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इलेक्शन है तो मंदिर भी जाना पड़ता है – 582 दिनों का सच अब आया सामने

जामा मस्जिद के शाही इमाम द्वारा किसी खास पार्टी के समर्थन की घोषणा करने से लेकर जनेऊ और शिव-भक्त बनते हुए भारतीय राजनीति ने लंबा सफर तय कर लिया है। इस सफर में मजार पर चढ़ते चादर से लेकर गंगा आरती तक के स्टेशन आए। अब जो स्टेशन आया है, वो है – मंदिर जाना और आशीष लेना। वैसे तो यह स्टेशन पहले भी आ चुका है, लेकिन इस बार वाले में ग्लैमर है, बॉलीवुड है, ‘मुसलमान’ भी है!

‘कौन’ हैं वो

उस ‘मासूम’ का नाम उर्मिला मातोंडकर है। इन्होंने हाल में कॉन्ग्रेस पार्टी जॉइन की है। 2019 का लोकसभा चुनाव यह उत्तर मुंबई सीट से लड़ेंगी। कभी यह बॉलिवुड की लीडिंग एक्ट्रेस हुआ करती थीं। फिर धीरे-धीरे पर्दे की दुनिया से गायब हुईं और 2016 में कश्मीरी बिजनेसमैन मोहसिन अख्तर मीर से शादी कर लीं।

‘थैंक राहुल जी’ कहतीं उर्मिला

लगाई मंदिर की ‘दौड़’

‘सेकुलर’ पार्टी कॉन्ग्रेस का टिकट पाकर उर्मिला भी मंदिर की दौड़ पर निकल पड़ीं। भगवान से आशीर्वाद लिया। फोटो खिंचवाया। सोशल मीडिया पर अपलोड किया। लेकिन यह क्या? लोग बिफर गए! क्यों भला? मुसलमान से शादी करने के बाद कहीं लिखा है क्या कि आप मंदिर नहीं जा सकतीं! सोशल मीडिया को लेकिन आप कंट्रोल करें भी तो कैसे करें?

कॉन्ग्रेसी दुपट्टा के साथ भगवन-भक्ति का यह सुयोग 30 मार्च को हुआ

लोगों ने चुनाव के लिए उर्मिला को अपना मुस्लिम नाम छिपाने को लेकर ट्रोल करना शुरू कर दिया। इसमें कितनी सच्चाई है, नहीं पता। वो हिंदू हैं या उन्होंने इस्लाम को अपना धर्म मान लिया है, ये सिर्फ वो ही बता सकती हैं। खास बात यह कि मुझे दिलचस्पी भी नहीं है – अपने समय में वो मेरी फेवरिट (क्रश कह लीजिए) रही हैं। तो जैसे ही मंदिर वाली फोटो इंस्टाग्राम पे देखा, बाकी के और फोटो को स्क्रॉल करके देखने से खुद को रोक न पाया। तभी दिखा मुझे ‘सत्य’।

‘Satya’ क्या है

सत्य यह है कि उर्मिला ने 30 मार्च 2019 को मंदिर वाली फोटो इंस्टाग्राम पर डाली। कुत्ते, पहाड़, नदी-नाले जैसे फोटो से भरे पड़े इनके इंस्टाग्राम पर मेरी नजर तब रूकी जब एक और मंदिर दिखा मुझे – बहुत देर के बाद। यह फोटो अपलोड किया गया था 25 अगस्त 2017 को। मतलब 582 दिनों पहले। मतलब 582 दिन तक आप भगवान से दूर रहीं! फूल-पत्ती, बेडरूम, चाँद-सूरज में आप खोई रहीं और अचानक से ‘सेकुलर’ कॉन्ग्रेस के टिकट ने आपको मंदिर की राह दिखा दी!

साल: 2017, माह: अगस्त, तारीख: 25

कुछ ज्यादा नहीं हो गया? खैर फैन हूँ, आप ‘भक्त’ भी कह सकती हैं – इसलिए ज्यादा लिखकर आपको परेशान नहीं करूँगा। लेकिन संख्या के हिसाब से देखें तो 582 दिन बहुत लंबी ‘जुदाई’ हो गई। आपके लिए मैं तो खैर कुछ और ही चाहता हूँ। वोटिंग और मतगणना के दिन देखना दिलचस्प होगा कि भगवान और वोटर आपके लिए क्या चाहते हैं।

PS: जिनको ऊपर लिखी बातों पर भरोसा नहीं, वे कृपया उर्मिला के अकाउंट पर जाकर खुद सारे फोटो देख सकते हैं।

वैधानिक चेतावनी: यह काम कोई फैन ही कर सकता है। कुत्ते-नदी-नाले से प्यार एक बात है और उनके फोटो देखते जाना और बात!

‘कमेंट्स’ के लिए AltNews के प्रतीक ने OpIndia CEO राहुल रोशन को बोला, मिला करारा जवाब

फ़र्ज़ी न्यूज फैलाने में पेशेवर और स्वघोषित फ़ैक्ट-चेकर AltNews के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ‘कमेंट’ के लिए ऑपइंडिया के CEO राहुल रोशन के पास जा पहुँचे। सिन्हा ने कहा कि वो ट्विटर हैंडल @padhalikha के बारे में एक लेख लिख रहे हैं, और इस पर वो राहुल रोशन की टिप्पणी जानना चाहते हैं।

प्रतीक सिन्हा द्वारा भेजा गया ई-मेल


ऑपइंडिया के CEO राहुल रोशन ने जो जवाब दिया, वो इस प्रकार है:

प्रश्न 1) अकाउंट के साथ आपका वर्तमान संबंध क्या है? क्या आप भी उस टीम का हिस्सा हैं, जो इसे चलाती है?

उत्तर: आपको उक्त ट्विटर अकाउंट को मेरे साथ जोड़ने के लिए विवेक अग्निहोत्री के साक्षात्कार का उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है।

जब आप जैसे बेशर्म शिकारी (stalker) ने मेरे परिवार को निशाना बनाया था, तो उस बारे में लिखते हुए मैंने तो उसी समय इस अकाउंट (और कुछ अन्य इन्टरनेट आउटलेट्स, जैसे पैरोडी वेबसाइट juntakareporter) से जुड़े होने की पुष्टि कर दी थी।
(मुझे उम्मीद है कि आपको अपने [उपरोक्त] कर्मों की सज़ा एक दिन ज़रूर मिलेगी, यद्यपि मुझे नहीं लगता कि आप ऐसी ‘दकियानूसी’ अवधारणाओं पर विश्वास करते होंगे)

हाँ, मैंने इस अकाउंट को शुरू किया था, लेकिन इसे शुरू करने के कुछ हफ्तों के बाद मैं अपने जीवन में विभिन्न चीजों में व्यस्त हो गया, इसलिए मैंने दूसरों को इसका एक्सेस दे दिया और इसे लगभग भूल गया। Nework18 छोड़ने के बाद और फिर अब कुछ वर्षों से मैं OpIndia और निजी जीवन में व्यस्त हो गया और ऐसे पैरोडी अकाउंट चलाने के लिए समय ही नहीं बचा (एक समय, 2011 के आसपास, मैं पाँच पैरोडी अकाउंट चलाता था)।

फिलहाल पैरोडी के लिए स्थापित इस अकाउंट ने एक तरह से अपने वास्तविक स्वरूप को खो दिया है, यानि अपनी अधिकांश पोस्ट्स में अब यह स्वयंभू उदारवादियों की बातों का मखौल नहीं उड़ाता; अब यह राजनीतिक रूप से ‘ग़लत’ (politically incorrect) विचारों और संदेशों के प्रसार का एक जरिया बन गया है।


प्रश्न 2) क्या आप इस अकाउंट द्वारा पोस्ट की गई सामग्री का समर्थन करते हैं?

उत्तर: चूँकि यह उन लोगों के समूह द्वारा चलाया जाता है जिन्हें मैंने एक्सेस दिया था, अतः इसमें उनकी अपनी मान्यताओं और मुद्दों की समझ पर आधारित मिश्रित सामग्री है। मैं इस बात का हिसाब नहीं रखता कि कौन क्या पोस्ट करता है, लेकिन वे कौन हैं यह मैं जानता हूँ- और यह एक गुप्त जानकारी है, जो मेरे पास सुरक्षित है।

मैं व्यक्तिगत ट्वीट्स का समर्थन कर भी सकता हूँ या नहीं भी कर सकता हूँ।
(तथाकथित ‘राइट विंग’ आप की सोच से कहीं अधिक विविध है, जबकि आपका वामपंथी गिरोह फिलहाल सामूहिक सोच यानि group-think से ग्रसित है और लोग अक्सर एक दूसरे से सहमत नहीं होते हैं।)

मैं उन स्थानों पर विचारों को नियंत्रित नहीं करता जहाँ मेरा कोई वर्तमान योगदान न हो। इसके अलावा, मैं समय के साथ और अधिक politically incorrect हो गया हूँ। मुझे अपने स्वयं के व्यक्तिगत अकाउंट के अलावा किसी अन्य फ़ेक अकाउंट की कोई ज़रूरत नहीं है- वो भी वह जिसकी follower संख्या मेरे निजी अकाउंट से भी कम हो।

अगर कुछ कहना ही होता है तो मैं अपने व्यक्तिगत अकांउट का इस्तेमाल करता हूँ- उदाहरण के लिए, न्यूजीलैंड की गोलीबारी के बाद भी इस्लामोफोबिया को एक फर्जी शब्द और अवधारणा कहना।

या फिर वह ट्वीट जहाँ आपने प्रशांत भूषण पर मेरे कमेंट्स को तोड़ा-मरोड़ा था। मैं फिर से कहूँगा कि कर्म आपको सबक सिखाएगा।
(“धर्मनिरपेक्षता” के अपने तकाजे के लिए अगर कर्म नहीं, तो अल्लाह मान सकते हैं।)

कृपया मुझे फिर कभी न लिखें। आपकी टीम का कोई अन्य व्यक्ति यह कर सकता है, लेकिन आप नहीं। मैं आपके ई-मेल को स्पैम लिस्ट में डाल रहा हूँ। आपने मेरे परिवार, विशेष रूप से मेरी दो-महीने की बेटी के साथ जो किया, उन्हें निशाना बनाया, उसके बाद से मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से नफ़रत करता हूँ। आपको फिर से मेरे निजी जीवन में घुसने की अनुमति नहीं है।

और हाँ, यदि आपके अंदर कोई नैतिकता का भाव है, तो आप मेरी इन प्रतिक्रियाओं को ठीक इसी रूप में प्रकाशित करेंगे।

संपादक की ओर से: हमें पता है कि भव्यता के भ्रम और लोगों का पीछा करने की बीमारी से पीड़ित एक विक्षिप्त व्यक्ति को खबर नहीं बनाना चाहिए। पर इस स्तर पर भ्रमित हो चुके (deslusional)लोगों में अक्सर शब्दों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की आदत होती है और इन्हें जो कहा जाता है वह इनको पूरी तरह से समझ में नहीं आता। इस प्रतिक्रिया को प्रकाशित इसीलिए किया गया है ताकि ऐसे तत्वों को ऑपइंडिया के CEO के बयान को ग़लत ढंग से प्रचारित और प्रसारित करने का कोई अवसर न मिल सके।

मेजर गोगोई के बहाने राष्ट्रवाद और दक्षिणपंथियों को गरियाने वाले… पढ़ लो असली ख़बर

2017 में ‘मानव-कवच’ (human-shield) विवाद का केंद्र-बिंदु रहे मेजर लीतुल गोगोई के विरुद्ध चल रही कोर्ट मार्शल की कार्रवाई पूरी हो गई है और उन्हें स्थानीय युवती के साथ ‘घुलने-मिलने’ के आरोप में वरिष्ठता घटने का दण्ड मिलने की सम्भावना है। इसी मामले में उनके ड्राईवर समीर मल्ला के खिलाफ कश्मीर में चल रहा कोर्ट मार्शल भी हाल ही में पूरा हुआ है। मल्ला को अनधिकृत रूप से ड्यूटी छोड़ कर जाने के आरोप में आधिकारिक रूप से कड़ी फटकार लगाए जाने की सम्भावना है। अनधिकृत रूप से ड्यूटी छोड़ कर जाने का आरोप मेजर गोगोई के विरुद्ध भी लगा है।

मेजर गोगोई को पिछले साल कश्मीर पुलिस ने हिरासत में तब ले लिया था जब वह एक 18 वर्षीया स्थानीय युवती के साथ एक होटल में जाने की कोशिश कर रहे थे और उनका होटल स्टाफ के साथ विवाद हो गया था। हालाँकि उस युवती ने बार-बार यह साफ किया है कि वह मेजर गोगोई के साथ अपनी इच्छा से थी पर मामला उसके उपरांत भी गंभीर ही था। मालूम हो कि सेना की अपने अधिकारियों को साफ हिदायत है कि अपनी तैनाती के दौरान वे स्थानीय लोगों के साथ घनिष्ठता नहीं कर सकते, और मेजर गोगोई का आचरण आदेशों के पूरी तरह विपरीत था।

ताली बजाने वालों के चेहरे पर अंडा

मेजर गोगोई के खिलाफ यह मामला जब प्रकाश में आया था तो टुकड़े-टुकड़े गिरोह के समर्थकों ने यह हवा बनानी शुरू कर दी थी कि मेजर गोगोई को कोई सजा नहीं मिलेगी क्योंकि उन्हें ‘राईट-विन्गर्स’ का समर्थन है। वामपंथी गुर्गों की मेजर गोगोई से असली अदावत तो यह थी कि एक तो वह सेना के थे, ऊपर से ‘समुदाय विशेष’ के भी ‘लल्ला विशेष’ कश्मीरी पत्थरबाजों को अपनी यूनिट की जान सुपुर्द करने की बजाय उन्हीं के एक ‘बिरादर’ को अपनी ढाल बनाने की ‘हिमाकत’ की, और उसके बाद ‘दुष्ट’ आत्मसम्मानी हिन्दुओं के हीरो बन गए।

इसीलिए अपने लोगों के लिए हर कानून छिन्न-भिन्न करने वालों के मन का चोर इसी दुश्चिंता में पड़ गया कि सामने वाले (दक्षिणपंथी) भी हो-न-हो ऐसा ही करेंगे।

और यह तब था जब उसी समय थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने यह साफ कह दिया था कि मेजर गोगोई यदि जाँच में किसी भी तरह दोषी निकले तो उनको ऐसी सजा मिलेगी जो नज़ीर बनेगी- और आज यही हो रहा है। वरिष्ठता घटाए जाने का मेजर गोगोई के करियर पर क्या प्रतिकूल प्रभाव होगा, यह ठीक-ठीक मापा नहीं जा सकता। पर चूँकि उन्होंने गलती की है, तो वह दण्ड के पात्र हैं।

अब जबकि मेजर गोगोई सजा पाने की दहलीज पर हैं तो हवाई भविष्यवाणी करने के बहाने पूरे दक्षिणपंथी समुदाय और सशस्त्र बलों को निशाना बनाने वालों से भी जवाब लिया जाना लाजमी है।

झारखंड में धर्मांतरण का मामला: 2 महिलाएँ पुलिस की हिरासत में

राँची स्थित लालपुर थाना क्षेत्र के नागरा टोली में सरना धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तन कराने का मामला सामने आया है। घटना बीते शनिवार (मार्च 30, 2019) की है। धर्मांतरण का यह धंधा वार्ड नंबर 19 की पार्षद रोशनी खलखो के घर के बगल में चल रहा था। धर्मांतरण के दौरान प्रार्थनाओं की आवाज़े सुनाई देने पर रोशनी मोहल्ले की अन्य महिलाओं के साथ उस घर में पहुँची जहाँ दो महिलाएँ प्रार्थना करवा रही थीं और बाक़ी दो महिलाएँ झूम रही थीं।

पार्षद और अन्य महिलाओं ने मिलकर धर्मांतरण कराने के आरोप में करीना कुजूर व सुकरो मुंडा को पकड़ा और इन्हें लालपुर पुलिस के हवाले कर दिया गया। दोनों आरोपित महिलाएँ कुजरू नगड़ी की रहने वाली हैं। इन दोनों के पास से धार्मिक पुस्तक भी बरामद की गई।

पार्षद ने बताया कि वह अपने घर के पास अन्य महिलाओं से बातें कर रही थी कि तभी प्रार्थनाओं की आवाज़े आने लगी, इस पर वो बगल में रहने वाले परिवार के घर पहुँची जहाँ उन्होंने धर्मांतरण का दृश्य देखा। धर्म परिवर्तन करवा रही किमी मुंडा और उसकी गोतनी सुमित्रा प्रार्थना में झूम रही थी। इसके अलावा रोशनी ने बताया कि धर्मांतरण की इस घटना के बारे में सबसे पहले केंद्रीय सरना समिति के कार्यकारी अध्यक्ष बबलू मुंडा को बताया गया, इसके बाद पुलिस पहुँची और दोनों महिलाओं को थाने ले गई।

इस मामले पर थाने में RSS के भैरव सिंह व अन्य धर्मों के प्रतिनिधि भी पहुँचे थे उन्होंने धर्मांतरण करवाने वाली महिलाओं के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने की माँग की।

धर्मांतरण के ज़रिए ईसाई बनने वाली किमी मुंडा ने बताया कि जिस सुकरो मुंडा को हिरासत में लिया गया है वो उसकी मौसी हैं, जो पहले सरना धर्म से थी, बाद में उसने ईसाई धर्म अपना लिया था। दूसरी महिला करीना कुजूर के बारे में सुकरो मुंडा को कोई जानकारी नहीं है। साथ ही उसने यह भी बताया कि धर्मांतरण जैसे किसी काम को अंजाम नहीं दिया जा रहा था, वो बस पूजा कर रही थी। इस मामले पर भाजपा के राज्यसभा सदस्य समीर उरांव ने राँची में कॉन्ग्रेस और जेएमएम (झारखंड मुक्ति मोर्चा) को ज़िम्मेदार ठहराते हुए इस मामले को लेकर गंभीरतापूर्वक कार्रवाई करने की माँग की।

जनसंघ (BJP) का एक पूर्व सांसद ऐसा भी जो 82 की उम्र में बीड़ी बनाकर करता है जीवन यापन

आमतौर पर देखा गया है कि सांसदों का जीवन काफी ऐशो-आराम और शानो-शौकत से भरा होता है और उनका यह लाइफस्टाइल सांसद पद से हटने के बाद भी कायम रहता है। मगर आज हम जिस पूर्व सांसद की बात करने जा रहे हैं, उनकी छवि इससे बिल्कुल विपरीत है। दरअसल हम बात कर रहे हैं बुंदेलखंड के पूर्व सांसद राम सिंह अहिरवार की, जिन्हें लोग ‘साइकिल वाले नेताजी’ कहकर भी बुलाते हैं।

राम सिंह, मध्य प्रदेश के सागर शहर की पुरव्याउ टोरी मुहल्ले में संकरी गली में स्थित एक सामान्य से मकान में अपनी पत्नी राजरानी के साथ रहते हैं। उनके पास दर्शन शास्त्र में स्नातक और अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक की डिग्री भी है। वह वर्ष 1967 में भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर यहाँ से लोकसभा का चुनाव लड़े थे और उन्होंने जीत दर्ज कराई थी।

आपको जानकर हैरानी होगी कि 82 साल के पूर्व सांसद राम सिंह को अपना घर खर्च चलाने के लिए बीड़ी बनाने का काम करना पड़ता है और इस उम्र में भी वो इतने सक्रिय हैं कि साईकिल चलाकर लोगों से मिलते-जुलते रहते हैं। वो कहते हैं कि उन्हें कभी गाड़ी की जरूरत ही नहीं पड़ी।

कुछ समय पहले उन्हें लकवा मार गया था, जिससे उन्हें बोलने में थोड़ी दिक्कत है। मगर उम्र के इस पड़ाव में भी उन्होंने साइकिल चलाना नहीं छोड़ा है। राम सिंह बताते हैं पूर्व सांसद की पेंशन के लिए भी उन्हें कितने चक्कर काटने पड़े, तब जाकर साल 2005 में पेंशन शुरू हो पाई थी।

पूर्व सांसद के पड़ोसी गोविंद का कहना है कि राम सिंह दूसरे नेताओं से बिल्कुल अलग हैं। वो ऐसे नेता नहीं हैं कि एक बार सांसद बनने पर खूब सारे सुख सुविधाएँ हासिल कर लें। वो तो इतने सीधे सरल व्यवहार के हैं कि लगता ही नहीं है कि वो कभी सांसद भी रहे हैं।

सागर के मौजूदा सांसद लक्ष्मीनारायण यादव यूनिवर्सिटी में पूर्व सांसद राम सिंह के जूनियर रहे हैं। वे कहते हैं कि जब राम सिंह को जनसंघ ने उम्मीदवार बनाया था, तो सभी हैरान रह गए थे। वे चुनाव भी जीत गए, मगर उन्होंने पूरा जीवन सादगी से बिताया।

आडवाणी के कारण बचे रहे शत्रुघ्न सिन्हा, BJP ने निलंबित न कर के उन्हें बनाया अप्रासंगिक

शत्रुघ्न सिन्हा ने वो सब कुछ किया, जिसके लिए पार्टी द्वारा उन्हें निलंबित किया जा सकता था। राहुल गाँधी की प्रशंसा से लेकर पीएम मोदी की आलोचना तक, उन्होंने भाजपा के पार्टी संविधान की जम कर धज्जियाँ उड़ाईं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की रैली से लेकर कोलकाता में ममता बनर्जी की विपक्षी एकता रैली तक, उन्होंने विपक्ष के हर जमघटों में हिस्सा लिया। यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे बागी भाजपा नेताओं के साथ मिलकर केंद्र सरकार पर तरह-तरह के आरोप तक लगाए। लेकिन, भाजपा ने संयम बनाए रखा। एक तरह से देखा जाए तो लाल कृष्णा आडवाणी का सिन्हा के प्रति वो स्नेह ही था, जिसका सम्मान करते हुए भाजपा ने उनके ख़िलाफ़ अनुशासत्मक कार्रवाई नहीं की।

बिहार भाजपा के नेता पार्टी आलाकामन के इस फैसले से नाराज़ थे। सुशील मोदी और गिरिराज सिंह जैसे सभी नेता चाहते थे कि उन पर कार्रवाई हो लेकिन भाजपा ने पुराने जमाने में पार्टी के भीतर सिन्हा के सम्मान का ख्याल करते हुए उनके बयानों को नज़रअंदाज़ किया। ऐसा शायद ही किसी पार्टी में देखने को मिलता हो। जहाँ बड़े-बड़े नेताओं पर सिर्फ़ पार्टी अध्यक्ष के ख़िलाफ़ तेवर दिखाने पर ही निकाल बाहर किया जाता है, वहाँ सिन्हा द्वारा मोदी-शाह की बारम्बार आलोचना के बावजूद उन्हें छुआ तक नहीं गया। इसके लिए शत्रुघ्न सिन्हा से ज्यादा लाल कृष्ण आडवाणी का हाथ था। आडवाणी भाजपा के पितृपुरुष हैं और भाजपा को पता था कि वो आडवाणी का ही भरोसा था, जिस कारण उन्होंने 1992 में अपनी छोड़ी सीट पर सिन्हा को चुनाव लड़ाया था।

यह दो चीजें दिखाता है। पहली यह कि भाजपा में आडवाणी का क़द और सम्मान आज भी वही है, जो पहले था। बस उनकी सक्रियता ख़त्म हुई है। दूसरा यह कि भाजपा ने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का एक मज़बूत उदाहरण देकर उनको भी करारा जवाब दिया, जो भाजपा को मोदी-शाह की कथित तानाशाही से जकड़ा हुआ बताते हैं। तीसरी सबसे बड़ी चीज यह भी है कि भाजपा ने बड़ी चालाकी से शत्रुघ्न सिन्हा को तीन साल खुल कर पार्टी व मोदी की आलोचना करने का मौका देकर उनके क़द को एकदम से घटा दिया। भाजपा को इस बात का एहसास था कि अगर वो सिन्हा पर निलंबन का अनुशासत्मक कार्रवाई करती है तो उन्हें ख़ुद को विक्टिम के रूप में पेश करने का एक मौक़ा मिल जाएगा और इसी कारण वो जनता के एक हिस्से में सहानुभूति का पात्र बनने की कोशिश करेंगे।

शत्रुघ्न सिन्हा द्वारा विपक्षी रैलियों का हिस्सा बनने पर भी उन्हें निलंबित नहीं किया गया। वो पार्टी से निलंबन चाहते भी थे ताकि ये मीडिया में चर्चा का विषय बने और वो दूसरी पार्टी में पूरे धूम-धड़ाके से शामिल हों लेकिन उनका ये स्वप्न धरा का धरा रह गया। परिणाम यह हुआ कि समय के साथ सिन्हा अप्रासंगिक होते चले गए। उनकी बातों की गंभीरता ख़त्म हो गई और उन्हें मीडिया कवरेज भी अपेक्षाकृत कम मिलने लगा। इसके उलट अगर भाजपा उन्हें निलंबित करती तो ये बात मीडिया में छा जाती और उन्हें फिर से उनकी खोई हुई लोकप्रियता का कुछ हिस्सा वापस मिल जाता। भाजपा ने जिस रणनीति से काम लिया, उस कारण उन्हें मजबूरन कॉन्ग्रेसी होना पड़ा, बिना किसी ख़ास मीडिया कवरेज के।

अरुण जेटली ने यह कह कर स्थिति साफ़ भी कर दी है कि अब भाजपा की समस्या कॉन्ग्रेस की है। अगर शत्रुघ्न सिन्हा पटना साहिब से चुनाव हार जाते हैं तो उन्हें शायद ही ऐसा सम्मान और पद दिया जाए, जो उन्हें नब्बे के दशक में चुनाव हारने के बावजूद भाजपा ने दिया था। इसे समझने के लिए हमें उसी दौर में जाना पड़ेगा। सारी चीजों को बारीकी से समझने के बाद आप भी भाजपा और शत्रुघ्न सिन्हा के संबंधों की अच्छी तरह पड़ताल कर पाएँगे।

बिहार वाले सेक्शन में जेटली ने कहा कि हमारी समस्या अब कॉन्ग्रेस की है

शत्रुघ्न सिन्हा का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है। सत्तर और अस्सी के दशन में एक वर्ष में क़रीब 10 फ़िल्में करने वाले शत्रुघ्न सिन्हा को बॉलीवुड के शॉटगन के नाम से जाना गया। विलेन और सपोर्टिंग किरदारों से शुरुआत करने वाले शत्रुघ्न सिन्हा पर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने भरोसा जताया और उन्हें राजनीति में एक बड़ा स्थान दिया। अगर भाजपा से उनके संपर्क की बात करें तो नब्बे के दशक में कॉन्ग्रेस द्वारा सुपरस्टार राजेश खन्ना को अपने पाले में लाने के बाद भाजपा को भी किसी ऐसे चेहरे की तलाश थी, जो फ़िल्मों की दुनिया में बड़ा नाम रखता हो। शत्रुघ्न सिन्हा के रूप में भाजपा ने उस चेहरे पर दाँव खेलने का निश्चय किया। अटल बिहारी वाजपेयी अपने क्षेत्रों में नाम कमा चुके हस्तियों को भाजपा में शामिल करने में हमेशा इच्छुक रहे थे।

1991 लोकसभा चुनाव के दौरान नई दिल्ली में देश के सबसे बड़े राजनीतिक युद्ध का नज़ारा देखने को मिला। कॉन्ग्रेस ने 60 और 70 के दशक में बॉलीवुड पर एकछत्र राज करने वाले राजेश खन्ना को वहाँ से प्रत्याशी बनाया। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी वहाँ से भाजपा के प्रत्याशी थे। 1989 में उन्होंने नई दिल्ली से ही चुनाव जीता था। 1991 का यही वो चुनाव था, जिसमें प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या कर दी गई थी। हालाँकि, वे गाँधीनगर से भी ताल ठोक रहे थे लेकिन नई दिल्ली सीट आडवाणी के लिए प्रतिष्ठा का विषय था। राजधानी क्षेत्र में आडवाणी की हार का उभरते भाजपा पर दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते थे। हालाँकि तब वाजपेयी की सर्वमान्यता अधिक थी लेकिन मंदिर-मंडल के उस दौर में आडवाणी देश के सबसे लोकप्रिय नेता के तौर पर उभर रहे थे।

राजेश खन्ना के माध्यम से कॉन्ग्रेस ने आडवाणी के राजनीतिक करियर को अधर में लटकाने की भरसक कोशिश की लेकिन आडवाणी किसी तरह जीतने में सफल हुए। पहली बार चुनाव लड़ रहे खन्ना की लोकप्रियता का आलम यह था कि उन्होंने तब नेता प्रतिपक्ष रहे अनुभवी आडवाणी को भी नाकों चने चबवा दिया था। आडवाणी जीते लेकिन सिर्फ़ 0.74% मतों के अंतर से। दोनों के बीच मतों का अंतर मात्र 1589 था। आडवाणी ने उस चुनाव में गाँधीनगर से भी जीत का पताका लहराया था और नियमानुसार उन्होंने नई दिल्ली सीट से इस्तीफा दे दिया, जिस कारण 1992 में यहाँ फिर से उपचुनाव हुए। राजेश खन्ना की लहर से खार खाई भाजपा ने अपने तरकश से ऐसा तीर निकालने की कोशिश की, जिससे इस सीट पर कॉन्ग्रेस को टक्कर दी जा सके।

अतः, शत्रुघ्न सिन्हा की भाजपा में एंट्री हुई। हालाँकि, उन्होंने 1989 लोकसभा चुनाव में भी कॉन्ग्रेस विरोधी दलों के लिए चुनाव प्रचार किया था लेकिन किसी भी पार्टी के साथ अपना नाम जोड़ने से बचते रहे थे। 1992 में खन्ना के ख़िलाफ़ भाजपा से ताल ठोकते हुए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहा राव को निशाना बनाया। चुनाव प्रचार के दौरान सिन्हा ने 1991 आम चुनाव में कॉन्ग्रेस के वादों का जिक्र करते हुए तत्कालीन केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया। इंडिया टुडे ने सिन्हा के इस प्रचार अभियान की तुलना 1971 में आई मीणा कुमार और विनोद खन्ना अभिनीत फ़िल्म ‘मेरे अपने’ में उनके द्वारा निभाए गए किरदार ‘छेनू’ से की थी।

उस उपचुनाव की ख़ासियत यह थी कि उसमें दोनों अभिनेताओं की पत्नियों ने भी अहम भूमिका निभाई थी। डिंपल कपाड़िया और पूनम सिन्हा ने भीड़ इकट्ठा करने से लेकर रणनीति बनाने तक का बीड़ा उठा लिया था। एक और बात बता दें कि इस चुनाव में 125 उम्मीदवार थे। डकैत फूलन देवी ने जेल से ही चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें मुश्किल से हज़ार वोट भी नहीं आए। जब परिणाम आए तो शत्रुघ्न सिन्हा की हार हुई और राजेश खन्ना नई दिल्ली से सांसद बने। एक लाख से भी अधिक मत पाकर खन्ना ने सिन्हा को 27,000 से भी अधिक मतों से मात दी। लेकिन, भाजपा ने हार के बावजूद शत्रुघ्न सिन्हा को वो सब कुछ दिया, जो अमूमन नेताओं को जीतने के बाद नसीब होता है।

पुराने दिन: हारने के बावजूद शत्रुघ्न सिन्हा को भाजपा ने वो सब दिया, जो एक जीते हुए बड़े नेता को मिलता है

1996 में भाजपा ने शत्रुघ्न सिन्हा को राज्यसभा भेजा। 2002 में उन्हें फिर से राज्यसभा भेजा गया। चुनाव हारने के बावजूद भाजपा ने उन्हें दो बार सांसद बनाया। वाजपेयी सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री का पद दिया गया। सिन्हा 2009 में पटना साहिब से पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए। 2014 में रिकॉर्ड वोटों से जीत कर उन्होंने अपनी इस सीट को बरकरार रखा। लेकिन, 2014 आते-आते सिन्हा भाजपा द्वारा अपने लिए किए गए कार्यों को भूल गए और उन्होंने पार्टी के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब सिन्हा के स्टारडम का दौर जा चुका है और न ही उनके लिए भीड़ जुटती है। फिर भी भाजपा ने उन्हें लेकर जिस तरह का संयम दिखाया, ऐसा कम ही देखने को मिलता है। वरना पार्टियाँ तो सेलेब्रिटीज से एक बार काम निकलने के बाद उन्हें किनारे कर दिया करती हैं।

आपको यह बात भी जाननी चाहिए कि सिन्हा अब भीड़ जुटाने के लायक भी नहीं रहे हैं। चंडीगढ़ में अरविन्द केजरीवाल की एक रैली हुई थी, जिसमें उन्हें भी अतिथि के रूप में बुलाया गया था। पोस्टरों पर केजरीवाल के साथ सिन्हा का चित्र लगाकर प्रचार-प्रसार किया गया था ताकि जनता की भीड़ जुटे लेकिन हुआ इसके उलट। केजरीवाल को कुछ ही मिनट में रैलीस्थल से भागना पड़ा। खाली कुर्सियाँ देख बौखलाए केजरीवाल सभा से तुरंत चल निकले। यह दिखाता है कि शत्रुघ्न सिन्हा अब जनता के बीच सचमुच अप्रासंगिक हो गए हैं और इसके पीछे उनके बड़बोलेपन का हाथ है। इसमें भाजपा का भी रोल है, जिसने उन्हें अच्छे तरीके से हैंडल किया।

मोदी विरोधी फ़िल्म निर्माताओं के हस्ताक्षर बयान में फर्ज़ीवाड़ा, मनमर्ज़ी से जोड़ा गया नाम

29 मार्च को भारत में फिल्म उद्योग से जुड़ी 100 से अधिक हस्तियों की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ एक संयुक्त बयान जारी करने की ख़बर सामने आई थी। आर्टिस्ट यूनाइटेड इंडिया नाम की वेबसाइट पर जारी सेव डेमोक्रेसी नाम के एक बयान में 103 छोटे स्तर के और स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं ने लोगों से लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार के ख़िलाफ़ वोट देने की अपील की थी।

लेकिन अब लिस्ट में शामिल फ़िल्म निर्माताओं में से एक ने इस तरह के किसी भी बयान को जारी करने से इनकार किया है। अभिनेत्री और निर्माता आरती पटेल, जिनका नाम लिस्ट में दूसरे नंबर पर दर्ज है, उन्होंने कहा कि इस तरह की लिस्ट नकली है। कॉन्ग्रेस पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल के एक ट्वीट के जवाब में आरती ने कहा कि उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है और न ही उन्होंने ऐसी किसी अपील पर हस्ताक्षर किए हैं।

यह ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि जब हमने पहली बार इस विषय पर समाचार प्रकाशित किया था, तो उसमें 103 नाम थे जिनमें आरती पटेल का नाम नहीं था। अब हस्ताक्षर करने वालों की कुल संख्या 124 हो गई है, जिसका अर्थ है कि सूची में 21 नए नाम बाद में जोड़े गए, जिसमें आरती पटेल का नाम भी शामिल है।

एक बात और ध्यान देने वाली है कि जिस वेबसाइट पर यह बयान जारी किया गया था, उसमें सादे क़ागज़ पर केवल व्यक्तियों के नाम लिखे हुए थे उनके हस्ताक्षर नहीं थे। इसी से पता चलता है कि यह बयान संबंधी यह पूरी ख़बर भ्रम फैलाने की मंशा से प्रचारित की गई। वेबसाइट में केवल एक पेज था, जो इस बयान को जारी करने के तीन दिन पहले यानी 26 मार्च को बनाया गया था।

यह दिलचस्प है कि आरती पटेल का नाम मोदी विरोधी बयान में शामिल था, जबकि वो ख़ुद पीएम मोदी द्वारा शुरू किए गए #VoteKar अभियान में भाग ले रही हैं, जिसमें लोगों से लोकसभा चुनाव के दौरान बाहर आने और वोट करने का आग्रह किया गया है।

आरती पटेल एक पुरस्कृत गुजराती अभिनेत्री और फिल्म निर्माता हैं। वह Bey Yaar (2014), लव इन भवई (2017) और मिशन मम्मी (2016) फिल्मों के लिए जानी जाती हैं।

कॉन्ग्रेस में टिकट के लिए मांगे जा रहे करोड़ों रुपए: सुधाकर रेड्डी ने लगाए आरोप, छोड़ी पार्टी

चुनावी हलचल के बीच कॉन्ग्रेस पार्टी को तेलंगाना में एक और झटका लगा है। ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी के पूर्व सचिव एवं वरिष्ठ नेता पी. सुधाकर रेड्डी ने रविवार को पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाया है कि पार्टी चुनाव में उम्मीदवारी का टिकट देने के लिए करोड़ों रुपये माँगती है। रेड्डी ने अपना त्यागपत्र कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को भेज दिया है।

इस पत्र में उन्होंने पार्टी के सिद्धांतों को बदलने की बात लिखी है। उन्होंने लिखा है कि दुर्भाग्य से कॉन्ग्रेस की परंपरा और उसके मूल्य पार्टी सिद्धांतों के विपरीत हो गए हैं। फिर चाहे वो पिछले साल का विधानसभा चुनाव हो, एमएलसी का चुनाव हो या फिर मौजूदा लोकसभा चुनाव, टिकट के बँटवारे में रुपए का प्रभाव बढ़ गया है। रेड्डी का कहना है कि पार्टी में काम करने वाले नेताओं की अनदेखी करते हुए पैसों के आधार पर टिकट दिया जा रहा है। रेड्डी ने आगे लिखा है कि पार्टी के टिकटों के लिए करोड़ों रुपये की माँग चौंकाने वाली है। कॉन्ग्रेस में टिकटों के वितरण के इस व्यवसायीकरण ने ही उन्हें पार्टी छोड़ने पर विवश किया है।

खबरों के अनुसार सुधाकर रेड्डी कॉन्ग्रेस से इस्तीफा देने के बाद अब भाजपा में शामिल हो सकते हैं। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि रेड्डी सोमवार (अप्रैल 1, 2019) को हैदराबाद में होने वाली बीजेपी की रैली के दौरान पार्टी में शामिल हो सकते हैं।

गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले ही कॉन्ग्रेस की मंत्री डी.के. अरुणा ने कॉन्ग्रेस का साथ छोड़ते हुए बीजेपी का दामन थाम लिया था। अभी फिलहाल वो भाजपा उम्मीदवार के रूप में महबूबनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रही हैं।

कम्युनिस्टों को नहीं पसंद हैं राहुल गाँधी, वायनाड सीट पर हरा कर ही लेंगे दम

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को अमेठी में अपनी हार का डर है और इसीलिए कॉन्ग्रेस द्वारा राहुल गाँधी को केरल के वायनाड से चुनाव लड़ाने का फ़ैसला लिया गया। यह फैसला कम्युनिस्टों को नागवार गुजरा है। ख़बर के अनुसार CPI (M) के पूर्व महासचिव प्रकाश करात कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की उम्मीदवारी से काफी नाराज़ हैं। करात ने दावा किया कि कॉन्ग्रेस पार्टी के फ़ैसले ने संकेत दिया कि भाजपा से लड़ने की (कथित) राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के विपरीत कॉन्ग्रेस पार्टी की प्राथमिकता अब वामपंथियों से लड़ने की हो गई है।

प्रकाश करात ने कहा, “लेफ्ट के ख़िलाफ़ राहुल गाँधी जैसे उम्मीदवार को चुनने का मतलब है कि कॉन्ग्रेस केरल में लेफ्ट को निशाना बनाने जा रही है। यह ऐसा फ़ैसला है जिसका हम पुरज़ोर विरोध करेंगे और इस चुनाव में हम वायनाड में राहुल गाँधी की हार सुनिश्चित करने के लिए काम करेंगे।”

कम्युनिस्ट केरल में कुछ सीटें जीतने के सपने दिख रहे हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के केरल से चुनाव लड़ने के फैसले ने उस सपने को तोड़ दिया है और इससे वो काफी हद तक आहत भी हैं। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भी नाराज़गी जताते हुए कहा कि वामपंथी तो वैसे भी राहुल गाँधी से लड़ेंगे, लेकिन राहुल को भाजपा के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना चाहिए था।

पिनाराई विजयन ने कहा, “वह केरल के 20 निर्वाचन क्षेत्रों में से एक में लड़ रहे हैं और उन्हें किसी भी भिन्न के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है। हम उनसे लड़ेंगे। उन्हें उस निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहिए जहाँ भाजपा चुनाव लड़ रही हो, राहुल गाँधी का वायनाड से चुनाव लड़ना वामपंथियों के ख़िलाफ़ लड़ने से ज़्यादा और कुछ नहीं है।”

वायनाड में चुनावी मुक़ाबला बहुत दिलचस्प है क्योंकि कॉन्ग्रेस ने 2014 में लोकसभा में माकपा के उम्मीदवार के रूप में मुस्लिम उम्मीदवार एमएल शाहनवाज़ को मैदान में उतारा था। कॉन्ग्रेस उम्मीदवार ने 21,000 मतों के बहुत कम अंतर से जीत हासिल की थी। 2019 में, माकपा ने एक मुस्लिम उम्मीदवार पीपी सुनीर को राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ एक ऐसी सीट पर उतारा है, जहाँ आधी जनता मुस्लिम और ईसाई आबादी की है। ये आबादी राहुल गाँधी की चुनावी लड़ाई को और अधिक मुश्किल बना देगी।

लालू परिवार में संकट के पीछे का गणित: तेज प्रताप के बग़ावत से अधर में महागठबंधन

चुनाव के मौसम में यूँ तो पूरे भारत का राजनीतिक माहौल गर्म रहता है लेकिन बिहार की आबोहवा को क़रीब से देखने वाले लोग जानते हैं कि जैसी हलचल, सरगर्मी और उठापटक यहाँ होती है, वैसी कहीं भी नहीं। भले ही राजनीतिक रूप से देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश हो लेकिन बिहार की राजनीतिक स्थितियों में कब और क्या बदलाव आ जाए, इसका पता लगाना मुश्किल है। अब लालू परिवार को ही लीजिए। एक समय बिहार की राजनीति के एकमात्र सिरमौर रहे लालू प्रसाद यादव आज अपने ही कुनबे को बचाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। यादव परिवार में फूट पड़ चुकी है। तेजस्वी-तेज प्रताप एक दूसरे के आमने-सामने खड़े नज़र आ रहे हैं। महागठबंधन की प्रतिष्ठा दाँव पर है। इसे समझने के लिए ताजा घटनाक्रम के कुछ पहलुओं को देखना पड़ेगा।

बात दरभंगा से शुरू करते हैं। दरभंगा में भाजपा के बागी नेता कीर्ति झा आजाद कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए थे। जिस तरह से सभी विपक्षी दल एकता दिखाने की जुगत में लगे हुए थे, उन्हें शायद इस बात का अंदाजा भी न हो कि एक दिन ऐसा आएगा जब उनकी ही टिकट कट जाएगी। 2014 आम चुनाव में दरभंगा से 3 लाख मत पाकर सांसद बनने वाले कीर्ति झा का टिकट कट जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि राजद को इस बात की भनक है कि भाजपा से लड़ने वाले अधिकतर नेताओं को मोदी लहर का अच्छा साथ मिलता है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अब्दुलबारी सिद्दकी को दरभंगा से टिकट दिया गया है। 2014 में दूसरे नंबर पर रहे अली अशरफ फातमी और कीर्ति झा के बीच क़रीब 35 हज़ार मतों का ही अंतर था। ऐसे में, सिद्दकी को टिकट मिलने से वे बिफर गए।

अब दरभंगा से सीधा तेजस्वी-तेज प्रताप के मतभेदों की तरफ बढ़ते हैं। अब्दुलबारी सिद्दकी को तेजस्वी यादव का क़रीबी माना जाता है। पहली मनमोहन सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे अली अशरफ फातमी को लालू यादव का क़रीबी माना जाता था। यह दिखाता है कि टिकट बँटवारे में तेजस्वी की सलाह पर जेल से लालू यादव ही सारे निर्णय ले रहे हैं। इस बारे में हमने एक ख़बर भी प्रकाशित की थी। 2 वर्ष पहले अब्दुलबारी सिद्दीकी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि तेजस्वी यादव में लालू यादव के सारे गुण-लक्षण दिखते हैं (भले ही ऐसा न हो)। हर पार्टी में बड़े नेताओं व सुप्रीम परिवार (राजद, सपा, डीएमके) के सदस्यों की कामना रहती है कि उनके क़रीबी लोगों को ज्यादा से ज्यादा टिकट मिले ताकि बाद में किसी भी प्रकार के संकट या विवाद की स्थिति में उनकी कृपा से जीते जनप्रतिनिधि उनके खेमे की तरफ से आवाज़ उठाएँ। मुखिया की अनुपस्थिति में राजद अभी इसी दौर से गुज़र रहा है।

तेजस्वी यादव के उपर्युक्त ट्वीट को देखिए। इसमें उनका तेवर साफ़ झलक रहा है। जहानाबाद से अपने क़रीबी चंद्र प्रकाश यादव को टिकट दिलाने की जुगत में लगे तेज प्रताप को पार्टी से निराशा हाथ लगी और तेजस्वी ने सुरेंद्र यादव के नाम पर मुहर लगा दी। इस बात से बौखलाए तेज प्रताप ने समर्थकों से नामांकन दाखिल का आदेश देकर एक तरह से बगावत का ही ऐलान कर दिया। इसी तरह शिवहर से भी वह अंगेश यादव को टिकट देना चाहते थे लेकिन वहाँ भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। गुरुवार (मार्च 28, 2019) को तेजस्वी यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का ऐलान किया था लेकिन ऐन वक़्त पर पार्टी के बड़े नेताओं को इसकी भनक लग गई और उन्होंने तेज प्रताप को किसी तरह मनाया।

दरअसल, लालू यादव के समय उसके आसपास रघुनाथ झा, रघुवंश प्रसाद यादव, अखिलेश सिंह और सीताराम सिंह जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता संकटमोचक के रूप में हुआ करते थे, जो पार्टी में किसी भी तरह की स्थिति को संभालने की ताक़त रखते थे। अखिलेश आज राज्य में कॉन्ग्रेस प्रचार समीति के अध्यक्ष हैं, रघुनाथ झा और सीताराम सिंह का निधन हो गया और रघुवंश आज के दौर में उतने सक्रिय नहीं हैं। एक और बात गौर करने वाली है कि मुस्लिम-यादव समीकरण की बात करने वाले लालू के ये सभी क़रीबी सवर्ण थे। आज पार्टी में दो गुट होने के साथ ही उन्हें ऐसे नेताओं की कमी भी खल रही है जो स्थिति को नियंत्रित कर सकें। आज तेज प्रताप का अगला क़दम क्या होगा, बताना मुश्किल है।

बिहार की राजनीति को देखें तो में लालू के आस-पास के नेताओं और खुद लालू यादव की रणनीतिक क्षमता तो थी ही। आज भ्रष्टाचार के मामलों में जेल की सज़ा भुगत रहे लालू अपना ही क़िला बचाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। हालाँकि, इसकी भनक तभी लग गई थी जब तेज प्रताप यादव ने अपनी पत्नी से तलाक़ लेने की बात कही थी और पूरा लालू परिवार उन्हें मनाने में नाकाम साबित हुआ था। अपने घर से दूर निकल चुके तेज प्रताप को मनाने में उनकी माँ राबड़ी देवी भी नाकाम साबित हुई थीं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे पर भी तेज प्रताप निशाना साध चुके हैं। उनका आरोप था कि पूर्वे उनके लोगों की अनदेखी कर रहे हैं। तेज प्रताप ने यह भी कहा कि जहानाबाद को लेकर तेजस्वी से उनकी बात नहीं हुई है। यह दिखाता है कि लालू परिवार में कम्युनिकेशन गैप भी हद से ज्यादा बढ़ चुका है।

इन सबके अलावा तेज प्रताप यादव अपने ससुर चन्द्रिका यादव को सिवान से टिकट देने के पक्ष में नहीं थे लेकिन इस मामले में भी पार्टी में उनके राय की अनदेखी की गई। चन्द्रिका ने नामांकन दाखिल करने के बाद तेजस्वी में प्रधानमंत्री बनने की क्षमता होने की बात कह अपने दामाद तेज प्रताप को नाराज़ कर दिया। हालाँकि, उन्होंने दावा किया कि तेज प्रताप उनके लिए प्रचार करेंगे लेकिन फिलहाल इसके आसार बहुत कम ही नज़र आ रहे हैं। अब देखना यह है कि शिवहर, जहानाबाद, दरभंगा और सारण में उम्मीदवार चयन से नाराज़ तेज प्रताप आगे क्या करते हैं? चर्चा है कि राजद सुप्रीमो लालू यादव ख़ुद मामले को सुलझाने के लिए पहल करने वाले हैं क्योंकि बिना उनके हस्तक्षेप के परिवार में शायद ही सब कुछ ठीक हो। हाँ, महागठबंधन में इसका नकारात्मक असर पड़ना तय है। तेजस्वी के प्रेस कॉन्फ्रेंस में कॉन्ग्रेस और कुशवाहा की अनुपस्थिति ने इस बात को बल दे दिया है।