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200 साल बाद पहला कुम्भ मेला, जिसमें नहीं हुई भगदड़ से एक भी मौत

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में मकर संक्रांति के पर्व पर 15 जनवरी से शुरू हुए दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक और आध्यात्मिक कुम्भ मेले का 4 मार्च को महाशिवरात्रि के अंतिम स्नान के साथ समापन हो चुका है। 49 दिनों तक चले इस भव्य मेले में देश-विदेश के करीब 23 करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 4 मार्च को हुए महाशिवरात्रि के आखिरी स्नान पर करीब 1.10 करोड़ लोगों ने संगम में डुबकी लगाई। 15 जनवरी से 4 मार्च तक चलने वाले भव्य कुम्भ मेले ने कई वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़े और कई नए कीर्तिमान बनाए हैं।

कुम्भ मेला नाम सुनते ही हिंदी फिल्मों में दिखाया गया वो सीन याद आ जाता है, जब भीड़ और भगदड़ के बीच 2 भाई कुम्भ में बिछड़ जाते हैं। लेकिन कुम्भ मेले की भगदड़ का ये सीन केवल बिछड़ने तक ही नहीं बल्कि अनेक लोगों की मौत तक का कारण भी हुआ करता था। हालात ये हैं कि अभी भी लोग कुम्भ की भीड़ और किसी अनहोनी की आशंका से डरते हैं और यदि देखा जाए तो उनका डर गलत भी नहीं है क्योंकि भारत में ब्रिटिश सत्ता के समय से ही हिन्दू संस्कृति, त्यौहारों, मेलों की पूरी अनदेखी की गई और व्यवस्था, सुरक्षा, एवं सुविधा को हल्के में लिया गया।

वर्तमान केंद्र सरकार और योगी आदित्यनाथ के संयुक्त प्रयासों ने प्रयागराज कुम्भ के आयोजन में एक कीर्तिमान स्थापित किया है। इस सरकार ने हर मायने में यह साबित किया है कि हिन्दू आस्थाओं के प्रति संवेदनशीलता और तत्परता दिखाई जाए तो उन्हें दुर्घटनाओं से बचाया जा सकता है।

1820 का हरिद्वार कुम्भ मेला इतिहास में दर्ज वह कुम्भ है, जिसमें ज्ञात स्रोतों के मुताबिक भगदड़ से 450 से भी ज्यादा तीर्थयात्रियों की मौत हुई और 1000 से ज्यादा लोग घायल हुए। इसके बाद 1840 के प्रयाग कुम्भ मेले में 50 से अधिक मौतें हुईं। तत्कालीन सरकारी तंत्र में लगातार मची उथल-पुथल और व्यवस्था के मामूली इंतजामों के कारण इसके बाद के प्रत्येक कुम्भ में भी भगदड़ से तीर्थयात्री मरते रहे, जिनका आधिकारिक ब्यौरा तक उपलब्ध नहीं है। यदि 20वीं शताब्दी की बात करें तो 1906 के प्रयाग कुम्भ मेले में भगदड़ से 50 से अधिक मौतें हुईं और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।

प्रधानमंत्री नेहरु के संसदीय क्षेत्र प्रयाग में आजादी के बाद आयोजित प्रथम कुम्भ की दर्दनाक भगदड़

जब भी कुम्भ मेले की भगदड़ों का नाम आता है तो वर्ष 1954 के प्रयाग कुम्भ का रक्तरंजित इतिहास आँखों के सामने आ जाता है। ‘द गार्जियन’ के अनुसार 3 फरवरी, 1954 को मौनी अमावस्या के दिन शाही स्नान में 800 से अधिक श्रद्धालुओं की भयानक भगदड़ में मौत हुई। ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ के अनुसार यह आँकड़ा हजार मौतों से ज्यादा का है। तत्कालीन प्रधानमंत्री और इलाहबाद से सांसद जवाहरलाल नेहरू उस दिन कुम्भ मेला क्षेत्र में ही उपस्थित थे। सरकार द्वारा केवल कुछ भिखारियों के मरने का दावा किया गया था। लेकिन तत्कालीन नेहरू सरकार का ‘सरकारी झूठ’ तब सामने आया जब एक पत्रकार ने गहनों से लदी महिलाओं की लाशों की तस्वीर अख़बार में छाप दी थी।

प्रयागराज (इलाहबाद) की इस भयावह घटना के गवाह कुछ लोग बताते हैं कि मृतक संख्या कम दिखाने के लिए शासन द्वारा दर्जनों शव पेट्रोल डाल कर जला दिए गए थे। हालाँकि, यह सब आधिकारिक रिकॉर्ड्स में कब दर्ज होता है? लाशों के कई ढेर पुलिस की घेराबंदी करके जलाए गए लेकिन कुछ पत्रकार फिर भी तस्वीरें खींच लाए। हादसे की तस्वीरें खींचने वाले अकेले फोटो पत्रकार एनएन मुखर्जी ने संस्मरण में बताया था कि दुर्घटना के अगले दिन अख़बारों में शवों की तस्वीरें देखकर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंदबल्लभ पंत ने दाँत पीसते हुआ कहा था, “कौन है ये हरामज़ादा फ़ोटोग्राफ़र?”

कुम्भ मेले में भगदड़ से मौतों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। ‘द गार्जियन’ के अनुसार, मार्च
1986 के हरिद्वार कुम्भ मेले में हुई 3 भगदड़ों 600 से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई। इसी
साल 1986 में ही जनवरी में हुए प्रयाग कुम्भ मेले में भगदड़ में 50 से अधिक लोगों की मौत
हुई थी।

21वीं सदी में भी नहीं थमीं कुम्भ में अव्यवस्था से जन्मी भगदड़ से मौतें

कुम्भ मेले में भगदड़ का सिलसिला वर्ष 2000 के बाद भी नहीं बदला और लगातार प्रत्येक कुम्भ में शासन-प्रशासन के गैर जिम्मेदाराना रवैये के कारण तीर्थयात्रियों की मृत्यु का सिलसिला जारी रहा। ‘द ट्रिब्यून’, और ‘द गार्जियन’ के अनुसार, 27 अगस्त 2003 को नासिक कुम्भ में मची भगदड़ में 39 श्रद्धालुओं की मौत हुई और 150 से 200 लोग घायल हुए। इसके बाद वर्ष 2010 के हरिद्वार कुम्भ मेले में भगदड़ में 7 लोगों की मौत हुई और 2 लोगों की डूबकर मौत हुई। वर्ष 2013 के प्रयागराज कुम्भ मेले में 10 फरवरी को मची भगदड़ में 36 श्रद्धालुओं की मृत्यु हुई। 5 मई 2016 को उज्जैन के सिंहस्थ कुम्भ मेले में मची भगदड़ में 10 लोगों की मौत हुई और 100 से ज्यादा श्रद्धालु घायल हुए।

इसके अलावा पिछले 200 सालों में जो भी कुम्भ हुए, उनमें भगदड़ से मौतें होती रहीं, संभवतया कई आंकड़े बदनामी के डर से दस्तावेजों में शामिल नहीं हो पाए। इसके साथ ही सांप्रदायिक हिंसा और आग लगने से भी कुम्भ मेलों में कई मौतें हुईं। हरिद्वार के कुम्भ मेलों में
हैजा बीमारी के संक्रमण से हजारों लोगों की मृत्यु का इतिहास रहा है।

2019 प्रयागराज कुंभ में किसी भी प्रकार की कोई अशुभ घटना नहीं घटी

इस वर्ष प्रयागराज में आयोजित अर्द्धकुंभ, जिसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भरपूर प्रयासों ने महाकुम्भ बना दिया है, में श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और स्वच्छता का बहुत अधिक ध्यान रखा गया है। भीड़ प्रबंधन के इतने व्यापक इंतजामों के कारण मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या और वसंत पंचमी के तीनों सबसे बड़े शाही स्नानों के संपन्न हो जाने पर भी करोड़ों श्रद्धालुओं में से एक भी हताहत नहीं हुआ। मौनी अमावस्या पर आंकड़ों के अनुसार, 5 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम पर डुबकी लगाई परन्तु भगदड़ या धक्कामुक्की और किसी जान-माल की हानि का एक भी मामला सामने नहीं आया जो कि हर लिहाज से चौंकाने वाला आँकड़ा है।

कुम्भ मेले में शाही स्नान के दौरान सभी पुलों पर लोगों को नदी में गिरने से बचाने के लिए रेलिंग के आलावा अतिरिक्त सुरक्षा के लिए CRPF द्वारा मानवनिर्मित चेन बनाई गई, जिसके बीच से ही श्रद्धालु पुल पार कर सकते हैं। इसके साथ ही 2019 का यह प्रयाग कुम्भ मेला 32 हजार हेक्टेयर भूमि में फैला हुआ है। जबकि 2013 का मेला क्षेत्र केवल 1900 हेक्टेयर भूमि पर ही था, जो 2019 कुम्भ मेले के मुकाबले लगभग 17 गुना कम था। इतने अधिक फैलाव के कारण भीड़ बहुत व्यापक क्षेत्र में विभाजित हो गई है, जिससे भगदड़ जैसी किसी भी अनहोनी की आशंका शून्य रही।

प्रयागराज मेले के आधिकारिक कार्यालय के अनुसार मेले में उप्र. पुलिस के 30,000 से भी ज्यादा पुलिसबल (जो 2013 के मुकाबले लगभग 2.5 गुना हैं), पी.ए.सी. की 20 कंपनियाँ,
NDRF की 10 कंपनियाँ, CAPF की 54 कंपनियाँ, और SDRF की 1 कंपनी, NSG की एक स्पेशल टीम, 6,000 होमगार्ड, डॉग स्क्वाड की 15 टीम और कम से कम 20 कंपनियाँ संयुक्त रूप से मेले की सुरक्षा व्यवस्था में तैनात की गई थीं। मेले में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए घुड़सवार पुलिस भी लगाई गई। मेला क्षेत्र में 1,135 CCTV कैमरे लगाए गए, जो चप्पे चप्पे पर नजर बनाए रखने में सहायक हुए। इसके साथ ही सरकार द्वारा एम्बुलेंस, इमरजेंसी, यातायात, साइन बोर्ड की व्यापक व्यवस्था की गई थी। (स्रोत- फर्स्टपोस्ट)

कुम्भ अपर मेला अधिकारी दिलीप कुमार त्रिगुणायत के अनुसार, “प्रयाग कुम्भ में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उच्चस्तरीय चक्रव्यूह रचना की गई, जिसके अंतर्गत मैदान में बल्लियों से ज़िग-ज़ैग रास्ता बनाया गया ताकि भीड़ को एक बार चक्रव्यूह में घुसने के बाद, वापस निकलने
में कम से कम एक से डेढ़ घंटे का समय लगे, और इतना समय भीड़ नियन्त्रण के लिए पर्याप्त
होगा। इस चक्रव्यूह का मकसद संगम तट पर ज्यादा भीड़ आने पर पीछे की भीड़ को रोकना है ताकि अव्यवस्था के कारण भगदड़ की स्थिति न पनपने पाए।” हालाँकि, उन्होंने बताया कि तीनों शाही स्नान पर्व बिना इस चक्रव्यूह का उपयोग किए ही सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गए क्योंकि अन्य सुरक्षा व्यवस्था ही इतनी अच्छी रही कि उच्चस्तरीय चक्रव्यूह व्यवस्था का उपयोग ही नहीं करना पड़ा।

इस तरह 200 सालों के ज्ञात इतिहास में प्रयागराज का यह अर्द्धकुंभ, जिसे योगी सरकार ने
महाकुंभ
बना दिया, वह बिना किसी जानमाल की हानि, भगदड़ या श्रद्दालुओं के डूबने जैसी अनहोनी के सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ है। सभी श्रद्धालु प्रयागराज कुम्भ की विश्वस्तरीय व्यवस्था के लिए उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री महंत योगी आदित्यनाथ की दिल खोलकर तारीफ़ कर रहे हैं। कुम्भ अब आधिकारिक रूप से संपन्न हो चुका है। सबसे बड़े शाही स्नान संपन्न हो चुके हैं, मेलाक्षेत्र से भीड़ अब कम होने लगी है, वसंत पंचमी के बाद वैष्णव साधु जाने लगे थे। शिवरात्रि तक प्रमुखतया सिर्फ शैव संन्यासी ही प्रयाग में मौजूद थे।

यह 2019 का कुम्भ हर हाल में राज्य और केंद्र सरकार की एक बहुत बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा सकता है। इतने विशाल जनसैलाब का सफलतापूर्वक प्रबंधन करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती मानी जाती थी। लेकिन मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने यह साबित कर दिखाया कि हिन्दुओं की आस्था को यदि प्राथमिकता और समय दिया जाए तो उन्हें आसानी से ही किसी आपदा में बदलने से रोका जा सकता है।

बाबर जो कर गया, उसे बदल नहीं सकते: सुप्रीम कोर्ट

अयोध्या मामले में मध्यस्थता के मसले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के पास कई तरह की दलीलें आईं। जहाँ मुस्लिम पक्ष मध्यस्थता के लिए तैयार दिखा, वहीं हिन्दुओं की तरफ के वकीलों ने इस पर उत्साह नहीं दिखाया। हिन्दू महासभा और रामलला विराजमान की तरफ से मध्यस्थता को लेकर प्रतिक्रियाएँ आईं कि हाई कोर्ट ने भी ऐसी कोशिश की थी लेकिन उसका परिणाम सकारात्मक नहीं रहा।

इस जिरह के दौरान कई सवाल उठाए गए जिनमें मध्यस्थता कैसे हो, क्या उसके परिणाम को दोनों समाज के लोग मानेंगे, करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़े विषय पर कोर्ट के फैसले की जगह मध्यस्थता कितनी सही है, आदि शामिल थे।

सुनवाई की शुरुआत में ही हिन्दू महासभा ने कहा कि जनता इस बात को स्वीकार नहीं करेगी कि इस मुद्दे पर बातचीत द्वारा मसला सुलझाया जा सके। इस पर जस्टिस बोबड़े ने हिंदू महासभा से पूछा, “आप कैसे कह रहे हैं की समझौता असफल रहेगा?”

बातचीत और समझौते की राह पर जाने की बात कहते हुए कोर्ट ने कहा कि ये विषय सिर्फ ज़मीन का नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है, इस पर मिल बैठकर बात करने से अगर रास्ता निकल आए तो वही बेहतर होगा।

मुस्लिम पक्षकार की ओर ओर से राजीव धवन ने पक्ष रखते हुए कहा कि यह कोर्ट के ऊपर है कि मध्यस्थ कौन हो? लेकिन मध्यस्थता गोपनीय तरीके से हो। इस पर जस्टिस बोबड़े ने कहा कि यह गोपनीय ही होना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि पक्षकारों द्वारा गोपनीयता का उल्लंघन नहीं भी होना चाहिए। मीडिया में इस पर टिप्पणियाँ नहीं होनी चाहिए। और न ही प्रक्रिया की रिपोर्टिंग हो। अगर इसकी रिपोर्टिंग हो तो इसे कोर्ट की अवमानना घोषित किया जाए।

हिन्दू पक्ष ने कहा कि मान लीजिये की सभी पक्षों में समझौता हो गया तो भी समाज इसे कैसे स्वीकार करेगा? इस पर जस्टिस बोबड़े ने कहा कि अगर समझौता कोर्ट को दिया जाता है और कोर्ट उस पर सहमति देता है और आदेश पास करता है। तब वो सभी को मानना ही होगा।

BJP नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सुनवाई के दौरान कहा कि मध्यस्थता की कुछ सीमाएँ होती हैं और उससे आगे नहीं जाया जा सकता है।

क्या अब कोर्ट तय करेगी सरकार कब युद्ध की घोषणा करे, कब शांति की : अटॉर्नी जनरल

अटॉर्नी जनरल ने सर्वोच्च न्यायालय में बताया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा अदालत में पेश राफेल दस्तावेजों को रक्षा मंत्रालय से चुराया गया था। राफेल सौदे पर समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई आज (मार्च 6, 2019) दोपहर के भोजन के बाद फिर से शुरू हुई।

शुरुआत में, सुप्रीम कोर्ट ने संजय सिंह द्वारा सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ दिए गए कुछ बयानों पर आपत्ति जताई और उन्हें सुनने से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि पीठ इसे बहुत गंभीरता से ले रही है और उनके खिलाफ गंभीर कार्रवाई करेगी। अदालत ने अधिवक्ता संजय हेगड़े से कहा कि वह अपने मुवक्किल संजय सिंह को सूचित करें। AAP नेता उन व्यक्तियों में से एक है जिन्होंने राफेल सौदे पर सुप्रीम कोर्ट में एक समीक्षा याचिका दायर की है।

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अदालत को यह बताते हुए कि समाचार पत्रों द्वारा प्रकाशित और याचिकाकर्ताओं द्वारा उपयोग किए गए राफेल दस्तावेज रक्षा मंत्रालय से चुराए गए थे और सरकार उसी के लिए कार्रवाई कर रही है। याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को धमकाने और कोर्ट में सच्चाई लाने से उन्हें रोकने का प्रयास है। उन्होंने यह भी कहा कि यह अदालत की अवमानना ​​है।

अटार्नी जनरल ने आरटीआई अधिनियम के तहत बताया कि रक्षा दस्तावेजों को इस अधिनियम के तहत प्रकटीकरण से छूट प्राप्त है। उन्होंने उल्लेख किया कि हिंदू द्वारा प्रकाशित दस्तावेज “सीक्रेट” के रूप में चिह्नित हैं। उन्हें इस तरह सार्वजनिक डोमेन में पेश नहीं किया जा सकता। केके वेणुगोपाल ने कहा कि रक्षा दस्तावेज प्रकाशित होने के बाद भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को भारी नुकसान हुआ है।

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने यह भी कहा, “क्या सुप्रीम कोर्ट युद्ध में जाने या शांति के लिए बातचीत करने के निर्देश देगा। कुछ मुद्दे न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हैं। क्या हमें युद्ध की घोषणा करते समय या जब हम शांति की घोषणा करते हैं, क्या हमें हर बार अदालत की अनुमति लेनी होगी? क्या इसके लिए अदालत में आना होगा?”

उन्होंने तब देश के लिए राफेल जेट की आवश्यकता का उल्लेख किया, लेकिन पीठ ने उन्हें समीक्षा याचिका पर टिकने के लिए कहा।

न्यायमूर्ति के एम जोसेफ ने एजी से असहमति जताते हुए कहा कि चोरी के सबूतों को भी अदालत द्वारा साक्ष्य अधिनियम के अनुसार देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि अगर कुछ भ्रष्टाचार हुआ है, तो सरकार आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत आश्रय नहीं ले सकती है। लेकिन अटॉर्नी जनरल ने असहमति जताई और कहा कि दस्तावेजों का स्रोत महत्वपूर्ण है। उन्होंने पूछा कि आख़िर याचिकाकर्ताओं को रक्षा मंत्रालय के क्लासिफाइड दस्तावेज कैसे मिले।

CJI रंजन गोगोई ने एजी से पूछा, अगर किसी आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने में कठिनाई हो रही है, एक दस्तावेज चुरा रहा है और अदालत में पेश किया गया है जो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि वह निर्दोष है, तो न्यायाधीश को दस्तावेज को केवल इसलिए अनदेखा करना चाहिए क्योंकि यह चोरी का है। इसके लिए, वेणुगोपाल को दस्तावेज़ के स्रोत का खुलासा करना होगा।

CJI रंजन गोगोई ने एजी से कहा कि वे इस पर तथ्य प्रस्तुत करें कि सबूत का स्रोत महत्वपूर्ण है। इस पर, एजी ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2004 के एक निर्णय का साक्ष्य प्रस्तुत किया, जिसमें कहा गया था कि अवैध रूप से प्राप्त सबूतों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। न्यायमूर्ति कौल ने यह कहते हुए भी एजी से असहमति जताई कि चूँकि दस्तावेज अदालत में आए हैं, इसलिए वह यह नहीं कह सकते कि अदालत को उन पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उन्होंने कहा कि भले ही एजी सही है, कुछ मुद्दों को सुनने के लायक है यदि वे अदालत को कन्विंस कर पाते हैं तो।

अटॉर्नी जनरल ने दोहराया कि राफेल जेट की खरीद राष्ट्र के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे का एक राजनीतिक कोण भी है, और सीएजी ने संसद में इस सौदे पर अपनी रिपोर्ट पहले ही सौंप दी है, और संसद इस मुद्दे पर गौर करेगी। एजी ने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि वे सीमित दायरे में रक्षा मामलों का उपयोग करें, क्योंकि अदालत द्वारा कहा गया कुछ भी विपक्ष द्वारा सरकार को लक्षित करने के लिए उपयोग किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष इस मामले का उपयोग करके सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है।

प्रशांत भूषण ने एजी के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि 2जी और कोलगेट मामलों में भी अदालत ने ऐसे दस्तावेजों पर भरोसा किया था। उन्होंने कहा कि उन मामलों के दौरान भी सरकार ने इसी तरह की दलीलें दी थीं, लेकिन जिन्हें अदालत ने खारिज कर दिया था।

प्रशांत भूषण ने यह भी कहा कि दस्तावेजों को द हिंदू और कारवाँ पत्रिका द्वारा प्रकाशित किया गया है, इसलिए यह कहना गलत है कि उन्होंने अपने दस्तावेजों के स्रोत का खुलासा नहीं किया है।

CJI रंजन गोगोई ने कहा कि अगर कोर्ट एजी के तर्क को स्वीकार करता है, तो वह खारिज कर देगा, अन्यथा वह आगे बढ़ जाएगा। इस बारे में प्रशांत भूषण ने कहा कि भले ही दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया जाता है, लेकिन इससे मामले में कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए अधिकांश दस्तावेजों में सूत्रों का उल्लेख किया गया है।

बता दें कि बीते साल 13 दिसंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने राफेल विमान सौदे में फैसला सुनाया था और कहा था कि इस सौदे में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं है। हालाँकि, तब कुछ लोगों ने सवाल उठाया था कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने सही कागजात पेश नहीं किए इसलिए फैसले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

फैसला आने के फौरन बाद केंद्र सरकार ने संशोधन याचिका दाखिल की थी।  इसके बाद प्रशांत भूषण ने याचिका दाखिल कर माँग की कि सरकार के दिए नोट में अदालत को गुमराह करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि राफेल मामले को लेकर दिए अपने फैसले पर खुली अदालत में फिर से विचार होगा।

आपको बता दें कि वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, बीजेपी के बागी नेता यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह और वकील एम एल शर्मा ने पुनर्विचार याचिका में अदालत से राफेल आदेश की समीक्षा करने के लिए अपील की है।

अपील में कहा गया कि सरकार ने राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए निर्णय लेने की सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया है। मोदी सरकार ने 3 P यानी Price, Procedure, Partner के चुनाव में गफलत बनाए रखी और अनुचित लाभ लिया है।

वहीं, केंद्र सरकार की अपील में कहा गया है कि कोर्ट अपने फैसले में उस टिप्पणी में सुधार करे जिसमें CAG रिपोर्ट संसद के सामने रखने का ज़िक्र है। केंद्र का कहना है कि कोर्ट ने सरकारी नोट की गलत व्याख्या की है।

फ़िलहाल, मामले की सुनवाई 14 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी गई है।

R-73 मिसाइल पाकिस्तानी F-16 पर लॉक्ड है: विंग कमांडर अभिनंदन का आख़िरी रेडियो मैसेज

भारतीय सीमा में घुसपैठ की कोशिश कर रहे पाकिस्तान के F-16 प्लेन गिराने से पहले विंग कमांडर अभिनन्दन के आखिरी रेडियो मैसेज के आधार पर IAF ने आखिरकार घोषणा कर दी है कि पाकिस्तान के F-16 विमान को अभिनन्दन ने मार गिराया था। मिग-21 में बैठे अभिनन्दन का आखिरी सन्देश था, “R-73 locked।”

IAF ने अब आधिकारिक रूप से पाक F-16 को ध्वस्त करने का श्रेय विंग कमांडर अभिनन्दन के नाम कर दिया है। डॉग फाइट के दौरान 8 लड़ाकू विमानों के समूह द्वारा दागे R-73 मिसाइल एकमात्र हथियार थे जो इनबाउंड पाक वायु सेना के जेट F-16 के ऊपर फायर किए गए थे। अभिनंदन ने अपने अंतिम ने रेडियो सन्देश में कहा ‘R-73 लॉक्ड’, इसके बाद उनसे संपर्क टूट गया था।

पाकिस्तान कुछ भी कहे लेकिन भारतीय सेना ने सबूत जारी कर बताया है कि IAF की गई एयर स्ट्राइक में आतंकवादियों के ठिकानों को सफलतापूर्वक तबाह कर दिया गया था। साथ ही, भारत ने F-16 को नष्ट करने के बाद भी सबूत दिए थे।

बता दें कि IAF विंग कमांडर अभिनन्दन को पाकिस्तान द्वारा पकड़ लिया गया था, लेकिन पाकिस्तान पर बढ़ते राजनयिक दबाव के कारण केवल तीन दिनों में ही रिहा करना पड़ा था।

शाह का चक्रव्यूह: ‘एयर स्ट्राइक’ का सबूत माँग-माँग कर BJP के पिच पर खेल रहा विपक्ष

भारत का समूचा विपक्ष वैसी ही वही बात कर रहा है, जैसा भाजपा चाहती है। फेक नैरेटिव बना-बना कर भाजपा और मोदी को घेरने वाले विपक्ष के पास मुद्दों के ऐसा अभाव हो गया है, जिस से उन्हें वही सूझता है जो भाजपा उन्हें दिखाती है। कुल मिला कर यह कि भारतीय जनता पार्टी मुद्दे सेट कर रही है कि किस बात पर उसे विरोध झेलना है। आज तक कुछ यूँ होता आ रहा था कि विपक्षी पार्टियाँ मुद्दे सेट करती थी और भाजपा उनका बचाव करते-करते परेशान रहती थी। लेकिन अमित शाह ने विपक्षी खेल को ताड़ कर उसे एक ऐसा मोड़ दिया है कि विपक्षी नेता उस जाल में उलझते जा रहे हैं। कुल मिला कर कह सकते हैं कि शाह ने एक ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है, जिसके हर द्वार पर एक से बढ़ कर एक जाल हैं।

‘एयर स्ट्राइक’ के सबूत

पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान को उचित जवाब देकर राजग सरकार ने यह बता दिया कि भारत अब बदल चुका है और वह आतंकवाद पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई कर सकता है। ‘एयर स्ट्राइक’ तो हो गया लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक के बाद हुई राजनीति से सतर्क भाजपा ने इस बार विपक्षियों की कुटिल चाल को पहले ही ताड़ लिया। अमित शाह को पता था कि भारत में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों का भी वोट बटोरने के लिए राजनीतिक इस्तेमाल करें। उन्हें यह भी अच्छी तरह पता है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर बढ़-चढ़ कर बोलने वाले नेताओं में से 90% को इसकी समझ ही नहीं होती। उदाहरण के लिए मायावती के ताज़ा बयान को ले लीजिए जिसमे उन्होंने पूछा था कि साढ़े चार वर्षों में एक भी राफेल विमान क्यों नहीं आया?

शाह जानते हैं कि जनता अब जागरूक हो चुकी है और सोशल मीडिया के युग में ऐसे बेहूदा बयान देने वाले नेताओं का ख़ुद इलाज हो जाता है। हुआ भी ऐसा ही। लोगों ने बहन जी को अच्छी तरह समझा दिया कि राफेल कोई हाथी की मूर्ति नहीं है जो एक ही दिन में बन कर तैयार हो जाए। भाजपा को अब ऐसे नेताओं का जवाब देने की ज़रूरत नहीं पड़ती। भाजपा को परेशानी तभी होती है जब ऐसे नेताओं के बयानों के साथ मीडिया का एक गिरोह विशेष खड़ा हो जाता है। इसी तरह अखिलेश यादव, फ़ारुख़ अब्दुल्ला सहित कई नेताओं ने एयर स्ट्राइक के सबूत माँगे। जैसे-जैसे उनके बयान आते गए, जनता की नज़र में वे उतने ही गिरते चले गए।

दरअसल, सबूत माँग-माँग कर इन नेताओं का लोकल मुद्दों से ध्यान ही भटक गया है। अखिलेश अब उत्तर प्रदेश के गाँव-कस्बों की बातें नहीं करते, वे अब एयर स्ट्राइक से लेकर राफेल तक की बात करते हैं। ममता बनर्जी बंगाल के बिना रह नहीं सकती, इसीलिए उन्होंने बंगाल को ही अखाड़ा बना डाला और वहाँ अपनी प्रधानमंत्री की मज़बूत दावेदारी पेश कर रैलियाँ कर रही हैं। अरविन्द केजरीवाल ने तो खैर कभी दिल्ली की बात की ही नहीं। तेजस्वी यादव अब सामान्य वर्ग के ग़रीबों को मिले आरक्षण के ख़िलाफ़ बोल कर अपना किला मज़बूत करना चाहते हैं। देवेगौड़ा को भी अब सीमा पर तनाव की चिंता सताती है। नायडू को मोदी के पिच पर खेलने दिल्ली आना पड़ता है।

लोकल मुद्दों से दूर होते विपक्षी नेता

इन सबसे क्या पता चलता है? अगर राजनीतिक विश्लेषक इन सभी घटनाओं और विपक्षी नेताओं के बयानों और प्रदर्शनों पर ध्यान दें तो वे पाएँगे कि अब सभी के सभी भाजपा के पिच पर खेल रहे हैं। इस से भाजपा को पहले तैयारी करने का मौक़ा मिल जाता है कि उसके नेताओं व प्रवक्ताओं को किस मुद्दा विशेष के लिए तैयार रहना है। किसानों के नाम पर राजनीति कर आगे बढ़ने वाला नेता पाकिस्तान की बात करे और दक्षिण भारत का कोई नेता यूपी में हुई घटना के लिए मोदी को घेरे तो पता चल जाता है कि भाजपा ने उन्हें उनके लोकल मुद्दों से काफ़ी दूर कर दिया है।

भाजपा को पता है कि मोदी की आज जो इमेज है, सबकुछ उसी पर टिका हुआ है। मोदी पर चौतरफा हमला कर के आज तक नेताओं को निराशा ही हाथ लगी है। सोनिया गाँधी के एक आपत्तिजनक टिप्पणी को मोदी ने गुजराती अस्मिता से जोड़ कर वहाँ का चुनाव जीत लिया था। विपक्षी नेताओं द्वारा मोदी को चौतरफा आक्रमण का केंद्र बना दिया गया है। भाजपा के लिए यह स्थिति पहले मुश्किल थी लेकिन अब यह ठीक प्रतीत हो रहा है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि भाजपा को पता चल गया है कि ऐसे बेहूदा बयानों से मोदी का कद बढ़ता है और उनका बाल भी बाँका नहीं होता। इसके उलट भाजपा के ज़मीनी व लोकल नेतृत्व को बिना कोई आक्रमण झेले ग्राउंड जीरो पर काम करने का मौक़ा मिल रहा है।

ग्राउंड जीरो पर कार्य कर रही भाजपा

भाजपा ने बिना हो-हल्ला के पीयूष गोयल को तमिलनाडु का प्रभारी बनाया और वे अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन फाइनल कर के आ गए। इसके उलट कॉन्ग्रेस को यूपी के महागठबंधन में साइड कर दिया गया और कॉन्ग्रेस ने दिल्ली में केजरीवाल को तन्हा कर दिया। चुनाव पूर्व गठबंधन बदलने-बिगड़ने के इस दौर में भाजपा ने बड़ी चालाकी से विपक्षी नेताओं को राष्ट्रीय मुद्दे पर बयान दिलवा दिलवा कर उन्हें जनता के आक्रोश के आवेश में फेंक दिया। जिस भी नेता का बेहूदा और बेतुका बयान आता है, सोशल मीडिया उसे लताड़ने में देर नहीं करता। वहीं अमित शाह राज्यों में घूम-घूम कर भाजपा का संगठन मज़बूत कर रहे हैं। पीएम मोदी रैलियाँ व बूथ कार्यक्रम कर जनता से सीधे जुड़ रहे हैं।

समय के साथ भाजपा की इस बदली रणनीति में विपक्षी नेता इतने मशगूल हो चुके हैं कि सबमे पीएम बनने की कहत दौड़ गई है। अपने-आप को सुपीरियर मान कर सभी अप्रत्यक्ष रूप से पीएम पद पर दावा ठोक रहे हैं। ये विपक्षी नेतागण जितना किसान,माध्यम वर्ग और ग़रीबों से जुड़े मुद्दों से दूर होकर राफेल, पाकिस्तान और 56 इंच की बातें करेंगे- भाजपा को उतना ही फ़ायदा मिलेगा। शाह का चक्रव्यूह अभी भी रचना के क्रम में है और फाइनल रणनीति तो चुनाव नज़दीक आने तक पता चल ही जाएगी।

नेता सबूत माँगते रहेंगे, भाजपा ज़मीन पर पैठ बनाती रहेगी। मोदी-शाह की जोड़ी ने सरकार और पार्टी को अलग-अलग फ्रंट पर खिला कर विपक्षियों को सम्मोहन के उस जाल में जकड़ लिया है, जहाँ उनकी कुटिलता का जनता यूँ हिसाब कर देती है। अभी देखते जाइए, कल फिर कोई नेता सबूत माँगेगा और उसके 2-3 दिन बाद उसीके इलाक़े में मोदी की रैली होगी। यानी भाजपा के दोनों हाथों में लड्डू।

बालाकोट एयर स्ट्राइक में निशाने पर लगे 80% बम, IAF ने मोदी सरकार को सौंपे सबूत

पुलवामा आत्मघाती हमले का बदला लेने के लिए, 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने बालाकोट में पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद के ठिकानों पर हवाई हमले किए। तभी से कॉन्ग्रेस पार्टी और कुछ अन्य तथाकथित लिबरल पत्रकारों ने हवाई हमलों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।

अब एयर स्ट्राइक पर एक बड़ा अपडेट सामने आया है कि बुधवार (मार्च 6, 2019) को वायु सेना ने केंद्र सरकार को एयर स्ट्राइक से जुड़े सभी दस्तावेज सौंप दिए हैं। इन सबूतों में एयर स्ट्राइक की तस्वीरें भी शामिल हैं। साथ ही इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि किस तरह उनके अधिकतर निशाने अचूक रहे हैं।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट है कि भारतीय वायु सेना ने मोदी सरकार को, भारतीय वायु क्षेत्र में उड़ान भरने वाले एक खुफिया विमान प्लेटफ़ॉर्म से एकत्र किए गए ‘हाई-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरों’ और ‘सिंथेटिक एपर्चर रडार’ इमेजरी के 12 पृष्ठ की रिपोर्ट IAF द्वारा किए गए हवाई हमले के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।

इंडिया टुडे के शिव अरूर ने बताया कि इंडियन एयर फोर्स के मिराज-2000 फाइटर जेट्स, जिसने बालाकोट में आतंकी अड्डों को उड़ाया था, भारतीय वायुसेना ने इस एयरस्ट्राइक के दौरान ‘Israeli Spice 2000 precision bombs’ का प्रयोग किया। यह बम “penetration warheads” से सुसज्जित था, अर्थात हर बाधा को पार करते हुए सीधा, अचूक निशाना।

वायु सेना की रिपोर्ट के अनुसार बालाकोट में उनके 80% निशाने सही लगे हैं। जिन बमों को दागा गया वह वहाँ मौजूद बिल्डिंगों के सीधे अंदर गए हैं। यही कारण है कि जो भी तबाही हुई है वह अंदर ही हुई है।

रिपोर्ट की मानें तो जिन मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ है, उन्होंने सीधे छत को भेदा और अपने टारगेट पर वार किया। एयर फोर्स की इस रिपोर्ट के अनुसार बालाकोट में मौजूद सभी टारगेट को तबाह कर दिया गया है।

बता दें कि 26 फरवरी को की गई एयर स्ट्राइक के बाद से ही इसके सबूत सामने रखने की बात शुरू हो गई थी। पाकिस्तान लगातार यह दावा कर रहा था कि उनका कोई नुकसान नहीं हुआ है, सिर्फ कुछ पेड़ ही गिरे हैं। हालाँकि, जब पेड़ ही गिरे हैं तो पाकिस्तान में  भारतीय सेना को लेकर इतनी दहशत क्यों है, इसका जवाब पाकिस्तान ने नहीं दिया।

जबकि, वायु सेना ने अपने आधिकारिक बयान में कहा था कि उनका मिशन पूरी तरह से सफल रहा है, ऐसे में सबूतों को सामने रखने का फैसला सरकार को ही करना है। वायु सेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने कहा था कि अगर पाकिस्तान का कुछ नुकसान नहीं हुआ है तो उनकी वायु सेना हमारे इलाके में क्यों आई और वहाँ इस तरह की हलचल क्यों है?

ज्ञात हो कि यह पहली बार नहीं है, इससे पहले 2016 में जब सर्जिकल स्ट्राइक हुआ था तब भी विपक्ष की बयानबाजी ऐसे ही जारी रही, जिसका पाकिस्तान ने अपने समर्थन में खूब फ़ायदा उठाया। इस बार भी विपक्ष के कई नेता इस बात की माँग कर चुके हैं कि केंद्र सरकार को पाकिस्तान में की गई एयर स्ट्राइक के सबूतों को सामने रखना चाहिए।

कॉन्ग्रेस की ओर से दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी के अलावा एनडीए में बीजेपी की साथी शिवसेना ने भी एयर स्ट्राइक की सच्चाई को जनता के सामने रखनी की बात कही थी। कुछ लिबरल पत्रकारों और अर्बन नक्सल ने भी एयरस्ट्राइक के बाद सबूत माँगे थे, जिसका प्रयोग इस बार भी पाकिस्तान अपने समर्थन में करने से नहीं चूका। हालाँकि, सरकार की ओर से हर बार कहा गया कि विपक्षी पार्टियाँ सेना का मनोबल गिराने का काम रही हैं।

कर्मचारियों के विवादित टिप्पणी के लिए फेसबुक ने संसदीय समिति से मांगी माफी, 10 दिन में देगा जवाब

आगामी लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर सरकार बेहद सतर्कता से काम ले रही है। सूचना प्रोद्यौगिकी पर बनी संसद की स्टैंडिंग कमिटी ने फेसबुक, व्हॉट्सएप और इंस्टाग्राम के अधिकारियों से सीधे शब्दों में कहा है कि चुनाव, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों के डेटा की सुरक्षा देश की पहली प्राथमिकता है। कंपनी से इस विषय पर 10 दिन के भीतर लिखित जवाब सौंपने को कहा है। संसदीय स्टैंडिंग कमिटी ने फेसबुक के अधिकारियों से पूछा, “आपका मंच समाज के काम आ रहा है या समुदायों को बांटने का काम कर रहा है?”

इस पर फेसबुक ने कहा कि वो एक हायब्रिड कंपनी है। फेसबुक की सामग्री, विज्ञापन और मार्केटिंग से जुड़े कामकाज पर कौन सी नीतियाँ लागू होती हैं, इसका जवाब देने में कंपनी असमर्थ रही। पेशी के दौरान फेसबुक के वैश्विक नीति प्रमुख ने अपने कुछ कर्मचारियों द्वारा पुलवामा हमले और आतंकवाद को लेकर की गई असंवेदनशील टिप्पणियों पर स्टैंडिग कमिटी से माफी भी माँगी।

कमिटी के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने कहा, “हमने उनसे कहा वो ये सुनिश्चित करें कि उनके मंच का इस्तेमाल समाज को बांटने, हिंसा भड़काने, भारत की सुरक्षा से खिलवाड़ या विदेशी ताकतों के भारतीय चुनाव में दखल को लेकर न हो। उन्होंने माना कि कुछ सुधारों की जरूरत है और वो उसके लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा है कि वो चुनाव आयोग के संपर्क में रहेंगे और संबंधित मंत्रालयों की सूचना पर काम करेंगे।”

इससे पहले 25 फरवरी को ट्विटर के कॉलिन क्रॉवेल भी अनुराग ठाकुर की अध्यक्षता वाले पैनल के सामने पेश हो चुके हैं। पैनल ने ट्विटर अधिकारियों से, चुनाव आयोग के साथ मिलकर काम करने को कहा है। उनसे तमाम मुद्दों को जल्द से जल्द सुलझाने को कहा गया है।

एंटोनी साहब, आपने राष्ट्रहित नहीं, ‘कॉन्ग्रेस-हित’ के कारण राफेल सौदे में देरी की

भारत के पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने राफेल सौदे को लेकर ऐसा बयान दिया है, जो उनके ही 2014 वाले बयान को काटता है। एंटोनी ने आज दो बातें कही। उन्होंने कहा कि राजग सरकार ने राफेल सौदे में देरी की। उन्होंने ख़ुद के बारे में कहा कि उन्होंने भी इस सौदे में देरी की। लेकिन, बड़ी सफाई से उन्होंने ख़ुद के फ़ैसले को ‘राष्ट्रहित’ से जोड़ दिया। बकौल एंटोनी, उन्होंने राष्ट्रहित में राफेल सौदे में देरी की। ये नेशनल इंटरेस्ट से ज्यादा कॉन्ग्रेस इंटरेस्ट प्रतीत होता है। अगर राफेल सौदा उसी समय निपट गया होता तो शायद आज राहुल गाँधी के पास केंद्र सरकार का विरोध करने के लिए कोई मुद्दा ही नहीं होता। अगर राफेल हमारे पास होता तो आज भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच एक अहम रोल निभाता।

जब सत्ता में थे, तब अलग ही सुर अलापा था

स्वयं तत्कालीन केंद्रीय रक्षा मंत्री एंटोनी ने 2014 में यह स्वीकार किया था कि यूपीए सरकार के पास वित्त की कमी है, जिस कारण वे चालू वित्त वर्ष में राफेल सौदे को आगे नहीं बढ़ा पाएँगे। फरवरी 6, 2014 को ज़ी न्यूज़ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में एंटोनी के बयान का जिक्र था। उस रिपोर्ट में कहा गया था:

“पाँच साल की लंबी प्रक्रिया के बाद भारत ने राफेल लड़ाकू विमानों के लिए फ्रांसीसी दसौं एवियेशन का चयन किया किया है। भारतीय रक्षा ख़रीद प्रक्रिया के अनुसार जो कम्पनियाँ सेनाओं की विशिष्ट आवश्यकता और निर्धारित मानकों पर खरे साजो-सामान को सबसे सबसे कम क़ीमत पर पेशकश करने को तैयार होती है उन्हें उसकी आपूर्ति का ठेका दिया जाता है।”

नीचे संलग्न किए गए ट्वीट में एंटोनी का 2014 वाला वीडियो है जिसमे वे राफेल में देरी का कारण वित्तीय कमी को बता रहे हैं।

जिस कम्पनी का चयन यूपीए काल में ही हो चुका था, उसे लेकर अब हो-हंगामा मचाया जा रहा है। एक और ग़ौर करने वाली बात यह है कि आज के हिट-जॉब विशेषज्ञ अख़बारों और मामले को बिना समझे कुछ भी आक्षेप लगाने वाले नेता राजग सरकार द्वारा फाइनल की गई राफेल डील की तुलना उस डील से कर रहे हैं, जो कभी मूर्त रूप ले ही न सकी। यूपीए काल के दौरान ये डील ‘नेगोशिएशन स्टेज’ में थी जिस पर काफ़ी सुस्त काम हो रहा था। मोदी सरकार ने सारी प्रकिया पूर्ण कर इसे मूर्त रूप प्रदान किया। इस तरह एक अपूर्ण डील से एक पूर्ण डील की तुलना की जा रही है।

कर के दिखाना सबसे मुश्किल कार्य होता है

बहुत आसान होता है किसी ऐसी चीज से तुलना करना, जो कभी अस्तित्व में भी न आई हो। ‘तुमने ऐसा किया, लेकिन मैंने तो वैसा कर दिया था’, ”तुमने इत्ते रुपए ख़र्च कर दिए, मैं तो बस इतने ही ख़र्च करने वाला था।’- यह सब बोल कर डींगें हाँकना बड़ा आसान है। मुश्किल है कर के दिखाना, जो राजग सरकार ने किया। उस समय धन की कमी की बात कहने वाले एंटोनी आज देरी पर राष्ट्रहित का बहाना मार रहे हैं। आपने देरी की तो राष्ट्रहित हो गया, किसी ने उसे पूरा कर दिया तो वो राष्ट्रविरोधी हो गया। वाह रे कॉन्ग्रेसी लॉजिक।

कॉन्ग्रेस ने मीडिया के एक वर्ग से लेकर अन्य सत्तालोलुप विपक्षी पार्टियों तक- सबको राफेल के रूप में एक ऐसा हथियार थमा दिया है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामले के साथ खिलवाड़ है। मीडिया लगातार हिटजॉब में संलग्न है और रक्षा मंत्रालय के काग़ज़ात चुराए जा रहे हैं। नेतागण न्यायपालिका को ही बुरा-भला कह रहे हैं। कैग सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं की रिपोर्ट्स की धज्जियाँ उड़ाई जा रही है। यह सबकुछ सिर्फ़ और सिर्फ़ राफेल विमान सौदे के राजनीतिकरण के कारण हो रहा है, जिसकी जिम्मेदार कॉन्ग्रेस है।

सबसे बड़ा विरोधाभास यहीं प्रकट होता है। कॉन्ग्रेस द्वारा राफेल सौदे पर आक्षेप लगाने का आधार है कि नरेंद्र मोदी ने कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा नेगोशिएट की गई डील को बदल दिया। उन्होंने विमानों की संख्या घटा दी और प्रति राफेल विमान ज्यादा दाम दिए। एंटोनी का कहना है कि उन्होंने जान-बूझ कर राष्ट्रहित में डील में देरी की। जब डील में देरी हो रही थी तो कॉन्ग्रेस का ये आरोप कहाँ तक सही है कि उसे बदल दिया गया? उसी यूपीए सरकार ने वित्तीय संकट का बहाना मार कर राफेल सौदे को अगले वित्त वर्ष के लिए टाल दिया था और आज वही कॉन्ग्रेस विपक्ष में बैठ कर डील को बदल देने के आरोप मढ़ रही है।

अब सौदों में कोई मामा-फूफा दलाल शामिल नहीं होता

क्या कॉन्ग्रेस को इस बात की चिंता सता रही है कि राफेल सौदे में पार्टी के प्रथम परिवार से जुड़ा कोई मामा या फूफा नहीं शामिल नहीं है? क्या दलालों के बिना सौदे का सफलतापूर्वक संपन्न हो जाना पार्टी को अखर रहा है? जहाँ दुनिया भर के देश रक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार और सेना के साथ खड़े होते हैं, यहाँ एक महत्वकांक्षी रक्षा सौदे को ही राजनीति में घसीट लाया गया।

ऐसे कई प्रोजेक्ट्स हैं जिसे कॉन्ग्रेस द्वारा शुरू किया गया था लेकिन उसे मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद ही पूरा किया जा सका। इसमें से कुछ प्रोजेक्ट्स तो ऐसे हैं जिन्हे नेहरू के प्रधानमंत्री रहते शिलान्यास किया गया था (जैसे- नर्मदा डैम)। उसे पूरा होने में पाँच दशक से भी अधिक लगे। क्या समय के साथ उनकी बनावट और योजना के स्वरूप में बदलाव नहीं आता? सालों से नेगोशिएट हो रही राफेल डील में अगर कुछ बदलाव कर उसे पूर्ण किया गया है तो इसमें दिक्कत क्या है? सितम्बर 2018 में मिन्हाज मर्चेंट के एक लेख में इस बारे में विस्तृत रूप में बताया गया था।

कौन है संजय भंडारी? कहाँ है वो?

इस लेख में उन्होंने बताया था कि कैसे रॉबर्ट वाड्रा से जुड़ी एक कम्पनी ने 2012 में राफेल ऑफसेट करार के लिए आवेदन दिया था। दसौं ने उसे अयोग्य पाया और रिजेक्ट कर दिया। क्या एंटोनी बताएँगे कि उस कम्पनी का मालिक संजय भंडारी आज कहाँ छिपा हुआ है? दरअसल, वह अब एक भगोड़ा है जिसकी तलाश भारतीय एजेंसियों को है। ऐसे लोगों के इस करार में शामिल न हो पाने से कॉन्ग्रेस बेचैन है। उसके हाथ से 2जी, कोलगेट, कॉमनवेल्थ की तरह एक और सोने की चिड़िया हाथ लग सकती थी लेकिन सत्ता परिवर्तन ने उन्हें हिला कर रख दिया है।

हमारी देरी राष्ट्रहित और आपकी गति भी राष्ट्रविरोधी! केरल के मुख्यमंत्री रहे एके एंटोनी को अक्सर कॉन्ग्रेस के ईमानदार नेताओं में से एक माना जाता है। वैसे ईमानदार, डॉक्टर मनमोहन सिंह भी रहे। अगर किसी मुद्दे को झूठ के आधार पर जबरदस्ती घसते रहने से वह घोटाला बन जाता है तो कॉन्ग्रेस को यह प्रयोग मुबारक। इस चक्कर में सरकार को घेरने के लिए जो असली ज़मीनी मुद्दे हैं, उनसे वो दूर होते जा रहे हैं।

राहुल, सोनिया, प्रियंका के तिलक से डर नहीं लगता साहब, डर तो असली हिन्दुओं का है: सिद्धारमैया

मुद्दाविहीन कॉन्ग्रेस का न रफ़ाल चला और न ही अन्य कोई सॉलिड मुद्दा मिला जिससे मोदी को घेरा जाए, रही सही कसर एयर स्ट्राइक ने पूरी कर दी, फिर भी घूम-फिरकर लगातार बेकार बयानों से ही चुनावी माहौल गर्माने की कोशिश जारी है।

ख़ैर, ताजा मामला कर्नाटक के पूर्व कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का है। उन्हें अब तिलक और भभूत लगाए सामान्य हिन्दुओं डर लगने लगा है। अपने तथाकथित डर को कर्नाटक के बदामी के एक कार्यक्रम में ज़ाहिर करते हुए सिद्धारमैया ने कहा, “मुझे उन लोगों से बहुत डर लगता है जो कुमकुम और भस्म का लम्बा टीका लगाते हैं।”

हालाँकि, ऐसा कहते हुए सिद्धारमैया अपनी ख़ुद की तिलक लगाने की घटना भूल जाते हैं। या उन्हें अपनी ही पार्टी के अन्य आलाकमान नेता याद नहीं आते जो ख़ुद को जनेऊधारी रामभक्त और शिवभक्त साबित करने के लिए लगातार लम्बा टीका लगाए घूम रहे हैं।

लम्बा टीका लगाए स्वयं सिद्धारमैया

नीचे उनकी ही पार्टी कॉन्ग्रेस के आलाकमान नेताओं की कुछ तस्वीरें हैं, जिसे आप देख सकते हैं। अभी तक सिद्धारमैया का इस पर कोई बयान नहीं आया है कि अपने ही पार्टी के इन नेताओं के लम्बे टीके को देखकर उन्हें कैसा लगता है?

पार्टी की सर्वेसर्वा सोनिया गाँधी
प्रियंका गाँधी
मंदिर-मंदिर टहलते लम्बा टीका लगाए कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी
टीकाधारी राहुल गाँधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ

यह सभी तस्वीरें वास्तविक हैं। फ़िलहाल, देखना यह है कि सिद्धारमैया अब अपने बयान पर कायम रहते हैं या अब अपने ही पार्टी के नेताओं के लम्बे टीके को देखते हुए, उनसे भी डरना शुरू कर देते हैं।

टीवी ने रवीश को जो काम था सौंपा, इस शख़्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी (भाग २)

पत्रकारिता के साथ ही, तमाम तरह की नौकरियों और व्यवसायों में एथिक्स का एक हिस्सा होता है। एथिक्स यानी नैतिकता। पत्रकारिता में नैतिक तो ख़ैर बहुत ही कम लोग हैं, और जो हैं उनके नाम कोई नहीं जानता। लेकिन, कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने इस चैप्टर पर किरासन तेल डालकर आकर लगाया और 2014 की जलती गर्मियों में तन-बदन सेंक लिया। ऐसी गर्मी में आग से देह सेंका और शरीर जलने पर मोदी को गरियाना शुरु किया, जो अभी तक नहीं रुका है। 

पिछले लेख की कड़ी से आगे बढ़ते हुए, दूसरे हिस्से में हम बात करेंगे कि किस तरह से रवीश कुमार ने अपनी पूरी स्पीच के दौरान एक के बाद एक लगातार ऐसे झूठ बोले जो कि किसी भी तर्क, सर्वेक्षण या आँकड़ों पर आधारित नहीं है, बल्कि वह एक विचार है जिसकी बुनियाद में खोखलापन है। आप कहेंगे कि आदमी विचार रखने को स्वतंत्र है। आप सही कह रहे हैं, लेकिन जो व्यक्ति एक ऊँचे प्लेटफ़ॉर्म से झूठ बोलता है, तो वो महज़ अभिव्यक्ति नहीं रह जाती, वो अजेंडा या प्रोपेगेंडा कहलाता है।

रवीश का अजेंडा किसी से छुपा नहीं है: अजेंडा और प्रोपेगेंडा चिल्लाते हुए खुद ही गोएबल्स की नीति का अनुसरण करना। उन्होंने कहा कि मीडिया में लगातार एक नज़रिया बनाया जा रहा है कि ‘देश में ही ग़द्दार छुपे हुए हैं’। उनका इशारा इस तरफ था जहाँ सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया में पाकिस्तान की तरफ़दारी करने वाले लोगों को आम जनता और कुछ एंकर ग़द्दार कहते नज़र आते हैं। 

ये होता है, और आम जनता की भावना पाक अकुपाइड पत्रकारों के लिए कमोबेश यही रही है। लेकिन हाँ, ग़द्दार कहना गलत है। ये लोग ग़द्दार नहीं हैं। ग़द्दार लोगों की ईमानदारी कम से कम दूसरे देश के लिए तो होती है, ये लोग ठीक से ग़द्दारी भी नहीं कर पा रहे। इनका पूरा फ़ोकस किसी एक व्यक्ति या पार्टी के विरोध में हर वो बात कह देनी है, जिसके कारण विरोध होता रहे। इस विरोध के चक्कर में ऐसे व्यक्ति अपने देश, देश की जनता, वहाँ के लोकतंत्र के चुने हुए प्रधानमंत्री या फिर अपने अंदर के विवेक आदि सब के विरोध में हो जाते हैं। ये अपने आप को विरोध में दिखाकर ही अपनी निष्पक्षता के सिक्के बनाते हैं, जबकि विरोध में होना ही आपको निष्पक्ष नहीं बनाता। 

आगे रवीश जी ने भाजपा को अंग्रेज़ों से भी बदतर बताते हुए कहा है कि न्यूज चैनल पर भाजपा का ही अजेंडा चल रहा होता है। यहाँ पर उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 900 न्यूज चैनल हैं, और लगभग सब भाजपा का ही अजेंडा चला रहे हैं। मज़े की बात यह है कि उन्होंने स्वयं ही कहा कि उन्हें तो बस चार-पाँच ही दिखते हैं। फिर ये 900 पर, या जो चैनल खोलिएगा ‘पता चलेगा कि भाजपा का अजेंडा चल रहा है’, का सर्वेक्षण कहाँ से किया?

फिर उन्होंने वही किया जो उन्होंने ‘आपातकाल’ जैसे भयावह दौर के साथ किया। उस समय की भयावहता को इतना नीचे गिरा दिया कि अब ‘आपातकाल’ सुनकर लोग मज़े लेने लगते हैं। रवीश जी ने कहा कि मीडिया में इस तरह का हस्तक्षेप अंग्रेज़ों के दौर में भी नहीं था। ये तर्क इतना बेहूदा और घटिया है कि आप चुप हो जाएँगे। चुप इसलिए हो जाएँगे कि ग़ुलामी के उस दौर को रवीश बेहतर बता रहे हैं जब हमारे सारे संस्थानों को बेकार बनाया गया; बोलने, चलने, इकट्ठा होने की आज़ादी नहीं थी; अख़बारों के संपादकों, प्रकाशकों और लिखने वालों को जेल में डाल दिया जाता था। 

आज रवीश कुमार बिना किसी पुख़्ता तर्क के, बिना किसी आधार के, सरेआम अपनी बात कह रहे हैं, लगभग हर शाम सरकार को कोसते हैं, और फिर भी उन्हें ये दौर अंग्रेज़ों के दौर से भी बदतर लग रहा है। ये किस तरह का प्रोपेंगेंडा है जहाँ ग़ुलामी के दिनों में सकारात्मकता ढूँढी जा रही है? और ऐसे में आपको कोई ग़द्दार या भारत विरोधी कहता है, तो आप ‘डर का माहौल’ करने लगते हैं! ये पत्रकारिता नहीं, लूसिफर को अपनी आत्मा बेचने जैसा कृत्य है।  

“इन्फ़ॉर्मेशन को हटाकर परसेप्शन ला दिया है” कहते हुए रवीश ने अगला ब्रह्मज्ञान दिया। जबकि, ये बात नकारात्मक तो बिलकुल नहीं। हाँ, कुछ लोगों के वन-वे विचारों को अब जवाब मिलने लगा है, और परसेप्शन के खेल में वो अकेले नहीं रह गए, तो इसे अब ऐसे बताया जा रहा है मानो कुछ गलत हो रहा हो। शाम के प्राइम टाइम आखिर किस कार्य के लिए होते हैं? अख़बारों के सम्पादकीय पन्नों पर लिखे गए स्तम्भ क्या हमेशा विश्लेषण ही होते हैं, या उसमें भी नज़रिया होता है?

फिर आज कई चैनल जब अपने विचारधारा को पकड़कर चल रहे हैं तो ऐसी कौन सी आग लग गई? या, माओवंशी कामपंथियों की ये सामंती सोच कि वामपंथ ही एकमात्र सही विचारधारा है, ऐसा मानकर आप लोग चलते रहेंगे? या फिर, आप जैसों को लगता है कि जो स्पेस सिर्फ आप जैसों का था, वहाँ फेसबुक पर पोस्ट लिखने वाले लोग आ गए हैं, और आप से तथ्यों के साथ जिरह करते हैं तो आप उन्हें शाखा जाने को कहते हैं। आखिर शाखा जाने वालों से आपको क्या समस्या है? क्या कुछ प्रचारित वाक्यों का सहारा लेकर आप लोगों की रिडिक्यूल मशीनरी चलती रहेगी, या कभी इस पर कुछ तथ्य भी आएँगे कि शाखा वाले दंगे करा रहे हैं, उन पर केस चल रहा है। और फिर ये भी बताइएगा कि मदरसे वालों पर कितने केस हैं, कितने दंगों के नाम हैं, कितने बम विस्फोट हैं, कितने आतंकी हमले हैं। 

परसेप्शन के खेल में जब आप पिछड़ रहे हैं तो आप नई शब्दावली रचे जा रहे हैं। आपने कहा कि अब दर्शक नहीं, समर्थक आ गए हैं। आ ही गए हैं, तो क्या दिक्कत है? क्या भारत की तमाम जनता के दिमाग में रवीश कम्पनी का चिप लगा दिया जाए कि भैया आप देखिए सब, लेकिन सोचिए वही जो रवीश कहेंगे। ज़ाहिर तौर पर आप मीडिया की वर्तमान स्थिति पर क्षुब्ध हैं क्योंकि वहाँ जो आपके गिरोह के लोगों का एकतरफ़ा संवाद चल रहा था, उसे बंद किया जा रहा है। 

आपके अवसाद के स्तर की झलक, और पत्रकारिता छोड़कर हर तरह के बेकार सवालों को उठाते हुए आपने दर्शकों को यह सलाह दी कि लोगों को सवाल पूछना चाहिए। यहाँ तक तो आपका कहा ठीक लगा क्योंकि पत्रकारिता और नागरिकों की चर्चा में सवाल पूछना नितांत आवश्यक बात है। लेकिन आपने जो उदाहरण दिए उससे खीझ और निराशा दिखी, “आप मोदी से सवाल पूछिए कि कितने कपड़े पहने थे, रैलियों के डिज़ायनर कपड़े कहाँ से आते हैं।” 

मतलब, पत्रकारिता जिसे ‘वॉचडॉग’ कहा जाता है, उसके पास मुद्दों के नाम पर मोदी के कपड़ों की क़ीमत की बात बची है? मोदी के कपड़ों की क़ीमत या डिज़ाइनर का नाम जान लेने से समाज या देश का क्या हित हो जाएगा? क्या मोदी नाड़ा वाला धारीदार चड्डी पहनकर घूमे ताकि आपको लगे कि गरीब देश का प्रधानमंत्री ग़रीबों की तरह रहता है? ये कैसे सवाल हैं जो पूछने को उकसा रहे हैं आप?

ये आप इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आपके द्वारा उठाए गए तमाम फर्जी प्रश्नों और प्रोपेगेंडा का कुल जमा निकल कर शून्य ही आया है। आपने जिन ख़बरों को अपने इंटरव्यू के अगले हिस्से में कालजयी टाइप का स्टेटस दिया है, उनमें से एक भी भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रांगण में टिक नहीं सके। इसीलिए आप बहुत ही सहजता से कोर्ट पर भी उँगली उठा गए कि आखिर जजों ने आपके फ़ेवरेट पत्रकारों और संस्थानों पर किए गए मानहानि के दावों पर केस को मान्यता ही क्यों दे दी? मतलब, आप यही कहना चाह रहे हैं कि सारी संस्थाएँ बर्बाद हैं क्योंकि वो आपके गुर्गों की पत्रकारिता पर होते सवालों पर चर्चा करने को तैयार हैं?

आपकी स्थिति दयनीय होती जा रही है। आप उन बातों के लिए दूसरों के घेर कर विक्टिम कार्ड खेल लेते हैं, जो आप हर बार खुद ही करते हैं। आपने पूरे इंटरव्यू के दौरान जो किया, वही कोई और करता है, तो आप विलाप की स्थिति में आ जाते हैं। ये पब्लिक स्पेस है, सोशल मीडिया है, जहाँ किसी को कुछ पसंद नहीं आता तो वो बोलता है कि आप कॉन्ग्रेस का अजेंडा चला रहे हैं, कोई नक्सली है, कोई अर्बन नक्सल है। 

ये लोकतंत्र है, इसमें हर व्यक्ति की अभिव्यक्ति का मूल्य बराबर है। आपने बहुत ख़ूबसूरती से ये कह दिया था कि मानहानि सवा रुपए की होनी चाहिए सबकी, चाहे वो अम्बानी हों या रवीश। फिर अभिव्यक्ति के मामले में आपकी अभिव्यक्ति किसी सामान्य नागरिक की अभिव्यक्ति से ऊपर कैसे हो जाएगी? आपको लगता है कि जो ज्ञानधारा आप बहाते हैं, वही निर्मल है, और आम जनता सीवेज़ का पानी फेंक रही है। 

आप दिन में हर बारहवें साँस पर आईटी सेल बोल देते हैं, किसी को शाखा भेज देते हैं, मोदी का अजेंडा कहते रहते हैं, तो फिर उन लोगों से भिन्न कैसे हैं जो किसी को कॉन्ग्रेसी अजेंडा चलाने वाला, नक्सल या शहरी नक्सल कहता है? 

ऐसे काम नहीं होता साहब, सोशल मीडिया ने सबको आवाज दी है। हर व्यक्ति सवाल कर सकता है। मोदी से भी सवाल होंगे, आपसे भी होंगे। सवाल पूछने की, उसे डिज़ाइन करने की, उसे बार-बार दोहराने की कलाकारी आपको ही नहीं आती। ‘जाँच करवाने में क्या जाता है’ कहकर आप जिस धूर्तता से ये कह देते हैं, उसके बाद की बात आपको पता है कि सुप्रीम कोर्ट से आगे जाँच हो नहीं सकती और संसदीय समिति के अधिकार क्षेत्र से यह बाहर है। 

आपने इस चर्चा में नैतिकता के जो प्रतिमान तोड़े हैं, उन्हें अगले हिस्सों में लोगों तक लाया जाएगा।