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मुंबई में रेलवे स्टेशन के पास गिरा फुटओवर ब्रिज, 5 की मौत

मुंबई के सीएसटी (छत्रपति शिवाजी टर्मिनस) रेलवे स्टेशन के पास एक फुटओवर ब्रिज गिर गया। हादसे में 5 लोगों की मौत हो गई है, जबकि 34 से ज्यादा घायल हुए हैं। घटना आज शाम करीब 07.30 बजे की है। हादसे के चलते ब्रिज का करीब 60% हिस्सा ढह गया है। यह ब्रिज रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक को जोड़ने का कार्य करता था। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) मौके पर मौजूद है।

पुलिस ने बताया कि हादसे में 34 लोग घायल भी हुए हैं। घायलों को सेंट जॉर्ज और जीटी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हादसे के वक्त कई वाहन और लोग ब्रिज के नीचे से गुजर रहे थे। ब्रिज के मलबे में कई लोगों के फँसे होने की आशंका है।

हादसे के समय पुल पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। शाम का समय होने के चलते दफ्तरों से वापस आने वाले लोग भी पुल का इस्तेमाल करते हैं। बताया जा रहा है कि इस हादसे में जिन 2 महिलाओं की मृत्यु हुई है वो जीटी अस्पताल की कर्मचारी थीं। यह हादसा उस वक्त हुआ जब वह शाम को अस्पताल से घर जा रही थीं। बचाव कार्य में जुटे NDRF के मुताबिक 10 से 12 लोगों के मलबे में फँसे होने की आशंका है। क्षेत्रीय प्रतिक्रिया केंद्र के एक दल को घटनास्थल पर रवाना किया गया है।

हादसे को लेकर रेलवे मंत्रालय ने कहा कि ब्रिज बीएमसी के अंतर्गत आता है। हम घायलों की हर संभव सहायता कर रहे हैं। रेलवे के डॉक्टर और अधिकारी राहत व बचाव कार्य में बीएमसी की मदद कर रहे हैं।

AAP से गठबंधन को लेकर कॉन्ग्रेस में मची चिल्ल-पों

दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर कॉन्ग्रेस की ओर से कराए जा रहे सर्वे से खुद कॉन्ग्रेस पार्टी में घमासान मच गया है। कॉन्ग्रेस के दिल्‍ली प्रभारी पीसी चाको की ओर से कराए जा रहे सर्वे को लेकर जहाँ दिल्‍ली प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी की अध्‍यक्ष शीला दीक्षित नाराज हैं, वहीं पूर्व प्रदेश अध्‍यक्ष अजय माकन ने इस सर्वे पर सहमति जताई है। शीला दीक्षित ने कहा कि दिल्ली कॉन्ग्रेस नेतृत्व गठबंधन को लेकर राहुल गाँधी के सामने अपनी राय रख चुका है और उन्होंने कार्यकर्ताओं से पूछकर ही गठबंधन न करने की बात शीर्ष नेतृत्व को बताई थी।

शीला दीक्षित ने आगे कहा, “सर्वे पर चाको जी ही बता सकते हैं। मैंने भी आज अखबारों में पढ़ा है। राहुल गाँधी जी ने गठबंधन न करने के लिए सहमति दी थी। अब ये क्यों किया जा रहा है, मुझे नहीं मालूम। कार्यकर्ताओं से बातचीत करके ही हमने राहुल जी से बात की थी। हमने सोचा था चैप्टर क्लोज हो गया, आपके सवाल का जवाब केवल चाको ही दे सकते हैं।”

रिपोर्ट्स के अनुसार, पीसी चाको के साथ मतभेद के सवाल पर शीला ने कहा, “हमारे बीच कोई टकराव नहीं है। जब वे आ जाएँगे तब देखा जाएगा। सीनियर लीडरशीप को लूप में लेकर सर्वे किया जा रहा होगा? इसका जवाब मुझे नहीं मालूम। अगर फायदा होता तो पहले ही कह देते।” शीला दीक्षित ने जोर देते हुए कहा कि उन्‍हें लगता है कि कॉन्ग्रेस को अकेले चुनाव लड़ना चाहिए, कॉन्ग्रेस सक्षम है और सब कुछ जानती है।

वहीं इस पर अजय माकन ने कहा, “अच्छी बात है कि कार्यकर्ताओं की राय ली जा रही है। कॉन्ग्रेस इसी तरह से काम करती आयी है। मेरी जो राय है, वो मैं राहुल गाँधी को बता चुका हूँ। ये सब कुछ राहुल गाँधी के निर्देश से ही हो रहा है। ‘शक्ति एप्प’ राहुल गाँधी ही देखते हैं। पीसी चाको के पास 52 हजार लोगों के नंबर नहीं हैं।”

बता दें कि दिल्ली कॉन्ग्रेस में शीला दीक्षित वाला खेमा नहीं चाहता कि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी से गठबंधन किया जाए। जबकि, अजय माकन और प्रभारी पीसी चाको अरविन्द केजरीवाल की पार्टी से गठबंधन के पक्ष में माने जाते हैं। माना ये भी जा रहा है कि शीला दीक्षित यह गठबंधन इसलिए भी नहीं चाहती हैं क्योंकि उनकी नजर अगले विधानसभा चुनावों पर है।

पीसी चाको और शीला दीक्षित के इस सम्पूर्ण प्रकरण ने कॉन्ग्रेस में खलबली मचा दी है क्योंकि फिलहाल पार्टी की जितनी बैठकें हुई हैं, उनमें गठबंधन को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी न तो किसी अंजाम तक पहुँची है और न ही आगे की कोई संभावना जताई गई है।

ये सारा प्रकरण पीसी चाको के एक ऑडियो सन्देश से सामने आया है। यह ऑडियो मैसेज सुनकर साफ होता है कि कॉन्ग्रेस के अंदर एक खेमा ऐसा भी है जो आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन चाहता है। ऑडियो में चाको अपने कार्यकर्ताओं से गठबंधन की संभावनाओं के बारे में बता रहे हैं। चाको इस ऑडियो में कह रहे हैं, “अगर वे चाहें तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन हो सकता है।” चाको का यह ऑडियो मैसेज ‘शक्ति एप्प’ के जरिये दिल्ली के लगभग 50 हजार कार्यकर्ताओं को भेजा गया है।

शीला दीक्षित ने इस पर कहा, “मुझे नहीं पता कि चाको साहब ऐसा क्यों कर रहे हैं, जबकि पूरी दिल्ली यूनिट गठबंधन के खिलाफ है। मैं दिल्ली की इंचार्ज हूँ, इसलिए मुझे तो कम से कम बताना ही चाहिए।” हालाँकि, कॉन्ग्रेस नेता अजय माकन ने इस पर कहा कि चाको से जुड़ा सारा वाकया पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी के निर्देश पर हुआ है। माकन ने कहा, “यह राहुल गाँधी का फैसला है क्योंकि शक्ति एप्प केवल वे ही यूज करते हैं। राहुल गाँधी के निर्देश पर ही शक्ति एप्प का उपयोग किया गया है। इसलिए अगर कोई राहुल गाँधी पर सवाल उठा रहा है तो यह पूरी तरह से गलत है।”

आचार संहिता उल्लंघन के नाम पर चुनाव चिह्नों के इस्तेमाल पर रोक की बात हास्यास्पद

लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही चुनावी दंगल चालू हो चुका है। इस चुनावी दंगल में एक ऐसी अजीबोगरीब माँग की गई है जिसमें हँसी आना तो लाज़मी है ही साथ ही ऐसी माँग करने वाले की मानसिकता भी स्पष्ट होती है। चलिए आपको बताते हैं कि आख़िर इस हँसी की असल वजह क्या है।

दरअसल, चुनाव आयोग के पास राजनीतिक पार्टियों की एक के बाद एक कई शिक़ायतें पहुँच रही हैं इसमें एक शिक़ायत यह की गई है कि सभी सरकारी दफ़्तरों से छत वाले पंखे हटवा दिए जाएँ क्योंकि इससे चुनाव प्रचार होने की संभावना है। बता दें कि छत वाला पंखा YSRC पार्टी का चुनाव चिह्न है और यदि चुनावी दौर में छत वाले पंखे चलेंगे तो उससे आचार संहिता का उल्लंघन होगा।

चुनाव आयोग में यह अजीबोगरीब शिक़ायत आंध्र प्रदेश में चित्तूर ज़िले से की गई है जहाँ रामाकुप्पम मंडल में तेलगू देशम पार्टी (TDP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि हर सरकारी दफ़्तर से जल्द से जल्द छत वाले पंखे हटवाए जाएँ।

TDP द्वारा की गई इस शिक़ायत के बाद तहसीलदार जनार्दन रेड्डी ने ज़िला प्रशासन को रिपोर्ट भेजकर शिक़ायत पर उचित फैसला लेने को कहा। चुनाव आयोग इस पर क्या फ़ैसला लेगा यह देखना बाक़ी है, फ़िलहाल इसका तो केवल इंतज़ार ही किया जा सकता है।

अगर राजनीतिक पार्टियों की इस तरह की मूर्खतापूर्ण माँगों को अगर गंभीरता से लिया जाए तो उसके परिणाम कितने भयंकर हो सकते हैं इसका तो केवल अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। राजनीतिक पार्टियों को मिले तमाम चुनाव चिह्नों की बात करें तो उनका इस्तेमाल हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है। उदाहरण के लिए उगता हुआ सूरज, हाथ, साईकिल, हंसिया, हथौड़ा, बाली, झाड़ू, लालटेन, घड़ी, शंख और छत का पंखा इत्यादि तमाम ऐसे चिह्न हैं जिनका हम दैनिक रूप से इस्तेमाल करते हैं। इन चीज़ों के इस्तेमाल पर रोक लगाने की माँग अगर उठती है तो ये किसी चुटकुले से अधिक और कुछ नहीं हो सकता।

इससे पहले भी चुनाव आयोग के समक्ष ऐसी शिक़ायतें आई थीं जिन पर चुनाव आयोग ने गंभीरता से निर्देश जारी किया था। साल 2012 उत्तर प्रदेश में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के मद्देनजर राजधानी लखनऊ तथा गौतमबुद्ध नगर में जगह-जगह लगी तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती और उनकी पार्टी के चुनाव चिह्न हाथी की मूर्तियों को ढकने का निर्देश जारी किया गया था, जिसपर काफी राजनीति भी गरमाई थी।

साल 2013 में कॉन्ग्रेस ने भी ऐसी ही अनोखी माँग चुनाव आयोग से की थी कि चुनावी दौर में खिले हुए कमल के तालाबों को ढका जाए क्योंकि कमल बीजेपी का चुनाव चिह्न है और इससे प्रचार होने की संभावना है। प्रचार होने की संभावना से आचार संहिता का उल्लंघन होता है।

ऐसा ही एक मामला तब सामने आया था जब तेलंगाना में विधानसभा चुनाव के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले गुलाबी बैलेट पेपर को लेकर विवाद हो गया था। दरअसल, कॉन्ग्रेस पार्टी ने गुलाबी रंग के बैलट पेपर के इस्तेमाल पर आपत्ति उठाई थी और उसकी वजह ये बताई थी कि तेलंगाना राष्ट्रीय समिति पार्टी का चुनाव चिह्न गुलाबी रंग का है। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति अपनी सभी प्रचार सामग्री गुलाबी रंग का इस्तेमाल करती है। टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव सहित तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के सभी नेता गले में गुलाबी रंग का स्कार्फ़ पहनते हैं। गुलाबी रंग के इस्तेमाल से आचार संहिता का उल्लंघन हो जाता इसलिए कॉन्ग्रेस ने चुनाव आयोग से इसके इस्तेमाल पर रोक लगाने की माँग उठाई गई।

वर्तमान समय में चुनावी माहौल के इस महासंग्राम में राजनीतिक पार्टियाँ पता नहीं कब किस चुनाव चिह्न को मोहरा बनाकर आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त कर दें इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता। इस तरह की माँग राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं की बचकानी सोच को उजागर करता है जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही इन्हें भोली-भाली जनता अपना प्रतिनिधि चुनकर सत्ता के आसन पर बैठा दे लेकिन इनकी सोच जस की तस ही रहती है। जबकि जनता के इन नुमाइंदों से ये उम्मीद की जाती है कि ये जनता हित में कुछ ऐसे समझदारी वाले फ़ैसले लें जिससे उनका कुछ भला हो सके। लेकिन अफ़सोस होता है कि इनकी सोच अभी, पंखा चलाना बंद कर दो, मूर्तियों को ढक दो, गुलाबी रंग की पर्चियों के इस्तेमाल को रोक दो और कमल के तालाबों को छुपा दो जैसी माँगों से ऊपर ही नहीं उठ सकी।

अनायास ही एक सवाल मन में घर करता है कि ऐसी बेहूदी माँगों पर चुनाव आयोग का कितना समय नष्ट होता होगा, ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए न जाने कितने स्तरों पर विचार किया जाता होगा? इन परिस्थितियों में तो सिर्फ़ सलाह ही दी जा सकती है जिसपर अमल करना बेहद ज़रूरी है, वो ये कि जितना दिमाग इस तरह की माँगों पर लगाया जाता है, बेहतर होता कि उतना दिमाग जनता के हित पर लगाया होता तो लाइमलाइट में आने के लिए इन बेकार की हरक़तों का रुख़ न करना पड़ता।

मोहम्मद शमी पर दहेज़ और यौन-उत्पीड़न के मामले में चार्जशीट दाखिल

भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं क्योंकि कोलकाता पुलिस ने अलीपुर कोर्ट में उनके खिलाफ चार्जशीट पेश की। शमी की पत्नी हसीन जहाँ द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर, शमी पर IPC 498A (दहेज उत्पीड़न) और 354A (यौन उत्पीड़न) के तहत आरोप लगाए गए हैं।

बता दें कि शमी का अपनी पत्नी के साथ विवाद, सोशल मीडिया पर उनके कथित अफेयर की तस्वीरें सामने आने के बाद से ही गहरा गया था। मोहम्मद शमी के दक्षिण अफ्रीका दौरे से लौटने के बाद उनका हसीन जहाँ से विवाद हुआ और जल्द ही यह विवाद सार्वजनिक हो गया था। हसीन जहाँ ने अपने फेसबुक अकाउंट पर कई फोटो और वॉट्सअप के स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए शमी पर लड़कियों के साथ अवैध संबंध रखने का आरोप लगाया था।  

साथ ही पिछले साल हसीन जहाँ ने शमी पर घरेलू हिंसा और यौन शोषण का भी आरोप लगाया था। हालाँकि, शुरुआत में शमी ने इन आरोपों का खंडन किया, यह दावा करते हुए कि यह उनके क्रिकेटिंग करियर को बर्बाद करने की साजिश है।

हसीन जहाँ ने शमी पर मैच फिक्सिंग में लिप्त होने का भी आरोप लगाया था, जिसके बाद बीसीसीआई ने उनका नाम केंद्रीय अनुबंध सूची से वापस ले लिया था। हालाँकि, मैच फिक्सिंग के आरोपों पर आंतरिक जाँच असत्य पाए जाने के बाद, शमी को बीसीसीआई द्वारा ग्रेड ए अनुबंध सूची में बहाल कर दिया गया था।

विश्व कप के ठीक एक महीने पहले, शमी के खिलाफ चार्ज-शीट का दाखिल होना, उस क्रिकेटर के लिए बहुत बड़ा झटका हो सकता है, जिसने भारतीय क्रिकेट टीम में वापसी के लिए आस लगा रखी हो। फ़िलहाल, मामले की अगली सुनवाई 22 जून को तय की गई है।

30 साल में यह पहला ऐसा चुनाव है, जब PM के अलावा कोई और PM का उम्मीदवार नहीं

1991 का चुनाव, पहला ऐसा चुनाव था, जहाँ नेहरू-गाँधी परिवार की सत्ता पर दावेदारी नहीं थी। राजीव गाँधी कॉन्ग्रेस को लीड कर रहे थे, स्वाभाविक तौर पर पीएम पद के दावेदार थे परन्तु बीच चुनाव में उनकी हत्या हो जाने से उपजी सहानुभूति लहर से सत्ता तो कॉन्ग्रेस के पास आ गई, लेकिन गाँधी परिवार सत्ता से बाहर हो गया। बाद में चाहे जो भी हश्र हुआ हो लेकिन नरसिंह राव ने पाँच साल का कार्यकाल गाँधी परिवार और उनके पिट्ठुओं को छकाते हुए पूरा किया और निश्चित रूप से छाप छोड़ी।

उसके बाद जितने भी चुनाव हुए, उन सबकी एक खासियत यह रही कि भाजपा की तरफ से जहाँ अटल बिहारी वाजपेयी पीएम पद के दावेदार होते थे, वहीं विपक्ष की ओर से यह सपना देखने का हक़ सबको मिल गया था। और ऐसा करना कतई अस्वाभाविक और बेतुका नहीं था। क्योंकि यह वही दौर था, जब तीसरे मोर्चे की राजनीति अपने पूरे शबाब पर थी।

लालू, मुलायम, हरकिशन सिंह सुरजीत, अमर सिंह, ज्योति बसु, चंद्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे नेता नेताओं को ताश के पत्तों की तरह फेंटकर उसमें से पीएम निकाल लेते थे। एच डी देवेगोड़ा, इंद्र कुमार गुजराल जैसे भूले-भटके पीएम, इसी ताश पद्धति से पीएम बन गए थे। बताते हैं कि जब तीसरे मोर्चे के नेताओं ने इंद्र कुमार गुजराल को पीएम बनाने का निर्णय लिया तब वे दिल्ली के आंध्र प्रदेश भवन के एक कमरे में सो रहे थे। उन्हें नींद से जगाया गया और कहा कि आप देश के अगले प्रधानमंत्री हैं। खुशी में उछलते हुए जब यही बात उन्होंने अपने घर पर बताई तो उनकी पत्नी ने कहा कि यह क्या बकवास है, तब उन्होंने डपटते हुए कहा कि तुम भारत के होने वाले पीएम से इस प्रकार बात नहीं कर सकतीं।

इसके अलावा जो बन नहीं सके, वह इन बन चुके प्रधानमंत्रियों से भी बड़े, इस पद के लिए दावेदार थे। जिनमें ज्योति बसु, शामिल हैं, जो पीएम बनने के लिए तैयार थे, लेकिन उनकी पार्टी ने फच्चर लगा दिया, जिसके बारे में उन्होंने बाद में अफ़सोस प्रकट किया कि यह उनकी ऐतिहासिक भूल थी। इसके अलावा मुलायम सिंह यादव, जिनकी दावेदारी पर दूसरे यादव नेता लालू प्रसाद ने वीटो लगा दिया, विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी उस कालखंड में फिर से एक बार पीएम बनाने की तैयारी कर ली गई थी, लेकिन वे अपने पहले कार्यकाल में हुए अनुभवों से इतने खौफज़दा थे, कि जब तीसरे मोर्चे के नेता उनके घर पर यह प्रस्ताव लेकर गए तो वे पीछे के दरवाजे से निकल चुके थे और कहीं पहुँचने की बजाय, घंटों अपनी गाड़ी में दिल्ली की सड़कों पर खाली घूमते रहे।

यही हाल उस दौर में भी था, जब अटल जी 13 महीने और फिर 5 साल के लिए पीएम बने… भाजपा की ओर से इस पद के लिए कोई कन्फ्यूजन नहीं रहता था, लेकिन विपक्षी दलों में दस सासंदों वाली पार्टी का मुखिया भी इस पद को अपने सपने में देखने के लिए अधिकृत था।

2004 में जब डॉ मनमोहन सिंह को सोनिया गाँधी ने पीएम बनाया तब उसकी तह में भी वही तीसरे मोर्चे की राजनीति थी, कि नेताओं को ताश की तरह फेंट दो, और जो नेता काबू में आ जाए उसे पीएम बना दो, बेशक वह जोकर ही क्यों न हो।

2009 में हालाँकि सोनिया गाँधी ने यह गलती कर दी कि या तो उन्हें अपनी ही पार्टी के किसी फुल टाइम राजनीतिज्ञ को पीएम बनाना था, या फिर मनमोहन सिंह को बनाया भी था, तो दो साल बाद उन्हें घर बिठाकर राहुल गाँधी को पीएम बना देतीं। तब उनकी पार्टी की वह दुर्गति न होती जो आज हुई है, और न ही राहुल गाँधी को आज इस पद के लिए संघर्ष करना पड़ता।

बाहरहाल, पीएम पद के अरमान सजाने वाले नेताओं की बात करें तो 2014 में भी फेहरिस्त खूब लम्बी थी। लालू, मुलायम, शरद पवार, मायावती, जय ललिता, चन्द्र बाबू नायडू सरीखे नेता इस पद के लिए स्वयंभू दावेदार थे, दावेदार तो राहुल गाँधी भी थे लेकिन नरेन्द्र मोदी ने अपनी छप्पर फाड़ जीत से इन सभी के अरमानों पर पानी फेर दिया।

पर यह सब लिखने और बताने के पीछे मेरा उद्देश्य उन नेताओं का बखान करना नहीं है, जिनके भाग्य से पीएम का पद छिंटक गया या जिनके भाग्य में दरिद्रता लिखी हुई थी, मैं यह सब इस लिए लिखने को विवश हूँ कि बीते लगभग तीस साल में यह पहला ऐसा चुनाव है, जब पीएम के अलावा कोई और पीएम का उम्मीदवार नहीं है।

लालू जी जेल में अपनी राजनीति ही नहीं बल्कि जीवन का भी भयावह समय गुजार रहे हैं। उनके पुत्र तेजस्वी कितनी ही चतुराई दिखा लें, लेकिन वे अपने पिता की राजनीति को आगे नहीं बढ़ा सकते, और उसका दौर भी अब बीत चुका है। मुलायम सिंह यादव तो टीवी पर सीधे प्रसारण में, करोड़ों लोगों के सामने मोदी जी को फिर से पीएम बनने का आशीर्वाद दे चुके हैं, जयललिता और करुणानिधि जैसे क्षत्रप अब इस दुनिया में नहीं हैं, ममता बनर्जी अधिक से अधिक 20 सीटें ला सकेंगी और इतनी सीटों पर उन्हें कौन पीएम बनाएगा और सहयोग कौन देगा? नवीन पटनायक और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता अपनी पूरी पारी खेल चुके हैं, और यह उनका आख़िरी चुनाव है।

अब अगर इस सीन में सबसे महत्वपूर्ण नेताओं की बात करें तो मायावती का नाम आता है, जिन्हें बीते कई वर्षों से पीएम पद का सशक्त दावेदार बताया जाता है, हमें कहना चाहिए कि वे इस बार फिर सशक्त दावेदार हो सकती थीं बशर्ते वे उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर लड़तीं, या पीएम पद पर कॉन्ग्रेस से समर्थन का आश्वासन लेने के बाद वे, देश भर में कॉन्ग्रेस से साथ गठबंधन करके लड़तीं, लेकिन वे ख़ुद अपने राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल समय से जूझ रही हैं, जहाँ वे अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में 80 में से मात्र 36 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं, कॉन्ग्रेस से उन्होंने खुली जंग का ऐलान कर दिया है और कॉन्ग्रेस ने भी इस जंग में चार कदम आगे बढ़कर, भविष्य में मायावती की राजनीति के सबसे बड़े संकट बनने वाले भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर के ऊपर अपनी सरपरस्ती का ‘हाथ’ रख दिया है।

वहीं इस पद के लिए 1991 से चूक रहे दिग्गज मराठा नेता, अपने ही राज्य नहीं बल्कि अपने ही परिवार में उलझ गए हैं, जहाँ उन्हें अपनी सीट अपने भतीजे अजीत पवार के बेटे पार्थ के लिए छोड़नी पड़ी है, वरना उनका समय तो बाद में खराब होता लेकिन ‘घड़ी’ पहले ही खंड-खंड हो जाती।

अंत में ‘बबुआ’ जितना जिक्र अखिलेश यादव का भी, जो कितनी भी डींगे हाँक लें, लेकिन उनके साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि जाति की राजनीति करने वाले अपने पिता जी की पार्टी के मुखिया सिर्फ ‘विरासत’ की वजह से हैं। और जाति की राजनीति में यह अयोग्यता ही मानी जाती है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण चौधरी अजीत सिंह है, जिनके पिताजी चौधरी चरण सिंह देश के प्रधानमंत्री भी रहे थे, लेकिन आज अजीत सिंह और उनके पुत्र एक-एक… दो-दो सीटों के लिए न केवल अपनी राजनीतिक निष्ठा बल्कि अपने समाज की निष्ठा को भी जहाँ-तहाँ नीलाम करते फिर रहे हैं। इसलिए बबुआ को अभी से ‘पैदल’ चलने का अभ्यास शुरू कर देना चाहिए क्योंकि चुनाव के बाद हाथी तो उनको उतार कर फेंक ही देगा, साइकिल के पहिए भी पंचर हो जाएँगे।

ऐसे में सिर्फ एक व्यक्ति बचता है जो अभी प्रधानमंत्री है, और आगे भी हर हाल में प्रधानमंत्री बनना चाहता है। जिसके पास न अब सत्ता और षड्यंत्रों के अनुभवों की कमी है, न संसाधनों की, न समर्थकों की, न ऊर्जा की, न मुद्दों की और न ही दिलेरी की। तब इन हालात में कोई मुझे यह बताए कि आखिर क्यों यह व्यक्ति फिर से पीएम नहीं बनेगा और 300 सीटों के साथ नहीं बनेगा ?

आतंकवाद से लड़ने में PM मोदी जितने कठोर नहीं थे मनमोहन सिंह: शीला दीक्षित

एक और जहाँ गाँधी परिवार जमीन घोटाले में अपने नाम मीडिया में आने के कारण परेशान चल रहा है, वहीं दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने आज एक बयान दिया है, जिसके कारण कॉन्ग्रेस में बवंडर मच सकता है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद से कॉन्ग्रेस लगातार ये माहौल बनाने के प्रयास कर रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आतंकवाद पर ठीक तरह से कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।

बृहस्पतिवार (मार्च 14, 2019) को एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में शीला दीक्षित ने स्वीकार करते हुए कहा कि मनमोहन सिंह आतंकवाद से लड़ने में उतने कठोर नहीं थे, जितने कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। हालाँकि, शीला दीक्षित ने यह भी कहा है कि नरेंद्र मोदी के ज्यादातर काम राजनीति से प्रेरित होने के साथ ही राजनीतिक लाभ उठाने के लिए होते हैं। इस बयान के सामने आने के बाद शीला दीक्षित ने सफाई देते हुए कहा है, “मनमोहन सिंह का आतंकवाद को लेकर उतना कड़ा कदम नहीं होता, जितना कि पीएम मोदी उठाते हैं। अगर मेरे बयान को किसी दूसरी तरह पेश किया जा रहा है तो मैं कुछ नहीं कह सकती।”

दिल्ली कॉन्ग्रेस प्रमुख शीला दीक्षित ने स्वीकार किया कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रतिक्रिया, पुलवामा आतंकी हमले  के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह मजबूत और दृढ़ नहीं थी।

शीला दीक्षित के इस बयान के बाद दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, जिन्हें आजकल सोशल मीडिया पर आत्ममुग्ध बौने के नाम से भी ‘वायरल’ किया जा रहा है, तुरंत एक्शन में आ गए हैं। उन्होंने शीला दीक्षित के इस बयान पर ट्वीट करते हुए कहा, “शीला जी का ये बयान वाक़ई चौंकाने वाला है। भाजपा और कॉन्ग्रेस में कुछ तो खिचड़ी पक रही है।” वहीं मनीष सिसोदिया ने भी ट्वीट में लिखा है, “हम तो पहले से ही कह रहे थे कि इस बार कॉन्ग्रेस, मोदी जी को दोबारा पीएम बनाने पर काम कर रही है।”

इन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इस सब जानकारी के बाद भी केजरीवाल लगातार हर दूसरे दिन कॉन्ग्रेस के सामने गिड़गिड़ाते हुए गठबंधन की भीख माँग रहे हैं। इसी कड़ी में आज हरियाणा कॉन्ग्रेस प्रमुख ने भी केजरीवाल की गठबंधन की पेशकश को लगभग रद्द कर दिया है।

इस्लामपुर में TMC गुंडों द्वारा भाजपा कार्यकर्ता की बेरहमी से पिटाई, हालत गंभीर

राजनीतिक असहिष्णुता का एक और मामला पश्चिम बंगाल में सामने आया है जहाँ एक भाजपा कार्यकर्ता पर कथित तौर पर तृणमूल कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा क्रूरता से हमला करने का आरोप लगाया गया।

अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से बीजेपी बंगाल द्वारा पोस्ट किए गए एक ट्वीट के अनुसार, पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर में एक बीजेपी कार्यकर्ता अपूर्बा चक्रबर्ती को TMC गुंडों ने बेरहमी से पीटा। हमले के शिकार हुए चक्रबर्ती की हालत गंभीर है और फ़िलहाल उन्हें उत्तर बंग मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। वह पश्चिम बंगाल में उत्तरी दिनाजपुर जिले के एक भाजपा नेता हैं।

बता दें कि अपूर्बा चक्रबर्ती कल रात (मार्च 13, 2019) इस्लामपुर पीएस के गुलशन इलाके में अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ एक शादी समारोह में गए थे। इसके बाद जब वो लगभग 10 बजे शादी से वापस घर जा रहे थे, तो संदिग्ध TMC के गुंडों ने सड़क पर उनके साथ मारपीट की। कुछ समय बाद वहाँ स्थानीय निवासी जमा हो गए जिसके बाद बदमाश वहांँ से भाग गए।

पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के राज में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के ख़िलाफ़ हिंसात्मक गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं। हाल ही में TMC विधायक सोवन चटर्जी और उनके मित्र बैशाखी चटर्जी बंगले में कैद हो गए थे क्योंकि उनके और उनके दोस्त के भाजपा में शामिल होने की अटकलें थीं। इसके अलावा उनकी दोस्त बैशाखी चटर्जी को बलात्कार की भी धमकी दी गई थी।

पिछले साल मई के महीने में, 6 महीने की गर्भवती महिला, जो पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनावों में एक भाजपा उम्मीदवार की रिश्तेदार थीं, नादिया ज़िले में TMC कार्यकर्ताओं द्वारा कथित रूप से उनका बलात्कार किया गया था।

पिछले साल TMC ने पश्चिम बंगाल पंचायत चुनावों में निर्विरोध 20,000 सीटें जीती थीं, ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि TMC पार्टी ने सभी ग्रामीण सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और हिंसा का सहारा लेकर बाक़ियों को नामांकन दाखिल करने से रोक दिया था। भाजपा ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को पंचायत चुनाव के लिए नामांकन दाखिल नहीं करने देने के मामले में हस्तक्षेप करने के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख़ किया था।

‘जनता बैलेट पेपर से देगी जवाब’, BJP की चुनाव आयोग से ‘माँग’ पर भड़क उठीं ममता

बुधवार (मार्च 13, 2019) को भाजपा की ओर से एक प्रतिनिधिमंदल ने दिल्ली में चुनाव आयोग से मिलकर बंगाल राज्य को अतिसंवेदनशील घोषित करने की माँग की थी। इसकी जानकारी मिलने के बाद प्रदेश मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा पर पलटवार करते हुए कहा कि चुनाव आयोग से राज्य के सभी पोलिंग बूथ को अतिसंवेदनशील घोषित करने की माँग करके भाजपा ने बंगाल और वहाँ के लोगों का अपमान किया है।

ममता की मानें तो भाजपा द्वारा राज्य को संवेदनशील घोषित करने की माँग से ही बीजेपी उन्हें परेशान करने लगी है। और ऐसा इसलिए क्योंकि बीजेपी को बंगाल की खुशहाली और समृद्धि पसंद नहीं आ रही है। ममता का कहना है कि भाजपा मनोरोग की शिकार हो चुकी है।

ममता ने बड़ी नाराजगी वाले अंदाज में कहा है कि आखिर राज्य को अतिसंवेदनशील बताकर वो (भाजपा) कह भी कैसे सकते हैं कि वो सुरक्षाबल और तृणमूल कॉन्ग्रेस को कंट्रोल करेगी। इतना ही नहीं ममता बनर्जी ने देश में लोकतंत्र पर सवाल उठाते हुए कहा कि बीजेपी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों को निगरानी में रखकर कंट्रोल कर रहे हैं। उन्होंने प्रेस क्लब को आवाज़ उठाने की भी नसीहत दी।

ममता ने अपने कार्यकर्ताओं से पोलिंग बूथ पर सतर्क रहने का आदेश दिया है। दरअसल, ममता का तर्क है जब
एक दिन में त्रिपुरा, राजस्थान में चुनाव हो सकते हैं तो बंगाल में क्यों नहीं सकते?

बता दें कि इस वर्ष लोकसभा चुनाव यूपी, बिहार, बंगाल में 7 चरणों में होने तय हुए हैं। जिसके कारण कई विपक्षी दल नाराज़ हैं और आरोप लगाया है कि ऐसा सिर्फ़ भाजपा को फायदा पहुँचाने के लिए किया जा रहा है।

बंगाल को शांतिपूर्ण राज्य बताने वाली ममता ने कहा कि भाजपा प्रदेश को संवेदनहीन समझ रही है, साथ ही, निर्वाचित सरकार को भी नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है। ममता ने भाजपा को इन सब चीज़ों का जवाब बैलेट पेपर से देने की बात कही है।

‘मोदी है तो मुमकिन है’ नारे के पीछे है यह वजह, बताया अरुण जेटली ने

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपनी ‘एजेंडा 2019’ श्रृंखला का चौथा भाग फेसबुक पर साझा किया, जहाँ उन्होंने बीजेपी के सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार की विभिन्न उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। अपने ब्लॉग में उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में पिछले 5 वर्षों में सरकार की उपलब्धि पर प्रकाश डाला। आइए आपको बताते हैं वित्त मंत्री ने अपने ब्लॉग में किन-किन उपलब्धियों के बारे में बताया:

Arun Jaitley ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಗುರುವಾರ, ಮಾರ್ಚ್ 14, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले पाँच वर्षों के दौरान अपने अथक परिश्रम का प्रदर्शन चौबीसों घंटे काम करके किया। अपनी लगातार नई बातों को सीखने की इच्छा के कारण, प्रधानमंत्री न केवल एक प्रभावशाली विद्यार्थी साबित हुए हैं बल्कि उन्होंने विदेश नीति, आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर भी अपनी पकड़ मज़बूत की। नीतिगत मुद्दों पर, वे अपनी टीम, मंत्रियों और सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों के साथ घंटों बैठते हैं और महत्वपूर्ण मामलों के संबंध में निर्णय लेते हैं। एक कर्ता के रूप में उनकी छवि अब अधिकतर भारतीयों द्वारा स्वीकार कर ली गई है। इसलिए, बीजेपी ने आगामी चुनावों के लिए एक प्रभावी नारा ‘मोदी है तो मुमकिन है – Modi makes it possible’ चुना है।

इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को नीचे सूचीबद्ध किया गया है:

  • इतिहास में पहली बार, लगातार पाँच साल तक, भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था रहा – यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत एक ‘स्वीट स्पॉट’ बनकर उभरा।
  • पिछले पाँच वर्षों से, न तो प्रत्यक्ष और न ही अप्रत्यक्ष कर दरों में वृद्धि हुई। इसके विपरीत, वे कम हो गए। पाँच लाख रुपये तक की शुद्ध आय वाले लोगों को आयकर से छूट दी गई है। GST काउंसिल की हर बैठक से पहले, राष्ट्र यह अनुमान लगाता है कि कौन से कर कम होने वाले हैं। ₹40 लाख तक के टर्नओवर वाले छोटे व्यवसायों को जीएसटी से छूट प्राप्त है। ₹1.5 करोड़ तक के टर्नओवर वाले लोग एक प्रतिशत जीएसटी का भुगतान कर सकते हैं। क़िफ़ायती आवास पर अब एक प्रतिशत कर लगाया गया है। करों के बोझ को कम करते हुए, कर आधार का विस्तार हुआ है और संग्रह तेजी से बढ़ा है।
  • बीस महीने की अवधि में, गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) का सबसे सरल कार्यान्वयन हुआ है। संविधान संशोधन, कराधान कानून इसके अधीन हैं, नियम और शुल्क सभी क्रमशः संसद और जीएसटी परिषद द्वारा सर्वसम्मति से तय किए गए हैं। किसी ने कल्पना नहीं की थी कि भारत कराधान की दर कम करेगा और कर संग्रह बढ़ाएगा।
  • 2014 में, हर रोज सात किलोमीटर राजमार्गों का निर्माण किया गया। आज वह आँकड़ा तीस किलोमीटर प्रतिदिन है यानी साल में दस हजार किलोमीटर से ज़्यादा। भारत दुनिया में सबसे बड़ा राजमार्ग डेवलपर बन गया है।
  • 2014 में, केवल 38 प्रतिशत ग्रामीण घर स्वच्छता से जुड़े थे। आज 99 प्रतिशत ग्रामीण घर स्वच्छता से जुड़े हुए हैं।
  • 91 प्रतिशत गाँव अब ग्रामीण सड़कों से जुड़े हैं। ग्रामीण सड़कों पर खर्च तीन गुना बढ़ा दिया गया।
  • भारत में पचास करोड़ गरीब लोगों को प्रति वर्ष आयुष्मान भारत योजना के तहत प्रति परिवार ₹5 लाख तक के अस्पताल उपचार का आश्वासन दिया गया। यह योजना 23 सितंबर, 2018 को लागू की गई थी और ताज़ा आंकड़ों के अनुसार 15.27 लाख रोगियों का इलाज कैशलेस आधार पर किया जा चुका है।
  • सबसे गरीब बीपीएल परिवारों के आठ करोड़ परिवारों को रसोई गैस के चूल्हे और सिलेंडर उपलब्ध कराए गए। भारत के गरीबों ने खाना पकाने की प्राचीन प्रणाली से पारिस्थितिक रूप से अनुकूल और अधिक आधुनिक प्रणाली से स्नातक किया।
  • भारत में सभी इच्छुक घरों (100 प्रतिशत) का विद्युतीकरण किया गया।
  • प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत लगभग पैंतीस करोड़ बैंक खाते हर घर को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ते हुए खोले गए। यह दुनिया में अब तक की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन योजना है।
  • स्वरोजगार और रोजगार सृजन को प्रोत्साहित करने के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत सोलह करोड़ से अधिक ऋण दिए गए। लाभार्थियों में से 54% अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति/ अन्य पिछड़ा वर्ग/ अल्पसंख्यक हैं। इसके अलावा, लाभार्थियों में 72% महिलाएँ हैं।
  • 2014 में, भारत में वाणिज्यिक उड़ानों के साथ 65 कार्यात्मक हवाई अड्डे थे। वर्तमान में वाणिज्यिक उड़ानों के साथ 101 हवाई अड्डे हैं। आने वाले समय में यह आँकड़ा बहुत जल्द 50 और बढ़ने की संभावना है।
  • भारतीय रेलवे अब सुपरफास्ट 160 किलोमीटर प्रति घंटे की ट्रेन और लोकोमोटिव के युग में प्रवेश कर चुकी है जो घरेलू रूप से निर्मित हैं। बहुत जल्द बुलेट ट्रेन का सपना साकार होगा। रेल यात्रा में गुणवत्ता की सुविधा में काफी सुधार हुआ है।
  • दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) ने लेनदार-देनदार संबंध के पैटर्न को बदल दिया गया है। अब लेनदारों, बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए डिफ़ॉल्ट प्रबंधन को नियंत्रण से बाहर फेंकना और अंततः अपने ऋण को रियलाइज़ कराना संभव हो गया है।
  • आधार – विशिष्ट पहचान संख्या, ने यह संभव कर दिया है कि सभी कमजोर वर्गों को राज्य द्वारा दिए गए लाभ सीधे और तत्काल प्रबाव से बिना किसी नुकसान के उन तक पहुँचें।
  • ग्रामीण बुनियादी ढांचे के निर्माण के अलावा, 22 फसलों वाले किसानों को लागत का 50% से अधिक एमएसपी का आश्वासन दिया गया। सब्सिडी वाली फसल बीमा योजना के अलावा, 12 करोड़ छोटे और मध्यम किसानों को आय सहायता के रूप में वार्षिक ₹6000/- दिए जाएँगे। कल 2.77 करोड़ किसानों को पहली किस्त मिल चुकी है।
  • किसानों को ₹75,000 करोड़ की आय सहायता के अलावा, मनरेगा पर ₹60,000 करोड़ खर्च किए जा रहे हैं। यह संसाधनों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पहुँचाने का काम करता है।
  • ₹1 करोड़ 4 लाख करोड़ तक के खर्चे से सस्ता और रियायती खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। कोई भी भारतीय भूखा नहीं सोएगा।
  • ग्रामीण भारत के प्रत्येक BPL परिवार के पास 2022 तक एक घर होगा। हर साल पचास लाख घर बनाए जा रहे हैं।
  • किसानों सहित असंगठित क्षेत्र का श्रमिक अब एक योजना के तहत ₹3000 पेंशन का हक़दार होगा, इसमें सरकार 50% का योगदान करती है। इससे दस करोड़ परिवारों को फ़ायदा होगा।
  • यूपीए सरकार के दौरान मुद्रास्फीति, जो 10.4 प्रतिशत थी, आज 2.5 प्रतिशत से भी कम है।
  • प्रधानमंत्री और सरकार ने दुनिया को दिखा दिया है कि भारत में एक ईमानदार सरकार चलाना संभव है।
  • इतिहास में पहली बार, ग़ैर-आरक्षित श्रेणियों के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए सार्वजनिक रोज़गार और शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया।
  • भारत ने 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 के एयर स्ट्राइक के माध्यमों से यह प्रदर्शित किया कि केवल देश के भीतर ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर आतंकवाद का जवाब देने में पूरी तरह से सक्षम है और इसके लिए आतंक पर हमला करने के अपरंपरागत तरीकों को भी अपनाने के लिए भी तैयार है।

ऊपर बताई गई उपलब्धियों के माध्यम से यह समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में चल रही केंद्र सरकार ने कई क्षेत्रों में संघर्ष करते हुए अपने विकास के लक्ष्यों को पूरा किया। ऐसे में एक सवाल उठना ज़रूरी बन पड़ता है कि क्या इससे पहले किसी सरकार ने इतना काम किया है? यह वही सरकारी तंत्र था, वही राजनीतिक व्यवस्था, वही कार्यान्वयन उपकरण जो सरकार के पास पहले भी मौजूद थे। अपनी कुशल राजनीति का परिचय देते हुए मोदी सरकार ने अपने विकास संबंधी सभी लक्ष्यों की प्राप्ति की।

सोशल मीडिया पर अफवाह, फेक न्यूज़ फैलाने पर होगा केस: चुनाव आयोग

लोकसभा चुनाव के तैयारियों के बीच सभी दलों के आईटी सेल ने जहाँ कमर कस ली है वहीं उन पर लगाम लगाने के लिए चुनाव आयोग भी मुस्तैद हो चुका है। चुनाव प्रचार के बीच सोशल मीडिया पर समर्थकों द्वारा बनाया गया माहौल काफी प्रभावी होता है। इस माहौल बनाने के चक्कर में फेक न्यूज़ से लेकर तमाम मनगढ़ंत अफवाहें भी फैलाई जाती हैं।

इसे देखते हुए चुनाव आयोग ने अपनी तैयारी तेज कर दी है। अब उनकी खैर नहीं जो किसी खास दल को जिताने, धर्म या भाषा से संबंधी भड़काऊ भाषण या किसी तरह की अफवाह जैसी पोस्ट डालकर चुनाव और मतदाता को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। अब ऐसी पोस्ट करने एवं उन्हें आगे बढ़ाने पर फेसबुक और व्हाट्सएप ग्रुप के एडमिन और ट्विटर यूजर के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन का मुकदमा दर्ज किया जाएगा।

बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, व्हॉट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम के ज़रिए जबरदस्त प्रचार-प्रसार किया गया था। हालाँकि उस समय उतने मतदाता सोशल मीडिया पर नहीं थे जितने आज हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब 75-80 करोड़ वोटरों के सोशल मीडिया पर अकाउंट होने का अनुमान है।

ताज़ा जानकारी के अनुसार भारत में – लगभग 200 मिलियन यूजर व्हाट्सएप पर, करीब 300 मिलियन यूजर फेसबुक पर और 34.4 मिलियन यूजर ट्विटर पर सक्रिय हैं।

इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के सोशल मीडिया पर होने के कारण, लगभग सभी दलों के आईटी सेल काम पर लग गए हैं। सोशल मीडिया पर आक्रामक प्रचार के दौरान कई लोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालने, चुनाव जीतने का फ़र्ज़ी दावा, उम्मीदवार को जीता हुआ दर्शाना, धर्म या भाषा संबंधी भड़काऊ पोस्ट भी डालते हैं और उसे वायरल कराते हैं, ताकि वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके। लेकिन इस बार निर्वाचन आयोग की सख्ती के बाद ऐसा करना अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारना होगा।

शंकर वोरा (प्रभारी, आदर्श आचार संहिता पालन) के अनुसार, “सोशल मीडिया पर पोस्ट के लिए हमारी टीम ने निगाह रखी हुई है। किसी दल या उम्मीदवार को जिताने, भड़काऊ पोस्ट पर एडमिन के खिलाफ आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का मुकदमा दर्ज होगा।”