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राम जन्मभूमि पर जमीयत ने उगला जहर, कहा- हिंदुओं को मंदिर के लिए कहीं और 5 एकड़ जमीन देता सुप्रीम कोर्ट

राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद से ही कई मजहबी संगठन और उसके नेता सवाल उठा रहे हैं। इसमें जमीयत उलेमा-ए-हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और एआईएमआईएम प्रमुख तथा हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी अगुआ हैं। जमीयत ने एक बार फिर जहर उगलते हुए कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को मुस्लिमों की बजाए हिंदुओं को मंदिर बनाने के लिए अलग से जगह देनी चाहिए थी।

शीर्ष अदालत ने दशकों से चल रहे इस विवाद का निपटारा करते हुए 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने विवादित जमीन रामलला को सौंपते हुए मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार को तीन महीने में ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया था। साथ ही, दूसरे पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने के भी निर्देश दिए थे।

ज्यादातर तबकों ने इस फैसले का स्वागत किया। बाबरी मस्जिद के मुख्य पक्षकार इकबाल अंसारी भी इनमें हैं। लेकिन, ओवैसी ने फैसले के बाद कहा कि मुस्लिमों को 5 एकड़ जमीन नहीं चाहिए। जमीयत और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की बात भी कही है। बीते दिनों जमीयत के प्रमुख अरशद मदनी ने कहा था कि उन्हें मालूम है कि समीक्षा याचिका खारिज हो जाएगी। इसके बावजूद वे इसे दाखिल करेंगे।

अब मौलाना मदनी ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले में, सभी सबूत बाईं ओर इशारा करते हैं, जबकि फैसला दाईं ओर जाता है। कोर्ट यह स्वीकार करता है कि मुस्लिमों ने 1857 से 1949 तक वहाँ नमाज अदा की। इस बात को माना गया कि 1934 में मस्जिद को नुकसान पहुँचाया गया था और इसके लिए हिंदुओं पर जुर्माना भी लगाया गया था। यह भी स्वीकार किया गया कि 1949 में वहाँ मूर्तियों की स्थापना गलत थी। साथ ही 1992 में मस्जिद के विध्वंस को भी गैर कानूनी करार दिया।” मदनी ने कहा कि कोर्ट ने यह भी नहीं कहा कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। लेकिन, फैसले में जमीन उन लोगों को दे दी जिन्होंने मस्जिद तोड़ी थी।

यहाँ पर हम आपको बता दें कि सैयद अरशद मदनी ने जो कुछ कहा है, उसमें कई त्रुटियाँ हैं।

1. कोर्ट ने कहा कि मस्जिद के नीचे की संरचना ‘गैर-इस्लामी’ थी। कोई भी यह नहीं बता सकता कि वो संरचना किस चीज की थी। कोई भी आदमी अपने होश में यह नहीं बता पाएगा कि वह पब था या शॉपिंग मॉल।

2. यह निर्णय स्वीकार करता है कि दूसरे पक्ष ने भी 1857 से 1949 तक नमाज़ अदा की लेकिन अदालत ने यह भी माना है कि यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि 1528 ई से 1857 तक वहाँ नमाज़ अदा की जाती थी। यह वक्फ बोर्ड के वकील द्वारा भी स्वीकार किया गया है।

3. SC का फैसला यह भी कहता है, 1856-57 में, अयोध्या में हिंदुओं और दूसरे समुदाय के बीच हुए दंगों के कारण, तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रांगण में एक रेलिंग स्थापित की। जिसके परिणामस्वरूप प्रांगन का विभाजन हुआ। हिंदुओं ने रामचबूतरा, सीता रसोई और अन्य धार्मिक संरचनाओं के बाहरी प्रांगण में स्थापित होने का सबूत दिया। इसके अलावा अदालत ने कहा कि द्विभाजन का मतलब यह नहीं था कि हिंदुओं ने राम जन्मभूमि पर अपना अधिकार छोड़ दिया।

4. कोर्ट ने कहा कि विध्वंस अवैध था। हालाँकि, यह एक अलग मामला है। यह जमीन के लिए एक टाइटल विवाद था और विध्वंस का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

बता दें कि मदनी ने भ्रामक और झूठे तर्क देने के बाद बाद यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 का दुरुपयोग किया है। इसके साथ ही मौलाना ने कहा कि वो अपनी समीक्षा याचिका में तर्क दे रहे हैं कि वैकल्पिक भूमि हिंदुओं को दी जानी चाहिए।

इससे पहले मौलाना अरशद मदनी ने कहा था कि एक बार एक मस्जिद का निर्माण हो जाने के बाद वह हमेशा एक मस्जिद ही रहता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दूसरे पक्ष को दी गई 5 एकड़ जमीन को भी खारिज कर दिया था। पहले मुस्लिम पक्षकारों को मस्जिद के लिए 5 एकड़ राम जन्मभूमि के 67 एकड़ जमीन के भीतर चाहिए था, मगर अब उनकी ये माँग हिंदुओं को वैकल्पिक 5 एकड़ जमीन देने पर स्थानांतरित हो गई है।

गौरतलब है कि जमीयत वही संगठन है जिसने हिंदुवादी नेता कमलेश तिवारी के हत्यारों को मदद की पेशकश की थी। हिंदू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी की 18 अक्टूबर को निर्मम हत्या कर दी गई थी।

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FACT CHECK: क्लिप दिखा यूपी पुलिस को बताया बर्बर, पूरा वीडियो सामने आया तो किसान सरपट भागा

उत्तरप्रदेश के उन्नाव में रविवार को जमीन मुआवजे की माँग कर रहे किसानों द्वारा हिंसात्मक रवैया अपनाने के बाद सोशल मीडिया पर उन्नाव पुलिस का एक वीडियो वायरल हुआ है। इस वीडियो में एक किसान खेत में पड़ा हुआ है और उसके इर्द-गिर्द भारी संख्या में पुलिस फोर्स लाठी लिए खड़ी है। थोड़ी देर में वीडियो में दिखता है कि एक पुलिस वाला किसान के पास आया और उसे लाठी मारकर उठाने का प्रयास करता है। लेकिन किसान की हालत ऐसी लगती है जैसे वह उठ भी नहीं सकता हो।

22 सेकेंड की इस वीडियो के इंटरनेट पर पहुँचने के बाद ये सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से शेयर की जाने लगी। बिना सच्चाई जाने उन्नाव पुलिस को बर्बर कहा जाने लगा। खुद समाजवादी पार्टी के नेता अनुराग भदौरिया ने इसे सोमवार को शेयर किया और बताया कि कैसे यूपी पुलिस किसानों पर अत्याचार करती है।

इसके बाद टाइम्स के पत्रकार पीयूष राय ने भी इस वीडियो को शेयर किया और लिखा कि पुलिस को लाठी हिंसात्मक भीड़ पर काबू पाने के लिए इस्तेमाल करनी चाहिए, लेकिन वह ऐसे शख्स पर लाठी चार्ज कर रही है, जो पहले ही बेहोश है। पीयूष ने वीडियो को विचलित करने वाला बताया।

साथ ही कंचन श्रीवास्तव नाम की पत्रकार ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा क्या कोई यकीन कर सकता है कि यह वीडियो राम राज्य का है और कई अधिकारी जिसकी सेवा कर रहे हैं वह अन्नदाता है?

कपिल सिब्बल के बंद हो चुके न्यूज चैनल तिरंगा टीवी के पत्रकार रहे सैफ उल्लाह खान ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा कि मुआवजा माँग रहे किसानों का उपचार।

वीडियो वायरल होने के साथ ही मामला तूल पकड़ने लगा और उन्नाव पुलिस सवालों के घेरे में आ गई। इसके बाद यूपी पुलिस ने इस घटना का पूरा वीडियो जारी किया। बताया कि जो वीडियो वायरल हुआ है वह इसका सिर्फ एक हिस्सा है।

उन्नाव पुलिस द्वारा जारी वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस द्वारा ‘पीटा गया’ किसान करीब 14 सेकेंड तक जमीन पर पड़ा रहता है। फिर अचानक से उठता है और भागने लगता है। जिससे वहाँ वीडियो बना रहे लोग भी हैरान हो जाते हैं और उसे देखने लगते हैं। लोगों के जेहन में सवाल आता है कि जमीन पर पड़ा युवक एक दम ठीक कैसे हो गया।

जाहिर है वह युवक केवल हठ में वहाँ लेटा हुआ था और पुलिस के कहने पर भी अपनी जगह से नहीं उठ रहा था। लेकिन मीडिया और राजनेताओं ने उन्नाव पुलिस को ऐसे दिखाया जैसे उनकी बर्बता के कारण युवक की हालत गंभीर हो गई। पुलिस ने बताया है कि वह पत्थरबाजी कर रहे लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने पहुँचे थी।

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24 साल में 250 बच्चों का यौन शोषण, रेप करने के बाद डायरी में स्कोर लिखता था डॉक्टर

फ्रांस में एक रिटायर्ड सर्जन द्वारा 250 से ज्यादा बच्चों का यौन शोषण किए जाने का मामला सामने आया है। इस सर्जन का नाम जोई ली स्कारनेक है। वह चार लड़कियों के यौन शोषण के आरोप में मई 2017 से जेल में बंद है। फ्रांसीसी अभियोजकों के अनुसार उसके खिलाफ नए मामले मिले हैं। अभियोजकों ने इसे फ्रांस के इतिहास का यौन शोषण का सबसे बड़ा मामला बताया है।

स्कारनेक के खिलाफ अब तक करीब 209 बच्चों की गवाही हो चुकी है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सर्जन ने जिन बच्चों को अपनी हैवानियत का शिकार बनाया उनमे 181 नाबालिग हैं। 184 बच्चे ऐसे भी हैं जो यौन-उत्पीड़न की इस त्रासदी पर अब कुछ भी कहने से बच रहे हैं। उन्होंने अपने और से लगाए गए आरोपों को वापस लेने की इच्छा जताई है।

स्कारनेक के खिलाफ जाँच की शुरुआत 1989 से लेकर 2017 के बीच चार लड़कियों के यौन उत्पीड़न से शुरू हुई थी। उसके खिलाफ 15 साल से कम उम्र के व्यक्ति के साथ दबाव बनाकर शारीरिक सम्बन्ध बनाने (यानी बलात्कार) का केस दर्ज हुआ था। इस मामले का फैसला 2020 की शुरुआत में अपेक्षित है। मामले की जाँच जब समाप्त होने की और थी तब पुलिस को इस डॉक्टर की एक सीक्रेट डायरी हाथ लगी थी। इसके बाद जाँच में एक बार फिर तेज़ी आ गई। इस डायरी की मदद से एकाएक कई मामले सामने आने लगे।

जाँच आगे बढ़ी तो मालूम चला कि स्कारनेक यौन उत्पीड़न के बाद डायरी में पीड़ित बच्चों का नाम लिखता था। डायरी में अपने कुकर्मों का उल्लेख उसने “सेक्सुअल एनकाउंटर” लिखकर किया था। डायरी में उसने बच्चों के यौन उत्पीड़न को “फैंटेसी” बताया था। जाँचकर्ताओं ने उसके घर से चाइल्ड पोर्न की कई तस्वीरों से लेकर डॉल्स तक बरामद की थी।

डायरी से पता चला कि उसने दक्षिणी फ़्रांस के Jonzac शहर में अपनी पड़ोसी की बेटी का भी रेप किया था। 2014 से 2017 के बीच वह इस शहर में रहता था। अभियोजन पक्ष के अनुसार सर्जन ने 1991 से लेकर 2014 के बीच इन घटनाओं को अंजाम दिया।

मामूली आदमी नहीं हैं सोनिया और राहुल गाँधी: कॉन्ग्रेस सांसदों का लोकसभा में हंगामा

संसद सत्र के दूसरे दिन मंगलवार (नवंबर 19, 2019) को गाँधी परिवार से स्पेशल प्रटेक्शन फोर्स (एसपीजी) सुरक्षा वापस लिए जाने के विरोध में कॉन्ग्रेस सदस्यों ने लोकसभा में जमकर हंगामा किया। लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी सुरक्षा पाने वाले मामूली लोग नहीं हैं। वाजपेयी जी ने गाँधी परिवार को एसपीजी सुरक्षा दी थी। 1991 से अब तक एनडीए दो बार सत्ता में आई, लेकिन उनकी एसपीजी सुरक्षा कभी नहीं हटाई गई।”

लोकसभा में जब अधीर रंजन इस मसले को उठा रहे थे, तब लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने कहा कि ये मामला अभी लिस्ट में नहीं है। ऐसे में जब ये मामला लिस्ट में हो, तभी सदन में इस मसले को उठाएँ। इससे पहले सोमवार (नवंबर 18, 2019) को भी कॉन्ग्रेस नेता ने इस मसले को लोकसभा में उठाया था और गृह मंत्री से जवाब माँगा था। चौधरी ने गाँधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाए जाने के गृह मंत्रालय के कदम पर लोकसभा में स्थगन नोटिस भी दिया था।

बता दें कि शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन की कार्यवाही आरंभ होते ही कॉन्ग्रेस के सदस्य नारेबाजी करते हुए आसन के निकट पहुँच गए। इसके बाद डीएमके के सदस्य भी कॉन्ग्रेस के समर्थन में आसन के समीप पहुँच कर नारेबाजी करने लगे। कॉन्ग्रेस और डीएमके के सदस्यों ने ‘बदले की राजनीति बंद करो’, ‘एसपीजी के साथ राजनीति करना बंद करो’ और ‘वी वॉन्ट जस्टिस’ के नारे लगाए। इसके बाद कॉन्ग्रेस सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया। 

उल्लेखनीय है कि हाल ही में सरकार ने कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी की एसपीजी सुरक्षा वापस ले ली थी। अब उन्हें जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है। अभी गाँधी परिवार की सुरक्षा में CRPF के जवान लगे हुए हैं। तीनों सदस्यों की सुरक्षा में कुल 6 कंपनियाँ तैनात हैं। यानी करीब 600 जवान, 24 घंटे सोनिया-राहुल-प्रियंका की सुरक्षा में तैनात रहेंगे।

पेशवा की ‘छबीली’: चीते का शिकार करने वाली वो वीरांगना जिसकी तलवारों से फिरंगी भी कॉंपे

ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़ते-लड़ते अपनी वीरगाथा को अमर कर जाने वाली झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्मदिवस 19 नवंबर को होता है। वैसे तो लक्ष्मीबाई के विवाह के बाद उनके जीवन का हर पल एक क्रांति का विस्फोट करता है लेकिन उनके जीवन से जुड़े कुछ अन्य पहलू भी हैं, जो बताते हैं कि 1857 में अंग्रेजों को धूल चटाने वाली लक्ष्मीबाई की वीरता परिस्थितियों का फलितार्थ नहीं थी। अच्छे-अच्छे जाँबाजों को रणभूमि में धूल चटाना उनका जन्मजात कौशल था। वह पितृसत्ता द्वारा गढ़ी गई हर भ्रांतियों को तोड़कर आगे बढ़ीं और खुद को इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज करवा गईं।

19 नवंबर 1828 को बनारस में एक मराठा ब्राह्मण के घर में जन्मीं रानी लक्ष्मीबाई का नाम पहले मणिकर्णिका था। घरवाले दुलार में ‘मनु’ बुलाते थे। पेशवा ने उनके स्वभाव के कारण ‘छबीली’ नाम दिया था। रानी, बचपन से ही शस्त्रों के ज्ञान में धनी थी। घुड़सवारी से लकर तलवारबाजी उनके प्रिय खेल थे। 4 साल की उम्र में माँ भागीरथीबाई का साया खोने के बाद पिता मोरोपंत ने उनकी परवरिश की। पिता बिठूर के राजदरबार में थे इसलिए मनु का भी अधिकतर समय वहीं बीतता था। उम्र बढ़ने के साथ उनके भीतर अलग-अलग कौशल विकसित होने लगे, जैसे कोई योद्धा युद्धभूमि के लिए तैयार हो रहा हो। वे रंग रूप से जितनी आकर्षक थीं, उनके हाव-भाव भी उतने ही मन को लुभाने वाले थे।

बताया जाता है मनु का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर से सिर्फ़ इसलिए हुआ था, क्योंकि झाँसी के महाराज शिवराव भाऊ उनकी बहादुरी से स्तब्ध रह गए थे। दरअसल, उन्होंने मनु को चीते का शिकार करते देखा था, जिसके बाद वह मनु का तेज भूल नहीं पाए। कुछ दिन बाद वह पेशवा के महाराज से मिले और अपने बेटे गंगाधर राव के लिए मनु का हाथ माँगा। झाँसी के महाराज के मन में मनु को अपनी पुत्रवधु बनाने की इच्छा इतनी प्रबल थी पेशवा के आगे कई बार इस संबंध में निवेदन किया। 1842 में 14 साल की उम्र में मनु का विवाह गंगाधर राव से हुआ।

लक्ष्मीबाई, रानी ऑफ झॉंसी का अंश

शादी के बाद गंगाधर राव को एहसास हो गया कि उनका विवाह किसी साधारण महिला से नहीं हुआ है। रानी के युद्ध कौशल, बुद्धि, विवेक को परखते हुए उन्होंने मणिकर्णिका का नाम लक्ष्मीबाई रखा। अपने जीवन काल में राजा ने उन्हें केवल असीम प्रेम ही नहीं किया, बल्कि उनकी इच्छाओं और पसंद-नापसंद का ख्याल रखते हुए शस्त्र संचालन, पुस्तकें, प्रशासन में हिस्सेदारी की व्यवस्था भी सुनिश्चित की। कहा जाता है कि रानी के ससुराल वाले चाहते थे कि वे महल के भीतर रसोई आदि का काम सँभाले, लेकिन वह व्यवस्था में सुधार लाने में जुटी रहती थी। इसके कारण उनके दुश्मन बढ़ते ही जा रहे थे।

समय बीतने के साथ-साथ रानी लक्ष्मीबाई ने एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश वह केवल 4 महीने जीवित रह पाया। यह वाकया राजा-रानी दोनों के जीवन में निराशा भर गया और राजा पुत्रवियोग में बीमार रहने लगे। लेकिन, जब उन्हें राज्य पर अंग्रेजों की कुदृष्टि का अंदाजा हुआ तो उन्होंने अपने चचेरे भाई का बच्चा गोद ले लिया, ताकि उनके बाद झाँसी के सिंहासन का उत्तराधिकारी सुनिश्चित हो सके। बच्चे को दामोदार राव नाम दिया गया। लेकिन महाराज की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उसे उनका उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और झाँसी को ब्रितानी राज्य में मिलाने का षड्यंत्र रचने लगे।

उस वक्त भारत में लॉर्ड डलहौजी वायसराय‍ था। जब रानी को पता लगा तो उन्होंने एक वकील की मदद से लंदन की अदालत में मुकदमा दायर किया, लेकिन ब्रितानियों ने रानी की याचिका खारिज कर दी। सन् 1854 के मार्च माह में अंग्रेजी हुकूमत ने रानी को महल छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन रानी ने दृढ़निश्चय किया कि वे अपने राज्य को नहीं छोड़ेंगी। यही वो समय था जब रानी लक्ष्मीबाई ने प्रण लिया कि वे अपने राज्य को फिरंगियों की हुकूमत से आजाद करवाकर दम लेंगी।

रानी लक्ष्मीबाई का साहस देखकर अंग्रेजों ने कई बार उनके प्रयासों को विफल करने का प्रयास किया। झाँसी के पड़ोसी राज्य ओरछा व दतिया भी झाँसी पर हमला करने लगे, लेकिन रानी ने उनके इरादों को नाकामयाब कर दिया। किंतु 1858 में ब्रिटिश सरकार ने झाँसी पर हमला कर उसको घेर लिया व उस पर कब्जा कर लिया, लेकिन रानी अपने प्रण पर अटल थीं। उन्होंने 14,000 बागियों की सेना तैयार की। योद्धा की भाँति पोशाक धारण की। पुत्र दामोदर को पीठ पर बाँधा और दोनों हाथों में तलवार लेकर युद्ध मैदान में आ उतरीं। घोड़े की लगाम को मुँह से पकड़े वे अपने सहयोगियों के साथ तात्या तोपे से मिलीं और ग्वालियर के लिए कूच किया।

देश के गद्दारों के कारण रानी को राह में फिर शत्रुओं का सामना करना पड़ा और फिर 29 साल की महानायिका ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया। 18 जून 1858 को युद्ध मैदान में अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गईं। आज उनके जीवन गाथा को शब्दों में सॅंजोए सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली थी’ हर बच्चे की जुबान पर है।

24 को रामलला को मिलेगी फैसले की कॉपी: सुब्रह्मण्यम स्वामी काशी में करेंगे ‘स्पॉट इन्वेस्टीगेशन’

राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी रामलला को 24 नवंबर को सौंपी जाएगी। रामलला विराजमान की तरफ से कानूनी लड़ाई लड़ने वाले वकीलों का एक दल अयोध्या पहुॅंच उन्हें आदेश की कॉपी देंगे और आशीर्वाद लेंगे। वहीं, भाजपा नेता संसद सुब्रह्मण्यम स्वामी 23 नवंबर को अयोध्या जाएँगे। स्वामी ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी है।

बताया जा रहा है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी वकीलों के दल का स्वागत करेंगे। कारेसवकपुरम में वकीलों का अभिनंदन किया जाएगा। वकीलों के इस दल में रामलला की पैरवी करने वाले सीनियर एडवोकेट के. परासरण और उनके परिवार के करीब 2 दर्जन सदस्य भी होंगे। वकीलों का यह दल रामलला का दर्शन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी परिसर के रिसीवर अयोध्या के कमिश्नर को सौंपेगा।

स्वामी ने अयोध्या यात्रा को लेकर जो ट्वीट किया है उसमें वाराणसी जाने की बात भी कही है। उन्होंने कहा है कि वह काशी विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र में ‘स्पॉट इनवेस्टिगेशन’ के लिए आएँगे। भाजपा नेता ने बीते दिनों एक इंटरव्यू में कहा था, “हमें तीन मंदिर चाहिए। एक राम मंदिर, दूसरा कृष्ण जन्मस्थान मथुरा का कृष्ण मंदिर और तीसरा काशी विश्वनाथ। काशी विश्वनाथ और कृष्ण मंदिर के तो सबूत भरपूर हैं। ये (राम मंदिर) सबसे मुश्किल था।”

काशी विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र में मौजूद उपासना स्थल को लेकर भी लंबे समय से आवाज उठती रही है। राम जन्मभूमि पर फैसला आने के बाद स्वामी के वाराणसी आने और ‘स्पॉट इन्वेस्टिगेशन की बात लिखने से वाराणसी में भी सरगर्मी बढ़ गई है।

कॉन्ग्रेस 30 नवंबर को रामलीला मैदान में नहीं करेगी रैली, ‘भारत बचाने’ के लिए अभी समय नहीं

बेरोजगारी, आर्थिक मंदी और कृषि संकट को लेकर आगामी 30 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली कॉन्ग्रेस की रैली स्थगित कर दी गई है। कॉन्ग्रेस ने इसे ‘भारत बचाओ’ रैली का नाम दिया था। जानकारी के मुताबिक संसद के शीतकालीन सत्र के मद्देनजर रैली के आयोजन की तिथि आगे बढ़ाई गई है। 30 नवंबर को होने वाली यह रैली अब 14 दिसंबर को हो सकती है।

कॉन्ग्रेस ने देश के विभिन्न हिस्सों में आंदोलन करने की योजना बनाई थी। हालाँकि अयोध्या मामले का फैसला आने के कारण में कुछ राज्यों में पार्टी ने इस कार्यक्रम को थोड़ा आगे बढ़ा दिया था। पार्टी का कहना है कि उसने पिछले कुछ दिनों देश के अलग-अलग हिस्सों में मोदी सरकार की ‘विफलताओं’’ को उजागर करने के लिए विरोध प्रदर्शन किया। इससे पहले कॉन्ग्रेस महसचिवों, प्रदेश प्रभारियों, विभाग अध्यक्षों, प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के प्रमुखों और विधायक दल के नेताओं की बैठक में 30 नवम्बर की रैली करने का निर्णय हुआ था।

कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा था, “भारतीय जनता पार्टी ने भारत को मंदी व तालाबंदी की कगार पर ला खडा कर दिया है। इस पार्टी ने भारत को भुखमरी की तरफ धकेल दिया है और भारत को बेरोजगारी के कुएँ में धकेल दिया है। इस सरकार ने भारत की सम्प्रभुता, आर्थिक सबलता पर आक्रमण और हमला कर दिया है। इसलिए देश के हर जिले मे सोनिया गाँधी व राहुल गाँधी के आह्वान पर इसे लेकर एक व्यापक आंदोलन हमने किया। इस सारे आंदोलन का आगाज 30 नवंबर को ‘भारत बचाओ’ रैली के माध्यम से दिल्ली के रामलीला मैदान में होगा।”

उन्होंने कहा था, “सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के आह्वान पर 25 नवंबर तक हर जिले के अंदर और हर प्रांत के अंदर एक व्यापक आंदोलन का आगाज हमने किया था। 60 प्रतिशत मुल्क में यह आंदोलन संपूर्ण हो चुका है और आज की बैठक में निर्णय किया गया है कि 40 प्रतिशत जहाँ बचा है, वहाँ भी ये संपूर्ण हो जाएगा। 30 नवंबर को ‘भारत बचाओ’ रैली से यह आंदोलन समाप्त होगा।”

इस्लामी एक्सट्रेमिज़्म फ़ैलाने के ख़िलाफ़ ममता बनर्जी ने ओवैसी की ‘एटम बम’ पार्टी को दी चेतावनी

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में पहली बार अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक अतिवाद के ख़िलाफ़ चेतावनी दी। उन्होंने कहा, “मैं देख रही हूँ कि यहाँ अल्पसंख्यकों में कुछ अतिवादी हैं, जिनकी जमीन हैदराबाद से जुड़ी है। ऐसे लोगों की बिलकुल भी मत सुनिए।” हालाँकि ममता बनर्जी ने अपना ये बयान बिना किसी पार्टी का नाम लिए दिया। लेकिन, राज्य में राजनैतिक चहल-पहल को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनका इशारा असद्दुदीन ओवैसी के इस्लामिक संगठन ऑल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुसल्लिमीन (AIMIM) की ओर था।

इस बैठक के बाद बंगाल मुख्यमंत्री ने कूचबिहार के मदन मोहन मंदिर की ओर प्रस्थान किया और राजबाड़ी मैदान में रासमेला जाने से पहले वहाँ पूजा-अर्चना की। यहाँ बता दें कि इस बार होने वाले चुनावों में कूचबिहार जिला ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए बहुत चिंता का विषय है। क्योंकि 1951 से यहाँ पर यहाँ की जनता या तो कॉन्ग्रेस को चुनती आई है, या फिर ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्ल़ॉक को। लेकिन 2014 में बड़ी मशक्कत से ममता बनर्जी ने इस जगह पर अपनी पैठ बनाकर जीत हासिल की थी। मगर, 2019 में भाजपा ने उनसे ये सीट छीन ली।इसलिए आगामी विधानसभा चुनावों में कूचबिहार क्षेत्र अगर ममता बनर्जी के हाथों से जाता है, तो ये उनके लिए एक बड़ी हार साबित हो सकती हैं। इसी कारण वे अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए उनके बीच पहुँची।

कूचबिहार में उन्होंने कहा, “मैं अपील करती हूँ टीएमसी नेताओं से कि भाजपा के ख़िलाफ़ चुनौती को स्वीकारें। हमारे कार्यकर्ता हमारी पार्टी की पूँजी हैं। मैं उन्हें नेताओं के नीचे काम करने को नहीं कहूँगी। वे उस झंडे के लिए काम करें जिसे उन्होंने पकड़ा है। अब पार्टी नेताओं को एक दूसरे के ख़िलाफ़ टिप्पणी करना समाप्त कर देना चाहिए। क्योंकि अगर ऐसा रहा, तो उनकी करनी का भुगतान पार्टी को करना पड़ेगा। मैं खुश हूँ कि तृणमूल विधायक, पार्षद एक टीम की तरह काम कर रहे हैं। लेकिन अगर ये पहले ऐसे रहते तो हम कभी सीट नहीं हारते।“

इस बैठक में हैरानी की बात ये हुई कि ममता बनर्जी ने नागरिक संशोधन बिल पर बात न करके मुस्लिम, बंगाली हिंदू और गोरखाओं पर बात की। जिसके संभवत: दो उद्देश्य हैं- एक हिंदुओं में भाजपा के प्रभाव को कम करना और दूसरा AIMIM द्वारा उनके मुस्लिम वोट बैंक को बाँटे जाने की कोशिश का विरोध करना।

गौरतलब है कि बंगाल में हिंदुओं और मुस्लिमों का वोट धीरे-धीरे ममता बनर्जी के हाथ से फिसलता जा रहा है। हिंदुओं के पास भाजपा का विकल्प है, जबकि मुस्लिमों के सामने ओवैसी की पार्टी आ गई हैं। इसके अलावा अभी बीते दिनों की घटनाओं को याद किया जाए तो समझ आएगा कि कैसे एक बड़ी तादाद में हिंदुओं ने ममता बनर्जी का ‘जय श्रीराम’ नारा लगाने वाले मामले में विरोध किया था। वहीं, बंगाल के मुस्लिमों में अपनी पैठ जमा रही AIMIM की ओर से भी चेतावनी दी गई थी,”ये सच है कि तादाद में कम हैं, लेकिन हमें छूना मत। हम ATOM BOMB हैं। दीदी! हमें आपकी दोस्ती भी कुबूल और आपकी दुश्मनी भी। आपको तय करना है कि आप हमें दोस्त समझते हो या फिर दुश्मन।”

महाराष्ट्र: शिवसेना ने कहा- सरकार बनाना हमारी जिम्मेदारी नहीं, कॉन्ग्रेस-एनसीपी ने बैठक टाली

महाराष्ट्र में जारी सियासी उठापठक के बीच ​सरकार बनाने की शिवसेना की उम्मीदें धूमिल होती जा रही है। 170 विधायकों का समर्थन होने का दावा करने वाले शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा है कि सरकार गठन की जिम्मेदारी ​उनकी पार्टी की नहीं है। वहीं, एनसीपी और कॉन्ग्रेस की मंगलवार को होने वाली बैठक भी टाल दी गई है। यह खबरें ऐसे वक्त में आई है जब कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को सीएम बनाने पर कॉन्ग्रेस और एनसीपी राजी हैं।

अटकलों का दौर तब शुरू हुआ जब सोमवार को एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने सोनिया गॉंधी से हुई मुलाकात के दौरान सरकार गठन पर चर्चा नहीं होने की बात कही। इससे पहले उन्होंने यह भी कहा था कि शिवसेना ने कॉन्ग्रेस-एनसीपी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। ऐसे में वे उसके साथ कैसे सरकार बना सकते हैं।

सोमवार (नवंबर 18, 2019) देर शाम पवार से मुलाकात के बाद संजय राउत ने कहा, “सरकार गठन हमारी जिम्मेदारी नहीं है। जिसकी यह जिम्मेदारी थी वे भाग खड़े हुए। बावजूद मुझे यकीन है कि जल्द हम सरकार बनाने में कामयाब रहेंगे।”

शरद पवार को लेकर संजय राउत ने कहा कि शरद पवार को समझने में कई जन्म लग जाएँगे। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पवार पर किसी तरह का कोई संदेह नहीं है। संजय राउत ने आगे कहा कि वो किसानों के मसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे। ये मुलाकात शरद पवार की अगुवाई में ही होगी।

वहीं जब सोनिया गाँधी के साथ बैठक के बाद जब शरद पवार से राउत के 170 विधायकों के समर्थन के दावे के बारे में पूछा गया, तो पवार ने कहा, “मुझे इस 170 के आँकड़े के बारे में नहीं पता है। इस  बारे में आपको उनसे पूछना चाहिए था।”

बता दें कि सोनिया गाँधी से मुलाकात के बाद पवार ने कहा था, “सोनिया जी के साथ सरकार बनाने को लेकर कोई बात ही नहीं हुई। हमारी अपनी पार्टियों की बात हुई। चुनाव के दौरान कई पार्टियाँ हमारे साथ थीं, उनका भी ध्यान रखना होगा। किसी के साथ सरकार बनाने पर बात नहीं हुई। कॉन्ग्रेस-एनसीपी के अपने मुद्दों पर बात हुई। साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर कोई बात ही नहीं हुई है। कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के नेताओं के बीच सामान्य मुलाकात हुई थी।”

इस मुलाकात के बाद कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट कर कहा, “शरद पवार ने सोमवार को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मुलाकात की और महाराष्ट्र के राजनीतिक हालात के बारे में उन्हें अवगत कराया। यह निर्णय लिया गया कि अगले एक या दो दिनों में एनसीपी और कॉन्ग्रेस के प्रतिनिधि दिल्ली में फिर मिलेंगे, जिसमें आगे के रणनीति के बारे में चर्चा होगी।” वहीं, एनसीपी प्रवक्ता नवाब मलिक ने बताया है कि कॉन्ग्रेस के साथ होने वाली बैठक इंदिरा गॉंधी की जयंती के कारण टाल दी गई है। अब बैठक बुधवार को होगी।

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राम जन्मभूमि पर छलका वामपंथियों का दर्द, माकपा ने कहा- सुप्रीम कोर्ट ने न्याय नहीं किया

राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की ज्यादातर तबकों में सराहना हो रही है। लेकिन, राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए पर पहुॅंच चुके वामपंथियों को यह रास नहीं आ रहा है। माकपा पोलित ब्यूरो की दो दिवसीय बैठक में प्रस्ताव पास कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाया गया है। पोलित ब्यूरो का मानना है, ‘अयोध्या विवाद पर कोर्ट का फैसला आया है, न्याय नहीं।’

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक बैठक में अयोध्या और सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चर्चा हुई। बैठक के बाद जारी बयान में अयोध्या पर कहा गया है कि फैसला एक पक्ष की भावनाओं और विश्वासों को केंद्र में रखकर दिया गया है। इस मामले में निर्णय भले आ गया है, लेकिन न्याय नहीं हुआ है।

पत्रकारों से बात करते हुए सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि कोर्ट का फैसला स्पष्ट रूप से कहता है कि 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर असंवैधानिक रूप से मूर्तियों की स्थापना हुई, जो कि गंभीर रूप से कानून का उल्लंघन है। लेकिन फिर भी विवादित जमीन कानून का उल्लंघन करने वालों को दे दी गई। फैसला में स्पष्ट है कि एएसआई की रिपोर्ट में ऐसा कोई सबूत नहीं हैं, जिसमें बताया गया हो कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी।

सबरीमाला पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ बहुमत से इस मामले में 2018 के फैसले को बरकरार रखने में विफल रही। अब इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने से और पुनर्विचार याचिका को लंबित रखने से मामले में अस्पष्ट और अनिश्चित स्थिति पैदा हो गई है।

पोलित ब्यूरो की दो दिवसीय बैठक में अन्य कई मुद्दों पर भी प्रस्ताव पारित किए गए। इनमें अर्थव्यवस्था, राफेल और जम्मू-कश्मीर प्रमुख है। घटती आर्थिक विकास दर पर चिंता जताते हुए सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े किए गए हैं। वहीं, राफेल सौदे की जॉंच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की कॉन्ग्रेस की मॉंग का समर्थन किया गया है।

गौरतलब है कि दिल्ली में हुई पोलित ब्यूरो की बैठक में पार्टी की गुटबाजी भी उभरकर सामने आ गई थी। ब्यूरो के तीन वरिष्ठ सदस्यों ने केरल में पार्टी के दो युवा कार्यकर्ताओं पर यूएपीए लगाए जाने को लेकर मुख्यमंत्री पिनरई विजयन को जमकर सुनाया था।

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