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लड़ाकू विमान उड़ाने और वॉरशिप पर पराक्रम दिखाने के बाद महिलाएँ अब ‘Defence Attache’ भी बन सकेंगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने महिलाओं को लेकर नए आयाम स्थापित किए हैं। एक समय था जब महिला सशक्तिकरण के नाम पर औरतों को सिलाई मशीन थमा कर सीमित कर दिया जाता था। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं। मोदी के नेतृत्व में इंदिरा गाँधी के बाद देश को निर्मला सीतारमन के रूप में पहली महिला पूर्णकालिक रक्षा मंत्री मिलीं जिन्होंने सशस्त्र सेनाओं के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेज़ करने के साथ सैन्य क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति को भी में संवारा।

प्रायः देखा गया है कि सैन्य सेवाओं को पुरुषों का अधिकारक्षेत्र माना जाता रहा है। पूर्व में भारतीय वायुसेना से रिटायर हुईं एयर मार्शल पी.बंदोपाध्याय (भारत की पहली एयर मार्शल) जैसी महिलाओं ने इस मिथक को तोड़ा है। इस वर्ष (2019) की शुरूआत में फैसला लिया गया कि भारत अपने विदेशी मिशनों में ‘डिफेंस अताशे’ के रूप में महिला अधिकारियों को भी तैनात करेगा। इस फैसले के बाद तीनों सेनाओं से उन महिलाओं की पहचान करने के लिए कहा गया जो इन पदों के साथ न्याय कर सकती हैं। इस दिशा में पहले डिफेंस अताशे के रूप में महिला सैन्य अधिकारियों को यूरोप और अमेरिका के मिशन पर तैनात करने की योजना है।

हालाँकि ये सच हैं कि भारत में अब तक कई प्रतिष्ठित महिलाएँ राजदूत, राजनयिक यहाँ तक ​​कि विदेशी सचिव भी रही हैं, लेकिन डिफेंस अताशे के रूप में पुरुष अधिकारियों को प्राथमिकता दी जाती थी। यह स्वयं रक्षा मंत्रालय ने स्वीकार किया है। लेकिन अब इन पदों के लिए चुनी गईं महिला ऑफिसर्स अपनी तैनाती पर जल्द ही जा सकती है। किसी देश के राजनयिक मिशन में डिफेंस अताशे का पद महत्वपूर्ण होता है। किसी अन्य देश में भारतीय दूतावास में तैनात डिफेंस अताशे सैन्य विशेषज्ञ के रूप में काम करते हैं। वे रक्षा खरीद संबंधित निर्णय लेने में भारत सरकार की सहायता करते हैं।

बीते कुछ वर्षों में भारत की रक्षा और सुरक्षा व्यवस्था में हुए बड़े परिवर्तन के कारण डिफेंस अताशे पद पर तैनात हुए सैन्य अधिकारी की जिम्मेदारियाँ बढ़ गई हैं। रक्षा कूटनीति अब निश्चित रूप से प्रमुख देशों के साथ भारत की राजनयिक भागीदारी का एक अहम हिस्सा हैं।

मोदी नेतृत्व में रक्षा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी

कुछ महीने पूर्व रक्षा मंत्रालय द्वारा इस बात की घोषणा की गई गई थी की भारतीय सेना की 10 शाखाओं में महिलाओं को स्थाई कमिशन मिलेगा। इनमें सिग्नल, इंजीनियर, आर्मी एविएशन, आर्मी एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियर, आर्मी सर्विस कोर, आर्मी ऑर्डनेंस कोर और इंटेलिजेंस भी शामिल होंगे।

अवनी के रूप में देश को पहली लड़ाकू विमान पायट मिली

इसके अलावा भारतीय वायुसेना की सभी शाखाएँ अब महिलाओं के लिए खुली हुई हैं, इस सूची में लड़ाकू विमान के पायलट का पद भी शामिल है। इस दिशा में याद दिला दें कि गत वर्ष फ्लाइंग ऑफिसर अवनी चतुर्वेदी लड़ाकू विमान को उड़ाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं थी जिन्होंने मिग-21 उड़ाकर इतिहास रचा था। यहाँ अवनी के साथ मोहना सिंह और भावना कंठ को भी पहली बार लड़ाकू विमान उड़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

इन तीनों महिलाओं की नियुक्ति पूरे देश के लिए गर्व की बात थी, साथ ही मोदी सरकार की उपलब्धि भी। इसके अलावा मोदी सरकार द्वारा महिला सामर्थ्य पर दिखाया गया अटल विश्वास उस समय दिखा जब देश के 66 वें गणतंत्र दिवस के मौक़े पर तीनों सेनाओं के एक विशेष महिला दस्ते ने मार्च करते हुए अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत का गौरव बढ़ाया।

शुभांगी बनी पहली नेवी पायलट

नौसेना क्षेत्र में शुभांगी के रूप में जब पहली महिला पायलट मिली तो यह देश के लिए गर्व की बात थी। शुभांगी के साथ-साथ आस्था सहगल, रूपा ए. और शक्तिमाया को भी नेवी के आर्मामेंट इंस्पेक्शन ब्रांच में पहली बार नियुक्त किया गया है। पिछले साल नेवी चीफ एडमिरल सुनील लान्बा ने कहा था कि आज नहीं तो कल महिला नौसेना अधिकारियों को युद्धपोत पर तैनाती का अवसर दिया जाएगा।

महिलाओं को सैन्य सेवा में ‘कॉम्बैट रोल’

साल 2017 में थल सेना के प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने कहा था कि जल्द ही महिलाओं को कॉम्बैट रोल (लड़ाकू भूमिका) देने की तैयारी है। अभी तक दुनिया में कुछ चुनिंदा देश ही ऐसा कर पाए हैं। रावत ने कहा था कि महिलाओं को कॉम्बैट रोल, जिसमें अभी तक केवल पुरुष ही होते हैं, देने की प्रकिया तेजी से बढ़ रही है। शुरुआत में महिलाओं को मिलिट्री पुलिस में शामिल किया जाएगा। लेकिन बाद में जनरल बिपिन रावत द्वारा इस फैसले पर स्वयं ही सवालिया निशान लगा दिए गए। जिनको कई लोगों द्वारा वाजिब भी बताया गया।

2018 में इस विषय पर जनरल बिपिन रावत के बयान ने उस समय तूल पकड़ा जब उन्होंने महिलाओं को कॉम्बैट रोल पर संशय जताया। न्यूज़ 18 को दिए इंटरव्यू में कहा भारत अभी महिलाओं को कॉम्बैट रोल में देखने के लिए तैयार नहीं है। रावत ने कहा था कि महिलाओं की ज़िम्मेदारी माँ के रूप में है और उनको छह महीने का मातृत्व अवकाश देना भी मुश्किल है। साथ ही जनरल बिपिन रावत ने महिलाओं की सुरक्षा और सहजता को आधार बताकर भी उन्हें कॉम्बैट रोल देने के लिए असमर्थ बताया। उन्होंने साक्षात्कार में कहा कि ऐसा नहीं है देश में बच्चों की माँ नहीं मरती हैं, लेकिन आतंकी ऑपरेशन में आतंकवादियों को मारने के दौरान जैसे हमारे जवानों का शरीर वीरगति प्राप्त करके घर लौटता है, उस तरह से महिलाओं को देखने के लिए अभी हमारा समाज तैयार नहीं हैं।

इसके अलावा बिपिन ने अपने साक्षात्कार में अपने 2017 के बयान को बदलने के पीछे एक वजह यह भी बताई कि हमारी सेना में अधिकतर जवान गाँव से आते हैं। जो अभी इन चीजों को एकदम से स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं। उनके अनुसार बहुत से सैनिकों के बहुत से कार्य (कपड़े बदलना, जिम जाना आदि) ऐसे होते हैं जिन्हें सुरक्षा पर तैनात जवान एक साथ कर लेते हैं, लेकिन महिलाएँ उसमें सहज नहीं होंगी।

हालाँकि इस विचार के बाद इसपर काफ़ी विमर्श चल रहा है और महिलाओं को माँ के रूप में दर्शाकर कई अटकलें भी लग रही हैं। लेकिन यकीनन जिस तरह से सरकार द्वारा महिलाओं को रक्षा के क्षेत्र में तैनात करने की प्रक्रिया तेज हैं। उस दिशा में जल्द ही कॉम्बैट रोल को लेकर भी संकोच वाली स्थिति जल्दी समाप्त होगी। बता दें जिन सवालों से आज भारत गुज़र रहा है, उन्हीं दुविधाओं से साल 2013 में अमेरिका को भी जूझना पड़ा था जब वह अपनी सेना में महिलाओं को कॉम्बैट रोल देने पर विचार कर रही थी, लेकिन बाद में इसपर स्टडी हुई और आखिरकार अमेरिका में महिलाएँ कॉम्बैट रोल में शामिल हुईं। अमेरिका के अलावा डेनमार्क, एस्टोनिया, फिनलैंड, जर्मनी, फ्रांस, इज़रायल ने भी इस मामले से जुड़ी मुश्किलों को समाप्त किया। यकीनन भारत में भी इसपर काम होगा।

आज भारत में अनेकों लिहाज से महिलाओं की भूमिका को संवारा जा रहा है। फिर चाहे वो महिलाओं के निजी जीवन से संबंधित हो स्थिति हो या फिर देश में रक्षा के लिए तैनात होने को लेकर। हर रूप में और हर क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रक्रिया चालू है। निर्माला सीतारमन के रूप में देश को एक सशक्त रक्षा मंत्री का मिलना, राजपथ पर महिलाओं के दस्ते द्वारा भारत का गौरव बढ़ाना, अवनी द्वारा लड़ाकू विमान उड़ाना और शुभांगी का नेवी पायलट बनकर पहचान बनाना, इसके साथ ही अब डिफेंस अताशे के रूप में महिला अधिकारियों की नियुक्ति होना नए भारत की नई तस्वीर है।

कुश द्वारा बसाए, मुगलों ने बदली जिसकी पहचान… UP के उस जिले को अब मिलेगा नया नाम!

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सुल्तानपुर जिले का नाम बदलने के लिए खत लिखा है। इस खत में उन्होंने ‘राजपूताना शौर्य फाउंडेशन’ की माँग का जिक्र करते हुए सीएम योगी से सुल्तानपुर जिले का नाम बदलकर कुशभवनपुर करने की सिफारिश की है।

राम नाईक ने पत्र में लिखा, “राजपूताना शौर्य फाउंडेशन के प्रतिनिधि मंडल द्वारा मुझसे मुलाकात कर एक किताब ‘सुल्तानपुर इतिहास की झलक’ के साथ एक ज्ञापन सौंपा गया। इसमें उन्होंने सुल्तानपुर को हेरिटेज सिटी में शामिल किए जाने और उसका नाम बदलकर कुशभवनपुर किए जाने का अनुरोध किया है।” राम नाईक ने सीएम योगी से कहा है कि इस किताब के आधार पर उचित कदम उठाया जाए। उन्होंने खत के साथ वो पुस्तक भी सीएम योगी को भेजी है।

गवर्नर राम नाईक द्वारा सीएम योगी को लिखी गई चिट्ठी

सुल्तानपुर जिले का नाम बदलने की माँग नई नहीं है। ये माँग काफी दिनों से उठ रही है। हाल ही में सुल्तानपुर नगरपालिका में एक प्रस्ताव भी पास किया गया। इससे पहले सुल्तानपुर के लंभुआ से भाजपा विधायक देवमणि ने विधानसभा में जिले का नाम बदलने का प्रस्ताव रखा था। देवमणि का कहना था कि अयोध्या से सटे सुल्तानपुर को भगवान राम के पुत्र कुश ने बसाया था। इसलिए पौराणिक कथाओं में इसे कुशभवनपुर नाम से संबोधित किया गया था। उन्होंने कहा था, “देवी सीता यहीं ठहरी थीं। उनकी याद में आज भी सीताकुंड घाट है। सुल्तानपुर के गजेटियर में भी इस बात का उल्लेख है कि इसका नाम कुशभवनपुर ही था। बाद में मुगल शासकों ने इसका नाम बदल दिया था। ऐसे में इसका पुराना नाम होने से जहाँ गर्व की अनुभूति होगी, वहीं शहर का सांस्कृतिक महत्त्व भी बढ़ेगा।”

गौरतलब है कि इससे पहले योगी सरकार द्वारा इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज, फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या और मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन किया गया है।

‘प्रधानमंत्री एक अनपढ़, जाहिल या रास्ते पर चलने वाले आदमी की तरह बात करते हैं’

वैसे तो प्रधानमंत्री को लेकर विपक्ष के बोल हमेशा से ही कड़वे रहे हैं लेकिन चुनाव के नज़दीक आते ही इन बयानों की संख्या काफ़ी ज्यादा बढ़ गई है। ऐसे में एनसीपी के नेता और 1993 में मुंबई धमाके के आरोपित याकूब मेमन के वकील मजीद मेमन ने इस बार पीएम को जाहिल और अनपढ़ जैसे शब्द कहे हैं।

नेशनल कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता माजिद मेमन ने सोमवार (अप्रैल 1, 2019) को एएनआई से पीएम मोदी के लिए कहा, “मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री भी एक अनपढ़, जाहिल या रास्ते पर चलने वाले आदमी की तरह बात करते हैं। वो इतने बड़े पद पर बैठे हैं, उनका पद एक संवैधानिक पद है। उस संवैधानिक पद के लिए प्रधानमंत्री रास्ते में नहीं चुना जाता।”

प्रधानमंत्री को उनके पद की गरिमा का एहसास दिलाने वाले मजीद मेमन द्वारा प्रधानमंत्री के लिए की गई ऐसी अभद्र टिप्पणी स्वयं ही दर्शाती है कि संवैधानिक पद का हवाला देने वाले खुद कितना उस पद का सम्मान करते हैं।

इससे पहले भी जब पीएम 2018 में बोहरा समाज के कार्यक्रम में शामिल हुए थे तो मेनन ने एक समाचार चैनल से बातचीत में कहा था कि मोदीजी बोहरा समाज के पास गए। वो इस विचार से गए कि शायद समुदाय विशेष को रिझा लिया जाएगा, लेकिन न वे इधर के रहेंगे, न ही उधर के। धोबी के कुत्ते वाली बात हो जाती है।

मजीद मेमन के बारे में बता दें कि ये वही शख्स हैं, जिन्होंने याकूब को बचाने के पक्ष में तर्क दिया था कि याकूब को मौत की सज़ा सिर्फ़ इसलिए सुनाई जा रही है क्योंकि वो मुस्लिम है। आतंकी को मिली सज़ा को समुदाय से जोड़ कर दलील पेश करने वाले मजीद ने महाराष्ट्र सरकार पर इल्जाम लगाया था कि वह राजनीतिक कारणों, सांप्रदायिक कारणों, अतिरिक्त कानूनी विचारों के लिए याकूब को मारने में दिलचस्पी लेती दिखाई दे रही है।

‘मायावती हो गई हैं मनुवादी, फैला रही हैं ब्राह्मणवाद’: भीम आर्मी नेता चंद्रशेखर

भीम आर्मी चीफ़ चंद्रशेखर ने बसपा सुप्रीमो मायावती से पूछा है कि जिन सवर्णों को टिकट दिया गया है उनका बहुजन के उत्थान में क्या योगदान रहा है? इसके अलावा मायावती को घेरते हुए चंद्रशेखर ने कहा कि बहुजन विरोधी मनुवादी सवर्णों को टिकट दिया जा रहा है और दूसरी तरफ मिशनरी कार्यकर्ताओं को एजेंट बताया जा रहा है।

ट्विटर के माध्यम से चंद्रशेखर ने मायावती को जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मायावती को सतीश चंद्र मिश्रा गुमराह कर रहे हैं, उन्होंने एक-एक करके कांशीराम की टीम के सहयोगियों को बाहर करवा दिया है। विरोधों के बावजूद ब्राह्मणवादी और संविधान विरोधी लोगों को टिकट देकर संसद भेजने कोशिश की जा रही है।

चंद्रशेखर ने ट्विटर पर वसीम अकरम त्यागी के उस ट्वीट को भी रीट्वीट किया जिसमें त्यागी ने मायावती पर मनुवादी होने का आरोप लगाया। अपने ट्वीट में त्यागी ने लिखा था कि गुजरात दंगों के बाद गुजरात जाकर मोदी का प्रचार करने वाली बहन जी सहारनपुर में दलितों के अत्याचार के ख़िलाफ़ जेल काटने वाले भीम आर्मी चीफ़ को भाजपा का एजेंट बता रही हैं, इससे शर्मनाक और क्या हो सकता है? बहन जी मनुवादियो से घिरी रहती हैं इसलिए ख़ुद मनुवादी बन बैठीं हैं।

मायावती ने चंद्रशेखर द्वारा वाराणसी से चुनाव लड़ने को लेकर भाजपा की साज़िश बताया और ट्वीट किया था कि भाजपा दलित वोट काटने की मंशा से चंद्रशेखर को वाराणसी से चुनाव लड़वा रही है। इसे मायावती ने भाजपा का षडयंत्र करार दिया था और कहा था कि भीम आर्मी का निर्माण भी भाजपा की चाल है जिससे दलित विरोधी मानसिकता की राजनीति की जा सके।

अपने एक अन्य ट्वीट में मायावती ने लिखा था कि चंद्रशेखर को बसपा में भेजने के पीछे भाजपा द्वारा जासूसी करने की मंशा थी, जो विफल हो गई है।


अनुच्छेद 370 की बहस में अब फ़िल्मी दुनिया की ‘सेलिब्रिटी’ हुईं शामिल, ट्विटर पर हुई नोकझोंक

अनुच्छेद 370 पर आए दिन सोशल मीडिया पर जुबानी जंग होती रहती है। इस बार यह जंग बिग बॉस की कंटेस्टेंट रह चुकी पायल रोहतगी और एक्ट्रेस गौहर ख़ान के बीच दिखी। पायल के एक ट्वीट ने बवाल मचा दिया है। यह ट्वीट उन्होंने अनुच्छेद 370 को लेकर किया जिसके बाद गौहर ख़ान और उनके बीच तीखी बहस का सिलसिला शुरू हो गया।

दरअसल, पायल रोहतगी ने अपनी पोस्ट में लिखा कि अगर जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया जा सकता है तो वहाँ से मुस्लिमों को भी बाहर कर देना चाहिए। बहुत से ऐसे कश्मीरी लोग हैं जो अन्य शहरों में बस गए हैं। कश्मीर हमेशा भारत का हिस्सा रहेगा, फिर चाहे कोई कश्मीर में रहे या न रहे। पंडितों को बाहर निकाल दिया गया, अब मुस्लिमों को भी बाहर निकाल देना चाहिए।

इस ट्वीट के बाद एक्ट्रेस गौहर ख़ान ने चुटकी लेते हुए जवाब में लिखा कि ये बात वो शख़्स कर रहा है जो ख़ुद 90% मुस्लिम आबादी के बीच ख़ुशी से रह रहा है। मुझे अब, बिल्डिंग में रहने वाले मुस्लिमों पर गर्व है जो तुम्हारे जैसे शख़्स को बर्दाश्त कर रहे हैं।

इसके अलावा अपने एक अन्य ट्वीट में गौहर ने लिखा कि कुछ लोग दूसरे मजहब वालों को अपना घर किराए पर नहीं देते हैं। नफ़रत फैलाना आसान है, इस तरह के विचारों पर शर्म आती है। भारत अपनी विविधताओं की वजह से सुंदर है। ऐसे लोगों को शर्म आनी चाहिए जो भारत को बाँटने की बात करते हैं।

गौहर के इन ट्वीट्स का जवाब पायल रोहतगी ने दिया और लिखा कि एक आंटी जिसने बिग बॉस जीतने के लिए एक हिन्दू लड़के के साथ असफल रिश्ता बनाया वो मेरी बिल्डिंग की आबादी को जानती है। आपको पता होना चाहिए कि मैं फ्लैट की मालकिन हूँ। पायल ने गौहर को कहा, “क्या तुम हिजाब में वर्कआउट करती हो ? क्योंकि मेरी बिल्डिंग में काम करने वाली महिलाएँ ऐसा करती हैं।”

हाल ही में महबूबा मुफ़्ती ने भी कहा था कि अगर अनुच्छेद 370 हटाया गया तो इस पर विचार किया जाएगा कि कश्मीर, भारत का हिस्सा बनेगा या नहीं। उनकी यह टिप्पणी तब सामने आई थी जब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने की बात कही थी।

J&K: पुलवामा में लश्कर के 4 आतंकी ढेर, सर्च ऑपरेशन अब भी जारी

जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले में सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता हाथ लगी है। आज तड़के पुलवामा जिले के लस्सीपोरा में आतंकवादियों और सुरक्षाबलों के बीच जारी मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने 4 आतंकियों को मार गिराया। सुरक्षाबलों को खुफिया सूत्रों से जानकारी मिली थी कि एक घर में कुछ आतंकी छिपे हैं। इसके बाद सेना, सीआरपीएफ और पुलिस ने संयुक्त रूप से तलाशी अभियान चलाया और इलाके को घेर लिया। जब आतंकवादी सुरक्षा बलों से घिर गए तो उन्होंने सुरक्षाबलों पर फायरिंग करना शुरू कर दिया, जिसका सुरक्षाबलों ने मुँहतोड़ जवाब दिया और इस दौरान हुए मुठभेड़ में चार आतंकवादी ढेर हो गए।

जानकारी के मुताबिक, सभी आतंकवादी लश्‍कर-ए-तैयबा के थे। सुरक्षाबलों ने आतंकियों के पास से 2 एके राइफल, एक एसएलआर और एक पिस्टल बरामद की है। सर्च ऑपरेशन अब भी जारी है। जम्मू-कश्मीर पुलिस के अधिकारी ने बताया कि, मुठभेड़ के दौरान सेना के तीन जवान और एक पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। यह एक साफ ऑपरेशन था। मुठभेड़ के दौरान किसी तरह की नागरिक संपत्ति की क्षति नहीं हुई। मुठभेड़ स्थल से हथियार और गोला-बारूद बरामद किया गया है और मामला दर्ज कर लिया गया है।

गौरतलब है कि, इससे पहले सुरक्षा बलों ने 29 मार्च को दो आतंकवादी मार गिराए थे। रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता कर्नल राजेश कालिया ने बताया था कि श्रीनगर शहर के बाहरी क्षेत्र नौगाम में एक मुठभेड़ में आतंकवादी मारे गए। वहीं, 28 मार्च को जम्मू कश्मीर के शोपियां और कुपवाड़ा जिलों में सुरक्षाबलों ने मुठभेड़ में चार आतंकवादी मार गिराए थे। आतंकियों के खिलाफ ‘ऑपरेशन ऑलआउट’ काफी लंबे समय से चल रहा है। इस ऑपरेशन के तहत इस साल अभी तक 250 से ज्यादा आतंकवादियों को मुठभेड़ में मारा गया है, जबकि पिछले साल 217 आतंकवादी ही मारे गए थे। पुलवामा आतंकी हमले के बाद सुरक्षाबलों ने कार्रवाई तेज कर दी है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भी घाटी में सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए हैं।

EMISAT: शत्रु के रडार को पकड़ने में सक्षम भारत का इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सैटेलाइट

इसरो ने आज सुबह 9:30 बजे PSLV C-45 रॉकेट से अन्य देशों के 28 सैटेलाइट सहित EMISAT को भी लॉन्च किया। यह भारत का इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सैटेलाइट है।

इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ELINT) सैटेलाइट क्या होता है?

गुप्तचरी या ख़ुफ़िया तरीकों से सूचना जुटाना मानव इतिहास के सबसे पुराने पेशे में से एक माना जाता है। आधुनिक शब्दावली में इसे ‘Intelligence gathering’ कहा जाता है। जब व्यक्तियों के बीच जाकर सीधा सम्पर्क कर सूचना एकत्रित की जाती है तब उसे ह्यूमन इंटेलिजेंस या HUMINT कहते हैं। लेकिन जब मनुष्यों से सीधा सम्पर्क न कर के उनके द्वारा प्रयोग में लाए जा रहे डिवाइस के सिग्नल को पकड़ कर सूचना जुटाई जाती है तब उसे SIGINT कहा जाता है।

SIGINT दो प्रकार का होता है- एक जिसमें संचार या कम्युनिकेशन हो रहा हो, और दूसरा जिसमें कम्युनिकेशन न हो रहा हो। जब दो व्यक्ति बात कर रहे हों और उनकी बातचीत को सुना जाए तो उसे COMINT कहते हैं। लेकिन जब सिग्नल ऐसा हो जिसमें प्रत्यक्ष रूप से कोई कम्युनिकेशन न हो रहा हो जैसे कि रडार के सिग्नल, तब उसे इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस या ELINT कहते हैं। EMISAT भी शत्रु के रडार के सिग्नल को पकड़ने में सक्षम सैटेलाइट है। डीआरडीओ की 2013-14 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार ‘प्रोजेक्ट कौटिल्य’ के अंतर्गत इस सैटेलाइट का निर्माण किया गया। ‘कौटिल्य’ के अर्थशास्त्र में भी गुप्तचरी की भूमिका को सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है।

एमीसैट के अलावा PSLV C-45 लॉन्च वेहिकल द्वारा अमेरिका के 24, स्पेन का एक, लिथुआनिआ के दो और एक स्विट्ज़रलैंड का सैटेलाइट भी कक्षा में स्थापित किया गया। यह इसरो का 47वां मिशन था जिसे समय पर और सफलतापूर्वक पूर्ण किया गया। इसरो ने इस मिशन को देखने के लिए आम जनता के लिए भी अपने द्वार खोल दिए। लॉन्च के पहले रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया अपनाई गई जिसके कारण सामान्य नागरिकों ने भी यह लॉन्च प्रत्यक्ष देखा।

मुश्किल चुनावों के दौरान सोनिया और इंदिरा भी भागी थीं दक्षिण भारत, जीत कर छोड़ दी थीं सीटें

लोकसभा चुनाव आते ही बड़े से बड़े नेताओं को हार का डर सताने लगता है और जिन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र में कुछ काम ही नहीं किया हो, उनका कहना ही क्या! कुछ ऐसी ही स्थिति राहुल गाँधी की हो चली है। अमेठी में स्मृति ईरानी द्वारा चौतरफा घिरे राहुल को जब कुछ नहीं सूझा, उन्होंने दक्षिण भारत का रुख कर अपनी पारिवारिक परंपरा को निभाया है। केरल के वायनाड से राहुल गाँधी की उम्मीदवारी का ऐलान कर कॉन्ग्रेस ने लोगों की इस आशंका को बल दे दिया है कि राहुल गाँधी के लिए अमेठी में इस बार राह आसान नहीं है। स्मृति ईरानी ने हारने के बावजूद समय-समय पर क्षेत्र का दौरा किया है और जनसम्पर्क किया है। राहुल ने हमेशा की तरह अमेठी को फिर से नज़रअंदाज़ किया, शायद इस कारण उन्हें दो जगहों से परचा भरना पड़ रहा है। लेकिन क्या आपको पता है गाँधी परिवार के दो और लोग दक्षिण भारत से चुनाव लड़ चुके हैं?

यूपी में हारी इंदिरा गाँधी पहुँचीं चिकमंगलूर

दरअसल, इंदिरा गाँधी 1977 में रायबरेली से चुनाव हार गई थीं। प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को भारतीय लोक दल (BLD) के दिग्गज नेता राज नारायण ने हराया था। बीएलडी का जन्म स्वतंत्र पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी सहित 7 कॉन्ग्रेस विरोधी पार्टियों को मिलाकर हुआ था और चौधरी चरण सिंह इसके नेता थे। 1977 में यह जनसंघ के साथ मिलकर जनता पार्टी बना और बीएलडी के चुनाव चिह्न पर ही चुनाव में हिस्सा लिया गया। इंदिरा गाँधी की करारी हार से कॉन्ग्रेस को तगड़ा झटका लगा क्योंकि न सिर्फ़ रायबरेली बल्कि पूरे देश में पार्टी की हालत बदतर हो चली थी। तब पूर्ण बहुमत के साथ जनता पार्टी ने मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाई थी।

रायबरेली में 55,000 से भी अधिक वोटों से हारी इंदिरा ने वापस संसद पहुँचने के लिए चिकमंगलूर का रुख किया था। कर्नाटक के चिकमंगलूर की जीत इंदिरा गाँधी के करियर के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हुई और उन्होंने एक बार फिर से खोई सत्ता हासिल करने की कवायद शुरू की। चिकमंगलूर में एक महीने के गहन प्रचार-प्रसार के दौरान इंदिरा ने रेलगाड़ी, बैलगाड़ी से लेकर बिना एसी वाली एम्बेसडर से भी प्रचार किया। उस दौरान वह एक दिन में 18 घंटे प्रचार किया करती थीं। उस दौरान कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने नारा गढ़ा था- “एक शेरनी, सौ लंगूर – चिकमंगलूर, चिकमंगलूर”।

जनता पार्टी ने दिवंगत जदयू नेता जॉर्ज फर्नांडिस से प्रचार करवाया था। उन्होंने इंदिरा गाँधी को कोबरा बताया था। इंडियन एक्सप्रेस के एक पत्रकार के अनुसार, रामनाथ गोयनका उस समय कॉन्ग्रेस के विरोधी थे और उन्होंने सभी पत्रकारों को इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ हर एंगल से लिखने के निर्देश जारी किए थे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी यह चुनाव चर्चा का विषय बना था। चिकमंगलूर से इंदिरा के 70,000 वोटों से जीतने के बावजूद बाद में यह कॉन्ग्रेस का गढ़ नहीं रहा। भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों ने यहाँ कई बार जीत का परचम लहराया। लेकिन, इतिहास में ये दर्ज हो गया कि जब इंदिरा गाँधी रायबरेली हार गईं, तब दक्षिण भारतीय राज्य के एक संसदीय क्षेत्र ने उन्हें वापस संसद पहुँचाया।

जब बेल्लारी में हुआ सोनिया बनाम सुषमा मुक़ाबला

इसी तरह जब सोनिया गाँधी ने पहली बार चुनाव लड़ा, तो उन्होंने अमेठी के साथ-साथ कर्नाटक के बेल्लारी से पर्चा भरा। उस समय सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के होने के कारण उन्हें लेकर देश में विवादों का दौर चल रहा था। भाजपा की फायरब्रांड नेता रहीं सुषमा स्वराज ने तो यहाँ तक कह दिया था कि अगर सोनिया देश की प्रधानमंत्री बनती हैं तो वो अपना बाल मुँड़वा लेंगी। 1999 में कॉन्ग्रेस ने सोनिया गाँधी को 2 सीटों पर लड़ाने की सोची क्योंकि शायद उन्हें जनता के मूड का अंदाज़ा नहीं था और वे इस बात से निश्चिंत नहीं थे कि क्या भारत की जनता इतालवी मूल की महिला को नेता के रूप में स्वीकार करेगी? बेल्लारी में सोनिया को टक्कर देने ख़ुद सुषमा स्वराज पहुँचीं।

वहाँ 56,000 वोटों से हार-जीत का निर्णय हुआ और चूँकि सोनिया गाँधी ने अमेठी से भी जीत दर्ज की थी, उन्होंने बेल्लारी लोकसभा क्षेत्र को छोड़ दिया। बेल्लारी भी 2004 से 2018 तक भाजपा का गढ़ रहा। 2018 में हुए उपचुनाव में कॉन्ग्रेस ने पिछले 15 वर्षों में पहली बार इस सीट को फतह किया। उस समय भी कॉन्ग्रेस ने सेफ सीट के चक्कर में ही बेल्लारी को चुना था। सुषमा को वहाँ भेजे जाने के साथ ही सोनिया की एकतरफा जीत का सपना धरा का धरा रह गया था। इंडिया टुडे ने इसे ‘बहनजी बनाम बहूजी’ का नाम दिया था। एक तरफ बिंदी और भारतीय रीति-रिवाजों को मानने वाली सुषमा स्वराज थीं तो दूसरी तरफ विदेशी मूल की सोनिया गाँधी।

बेल्लारी को कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े गढ़ों में से एक माना जाता था। इंदिरा गाँधी का जादू यहाँ सर चढ़ कर बोला करता था। फिर भी, सोनिया को यहाँ जीतने के लिए नाकों चने चबाने पड़े। कॉन्ग्रेस ने भाजपा को मूर्ख बनाने और सोनिया को आसान जीत दिलाने के लिए उनके दक्षिण भारत के किसी तीन में से एक सीट से लड़ने का अफवाह उड़ाया। सोनिया गाँधी को हैदराबाद ले जाया गया ताकि भाजपा को छला जा सके लेकिन उस समय हैदराबाद में बैठे वेंकैया नायडू को इसकी भनक लग गई कि सोनिया को बेल्लारी से लड़ाया जा रहा है। वहाँ एसपीजी की तैयारियों से भी भाजपा को बहुत कुछ पता चल गया।

सोनिया द्वारा कुडप्पा से लड़ने की स्थिति में भाजपा ने लोकप्रिय तेलुगु अभिनेत्री विजयशंति से चुनाव लड़ने की पेशकश की थी। आख़िरकार वाजपेयी की सहमति के बाद बेल्लारी से सुषमा स्वराज को लड़ने को कहा गया और उन्होंने अपनी सहमति भी दे दी। इस तरह डरी हुई कॉन्ग्रेस की तरफ से लड़ रही सोनिया गाँधी को भी दक्षिण भारत के एक संसदीय क्षेत्र ने जिताया और तमाम आशंकाओं के बावजूद उन्हें वहाँ से जीत मिली।

अब बारी हार के डर से जूझ रहे राहुल की

अब राहुल गाँधी ने अपनी मुश्किल राजनीतिक परिस्थितियों में केरल के वायनाड को चुना है। उनके इस निर्णय से केरल में राज कर रही वामपंथी सरकार भी नाराज़ हो गई है। मुख्यमंत्री विजयन और वामपंथी नेता प्रकाश करात ने राहुल के इस क़दम को पार्टी के ख़िलाफ़ लड़ाई माना है। आपको बता दें कि मुस्लिम मतों का यहाँ पर ख़ासा प्रभाव है और कॉन्ग्रेस को उम्मीद है कि मुस्लिमों का वोट राहुल गाँधी को जिताने के लिए काफ़ी होगा। केरल में राहुल गाँधी के कई भरोसेमंद बड़े नेता भी हैं जो अपनी कुशल मशीनरी के साथ उनकी इस सीट पर जीत सुनिश्चित करने के लिए मेहनत करेंगे ताकि राहुल देश के अन्य इलाक़ों में प्रचार कर सकें। इस पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि राहुल को ‘हार का डर’ है।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, राहुल की उम्मीदवारी पर निर्णय से पहले कॉन्ग्रेस ने मुस्लिम लीग के नेताओं से भी बातचीत की ताकि मुस्लिमो मतों को अपनी तरफ किया जा सके। वाम नेता सीताराम येचुरी ने भी राहुल की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि वो ऐसी भी सीट से लड़ सकते थे, जहाँ भाजपा से उनकी सीधी टक्कर हो। कॉन्ग्रेस इस क्षेत्र में बढ़ी माओवादी घटनाओं को लेकर राज्य और केंद्र सरकारों पर निशाना साधेगी ताकि यहाँ वोट बटोरे जा सकें। कुल मिलकर यह कि कॉन्ग्रेस जब-जब मुश्किल में होती है, अपने सुप्रीम नेता के लिए दक्षिण भारत में एक सेफ पैसेज खोजती है।

‘सम्राट अशोक ने रोबोटों से लड़ा था युद्ध, वैज्ञानिक सोच के मामले में हिन्दू ग्रंथ था विश्व-गुरु’

एड्रियेन मयोर प्राचीन विज्ञान की इतिहासकार हैं, दंतकथाओं में रुचि रखती हैं, और अमेरिका के प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड विश्विद्यालय में शोध छात्रा हैं। सन्डे टाइम्स अख़बार से बात करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे हिन्दू मिथकों में सम्राट अशोक के रोबोटों से युद्ध करने का वर्णन है। अपनी ताज़ा कृति Gods and Robots: Myths, Machines, and Ancient Dreams of Technology में मयोर प्राचीन सभ्यताओं द्वारा भविष्य की तकनीक को कल्पित करने का विश्लेषण करती हैं।

प्रश्न: हिन्दूवादियों का ऐसा मानना है कि प्राचीन भारतीयों ने अंतरिक्षयान से लेकर मिसाइल व इन्टरनेट तक सब कुछ बना रखा था। अपने शोध में आप इसे कैसे देखती हैं?

मयोर: मेरे शोध का मूल विषय प्राचीन मानव में वैज्ञानिक प्रेरणा के उद्गम और प्रथम आभास का है। इस विषय में शोध करते-करते मैं मिथकों के बीच जा पहुंची, जहाँ मैंने पाया कि प्राचीन व्यक्तियों ने कृत्रिम जीवन, यंत्रमानव (रोबोट), मशीनें आदि बनाने के बारे में तब से सोचना शुरू कर दिया था जब वे तकनीकी रूप से इसे निष्पादित करने से कोसों दूर थे। रोबोटों और उन्नत मशीनों की मौखिक कहानियों को लिखित रूप में पहली बार 2700 साल पहले होमर (यूनान) के समय लाया गया था। ऐसी ही कहानियाँ रामायण, महाभारत, आदि में भी मिलतीं हैं- विश्वकर्मा और माया भी ऐसी ही चीजें बनाया करते थे। यूनानियों में यही चीज़ देवता हिफेस्टस और शिल्पकार डेडॉलस करते हैं।

इन कहानियों को मैं विश्व का प्रथम साइंस फिक्शन मानती हूँ। उन्नत तकनीक के प्राचीन सपने किसी एक सभ्यता की बपौती नहीं हैं। आप यूनानी, मिस्री, हिन्दू, इस्लामिक, इट्रस्केन, चीनी या किसी भी अन्य सांस्कृतिक मिथक को देखें जो कृत्रिम जीवन के बारे में है। उनमें यह कल्पना होती है कि यदि किसी व्यक्ति को दैवीय रचनात्मकता और शक्तियाँ मिल जाएँ तो क्या-क्या संभव है। पर उन मिथकों को समकालीन आधुनिक विज्ञान के विकास से सीधे नहीं जोड़ा जा सकता।

प्रश्न: आप कहती हैं कि भारतीय और यूनानी संस्कृतियाँ एक-दूसरे से तकनीकों की कल्पनाएँ उधार लेती हैं। कैसे?

मयोर: भारतीय और यूनानी मतों का एक-दूसरे पर प्रभाव डालना लगभग ईसा से पाँच शताब्दी पूर्व प्रारंभ हुआ, और सिकंदर तथा पुरु के बीच की संधि के बाद यह और भी बढ़ गया। जैन ग्रंथों में लिखा है कि अजातशत्रु के अभियंताओं ने ऐसे रथों का अविष्कार किया, जिनमें घूमते चक्र थे। ऐसा माना जा सकता है कि उत्तरकाल के फारसी रथों में लगी हुई दरांतियाँ इसी से प्रेरित थीं। इसके अलावा मखदूनिया (Macedon) के राजा फिलिप-II के बहुत पहले से अजातशत्रु के पास गुलेल जैसे अस्त्र हुआ करते थे, जिनसे भारी चट्टानों को दुश्मन की सेनाओं पर फेंका जा सकता था।

भारतीय हमेशा से तेल के दिए जलाते आए हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि यूनानियों और रोमनों से बहुत पहले उन्हें मिट्टी के तेल की भी जानकारी रही होगी। यूनान के टियाना के घुमक्कड़ संत अपोलोडोरस ने स्वचालित नौकर और खुद से चलने वाले रथ भारतीय राजाओं के पास देखे। प्राचीन भारत प्राचीन यूरोप से हायड्रॉलिक्स और डिस्टिलेशन (hydraulics and distillation) की तकनीक में सदियों आगे था। तकनीक का आदान-प्रदान किस हद तक हुआ होगा, यह ठीक-ठीक पता नहीं लगाया जा सकता।

प्रश्न: और किन संस्कृतियों में उनके खुद के दिव्यास्त्र, रोबोट, और उड़ते रथ थे?

मयोर: उड़ते रथों और कृत्रिम हंसों, कृत्रिम नौकरों, विशाल रोबोटों, मशीनों जैसे मिथक महाभारत, रामायण, कथासरित्सागर, हरिवंश, और कई अन्य किताबों में मिलते हैं। मिस्री अभिलेखों और होमर की ओडिसी में ऐसे जहाजों का ज़िक्र है, जो अपना रास्ता खुद तलाश लेते थे। होमर के इलियड और चीनी ग्रंथों में मानव-मशीन मिश्रणों (android) और स्वचालित रोबोटों (automatons) का जिक्र है। और भी मिसालें दी जा सकतीं हैं।

प्रश्न: बुद्ध के अवशेषों के रक्षक एंड्राइड लड़ाकों की क्या कहानी है?

मयोर: इसकी सबसे विस्तृत कहानी लोकपनत्ती नामक बर्मी ग्रन्थ में है। कथा है कि गौतम बुद्ध की मृत्यु के पश्चात राजा अजातशत्रु ने उनके शव को एक स्तूप के नीचे गुप्त कमरे में छिपा दिया। उसकी रक्षा भूत वाहन यंत्र (spirit movement machines) कर रहे थे। यह रोबोट लड़ाके थे, जिनके पास तलवारें भी थीं- यह राजा अजातशत्रु के पास मौजूद तलवारों से लैस युद्ध वाहनों और मशीनों की याद दिलाते थे। यूनानी मिथकों में भी इंसानी और पशु रूप में automaton लड़ाकों का जिक्र है, जो महलों और खजानों के रक्षक थे, पर इस कहानी के ऐतिहासिक और तकनीकी विवरण इसे उनसे अलग करते हैं। कहानी के अनुसार इन रोबोटों को बनाने से संबंधित जो स्केच था, उसे गुप्त रूप से रोमा-विषया से पाटलिपुत्र मंगवाया गया था। रोमा-विषया यूनान से प्रभावित एक पाश्चात्य जगत था, और मंगवाने वाला यंत्रकर्ता एक रोबोट बनाने वाला कारीगर था, जो पाटलिपुत्र में जन्मा था।

यह automaton सैनिक बुद्ध के अवशेषों के तब तक रक्षक रहे, जब तक कि सम्राट अशोक को इस गुप्त कमरे के बारे में पता नहीं चल गया। अशोक ने इन सैनिकों से युद्ध किया और इन्हें हराने के बाद इन पर काबू करना सीखा, जिसके बाद वे अशोक के आज्ञाकारी हो गए। ऐतिहासिक रूप से हम यह जानते हैं कि अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को तलाशा और पूरे देश में उन्हें बाँटा था।

प्रश्न: क्या किसी ने इन प्राचीन ग्रंथों में कल्पित automatons को बनाया था?

मयोर: ईसा से तीसरी शताब्दी पहले तक यूनान, अलेक्सांद्रिया (मिस्र), अरब, भारत और चीन के शिल्पकारों और अभियंताओं ने स्वचालित वस्तुएँ बनानी प्रारंभ कर दीं थीं। साथ ही वे उड़ते पक्षियों के प्रतिरूप, सजीवित मशीनें, और मिथकों में वर्णित automatons से मिलते-जुलते automatons भी बना रहे थे। कुछ सूक्ष्म थे तो कुछ काफी बड़े थे, कुछ काफी आसानी से बनने वाले थे तो कुछ काफी जटिल थे। उनके शक्ति-स्रोतों में स्प्रिंग, लीवर, पुली से लेकर वायु, ऊष्मा, पानी तक थे।

जगन्नाथपुरी: BJD के गढ़ में हिंदुत्व और गरीबों की आवाज़ बन कर गरज रहे संबित पात्रा

अगर आपके घर में टीवी है, तो आपने संबित पात्रा का नाम ज़रूर सुना होगा। असल में, आपने उन्हें ज़रूर देखा होगा। तथ्यों को रखने की उनकी क्षमता, विपक्षियों के दावों की पोल खोलती उनकी प्रतिक्रियाएँ और हंगामेबाज न्यूज़ एंकरों के तीखे सवालों के सुलझे हुए जवाब देने की उनकी कला, ये सब उनको उनके प्रतिद्वंद्वी प्रवक्ताओं में सबसे अलग बनाती है। बहस के दौरान वो बीच में हंगामा नहीं करते, ऊँगली उठाकर अपनी पाली का इंतजार करते हैं। वो आँकड़ों पर पूरी तैयारी करके आते हैं, सिर्फ़ आरोप-प्रत्यारोप से अपना काम नहीं चलाते। संबित पात्रा ने भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में टीवी दर्शकों को केंद्र सरकार की नीतियाँ व योजनाओं की सफलता समझाने में अहम भूमिका निभाई है, जिसका पुरस्कार उन्हें जगन्नाथपुरी से लोकसभा टिकट के रूप में मिला। उन्होंने ज़ोर-शोर से अपना प्रचार अभियान भी शुरू कर दिया है।

संबित पात्रा की रैली: हाथों में भगवान जगन्नाथ, मस्तक पर त्रिपुण्ड

अगर आप संबित पात्रा के प्रचार अभियान और उनके सोशल मीडिया हैंडल पर ग़ौर करें तो आप पाएँगे कि उनका प्रचार अभियान हिंदुत्व और ग़रीबी पर केंद्रित है। उनके बारे में एक ख़ास बात यह है कि वो राहुल गाँधी की तरह अकस्मात हिन्दू नहीं बने हैं बल्कि पहले भी वो अक्सर मंदिरों में पूजा-अर्चना के लिए जाते रहे हैं, जलाभिषेक इत्यादि धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं और भारतीय पारम्परिक परिधानों में भी दिखते रहे हैं। कभी-कभी माथे पर त्रिपुण्ड और बदन पर धोती के साथ वो न्यूज़ बहस में भी पहुँच जाया करते हैं। अतः उन्हें लगातार देखने वालों को पता है कि जगन्नाथपुरी का उनका ताज़ा प्रचार अभियान उनकी इसी सोच, लक्षण और व्यवहार के आयाम का विस्तार है, ये उनके लिए कुछ नया नहीं है।

गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य को दण्डवत प्रणाम करते संबित पात्रा

उन्होंने गोवर्धन पीठ जाकर पुरी शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती से मुलाक़ात की। शंकराचार्य के चरणों में दंडवत करते संबित पात्रा की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुई और लोगों ने उनकी श्रद्धा और सादगी को सराहा। न सिर्फ़ शंकराचार्य, बल्कि पात्रा ने उनके साथ बैठे अन्य साधू-संतों को भी दण्डवत प्रणाम किया। यह कुछ नया नहीं है, यही हिन्दू संस्कृति है और पात्रा ऐसा पहले भी करते आए हैं। संबित शंकराचार्य को पुष्पहार पहनाने के लिए आगे बढ़े लेकिन शंकराचार्य ने वो हार संबित को ही पहना दिया। संबित पात्रा के राष्ट्रीय प्रवक्ता होने का फ़ायदा भी उन्हें मिल रहा है। नामांकन से लेकर चुनाव प्रचार अभियानों तक, मीडिया की माइक उनके आगे तनी रहती है और उनके बयानों को अच्छी कवरेज मिल जाती है।

भगवान जगन्नाथ की आरती करते संबित पात्रा

नामांकन दाखिल करने से पहले संबित पात्रा ने जगन्नाथपुरी मंदिर में दर्शन किए। हाथों में ज्वलित अग्नि वाली आरती का थाल लिए पात्रा ने समर्थकों सहित भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद लिया। इसके बाद वे नामांकन दाखिल करने पहुँचे। नामांकन दाखिल करने से पहले हुई रैली में भी ओडिशा की संस्कृति की झलक दिखी और उसमें शामिल लोग उड़िया तौर-तरीकों से सुसज्जित थे। इस दौरान उन्होंने दक्षिण काली माता के भी दर्शन किए। सबसे बड़ी बात कि पात्रा ने न सिर्फ़ पुरी जाकर मंदिरों के दर्शन किए बल्कि पार्टी कार्यालय में भी भक्ति का माहौल पैदा कर दिया। अगर आप प्रचार अभियान में लगे संबित की वेशभूषा पर गौर करें तो पाएँगे कि उसमें उड़िया संस्कृति और हिंदुत्व, दोनों की ही महक है।

भाजपा चुनाव कार्यालय, पुरी में पूजा-अर्चना करते संबित

संबित ने पार्टी कार्यालय में पूजा अर्चना की। समर्थकों व कार्यकर्ताओं ने भी पूरी के भाजपा दफ़्तर में हुए इन धार्मिक क्रियाकलापों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। उन्होंने चिल्का में जनसभा को सम्बोधित करने के साथ-साथ माँ अङ्कुलेश्वरी के भी दर्शन किए। नयागढ़ में उन्होंने पूर्व बीजद नेता दिवंगत कुमार हेमेंद्र चंद्र की प्रतिमा का लोकार्पण किया। नयागढ़ राजपरिवार से आने वाले हेमेंद्र को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही संबित ने बीजद के गढ़ में सेंध लगाने की कोशिश शुरू कर दी है। 2014 में हेमेंद्र पौने दो लाख से भी अधिक मतों के अंतर से जीत कर लोकसभा पहुँचे थे। संबित द्वारा उनकी प्रतिमा लोकार्पण के समय केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और बीजद से भाजपा में शामिल हुए बैजयंत जय पांडा भी थे।

दक्षिण काली के दर्शन के दौरान लोगों से मिलते संबित पात्रा

संबित पात्रा के पुरी पहुँचने के बाद भाजपा के दफ़्तर का उद्घाटन भी हुआ, जिसमें मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हिस्सा लिया। संबित ने ब्रह्मगिरि से कई बार विधायक रहे दिवंगत नेता लालतेन्दु विद्याधर मोहापात्रा की प्रतिमा पर भी माल्यार्पण किया। 5 वर्षों तक ओडिशा प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे लालतेन्दु की जन्मस्थली पुरी संसदीय क्षेत्र में आने वाले गाँव गदरोडंगा में ही है। कॉन्ग्रेस व बीजद के दिवंगत स्थानीय नेताओं की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण व उनका लोकार्पण कर संबित ने अपना चुनावी एजेंडा सेट कर दिया है। चाहे वो किसी भी पार्टी के दिवंगत जनप्रतिनिधि हों, संबित ने उनका सम्मान कर व उन्हें याद कर यह सन्देश देने की कोशिश की है कि उनके लिए भी उनके मन में आदरभाव है। इसी तरह उन्होंने पीपली विधानसभा में हनुमानजी के दर्शन भी किए।

इसी तरह उन्होंने पाइक विद्रोह के नेतृत्वकर्ता बख्शी जगबंधु की प्रतिमा के भी दर्शन किए और वहाँ माल्यार्पण किया। बख्शी जगबंधु ओडिसा के अग्रणी व सबसे पुराने स्वतन्त्रता सेनानियों में से एक हैं। इसी तरह संबित ने ब्रह्मगिरि में अलरनाथ मंदिर के भी दर्शन किए। शुरुआती प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने अपने हाथ में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा रखी थी, जिस पर चुनाव आयोग में उनके ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज कराई गई है। इन सबके बावजूद संबित पात्रा के प्रचार अभियान को क़रीब से देखने पर पता चलता है कि उन्होंने अपनी भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व वाली छवि के साथ ही चुनाव में उतरने का निश्चय किया है।

संबित पात्रा की रैली में पारम्परिक उड़िया संस्कृति की झलक

इसके अलावा संबित सिर्फ़ मंच से हाथ हिलाने और गाड़ियों से रैली करने वाले नेताओं के उलट पदयात्रा और ग़रीबों के घर जाकर उनसे मिलने का कार्य भी कर रहे हैं। संबित ने जनसम्पर्क का नरेंद्र मोदी वाला तरीका ही अपनाया है। बच्चों को गोद में लेकर खिलाना, बुज़ुर्गों के पाँव छूना, युवाओं को गले लगाने से लेकर कार्यकर्ताओं व संगठन के लोगों को एकजुट करने तक, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाला तरीका ही अपनाया है। एक और वीडियो में वह एक बूढ़ी महिला को अपने हाथों से खाना खिलाते हुए दिख रहे हैं। वह महिला खाना बना कर उन्हें परोस रही है। एक अन्य फोटो में उन्हें एक बुज़ुर्ग के पाँव पर अपना सिर रख कर प्रणाम करते हुए देखा जा सकता है। हालाँकि, अगर चुनावी गणित की बात करें तो जगन्नाथपुरी भाजपा के लिए टेढ़ी खीर है। यहाँ पिछले 21 वर्षों से बीजद उम्मीदवार ही जीतते आ रहे हैं।

पुरी संसदीय क्षेत्र में आने वाले चिल्का विधानसभा क्षेत्र से पिछले चुनाव में भाजपा को मात्र 541 मतों से विजय प्राप्त हुई थी। भाजपा के लिए यहाँ उम्मीद की किरण तो है लेकिन उनका मुक़ाबला वरिष्ठ बीजद नेता पिनाकी मिश्रा से है। 1996 में तत्कालीन पुरी सांसद और केंद्रीय मंत्री ब्रज किशोर त्रिपाठी को हरा कर सांसद बने मिश्रा 2009 और 2014 में इसी क्षेत्र से संसद पहुँचे थे। पुरी के एक पुराने नेता होने के साथ-साथ पिनाकी बीजद के प्रवक्ता भी हैं। मजे की बात यह कि कॉन्ग्रेस उम्मीदवार सत्यप्रकाश भी अपनी पार्टी के प्रवक्ता हैं। प्रवक्ताओं की इस लड़ाई में हिंदूवादी संबित कहाँ ठहरते हैं, ये तो समय ही बताएगा। पुरी सीट का महत्व अचानक से इसीलिए भी बढ़ गया है क्योंकि यहाँ से ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लड़ने की चर्चाएँ चल निकली थी।