Home Blog Page 6041

ट्विटर से निजी अदालत चलाने वाले प्रशांत भूषण ने स्वीकारी गलती, पर SC ने नहीं दी राहत

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और केंद्र सरकार की तरफ़ से प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत देने से मना कर दिया। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण की वह याचिका भी ख़ारिज कर दी जिसमे उन्होंने जस्टिस अरुण मिश्रा से ख़ुद को इस केस से वापस लेने की माँग की थी। अटॉर्नी जनरल ने अदालत में बताया कि वे जब बाहर मिले तो उन्होंने भूषण से माफ़ी माँगने को कहा लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था।

वेणुगोपाल ने भूषण द्वारा माफ़ी माँगने की स्थिति में केस वापस लेने की बात कही। प्रशांत भूषण की तरफ़ से जिरह करते हुए वकील दुष्यंत दवे ने कहा कि अगर मुक़दमा पक्ष के मन में जज की ओर से पक्षपात की आशंका की स्थिति में जज को केस से हटाने की माँग की जा सकती है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को ध्यान दिलाया कि जजों को केस से हटाने की माँग करना भूषण का पुराना हथकंडा है और इसे अदालत की मर्यादा गिराने का कार्य माना जाना चाहिए।

दुष्यंत दवे को तुषार मेहता द्वारा जिरह करना पसंद नहीं आया और उन्होंने कोर्ट से पूछा कि जो इस मामले में पक्षकार नहीं हैं, उन्हें लम्बी जिरह करने का मौक़ा देकर हम क्या सन्देश देना चाहते हैं? अटॉर्नी जनरल पक्ष ने अदालत से कहा कि लंबित मामलों में मीडिया के पास जाने का क्या औचित्य है जब कोर्ट में वापस आया जा सकता है? इसके बाद प्रशांत भूषण ने अपने ट्वीट को ‘Genuine Mistake’ के रूप में स्वीकार किया। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि वे भूषण के लिए कोई सज़ा नहीं चाहते।

अब इस मामले में 29 मार्च को सुनवाई होगी। कोर्ट ने भूषण की माफ़ी को रिकॉर्ड कर लिया है। ज्ञात हो कि प्रशांत भूषण ने सीबीआई मामले की सुनवाई के बाद अपने ट्वीट में लिखा था:

“मैंने विपक्ष के नेता श्री खड़गे से व्यक्तिगत रूप से पुष्टि की है कि ‘हाई पॉवर्ड कमेटी (HPC)’ की बैठक में सीबीआई निदेशक के रूप में नागेश्वर राव को पुनः बहाल करने से संबंध में कोई चर्चा नहीं हुई थी और इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया था। सरकार ने उच्चतम न्यायालय को गुमराह किया है और शायद HPC की बैठक के मनगढंत विवरण प्रस्तुत किए हैं!”

बता दें कि सीबीआई में दो उच्चाधिकारियों के बीच छिड़े विवाद के बाद केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए तत्कालीन निदेशक आलोक वर्मा को अक्टूबर 2018 में लम्बी छुट्टी पर भेज दिया था। प्रशांत भूषण ने केंद्र सरकार के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने उच्चाधिकार प्राप्त समिति को नया सीबीआई निदेशक चुनने को कहा था। उस समिति में प्रधानमंत्री मोदी, मुख्य न्यायाधीश के प्रतिनिधि और विपक्ष के नेता खड़गे शामिल हैं।

87 वर्षीय वेणुगोपाल ने याचिका में कहा था कि प्रशांत भूषण ने उनकी ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा पर जानबूझ कर संदेह प्रकट किया। 1 फरवरी को सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में HPC की बैठक का विवरण प्रस्तुत किया था। इसे सुनवाई के दौरान एक सीलबंद लिफ़ाफ़े में पेश किया गया था। इस दौरान वेणुगोपाल ने अदालत को बताया था कि केंद्र सरकार ने नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक नियुक्त करने से पहले HPC की अनुमति ली थी।

दिग्विजय को लगता है कि आतंकियों के पक्ष में बोलने पर अल्पसंख्यक खुश होगा: उमा भारती

कॉन्ग्रेस के विवादित नेता दिग्विजय सिंह द्वारा पुलवामा आतंकी हमले को ‘दुर्घटना’ बताने से नाराज उमा भारती ने दिग्विजय सिंह पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि दिग्विजय सिंह को अपनी पार्टी के आतंकवादियों से लगाव के बारे में सोचना चाहिए।

केन्द्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री उमा भारती ने बुधवार (मार्च 06, 2019) को कहा कि कॉन्ग्रेस एवं उसके वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के निशाने पर हमेशा अल्पसंख्यक वोट रहते हैं इसलिए उनको लगता है कि यदि वह (दिग्विजय) आतंक एवं आतंकवादियों के पक्ष में बोलेंगे तो भारत के अल्पसंख्यक खुश होंगे।

पुलवामा आतंकवादी हमले को दिग्विजय द्वारा ट्विटर पर दुर्घटना लिखे जाने पर पूछे गए सवाल के जवाब में उमा भारती ने कहा, ‘‘दिग्विजय जी जो कहते हैं उसमें उनके निशाने पर हमेशा अल्पसंख्यक वोट रहते हैं। कॉन्ग्रेस को ही अल्पसंख्यकों की देशभक्ति पर शंका है। इसलिए उनको ऐसा लगता है कि आतंक के पक्ष में बोलने में भारत का जो अल्पसंख्यक है, वह खुश होता है।’’

RSS की सार्वजनिक स्थानों पर शाखा लगाने पर प्रतिबंध लगाने की बात कॉन्ग्रेसी मंत्रियों द्वारा कहे जाने पर उन्होंने कहा, ‘‘संघ के जो स्वयंसेवक होते हैं, वे राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग हैं। उनको इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है। बल्कि मैं तो यह सुझाव दूँगी कि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ संघ की शाखा में जाया करें। इससे उनको देशभक्ति का पाठ सीखने को मिलेगा। उनकी भी समझ में आएगा कि देशभक्ति किसको कहते हैं।’’

अपनी बात रखते हुए उमा भारती ने कहा, ‘‘कमलनाथ जी, दिग्विजय सिंह जी, राहुल गाँधी जी, खासकर दिग्विजय सिंह को तो संघ की शाखा में जाना बहुत जरूरी है, ताकि आतंकवाद से उनका जो लगाव है, हाफिज सईद से और ओसामा बिन लादेन से उनको जो प्यार है, वह कुम्भ भी नहा आने, नर्मदा की परिक्रमा से भी कम नहीं होगा, वह संघ की शाखा में जाने से ही ठीक होगा।’’

भारती ने कहा कि कॉन्ग्रेस ने 1984 एवं 1991 में लोकसभा चुनाव में क्रमश: पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की शहादत का राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश की। इन्हें तो शर्म आनी चाहिए। विवादास्पद रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मामले पर अदालत में चल रहे मुकदमे पर उमा भारती ने कहा कि जिस तरह से मक्का एवं वैटिकन सिटी में मंदिर नहीं बन सकता, उसी प्रकार अयोध्या में राम मंदिर के अलावा कुछ नहीं बन सकता।

71 फुट की गदा वाले इस हनुमान जी को बनाने में लगे 8 साल, अब रिकॉर्ड बुक में होंगे शामिल

फरीदाबाद-गुड़गाँव रोड पर साल 2011 में त्रिवेणी हनुमान मंदिर ट्रस्ट की ओर से हनुमानजी की सबसे बड़ी मूर्ति बननी शुरू हुई थी, जिसका निर्माण कार्य 8 साल बाद 2019 में पूरा चुका है और अब इसे एशिया बुक ऑफ रेकॉर्ड्स और लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में शामिल करवाने की तैयारी चल रही है।

हालाँकि, खड़े हुए हनुमान जी की मूर्तियाँ कई जगह इससे बड़ी-बड़ी हैं लेकिन इस पोज में बनी यह ऐसी पहली विशाल मूर्ति है। इस मूर्ति का निर्माण राजस्थान के आर्किटेक्ट नरेश ने किया है।

नवभारत में छपी रिपोर्ट के मुताबिक मंदिर के मुख्य पुजारी खेमचंद का कहना है कि हनुमान जी के इस मंदिर से बड़खल गाँव और शहर के श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी हुई है। साथ ही इस मंदिर के लिम्का बुक में शामिल होने से यहाँ आने वाले पर्यटक भी बढ़ेंगे।

8 साल में बनकर तैयार हुई हनुमान जी की मूर्ति

हनुमान जी की इस प्रतिमा के हाथ 21 फुट के हैं, लंगोट 41 फुट, कमर 31 फुट, पूँछ और दुपट्टा 101 फुट, गदा 71 फुट, मुकुट 31 फुट और कलाई 10 फुट है।

आन्ध्रप्रदेश में हनुमान जी

इसके साथ ही आपको बता दें कि खड़ी अवस्था में एशिया के सबसे ऊँचे हनुमानजी आन्ध्रप्रदेश में मौजूद हैं। आन्ध्र प्रदेश में मौजूद हनुमान जी की मूर्ति की ऊँचाई 135 फुट है और भक्त इन्हें वीर अभय अंजनी हनुमान स्वामी के नाम से पुकारते हैं। इनका निर्माण 6 साल पहले 2013 में हुआ था।

‘गधों का सरताज है राहुल गाँधी’ जानिए किसने और क्यों की अध्यक्ष जी पर ये निंदनीय टिप्पणी

प्रियंका गाँधी के भाई और कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी का भारतीय जनता पार्टी के एक नेता ने एक बार फिर ‘नामकरण‘ कर दिया है। इस बार यह काम किया है भारतीय जनता पार्टी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे और विधायक आकाश विजयवर्गीय ने।

आकाश विजयवर्गीय का कहना है कि पहले कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को ‘पप्पू’ कहा जाता था। उनका कहना है कि पप्पू एक हानिरहित और प्यारा नाम है, लेकिन अब वह राष्ट्र विरोधी की तरह काम करने लगे हैं। इसलिए अब उनके नाम को पप्पू से बदलकर ‘गधों का सरताज’ रख दिया है। उन्होंने यह बातें कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा IAF द्वारा की गई एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाने और ओसामा बिन लादेन को सम्मान देने जैसे मुद्दे को लेकर भारतीय युवा मोर्चा के विरोध प्रदर्शन में कहीं।

आकाश विजयवर्गीय मध्यप्रदेश के इंदौर-3 विधानसभा सीट से भाजपा विधायक हैं। 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और 3 बार के विधायक अश्विन जोशी को 75,000 वोटों के अतंर से हराया था। उन्होंने पहली बार विधायक का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।

विरोध प्रदर्शन के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने ‘राहुल गाँधी गधा है’ के नारे लगाए। इस प्रदर्शन का नेतृत्व आकाश ने किया। उन्होंने कहा कि राहुल जिस तरह की हरकत कर रहे हैं उससे वह अब पप्पू कहलाने के लायक नहीं बचे हैं। उन्होंने कॉन्ग्रेस को गधों की सेना और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को गधों का सरताज कहा।

इंदौर के अग्रसेन चौराहे पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने ‘राहुल गाँधी चोर है’ के नारे भी लगाए। विजयवर्गीय ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, “राहुल उल्टे-सीधे बयान देते हैं। कभी आलू से सोना बनाने की बात करते हैं, कभी आँख मारते हैं और कभी गले पड़ते हैं। वह अपने देश के हैं इसलिए उन्हें पप्पू कहते थे। यह प्यार का नाम है, अगर उनके पास दिमाग नहीं है तो क्या हुआ।”

उन्होंने बयान देते हुए आगे कहा, “अब राहुल देशद्रोह की बात करने लगे हैं। भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा लगाने वाले लोगों के साथ खड़े दिखाई देते हैं। दोकलाम विवाद के दौरान चुपचाप चीनी प्रतिनिधियों से मुलाकात करते हैं। यदि चीन की वेबसाइट पर यह बात लीक नहीं होती तो हमें पता भी नहीं चलता कि वह चीनी प्रतिनिधियों से मिले हैं।”

राजनीति में आपसी छींटाकशी अब आम बात हो गई है। कॉन्ग्रेस पार्टी अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माँ और पत्नी को लेकर घटिया चुटकुले बनाती है तो कभी भाजपा सांसद अरविन्द केजरीवाल को जूतों के लायक बता देते हैं। राजनीति का यह गिरता हुआ स्तर अभी आम चुनावों तक और ज्यादा गिर सकता है।

पाक के नए हथियार बन रहे हैं भस्मासुर राहुल और कॉन्ग्रेस की राजनीति

हमारे देश का व्यापक लोकतंत्र हमे अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। प्रतिद्वंद्वियों पर बिना आपत्तिजनक टिप्पणी किए उन्हें घेरने का मौक़ा देता है। राजनीति में जहाँ सारी नैतिकता धराशायी हो जाती है, किसी पर ओछी टिप्पणी कर मानहानि के मुक़दमे में जेल जाना भी यहाँ आपको कुछेक वोट दिला सकता है। ऐसे हालात तब तक बर्दाश्त योग्य रहते हैं, जब तक कि दुश्मन इसका फ़ायदा न उठाए। लेकिन, अब राहुल गाँधी के लगातार आ रहे बयानों और कॉन्ग्रेस पार्टी के लगातार गिरते राजनीतिक स्तर ने पाकिस्तान को एक नया हथियार थमा दिया है, जिस से वह भारत को घेर सकता है।

भारत की पुरानी पार्टी का अध्यक्ष भारत की छवि के लिए भस्मासुर बनता जा रहा है। राहुल समेत कॉन्ग्रेस और महागठबंधन के नेताओं के बयान पाकिस्तानी मीडिया में शेयर हो रहे हैं। वहाँ टीवी चर्चाओं के दौरान पाकिस्तान का पक्ष साबित करने के लिए राहुल के बयानों का जिक्र किया जाता है।

अपने ही देश के ख़िलाफ़ दुश्मन को सौंप रहे हथियार

आज राफेल पर बोलते हुए राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पाकिस्तान का पोस्टर बॉय बताया। लेकिन, स्थिति इसके उलट है। पाकिस्तान के सत्ताधीशों, सेना व भारत-विरोधी खेमे में नरेंद्र मोदी के प्रति जितनी घृणा है- राहुल गाँधी के प्रति उतनी ही हमदर्दी। रेडियो पाकिस्तान ने राहुल गाँधी के नेतृत्व में महागठबंधन द्वारा जारी किए गए बयान को आधार बना कर भारत को घेरा। उस बयान में नेताओं ने कहा था कि मोदी ताज़ा सुरक्षा हालात का प्रबल राजनीतिकरण कर रहे हैं। अगर मोदी ऐसा कर रहे हैं तो पाकिस्तानी मीडिया राहुल गाँधी के बयानों का सहारा क्यों लेता है? अगर मोदी पाकिस्तान के पोस्टर बॉय हैं तो वहाँ भारत को ललकारे गए हर एक बयान में मोदी का नाम क्यों रहता है?

असल में, पाकिस्तान के पूर्व मंत्री रहमान मालिक ने खुलेआम कहा है कि राहुल गाँधी को भारत का प्रधानमंत्री बनना चाहिए। अपने ट्वीट में उन्होंने भारतीय एजेंसी रॉ और मोदी को लेकर तो गुस्सा ज़ाहिर किया लेकिन राहुल गाँधी को भारत का अगला पीएम बताया। रहमान मालिक और रेडियो पाकिस्तान को राहुल गाँधी अच्छे लगते हैं, मोदी के प्रति वे गुस्सा जताते हैं- तो पाकिस्तान का पोस्टर बॉय कौन हुआ? नरेंद्र मोदी ने बिना नाम लिए पाकिस्तान और वहाँ के पीएम इमरान को जिस तरह की बेइज्जती फील कराई है, वैसा कारनामा शायद ही पहले किसी ने किया हो। नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री हैं- वे दौड़-दौड़ कर पाकिस्तान जाते हैं, पाक का बचाव करते हैं। कौन हुआ पाक का पोस्टर बॉय?

नरेंद्र मोदी ने तो भारतीय वायु सेना को खुली छूट दे पाकिस्तान की नाक में दम करने का कार्य किया है। उन्होंने कुछ दिनों पहले एक रैली के दौरान कहा भी था कि अगर आज हमारे पास राफेल होता तो भारत ताज़ा तनावपूर्ण माहौल में और अधिक बेहतर स्थिति में होता। मोदी और उसकी कूटनीति पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने में लगी हुई है। नदियों के पानी का विषय हो या पाकिस्तान से छीने गए ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ दर्जे का- मोदी सरकार हर तरफ़ से पाकिस्तान पर वार कर रही है। लेकिन, विपक्ष राफेल-राफेल चिल्लाने में व्यस्त है।

जैसे शल्य ने अंगराज कर्ण की मनःस्थिति ख़राब की

महाभारत एक पूर्ण ग्रन्थ है, जहाँ राजनीति से लेकर युद्धनीति तक- इन सभी चीजों के हर एक पहलू का वर्णन है, उदाहरण मिलता है। ऐसी ही एक कहानी महारथी कर्ण और शल्य की है। मद्र देश का राजा शल्य जब महाभारत के युद्ध में हिस्स्सा लेने पहुँचा, तब दुर्योधन ने उसका छलपूर्वक स्वागत-सत्कार कर कौरवों की तरफ़ से लड़ने को विवश कर दिया। भांजे युधिष्ठिर को शल्य ने उनके एक वचन निभाने का वादा किया। भीष्म के शर-शैया धारण करने के बाद जब कर्ण कौरवों का सेनापति बना, तब शल्य को उसका सारथी बनाया गया।

यही वो समय था जब युधिष्ठिर ने शल्य को अपना वचन याद दिलाया। शल्य युधिष्ठिर की बात मानने को तैयार हो गया और बदले में धर्मराज युधिष्ठिर ने जो कहा, वो आज के समय में भी प्रासंगिक है और हमेशा रहेगा। युधिष्ठिर का मानना था कि व्यक्ति अपनी शक्ति से ज्यादा अपने मनोबल पर निर्भर रहता है। अगर मनोबल ऊँचा हो तो अपने से अधिक शक्तिशाली शत्रु को भी परास्त किया जा सकता है। उन्होंने शल्य से कहा कि वे कर्ण का मनोबल नीचा करते रहें। सारथी के रूप में युद्ध मैदान में कर्ण के सबसे अधिक नज़दीक रहने के कारण उसके लिए यह संभव भी था।

जब भी कर्ण युद्धक्षेत्र में कोई बहादुरी का कार्य करता- शल्य कुछ बेतुकी बातें कर उसका मनोबल तोड़ने की कोशिश करता। जब भी कर्ण किसी शत्रु को मार गिरा कर गर्व की अनुभूति करता, शल्य फिर से कुछ बातें कर उनकी मानसिक स्थिति को डावाँडोल करने का प्रयास करता। कर्ण को उसने इतना हतोत्साह किया कि वह शल्य से खीझ उठा। लगभग यही हाल आज राहुल गाँधी का है। जब ‘ एयर स्ट्राइक’ के बाद जनता का मनोबल ऊँचा था, सबूत माँग कर कॉन्ग्रेसी नेताओं ने उस मनोबल को तोड़ने और शत्रु के मनोबल को बढ़ाने का कार्य किया। राफेल सौदा सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और देश गर्व की अनुभूति कर रहा था, तब इस पर छींटाकशी कर-कर के कॉन्ग्रेस पार्टी ने गन्दी राजनीति की। चाहे जो भी हो, अगर देश के लोग अपने ही देश के लिए ऐसा करें तो उसका गलत असर तो पड़ता है। शल्य की कहानी में हमने देखा।

अब सुनिए कि फाइलें कैसे गायब होतीं हैं

राहुल गाँधी ने रक्षा मंत्रालय की फाइलों के गायब होने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस सरकार में सबकुछ गायब हो रहा है। उन्हें इस बात का याद दिलाना ज़रूरी है कि उनके वक़्त क्या हुआ था। कोलब्लॉक एलोकेशन घोटाले के बाद कुछ महत्वपूर्ण काग़ज़ात गायब हो गए थे। अव्वल तो यह कि 2006 से 2009 के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ही कोयला मंत्रालय देख रहे थे। ख़ुद तत्कालीन केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने ये बात स्वीकार की थी कि फाइल्स गायब हो गई हैं। लेकिन उस समय तो विपक्षी पार्टियों ने राजनीति करने की बजाय इसे गंभीर मुद्दा बताते हुए तुरंत एफआईआर दर्ज करने की माँग की थी। क्या आज राहुल गाँधी एक जिम्मेदार विपक्षी पार्टी नेता की भूमिका नहीं निभा सकते?

जैसा कि प्रधानमंत्री सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारु ने अपनी पुस्तक में लिखा है, पीएमओ की फाइलें सोनिया गाँधी के पास जाया करती थीं और वे इस पर निर्णय लेती थी। ये फाइलों के गायब होने से भी बड़ी गंभीर बात है जहाँ प्रधनमंत्री ही असहाय था। अब राहुल गाँधी रक्षा सौदों पर बिना सबूत आक्षेप लगा कर पाकिस्तान का काम आसान कर रहे हैं और देश को गर्त में ढकेलने की कोशिश कर रहे हैं। पाक का क्या, उसे तो भारत के रक्षा सौदों के बिगड़ने से ख़ुशी ही होगी।

100 साल से ऊपर है उम्र इन 6000 वोटरों की, लेकिन लोकतंत्र में आस्था मजबूत

आजकल के समय में जिस प्रकार से बुजुर्गों की बेकद्री की जाती है, उसके कारण वो अपने जीवन को पूरा नहीं जी पाते और समय से पहले ही 75-80 की उम्र में दुनिया को अलविदा कह देते हैं। इस कारण आज 90 या उससे ऊपर की उम्र के बुजुर्ग दुर्लभ ही देखने को मिलते हैं। ऐसे में हरियाणा में चल रही चुनाव की हवा एक ऐसी ख़बर लेकर आई है, जिसे सुनकर निश्चित ही आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी।

साल 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ हरियाणा में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं। ऐसे में इन दोनों चुनावों की तैयारी हरियाणा में जोर-शोर से हो रही है। इसी दिशा में वहाँ वोटर लिस्ट भी तैयार हो चुकी है। इस वोटर लिस्ट के बनने के बाद जो खास बात निकलकर आई वो यह कि इस लिस्ट में 5,910 वोटर ऐसे सामने आए, जिनकी उम्र 100 साल से ऊपर की है। और 89,711 ऐसे मतदाता हैं, जिनकी उम्र 90 से 99 के बीच है।

उम्र के जिस मोड़ पर आकर लोग घर-परिवार के साथ खुद के जीवन की स्मृतियों को भी भुलाने लगते हैं उस उम्र में इन बुजुर्गों में मतदान को लेकर जोश और सजगता आज भी बरकरार है। जिसके चलते देश के लोकतंत्र को मजबूत बनाते हुए ये बुजुर्ग इस वर्ष चुनावों में मतदान करके अपना योगदान देंगे।

रिपोर्ट के मुताबिक वोटर लिस्ट में देखें तो हरियाणा के करनाल जिले में 100 साल से ज्यादा उम्र के सबसे अधिक वोटर हैं और पंचकूला में इस उम्र-वर्ग के सबसे कम वोटर हैं। करनाल में जहाँ इन बुजुर्ग वोटर्स की संख्या 553 है वहीं पंचकूला में इस उम्र-वर्ग के केवल 111 ही मतदाता हैं।

इसके अलावा हरियाणा में 89,711 मतदाता ऐसे हैं, जिनकी उम्र 90 से 99 वर्ष की है। इस श्रेणी में आने वाले सबसे ज्यादा मतदाता भिवानी में हैं, जहाँ इनकी संख्या 7,946 है, जबकि इस उम्र-वर्ग के सबसे कम वोटर पंचकूला में हैं जहाँ पर इनकी संख्या 1,436 है।

संयुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी इंद्रजीत का कहना है कि अंतिम वोटर लिस्ट को 31 जनवरी 2019 को प्रकाशित किया गया था, जिसके अनुसार मतदाता सूची में इस बार 3.68 लाख नए वोटर्स जुड़े हैं लेकिन सत्यापन के बाद इस सूची से 85,613 वोटर्स बाहर कर दिए गए क्योंकि वह सभी नाम फर्जी थे और एक से अधिक जगहों पर उनका नाम दर्ज था। इंद्रजीत ने कहा कि राज्य के लिए यह गर्व की बात है कि इतनी अधिक आयु वाले मतदाताओं के नाम भी मतदाता सूची में दर्ज हैं।

रईसज़ादे ने कार से मारी टक्कर, फिर बोनट पर पीड़ित को 2 किमी तक घसीटा

दिल्ली NCR में आने वाले उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद से एक सनसनीखेज घटना सामने आई है। रोड रेज की इस घटना में कार चालक ने पहले तो एक शख़्स को टक्कर मारी और फिर उसे बोनट पर रख कर दो किलोमीटर तक गाड़ी दौड़ाता रहा। इस दौरान कई बार तो ऐसा लगा जैसे की वह व्यक्ति बोनट पर से गिर पड़ेगा। अगर वह चलती कार के बोनट से गिर जाता तो कोई बड़ी दुर्घटना होनी तय थी। सोशल मीडिया पर इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो वायरल हो गया। पुलिस ने आरोपित चालक को गिरफ़्तार कर लिया है। पीड़ित व्यक्ति ने थाने में शिक़ायत दर्ज करवाई है।

24 वर्षीय कार चालक का नाम रोहन मित्तल है जबकि पीड़ित एक कैब ड्राइवर है। लग्जरी गाड़ी चला रहा मित्तल नोएडा स्थित एक एक्सपोर्ट्स हाउस का मालिक है। उसे हत्या की कोशिश में गिरफ़्तार कर लिया गया है। सम्बंधित धाराओं के अंतर्गत उस पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

दरअसल, हुआ यूँ कि कार ने उक्त व्यक्ति को टक्कर मार दी। टक्कर के बाद वह व्यक्ति कार के एकदम क़रीब था लेकिन कार चालक ने गाड़ी नहीं रोकी। गुस्साए व्यक्ति ने कार के बोनट पर कई बार हाथ भी पटका। ऐसी स्थिति में उसने गिरने से बचने के लिए कार का बोनट पकड़ लिया लेकिन कार चालक कार को भगाता रहा। दो किलोमीटर बाद जब इस घटना को देख रही भीड़ जमा हो गई, तब जाकर कहीं ड्राइवर ने कार रोकी। इसी तरह की एक घटना दिसंबर 2018 में हुई थी जब हरियाणा के साइबर सिटी गुरुग्राम में एक कार चालक ने ट्रैफिक पुलिसकर्मी को गाड़ी के बोनट पर घसीटा था।

उस समय हुआ यूँ था कि शहर के सिद्धेश्वर चौक पर एक स्विफ्ट कार ने सिग्नल तोड़ डाला जिसके बाद ट्रैफिक पुलिस ने गाड़ी रोकने का इशारा किया। चालक ने पुलिस की बात को नज़रअंदाज़ कर गाड़ी को भगा दिया। उक्त पुलिसकर्मी कार की बोनट पर आ गया और कार चालाक काफ़ी दूर तक उसे घसीटता चला गया। अंत में चालक गाड़ी छोड़ कर फरार हो गया।

रॉबर्ट वाड्रा ने खुद अपनी तुलना माल्या, नीरव और मेहुल चौकसी जैसे भगोड़ों से की

‘चोर की दाढ़ी में तिनका’- हिंदी भाषा की इस कहावत है का इस्तेमाल तब किया जाता है जब कोई गलती करके खुद ही जाने-अंजाने में इशारा कर दे कि वह गुनहगार है। सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा ने इस बार वही किया है। हाल ही में अपने बयान में उन्होंने बिना किसी के कुछ कहे ही अपनी सफाई देते हुए खुद के मामले की तुलना विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे भगौड़े लोगों से कर डाली।

मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में इन दिनों प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के सवालों से रॉबर्ट को लगातार जूझना पड़ रहा है। लंदन वाले मामले में पूछताछ खत्म नहीं हुई थी कि बीकानेर वाले मामले की भी फाइलें ईडी ने खोल दी। ऐसे में हर तरफ से खुद को फँसा हुआ महसूस करते हुए रॉबर्ट ने बुधवार (मार्च 6, 2019) को एएनआई से कहा कि वह (रॉबर्ट) तो इस देश में हैं, लेकिन उनका क्या जो देश को लूट कर भाग गए? रॉबर्ट ने कहा कि जब तक वह अपने आप को बेगुनाह नहीं साबित कर देते तब तक वह इस देश को छोड़कर कही भी नहीं जा रहे हैं और न ही वह इस बीच सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनेंगे।

यहाँ रॉबर्ट ने खुद अपनी सफाई के लिए जिन लोगों कि तरफ इशारा किया उनमें विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे भगोड़े शामिल हैं। दरअसल, जब से रॉबर्ट की पत्नी प्रियंका ने कॉन्ग्रेस महासचिव पद संभाला है तब से ही उनको अपने पति के इन कारनामों को लेकर आलोचनाओं का सामना कर पड़ रहा है जिसके कारण रॉबर्ट ने खुलकर यह बयान दिया है।

हाल ही में रॉबर्ट ने अपनी पत्नी प्रियंका के समान स्वयं भी सक्रिय राजनीति में आने का संकेत दिया था। लेकिन अब उन्होंने यह बयान भी दे दिया है कि वह जब तक अपने नाम पर लगे दाग को मिटा नहीं लेते तब तक राजनीति से नहीं जुड़ेंगे। फिलहाल के लिए बता दें कि दिल्ली की अदालत ने उनकी लंदन वाली संपत्ति पर चल रहे केस में मिलने वाली अंतरिम जमानत की तारीख़ को 19 मार्च तक के लिए बढ़ा दिया है।

कंगना और कुंभ पर सवाल खड़े करने वाले आमिर और यूनिलीवर की करतूतों पर चुप बैठ जाते हैं

फ़िल्मों के बारे में सभी जानते हैं कि वहाँ सेट, हुलिया, किरदार सभी नकली होते हैं। इसके बावजूद जब अभी हाल में कंगना की मणिकर्णिका अच्छी चल निकली तो गिरोहों ने विवाद उठाया कि कंगना का घोड़ा तो नकली है! ऐसा इसलिए था क्योंकि गिरोह के मर्दवादियों को एक अकेली कंगना आसान शिकार लगी होगी। इन्हीं लोगों ने आमिर ख़ान की फ़िल्म में शाकाहारी पहलवानों को जबरन मुर्गा खिलाना दिखाने पर ग़लत तथ्यों के बारे में कुछ नहीं कहा था। वो पुरुष हैं, फिल्म इंडस्ट्री पर मजबूत पकड़ रखते हैं, शायद उनकी फेंकी बोटियों से पेट भी भरा हुआ होगा। उन्हें निशाना एक ही तरफ़ साधना होता है।

अभी हाल में जब अर्धकुम्भ का वृहत आयोजन हुआ तो उनके पालतू कहने लगे कि इतना सरकारी ख़र्च क्यों? किसी ने पूछ लिया कि मंदिरों से धन और ज़मीनें लेना बंद कर दो तो आयोजन भी बंद कर देना। उसके बाद फिर हमले का दूसरा कोण ढूँढा जाने लगा। कुम्भ के आयोजन में 200 वर्षों बाद ऐसा हुआ है कि कोई बड़ी भगदड़ नहीं मची। किसी के भीड़ में कुचल कर मारे जाने की ख़बर चलाने का गिद्धों को मौक़ा ही नहीं मिला। भला आयातित विचारधारा और उपनिवेशवादी मानसिकता के लोग ऐसी कामयाबी कैसे सहन कर पाते?

लिहाजा उन्होंने प्रचारों के जरिये हिन्दुओं को फिर से नीचा दिखाने की कोशिश की। भारत को बरसों उपनिवेश बनाए रखने वाली जगहों की एक कंपनी के प्रचार का बहाना बनाया गया। ब्रिटिश-डच कंपनी जो भारत में हिंदुस्तान-यूनीलीवर के नाम से चलती है, अपने कई उत्पादों का प्रचार भी करती है। उसने अपनी चाय “रेड-लेबल” के लिए एक प्रचार बनाया जिसमें दर्शाया गया है कि भारतीय लोग कुम्भ की भीड़ का फायदा अपने बुजुर्ग अभिभावकों को वहाँ छोड़ आने के लिए उठाते हैं। प्रचार की कहानी में एक व्यक्ति अपने पिता को ऐसे भीड़ में छोड़ आता है, जैसे भारतीय समाज में ये आम बात हो!

ब्रिटिश-डच कंपनी हिंदुस्तान-यूनीलीवर के पिछले सीईओ को काफी हद तक “प्रगतिशील” माना जाता था और कई लोगों ने तो उनके अगला जॉर्ज सोरोस होने की संभावना भी जताई थी। इस ब्रिटिश-डच कंपनी के मौजूदा सीईओ के बारे में ऐसा तो नहीं कहा जा सकता लेकिन उनके अलग-अलग ब्रांड के हाल में आये प्रचारों पर सवाल जरूर उठ रहे हैं। थोड़े दिन पहले भारतीय लोगों का एक बड़ा वर्ग क्लोज-अप के प्रचारों से नाराज चल रहा था। भारत में इस ब्रिटिश-डच कंपनी को पहले ही स्वदेशी उद्यमों से कड़ा मुक़ाबला झेलना पड़ रहा है। उनका व्यापार बढ़ नहीं पा रहा।

हालाँकि ऐसी बड़ी कंपनियों में मीडिया को “मैनेज” करने की अपार क्षमता होती है, लेकिन अब के दौर में जब सोशल मीडिया, परम्परागत ख़रीदी जाने वाली मीडिया जितना ही प्रभावशाली हो चला है तो ब्रिटिश-डच कम्पनी यूनीलीवर को बायकाट के गाँधीवादी तरीके का असर शायद महसूस हो ही जायेगा। अच्छा भी है, क्योंकि सनातनी समाज अब अन्यायों के प्रति असहिष्णु हो चला है, ये बात उपनिवेशवादियों को पता भी होना चाहिए।

रागा का रा-फेल राग: नशे-सी चढ़ गई ओए…

राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस किया। हालाँकि, प्रोपेगेंडा में लिप्त, चोरों के सहारे ‘बड़ी ख़बर’ मैनुफ़ैक्चर करने वाले ‘द हिन्दू’ की साख लगातार गिरती ही जा रही है, लेकिन कॉन्ग्रेस वाले उसकी ख़बर की फ़ोटोकॉपी करके प्रेस कॉन्फ़्रेंस में लहराने से बाज़ नहीं आते। पिछली बार ‘द हिन्दू’ के एन राम ने राफेल को लेकर जो ‘सबूत’ दिए थे, उसे जानबूझकर काट कर पेश किया था ताकि रक्षा मंत्रालय पर सवाल उठे। लेकिन आधे घंटे में पूरी, बिन कटी, तस्वीर आ गई और एन राम का स्तर गिरकर उत्तर भारत के लोकप्रिय अश्लील साहित्य के लेजेंड मस्त राम जितना हो गया।

पिछली ग़लतियों से सीखे बिना, एन राम ने कल राफेल पर ‘नया ख़ुलासा’ किया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस रिपोर्ट पर भी कुछ निकल कर नहीं आएगा क्योंकि जिस तरह से रिपोर्ट लिखी गई है, उसकी क्लिष्टता से तो यही लगता है कि लिखने वाले ने भ्रमित करने की कोशिश की है। दूसरी बात यह भी है कि जब तक पूरी रिपोर्ट सामने न हो, कुछ हिस्सों को संदर्भ से बाहर निकालकर रखना, देशहित नहीं, डूबते अख़बार को चर्चा में रखने भर का ज़रिया है।

आप यह देखिए कि ऐसी रिपोर्ट कब आती है। राफेल पर रिव्यू पेटिशन पर कल ही सुनवाई होनी थी, और ‘द हिन्दू’ की रिपोर्ट भी उसी दिन आई। उसके बाद क्या हुआ? उसके बाद गिरोह के वकील, प्रशांत भूषण, अख़बार की कतरन को सबूत के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में ले गए, जहाँ सुनवाई का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर बर्बाद हुआ कि इस ‘नए सबूत’ को शामिल किया जा सकता है, या नहीं।

आपको लगेगा कि ये सामान्य सी बात है, जबकि ऐसा है नहीं। यही काम इसी गिरोह ने अयोध्या मामले में किया जब वो नया एंगल ले आए कि ‘मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग है’, और इस पर खूब समय बर्बाद किया गया। ये मरे हुए घोड़े को ज़िंदा रखने का पुराना तरीक़ा है जिसमें वामपंथी गिरोह को महारत हासिल है। 

कोर्ट के सामने सरकार का पक्ष रखने वाले वकील ने कोर्ट को याद दिलाया कि अगर ये तथाकथित सबूत, जो चोरी से रक्षा मंत्रालय से उड़ाए गए हैं, पब्लिक में आते हैं, तो इसका मतलब भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करना होगा। कारण यह है कि जब दो देश ऐसे समझौते करते हैं तो उनकी कई शर्तें गोपनीय होती हैं, और जब रक्षा मंत्रालय के दस्तावेज चोरी हो रहे हैं, तो कल को राफेल से संबंधित तकनीकी बातें भी पब्लिक में आ सकती हैं, और इससे भविष्य में होने वाले तमाम समझौतों पर असर पड़ेगा। 

‘द हिन्दू’ की टाइमिंग, उनके पास के तथाकथित सबूतों की कतरनें, और उनका प्रयोग एक खास गिरोह द्वारा होना, यह बताता है कि विपक्ष के पास अगर मुद्दा न हो, तो वो किस हद तक जा सकते हैं। एन राम ने अपनी पिछली करतूत के लिए पाठकों से माफ़ी नहीं माँगी है कि आधी तस्वीर क्यों छापी थी। कल को जब ये रिपोर्ट भी वैसी ही साबित होगी, तब भी ये माफ़ी नहीं माँगेंगे क्योंकि इनका काम है आरोप लगाकर गायब हो जाना।

राहुल गाँधी और उनकी पार्टी अब ऐसे ही धंधेबाज़ और अस्तित्व को बचाने के लिए कुछ भी लिखने वाले अख़बारों पर निर्भर है। इसीलिए, उधर रिपोर्ट छपती है, इधर प्रेस कॉन्फ़्रेंस होती है। राहुल गाँधी राफेल पर आज तक 30,000 करोड़ अम्बानी को दे दिए कहते फिर रहे हैं, उधर अम्बानी की कम्पनी दिवालिया हो रही है। अगर मोदी इस तरह का दोस्त है, तो अम्बानी जैसे लोगों को समझना चाहिए कि कैसे दोस्त बनाने चाहिए! 

लेकिन राहुल गाँधी तो राहुल गाँधी हैं, उन्हें सत्य से क्या! जैसे एक नशेड़ी दीन-दुनिया से बेख़बर रहता है, और अचानक से कुछ बोल पड़ता है, या बार-बार एक ही बात बोलता है, वैसे ही राहुल गाँधी भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल में कुछ न पाने के बाद, संसद में निर्मला सीतारमण, अरुण जेटली से लेकर तमाम लोगों द्वारा घंटों चर्चा के बाद भी, इन सब बातों से परे, लगातार एक ही बात रटे जा रहे हैं।

अब उनके ये ‘खुलासे’ इतने बोरिंग हो गए हैं कि न्यूज रूम में ये सोचना पड़ता है कि इस पर अब कैसे लिखा जाए, क्योंकि ये आदमी तो लगातार एक ही बात बोलता है। 

कॉन्ग्रेस की हालत पिछले 14 फ़रवरी के पुलवामा हमलों के बाद ऐसी हो गई है जैसे उनकी पूरी योजना की फ़ाइल किसी ने हाथ से खींच ली हो। प्रियंका की धमाकेदार लॉन्च हुई, रैलियों का प्रोग्राम बना, फिर उसमें राहुल की छवि बेहतर करने के लिए और लोग आए… ये सब चल ही रहा था कि अचानक से स्थिति में बदलाव आया। 

यहाँ कॉन्ग्रेस ने जो लाइन पकड़ी, उससे इन्हें दो तरह से नुकसान हुआ। पहले तो साथ खड़े हुए क्योंकि राजनैतिक दूरदर्शिता यही माँग रही थी। लेकिन दिन भर के बाद ही इनके नेताओं ने उल्टी-सीधी बातें करने में समय लगाना शुरू किया, और जो कैपिटल ये बना रहे थे, वो हाथ से जाता रहा। फिर एयर स्ट्राइक हुए तब तक कॉन्ग्रेस ‘मोदी रैलियाँ कर रहा है’ वाली बात को इतनी बार बोल गई कि उनकी अपनी रैलियों के करने पर भी सवाल उठ जाते।

बहरहाल, हुआ यह कि मोदी ने सेना को अपना काम करने दिया, और खुद अपना काम करते रहे। कॉन्ग्रेस ने एयर स्ट्राइक पर सबूत माँगने से लेकर, अपने नेताओं के मुँह बद करने में नाकामी दिखाई, और स्वयं भी पार्टी के तौर पर ऐसा कुछ नहीं किया कि मोदी या भाजपा को घेर सके, तो इन्होंने जो कोशिश की थी, वो नाकाम हो गई। 

पुलवामा और एयर स्ट्राइक पर सरकार को घेरने की जगह, कॉन्ग्रेस अगर उन चालीस जवानों के घर राहुल-प्रियंका को भेज देती, बीस दिन भी लग जाते, तो अभी तक उनकी स्थिति मजबूत रहती। उनके पास सरकार और मोदी पर ये सवाल पूछने का पूरा हक़ होता कि ‘हम तो परिवारों से मिल रहे हैं, आप रैलियाँ कर रहे हो’। लेकिन कॉन्ग्रेस यहाँ भी मात खा रही है, और अब उन्हें क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन के नाम पर दो और तीन सीटों का प्रस्ताव मिल रहा है। 

फिर अब बचा क्या? बच गया राफेल और राहुल की पुरानी स्क्रिप्ट के वो पन्ने जिन्हें जीन्स की पिछली जेब में लेकर घूमने से उनकी रीढ़ टूट चुकी है। और जब किसी की रीढ़ टूट चुकी हो तो वो अपने मालिक की कितना ढोएगा, ये समझना बहुत मुश्किल नहीं।

अब राहुल वापस उसी काग़ज़ के टुकड़े से कई काम लेते हैं। दीन-दुनिया से बेख़बरी की दवाई भी उसी काग़ज़ पर रखकर तैयार होती है, स्पीच भी उसी काग़ज़ से पढ़कर देना है, बाद में आँसू भी उसी से पोंछना है। कभी-कभी तो दया आती है इस व्यक्ति पर, लेकिन फिर वो ख़ूनी, लुटेरा पंजा दिखता है भारतीय तिरंगे के तीन रंगों के साथ।