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‘BHU में स्नातक के इतिहास के कोर्स से रामायण, महाभारत और वैदिक काल हटा’; PRO ने कहा अफवाह है

बीएचयू यानी बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के प्रशासन ने इतिहास के कोर्स से रामायण और महाभारत को बाहर कर दिया है। हाल ही में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में उठे विवाद से बीएचयू अभी निकल भी नहीं पाया है कि एक बार फिर से बीएचयू में हंगामा खड़ा हो गया है। दरअसल बीचयू के इतिहास विभाग ने बीए कोर्स से रामायण, महाभारत और वैदिक काल के अध्याय को हटा दिया है। इस फैसले के बाद से ही छात्रों में विश्वविद्यालय प्रशासन और वाईसचांसलर के खिलाफ काफी रोष है। इस मामले को लेकर उन्होंने विभागाध्यक्ष से भी आपत्ति दर्ज कराई है।

शाम में कुछ मीडिया में ऐसी खबरें आ रही थीं कि यूनिवर्सिटी में रामायण और महाभारत से जुड़े अध्यायों को हटाया जा रहा है। विश्वविद्यालय के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर ने कहा है कि यह कोरी अफवाह है। उन्होंने आगे बताया कि कोर्स में किसी भी तरह का बदलाव एकेडमिक काउंसिल करती है, और ऐसा अभी कुछ नहीं हुआ है। उनके अनुसार यह सब विश्वविद्यालय को बदनाम करने की साजिश है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक छात्रों द्वारा इस मुद्दे पर आपत्ति जताने के बाद, इस विषय को लेकर बैठक शुरू हो गई है। इस सब के बीच विश्वविद्यालय परिसर पहले से ही एक प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर काफी अशांत है। डॉ फ़िरोज़ खान की नियुक्ति के विरोध में धरना जारी है और विश्वविद्यालय प्रशासन अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सका है।

वहीं इस विवाद पर छात्रों का भी गुस्सा जमकर फूटा है। फ़िरोज़ खान की नियुक्ति पर उपजे इस विवाद के चलते संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय पर पिछले 13 दिन से ताला लटका हुआ है। सम्भावना जताई जा रही है कि अगर बीएचयू में इतिहास के कोर्स से रामायण, महाभारत और वैदिक इतिहास को हटाने के मामले में अगर विवाद बढ़ता है तो आने वाले वक़्त में प्रशासन और छात्र एक बार फिर आमने-सामने होंगे।

कल ही में बीएचयू परिसर इससे पहले भी एक अन्य घटना के चलते सुर्ख़ियों में था। जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सावरकर की तस्वीर को किसी उत्पाती ने उखाड़ कर फेंक दिया था। इस घटना के सर्वप्रथम एमए में पढ़ने वाले छात्रों का ध्यान इसकी ओर गया था। बाद में इस मामले की शिकायत की गई और जाँच के लिए तीन सदस्यीय कमिटी का गठन भी किया गया है।

नोट: इस रिपोर्ट को नई सूचनाओं के आलोक में अपडेट किया गया है।

‘द-हिन्दू’ के साथ मिलकर प्रधानमंत्री मातृत्व योजना के खिलाफ ‘फेक न्यूज’ फैला रहे हैं ज्याँ द्रेज़: झूठ उजागर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मातृ वंदना योजना को लेकर द हिन्दू अख़बार में आज एक ओपेड ‘द मदर ऑफ़ ऑल इश्यूज’ छपा। इस आर्टिकल में बताई गई जानकारी, ग्राफ से लेकर इसकी हेडलाइन तक संदिग्ध है। जब द हिन्दू में छपे इस लेख की जाँच विस्तार से की गई तो मालूम चला कि इसमें बहुत कुछ भ्रामक कहा गया है, इनके द्वारा दी गई जानकारी पर नज़र डालें तो भारत में बच्चों के पैदा होने की सालाना दर 270 लाख है, जिनमें आधे से भी कम केस वह हैं जहाँ कोई स्त्री पहली बार माँ बनी है। इस तरह के लोगों की तादाद 123 लाख यानी 1.2 करोड़ बताई गई है। इसका मतलब यह है कि आर्टिकल के अनुसार इस साल देश में करीब 1.2 करोड़ महिलाएँ पहली बार माँ बनी हैं। इस लिहाज़ से उन सभी को पीएम की मातृ वंदना योजना यानी पीएमएमवीवाई से लाभ पहुँचना चाहिए।

मगर इन 1.2 करोड़ महिलाओं के बीच सिर्फ 60 लाख ही ऐसी हैं जिन तक यह मदद पहुँच सकी है, रिपोर्ट के मुताबिक इन 60 लाख में भी सिर्फ 38 लाख ऐसी महिलाएँ हैं जिन्हें इस स्कीम के तहत पूरा पैसा मिल सका है। यह संख्या कुल महिलाओं की सिर्फ 31 फीसदी हैं।

दरअसल इस लेख को लिखने वाले और कोई नहीं बल्कि सोनिया गाँधी के करीबी ज्यां द्रेज़ हैं। ज्यां 2010 से लेकर 2014 तक मनमोहन सिंह के नेतृत्त्व वाली यूपीए सरकार में एनएसी के सदस्य भी रह चुके हैं।

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इन भ्रामक तथ्यों का खंडन किया जाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इस आर्टिकल को लिखने वाले से लेकर एडिट कर छपने भेजने वाले तक के पास यह ज्ञान भी नहीं था कि इस स्कीम का लाभ उठाने के लिए सभी 1.2 करोड़ महिलाओं में नियमानुसार सब इसका फायदा उठाने के लिए अधिकृत नहीं हैं। इस बात को जानकर एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है कि ज्यां द्रेज़ और उनकी बात पर हामी भरने वाले लोग आखिर क्यों चाहते हैं कि भारत सरकार उन महिलाओं को 6000 रूपए दे जो अपने बल पर अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठाने में सक्षम हैं।

इससे यह साफ हो जाता है कि इस लेख को लिखने वाले द्रेज़ को इस योजना के बारे में ज्यादा कुछ जानकारी नहीं है। दरअसल यह स्कीम गरीब और निर्धन परिवारों के लिए ही केन्द्रित है। इसके तहत सरकार उन्हें 6000 रुपए की मदद मुहैय्या कराती है। इस दौरान उन्हें 2000 रूपए की तीन इनस्टॉलमेंट दी जाती है।

यह रकम माँ बनने वाली स्त्री के लिए यह उस समय हुए नुकसान की भरपाई होती है जब वह गर्भवती होती है। इस अवस्था में उसे आराम की सख्त ज़रूरत होती है। यही वजह है कि इस दौरान गरीब परिवार की कामकाजी महिलाएँ घर से बाहर निकलकर पैसा कमाने के लिए शारीरिक रूप से सक्षम नहीं होतीं। इसके नियमानुसार महिला बच्चे को जन्म देने के पहले और बाद में आराम कर सकती है। इस योजना के लिए जिन 90 फीसदी महिलाओं ने आवेदन किया उन्हें पहली इनस्टॉलमेंट दी जा चुकी है। वहीं आवेदन करने वाली 60 फीसद महिलाएँ ऐसी हैं जिन्हें सारी तीन इनस्टॉलमेंट मिल चुकी हैं।

इससे साफ़ पता चलता है कि ज्यां द्रेज़ ने इन सभी बिन्दुओं पर ध्यान ही नहीं दिया है। अपने इस लेख में द्रेज़ ने सरकार की एक योजना को गलत ढंग से पेश किया है ताकि नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम किया जा सके। हैरानी इस बात पर होती है कि द हिन्दू अखबार ने झूठ और संदिग्ध तथ्यों से भरे इस लेख को लिखने वाले ज्यां द्रेज़ को रिसर्चर और डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट यानी विकासशील अर्थशास्त्री की संज्ञा तक दे डाली।

पीएम की मातृ वंदना योजना के प्रावधान को सुनकर कई लोगों के मन में यह सवाल उठाना वाजिब है कि क्या 6000 रुपए की धनराशि एक गर्भवती स्त्री के लिए पर्याप्त मदद है। बता दें कि गर्भवती स्त्रियों की मदद के लिए सिर्फ इतना ही प्रावधान भर नहीं है। इस सम्बन्ध में भारत सरकार की एक अन्य योजना संचालित होती है। इस योजना का नाम ‘प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान’ है। इस योजना के तहत नियमित रूपसे हर महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिला की देखभाल की जाती है। सबसे ख़ास बात तो यह है कि इस योजना के तहत गर्भवती स्त्री को मिलने वाली सभी सुविधाओं के लिए कोई पैसा नहीं खर्चा करना पड़ता।

ज्यां द्रेज़ को इस बात से शिकायत है कि इस योजना के लिए लाभार्थी को फॉर्म भरने से लेकर आधार डिटेल जैसी फॉर्मेलिटी को पूरी करना पड़ता है। यह सब कहते वक़्त ज्यां इस बात को भूल गए कि आधार को लिंक कर देने के बाद से किसी भी योजना में अब घपले की गुंजाईश नहीं बची है। सरकार के इस कदम के बाद ज़रुरतमंद का हक मारकर अपनी दुकान चलाने वाले बिचौलियों का भी सफाया हो चुका है। बता दें कि आधार के लागू होने के बाद से किसी भी सरकारी योजना से मिलने वाला लाभ सीधे लाभार्थी तक पहुँचता है। यही वजह कि सरकार ने आधार को लगभग हर क्षेत्र में अनिवार्य कर दिया है।

SVDV में फिरोज क्यों: हम नहीं चाहते कि सनातन धर्म की इस्लामी और ईसाई चश्मे से व्याख्या हो

BHU के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति के विरोध में छात्रों का धरना पिछले लगभग एक पखवाड़े से जारी है। आज भी विरोध स्वरुप हनुमान चालीसा का पाठ किया गया लेकिन अभी तक विश्विद्यालय प्रशासन और वाईसचांसलर की तरफ से कोई ठोस आश्वाशन नहीं मिला है। छात्र अभी भी शांतिपूर्वक सनातन धर्म, मालवीय मूल्यों और उनके आदर्शों की रक्षार्थ संघर्ष कर रहे हैं।

छात्रों की पिछले दिनों हुई JNU के प्रोफ़ेसर VC राकेश भटनागर से बातचीत भी बेनतीजा रही। छात्रों के प्रतिनिधि जब कुलपति से मिलने गए तो वो ‘देश के संविधान’ का हवाला देकर जहाँ के वो VC हैं उस BHU के ‘संविधान’ को मानने से इनकार कर दिया। ये कहकर कि मालवीय जी एक इंसान हैं इंसान गलत हो सकता है लेकिन लिखित संविधान नहीं और उनके लिए ‘मालवीय मूल्यों’ और ‘आदर्शों’ की कोई कीमत नहीं है। जो छात्र BHU में पढ़ते हैं मालवीय जी और उनकी बातें आज भी उनके लिए जीवंत हैं और उनके जीने का आधार भी। दीवारों पर लिखी जिन इबारतों, संदेशों को मानने से वाईसचांसलर इनकार कर रहे हैं और BHU के उस संविधान को भी जिसकी हालिया रीप्रिंट किताब के पहले पन्ने पर खुद उन्हीं का सन्देश है और उन्होंने ने ही इस प्रिंट को रिलांच भी किया लेकिन अब कहना है कि हमने पढ़ा नहीं, परम्परा है इसलिए लॉन्च किया।

एक तरफ SVDV के छात्र अपनी परम्पराओं, अपने पठन-पाठन की संरक्षित गुरुकुल की प्रक्रियाओं-विधियों के रक्षार्थ संघर्षशील हैं। तो दूसरी तरफ बीबीसी, वायर, प्रिंट जैसे मीडिया का एक धड़ा इस आंदोलन की धार कुंद करने में लगा है ये झूठ प्रसारित कर फिरोज खान की नियुक्ति का मसला महज ‘संस्कृत भाषा’ का है। इसे लेकर वो तरह-तरह के लेख लिख रहे हैं कि फला-जगह एक संस्कृत स्कूल है जहाँ 80% मुस्लिम बच्चे पढ़ते हैं। पहले भी स्पष्ट कर चूका हूँ कि ये मामला भाषा का है नहीं BHU में ‘संस्कृत भाषा’ और साहित्य के लिए अलग से एक पूरा विभाग है कला संकाय के अंतर्गत जबकि फिरोज खान की नियुक्ति ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय” में हुई है जिसकी स्थापना महामना मदन मोहन मालवीय जी ने ‘हिन्दू सनातन धर्म’ की रक्षार्थ और हिन्दू धर्म की ‘वैज्ञानिक व्याख्या’ और इसके संरक्षण के लिए किया था। जहाँ आज भी वैदिक गुरुकुल रीति से ही विद्या अर्जन होता है।

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तमाम मीडिया गिरोहों के दुष्प्रचार के बाद ऑपइंडिया ने SVDV के छात्रों से पुनः बात की वहाँ क्या पढ़ाया जाता है। इस संकाय की स्थापना का उद्देश्य क्या था? इसके पीछे मालवीय जी का क्या विज़न रहा है? वहाँ किन विषयों की पढ़ाई होती है? छात्रों की दिनचर्या कैसी होती है? और वहाँ वे क्यों अध्यनरत हैं? उनका उद्देश्य क्या है? साथ ही इस बात पर भी की वहाँ अध्ययन के बाद किस तरह का फ्यूचर वे अपने लिए देखते हैं और अंततः इस पर भी कि उन्हें फिरोज खान की नियुक्ति से आपत्ति क्यों है?

SVDV के स्थापना का उद्देश्य

तो चलिए सबसे पहले आप संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान की स्थापना का उद्देश्य क्या है जिसका जिक्र BHU की वेबसाइट पर भी है वही जान लीजिए जिससे बहुत कुछ स्पष्ट हो जाएगा- “SVDV की स्थापना 1918 में महामना द्वारा इस उद्देश्य से की गई थी कि प्राचीन भारतीय शास्त्रों, संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए, इस संकाय का प्रमुख उद्देश्य समाज में धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष और तंत्र के बारे में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करना है और विशेषरूप से समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए नैतिकता और धर्म के सर्वोपरि मूल्यों को बहाल करना है। यहाँ परंपरागत तरीकों के साथ-साथ मौखिक-सह-लिखित परंपरा को ध्यान में रखते हुए शास्त्रीय ग्रंथों की ‘स्ट्रिक्टली’ पढ़ाई होती है।”

संकाय की खुद उद्घोषणा है कि हम ग्रंथो के प्रत्येक शब्द की व्याख्या पर जोर देते हैं ताकि उनके ‘आवश्यक’ निहितार्थ को समझा जा सके। और यहीं से छात्रों की उस आशंका को भी बल मिल रहा है कि जैसे ही इस संकाय में वर्णाश्रम धर्म से अलग किसी विधर्मी अर्थात मुस्लिम या ईसाई की नियुक्ति होगी तो हमारे शास्त्रीय वैदिक और प्राचीन ग्रन्थ इस्लामी और ईसाई प्रभाव से नहीं बचेंगे। पूरे विश्व में आज यही एक संस्थान बचा है जहाँ मालवीय जी के प्रयासों के फलस्वरूप हमारी अतिप्राचीन सनातन परंपरा अपने मूलरूप में सुरक्षित है और यहाँ शास्त्री, आचार्य, कर्मकांड आदि में डिप्लोमा से लेकर शोध तक में भी गुरुकुल की परम्पराओं का पालन होता है।

यहाँ के छात्रों का कहना है कि हम वेद पढ़ने से पहले यज्ञोपवीत धारण करते हैं, हमारे अध्यापक प्रोफ़ेसर भी संकाय में प्रवेश से पहले काशी के आराध्य शिव हैं तो शिव और पार्वती सहित जिन भी देवी-देवताओं की तस्वीरें और प्रतिमाएँ यहाँ हैं उन्हें प्रणाम करते हुए, उनकी प्रदक्षिणा करते हुए प्रवेश करते हैं और हम किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से ऐसी आशा नहीं रखते। यह पूरा मामला हमारी आस्था, विश्वास और धर्म से जुड़ा है और हम नहीं चाहते कि इसमें किसी तरह की कोई मिलावट हो। ऐसा होते ही यहाँ के संस्थापक मालवीय जी की भावना को गहरा आघात लगेगा। हम-आप आज हैं कल नहीं रहेंगे पर हमारी परम्परा और सनातन धर्म अक्षुण्य है, ये सतत प्रवाहमान है। इसे अपनी पूरी शुद्धता में प्रवाहित होने देना आज हम सभी के कर्तव्य के साथ हिन्दू धर्म के मूल्यों से गहराई से जुड़ाव होने के कारण जिम्मेदारी भी है।

SVDV में किन विषयों की पढ़ाई होती है? वहाँ विभाग कौन से हैं?

वेद, व्याकरण, ज्योतिष, वैदिक दर्शन, धर्मागम, धर्मशास्त्र मीमांसा, जैन-बौद्ध दर्शन के साथ-साथ इन सबसे जुड़ा साहित्य। क्या ये विषय महज साहित्य हैं? क्या आप चाहेंगें कि इन विषयों को वो लोग पढ़ाएँ जिनका इनके मर्म और मूल्यों से कोई वास्ता ही न हो? क्या आप चाहेंगे कि इनकी इस्लामी और ईसाइयत मिश्रित व्याख्या हो या बाद के हिंसक आंदोलनों से उपजे सामी मजहबों से घालमेल कर कोई प्राचीन सनातन ज्ञान-विज्ञान की परंपरा में इतना घालमेल कर दे कि मूल को ढूँढना ही मुश्किल हो जाए?


संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के विभाग और पढ़ाए जाने वाले विषय

उम्मीद है आप भी नहीं चाहेंगे यदि आप हिन्दू होंगे और सनातन धर्म, अध्यात्म और इसके मूल्यों में आपकी आस्था होगी तो फिर उन छात्रों से हम ये उम्मीद क्यों पाले बैठे हैं कि वो डॉ. फिरोज खान को स्वीकार लें, होने दे वो सारा अनर्थ अपने आँखों के सामने जो बेशक आज के वामपंथी विचारों वाले नास्तिक JNU के प्रोफ़ेसर और वर्तमान में BHU के वाईसचांसलर राकेश भटनागर बेशक तैयार हों जिनके बारे में BHU के छात्र ही कहते हैं कि मालवीय भवन में होने वाले गीता पाठ में भी वो नहीं जाते। लेकिन, ये छात्र हरगिज तैयार नहीं हैं। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि वो सनातन परम्परा को पढ़ते नहीं बल्कि जीते हैं। चाहे वो वेश-भूषा, तिलक, चोटी और यज्ञोपवीत के स्तर पर हो या ब्रह्ममुहर्त में उठने से लेकर संध्यावंदन और धर्म ग्रंथो के परायण तक यही सब उनका जीवन है और उनके जीने का उद्देश्य भी।

क्या कहना है SVDV के छात्रों का

अब अगली कड़ी में हमने वहाँ के शास्त्री, आचार्य, कर्मकाण्ड आदि में डिप्लोमा और विद्यारिद्धि (पीएचडी) के कई वर्तमान और पुराने छात्रों से हुई बातचीत का जिक्र करना चाहूँगा। प्रशांत, शिवम, शशिकांत, कृष्णा जैसे कई छात्रों ने बताया कि मन्त्र, श्लोक, यज्ञ, वैदिक अनुष्ठान, पुरोहित कर्म, कथावाचन, भागवत पाठ से लेकर ज्योतिष और कर्मकांड तक में SVDV के छात्र समान रूप से शामिल होते हैं यही उनकी जीविका का साधन भी है। वहाँ पढ़ने वाले सभी छात्र सरकारी नौकरी के लिए अध्ययनरत नहीं हैं। हालाँकि, कुछ अध्ययन-अध्यापन के विधिवत प्रणाली में जाकर प्रोफ़ेसर-आचार्य आदि बनते भी हैं पर अधिकांश जीवन भर पुरोहित कर्म, वेद-वेदांगों और प्राचीन शास्त्रों की शिक्षा देते हुए, हिन्दू धर्म और सनातन परंपरा की रक्षा करते हुए अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।

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आज SVDV के वे सभी छात्र डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति से आशंकित हैं, उनकी आशंका निर्मूल नहीं है क्योंकि वे सिर्फ आज की नहीं बल्कि आने वाले समय की सोच रहे हैं अगर आज उन लोगों ने हार मान ली तो आने वाले दौर में वहाँ ईसाईयों की भी नियुक्ति होगी और हो सकता है कि आज से 15-20 साल बाद जब यही फिरोज खान वहाँ HOD, डीन होंगे और विभाग में कई अन्य मुस्लिम और ईसाई प्राध्यापक-प्रोफ़ेसर तो प्राचीन शास्त्रों की जो व्याख्या होगी वो आप समझ ही सकते हैं कि क्या-क्या हो सकती है।

शास्त्री के एक छात्र अभिनायक मिश्रा से बातचीत हो रही थी तो उन्होंने कहा, “पहले भी मुस्लिमों और ईसाईयों ने सनातन धर्म को कम नुकसान नहीं पहुँचाया है और आज विश्व के एक मात्र संस्थान जहाँ सनातन की पताका अपने मूलरूप में आज भी सुरक्षित है उसे हम नष्ट नहीं होने देंगे।”

अमन कुमार ने कहा, “हम SVDV में अध्ययन के साथ भी अपनी आजीविका के लिए न सिर्फ बनारस में बल्कि कहीं भी पौरोहित कर्म करते हुए पूजा-पाठ, यज्ञ-अनुष्ठान करवाते हैं। कल जब हम एक मुस्लिम से इस्लाम मिश्रित धर्म ज्ञान लेंगे तो क्या समाज को हमारे ज्ञान पर, हमारी व्याख्याओं पर उतनी आस्था और विश्वास रह जाएगा। उससे भी बड़ी बात ये कि हम किसी मुस्लिम को वैदिक सनातन धर्म और शास्त्रों की शिक्षा और उसकी व्याख्या के योग्य ही नहीं मानते। हमें कभी भी कोई मुस्लिम व्यक्ति अपने गुरु के रूप में धर्म विज्ञान पढ़ाता हुआ स्वीकार्य नहीं होगा।”

आचार्य के छात्र रौशन ने कहा, “मीडिया में मैंने पढ़ा कि लोग ये चला रहे हैं कि फिरोज खान भजन अच्छा गाते हैं उनको श्लोक और मन्त्र याद है, हो सकता है कि उनको संस्कृत साहित्य का ज्ञान हो पर यहाँ बात सिर्फ साहित्य की है ही नहीं, हमारे यहाँ ‘धर्म विज्ञान’ सर्वोपरि है और चूँकि ग्रन्थ संस्कृत में हैं इसलिए संस्कृत भाषा एक माध्यम तो क्या हम संस्कृत भाषा के एक जानकार को धर्म की शिक्षा देने का उत्तराधिकारी मान लें। जो साहित्य में हमें वेद और वेदांग आदि पढ़ाए। आप ही बताइए क्या कल को कोई इस्लाम के बारे में थोड़ा जानकर इस्लाम के आलिम के रूप में वो इस्लाम धर्म की शिक्षा के योग्य माना जाएगा। अगर ऐसा कहीं होने वाला भी होगा तो यही मीडिया जो आज हमें रूढ़िवादी, पिछड़ा कह रहा है। यही लिखता फिरेगा कि हिन्दू को इस्लाम और ईसाई धर्म की शिक्षा देने की ज़रूरत ही क्या है। और तब भी दोषी हिन्दू होंगे, ये वामपंथी और सनातन धर्म विरोधी लोगों ने ही हिन्दू धर्म को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया है।”

इन सभी मुद्दों पर एक बार फिर हमने BHU के पूर्व शोधछात्र और वर्तमान में सहायक प्रोफ़ेसर सौरभ द्विवेदी से भी बात की जिन्होंने इस बात पर पुनः जोर दिया, “मैं उन्हीं उमाकांत चतुर्वेदी का छात्र हूँ जिनके विभाग में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति हुई है और मैं उन्हें अच्छी तरह से जानता हूँ। मैंने ऑपइंडिया से बात करते हुए पहले भी कहा था और अब भी दोहराता हूँ कि SVDV में फिरोज खान की नियुक्ति पैसों के बल पर हुई है। फिरोज खान उन्हीं के पाँच साल पहले पढ़ाए हुए छात्र हैं।”

सौरभ ने कहा, “अगर उनकी जगह कोई और हिन्दू होता और पैसे पर भी नियुक्ति होती तो इसका विरोध नहीं होता। आज विरोध की सबसे बड़ी वजह यही है कि हम अपने ग्रंथो और सनातन परम्पराओं की इस्लामी व्याख्या नहीं चाहते, इन लोगों ने पहले भी हिंसा के बल पर हमारे मंदिरों और सनातन हिन्दू धर्म को कम नुकसान नहीं पहुँचाया अब एक बार और नहीं और उस जगह तो बिलकुल नहीं जहाँ महामना की आत्मा बसती है।”

मालवीय जी के उद्देश्यों पर सवाल पूछने पर सौरभ द्विवेदी ने कहा, “बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के नाम में मालवीय जी ‘हिन्दू’ शब्द रखकर ही अपना दृष्टिकोण प्रकट कर दिया था और ‘संस्कृत विभाग’ के होते हुए भी एक पृथक से संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय की स्थापना और वहाँ पर ‘वर्णाश्रम धर्म’ के नियमों से प्रवेश की बात वह खुद शिलालेख पर अंकित करवा कर गए हैं। कोई भी संस्था उसके संस्थापक के उद्देश्यों को ख़ारिज नहीं कर सकती और उस महामानव ‘महामना’ को तो बिलकुल भी नहीं जिन्होंने उस समय इस संस्था का भीख माँगकर निर्माण किया जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था। आज बेशक वाईसचांसलर के लिए मालवीय मूल्यों और BHU के संविधान की कोई क़द्र न हो लेकिन यहाँ के संस्थापक की सम्पूर्ण भावना उस किताब में दर्ज है जिसके आधार पर BHU का निर्माण हुआ और अब तक वह संचालित होता रहा।”

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VC के बारे में बोलते हुए सौरभ द्विवेदी ने कहा, “हमें किसी नास्तिक VC से सेक्युलरिज्म का पाठ नहीं पढ़ना। BHU अपने स्थापना के समय से ही सेक्युलर है। यहाँ किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं है बस आज जिस संविधान की आड़ लेकर ‘धर्म विज्ञान’ को भ्रष्ट करने की साजिश रची गई है। हम उसके खिलाफ हैं और इसका विरोध करते रहेंगे, हमारी हार सिर्फ छात्रों की हार नहीं है बल्कि आने वाले समय में यहाँ पूरी सनातन परम्परा की हार होने वाली है और इसके दोषी वो सभी होंगे जो आज मौन हैं।”

SVDV के ही एक पुराने छात्र राहुल दुबे (जो अब पुरोहित के रूप में कार्य कर रहे है, साथ ही संस्कृत भारती कार्यक्रम भी चलाते हैं) और उनके साथ आचार्य, शास्त्री और शोध के अधिकांश छात्रों का कहना है, “हम किसी मुस्लिम के खिलाफ नहीं हैं और न ही BHU से फिरोज खान के निष्काषन की भी माँग नहीं कर रहे हैं। हमारी माँग सिर्फ इतनी है कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में कोई मुस्लिम या ईसाई का प्रवेश न हो। वहाँ वही हो जो सनातन परंपरा और हिन्दू धर्म को मानने वाले और जीने वाले हों। वाईसचांसलर चाहें तो कहीं और कला संकाय या मंच कला संकाय के नाट्यशास्त्र विभाग में संस्कृत भाषा पढ़ाने के लिए स्थान्तरित कर सकते हैं लेकिन उनका संविधान की आड़ लेकर अपने जिद पर अड़े रहना कहीं न कहीं धर्म की सनातन परंपरा को बाधित करने की साजिश है। और हम इसके खिलाफ हैं आने वाले समय में ये सरकार की भी जिम्मेदारी है कि जब भी कभी काशी हिन्दू विश्विद्यालय के लिए किसी कुलपति का चुनाव हो तो कम से कम उसकी हिन्दू धर्म में आस्था हो, वह सनातन और मालवीय मूल्यों को आगे बढ़ाने वाला हो।”

विरोध स्वरुप मिर्ची यज्ञ करते हुए SVDV के छात्र

एक दुल्हनिया ऐसी भी: गहने की जगह पहने टमाटर, कहा- पाकिस्तान में सोने के भाव टमाटर

सोशल मीडिया पर पाकिस्तान की एक दुल्हन का वीडियो खूब सुर्खियाँ बटोर रहा है। वजह है दुल्हन के खास गहने। दरअसल पाकिस्तान में एक दुल्हन को उसकी शादी में टमाटर और पाइन नट के गहने पहने हुए पाया गया। जब दुल्हन से टमाटर के गहने पहनने का कारण पूछा गया तो उसने बड़ा ही मजेदार जवाब दिया। दुल्हन बड़ी ही संजीदगी से कहती है कि आजकल सोने की कीमतें आसमान छू रही हैं और टमाटर व पाइन नट के भी। उसने बताया कि उसके देश में टमाटर के लिए हाय-तौबा मचा हुआ है।

एक पाकिस्तानी मीडिया चैनल द्वारा फिल्माई गई टमाटर वाली दुल्हन का ये क्लिप पाकिस्तानी पत्रकार नायला इनायत ने शेयर किया है। वीडियो में देखा जा सकता है कि एक दुल्हन पारंपरिक सोने के गहने पहनने के बजाय टमाटर के गहने पहनने के अपने फैसले के बारे में बात कर रही है। दुल्हन ने हार, चूड़ियों की जगह टमाटर पहना है। यहाँ तक कि माँग-टीका और बालियाँ भी टमाटर के ही हैं।

वीडियो में एक न्यूज एंकर दुल्हन को शादी की बधाई देता है और फिर उससे पूछता है कि उसने गहने की जगह पर टमाटर क्यों पहना है। दुल्हन कहती है कि देश में इस समय टमाटर और पाइन नट्स की वैल्यू सोने के बराबर चल रही है। इसलिए उसने सोने की जगह पर टमाटर और पाइन नट्स के गहने पहने हैं। जब एंकर ने पूछा कि पाइन नट्स कहाँ हैं, तो दुल्हन एक शगुन का लिफाफा खोलती है और उसमें से पाइन नट्स निकाल कर दिखाती है। ये लिफाफा उसके बड़े भाई ने ‘सलामी’ (शादी के तोहफे) के रूप में भेजे थे।

दुल्हन ने बताया कि उसके चाचा, चाची और चचेरे भाई, सभी ने उपहार के रूप में उसे पाइन नट्स भेजे थे। इतना ही नहीं पाकिस्तान की अर्थव्यवस्ता की स्थिति को स्पष्ट करते हुए दुल्हन कहती है कि उसे अपने माता-पिता के घर से उपहार के रूप में टमाटर से भरे तीन सूटकेस मिले हैं। वह कहती है, “माता-पिता, जिन्होंने अपनी बेटी को टमाटर दिया है, उन्होंने सब कुछ दिया है। जब से मेरे माता-पिता ने मुझे टमाटर और पाइन नट्स उपहार में दिए, तब से पूरा मुहल्ला खौफ में है।”

बता दें कि आर्थिक मंदी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे कंगाल पाकिस्तान में टमाटर की कीमत 320 रुपए प्रति किलो तक पहुँच गया है। टमाटरों को लूट मची है। किसानों ने बेशकीमती हो चुकी फसल को लूट से बचाने के लिए खेतों में हथियारबंद सुरक्षाकर्मी तैनात कर रखे हैं।

पाकिस्तान में टमाटर की बढ़ती कीमतों के कई कारण हैं। पाकिस्तानी सरकार की विनाशकारी कृषि नीति और बेमौसम बारिश ने टमाटर का उत्पादन काम हुआ है। कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद से भारत के साथ कारोबारी रिश्ते बंद होने की वजह से भी कीमतों में भारी उछाल आया है।

‘ज़हरीले पानी’ वाले गायब केजरीवाल के लिए भाजपा युवा मोर्चा ने पोस्टर हाथ में लेकर किया प्रदर्शन

दिल्ली विधानसभा चुनावों से कुछ समय पहले ही अरविंद केजरीवाल को जल स्वच्छता और प्रदेश में प्रदूषण को लेकर कई ओर से घेरा जा रहा है। इसी बीच पोस्टरबाजी की राजनीति भी तेज हो गई है। पहले गौतम गंभीर के ख़िलाफ़ AAP कार्यकर्ताओं ने पोस्टर लेकर प्रदर्शन किया था और अब भाजपा के युवा मोर्चा ने दिल्ली भाजपा के पूर्व अध्यक्ष सतीश उपाध्याय के नेतृत्व में पोस्टर हाथ में लेकर केजरीवाल के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया है।

इन पर लिखा है, “क्या आपने दिल्ली जल बोर्ड के चेयरमैन अरविंद केजरीवाल को देखा है।” इसके अलावा इन पोस्टर्स में लिखा है कि दिल्ली के 20 शहरों के पानी का सर्वे हुआ है, जिसमें दिल्ली का पानी सबसे जहरीला पाया गया है।

गौरतलब है कि अभी हाल में ही केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्री रामविलास पासवान ने पेयजल की गुणवत्ता के आधार पर देश के प्रमुख शहरों की रैंकिंग जारी की थी। जिसमें दिल्ली का पानी सबसे खराब बताया गया था। इस रिपोर्ट के सामने आते ही विपक्ष ने सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को घेरना शुरु कर दिया था। भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने खुद को ट्रोल किए जाने वाले मुद्दे को उठाकर पूछा था कि ‘जल या जलेबी।’

उन्होंने इशारा किया था कि उनके जलेबी खाने पर उन्हें ट्रोल कर लिया गया, लेकिन दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष होने के बाद भी उनकी ओर से पानी गुणवत्ता को सुधारने के लिए क्या किया गया। उनके अनुसार केजरीवाल ने दिल्ली वालों को पानी मुफ्त दिया, लेकिन उसे जहरीला करके।

हालाँकि पेयजल पर जारी की गई गुणवत्ता वाली रिपोर्ट पर केजरीवाल ने दावा किया है वो बिलकुल गलत है और दिल्ली में पीने वाला पानी एकदम साफ़ है। 9 माह में जाँच के लिए उठाए गए पानी के सिर्फ 1.43 फीसद (करीब डेढ़ फीसद से भी कम) सैंपल ही गुणवत्ता के मानक पर खरे नहीं उतरे। जबकि 98.57 फीसद पानी के सैंपल सही पाए गए।

वहीं, जल बोर्ड के उपाध्यक्ष दिनेश मोहनिया ने ट्वीट कर कहा कि इस साल जनवरी से सितंबर तक विभिन्न इलाकों से 1 लाख 55 हजार 302 सैंपल लिए गए। जिसमें से सिर्फ 2,222 सैंपल दूषित पाए गए। वहीं 1 लाख 53 हजार 80 सैंपल सही पाए गए। 

इस संबंध में बता दें पासवान ने केजरीवाल को चुनौती दी है कि वे भारतीय मानक ब्यूरो की जिस रिपोर्ट को गलत बता रहे हैं, वह उसे साबित करके दिखाएँ। केंद्रीय मंत्री पासवान ने केजरीवाल से कहा, “मैं आपको चुनौती देता हूँ कि आप अपने अधिकारियों से एक टीम भेजने को कहें जिसमें बीआइएस के अफसर भी शामिल हों। वे किसी भी इलाके में जाकर नमूना लें और उसकी जाँच किसी भी प्रयोगशाला में कराएँ। केजरीवाल आज शाम अथवा कल या परसों तक अफसरों को नामित करें।”

बता दें ये रिपोर्ट भाजपा नेता डॉ हर्षवर्धन द्वारा भी उनके ट्विटर हैंडल पर शेयर की गई है। जिसपर प्रतिक्रिया देते हुए केजरीवाल ने कहा, “सर आप तो डॉक्टर हैं। आप तो जानते हैं सर ये रिपोर्ट झूठी है और राजनीति से प्रेरित है। आप जैसे व्यक्ति को गंदी राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहिए।”

JNU बहुत कुछ है… देश का सबसे बेहतर शोध संस्थान जो रैंकिंग में फिसड्डी और राजनीति का अड्डा है

मुझे लगता है कि आम जनता को, जो इस मुआमले से सीधे-सीधे जुड़े नहीं हैं, JNU के बारे में बहस नहीं करनी चाहिए। हमें न तो दक्षिणपंथी लोगों द्वारा फैलाई जा रही बातों में आना चाहिए, और न ही यहाँ के कुछ कुत्सित मानसिकता वाले छात्रों की बातों में आना चाहिए। हालाँकि, JNU के वर्तमान छात्रों से अधिक वो लोग वातावरण को प्रदूषित कर रहे हैं जो या तो यहाँ से अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके हैं, या फिर कहीं और सेटल होकर फ्री टाइम में फेसबुक पर ज्ञान दिए जा रहे हैं। ये लोग बस सहानुभूति, कचोट और पुरानी खुजली को फिर से खुजाने के सुखद अहसास भर के लिए प्रेमिका की शादी में पत्तल लगाने वालों की तरह हैं, जो न तो लड़की का कोई फायदा करवा पाते हैं और न ही नए लड़के का।

खैर, अब बात यह है कि हमें करना क्या चाहिए। यदि हमारे अंदर देश की शिक्षा-व्यवस्था को लेकर इतनी ही अधिक चिंता है तो हमें सोचना चाहिए कि आखिर इस शिक्षा संस्थान में ऐसा क्या है कि ये अब हमेशा विवादों मे ही रहता है। हमें सोचना चाहिए कि जहाँ हम बच्चों को ज्ञान अर्जन के लिए भेजते हैं, शोध के लिए भेजते हैं, वहॉं वो ‘ले के रहेंगे’, ‘SAVE KASHMIR’, वामपंथ, दक्षिणपंथ, ‘GO BACK BHAGWA’, ‘मोदी हाय-हाय’ करना क्यों सीखने लगते हैं? जहाँ हमें गरीबी के नाते जल्द से जल्द डिग्री लेकर कुछ करना चाहिए, वहॉं क्यों बच्चे एक के बाद दूसरी, और दूसरी के बाद तीसरी डिग्री करना चाहते हैं? जिस बच्चे को सूतापट्टी या मोतीझील से ख़रीदे कपड़े का शर्ट-पेंट सिलवा वहॉं भेजा जाता है वो आखिर कैसे वहॉं जींस और फैब इंडिया का कुरता पहनना सीख जाता है?

जिस बच्चे को अपने घर में सुपारी का एक टुकड़ा खाने पर लम्बा भाषण सुनना पड़ता था वो कैसे वहॉं व्हिस्की, जिन, रम, स्कॉच, कसौल आदि का फर्क समझने लगता है? जिस बच्चे को सुबह सूर्योदय से पहले “कराग्रे वास्ते लक्ष्मी” से उठने की बात सिखाई जाती थी, वो कैसे 10 बजे उठकर निम्बू पानी निचोड़ने लग जाता है? और हाँ, ऐसा क्या हो जाता है छात्र के साथ की वो अपने कमरे में देसी स्वामी विवेकानंद के कोट वाली पोस्टर हटाकर विदेशी मार्क्स और लेनिन को अपना लेता है?

JNU देश का सर्वश्रेष्ठ शोध संस्थान है, इसमें कोई दो राय नहीं। थोड़ा नजर उठाकर देखेंगे तो पाएँगे कि भले ही अपने देश में शोध का बहुत महत्व न हो, दुनिया भर में शोध के नाम पर मिलने वाली नौकरियों में सबसे अधिक पैसा है। ऐसे में JNU के अधिकतर छात्र शोध के बाद विदेश चले जाते हैं… ध्यान देंगे तो पाएँगे कि वाकई यहाँ रहने वाले खालिद और कन्हैया ही हैं अधिकतर।

हमें यह भी सोचना चाहिए की देश की बहुत छोटी आबादी ही JNU पहुँच पाती है। देश में इंजीनियर बन रहे हैं, डॉक्टर बन रहे हैं, CA बन रहे… ये सब JNU से नहीं आते, देश फिर भी चल रहा है।

ऐसे में सामान्य जन को JNU के नाम पर न तो समर्थन, और न ही विरोध में हाइप क्रिएट करना चाहिए। वजह कई सारे हैं। JNU अब वो नहीं रहा जिसके लिए उसे 1969 में बनाया गया था। न तो जगदीश चंद्र बोस यहाँ से पढ़े थे, न रामानुजन, न विक्रम साराभाई, न होमी जहाँगीर भाभा, न रामन और न ही अबुल कलाम। कुछ इकोनॉमिस्ट हुए जो JNU से निकले और विदेश में बड़ा नाम किया। उनकी शोध पर उन्हें नामचीन पुरस्कार भी मिला, किन्तु उनके इस शोध का मानव जीवन पर कोई सकारात्मक असर पड़ा हो, बताइए। वर्ल्ड बैंक, यूनिसेफ या संयुक्त राष्ट्र संघ की फाइलों में पड़ी इनकी शोध धूल खा रही है… न तो दुनिया से भुखमरी समाप्त हो रही है और न ही जलवायु संतुलन के ठोस काम आया है ये शोध।

ऐसा नहीं है कि सारी बुराई ही है इधर, नि:संदेह कुछ अच्छे छात्र भी आए JNU से, किन्तु JNU इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि इसके लिए लोग आपस में लड़ने लगें और फिर JNU पर हल्ला करने से अन्य स्थानों पर शिक्षा-व्यवस्था सुधर जाएगी, सस्ती हो जाएगी… क्योंकि सरकार की सब्सिडी से JNU लगभग मुफ्त है और बाकी संस्थानों को अपना वित्त खुद देखना पड़ता है। हम अभी इतने विकसित और सशक्त अर्थव्यवस्था हो गए हैं कि देश भर में पढ़ाई का स्तर JNU सरीखा और मुफ्त कर सकें।

ऑस्ट्रेलिया एक ऐसा देश है जो बड़े शोधपरक सर्वेक्षणों के लिए जाना जाता है। यहाँ की एक संस्था है कैलिपर जो विश्व की तीन बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनी में प्रवेश के लिए टेस्ट पेपर बनाती है। बजाय पास-फेल के, यह नियुक्ति के पद के हिसाब से आदमी को सही या गलत बताती है और फिर आपका सलेक्शन यहाँ होता है।

सिडनी, ऑस्ट्रेलिया की ही एक संस्था है युनीरैंक। युनीरैंक विश्व भर में रैंकिंग सिस्टम के लिए प्रसिद्ध है। यह विश्वभर की 13,600 विश्वविद्यालयों से जुड़ी है और वहॉं के पिछले 4 साल के रिकॉर्ड के हिसाब से वृहत स्तर पर रैंकिंग तय करती है। इस संस्था के 2019 की रैंकिंग में पहले 200 विश्वविद्यालयों में भारत का कोई भी विश्वविद्यालय नहीं है।

मुझे पता है आप तर्क देंगे की भारत विकसित नहीं है तो यह संभव नहीं, कोई बड़ी बात नहीं। इस लिस्ट के प्रथम 20 स्थानों में सिर्फ अमेरिका और चीन है और उसके बाद इनके अलावा ब्रिटेन और कनाडा जैसे देश। एशिया की रैंकिंग में प्रथम 50 की रैंकिंग में दिल्ली यूनिवर्सिटी 7वें और IIT, मद्रास 50वें स्थान पर है। 200 तक की रैंकिंग पढ़ डाली मैंने, अफ़सोस JNU का नाम नहीं दिखा मुझे।

इस संस्था ने देश के स्तर पर भी रैंकिंग दी है। मैं संस्था द्वारा 2019 के प्रथम 5 भारतीय विश्वविद्यालयों का नाम बताता हूॅं आपको:
रैंक 1 – दिल्ली यूनिवर्सिटी
रैंक 2 – आईआई टी, मद्रास
रैंक 3 – आईआईटी, मुंबई
रैंक 4 – आईआईटी, कानपुर
रैंक 5 – आईआईटी, खड़गपुर

आपको JNU नहीं दिखा होगा। सो बता दूँ कि JNU इस रैंकिंग के दसवें स्थान तक भी कहीं नहीं है, बल्कि इसकी रैंकिंग 12वीं है हिंदुस्तान में। फिर से दुहराऊँगा कि JNU भारत में उपलब्ध सबसे बेहतर शोध संस्थान है… किन्तु ऐसा बिलकुल नहीं कि आप JNU के नाम पर लड़ मरें। वो महारथी तो बिलकुल ही चुप रहें जो कहते हैं कि प्रवेश परीक्षा पास करके दिखाओ, उनसे कहूॅंगा कि जाओ आप शोध के लिए फ़िनलैंड जहाँ अब तेज हिंदुस्तानी छात्र जा रहे… जहाँ केवल फ़ीस ही नहीं लगती बल्कि अच्छे-खासे पैसे भी दिए जाते हैं शोध करने के लिए।

सो मित्रो, बिना किसी लाग-लपेट और द्वेष-ईर्ष्या के कहूॅंगा- JNU बहुत अच्छा है, किन्तु यह राजनीति का अड्डा भी है। इससे खुद को दूर रखें, अपने आसपास की बेहतरी को देखें, तो हमारे आपके अलावा हमारे देश के लिए भी बेहतर होगा।

मुस्लिम आतंकियों और केरल के माओवादियों के बीच गहरे संबंध- CPM

केरल की सत्ताधारी पार्टी सीपीआई (मार्क्‍सवादी) ने इस्लामिक आतंकवाद पर एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि मुस्लिम आतंकवादी राज्य में माओवादियों को बढ़ावा दे रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार केरल में कोझिकोड जिले में सीपीएम के सचिव पी मोहनन ने कहा है कि माओवादियों और इस्‍लामिक आतंकवादियों के बीच बेहद घनिष्‍ठ संबंध हैं, जिसकी राज्‍य की पुलिस को जाँच करनी चाहिए।

उनके अनुसार, “राज्य में माओवादियों की शक्ति मुस्लिम आतंकवादी संगठन हैं जो उन्हें खाद-पानी देकर बढ़ावा दे रहे हैं। पुलिस को इस एंगल की जाँच करनी चाहिए।”

उनके मुताबिक नेशनल डेवेलपमेंट फ्रंट (एनडीएफ) और इस्लामिक फंडामेंटालिस्ट्स माओवादियों का समर्थन करने के लिए बहुत उत्साहित रहते हैं।

यहाँ बता दें कि एक ओर जहाँ पी मोहनन का ये बयान आया है वहीं 28 अक्टूबर को पलक्कड़ जिले के अट्टापेडी में पुलिस के दो दिन के तलाशी अभियान के दौरान मुठभेड़ में मारे गए 4 माओवादियों की घटना पर केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने फिलहाल न्यायिक जाँच करवाने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि पुलिस की ओर से यदि कोई गलती हुई है तो उसका पता लगाने के लिए मैजिस्ट्रेट जाँच चल रही है।

नवभारत की रिपोर्ट के मुताबिक विजयन ने कहा, “पुलिस ने आत्मरक्षा में गोलियाँ चलाईं। माओवादी पुलिस की ड्यूटी में बाधक बन रहे थे। पुलिस की ओर से कोई चूक होने के आरोपों को हम देख रहे हैं। मैजिस्ट्रेट जाँच जारी है। “

कमलनाथ के खिलाफ 5000 शिक्षकों का प्रदर्शन, सैलरी नहीं दे रही कॉन्ग्रेस सरकार

मध्यप्रदेश के सरकारी कॉलेजों के शिक्षक तनख्वाह न मिलने के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। मध्य प्रदेश कॉलेजियेट प्रोफेसर्स यूनियन के इस प्रदर्शन में तकरीबन 5000 शिक्षक आन्दोलन कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक यह आन्दोलन तीन चरणों में होगा जिसमें प्रदर्शन करने वाले शिक्षक 21 नवम्बर से प्रतिदिन राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार को उनके (शिक्षकों के) बकाया पैसे देने के लिए पत्र लिखेंगे।

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यूनियन के अध्यक्ष कैलाश त्यागी ने कहा, “हम बड़े खुश थे जब हमने सुना कि हमारी तनख्वाह दिवाली से पहले ही दे दी जाएगी, मगर हमें आज तक सैलरी नहीं मिली। मुझे तो यह जानकारी भी मिली है कि कई कॉलेजों में तो शिक्षकों को दो महीने से तनख्वाह नहीं मिली।”

एक अन्य प्रोफ़ेसर ने बताया, “हम सबकी अपनी मजबूरियाँ हैं, परिवार की भी ज़िम्मेदारी है। हम ईएमआई तक नहीं भर पा रहे। आप समझ सकते हैं कि हम किन हालात से गुज़र रहे हैं।”

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों ने अपना विरोध दर्ज कराने के लिए 24 से लेकर 30 नवम्बर तक काली पट्टी बाँधने का निश्चय किया है। सरकारी शिक्षकों के एक एसोसिएशन के सचिव प्रोफेसर आनंद शर्मा ने ने बताया कि 1 दिसंबर से सभी शिक्षक शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे।

शुरुआत में इस मुद्दे को टालने के लिए राज्य की कमलनाथ सरकार ने कहा था कि उनके पास शिक्षकों ऐसी कोई शिकायत ही नहीं पहुँची है। मगर इसके बाद सोमवार शाम राज्य के उच्च शिक्षा विभाग की ओर से सभी शिक्षकों को मैसेज भेजा गया जिसमें लिखा था कि उनकी अक्टूबर की सैलरी तत्काल प्रभाव से उन्हें भेज दी गई है।

शिक्षकों के प्रति मध्य-प्रदेश सरकार के उदासीन रवैये के खिलाफ लम्बे समय से वहाँ के शिक्षक अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। 5 सितम्बर को टीचर्स डे के दिन गेस्ट फैकल्टी के तौर पर काम करने वाले कई लेक्चरर अपना विरोध दर्ज कराने भोपाल पहुँचे थे। उनका कहना था कि प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार उन्हें परमानेंट करने के अपने वादे से मुकर रही है।

भोपाल में शिक्षक दिवस पर शिक्षकों के प्रदर्शन से भड़क कर कमलनाथ के कैबिनेट मंत्री गोविन्द सिंह ने कहा था, “सरकार के पास पैसे पेड़ पर नहीं उगते, सरकार आने वाले पाँच साल में अपने वादे को पूरा करने की कोशिश करेगी।”

बता दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने चुनाव पूर्व यह वादा किया था कि सत्ता में आने पर वे गेस्ट के तौर पर काम करने वाले 80,000 शिक्षकों को परमानेंट कर देंगे, मगर अभी तक इस सम्बन्ध में कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई है।

सीताराम! नक्सली आतंकियों के नाजायज बापों को राम से इतनी एलर्जी क्यों है…

मार्क्सनंदन कामपंथी वामभक्तों की पार्टी ‘माकपा’ ने दो दिन की बैठक की। बैठक क्यों की, इसकी क्या जरूरत थी, ये इनके पार्टी वालों को छोड़ कर किसी की समझ में नहीं आता। इन्हें अब स्कूल की प्राइमरी कक्षाओं में मॉनीटर का चुनाव छोड़ कर कोई पूछने वाला बचा नहीं है, लेकिन 24/7 चिल्लाने वाली मीडिया में खबरों की कमी के बीच इनसे भी दो बातें पूछ ली जाती हैं कि भैया, दो दिवसीय चिंतन जो किया उसमें हुआ क्या।

इन्होंने अपने मुद्दे तक सत्ता की चाहत में भुला दिए, जो कि बाकी पार्टियों द्वारा हथिया लिए गए, तब इनके पास सिवाय कल्पनाशीलता के कुछ बचता नहीं है। आज इनकी हालत इतनी बेकार हो चुकी है कि केरल में वामपंथी सरकार ने जब दो वामपंथियों को यूएपीए के तहत जेल में डाल दिया तो बिफर गए कि अपनी सरकार में ऐसा कैसे हो सकता है।

इनके दो दिवसीय बैठक से जो मूल बात निकल कर बाहर आई वो यह है कि ‘अयोध्या पर फैसला आया है, न्याय नहीं हुआ।’ इसके साथ ही भावुकता में बहते हुए मार्क्सवंशियों ने यहाँ तक कहा कि ये फैसला एक खास वर्ग के लोगों को ध्यान में रख कर दिया गया है। उनकी इस पंक्ति से सड़ाँध मारने वाले तर्क की दुर्गंध फैल जाती है। इनके कहने का मतलब यह है कि ‘हिन्दुओं को ध्यान में रख कर फैसला दिया गया है’, जबकि सुप्रीम कोर्ट को ‘इस वर्ग के नहीं, दूसरे वर्ग के लोगों को ध्यान में रख कर फैसला देना चाहिए था।’

आप इनकी ऐंठ देखिए कि है कुछ नहीं इनके पास, लेकिन जो है उसी को इतनी जोर से बजा रहे हैं कि कब फूट जाए, पता नहीं। इनकी ऐंठ और घमंड यह है कि इनके लिए भारतीय इतिहास 1949 से ही शुरु होता है। उसके पहले जो हुआ, उसको बोलते भी नहीं कहीं। बहुत पीछे जाते हैं तो 1528 में पहुँचते हैं जहाँ रहमदिल, आलमपनाह बाबर, जिसके माता और पिता पक्ष पर करोड़ों हत्याओं का रक्त है, कंधे पर पत्थर उठा कर एक जंगल-झाड़ में, छेनी-हथौड़ा से कूटते हुए मस्जिद बनाता दिखता है।

इनका वश चले तो यही कह दें कि बाबर ने ही भारत को समुद्र से खींच कर बाहर निकाला था, और हर भारतीय को उसका शुक्रगुजार होना चाहिए। इनका वश चले तो सुप्रीम कोर्ट में जज नहीं, पोलित ब्यूरो के सदस्य बैठेंगे।

चीन के उइगरों पर चुप क्यों हो?

1962 के भारत-चीन युद्ध में चीन का समर्थन करने वाले वामपंथी, आज मंदिर के ऊपर बनी उस नासूर मस्जिद के लिए ‘हाय बाप-हाय दादा’ चिल्ला रहे हैं, जैसे कि उसी मस्जिद में इनके युवा काडरों के लिए विशिष्ट पदार्थों का भंडारण होता था जिसके सेवन से ऐसे दुनिया बदलने वाले ख्याल इनके दिमाग में उपजते हैं।

आम तौर पर वेनेजुएला से ले कर स्वीडन तक के वामपंथी लम्पटों के लिए तुरंत झंडा निकाल लेने वाले भारतीय वामपंथी, चीन पर झंडे का डंडा स्थान विशेष में छुपा लेते हैं। उइगरों के साथ जो चीन कर रहा है, उस पर एक बयान तक नहीं आता। ये तो कम्यून मानते हैं, देश तो ‘टुकड़े-टुकड़े’ हो जाए, ‘केरल, पंजाब, बस्तर’ सबके लिए आजादी माँगते हैं, फिर भारत के समुदाय विशेष और चीन के उइगरों में अंतर कैसा? वो इसलिए कि भारत का समुदाय विशेष कन्हैया को वोट देता है, वहीं उइगर मुस्लिम महिलाओं के साथ चीनी राष्ट्रपति क्या करवा रहे हैं, वो इंटरनेट पर मिल जाएगा।

बैठक में बताया जा रहा है कि राफेल और सबरीमाला पर भी इनकी कुछ राय है। इनकी राय सुप्रीम कोर्ट के साथ नहीं है। ये चाहते हैं कि सारी हिन्दू परम्पराएँ ध्वस्त हो जाएँ, लेकिन धर्म/मजहब को न मानने वाले ये चम्पू अचानक से मस्जिद के लिए कंधे पर ईंट ले कर चलने को तैयार हैं।

वामपंथियों से सीधा सवाल यह है कि जब तुम सर्वहारा की लड़ाई लड़ने का ज्ञान देते हो, तो इसमें मस्जिद की उपयोगिता कहाँ से आ गई? विचार इस पर करो कि खास समुदाय में एक प्रतिशत महिलाएँ ही ग्रेजुएट क्यों हैं? बहुत ज्यादा दया आती है अल्पसंख्यकों की स्थिति पर तो हलाला जैसी बेहूदगी से मुक्त करवाओ उन्हें! अगर कथित अल्पसंख्यकों से इतना ही प्रेम है तो उनकी आधुनिक शिक्षा के लिए प्रयास करो, उन्हें मदरसों से बाहर निकालो।

लेकिन वो तुमसे हो नहीं पाएगा। वो इसलिए नहीं हो पाएगा क्योंकि नसों में दोगलेपन से सना हुआ रक्त बह रहा है। मुस्लिम को बाबरी मस्जिद मिले या न मिले, वो जिंदा रह सकता है, अपने जीवन में आगे बढ़ सकता है, लेकिन अगर उसके पास शिक्षा का अभाव है, वहाँ ध्यान नहीं दिया जा रहा है तो वो कहीं पत्थरबाज बनेगा, कहीं आतंकी बनेगा, कहीं कट्टरपंथियों के साथ मिल कर दंगों को अंजाम देगा।

तुम ये कर नहीं पाओगे क्योंकि अपनी मीटिंग में चाय-समोसे का फंड जुटा पाना भी तुम्हारे लिए आज मुश्किल है। वो इसलिए मुश्किल है क्योंकि तुम पर किसी का विश्वास रहा नहीं, और जेएनयू जैसी जगहों पर नितम्ब चिपकाकर चुनाव जीतने से पद तो मिल जाता है, लेकिन गंगा ढाबा पर ‘दो रूपया देना कामरेड, बीड़ी पीनी है’ वाले फंड से बीड़ी ही खरीदी जा सकती है, लोगों का विश्वास नहीं।

इसलिए, मार्क्स को ही अपना बाप बनाने पर तुले मूर्खाधिराजो! हे धूर्त नक्सलियो! हे दोगले वामपंथियो! सुप्रीम कोर्ट को दोष देना बंद करो और अगर सच में चाहते हो मजहब विशेष का उत्थान हो, तो उनकी बेहतरी के लिए कुछ मुद्दे मैं बता रहा हूँ जिसे पकड़ कर तुम्हारा बेहतर टाइमपास हो सकता है: अशिक्षा, कुपोषण, कट्टरपंथ, हलाला-बहुपत्नी प्रथा-तीन तलाक जैसी कुरीतियाँ इत्यादि।

पैटर्न है लोकतंत्र के खम्भों पर लगातार हमला

इनका पैटर्न है ये। पाँच साल से चिल्लाते रहे कि लोकतंत्र की तो हत्या हो गई, आज लोकतंत्र शर्मसार हुआ, आज दोबारा मर गया, आज तो आपातकाल आ गया है, आज तो घृणा फैलाई जा रही है, आज तो असहिष्णुता आ गई है हिन्दुओं में, लेकिन लोकतंत्र का ‘लोक’ इन्हें नकारता रहा। जितनी घटनाएँ ये लोग लिंचिंग, ‘जय श्री राम’, गौरक्षक आदि के नाम पर गिनाते हैं, हर एक में हिन्दुओं को पीड़ित होने का अनुपात ही ज्यादा है।

हर अखलाख के लिए दस भरत यादव हैं, हर पहलू खान के लिए दस प्रकाश मेशराम हैं, हर तबरेज पर दस काँवड़ियों का जत्था है जिस पर पत्थरबाज़ी हुई, हर हिन्दू असहिष्णुता की खबर पर दस खबरें हैं कि दुर्गा की मूर्ति कट्टरपंथियों ने तोड़ी, रामनवमी जुलूस पर हमला किया, कई मंदिर तोड़े, जय श्री राम पर झूठी खबरें फैलाई गईं …

इसलिए, अब मीडिया में जब ये हर बार अपने प्रपंच पर पकड़ लिए जाते हैं तो तथ्य की राह छोड़ कर अब विचार पर उतर आए हैं। पहले ‘मु##मानों की लिंचिंग हो रही है’ को काटने के लिए खबरें छुपा ली जाती थीं, अब वैसा नहीं हो पाता, तो अब ये लोग ऐसी बातें नहीं कर पा रहे। अब इन्होंने विधायिका पर प्रश्न करना छोड़ दिया है और लोकतंत्र के दूसरे खम्भे पर हमला बोलना शुरु कर दिया है।

अब इनके फायरिंग रेन्ज में सुप्रीम कोर्ट है। अब वो सुप्रीम कोर्ट है, वो न्यायपालिका है जिसमें कमोबेश हर भारतीय की आस्था है। अगर इसी खम्भे पर मूत्र विसर्जन कर-कर के, गला दिया जाए, तो इन वामपंथियों का लक्ष्य सध जाएगा। इसलिए, पूरी लॉबी एक साथ, इकट्ठा हो कर चिल्ला रही है कि मजहब विशेष के साथ तो अयोध्या में अन्याय हो गया। एक ऐसा नहीं है इनमें जो यह कह सके कि नहीं, वो जगह हिन्दुओं की थी, मंदिर था, वहाँ मस्जिद बनानी ही नहीं चाहिए थी। और जब बन गई तो मजहब विशेष वालों को साम्प्रदायिक सौहार्द का परिचय देते हुए, बिना कोर्ट कचहरी के, जगह खाली कर देनी चाहिए थी।

उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने लगातार कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर विश्वास है। उन्हें विश्वास इसलिए था क्योंकि बाबरी का ध्वंस लोगों की स्मृतियों में ताजा था। सबको दिखा था कि बाबरी मस्जिद को तोड़ा गया है। इसलिए उम्मीद थी कि फैसला उसी टूटी मस्जिद के आधार पर होगा। राम के अस्तित्व पर सवाल उठाए गए इस देश में! पूछा गया कि वो हुए, ये किसने देखा। रामायण तो मिथ्या है, कल्पना है किसी लेखक की।

इसलिए, जब तक इन्हें उम्मीद थी कि फैसला इनके पक्ष में आएगा, ये चुप रहे। तब तक सवाल नहीं उठाया सुप्रीम कोर्ट पर, लेकिन पाँच जजों के एकमत फैसले को ये दस-बीस वामपंथी नेता ‘अन्याय’ कह रहे हैं। भारत का संविधान सबको बोलने की आजादी देता है, आजादी तो इतनी देता है कि इसी देश के टुकड़े की इच्छा पर ‘इंशाअल्लाह’ कहा जाता है, और लोग कुछ नहीं कहते।

अब सुप्रीम कोर्ट ही उठल्लू हो गया है। अब इन वामपंथियों की सभा तय करेगी कि सुप्रीम कोर्ट के जज क्या फैसला सुनाएँ। ये चाहते हैं कि राफेल में घोटाले की बात मान ले सुप्रीम कोर्ट, नहीं मान रही तो फिर ये लोग खुद जाँच करेंगे। जो सामरिक महत्व की गोपनीय बातें सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए, उसे ये चार चम्पक वामपंथी सरेआम कर देना चाहते हैं ताकि सारे देशों से भारत के रिश्ते खराब हो जाएँ।

लेकिन ऐसी सभा, ऐसा कोर्ट, ऐसी जाँच समितियाँ इन वामपंथियों के सपनों में ही बैठ सकती है क्योंकि इन भिखारियों के पास बीड़ी पीने के तो पैसे हैं नहीं, सभा कैसे बुलाएँगे।

वीर सावरकर को भारत रत्न देने के लिए पैरवी की जरूरत नहीं: संसद में मोदी सरकार

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में बीजेपी ने स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) को भारत रत्न देने का वादा किया था। अब लोकसभा में भी सरकार ने इस पर प्रतिक्रिया दी है। गृह मंत्रालय ने लोकसभा में मंगलवार को कहा कि भारत रत्न के लिए सिफारिशें आती रहती हैं लेकिन इसके लिए किसी औपचारिक सिफारिश की जरूरत नहीं है। समय-समय पर भारत रत्न को लेकर फैसले किए जाते हैं।

बता दें कि संसद के शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन मंगलवार (नवंबर 19, 2019) बीजेपी के ही एक सांसद गोपाल चिन्नया शेट्टी ने इस संबंध में सवाल पूछे। जिसके बाद गृह मंत्रालय की ओर से जवाब में ये बातें कही गई।

गौरतलब है कि भारत रत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है और सरकार इसके लिए राष्ट्रपति से संस्तुति करती है। महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने घोषणा की थी कि सत्ता में आने के बाद वह वीर सावरकर के नाम की सिफारिश भारत रत्न के लिए करेगी। इसे लेकर उस समय भी काफी विवाद हुआ था।

कॉन्ग्रेस सावरकर को भारत रत्न देने की बीजेपी की माँग की निंदा कर रही थी। कॉन्ग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा था, “अगर महात्मा गाँधी की 150 वीं वर्षगाँठ पर यह सरकार वीर सावरकर को भारत रत्न देने के बारे में सोचती है, तो मैं कह सकता हूँ कि इस देश को भगवान ही बचा सकते हैं।”

इसके अलावा उन्होंने बीजेपी की इस माँग पर कटाक्ष करते हुए पूछा था कि वह महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को यह सम्मान देने की माँग क्यों नहीं करती? मनीष तिवारी का कहना था कि सावरकर पर महात्मा गाँधी हत्याकांड में साजिश में शामिल होने के आरोप में मुकदमा चला था। हालाँकि बाद में वह बरी हो गए थे।

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