह की सदस्यता समाप्त करने को लेकर कॉन्ग्रेस ने विधानसभा अध्यक्ष के पास याचिका दायर की थी। जिसे उन्होंने खारिज कर दिया।

गौरतलब है कि विधायक अदिति सिंह ने उत्तर प्रदेश में श्रमिकों के बसों के लिए हो रही राजनीति पर सवाल उठाया था। अपनी ही पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए पूछा था कि कोरोना आपदा के समय इतनी ‘ओछी राजनीति’ करने की क्या आवश्यकता थी? 

अदिति सिंह ने ट्वीट कर लिखा था, “आपदा के वक्त ऐसी निम्न सियासत की क्या जरूरत, एक हजार बसों की सूची भेजी, उसमें भी आधी से ज्यादा बसों का फर्जीवाड़ा। 297 कबाड़ बसें, 98 ऑटो रिक्शा व एबुंलेंस जैसी गाड़ियाँ, 68 वाहन बिना कागजात के, ये कैसा क्रूर मजाक है। अगर बसें थीं तो राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र में क्यूँ नहीं लगाई।”

पिछले दिनों ये खबरें भी आईं थीं कि अदिति सिंह को कॉन्ग्रेस ने महिला विंग के महासचिव पद से हटा दिया है। राष्ट्रपति महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती के मौके पर आयोजित विधानसभा के विशेष सत्र का कॉन्ग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने बहिष्कार किया था। मगर कॉन्ग्रेस के बहिष्कार के बावजूद अदिति सिंह ने सदन में पहुँच कर सभी को चौंका दिया था। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटाने का भी समर्थन किया था।

स्टार किड्स की फिल्में नहीं देखो, किसी ने जबर्दस्ती किया है: नेपोटिज्म पर बहस को करीना कपूर ने बताया अजीब

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से बॉलीवुड में नेपोटिज्म का मुद्दा चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में इस मसले पर करीना कपूर ने भी अपनी राय रखी थी। इसकी वजह से वह आलोचना का शिकार हो रही हैं।

करीना ने बरखा दत्त के साथ बातचीत में नेपोटिज्म पर चर्चा को अजीब बताया है। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि उन्हें किसी भी प्रकार का विशेष फायदा स्टार किड होने के नाते मिला।

इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर करीना कपूर ट्रेंड करने लगीं और लोग उन्हें अपने-अपने तरह से बताने लगे कि कैसे एक स्टार किड होने के नाते ही वह अब तक बॉलीवुड में बनी हुई हैं।

बरखा के यूट्यूब चैनल मोजो स्टोरी पर अपलोड इस इंटरव्यू में करीना कपूर ‘बरादरी प्रोजेक्ट’ पर बात करते हुए उन कारीगरों पर चर्चा कर रही थीं जिनके काम को फैशन क्षेत्र के केंद्र में लाने के लिए नम्रता जकारिया नामक पत्रकार ने इस प्रोजेक्ट को शुरू किया है।

वीडियो लगभग 27 मिनट का है। मगर इस वीडियो 18 मिनट के स्लॉट के आसपास बरखा दत्त करीना कपूर के सामने नेपोटिज्म पर सवाल करती हैं। इसके बाद करीना कहती हैं कि दरअसल लोग स्थिति को समझना नहीं चाहते हैं। वह बस हमलावर रहते हैं। चाहे कोई किसी भी बैकग्राउंड से आता है। उनकी मानें तो यह उनका संघर्ष है जो आज वो बॉलीवुड के नामी सितारों में गिनी जाती हैं। वरना कौन इस इंडस्ट्री में 2 दशक बिता पाता है।

वह कहती हैं, “21 साल तक काम में बने रहना मुझे नहीं लगता नेपोटिज्म से मुमकिन हो पाता है। ये मुमकिन नहीं है। मैं लंबी लिस्ट बता सकती हूँ ऐसे लोगों की जिनके लिए यह आसान नहीं था।”

नेपोटिज्म को उचित ठहराते हुए वह डॉक्टर के बच्चे का उदहारण देती हैं और कहती हैं कि एक डॉक्टर का लड़का भी चाहता है कि वह डॉक्टर बने। इसके बाद बरखा दत्त भी भाई-भतीजावाद को उचित ठहराने के लिए कहती हैं कि वह एक पत्रकार की बेटी हैं और वह भी कई लोगो को जानती हैं जिनके बच्चे भी उसकी प्रोफेशन में हैं। लेकिन उन पर ऐसे हमले नहीं होते।

करीना अपनी बात को बढ़ाते हुए कहती हैं कि उन्हें लगता है स्टार किड्स लोगों के लिए बहुत आसान टारगेट होते हैं। वे इन सबके समाधान के रूप में कहती हैं कि हमें बस काम करते रहना चाहिए। उनका मानना है कि उन्हें नहीं लगता कि उन्हें कुछ भी उनके बैकग्राउंड के कारण मिला। उनकी पहचान बनाने में उनका संघर्ष था। हाँ ये बात और है कि उनका स्ट्रगल उतना दिलचस्प नहीं था जितना कि किसी बाहरी का होता है, जो ट्रेन से जेब में 10 रुपए लेकर आता है। वह कहती हैं कि किसी का संघर्ष दिलचस्प हो सकता है लेकिन उनके पास भी उनकी कहानी है। उनका मानना है कि किसी पर ऊँगली उठाना काफी खराब बात है।

सबसे हैरानी की बात इस पूरी बातचीत में ये होती है कि जब करीना आगे इस बारे में बात करती हैं तो वह नेपोटिज्म के लिए जिम्मेदार दर्शकों को ठहरा देती हैं। वह कहती हैं,”दर्शकों ने ही हमें बनाया है। किसी और ने नहीं बनाया। यही लोग ऊँगली उठा रहे हैं। जिन्होंने स्टार्स के बच्चों को स्टार बनाया। आप जा रहे हो न फिल्म देखने? मत जाओ। किसी ने आपको जबरदस्ती किया है। मैं नहीं समझ पाती। मुझे तो यह चर्चा ही अजीब लगती है।”

वह अक्षय कुमार, शाहरूख खान, आयुष्मान खुराना और राजकुमार राव का उदहारण देकर कहती हैं कि यह सब बाहरी हैं। लेकिन आज सफल इसलिए हैं क्योंकि इन्होंने मेहनत की। ऐसे ही आलिया हो या करीना कपूर, सबने मेहनत की। लोग फिल्म देखते हैं और इंजॉय करते हैं। इसलिए ये दर्शक ही होते हैं जो कलाकार को बनाते हैं और बिगाड़ते हैं।

गौरतलब है कि इस मुद्दे पर चर्चा करने के बाद एक हफ्ते के भीतर करीना कपूर सोशल मीडिया पर ट्रोल हो रही हैं। लोग कह रहे हैं कि उनकी आने वाली मूवी कोई मत देखो, क्योंकि वह खुद कह रही हैं कि दर्शक उनकी फिल्म न देखने जाएँ।

लोग उनकी पुरानी तस्वीरें शेयर कर रहे हैं जिसमें उन्होंने कठुआ को लेकर अपने हिंदू होने पर शर्म व्यक्त की थी। इसके अलावा कुछ लोग उनके फिल्मों की कमाई को शेयर कर कह रहे हैं कि करीना को ऐसे दावे करने से पहले कि दर्शक ही उन लोगों को बनाते-बिगाड़ते हैं, एक बार अपनी पिक्चरों की कमाई देखने की जरूरत है। अगर वाकई उन्हें दर्शकों ने बनाया होता तो कभी फिल्में फ्लॉप नहीं होतीं।

किसी ने उन्हें नेपो क्वीन कहा तो किसी ने उनकी मूवी न देखने की अपील की। एक यूजर ने उन्हें एक्टिंग में जीरो बताते हुए यह पूछा कि आखिर लोग इन्हें ट्रेंड ही क्यों करवा रहे हैं। इन्होंने ही एक इंटरव्यू में कहा था कि सारा अली खान को अपनी पहली फिल्म के एक्टर को डेट नहीं करना चाहिए।

संप्रदाय विशेष के लिए हो अलग निर्वाचन समूह, संसद में मिले आरक्षण: आकार पटेल की संविधान विरोधी माँग, जिन्ना का समर्थन

मानवतावादी संस्था के रूप में खुद को प्रचारित करने वाले ‘एमनेस्टी इंडिया’ के प्रमुख रह चुके आकार पटेल ने संप्रदाय विशेष के लोगों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की माँग की है। उन्होंने पाकिस्तान के स्थापना का भी बचाव किया और मुहम्मद अली जिन्ना के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया। उन्होंने ट्विटर पर कहा कि संप्रदाय विशेष के लोगों के लिए अब संसद से लेकर अन्य प्रतिनिधित्व समूहों में अपने लिए अलग जगह माँगने का वक्त आ गया है।

आकार पटेल ने विभाजन के असली कारणों को छिपाते हुए दावा किया कि कॉन्ग्रेस ने संप्रदाय विशेष के लोगों के लिए अनुपात के आधार पर प्रतिनिधित्व देने से इनकार कर दिया था, इसलिए पाकिस्तान का गठन हुआ। उन्होंने कहा कि अब स्वतंत्र भारत ने जिन्ना के डर को सही साबित कर दिया है। साथ ही आकार पटेल संप्रदाय विशेष के लोगों के लिए अलग इस्लामिक स्टेट की माँग करते हुए इसके लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराने से भी नहीं चूके।

उन्होंने आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात करते हुए कहा की हर एक जनप्रतिनिधियों के समूह में संप्रदाय विशेष के लोगों के लिए एक निश्चित संख्या में सीटें आरक्षित होनी चाहिए। कुछ लोगों ने इसका अर्थ ये भी निकाला की सेना से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक में संप्रदाय विशेष के लोगों को आरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये सबसे काम है जो हम संप्रदाय विशेष के लोगों के लिए कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दू राष्ट्र इस माँग को नहीं ठुकरा सकता, क्योंकि ये वैध है।

हिंदुओं के कत्लेआम के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की बात करने वाले मुहम्मद अली जिन्ना का बचाव करते हुए आकर पटेल ने कहा कि वो दक्षिणी मुंबई में रहने वाले गुजराती थे, जो आम भारतीयों से कहीं ज्यादा शहरी थे। नरेंद्र मोदी को संविधान के खिलाफ काम करने वाला प्रधानमंत्री कहने वाले आकार पटेल इस दौरान ये भी भूल गए कि वो जो कह रहे हैं, उसे संविधान सभा पहले ही ठुकरा चुका है।

मुहम्मद इस्माइल ने कहा था कि संप्रदाय विशेष के लोगों को जब तक अलग निर्वाचन क्षेत्र नहीं मिलता और उन्हें इस तरह का प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, तब तक उनके साथ न तो न्याय हो सकता है और न ही वो जगह मिल सकती है, जिसके लिए वो इच्छुक हैं। आरके सिधवा ने तब कहा था अगर वो अब भी ऐसा सोचते हैं तो फिर वो आज भी न सिर्फ टू नेशन थ्योरी में विश्वास रख रहे हैं, बल्कि सांप्रदायिकता को भी बढ़ावा दे रहे हैं।

उन्होंने ये भी बताया था कि ये सिस्टम भारत में क्यों काम नहीं करेगा। उन्होंने कहा था कि छोटे देशों में ये चल सकता है, लेकिन यहाँ नहीं। ये एक ऐसा सिस्टम है जिसे बुद्धिजीवी वर्ग ही समझ सकता है। उन्होंने गिनाया था कि बेल्जियम और स्विट्जरलैंड में कुछ लाख ही जनसंख्या है, जबकि भारत में 40 करोड़ है और यहाँ के संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों में ही लाख तक जनसंख्या होती है।

यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरू भी इस तरह के आरक्षण के खिलाफ थे और उन्होंने कहा था कि एक लोकतंत्र में इस तरह की व्यवस्था इसके विरुद्ध ही हो जाएगी। उन्होंने कहा कि जब एक राजनीतिक लोकतंत्र में ऐसा किया जा रहा है तो इसका अर्थ है कि आप उस अल्पसंख्यक समुदाय को अलग-थलग कर रहे हो। उन्होंने कहा था कि इसका अर्थ यह हुआ कि उनमें हमारा विश्वास नहीं है।

आकार पटेल इससे कोरोना पीड़ित अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गजों के लिए नफ़रत फैला चुके हैं। पटेल के मुताबिक़ यह 3 हस्तियाँ साबित करती हैं कि ‘पैसे से क्लास नहीं आता।’ अपनी विकृत मानसिकता का प्रदर्शन करते हुए आकार ने तीनों को ‘मिडिल क्लास ऑपोरच्युनिस्ट’ (मध्यमवर्गीय अवसरवादी) भी कहा था। कहा था कि यह छोटे ही रहने वाले हैं, इनकी मानसिकता कुएँ के मेढक जैसी ही है।’

IAS से नेता बने शाह फैसल का पॉलिटिक्स डेढ़ साल में ही बंद, शेहला रशीद ने भी छोड़ दिया था साथ

आईएएस अधिकारी से नेता बने शाह फैसल ने पॉलिटिक्स से तौबा कर ली है। जम्मू-कश्मीर में उनकी सियासी दुकान करीब डेढ़ साल ही चली। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वे दोबारा नौकरशाही का हिस्सा बन सकते हैं।

शाह फैसल प्रतिष्ठित परीक्षा पास करने वाले पहले कश्मीरी थे। 2019 की शुरुआत में उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी। इसके बाद मार्च 2019 में जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (JKPM) का गठन किया। जेएनयू की पूर्व छात्र नेता शेहला रशीद भी उनके साथ थीं।

बीते साल अक्टूबर में शेहला ने भी राजनीति से किनारा करते हुए पार्टी छोड़ दी थी। अब फैसल ने भी JKPM के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है।

JKPM के वरिष्ठ नेता फ़िरोज़ पीरज़ादा ने उनके इस्तीफे की पुष्टि की है। साथ ही बताया है कि अब पार्टी की सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी गई है।

ख़बरों की मानें तो इस बात के आसार हैं कि शाह फैसल फिर से प्रशासन में शामिल हो सकते हैं। हालॉंकि शुरुआत से ही फैसल का रवैया सरकार विरोधी रहा है। ऐसे में दोबारा उनके प्रशासन का हिस्सा बनने की खबर कई सवाल खड़े करती है।

रविवार के दिन शाह फैसल ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से JKPM का ज़िक्र हटा दिया है। फ़िरोज़ पीरज़ादा ने बताया, “हम नहीं जानते कि वह क्या करेंगे। वह इस बारे में अक्सर बात करते थे कि वह अमेरिका जाकर आगे की पढ़ाई करना चाहते हैं। ख़बरें यह भी आ रही हैं कि वह प्रशासन में फिर से शामिल होंगे। इसलिए अभी हमारे पास इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है।”    

साल 2018 में शाह फैसल पढ़ाई के लिए हार्वर्ड, अमेरिका में गए थे। वापस आने के बाद उन्होंने अपना राजनीतिक दल बनाने का फैसला लिया था। इसके बाद साल 2019 में फैसल ने जम्मू कश्मीर पीपल्स मूवमेंट JKPM नाम का राजनीतिक दल शुरू किया था। लेकिन राज्य से विशेष राज्य का दर्जा हटाए जाने के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। साल 2019 के अगस्त महीने में शाह फैसल को दिल्ली एयरपोर्ट से हिरासत में लेकर कश्मीर में नजरबंद किया गया था। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर 14 अगस्त को शाह फैसल दिल्ली में नहीं रोके गए होते तो वह इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) में भारत के खिलाफ मामला दर्ज करा चुके होते। वह घाटी में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ याचिका दायर करने की तैयारी में थे।

इसके पहले रायटर्स के एक पत्रकार देवज्योत घोषाल ने शाह फैसल के बारे में हैरान कर देने वाला दावा किया था।देवज्योत के मुताबिक़ उन्हें शाह फैसल ने बताया था कि सैटेलाइट टीवी से लोगों को सरकार के निर्णय की ख़बर मिल चुकी थी। इस दौरान फैसल ने कहा था कि सुरक्षा कम होते ही कश्मीर भभक उठेगा, क्योंकि लोग ख़ुद को छला महसूस कर रहे हैं।

फैसल ने 2016 में भी इस्तीफा देने की धमकी भी दी थी। उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया पर आरोपों की झड़ी लगाते हुए कहा था कि बुरहान वानी से उनकी उनकी तुलना कर उनके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार किया जा रहा है। इसके अलावा इस साल जुलाई में उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का भी समर्थन किया था। इमरान ख़ान का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा था कि वो तो शांति की प्रक्रिया स्थापित करना चाहते हैं, लेकिन भारत में ही ऐसे लोग हैं जो ये होना नहीं देना चाहते। उन्होंने इमरान को बदलाव लाने वाला नेता भी बताया था।