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ठुकरा के मुझको व्हाट्सप्प से, AAP मेरा इंतकाम देखेगी

AAP सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा AAP के ही विधायक अलका लाम्बा को ट्विटर पर अनफॉलो करने के बाद, अलका लाम्बा ने बीजेपी नेताओं का यह कहते हुए शुक्रिया अदा किया कि उनको भाजपा के कुछ नेताओं ने बीजेपी में शामिल होने के लिए अप्रोच किया।

AAP नेता अलका, जो AAP के प्रति अपनी वफादारी साबित करने से पहले कॉन्ग्रेस से जुड़ी थी, ने अब दावा किया कि पिछले कुछ दिनों से, भाजपा के नेता उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा में उनका भविष्य काफी बेहतर है। फ़िलहाल, लाम्बा ने कहा कि वह राजनीति में अपने स्वयं के राजनीतिक भविष्य के लिए नहीं बल्कि उन लोगों के भविष्य के लिए हैं जिन पर हमारे देश का भविष्य निर्भर करता है: गरीब, किसान और मजदूर। उन्होंने कहा कि यह विचारधाराओं की लड़ाई है।

भाजपा में शामिल होने की अफवाहों के सामने आने के बाद, अलका ने भाजपा में शामिल होने की पेशकश से इनकार करने करते हुए जो ट्वीट किया वह और भी दिलचस्प है।

अलका ने इनकार के बीच भी ये कहकर सुगबुगाहट छोड़ दी कि यह संभव हो सकता है कि आगामी चुनावों में जो भी नेता देश के पक्ष में फैसला लेगा, वह हमेशा उसका समर्थन करेंगी। बता दें कि दिल्ली विधानसभा भी अगले साल की शुरुआत में होने की संभावना है जिसमें एक साल से भी कम समय बचा है।

खबर यह भी है कि आप नेत्री को हाल ही में AAP के व्हाट्सएप ग्रुप से भी हटा दिया गया है। ये तो वही बात हो गई “उन्होंने लगभग मना कर दिया है जी…..”

इससे पहले AAP के मुखिया केजरीवाल मुँह से, शरीर से, ट्वीट से, और हर उस तरीके से कॉन्ग्रेस से समर्थन के लिए डेस्पेरेट हुए जा रहे थे, जिससे लगता है कि इस व्यक्ति के लिए सत्ता का लालच कितना प्रबल है। लगातार कॉन्ग्रेस के पास आने की तमाम कोशिशों के असफल होने पर केजरीवाल ने जो ट्वीट किए, जिस तरह की बातें कहीं, वो आश्चर्यजनक था। कुछ दिन पहले शीला दीक्षित की उपस्थिति में केजरीवाल द्वारा दिए गए प्रस्ताव पर चर्चा हुई थी, और दिल्ली में आम आदमी पार्टी से गठबंधन को कॉन्ग्रेस ने पूरी तरह से नकार दिया था।

नेहरू ने जिस ड्रैगन को दूध पिलाया, आज वह भारत पर ही आग उगल रहा है

हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवारलाल नेहरू भारतीय इतिहास के सबसे कद्दावर नेताओं में से एक रहे हैं। लगभग 17 वर्षों तक दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान जवाहरलाल नेहरू की कई ऐसी भी नीतियाँ रही हैं, जिनके परिणाम देश आज तक भुगत रहा है। हमने एक विकीलीक्स केबल के माध्यम से बताया था कि अमेरिका सोचता है कि अगर नेहरू ने सरदार पटेल की बात मान ली होती तो सिक्किम को भारत का हिस्सा बनने में 25 साल नहीं लगते।

इसी तरह नेहरू की लचर कश्मीर नीति पर भी बात होती रही है। इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले जाकर नेहरू ने कश्मीर मुद्दे को और उलझा दिया था। नेहरू ने सेना की ज़रूरतों पर भी ध्यान नहीं दिया और एक बार तो उन्होंने रक्षा नीति की आवश्यकता को ही नकार दिया था। इसी तरह जिस चीन को नेहरू अपना दोस्त मान कर अन्य नेताओं की चेतावनियों को नज़रअंदाज़ करते रहे, उसी चीन ने भारत की पीठ में छुरा घोंपा और 1962 युद्ध में भारत को भारी क्षति हुई।

आज चीन को लेकर ख़बर आई है कि उसने एक बार फिर से मसूद अज़हर को आतंकी घोषित करने की भारत की माँग को सुरक्षा परिषद में ठुकरा दिया। चीन के इस रवैये के कारण मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित नहीं किया जा सका। चीन के इस रवैये से न सिर्फ़ भारत बल्कि अमेरिका व अन्य देश भी परेशान हो चले हैं। लेकिन, क्या आपको पता है कि चीन के इस दुःसाहस के पीछे जवाहरलाल नेहरू की लचर नीतियाँ रही है। चीन आज सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और भारत नहीं है। इसमें भी जवाहरलाल नेहरू के एक निर्णय का हाथ है। ऐसा ख़ुद कॉन्ग्रेस पार्टी के ही नेता व पूर्व राजनयिक शशि थरूर ने लिखा है। भारत के पूर्व विदेश राज्यमंत्री ने अपनी पुस्तक ‘Nehru: The Invention Of India‘ में लिखा है कि नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता ठुकरा दी थी। बकौल थरूर, उन्होंने इसे से सम्बंधित फाइलें UN में देख रखी हैं।

नेहरू ने सुझाव देते हुए कहा था कि ये सीट चीन को दे दी जाए। थरूर लिखते हैं कि नेहरू चीन के प्रति सहानुभूति वाला रवैया रखते थे। नेहरू की विदेश नीति की बात करें तो बाबासाहब भीमराव अंबेडकर की बातों को समझना पड़ेगा। बाबासाहब ने नेहरू की आलोचना करते हुए कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था। अपने इस्तीफा पत्र में उन्होंने नेहरू की विदेश नीति की ख़ासी आलोचना की थी। इस बारे में प्रकाश नंदा ने न्यूज़ 18 में एक ब्लॉग लिख कर अधिक जानकारी दी थी। अंबेडकर के इस्तीफा पत्र की बात करते हुए नंदा ने बताया कि वो मानते थे कि आज़ादी के समय कोई भी ऐसा देश नहीं था जिसने भारत के लिए बुरा सोचा हो। सभी देश भारत के दोस्त थे। बकौल अंबेडकर (सितम्बर 7, 1951), चार वर्षों बाद स्थिति एकदम उलट गई थी। उन्होंने अपने पत्र में लिखा है, “विश्व पटल पर भारत आज अलग-थलग हो गया है और संयुक्त राष्ट्र में हमारे प्रस्तावों का समर्थन करने वाला कोई देश नहीं बचा है।”

उन्होंने लचर पाकिस्तान नीति के लिए नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा था कि वे कश्मीर मुद्दा और पूर्वी बंगाल के लोगों पर हो रहे अत्याचार को देख कर व्यथित थे। उन्होंने भारत को पूर्वी बंगाल में रह रहे अपने लोगों के साथ खड़े रहने को कहा था। पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं की चिंता करने के साथ-साथ उन्होंने कहा था कि कश्मीर के बौद्ध और हिन्दुओं को भी पाकिस्तान में जबरदस्ती मिलाया जा सकता है, जो उनकी इच्छा के विरुद्ध होगा। बाबासाहब की राय चीन को लेकर भी नेहरू से अलग थी। उन्होंने भारत की लचर चीन नीति की आलोचना करते हुए कहा था कि चीन ने तिब्बत को जबरदस्ती सेना के दम पर हथिया लिया। 1951 में लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों को सम्बोधित करते हुए बाबासाहब ने कहा था कि तिब्बत में चीन की मौजूदगी भारत के लिए लम्बे समय तक ख़तरा बनी रहेगी। तिब्बत की स्वतन्त्रता की वकालत करने वाले अम्बेडकर हमेशा हिमालयी राज्यों में चीन के हतस्क्षेप के प्रखर विरोधी रहे।

टाइम मैगज़ीन ने भी इस बात की तरफ ध्यान दिलाया था कि डॉक्टर अम्बेडकर भारत के अकेले बड़े नेता थे जो नेहरू और चीन की दोस्ती की खुली आलोचना किया करते थे। अम्बेडकर ने कहा था कि भारत को वामपंथी तानाशाही और संसदीय लोकतंत्र में से किसी एक को चुनना चाहिए। उन्होंने पूछा था कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता क्यों नहीं मिली? प्रधानमंत्री नेहरू ने इसके लिए क्यों नहीं प्रयास किए? पंचशील नीति पर निशाना साधते हुए अम्बेडकर ने कहा था कि अगर माओ को पंचशील पर थोड़ा भी भरोसा होता तो वे अपने ही देश में बौद्धों के साथ अलग तरह का व्यवहार क्यों करते। उन्होंने अपने देश के ही बौद्धों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। अफ़सोस यह कि नेहरू ने कई मुद्दों पर अम्बेडकर जैसे विद्वान और पटेल जैसे महान प्रशासक की बात नहीं सुनी, जिसका खामियाजा हमारा देश आज तक भुगत रहा है।

भारत-चीन युद्ध के कारणों की बात करते हुए मेजर इयान कार्डोज़ो अपनी पुस्तक ‘परम वीर चक्र‘ में लिखते हैं कि नेहरू ने विस्तारवादी चीन को अनावश्यक रियायतें देना प्रारम्भ कर दिया। चीन की कुटिल चाल से वे हमेशा बेखबर रहे। 1971 भारत-पाक युद्ध में जब मेजर जनरल इयान का पाँव बुरी तरह घायल हो गया तो वहाँ किसी भी प्रकार की मेडिकल सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थी। बहादुर इयान ने ख़ुद खुर्की का प्रयोग कर के अपना पाँव काट डाला था। बाद में एक पाकिस्तानी सर्जन को कब्ज़े में लेकर उनका ऑपरेशन कराया गया। इन सबके बावजूद वे एक आर्टिफीसियल पैर के साथ मैराथन वगैरह में हिस्सा लेते हैं और फिट रहते हैं। अपनी पुस्तक में उन्होंने आगे लिखा है कि तिब्बत को लेकर भारत की हल्की-फुल्की प्रतिक्रिया ने चीन को और बढ़ावा देने का कार्य किया। यहाँ तक कि भारतीय शासन प्रतिष्ठान ने अपने इस निर्णय के पीछे बेशर्मी से भरे बेढंगे तर्क भी दिए। मेजर जनरल ने नेहरू को सैन्य नेतृत्व को कमजोर करने के लिए जिम्मेदार ठहराया है।

नेहरू तो चीन की बड़ी इज्जत करते थे, आदर देते थे लेकिन चीन नेहरू के बारे में क्या सोचता था? चीनी राजनेताओं के उनके बारे में क्या राय थी? पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के पहले प्रीमियर चाउ एन-लाइ की नेहरू के बारे में सोच का विवरण इंडियन एक्सप्रेस व टाइम्स ऑफ इंडिया के एडिटर रहे अरुण शौरी अपनी पुस्तक ‘भारत-चीन सम्बन्ध‘ में देते हैं। लाइ नेहरू को एक घमंडी व्यक्ति मानते थे और उनका सोचना था कि नेहरू के इस घमंड को तोड़ना ज़रूरी है। शौरी ने नेहरू की विचित्र चीन नीति का जिक्र करते हुए बताया है कि नेहरू ने 22 दिसंबर 1962 को मुख्यमंत्रियों को भेजे गए पत्र में लिखा था कि चीनियों द्वारा भारत पर किया गया आकस्मिक हमला भारत के लिए लाभप्रद सिद्ध होगा। अब सोचने वाली बात है कि किस देश को दूसरे देश द्वारा किए गए अपमान से लाभ होता है? नेहरू ने चीनियों को न सिर्फ़ अपना बल्कि देश का भी अपमान करने दिया। भारत की हार में भारत का लाभ कहाँ था?

संघ में कई अहम पद संभाल चुके राम माधव अपनी पुस्तक ‘असहज पड़ोसी‘ में एक ऐसी घटना का जिक्र करते हैं, जिस से नेहरू की अदूरदर्शिता का पता चलता है। भारत के दो सैन्य अधिकारियों ने नेहरू को चीन द्वारा संभावित हमले को लेकर आगाह किया था। यह चेतावनी बेजा अफवाहों पर नहीं बल्कि प्रत्यक्ष सबूतों पर आधारित थी। चीनी सैनिकों को एक गलत नक़्शे के साथ पकड़ा गया था, जिसमें उत्तर-पूर्वी भारत के सीमान्त प्रांत को चीन का हिस्सा बताया गया था। सारी कड़ियों को जोड़ कर तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ केएम करियप्पा ने जब नेहरू से इस बारे में बात की तो उन्होंने करियप्पा की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि देश का दुश्मन कौन है और कौन नहीं, यह फ़ैसला करना सेना का काम नहीं है। उन्होंने करियप्पा को झिड़कते हुए कहा कि चीन नेफा सीमा की रक्षा करेगा, वह दोस्त है। किसी दूसरी ही दुनिया में जी रहे नेहरू अगर 1950 के दशक की शुरुआत में ही सेना की बात मान कर देश को तैयार रखते तो शायद 1962 में चीन को मुँह की खानी पड़ती।

नेहरू जी अलग ही दुनिया में जी रहे थे। सेना, अम्बेडकर, पटेल, सभी की बातें उन्हें अपनी सोच के सामने तुच्छ लगती थी। करियप्पा को झिड़क देना, थिमैया को इस्तीफा देने को मजबूर कर देना- यह सब दिखाता है कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं थे। अगर समय रहते चीन को उचित सबक सिखाया जाता, सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता ले ली गई होती, चीन के ख़िलाफ़ सबकी बात मान कर सेना को तैयार रखा जाता, तो क्या आज चीन की डोकलाम में घुस आने की हिम्मत होती? क्या आज चीन सुरक्षा परिषद में बैठ कर भारतीय भूमि पर रक्त बहाने वाले पाकिस्तानी आतंकी मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने की राह में आड़े आ रहा होता? अब जब राहुल गाँधी कह रहे हैं कि मोदी शी जिनपिंग से डर गए हैं, तो भाजपा ने उन्हें इतिहास याद दिलाते हुए नेहरू की चीन नीति के बारे में जानने को कहा है। आशा है, इस संवेदनशील मुद्दे का राजनीतिकरण करने से विपक्षी दल बचेंगे।

राहुल-पाहवा ज़मीन हेराफेरी को सामने लाने के लिए ऑपइंडिया अभिनन्दन का पात्र: रविशंकर प्रसाद

आज गुरुवार (मार्च 14, 2019) को केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट के आधार पर राहुल गाँधी को घेरा। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और एचएल पाहवा के बीच हुई ज़मीन की डील के बारे में बात करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ऑपइंडिया ने इस पर काफ़ी विस्तृत तरीक़े से प्रकाश डाला है। उन्होंने कहा कि राहुल ने ज़मीन ख़रीद कर अपनी बहन को गिफ्ट कर दी। उन्होंने कहा कि ज़मीन खरीदना बुरी बात नहीं है, ज़मीन किस से ख़रीदी गई, यह मायने रखता है। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाए किये ज़मीनें एक ही व्यक्ति से क्यों ख़रीदी गई। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पर गंभीर आरोप लगाते हुए प्रसाद ने कहा कि उनके सभी लैंड डील्स में राहुल गाँधी पूरी मज़बूती से उनके साथ खड़े हैं। उन्होंने पूछा कि ये एचएल पाहवा कौन है? उनका व्यापार क्या है? उसकी आय का स्रोत क्या है? सीसी थम्पी और संजय भंडारी का नाम लेते हुए रविशंकर प्रसाद ने राहुल को आड़े हाथों लिया।

उन्होंने ऑपइंडिया के हवाले से बताया कि 17 मार्च 2008 को राहुल गाँधी ने 26,47,000 रुपए में एचएल पाहवा से हसनपुर, पलवल में महेश कुमार नागर के माध्यम से ज़मीन ख़रीदी। 3 मार्च 2008 को एचएल पाहवा ने हसनपुर में 72 कैनाल ज़मीन महेश कुमार नागर के माध्यम से रॉबर्ट वाड्रा को बेच दी। इसके अलावा अमीपुर में 40 कैनाल ज़मीन प्रियंका गाँधी के द्वारा 15 लाख रुपए में ज़मीन खरीदी गई। इसमें भी पाहवा शामिल था। उन्होंने पूछा कि इन सारी ख़रीद-बिक्रियों में पाहवा एक कॉमन फैक्टर क्यों है। उन्होंने पूछा कि 24 अप्रैल 2006 को प्रियंका गाँधी द्वारा 15 लाख रुपए में ख़रीदी गई ज़मीन 3 साल 10 महीने बाद 84.15 लाख रुपए में क्यों बेच दी गई?

केंद्रीय मंत्री ने किया ऑपइंडिया का अभिनन्दन

ऑपइंडिया द्वारा सामने लाए गए मुद्दों पर बात करते हुए रविशंकर प्रसाद ने बताया कि 80 कैनाल ज़मीन 10 अप्रैल 2006 को बेचीं गई। इसे रॉबर्ट वाड्रा द्वारा ख़रीदी गई और एचएल पाहवा द्वारा बेचीं गई। इस डील में भी महेश कुमार नागर के माध्यम से ही लेनदेन हुआ। दिसंबर 2010 में वाड्रा में यही ज़मीन 2 करोड़ 50 लाख में बेच दी। उन्होंने कहा कि यहां दो त्रिभुज बनते हैं- एक ख़रीददारों का और एक बिक्रेताओं का। एक तरफ प्रियंका, राहुल और रॉबर्ट हैं तो दूसरी तरफ़ पाहवा, भंडारी और थम्पी है। उन्होंने कहा कि राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार को क्लीन चिट दिए जाने के बावजूद राहुल द्वारा सवाल खड़े करना उनकी तल्खी को दिखाता है।

उन्होंने कहा कि राफेल पर राहुल गाँधी द्वारा सारा हंगामा संजय भंडारी के लिए किया जा रहा है क्योंकि यूरोफाइटर को सफलता नहीं मिले। भंडारी को राफेल में कुछ नहीं मिल पाया, इसीलिए राहुल राफेल पर निशाना साध रहे हैं। केंद्रीय आईटी प्रसाद ने कहा कि ऑपइंडिया ने जिस तरह से इस ज़मीन डील को सामने लाया, इसके लिए वह प्रशंसा का पात्र है।

फैक्ट चेक: क्या सूअर का खून होता है वोटिंग वाली स्याही में? अल्पसंख्यकों के खिलाफ साज़िश?

पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया आपसी संवाद और जानकारी का एक बेहतरीन जरिया बनकर उभरा है। लेकिन हर चीज के अच्छे और बुरे दोनों पहलू होते हैं। सूचना क्रांति के इस दौर में हम आपा-धापी में हर ‘वायरल’ हो रही खबर, पोस्ट, तस्वीर को सच भी मान लेते हैं। राजनीतिक दल जनता की इस नादानी को अच्छी तरह से समझते हैं और अपने मीडिया गिरोह और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के माध्यम से लोगों में अफवाह फैलाकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेते हैं।

इसी प्रकार की एक खबर आजकल फेसबुक से लेकर ट्विटर पर चर्चा का विषय बन चुकी है। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों और बड़े पेजों द्वारा एक पोस्ट वायरल किया जा रहा है जिसमें लिखा है, “मतदान के बाद जो स्याही लगाई जाती है, उसमें सूअर का खून मिलाया जाता है। यह बात सही है क्या?”

यह पोस्ट उस दिन चर्चा में आया है जब से कुछ मुस्लिम संगठनों ने रमजान के दिन पड़ने वाली तारीखों पर चुनाव आयोग से आपत्ति जतानी शुरू की और रमजान के दिन पड़ने वाली तारीखों को बदलने की माँग की है। पिछले 4-5 वर्षों में देखने को मिला है कि विपक्षी पार्टियों ने अपने स्वार्थ के लिए सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं पर आरोप लगा कर लोगों को उकसाने और अफवाह फैलाने का काम किया है।

“पाक-ए-रमजान के महीने वोट देना हराम है?”

मतदान में इस्तेमाल होने वाली स्याही की भ्रामक और झूठी खबर के साथ ही कुछ अकाउंट्स यह खबर भी फैला रहे हैं कि भाजपा ने जान-बुझकर इसी समय चुनाव रखा ताकि कुछ लोग रमजान के दिन वोट देकर पाप करें। ट्वीट में लिखा है, “फतवा: पाक-ए-रमजान के महीने वोट देना हराम है। भाइयों 5 मई से 4 जून तक हमारा रमजान का महीना है। और इसी बीच 3 दिन चुनाव भी हैं। भाजपा ने जान-बूझकर इसी समय चुनाव रखा, ताकि हम वोट देकर पाप करें। मगर हम भी क़ुरान के ज्ञानी हैं। इनकी बातो में नही आएँगे। हम अल्लाह और EVM में से अल्लाह चुनेंगे।”

लेकिन सवाल यह है कि ऐसा दावा करने वाले लोग वही हैं, जो उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनते वक़्त दावा कर रहे थे कि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए भाजपा द्वारा लाए गए तीन तलाक अध्यादेश से गुस्साए एक मजहबी आदमी ने अगर भाजपा के विरोध में वोट दिया होगा तो उसकी 4 पत्नियों ने भाजपा को वोट दे दिया होगा, जिस कारण भाजपा जीत गई। ऐसे में विपक्षी पार्टियों और उनके समर्थकों द्वारा भाजपा पर रमजान के दिन जान-बूझकर मतदान करवाने का आरोप हास्यास्पद ही नजर आता है।

हालाँकि, इस अपील को करने वाले ‘मौलाना फैजल हयात बुखारी (फैजू मियाँ) ~ फतवा वाले’ (@faizu_miya) नाम के इस एकाउंट की वास्तविकता संदेह का विषय है, और सरसरी तौर पर यह कहा जा सकता है कि यह कटाक्ष है। लेकिन, हर सोशल मीडिया यूजर इतना समझदार नहीं होता कि सही और गलत एकाउंट्स में फर्क कर सके। शुरुआत मजाक से होती है, लेकिन कुछ लोग जो वैमनस्यता फैलाना चाहते हैं, या किसी पार्टी के खिलाफ बातें फैलाना चाहते हैं, वो तो ‘टाइप किया हुआ है, गलत थोड़े ही होगा’ मानने वाले लोगों को अपना शिकार बनाते हैं। यही हो भी रहा है, जिस सूचना को यह एकाउंट वायरल कर रहा है उसका इस्तेमाल कर, कई लोग अल्पसंख्यकों में सन्देश फैला रहे हैं कि रमजान के दिन वोट करना हराम है।

सूअर का खून नहीं बल्कि सिल्वर नाइट्रेट होता है स्याही में इस्तेमाल

आम चुनाव के दौरान मतदान करते समय मतदाताओं की उंगली पर एक खास तरह की स्याही लगाई जाती है। इस स्याही का प्रयोग फर्जी मतदान को रोकने के लिए किया जाता है। मतदान में इस्तेमाल होने वाली स्याही के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि भारत में सिर्फ 2 कंपनियाँ हैं जो वोटर के लिए ये स्याही बनाती हैं- हैदराबाद का रायडू लैब्स और मैसूर का मैसूर पेंट्स ऐंड वॉर्निश लिमिटेड। यही दोनों कंपनियाँ पूरे देश को वोटिंग के लिए इंक सप्लाय करती हैं। यहाँ तक कि इनकी इंक विदेशों में भी जाती है।

इन कंपनियों के परिसर में स्याही बनाते वक्त स्टाफ और अधिकारियों को छोड़कर किसी को भी जाने की इजाजत नहीं होती है। वोटिंग में इस्तेमाल होने वाली इंक में सिल्वर नाइट्रेट होता है जो अल्ट्रावॉइलट लाइट पड़ने पर स्किन पर ऐसा निशान छोड़ता है, जो मिटता नहीं है। उंगली पर लगने के बाद सिल्वर नाइट्रेट त्वचा से निकलने वाले पसीने में मौजूद सोडियम क्लोराइड (नमक) से क्रिया करके सिल्वर क्लोराइड बनाता है। धूप के संपर्क में आने पर यह सिल्वर क्लोराइड टूटकर धात्विक सिल्वर में बदल जाता है। धात्विक सिल्वर पानी या वाॅर्निश में घुलनशील नहीं होता, इसलिए इसे उंगली से आसानी से साफ नहीं किया जा सकता। ये दोनों कंपनियाँ 25,000-30,000 बोतलें हर दिन बनाती हैं और इन्हें 10 बोतलों के पैक में रखा जाता है। इनकी एक्सपायरी 90 दिन के बाद होती है और निशान एक हफ्ते तक बना रहता है।

मैसूर के राजा ने बनवाया था इस स्याही को

चुनाव के दौरान फर्जी मतदान रोकने में कारगर हथियार के रूप में प्रयुक्त हाथ की उंगली के नाखून पर लगाई जाने वाली स्याही सबसे पहले मैसूर के महाराजा नालवाड़ी कृष्णराज वाडियार द्वारा वर्ष 1937 में स्थापित मैसूर लैक एंड पेंट्स लिमिटेड कंपनी में बनावाई गई थी। वर्ष 1947 में देश की आजादी के बाद मैसूर लैक एंड पेंट्स लिमिटेड (Mysore Lac & Paint Works) सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बन गई। अब इस कंपनी को मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड के नाम से जाना जाता है। कर्नाटक सरकार की यह कंपनी अब भी देश में होने वाले प्रत्येक चुनाव के लिए स्याही बनाने का काम करती है और इसका निर्यात भी करती है।

1962 में तीसरे आम चुनाव में पहली बार हुआ था स्याही का प्रयोग

चुनाव के दौरान मतदाताओं को लगाई जाने वाली स्याही निर्माण के लिए इस कंपनी का चयन वर्ष 1962 में किया गया था और पहली बार इसका इस्तेमाल देश के तीसरे आम चुनाव में किया गया था। इस स्याही को बनाने की निर्माण प्रक्रिया गोपनीय रखी जाती है और इसे नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी आफ इंडिया के रासायनिक फॉर्मूले का इस्तेमाल कर के तैयार किया जाता है। यह आम स्याही की तरह नहीं होती और उंगली पर लगने के 60 सेकंड के भीतर ही सूख जाती है।

कुछ लोगों के लिए यह अफवाह एक ‘फ़न’ का जरिया बन चुकी है, शायद लोग ये बात नहीं जानते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार निरंतर मतदाताओं को मतदान के लिए जागरूक करने का प्रयास कर रही है।

हालाँकि, ये कोई फैक्ट चेक नहीं है। ये स्वघोषित फैक्ट चेकर साइटों पर एक कटाक्ष है जो खुद ही पोस्ट लिखते हैं, खुद ही शेयर करते हैं, और 7 शेयर होने वाली खबर को वायरल कहकर फैक्ट चेक के नाम पर आर्टिकल लिखते रहते हैं। ये वैसे ही प्रोपेगंडा पोर्टल ऑल्ट न्यूज़ की बकवास ‘फैक्ट चेकिंग तकनीक’ की प्रक्रिया का मजाक है, लेकिन इसमें इस्तेमाल हुई हर सूचना, हर सोशल मीडिया हैंडल के पोस्ट और स्क्रीनशॉट वास्तविक हैं। फैक्ट चेकिंग को इस तरह के निम्न स्तर पर लाने वाले ऑल्ट न्यूज़ से आग्रह है कि हमारे फीचर्ड इमेज का फैक्ट चेक करे, वहाँ दुकान चलाने लायक अच्छी जानकारी मिल सकती है।

टॉम वडक्कन ही नहीं, मोदी का बढ़ता कद देख कॉन्ग्रेस के 8 नेताओं ने थामा BJP का हाथ

2019 में लोकसभा चुनाव को देखते हुए विपक्षी नेता जितना नरेंद्र मोदी पर भर-भरके बयानबाजी कर रहे हैं, मोदी सरकार उतनी ही मजबूत होती जा रही है। चुनाव की तारीखें पास होने के साथ ही भाजपा की नीतियों और प्रधानमंत्री के उचित नेतृत्व को पहचानते हुए कॉन्ग्रेस पार्टी के कई नेता पहले ही बीजेपी में शामिल हो चुके हैं और अब सोनिया गांधी के करीबी टॉम वडक्कन ने भी पार्टी को छोड़ते हुए बीजेपी का दामन थाम लिया है।

गुरुवार (मार्च 14, 2019) को कॉन्ग्रेस पार्टी की नीतियों से परेशान होकर केरल में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता टॉम वडक्कन बीजेपी में शामिल हो गए हैं। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रह चुके टॉम वडक्कन सोनिया गांधी के क़रीबी भी माने जाते थे। लेकिन, बीजेपी में शामिल होने के साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस पर जमकर हमला बोला है। उनका कहना है कि पहले कॉन्ग्रेस ने सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगा जिससे वो काफी आहत हुए थे। 20 साल पार्टी को सेवा प्रदान करने के बाद उन्होंने कहा कि पार्टी में “यूज एंड थ्रो” की नीति है। इसलिए उनके पास कोई और विकल्प नहीं था।

केवल टॉम वडक्कन ही नहीं बल्कि कई नेता इन दिनों अपनी पार्टियाँ छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। उम्मीद है इससे उन लोगों के सुरों पर सवालिया निशान लगेगा जो मोदी को तानाशाह बताकर उनकी तुलना हिटलर से करते हैं। वैसे तो चुनावी हवा में बहकर बहुत से नेता बीजेपी में शामिल हुए हैं। लेकिन इस सूची में कॉन्ग्रेस नेताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। टॉम की ही तरह आज तृणमूल कॉन्ग्रेस विधायक अर्जुन सिंह ने भी भाजपा के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया।

हाल ही में कॉन्ग्रेस पार्टी को छोड़ने वालों में कर्नाटक के पूर्व विधायक उमेश जाधव का नाम भी शामिल है।

इनके साथ ही महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल के बेटे सुजय भी मंगलवार (मार्च 12, 2019) को पिता के ख़िलाफ़ जाते हुए बीजेपी में शामिल हुए।

ऐसे ही कुछ दिन पहले कॉन्ग्रेस के 3 विधायकों ने गुजरात में इस्तीफ़ा दिया था। इन में जामनगर के विधायक वल्लभ धारविया ने विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र त्रिवेदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। पार्टी के पूर्व सहयोगी परषोत्तम सबारिया भी भाजपा में शामिल हो गए हैं। बता दें कि गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 के बाद से अब तक कॉन्ग्रेस के 5 विधायक बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। 8 मार्च को माणवदर से कॉन्ग्रेस विधायक जवाहर चावड़ा ने भी विधानसभा से इस्तीफा देकर बीजेपी जॉइन कर लिया था।

एक ओर कॉन्ग्रेस के लिए बेहद हैरान करने वाली बात होगी कि जिस भाजपा पार्टी को वह दिन-रात हराने की कोशिशों में जुटी हुई है, उसे कॉन्ग्रेस के ही नेता मजबूत बना रहे हैं। वहीं दूसरी ओर भाजपा के लिए यह सफलता के संकेत हैं कि उसे हर ओर से समर्थन प्राप्त हो रहा है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में और अमित शाह की नीतियों से भाजपा का जादू 2019 के लोकसभा चुनावों में भी उतना ही बोल रहा है, जितना कि 2014 में था।

2014 के मुकाबले 2019 में भाजपा की नीतियों और शक्तियों का अंदाजा आप ऑपइंडिया के इस आर्टिकल में विस्तृत ढंग से पढ़ सकते हैं – सहयोगी दलों को साथ रखने की कला जानते हैं मोदी-शाह, कॉन्ग्रेस की एकता बस मंचों तक ही सीमित

रॉबर्ट वाड्रा का स्व-घोषित ‘चेला’, ‘गोल्ड बडी’ जगदीश शर्मा ED द्वारा PMLA मामले में तलब

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने आज कॉन्ग्रेस नेता जगदीश शर्मा, राहुल गाँधी के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा के स्व-घोषित ‘चेला’ (शिष्य) को धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत जाँच के सिलसिले में तलब किया। उन्हें ईडी के सामने जामनगर हाउस कार्यालय में पेश होना है।

दिसंबर 2018 में, प्रवर्तन निदेशालय ने पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के कार्यालयों पर छापे मारे थे, साथ ही वाड्रा के करीबी सहयोगी जगदीश शर्मा से संबंधित अन्य स्थानों पर भी।

ईडी के सूत्रों ने कथित तौर पर सूचित किया है कि छापे उन संदिग्धों पर डाले गए थे जिन्होंने कथित तौर पर रक्षा आपूर्तिकर्ताओं से रिश्वत के पैसे लिए थे।

हालाँकि, पूछताछ के लिए ले जाने से पहले शर्मा ने कहा था कि यह रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ एक साजिश थी। रिपोर्ट्स ने जगदीश शर्मा को वाड्रा के करीबी सहयोगियों में से एक के रूप में उद्धृत किया था।

वास्तव में, शर्मा हमेशा रॉबर्ट वाड्रा के साथ अपनी निकटता के बारे में बहुत मुखर रहे हैं। 2012 में AAP सुप्रीमो, अरविंद केजरीवाल पर जूता फेंकने के बाद, शर्मा ने वाड्रा के ‘गोल्ड बडी’ होने की शेखी बघारी थी। इसी तरह, दिसंबर 2018 में, जगदीश शर्मा ने कहा था कि वह “वाड्रा साहब के चेले” हैं।

इस बीच, प्रवर्तन निदेशालय ने गाँधी परिवार के दामाद, रॉबर्ट वाड्रा पर उस मामले में भी कड़ी रोक लगा रखी है, जब लंदन में बेनामी संपत्ति खरीदने के आरोप में उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए गए थे। लन्दन के 12-Bryanston Square पर 1.9 मिलियन पाउंड की कीमत की संपत्ति उनके पास है।

पिछले महीने, सीबीआई की एक विशेष अदालत ने रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े जाँच के मामले में स्टे देने से इनकार कर दिया था और उन्हें उन पर चल रहे मनी लॉन्ड्रिंग जाँच में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा था। इसी तरह, पिछले महीने के शुरू में, ED ने रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी M/s स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी (P) लिमिटेड को 4.62 करोड़ रुपए के मामले में अटैच किया था।

पिछले साल अप्रैल में ईडी ने वाड्रा के सहयोगी जय प्रकाश बगरवा की संपत्तियों को बीकानेर भूमि घोटाला मामले में संलग्न किया था। बीकानेर भूमि घोटाला मामले में, राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा कुछ रियल एस्टेट डेवलपर्स की मिलीभगत से गैर-मौजूद व्यक्तियों के नाम पर भूमि आवंटित की गई थी।

वाड्रा पर उनके खिलाफ धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत एक आपराधिक मामला भी दर्ज है, जहाँ उनकी फर्म स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी ने सस्ते में कोलायत और बीकानेर में जमीन खरीदी थी और उसी को अवैध रूप से ट्रांजेक्शन द्वारा बहुत ऊँचे दाम पर बेचा दिया था।

गाँधी-वाड्रा परिवार के आसपास के जाल हर गुजरते दिन के साथ और अधिक उलझते जा रहे हैं। एक खुलासे में, OpIndia ने हाल ही में संजय भंडारी से जुड़े संदिग्ध भूमि सौदों में गाँधी परिवार के गठजोड़ का भंडाफोड़ किया है, जो गाँधी-वाड्रा परिवार का करीबी सहयोगी हैं।

मध्य प्रदेश: सीनियर IPS अफसर की मनमानी पर 2 महीने से मृत पिता का चल रहा है इलाज, जाँच करने पर होता है विरोध!

वर्णव्यवस्था के अलावा आज हमारा समाज ‘अमीर-गरीब’ मानसिकता की ऐसी कसी हुई जकड़ में है, जिसके कारण हम समानता का अधिकार हासिल करने के बाद भी दो वर्गों में विभाजित हैं। हालाँकि, इस विभाजन में ज्यादा और कम के फर्क से अधिक ‘गहराई’ का अंतर है।

एक ऊँचे पद पर बैठे व्यक्ति में और एक आम इंसान में क्या फर्क़ होता है? इस सवाल से हम अक्सर हर दूसरे इंसान को जूझते हुए देखते हैं बशर्ते उसके लिए व्यक्ति की ‘आय’ मापदंड न हो। लेकिन हकीक़त तो यही है कि ओहदे पर बैठा व्यक्ति चाहे तो समाज के बनाए नियमों को अपनी मर्जी के अनुसार ढाल सकता है लेकिन एक आम जन ऐसा करता है तो उसे मानवाधिकारों का हनन करने वाला माना जाता है। साथ ही उसपर कानूनी कार्रवाई करते वक्त एक भी बार विचार नहीं होता। वहीं पद पर आसित व्यक्ति की मनमानियों की ढाल खुद कानून बनता है। इसका हालिया उदाहरण मध्य प्रदेश में एक आईपीएस अफसर की बचकानी हरकत से लगाया जा सकता है, जो अपने मृत पिता की जाँच को रोकने के लिए अपने पद का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं।

कमलनाथ सरकार वाले मध्यप्रदेश में पिछले दो महीनों से एक वरिष्ठ आईपीएस अफ्सर अपने बंगले में अपने मृत पिता का इलाज करा रहे हैं। जी हाँ, मृत पिता। आज से ठीक दो महीने पहले एक निजी अस्पताल ने राजेन्द्र मिश्रा के 84 वर्षीय पिता को मृत घोषित किया था और साथ ही उनका डेथ सर्टिफिकेट भी दिया था। लेकिन राजेंद्र का कहना है कि उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं है।

सोचिए!

राजेंद्र का कहना है कि उनके पिता का इलाज अभी चालू है और वह अपनी पत्नी (राजेन्द्र की माँ), अपने बच्चों और पारंपरिक जड़ी-बूटियों से उनका इलाज करने वाले वैद्य के सिवा किसी से भी मुलाकात नहीं करते हैं। आप सोच रहे होंगे कि हर किसी को अपने माता-पिता से अटूट प्रेम होता है… अगर कोई उन्हें जीवित रखने के लिए इलाज करा रहा है तो इसमें हैरानी कैसी?

लेकिन सोचिए, यह अधिकार किसी आम व्यक्ति के पास है क्या? समाज की बनाई रीतियाँ क्या उसे ऐसा करने के लिए स्वतंत्रता देती है? और अगर कोई अड़ कर ऐसा करे भी तो क्या आधिकारिक पुष्टि के बाद वो अपनी जिद पर अड़ा रह सकता है ? ऐसे बहुत से सवालों का सिर्फ़ एक जवाब है “शायद नहीं।”

आईपीएस पद पर आसित एक व्यक्ति सरकारी बंगले में मृत पिता का इलाज कराता है और साथ ही जब प्रदेश मानवाधिकार आयोग से डॉक्टरों की टीम को उनकी स्थिति का जायजा लेने के लिए भेजता है तो वो अफसर इसके विरोध तक करने पर उतर आता है। हम किसी के पिता-प्रेम पर सवाल नहीं उठा रहे। लेकिन जानने की इच्छा जरूर रखते हैं कि अगर 84 वर्षीय बुजुर्ग वाकई जीवित हैं तो फिर उनकी एक रूटीन जाँच कराने में क्या आपत्ति है? साथ ही अगर राजेन्द्र के पिता जीवित हैं तो उन्हें उस निजी अस्पताल से कोई शिकायत क्यों नहीं है, जो उन्हें मृत घोषित कर चुका है?

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का कहना है कि चिकित्सा के क्षेत्र में एलोपैथी, आखिरी विकल्प नहीं है। बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो विज्ञान से आगे हैं। उनकी मानें तो उनके पिता जिंदा है और उनका इलाज चल रहा है। अपने पिता द्वारा 6 दशकों से योग करने का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि वह ‘योग निंद्रा’ में हैं। जाँच पर रोक लगाने के लिए वो तर्क देते हैं कि क्या होगा अगर डॉक्टरों ने उनको योग निंद्रा से उठाने का प्रयास किया और उन्हें कुछ हो गया? क्या इसे मर्डर नहीं कहा जाएगा?

जाँच रोकने के लिए पहुँच गए कोर्ट तक

इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार राजेन्द्र कहते हैं कि उनके पिता का इलाज कराना उनका मौलिक अधिकार है और बाहर वाले इसमें दखलअंदाजी क्यों कर रहे हैं? यह उनकी समझ से बाहर है। 23 फरवरी को 6 डॉक्टरों की टीम जब राजेन्द्र के बंगले पर पहुँची तो बाहर तैनात पुलिस ने उन्हें अंदर जाने से मना कर दिया। इसके अलावा पिछले महीने राजेश की माँ भी मध्य प्रदेश के हाई कोर्ट में इस मामले में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ अपनी याचिका लेकर पहुँची थी, उन्होंने मानवाधिकार आयोग को भी लिखा, जिसमें दावा किया गया था कि पैनल द्वारा उनके जीवन, सम्मान और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन किया जा रहा है।

आँकड़ेबाजी: मोदी के आने के बाद जागरूक हुई जनता, कई विजयी उम्मीदवारों को मिल रहे 50% से अधिक मत

अक्सर ये बातें कही जाती हैं कि चुनावों में 20-30 प्रतिशत मत लेकर उम्मीदवार विजयी हो जाते हैं और वे उस 70% जनता के भी नेता बन बैठते हैं, जिन्होंने उन्हें वोट दिया ही नहीं। भारतीय लोकतंत्र में बहुदलीय व्यवस्था है, न कि अमरीका या यूरोप के देशों की तरह द्विदलीय प्रणाली। चुनाव आयोग में पंजीकृत राजनीतिक दलों की संख्या 465 है, जबकि 7 राष्ट्रीय दल, 60 से अधिक क्षेत्रीय दल एवं 54 से अधिक गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल हैं। निर्दलीय भी चुनाव में प्रत्याशी हो सकते हैं। ऐसे में विधानसभा व लोकसभा के चुनावों में एक-एक क्षेत्रों में उम्मीदवारों की संख्या कभी-कभी 40-50 तक पहुँच जाती है।

राष्ट्रीय दलों व क्षेत्रीय दलों का अपना जनाधार अर्थात ठोस मतदाता होते हैं। ऐसे में किसी भी प्रत्याशी के लिए 50% या इससे अधिक मत प्राप्त करना टेढ़ी खीर है। किंतु इस विषय का एक दूसरा पहलू भी है कि क्या किसी उम्मीदवार के लिये 50% मत प्राप्त करना असंभव है। इसका जवाब हाँ नहीं हो सकता, क्योंकि कई नेताओं ने कुल मतों का आधे से अधिक प्राप्त कर अपने प्रतिद्वंद्वियों को हराया है। जयपुर से स्वतंत्र पार्टी की उम्मीदवार महारानी गायत्री देवी ने 1962 व 1967 के आम चुनाव में क्रमश: 77.08 व 64.01 प्रतिशत मत प्राप्त किए। 2004 में पश्चिम बंगाल के आरामबाग लोकसभा क्षेत्र से मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के अनिल बसु को 77.16% मत मिले थे। इसी श्रेणी में काकिनाडा से एमएस संजीव राव (1971), रामविलास पासवान, संतोष मोहन देव, द्रमुक के एनवीएन सोमू, गुजरात के राजकोट के बल्लभभाई रामजीभाई, नगालैंड के के.ए. संथम, नगा पीपुल्स पार्टी के सीएम चांग आदि का नाम आता है।

1977 के चुनाव में राज नारायण ने 53.51% वोट प्राप्त कर इंदिरा गाँधी को हराया था और जनता दल से लड़े अनिल शास्त्री को 1989 के चुनाव में बनारस से 62.31% मत मिले थे, जबकि अमेठी से जनता पार्टी के रविंद्र सिंह ने 60.47% मतों के साथ कॉन्ग्रेस के संजय गाँधी को पराजित किया था। 50% से अधिक वोट पाकर प्रतिद्वंद्वी को चित करने वाले इन सारे नामों में एक बात सामान्य है कि इनकी राजनीति का आधार पारिवारिक पृष्ठभूमि न होकर, स्वयं जनता के बीच किये गए संघर्ष का परिणाम था। लेकिन ऐसा बहुत कम हुआ, इन्हें आपवादिक स्थिति कही जाएगी।

इसके बाद वर्ष 2014 में भारतीय मतदाताओं की रुचि व रुझान दोनों ने करवट ली और एक अलग तरह की धारा चली। नरेंद्र मोदी बनारस लोकसभा क्षेत्र से 56.37% और वडोदरा से 72.75% मत पाकर विजयी हुए। साथ ही गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल में भारतीय जनता पार्टी के सभी उम्मीदवार 50 प्रतिशत से अधिक मत पाकर जीते, जबकि सीटों की संख्या के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 41% सीटों पर उम्मीदवारों ने 50% से अधिक मत प्राप्त कर प्रतिद्वंद्वियों को धूल चटाई। 2014 के लोकसभा चुनाव में 206 विजयी प्रत्याशी ऐसे रहे, जिन्हें 50% से अधिक मत मिले और खास बात यह रही कि इनमें से 70% से अधिक उम्मीदवार भारतीय जनता पार्टी के थे।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि मतदाताओं में चुनाव को लेकर जागरूकता आई है और वे अपना मतदान निश्चित व स्पष्ट दृष्टि के साथ करते हैं। इसलिए अल्पमतों के साथ प्रतिनिधित्व करने का राग अप्रासंगिक होता जा रहा है। इसके कारणों की समीक्षा की जाए तो कई बातें निकल कर आती हैं। 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी ने जनसंवाद और मतदाताओं के साथ अंतर्संवाद की शैली से लोगों के बीच गये और आम नागरिकों के मन में राजनीति व राजनेताओं के प्रति दशकों से बैठी उदासीनता को समाप्त कर पाने में बहुत हद तक सफलता हासिल की। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी द्वारा जनता से ख़ुद को प्रधानसेवक बनाने की अपील से जनता में यह संदेश गया कि राजनेता विशिष्ट व्यक्ति नहीं, बल्कि वह होता है, जो उनके बीच का और उनके लिये हो, जिससे वे अपनी आकांक्षाएँ, अपेक्षाएँ, आवश्यकताएँ कह सकें।

इसके अतिरिक्त सोशल मीडिया के प्रादुर्भाव व संचार साधनों के आगमन होने से जनता को राजनेताओं से सवाल पूछने, अंतर्संवाद करने और शिकायत प्रकट करने का हथियार भी मिला। इन सबका प्रभाव यह हुआ कि राजनीति में गैर राजनीतिक व्यक्तियों व आम जनता की रुचि बढ़ी और किसी दल या नेता के प्रति धारणा अपने आकलन एवं विश्लेषण पर करने लगा। अतः जनता ने भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को न केवल स्पष्ट बहुमत दिया, बल्कि करीब 38% उम्मीदवारों को 50% से अधिक मतों से जिताया।

इधर 2014 में विजय के बाद मोदी सरकार ने सुलभ व सस्ता इंटरनेट एवं मोबाइल नीति लागू करते हुए डिजिटल भारत अभियान को गाँव -गाँव तक पहुँचाया है। एक ओर सरकार अपने कार्यक्रमों, नीतियों व योजनाओं का लाभ सीधे जनता तक पहुँचा रही है और अपने पाँच साल के कामकाज एवं पार्टी की गतिविधियों व विचारों को भी आम लोगों तक पहुँचाने के लिए डिजिटल प्लेटफार्मों का आक्रामक उपयोग कर रही है तो दूसरी तरफ विपक्षी दल भी इसमें पीछे नहीं रहना चाहते हैं।

यह सच है कि जब समाज में मतदाताओं के पास सूचना का आदान-प्रदान, सूचना तक पहुँच होगी तो वह उम्मीदवार या दल के पक्ष अथवा विपक्ष पर विचार कर अपना निर्णय देगा। डिजिटल इंडिया और संचार क्रांति के कारण मतदाताओं के पास सरकार, पार्टी व उम्मीदवार के विषय में जानकारी इकट्ठा करने के साथ अपना हित व अहित सोचकर मतदान के दिन निर्णय लेने की संभावना और बढ़ चुकी है। ऐसे में संभव है कि इस बार के चुनाव में जनता अपना निर्णय जब सुनायेगी तो किसी दल व उम्मीदवारों को सरकार बनाने के लिये 50% से अधिक मत देकर भारतीय राजनीति में आये इस सकारात्मक बदलाव की धारा का प्रवाह और तीव्र करेगी।

(लेखक सामाजिक व राजनीतिक विश्लेषक हैं)

EXCLUSIVE: दो और ज़मीन सौदे के दस्तावेज़, गाँधी-वाड्रा परिवार व दलाली के रिश्तों का खुलासा पार्ट-2

ऑपइंडिया ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और हथियार दलाल संजय भंडारी के बीच संबंधों का ख़ुलासा कर बताया था कि एचएल पाहवा ने राहुल गाँधी को काफ़ी कम दाम कर ज़मीन बेची। पाहवा को वित्त उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति का नाम सीसी थम्पी था। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट को आधार बना कर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया और राहुल गाँधी पर सवाल दागे। रिपोर्ट के प्रकाशित होने और रिपब्लिक भारत पर इस पर चर्चा होने के साथ खड़ा हुए राजनीतिक तूफ़ान में गाँधी परिवार बुरी तरह फँसता नज़र आ रहा है।

हमारे ख़ुलासे का आधार राहुल गाँधी और एचएल पाहवा के बीच हुआ भूमि सौदा था। राहुल ने पाहवा से ज़मीन ख़रीदी, जिसके रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गाँधी से भी अच्छे सम्बन्ध हैं। सबसे बड़ी बात तो यह कि पाहवा से ख़रीदी गई ज़मीन को फिर वापस उसे ही काफ़ी ज्यादा क़ीमतों पर बेच दिया गया। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा एचएल पाहवा के ठिकानों पर छापेमारी के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले, जिनमें इस लैंड डील का विवरण था।

इन दस्तावेजों से पता चलता है कि पाहवा के पास इतने अधिक मूल्य में ज़मीन ख़रीदने के लिए मुद्रा भंडार ही नहीं था। पाहवा को इस कार्य के लिए सीसी थम्पी द्वारा वित्त उपलब्ध कराया गया। सीसी थम्पी और संजय भंडारी के बीच रुपयों का कई बार लेन-देन हुआ है। दोनों के बीच कई ट्रांजैक्शंस हुए हैं। ये दोनों वाड्रा से भी जुड़े हुए हैं। थम्पी ने वाड्रा के लिए बेनामी संपत्ति की ख़रीद की थी और भंडारी ने उस करार के दौरान सेतु का कार्य किया था। ऑपइंडिया द्वारा जारी किए गए तीन दस्तावेज राहुल गाँधी, एचएल पाहवा और रॉबर्ट वाड्रा के बीच रिश्तों को उजागर करते हैं।

अब हमारे पास दो अतिरिक्त दस्तावेज भी हैं जो गाँधी-वाड्रा परिवार को एचएल पाहवा से जोड़ते हैं। वही पाहवा, जो संजय भंडारी और सीसी थम्पी से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। हमने जो प्रॉपर्टी डील के काग़ज़ात जारी किए थे, वो हसनपुर स्थित ज़मीन के थे। अब हमें और भी काग़ज़ात मिले हैं, जो रॉबर्ट वाड्रा और एचएल पाहवा के बीच हुए ज़मीन के सौदे से जुड़े हैं। यह हरियाणा के अमीपुर में हुए ज़मीन सौदे से जुड़ा है। इसमें एचएल पाहवा से रॉबर्ट वाड्रा को ट्रांजैक्शन किए गए हैं।

ज़मीन सौदे का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि वही महेश नागर जिसने रॉबर्ट वाड्रा और राहुल गाँधी की ओर से पिछले कागजात पर हस्ताक्षर किए थे, उसने इस ज़मीन के सौदे के लिए वाड्रा की ओर से भी हस्ताक्षर किए थे।

रॉबर्ट वाड्रा, प्रियंका गाँधी वाड्रा और राहुल गाँधी के सौदों के बीच में HL पाहवा है।

इसके अलावा हमने एक और भूमि सौदे के कागज़ात खोजे हैं, जिसमें इस बात का स्पष्टीकरण मौजूद है कि रॉबर्ट वाड्रा ने HL पाहवा को भी ज़मीन बेची थी।

HL पाहवा, CC थम्पी और संजय भंडारी के बीच सांठगांठ के साथ कुछ ऐसे सवाल भी हैं जिनसे राहुल गाँधी का बच पाना लगभग न के बराबर है।

1. राहुल गाँधी ने HL पाहवा से जो ज़मीन ख़रीदी उसका संबंध संजय भंडारी और CC थम्पी से था। अब सवाल यह उठता है कि क्या ज़मीन ख़रीदने से पहले राहुल गाँधी को इस अवैध सांठगांठ के बारे में पहले से पता था?

2. HL पाहवा ने रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गाँधी वाड्रा को ज़मीन बेची है और उसके बाद ज़मीन को वापस बढ़े हुए दामों पर ख़रीदा, जबकि उसके पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त नकद धन भी नहीं थी। इस प्रक्रिया में, उसने इन भुगतानों के लिए CC थम्पी से पैसे लिए। क्या राहुल गाँधी को अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा और बहनोई रॉबर्ट वाड्रा के इस अवैध भूमि सौदों के बारे में पता था?

3. HL पाहवा अपने परिवार के लेन-देन में क्या भूमिका निभाते हैं और वह एकमात्र सूत्रधार क्यों है जिसके माध्यम से ऐसे भूमि सौदे संचालित होते हैं? HL पाहवा ने CC थम्पी से पैसे क्यों लिए और जब उसके पास नकद धन नहीं था, बावजूद इसके उसने ज़मीन फिर से क्यों खरीदी?

4. इसका सीधा लिंक हथियार डीलर संजय भंडारी से है, जो राफ़ेल सौदे पर कॉन्ग्रेस शासन की वार्ता के दौरान दसौं के लिए एक ऑफसेट भागीदार बनना चाहता था। अधिकांश भूमि ख़रीद और बिक्री कॉन्ग्रेस शासन के दौरान हुई जबकि उस समय राफ़ेल वार्ता चल रही थी। क्या राहुल गाँधी को कॉन्ग्रेस के राफ़ेल सौदे में संजय भंडारी की भागीदारी के बारे में पहले से पता था?

5. न्यूज रिपोर्टें इस बात को सुनिश्चित करती हैं कि MMRCA डील समझौते में रक्षा मंत्रालय से MMRCA की कई फाइलें गायब हुई थीं। ये फाइलें संजय भंडारी द्वारा फोटोकॉपी कराई गई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जब राहुल गाँधी और उनका परिवार  HL PAHWA के साथ डील कर रहे थे, जो कि सीसी थम्पी और संजय भंडारी से जुड़ा हुई था, तो उन्हें पता था कि संजय भंडारी क्या कर रहे है?

6. इसके अलावा एयरबस के लिए भी संजय भंडारी बिचौलिया की भूमिका में थे। एयरबस कॉन्सॉर्टियम का एक पार्ट है जिससे यूरोफाइटर तैयार होता है, जो कि  MMRCA सौदे के दौरान राफेल के साथ सीधे प्रतिस्पर्धा में था। क्या राहुल गाँधी जानते थे कि एच एल पाहवा जिनके संबंध थंपी के जरिए संजय भंडारी से थे वो एयरबस के लिए बिचौलिए रह चुके हैं?

7. क्या राहुल गाँधी बार-बार राफेल मुद्दे को इसीलिए उठा रहे हैं क्योंकि राफेल MMRCA करार में उनके क़रीबी संजय भंडारी को कोई हिस्सा नहीं मिल पाया। या हो सकता है उन्हें अब यूरोफाइटर ज्यादा लाभप्रद नज़र आ रहा हो।

8. एबीपी के एक पत्रकार ने बताया कि राहुल गाँधी जर्मनी में यूरोफाइटर प्रतिनिधियों से मिले। क्या वर्तमान राफेल सौदे में उनकी निंदा में कोई भूमिका थी? क्या संजय भंडारी इन कथित बैठकों में शामिल थे?

9.क्या ‘चौकीदार चोर है’ के नारे इसलिए लगाए जाते हैं ताकि हथियारों के सौदागर के साथ राहुल की अपनी सांठगांठ का खुलासा न हो?

10 मौजूदा राफेल सौदे को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिलने के बाद भी राहुल गाँधी तमाम कुतर्कं से राफेल के पीछे पड़े हुए हैं क्योंकि अगर राफेल डील नाकाम नहीं साबित होती तो यूरोफाइटर पर विचार वापस नहीं किया जा सकता?

चूँकि, राहुल गाँधी राफेल डील के खिलाफ़ हाथ-धो कर पड़ चुके हैं तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से यह भी महत्तवपूर्ण हो जाता है कि वह केवल जमीन की खरीद-बिक्री पर बात न करते हुए एचएल पाहवा, सीसी थंपी और संजय भंडारी जैसे लोगों से अपने संबंधों के बारे में भी खुलकर बात करें, जिसके कारण उन पर सवालों की पकड़ और गहराती जा रही है।


भाई ने बहन की सुरक्षा के लिए किया रेल मंत्री को ट्वीट, रेलवे पुलिस ने तुरंत एक्शन ले किया सबको अरेस्ट

रेल यात्रा को सहज और सुगम बनाने की दिशा में प्रशासन की ओर से लगभग हर संभव प्रयास किया जाने लगा है। इस प्रयास में हर वो सुविधा शामिल की जाती है, जिससे रेल यात्रा के दौरान यात्रियों को किसी भी तरह की असुविधाजनक स्थिति का सामना न करना पड़े। लेकिन अगर किसी यात्री के समक्ष ऐसी कोई असुविधा या आपत्तिजनक स्थिति आ भी जाती है तो उसका तुरंत निवारण करना प्रशासन की प्राथमिकता होती है और यह किया भी जा रहा है।

ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के आगरा का है, जहाँ एक महिला पैसेंजर को कुछ मनचले परेशान कर रहे थे। इस पर उस महिला ने अपने भाई से संपर्क साधा और अपनी परेशानी उनसे साझा की। भाई मौक़े पर तो वहाँ मौजूद नहीं था लेकिन उन्होंने ट्विटर के माध्यम से इस घटना की जानकारी रेल मंत्री पीयूष गोयल, इंडियन रेलवे और एसपी जीआरपी को टैग करते हुए दे दी। भाई द्वारा की गई मदद की ये गुहार फौरी तौर पर रंग लाई और महिला पैंसेजर को परेशान करना मनचलों पर भारी पड़ गया।

महिला पैसेंजर के भाई के ट्वीट पर एसपी जीआरपी आगरा ने रिप्लाई किया और उनसे उनका मोबाइल नंबर माँगा। इसके बाद तत्काल प्रभाव से उस गाड़ी की लोकेशन देखकर कार्रवाई के लिए प्रभारी निरीक्षक आगरा कैंट विजय कुमार को बताया गया। प्रभारी निरीक्षक ने सूचना पाकर तुरंत मामले को गंभीरता से लिया और मौके पर पहुँचकर आरोपियों को गिरफ़्तार कर लिया गया।

जानकारी के अनुसार, यह घटना 12 मार्च 2019 की है। महिला पैसेंजर के भाई ने अपने ट्वीट में लिखा, “सर मेरी बहन को मदद की ज़रूरत है वह 22415 नंबर ट्रेन में यात्रा कर रही है। उसके पास वाली सीटों पर 6 लोग बैठे हैं और उन्होंने शराब भी पी रखी है, नशे की हालत में वो लोग उससे ग़लत हरक़त कर रहे हैं। इस वजह से वो ख़ुद को असहज महसूस कर रही है। कृपया करके उसकी मदद करें।”

प्रशासन द्वारा यदि इस मामले को गंभीरता से न लिया गया होता तो यह रेल यात्रा उस महिला के लिए एक भयानक याद बन जाती। प्रशासन द्वारा की गई इस तरह की कार्रवाई निश्चित तौर पर महिला वर्ग को भी निश्चिंत व सुरक्षित यात्रा करने का सुखद एहसास दिलाने में कारगर साबित होगा।