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रवीश कुमार, हम जानते हैं भगवा बंगाल देख आपके अंग विशेष में हो रही जलन, पर बर्नोल नहीं हैं विजय; क्योंकि BJP बनाम TVK नहीं था तमिलनाडु का यह चुनाव

तमिलनाडु में 50 साल से अधिक चला आ रहा द्रविड़ राजनीति (DMK/AIADMK) का वर्चस्व कमजोर पड़ गया है। क्योंकि इस बार विधानसभा चुनाव 2026 में एक्टर जोसेफ विजय चेंद्रशेखर की पार्टी तमिझागा वेट्री कजगम (TVK) यानी तमिलनाडु विजय पार्टी ने 35% (लगभग 1.7 करोड़ वोट) वोट शेयर से डेब्यू कर तमिलनाडु में नया अध्याय लिखा है। अब विजय और उनकी पार्टी TVK की इस जीत पर प्रोपेगेंडा पत्रकार और यूट्यूबर रवीश कुमार ने नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की है।

बंगाल में BJP की जीत के बाद रवीश कुमार तमिलनाडु के नतीजों में अपनी खुशी तलाश रहे हैं, जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 3% वोट शेयर भी नहीं मिला, वहाँ भी ‘BJP को हराने’ वाला प्रोपेगेंडा चला रहे हैं। उन्होंने तमिलनाडु में विजय की जीत पर पूरी वीडियो बनाई है और नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की कि कैसे तमिलनाडु में BJP का विरोध कर विजय चुनाव जीत गए। विजय की जीत को रवीश कुमार ने तमिलनाडु की जनता में BJP के खिलाफ रोष के रूप में पेश किया। यहाँ तक कि यह साबित करने में लगे रहे कि तमिलनाडु का अगला ‘ईसाई’ मुख्यमंत्री BJP से नफरत करता है।

विजय की जीत और उनकी पार्टी की BJP के खिलाफ नफरत बताते हुए रवीश कुमार कहते हैं, “पहली बार ईसाई मुख्यमंत्री बनेगा। धर्मनिर्पेक्ष छवि बनाने वाले विजय पर तमिलनाडु की जनता ने जाति और धर्म के आधार के बगैर साथ दिया।” वे बताते हैं कि कैसे विजय बार-बार कहते रहे कि वह BJP के साथ नहीं जाएँगे, क्योंकि उनकी विचारधारा BJP से मेल नहीं खाती है।

रवीश कुमार बताते हें कि विजय मानते हैं, “BJP द्रविड़ विरोधी राजनीति करने वाली पार्टी है। BJP तमिलनाडु की धर्मनिर्पेक्षता की राजनीति के मूल्यों के खिलाफ है। विभाजनकारी राजनीति करती है। फासीवादी पार्टी है, इसीलिए उसके साथ कभी गठबंधन नहीं करेंगे क्योंकि यह उनके आत्मसम्मान के खिलाफ है।” रवीश कुमार कहते हैं कि विजय ने BJP से दूरी बनाई है।” और रवीश का मानना है कि तमिलनाडु में BJP का विरोध करते हुए एक नई पाटी सत्ता तक पहुँच गई।”

दरअसल, विधानसभा चुनाव 2026 में विजय की पार्टी 234 सीटों पर अकेले चुनावी मैदान में उतरी और 108 सीटों पर जीत दर्ज की। लेकिन बहुमत के लिए आँकड़ा पूरा नहीं है। विजय की पार्टी को सरकार बनाने के लिए 10 सीटें और चाहिए होंगी। रिपोर्ट्स में सामने आया है कि विजय के फादर और फिल्म निर्माता एसए चंद्रशेखर ने कॉन्ग्रेस को गठबंधन का खुला न्योता दिया है। उधर, BJP ने खुद द्रविड़ राजनीति करने वाली AIADMK के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा, जिसमें BJP केवल एक सीट पर जीती और AIADMK 47 सीटों पर।

प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार ने विजय की जीत को BJP विरोध का रंग देकर अपनी पुरानी आदत दोहराई है, लेकिन हकीकत में यह चुनाव BJP बनाम TVK कभी था ही नहीं। विजय ने BJP को ‘विभाजनकारी‘ और ‘फासीवादी’ कहकर दूरी बनाई तो सही, पर द्रविड़ियन राजनीति को खत्म करने के लिए। विजय ने DMK-AIADMK से अलग होकर एक स्वतंत्र पार्टी बनाई।

विजय अपनी राजनीतिक विचारधारा सेकुलर सोशल जस्टिस, सामाजिक न्याय, समानता और राज्य स्वायत्ता जैसे मूल्यों को बताते चुनाव लड़े। विजय BJP को अपना वैचारिक विरोधी बताते रहे और DMK को अपना राजनीतिक प्रतिद्वंदी कहते रहे, लेकिन यह भी देखा गया कि TVK की मूल विचारधारा, जो द्रविड़ियन को बचाने का दावा करती है, वह खिसकते नजर आई। क्योंकि विजय पेरियार जैसे द्रविड़ विचारकों को वैचारिक स्तंभ मानते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि विजय की पार्टी TVK द्रविड़ विचारधारा और तमिल राष्ट्रवाद का मिश्रण है।

उधर, एक ओर रवीश कुमार अपनी वीडियो में विजय की धर्मनिर्पेक्ष छवि पर बात करते हैं, तो दूसरी ओर विजय को अगला ‘ईसाई’ मुख्यमंत्री बताकर अपना नैरेटिव ध्वस्त करते हैं। यह सच है कि विजय ईसाई हैं, लेकिन उन्होंने अब तक राजनीति में धर्म को आगे नहीं रखा, जो कि BJP की हिंदुत्व पॉलिटिक्स से टकराता भी है और तमिलनाडु की सेकुलर ग्राउंड रियलिटी से मेल खाता है। पर BJP को राज्य में 2.9% से वोट शेयर मिला है, तो यहाँ भी विजय की BJP से ‘लड़ाई’ जैसी कोई बात है ही नहीं।

असल में विजय और उनकी पार्टी की जीत को तमिलनाडु में 50 से ज्यादा साल से स्थापित द्रविड़ राजनीति को चुनौती देते हुए नए विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, जो पेरियार के मूल्यों पर चलती है लेकिन स्वीकार नहीं करती। विजय की यह जीत असल में भ्रष्टाचार से तंग जनता, युवाओं और उनके कट्टर फैन क्लब्स की है, जिसने एक ‘नॉन-पॉलिटिकल’ चेहरे को मंदिर, मस्जिद और गिरजाघरों में जाते देखकर सीधे सत्ता के करीब पहुँचा दिया। आखिरकार विजय ने द्रविड़ राजनीति को कमजोर तो किया, पर अपनी मूल विचारधारा को छिपा नहीं सके।

रवीश कुमार जैसे प्रोपेगेंडाबाज पत्रकार यह जानने में असमर्थ होंगे, क्योंकि उनके नैरेटिव में सबसे पहला शब्द BJP आता है। जहाँ 5 राज्यों में से असम, बंगाल और पुडुचेरी समेत 3 राज्यों में BJP ने प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई, तब रवीश कुमार ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता के लिए BJP की जीत या विरोधियों की हार पर एक भी विश्लेषण करना जरूरी नहीं समझते। इन राज्यों में BJP की जीत से जलन होने लगी, इसीलिए वे तमिलनाडु में विजय की जीत को ‘बर्नोल’ की तरह इस्तेमाल कर प्रोपेगेंडा गढ़ने में लग गए।

अटलांटिक में ‘डेथ क्रूज’ बना MV होंडियस, हंता वायरस ने ली 3 की जान: जानें- आखिर कितना खतरनाक है यह संक्रमण, WHO ने जारी की ग्लोबल एडवाइजरी

अटलांटिक महासागर की लहरों के बीच एक आलीशान सफर उस समय खौफनाक मंजर में बदल गया, जब एक लग्जरी क्रूज शिप पर ‘हंता वायरस’ ने हमला कर दिया। MV होंडियस नाम के इस जहाज पर सवार 155 लोगों के लिए यह छुट्टियाँ किसी बुरे सपने जैसी बन गई हैं।

अब तक इस वायरस की चपेट में आने से 3 यात्रियों की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप मचा हुआ है।

लग्जरी क्रूज पर मातम का साया

यह दुखद वाकया ‘MV होंडियस‘ नाम के एक आलीशान जहाज का है। लोग लाखों रुपए खर्च करके अटलांटिक महासागर की सैर पर निकले थे। जहाज 20 मार्च को अर्जेंटीना से रवाना हुआ और उसे 4 मई को केप वर्डे पहुँचना था।

लेकिन बीच रास्ते में ही अचानक लोग बीमार पड़ने लगे और पता चला कि जहाज पर खतरनाक इन्फेक्शन फैल गया है। अब हालात ये हैं कि जहाज समुद्र के बीचों-बीच फँसा हुआ है और उसे किनारे पर आने की इजाजत नहीं मिल रही। जहाज पर सवार यात्री बुरी तरह डरे हुए हैं और उन्हें नहीं पता कि वे कब सुरक्षित अपने घर पहुँच पाएँगे।

मौत का सिलसिला और दहशत

इस वायरस की चपेट में सबसे पहले हॉलैंड के रहने वाले एक बुजुर्ग व्यक्ति आए, जिनकी 11 अप्रैल को जहाज पर ही मौत हो गई। उनके बाद उनकी पत्नी की भी तबीयत बिगड़ी और दक्षिण अफ्रीका के अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने भी दम तोड़ दिया। जाँच में पुष्टि हुई कि उन्हें हंता वायरस था।

अब तक इस संक्रमण से तीन लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें एक जर्मनी का नागरिक भी शामिल है। जहाज पर मौजूद 155 लोगों में से कई और यात्रियों में भी इसके लक्षण दिख रहे हैं। हालत इतनी खराब है कि क्रू मेंबर्स भी बीमार पड़ रहे हैं और दो सदस्यों को सांस लेने में दिक्कत होने की वजह से तुरंत डॉक्टर की मदद लेनी पड़ी है।

इन्फ्लुएंसर की आँखों देखी दास्ताँ

जहाज पर फँसे लोगों की आपबीती जेक रोसमारिन नाम के एक ट्रैवल ब्लॉगर ने दुनिया को बताई है। जेक ने इंटरनेट पर एक Video डाला है, जिसमें वे रोते हुए अपना दर्द बयाँ कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे सिर्फ अखबार की कोई खबर नहीं हैं, बल्कि जीते-जागते इंसान हैं जिनके परिवार वाले घर पर उनका इंतजार कर रहे हैं।

जेक ने बताया कि जहाज पर किसी को कुछ पता नहीं चल रहा है कि आगे क्या होगा, जिससे हर कोई बहुत डरा हुआ है। उनका यह भावुक Video अब सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है और लोग उनके लिए दुआएँ माँग रहे हैं।

क्या है यह हंता वायरस?

हंता वायरस वैसे तो पुराना है, लेकिन यह बहुत खतरनाक और जानलेवा है। यह वायरस मुख्य रूप से चूहों और उनके जैसे छोटे जानवरों से फैलता है। इंसानों के शरीर में जाने के बाद यह दो तरह से हमला करता है या तो यह फेफड़ों को खराब कर देता है या फिर किडनी को पूरी तरह फेल कर देता है।

सबसे ज्यादा डर की बात यह है कि इससे मौत होने का खतरा बहुत ज्यादा रहता है। अमेरिका जैसे देशों में इस संक्रमण की चपेट में आने वाले आधे मरीजों की जान बचाना भी मुश्किल हो जाता है।

कैसे फैलता है यह जानलेवा संक्रमण?

हंता वायरस सीधे तौर पर चूहों से फैलता है। अगर कोई व्यक्ति चूहों की गंदगी, पेशाब या लार के संपर्क में आता है, तो वह बीमार पड़ सकता है। यह वायरस हवा के जरिए भी शरीर में जा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर चूहों की गंदगी वाली जगह पर झाड़ू लगाई जाए, तो हवा में उड़ने वाली धूल के साथ यह वायरस सांस के रास्ते फेफड़ों तक पहुँच जाता है।

कभी-कभी चूहे के काटने से भी यह संक्रमण हो सकती है। अच्छी बात यह है कि यह कोरोना की तरह एक इंसान से दूसरे इंसान में आसानी से नहीं फैलता, हालाँकि कुछ खास किस्म के हंता वायरस बहुत कम मामलों में एक व्यक्ति से दूसरे में जा सकते हैं।

पहचानिए हंता वायरस के लक्षण

हंता वायरस के लक्षण शुरू में साधारण बुखार या फ्लू जैसे लगते हैं, इसलिए इसे पहचानना मुश्किल होता है। संक्रमण के संकेत दिखने में एक से आठ हफ्ते का समय लग सकता है। शुरुआत में मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, उल्टी-दस्त और पेट में दर्द जैसी शिकायतें होती हैं।

लेकिन कुछ ही समय बाद यह संक्रमण जानलेवा हो जाती है। अचानक फेफड़ों में पानी भर जाता है, जिससे सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगती है और ब्लड प्रेशर गिर जाता है। अगर सही समय पर डॉक्टर की मदद न मिले, तो मरीज का दिल काम करना बंद कर सकता है और उसकी जान जा सकती है।

WHO की एडवायजरी और वैश्विक रिस्क

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इस मामले को लेकर काफी अलर्ट है और प्रभावित देशों की सरकारों के साथ मिलकर काम कर रहा है। WHO का कहना है कि इस जहाज पर हालात काफी गंभीर हैं क्योंकि बीमार पड़े 7 लोगों में से 3 की मौत हो चुकी है।

हालाँकि, राहत की बात यह है कि दुनिया के बाकी लोगों के लिए अभी डरने वाली बात नहीं है, क्योंकि यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में बहुत मुश्किल से फैलता है। इसलिए इसके महामारी बनने का खतरा कम है, लेकिन जहाज जैसी बंद जगहों पर जहाँ लोग करीब रहते हैं, वहाँ बहुत ज्यादा सावधानी रखने की जरूरत है।

सुरक्षा के उपाय: खुद को कैसे बचाएँ?

हंता वायरस से बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप अपने घर और आसपास चूहों को न आने दें। अगर कहीं चूहों की गंदगी साफ करनी हो, तो वहाँ सूखी झाडू बिल्कुल न लगाएँ, क्योंकि इससे वायरस हवा में फैल सकता है।

सफाई से पहले उस जगह पर फिनाइल या सैनिटाइजर छिड़ककर उसे गीला कर लें और मास्क-दस्ताने जरूर पहनें। अपने खाने-पीने के सामान को हमेशा ढककर रखें। चूंकि इस संक्रमण का अब तक कोई टीका (वैक्सीन) नहीं बना है, इसलिए चूहों से दूरी बनाए रखना ही खुद को सुरक्षित रखने का इकलौता तरीका है।

यूँ ही नहीं खुद को ‘मुस्लिमों की पार्टी’ कहती है कॉन्ग्रेस: असम में जीते 19 विधायकों में केवल 1 हिंदू, बंगाल में दोनों मुस्लिम

2018 में उर्दू अखबार ‘इंकलाब’ ने एक खबर छापी जिसमें राहुल गाँधी का एक बयान था जिसमें कहा गया था कि ‘कॉन्ग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है’। तब कॉन्ग्रेस पार्टी ने इस बयान को झुठलाने की कोशिश की लेकिन पार्टी के ही तब के अल्पसंख्यक मोर्चा के चेयरमैन ने इस बयान की पुष्टि की थी। इस बात को 8 साल बीत गए हैं।

अब आज की बात, सोमवार (4 मई 2026) को राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आए। कॉन्ग्रेस के उस दावे में कितना सच था या नहीं थे इस थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं और नतीजों से कॉन्ग्रेस के मौजूदा स्वरूप को समझने की कोशिश करते हैं। बात करते हैं, असम और पश्चिम बंगाल की, इन दोनों राज्यों में बीजेपी सत्ता में आई है।

बंगाल में टक्कर TMC-BJP के बीच थी तो कॉन्ग्रेस की गर्त में जाना लगभग तय था, हुआ भी वही। असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में पार्टी के आक्रामक प्रचार ने राज्य में पार्टी की जीत की हैट-ट्रिक तय कर दी।

कॉन्ग्रेस को असम और पश्चिम बंगाल में कुल जमा 21 विधानसभा सीटें मिलीं। असम में पार्टी ने 19 सीटें जीतीं जबकि पश्चिम बंगाल में कॉन्ग्रेस के खाते में 2 सीटें आईं। इसमें एक दिलचस्प बात जो सामने आई वो उस 2018 के अखबार की उस रिपोर्ट की ही याद दिला रही थी जो राहुल गाँधी ने तब कथित तौर पर कहा था।

असम में जीते कॉन्ग्रेस के 19 विधायकों में केवल 1 विधायक हिंदू है। असम की नोबोइचा सीट से जीते जोय प्रकाश दास राज्य में कॉन्ग्रेस के इकलौते हिंदू विधायक हैं बाकी विधायकों के नाम आप इस लिस्ट में देख सकते हैं।

असम में जीते कॉन्ग्रेस के विधायक (फोटो साभार: ECI Result)

यही हाल पश्चिम बंगाल में भी कॉन्ग्रेस का हुआ। पश्चिम बंगाल के फरक्का में कॉन्ग्रेस के मोताब शेख और रानीनगर में जुल्फीकार अली ने जीत दर्ज की है।

पश्चिम बंगाल में जीते कॉन्ग्रेस के विधायक (फोटो साभार: ECI Result)

वहीं, केरल में कॉन्ग्रेस उस इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के साथ गठबंधन में सरकार बनाने जा रही है जिसकी कट्टरपंथी विचार किसी ने छिपे नहीं है। इस कट्टरपंथी और हिंदू विरोधी पार्टी को राहुल गाँधी सेकुलर तक बता चुके हैं।

भले ही IUML यह दावा करती है कि उसका गठन 1948 के बाद हुआ लेकिन असल में यह ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) की ही एक शाखा है। AIML वही पार्टी थी जिसे पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने बनाया था। देश के बँटवारे के बाद AIML की जगह पाकिस्तान में मुस्लिम लीग और भारत में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने ले ली।

IUML का गठन AIML की सोच और विचारधारा को जिंदा रखने के लिए किया गया था। इसका एक बड़ा उदाहरण यह है कि IUML के पहले अध्यक्ष मोहम्मद इस्माइल खुद देश के बँटवारे के आंदोलन में शामिल थे और पाकिस्तान बनने के समर्थक थे।

कॉन्ग्रेस का मुस्लिम घुसपैठियों से भी प्रेम बताता है कि उसकी आज की दशा क्या हो गई है। असम और बंगाल दोनों ऐसे राज्य हैं जो घुसपैठ और डेमोग्राफी परिवर्तन से जूझ रहे हैं लेकिन कॉन्ग्रेस को ना ये अवैध घुसपैठिए नजर आते हैं, ना ही डेमोग्राफी में बदलाव नजर आता है। वो जमीनी हकीकत को भी जानते समझते हुए भी केवल वोट के लिए या कहें तो मुस्लिम वोट के लिए इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखती है।

अब भले ही 2018 में राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी बताया हो या ना बताया हो लेकिन पार्टी के कृत्य तो इस बात को स्थापित करते ही हैं। बाकी अभी इन दोनों राज्यों में कॉन्ग्रेस के करीब 95% चुने गए विधायक मुस्लिम हैं, आगे ये आँकड़ा और कॉन्ग्रेस की राजनीति कहाँ जाएगी ये तो वक्त ही बताएगा।

Tamil Nadu के नए नायक की ‘विजय’, ‘थलापति’ की सुनामी में ढह गई दो ध्रुवीय राजनीति की दीवार: पढ़ें- कैसे फिल्मी फेम को जनसमर्थन में बदलकर सत्ता के केंद्र में आते गए ‘सितारे’

Tamil Ndau की राजनीति सिर्फ सत्ता का खेल नहीं बल्कि भावनाओं और पहचान की गहराई से जुड़ा एक मंच है। यहाँ नेता केवल नेता नहीं होते बल्कि कई बार वे प्रतीक बन जाते हैं, जिन्हें जनता पर्दे से उठाकर अपने जीवन का हिस्सा बना लेती है। सिनेमा और सियासत का यह अनोखा संगम दशकों से इस राज्य की पहचान रहा है जहाँ MG रामचंद्रन से लेकर जयललिता तक कई सितारों ने पर्दे की लोकप्रियता को सत्ता की ताकत में बदला।

इसी परंपरा के बीच जब थलापति विजय ने अपनी पार्टी TVK के साथ राजनीति में कदम रखा तो इसे पहले सिर्फ एक और स्टार की महत्वाकांक्षा माना गया। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में उभरते रुझानों ने इस धारणा को चुनौती दे दी है। 106 सीटों पर बढ़त केवल एक आँकड़ा नहीं बल्कि यह संकेत है कि Tamil Ndau की जनता एक बार फिर अपने ‘नायक’ को नई भूमिका में स्वीकार करने को तैयार है।

Tamil Nadu की राजनीति लंबे समय से दो बड़े धड़ों द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के बीच घूमती रही है। ऐसे में एक नए दल का इस तरह उभरना बताता है कि जनता के मन में बदलाव की एक धीमी लेकिन गहरी इच्छा बन चुकी थी जो अब सामने आ रही है। यह पूरी तरह पारंपरिक एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी) नहीं है बल्कि एक भावनात्मक बदलाव है, जहाँ लोग पुराने विकल्पों से हटकर कुछ नया तलाश रहे हैं। विजय का यह उभार उसी तलाश का परिणाम लगता है।

Tamil Nadu में सिनेमा और राजनीति का गहरा रिश्ता

Tamil Nadu में सिनेमा और राजनीति का रिश्ता सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक संवाद का एक मजबूत माध्यम बना। यहाँ फिल्मों के जरिए नेताओं ने जनता के बीच अपनी पहचान बनाई और विचारधारा को लोकप्रिय किया।

इस परंपरा की नींव सी एन अन्नादुरई ने रखी जिन्होंने थिएटर और सिनेमा को राजनीतिक संदेश देने का साधन बनाया। उनके बाद एम करुणानिधि ने फिल्मों के संवादों और पटकथाओं के जरिए सामाजिक न्याय और द्रविड़ विचारधारा को मजबूत किया।

यहीं से एक ऐसा मॉडल तैयार हुआ जिसमें स्क्रीन पर दिखने वाला चेहरा जनता के दिल और दिमाग दोनों पर असर डालने लगा। यही वजह है कि तमिलनाडु में फिल्मी सितारों को सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि संभावित नेता के रूप में भी देखा जाता है।

सुपरस्टार से मुख्यमंत्री तक: एम जी रामचंद्रन का मॉडल

अगर फिल्म से राजनीति में सफल बदलाव का सबसे मजबूत उदाहरण देखें, तो वह एमजी रामचंद्रन (MGR) हैं। उन्होंने फिल्मों में एक ऐसे नायक की छवि बनाई जो गरीबों का रक्षक था और अन्याय के खिलाफ खड़ा होता था।

जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा और AIADMK की स्थापना की, तो जनता ने उसी छवि को असल जिंदगी में भी स्वीकार कर लिया। 1977 से 1987 तक उनका लगातार मुख्यमंत्री बने रहना इस बात का प्रमाण है कि उनकी लोकप्रियता कितनी गहरी थी।

उनकी सरकार की पहचान जनकल्याण योजनाएँ और आम लोगों से जुड़ाव रही। MGR ने यह साबित किया कि अगर फिल्मी छवि और जनविश्वास एक साथ मिल जाएँ, तो राजनीति में बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।

विरासत को आगे बढ़ाने वाली नेता: जय जयललिता

जयललिता का सफर भी इसी परंपरा का विस्तार था, लेकिन उन्होंने इसे एक नए स्तर पर पहुँचाया। MGR के बाद उन्होंने AIADMK की कमान संभाली और खुद को एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया। उनकी पहचान सिर्फ एक अभिनेत्री या उत्तराधिकारी की नहीं रही, बल्कि उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक छवि बनाई।

‘अम्मा’ ब्रांड के जरिए उन्होंने महिला वोटर्स और गरीब वर्ग में गहरी पकड़ बनाई। उनकी नीतियाँ, नेतृत्व शैली और सख्त प्रशासनिक छवि ने उन्हें Tamil Ndau की सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल कर दिया। यह दिखाता है कि सिर्फ फिल्मी लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि संगठन और नेतृत्व क्षमता भी जरूरी होती है।

अलग-अलग रास्ते, अलग-अलग नतीजे

अभिनेता विजयकांत – तेज शुरुआत से धीमे अंत की ओर

अभिनेता विजयकांत ने जब राजनीति में कदम रखा तो उन्हें जबरदस्त समर्थन मिला। उनकी पार्टी DMDK ने अच्छा प्रदर्शन किया और वह विपक्ष के नेता भी बने। लेकिन समय के साथ संगठन कमजोर हुआ और पार्टी का प्रभाव घटता गया।

अभिनेता कमल हासन – शहरी सीमाओं में सिमटे

अभिनेता कमल हासन ने मक्कल नीधि मय्यम के जरिए राजनीति में एंट्री की। उनकी राजनीति विचारों और सुधारों पर आधारित थी, लेकिन उनका प्रभाव मुख्य रूप से शहरी और पढ़े-लिखे वर्ग तक ही सीमित रह गया।

अभिनेता रजनीकांत – कभी चुनाव नहीं लड़े

अभिनेता रजनीकांत का राजनीतिक सफर सबसे अलग रहा। उनकी लोकप्रियता बहुत बड़ी थी, लेकिन उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम नहीं रखा। इस वजह से उनका प्रभाव राजनीतिक रूप से स्थापित नहीं हो पाया।

क्यों अलग हैं विजय?

थलापति विजय का उभार सिर्फ एक और फिल्मी स्टार की राजनीति में एंट्री नहीं है, बल्कि एक अलग तरह की राजनीतिक कहानी है। जहाँ पहले के अभिनेता-नेता किसी न किसी राजनीतिक ढाँचे, विचारधारा या संगठन से जुड़े रहे, वहीं विजय सीधे जनता के बीच से उभरे चेहरे के तौर पर सामने आए हैं। सबसे पहले उनकी पर्सनल और प्रोफेशनल पृष्ठभूमि।

विजय का असली नाम जोसेफ विजय चंद्रशेखर है। उनका जन्म 22 जून 1974 को एक फिल्मी परिवार में हुआ। उनके पिता एस ए चंद्रशेखर फिल्म निर्देशक रहे हैं और उनकी माँ शोभा चंद्रशेखर सिंगर हैं। यानी सिनेमा उनके लिए सिर्फ करियर नहीं, बल्कि बचपन से ही जीवन का हिस्सा रहा। उन्होंने एक बाल कलाकार के रूप में शुरुआत की और धीरे-धीरे खुद को तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सुपरस्टार्स में शामिल कर लिया।

करीब 69 फिल्मों की अपनी यात्रा में उन्होंने सिर्फ अभिनय नहीं किया, बल्कि एक खास इमेज तैयार की एक ऐसे हीरो की जो सिस्टम से लड़ता है, आम लोगों के लिए खड़ा होता है और भ्रष्टाचार या अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है। यही इमेज बाद में उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूँजी बनती दिख रही है।

अब बात आती है उनके जनता से जुड़ाव की। विजय का कनेक्शन पारंपरिक राजनीति की तरह भाषणों या विचारधाराओं से नहीं बना, बल्कि फिल्मों, डायलॉग्स और किरदारों के जरिए बना। उनके फैंस उन्हें सिर्फ एक स्टार नहीं, बल्कि अपने जैसा मानते हैं। यही वजह है कि जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा, तो यह जुड़ाव सीधे वोट में बदलता हुआ नजर आ रहा है।

उनका फैन क्लब विजय मक्कल अय्यकम भी यहाँ अहम भूमिका निभाता है। यह सिर्फ फैन क्लब नहीं, बल्कि एक तरह का ग्राउंड नेटवर्क बन चुका था, जिसने 2022 के स्थानीय चुनावों में भी अच्छा प्रदर्शन किया। यानी विजय ने बिना पारंपरिक पार्टी स्ट्रक्चर के भी एक बेस तैयार कर लिया था, जिसे बाद में उन्होंने तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) में बदल दिया।

दूसरी बड़ी बात उनका फुल-टाइम राजनीति में आना। जहाँ कई स्टार्स ने फिल्मों और राजनीति को साथ-साथ चलाने की कोशिश की विजय ने साफ फैसला लिया कि वे फिल्मों को छोड़कर पूरी तरह राजनीति में उतरेंगे। 2024 में पार्टी लॉन्च करते वक्त उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वे एक्टिंग से दूरी बना लेंगे।

Tamil Nadu की राजनीति के इतिहास को देखें, तो यह एक अहम फैक्टर रहा है। एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता दोनों ने सत्ता में आने से पहले खुद को पूरी तरह राजनीति को समर्पित किया था। विजय ने उसी पैटर्न को अपनाया, लेकिन अपने तरीके से।

तीसरी और सबसे जोखिम भरी रणनीति अकेले चुनाव लड़ना। Tamil Nadu में नई पार्टियाँ अक्सर बड़े गठबंधनों का सहारा लेती रही हैं, लेकिन विजय ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने DMK या AIADMK जैसे स्थापित दलों के साथ जाने के बजाय सीधे मुकाबले का रास्ता चुना। इससे उन्होंने खुद को तीसरे विकल्प के रूप में पेश किया, न कि किसी के सहयोगी के तौर पर।

यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि इससे हार का खतरा भी उतना ही बड़ा था। लेकिन शुरुआती रुझान यह दिखा रहे हैं कि यह दाँव असरदार साबित हो सकता है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू है उनकी टाइमिंग। विजय ऐसे समय पर राजनीति में आए हैं जब राज्य की राजनीति में एक तरह की थकान महसूस की जा रही है। दशकों से वही चेहरे, वही पार्टियाँ और वही ढाँचा ऐसे में एक नया चेहरा लोगों को आकर्षित करता है। विजय ने इसी गैप को पहचाना और खुद को उस खाली जगह में स्थापित किया।

उनकी अपील खासतौर पर युवाओं और महिलाओं में ज्यादा दिखती है। युवा मतदाता, जो MGR या जयललिता के दौर को सिर्फ कहानियों में जानते हैं, उनके लिए विजय पहला ऐसा चेहरा हैं जो उनके समय का है। वहीं महिलाएँ उन्हें एक अपेक्षाकृत सॉफ्ट और अपने करीबी नेता के रूप में देखती हैं।

अगर हम विजय की पॉलिटिक्स का मॉडल कैडर पॉलिटिक्स से ज्यादा कैरेक्टर पॉलिटिक्स पर आधारित है। यानी संगठन से ज्यादा उनकी व्यक्तिगत छवि और भरोसा काम कर रहा है।

यही वजह है कि विजय बाकी फिल्मी नेताओं से अलग नजर आते हैं। उनके पास पारंपरिक राजनीतिक अनुभव भले न हो, लेकिन उनके पास एक मजबूत इमोशनल कनेक्शन, तैयार बेस और सही समय पर लिया गया बड़ा जोखिम है। जो उन्हें इस चुनाव में एक असाधारण खिलाड़ी बना रहा है।

इस चुनाव में विजय के समर्थन का सबसे दिलचस्प पहलू उनका वोट बैंक है। महिलाएँ उन्हें एक नए और भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रही हैं। Tamil Nadu में महिला वोटर्स हमेशा से निर्णायक रही हैं और विजय ने इस वर्ग में अपनी जगह बनाई है।

वहीं युवा मतदाता, जो पुराने नेताओं के दौर में बड़े नहीं हुए, विजय को अपने समय का नेता मान रहे हैं। उनके लिए विजय सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक ऐसा चेहरा हैं जो उनकी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है।

Tamil Nadu की राजनीति पारंपरिक रूप से कैडर आधारित रही है, जहाँ संगठन और कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका होती है। लेकिन विजय का मॉडल इससे अलग है। यह कैरेक्टर पॉलिटिक्स है, जहाँ नेता की व्यक्तिगत छवि और लोगों के साथ भावनात्मक जुड़ाव ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

उनके समर्थक उन्हें एक नेता से ज्यादा एक परिचित चेहरे के रूप में देखते हैं, जिसे उन्होंने सालों तक फिल्मों में देखा है।

क्या विजय MGR बन सकते हैं?

विजय की तुलना अक्सर MGR से की जा रही है, लेकिन दोनों के बीच अंतर भी उतना ही महत्वपूर्ण है। MGR के पास राजनीतिक अनुभव और संगठन दोनों थे, जबकि विजय का सफर सीधे फिल्मों से राजनीति तक का है।

विजय का मॉडल ज्यादा आधुनिक है, जहाँ मीडिया, छवि और समय का सही इस्तेमाल उनकी ताकत बनता है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि वे MGR जैसे बनेंगे, लेकिन इतना जरूर है कि उन्होंने एक नई दिशा जरूर दिखा दी है।

अभी अंतिम नतीजे आना बाकी हैं, लेकिन यह साफ हो चुका है कि Tamil Nadu की राजनीति बदल रही है। अब मुकाबला सिर्फ दो पार्टियों के बीच नहीं रहा। एक तीसरी ताकत उभर चुकी है, जो आने वाले समय में राजनीति की दिशा तय कर सकती है। इस जीत के बाद तमिलनाडु को दशकों बाद एक नया राजनीतिक विकल्प मिलेगा और यही इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी हो सकती है।

जिन-जिन दलों के लिए प्रचार, जिन-जिन का किया समर्थन, सबका बैठ गया भट्ठा: साथियों के लिए फिर पनौती साबित हुए अखिलेश यादव और तेजस्वी

चुनावी राजनीति में बयान देना, माहौल बनाना और जीत का दावा करना आम बात है, लेकिन जब यही दावे लगातार अलग-अलग राज्यों में दोहराए जाएँ और हर बार नतीजे उसके उलट आएँ, तो मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता। वह यह दिखाता है कि आपका बोलना सही नहीं है क्योंकि आप कर कुछ पा नहीं रहे और ‘पनौती’ साबित हो रहे सो अलग। पिछले कुछ चुनावों में अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के साथ यही होता नजर आ रहा है।

दोनों नेताओं ने खुद को विपक्षी राजनीति के अहम चेहरे के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने बंगाल से लेकर तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा और बिहार तक अलग-अलग राज्यों में विपक्षी दलों के समर्थन में न सिर्फ प्रचार किया, बल्कि बार-बार दावा कर विपक्षी पार्टियों के लिए जीत लगभग तय बताई।

हालाँकि जब वास्तविक नतीजे सामने आए तो लगभग हर जगह पर तस्वीर इतनी उलट थी कि इन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगे। इस पूरे सिलसिले को अगर ध्यान से देखा जाए, तो यह सिर्फ हार-जीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस गैप की कहानी है जो राजनीतिक दावों और जमीनी नतीजों के बीच लगातार बढ़ता जा रहा है।

बंगाल: ममता को लेकर किया ‘एक अकेली लड़ जाएगी’ का दावा, जीती BJP

इस पैटर्न की सबसे ताजा कड़ी पश्चिम बंगाल में देखने को मिली। यहाँ अखिलेश यादव ने खुलकर ममता बनर्जी के समर्थन में सोशल मीडिया पर लिखा, “एक अकेली लड़ जाएगी, जीतेगी और बढ़ जाएगी।” यह बयान महज औपचारिक समर्थन नहीं था, बल्कि भविष्यवाणी जैसा था। इसमें संदेश साफ था कि ममता बनर्जी के लिए कोई चुनौती नहीं है और उनकी जीत तय है।

हालाँकि जैसे ही मतगणना के रुझान सामने आने लगे, यह दावा जमीनी हकीकत से टकराता नजर आया। पश्चिम बंगाल में BJP ने इतिहास रच दिया। बीजेपी ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली TMC सरकार को 15 साल के बाद उखाड़ फेंका है। यहाँ बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली है।

तमिलनाडु: ‘उत्तर-दक्षिण एकता’ का नारा लगातीं तेजस्वी की रैलियाँ पर वोट पर नहीं पड़ा असर

तमिलनाडु में तेजस्वी यादव की सक्रियता इस पूरे पैटर्न का अगला बड़ा उदाहरण है। तेजस्वी ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के ‘सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस’ के लिए खूब पसीना बहाया था। उन्होंने एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए उन इलाकों में प्रचार किया जहाँ उत्तर भारतीय प्रवासी और मजदूरों की संख्या अधिक है।

उनके भाषणों में ‘सामाजिक न्याय’ और ‘उत्तर-दक्षिण एकता’ की बात प्रमुखता से उठाई गई। यह स्थानीय राजनीति में एक नया सामाजिक समीकरण जोड़ने की कोशिश के साथ एक सोची-समझी रणनीति थी।

रैलियों में थोड़ी-बहुत भीड़ भी दिखी, मीडिया कवरेज भी मिला, लेकिन जब नतीजों के रुझान आए तो यह साफ हो गया कि यह रणनीति अपेक्षित असर नहीं छोड़ पाई। जिन सीटों पर तेजस्वी ने विशेष ध्यान दिया था, वहाँ भी DMK गठबंधन पिछड़ता नजर आया।

कई जगह मुकाबला AIADMK और TVK के बीच सिमट गया, जिससे यह संकेत मिला कि स्थानीय मुद्दे और एंटी-इंकम्बेंसी की लहर, बाहरी प्रचार से कहीं ज्यादा प्रभावी रही। यानी मंच पर जो भीड़ दिखाने की कोशिश हो रही थी, वह वोट में तब्दील नहीं हो सकी। आँकड़ों की बात करें तो TVK ने अब तक 36 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए मजबूत बढ़त बना ली है और 72 सीटों पर आगे चल रही है।

दूसरी ओर सत्तारूढ़ DMK ने 17 सीटों पर जीत हासिल की है और 45 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। कॉन्ग्रेस ने अब तक 1 सीट पर जीत दर्ज की है और 4 सीटों पर आगे है, जबकि AIADMK ने 13 सीटों पर जीत दर्ज की और वह 30 सीटों पर आगे चल रही है।

दिल्ली: अखिलेश यादव का ’70 में 70 हार जाएगी भाजपा’ वाला दावा, लेकिन हकीकत उलट

दिल्ली में अखिलेश यादव ने अरविंद केजरीवाल के साथ रोड शो करते हुए कहा था कि भाजपा सभी 70 सीटें हार सकती है और आम आदमी पार्टी ऐतिहासिक जीत दर्ज करेगी। यह बयान चुनावी भाषण से आगे बढ़कर एक तरह की पूरी चुनावी तस्वीर पेश करता था, जहाँ इनकी ओर से तो मुकाबला लगभग खत्म माना जा रहा था।

हालाँकि दिल्ली की राजनीति इतनी सीधी नहीं होती। हर सीट पर अलग समीकरण, स्थानीय उम्मीदवारों का प्रभाव और संगठन की ताकत चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है। दिल्ली में BJP ने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के किले को ढहाते हुए अपनी सरकार बनाई। यहाँ BJP ने लगभग 40 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया।

हरियाणा: इतिहास रचने का दावा और नतीजों में अचानक बदलाव

हरियाणा में भी अखिलेश यादव ने INDI गठबंधन को लेकर बड़े दावे किए। उन्होंने कहा कि विपक्ष की एकजुटता भाजपा को हराकर नया इतिहास लिख सकती है।

शुरुआती रुझानों में कॉन्ग्रेस की बढ़त ने इस दावे को कुछ समय के लिए सही साबित किया, लेकिन जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, तस्वीर बदल गई। भाजपा ने बढ़त बनाई और निर्णायक जीत दर्ज की।

यह बदलाव यह दिखाने के लिए काफी था कि चुनावी रणनीति सिर्फ शुरुआती माहौल पर नहीं टिकी होती, बल्कि अंत तक संगठन ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। यहाँ विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 90 में से 48 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई।

महाराष्ट्र: विपक्षी उम्मीदों के बीच सत्ता पक्ष की मजबूत वापसी

महाराष्ट्र में भी अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की राजनीतिक लाइन विपक्षी एकजुटता के जरिए सत्ता परिवर्तन का दावा करने वाली रही। अलग-अलग मंचों और बयानों में यह लगातार कहा गया कि राज्य में सत्ता के खिलाफ माहौल है और गठबंधन मिलकर चुनावी तस्वीर बदल सकता है, लेकिन महाराष्ट्र में भी वही पैटर्न दिखा जो दूसरे राज्यों में नजर आया।

लेकिन जब मतदान और उसके बाद के रुझान सामने आए, तो तस्वीर दावों से अलग नजर आई। बीजेपी और उसके सहयोगियों के गठबंधन ने 288 में से करीब 235 सीटों पर जीत दर्ज कर भारी बहुमत हासिल किया। अकेले बीजेपी ने 130 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की। अंततः यह साफ हुआ कि सिर्फ राजनीतिक संदेश और मंचीय भाषण चुनाव नहीं जिताते।

बिहार: सबसे मजबूत गढ़ में सबसे बड़ी हार

इस पूरे पैटर्न का सबसे बड़ा और सबसे निर्णायक उदाहरण बिहार है। यहाँ तेजस्वी यादव खुद चुनावी लड़ाई के केंद्र में थे और अखिलेश यादव भी उनके समर्थन में सक्रिय थे। ‘वोटर अधिकार यात्रा’, एमवाई समीकरण और PDA फॉर्मूले के जरिए यह दावा किया गया कि इस बार सत्ता परिवर्तन तय है, लेकिन जब नतीजे सामने आए, तो यह पूरा नैरेटिव बिखर गया।

NDA ने प्रचंड जीत हासिल की जबकि महागठबंधन लगभग 40 सीटों पर सिमट गया। यह सिर्फ हार नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक झटका था जिसने यह दिखा दिया कि जमीन पर वोटर का मूड उस नैरेटिव से पूरी तरह अलग था जो बनाया जा रहा था। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह हार उसी राज्य में हुई जहाँ तेजस्वी यादव की सबसे मजबूत पकड़ मानी जाती है।

दावों और नतीजों के बीच बढ़ती दूरी

अगर इन सभी घटनाओं को एक साथ देखा जाए, तो यह साफ होता है कि एक ही तरह का पैटर्न बार-बार दोहराया जा रहा है। जहाँ अखिलेश और तेजस्वी जाते हैं, वहाँ माहौल बनता है, दावे किए जाते हैं, जीत की तस्वीर पेश की जाती है। लेकिन जब नतीजे आते हैं, तो वही तस्वीर बदल जाती है।

अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की राजनीति आज भी चर्चा में रहती है, लेकिन हालिया चुनावी नतीजे यह दिखाते हैं कि उनके दावों और वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

जब एक ही कहानी बंगाल, तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा और बिहार जैसे अलग-अलग राज्यों में दोहराई जाए, तो इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता। अब अखिलेश और तेजस्वी यादव को अपनी ‘जीत की भविष्यवाणी’ करने वाली रणनीति में बदलाव लाने पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता जरूर है।

‘चरित्रहीन’ वाली सयोनी घोष को दूसरी ममता बनाने चला था लिबरल गैंग, ‘काबा-मदीना’ से TMC की ही खोद दी कब्र: CM योगी ने हनुमान चालीसा पाठ को कर दिया था मजबूर

बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने प्रचंड जीत हासिल कर ली है। और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) को जबरदस्त पछाड़ मिली है। नतीजों ने साफ कर दिया है कि बंगाल की जनता ने ‘पोरिबर्तन’ कर दिखाया है, वे 15 साल से बंगाल में सत्ता में रही TMC से तंग आ चुके हैं। और TMC को ढहाने के पीछे भी उनके ही नेताओं का हाथ है। इनमें से ही एक हैं सयोनी घोष। एक्ट्रेस से पॉलिटिशियन बनीं सयोनी घोष ने इन चुनावों में खुद को TMC की फायर ब्रांड नेता के तौर पर पेश किया, लेकिन निकली वो ‘पनौती’। वे जिन-जिन क्षेत्रों में चुनाव प्रचार करने पहुँची थी, उनमें से ज्यादातर सीटों पर TMC को करारी हार मिली।

चाहे वो TMC का गढ़ कहे जाने वाला दक्षिण 24 परगना जिला हो, या हो मदारीहाट, पुरुलिया और या जलपाईगुड़ी की राजगंज सीट। हर सीट पर BJP ने TMC को धोबी पछाड़ दिया है। इन्हीं इलाकों में घूम-घूमकर सयोनी घोष ने कविता और गाने गाकर खुद को ‘सेकुलर’ नेता के रूप में पेश किया। सयोनी का बंगाली भाषा में गुनगुनाया गया वो गीत खूब बिका, जिसके हिंदी बोल हैं- ‘मेरे दिल में है काबा, आँखों में मदीना।’ इसी गाने पर लिबरल गैंग ने सयोनी घोष के कसीदे पढ़े।

इतना ही नहीं चुनाव में उनको ममता बनर्जी की परछाई की तरह देखा जाने लगा। जो साधी सफेद साड़ी और हाथ में माइक पकड़कर BJP के बड़े-बड़े नेताओं पर सीधे हमले बोलने लगीं। मीडिया ने भी सयोनी घोष के प्रचार को खूब हवा दी। जब कुछ यूट्यूब चैनल ने उनका इंटरव्यू किया और ‘सेकुलर’ राजनीति पर सवाल पूछे। लेकिन किसी ने उनकी हिंदू घृणा की पोल नहीं खोली।

लेकिन असलियत यह है कि मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाली TMC और उसकी नेता सयोनी घोष को CM योगी ने हिंदुत्व का पाठ पढ़ाया था। जब एक रैली में CM योगी ने सयोनी घोष का नाम लिए बिना उन्हें सीख दी कि बंगाल की पहचान काबा नहीं, बल्कि माँ काली है। इसके बाद सयोनी घोष हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए मजबूर हुईं और चुनाव में उनकी पहचान ‘सेकुलर’ नेता के रूप में होने लगी।

अब चुनावों के नतीजे के बाद सयोनी घोष की सोशल मीडिया पर खूब आलोचना हो रही है। जहाँ यूजर्स उनकी पुरानी फिल्मों को लेकर सयोनी घोष की ‘सेकुलर’ राजनीति और साधे कपड़े वाली पहचान की हकीकत बता रहे हैं। लोग बता रहे हैं कि ये वही सयोनी घोष हैं, जिन्होंने ‘चरित्रहीन’ जैसी एडल्ट फिल्मों में काम किया और अब चुनाव में सीधी-साधी महिला की पहचान ओड़े खूब बयानबाजी की।

इतना ही नहीं सयोनी घोष की हकीकत यह भी है कि उन्होंने शिवलिंग पर कंडोम की फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट की। जब लोगों ने सवाल पूछे, तो कहने लगी कि ‘एक्स’ अकाउंट हैक हो गया था। लेकिन हैकर ने मुस्लिम-विरोधी पोस्ट शेयर नहीं किए। यानी सयोनी घोष खुले में सिर्फ हिंदू घृणा दिखाती हैं और काबा-मदीना पर गाने गाती हैं। और फिर इसी बैकग्राउंड के साथ जनता के बीच अपनी ‘सेकुलर’ राजनीति चमकाती हैं।

लेकिन बंगाल के नतीजों में साफ दिख गया है कि यहाँ पिछले 15 सालों से TMC के ‘जंगलराज’ से परेशान लोगों ने जनादेश दे दिया है। अब लोगों ने ‘पोरिबर्तन’ कर दिया है। आने वाले समय में बंगाल में काबा-मदीना के गाने नहीं, बल्कि राज्य को अपनी बंगाली पहचान से नवाजा जाएगा।

आखिर में सयानी घोष ने जो लकीर खींची है, उम्मीद है कि उसकी तस्वीर हमें वैसी ही देखने को मिले जैसा वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल कहते हैं, “दिल में काबा, आँखों में मदीना! पश्चिम बंगाल का ये चुनाव इस गाने के कारण भी याद रखा जाएगा। जैसे शाह बानो मैटर के बाद केंद्र में कभी कॉन्ग्रेस को बहुमत नहीं मिला, वैसा ही हाल अब तृणमूल का हो सकता है। सांप्रदायिक अतिवाद भारत के स्वभाव के विपरीत है। चोलबे ना।”

जहाँ जन्मे मुखर्जी, अब वो बंगाल भी भगवा है… मोदी-शाह ने पूर्ण किया श्यामा प्रसाद का स्वप्न

बंगाल में 4 मई की सुबह जब सूरज उगा, तो हवाओं में बदलाव की महक थी। टीवी और रेडियो पर जैसे ही गिनती शुरू हुई, आँकड़ों ने सबको चौंका दिया। बंगाल की खाड़ी से उठी ‘भगवा लहर’ ने ममता दीदी के उस किले को ढहा दिया, जिसे कभी कोई हिला नहीं पाया था।

अभी के रुझान बता रहे हैं कि बीजेपी 199 से ज्यादा सीटों पर जीत रही है, जो बहुमत से कहीं ऊपर है। वहीं, पिछले 15 सालों से राज कर रही TMC 90 सीटों के आसपास सिमट गई है। यह महज एक चुनावी जीत नहीं है बल्कि एक ऐसी वैचारिक यात्रा का पड़ाव है जिसकी नींव डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दशकों पहले रखी थी।

पुरानी यादें और BJP का बड़ा मकसद

BJP के लिए बंगाल में जीतना सिर्फ कुर्सी पाने जैसा नहीं है। यह उनके लिए भावनाओं से जुड़ा मामला है। दरअसल, BJP जिस ‘भारतीय जनसंघ’ से निकलकर बनी है, उसकी शुरुआत करने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल के ही रहने वाले थे। BJP उन्हें अपना सबसे बड़ा आदर्श मानती है और हमेशा से मानती आई है कि बंगाल उनकी असली जन्मभूमि है। इसलिए, बंगाल में सरकार बनाना उनके लिए अपनी जड़ों की ओर लौटने जैसा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव के दौरान लोगों को एक पुरानी कहानी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दो बड़े सपने थे। पहला- कश्मीर से ‘अनुच्छेद 370’ हटाना, जिसे सरकार ने कुछ साल पहले पूरा कर दिया। और दूसरा- बंगाल को फिर से सोने की चिड़िया यानी ‘सोनार बांग्ला’ बनाना। उन्होंने जनता से वादा किया कि कश्मीर के बाद अब बंगाल का सपना पूरा करने की बारी है।

नेताओं की यह बात बंगाल के मध्यमवर्गीय परिवारों के दिल को छू गई। लोगों को लगा कि BJP सिर्फ राजनीति नहीं कर रही, बल्कि बंगाल की पुरानी पहचान, भाषा और संस्कृति को बचाने की बात कर रही है। इस संदेश ने लोगों के मन में यह भरोसा जगा दिया कि अगर अपनी विरासत और मान-सम्मान को सुरक्षित रखना है, तो BJP ही उनकी सबसे बड़ी ढाल बन सकती है। इसी भरोसे ने वोटर्स को कमल के निशान तक पहुँचा दिया।

2016 से 2026 तक का सफर: शून्य से शिखर तक

अगर हम 10 साल पीछे जाकर देखें, तो बंगाल में BJP की स्थिति बहुत कमजोर थी। साल 2016 के चुनावों में पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं था और पाने के लिए भी बहुत कम था। उस समय BJP को पूरी 294 सीटों में से केवल 3 सीटें मिली थीं। जनता के बीच भी पार्टी की पकड़ कम थी और उसे सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों का साथ मिला था। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि यह पार्टी कभी बंगाल की सत्ता तक पहुँच पाएगी।

बंगाल विधानसभा चुनाव 2016 नतीजें

2021: जब बीजेपी ने सबको चौंका दिया

5 साल बाद यानी 2021 में कहानी पूरी तरह बदल गई। BJP ने बंगाल की राजनीति में ऐसी छलाँग लगाई कि बड़े-बड़े दिग्गज हैरान रह गए। पार्टी की सीटें 3 से बढ़कर सीधे 77 पर पहुँच गईं। लोगों का भरोसा भी बढ़ा और BJP को करीब 38 प्रतिशत वोट मिले। भले ही पार्टी तब सरकार नहीं बना पाई, लेकिन उसने यह साफ कर दिया कि वह बंगाल में TMC को टक्कर देने वाली इकलौती और सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है।

2026: शिखर पर पहुँचने की ऐतिहासिक जीत

अब 2026 के नतीजों ने तो इतिहास ही रच दिया है। BJP ने अपनी पिछली सीटों का आँकड़ा दोगुना करते हुए बहुमत हासिल कर लिया है। पार्टी न केवल सीटों के मामले में आगे निकली, बल्कि उसे मिलने वाले वोटों का प्रतिशत भी TMC से ज्यादा हो गया है। यह सफर दिखाता है कि बंगाल के लोगों ने पिछले 10 सालों में धीरे-धीरे अपना मन बदला और एक नई राजनीति को मौका देने का फैसला किया। आज BJP शून्य से शुरू होकर बंगाल के शिखर पर पहुँच गई है।

कमल मेला और फुटबॉल: BJP की ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ रणनीति

इस बार BJP ने सिर्फ बड़ी-बड़ी रैलियाँ और भाषण ही नहीं दिए, बल्कि बंगाल के लोगों के बीच पहुँचने के लिए ‘कमल मेलों’ का आयोजन किया। ये मेले सिर्फ राजनीति के लिए नहीं थे, बल्कि इनमें बंगाल की संस्कृति, खान-पान और संगीत की झलक देखने को मिली। पार्टी ने स्थानीय कलाकारों और गायकों को अपनी कला दिखाने का मौका दिया। इससे लोगों के मन में यह बात बैठ गई कि BJP कोई ‘बाहरी’ पार्टी नहीं है, बल्कि वह बंगाल की मिट्टी और यहाँ की परंपराओं का पूरा सम्मान करती है।

बंगाल के लोगों के लिए फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक जुनून है। BJP ने इस जुनून को समझा और पूरे राज्य में फुटबॉल टूर्नामेंट्स करवा दिए। इन मैचों के जरिए पार्टी के नेता सीधे लाखों युवाओं से मिले। खेल-खेल में ही युवाओं को BJP की विचारधारा से जोड़ा गया। इस अनोखी तरकीब ने नौजवानों के बीच यह संदेश भेजा कि BJP सिर्फ चुनाव की बात करने वाली पार्टी नहीं है, बल्कि वह उनकी पसंद और नापसंद का भी ख्याल रखती है।

इन नए प्रयोगों का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि BJP ने खुद को जनता का हिस्सा बना लिया। रैलियों में अक्सर नेता दूर मंच पर खड़े होकर भाषण देते हैं, लेकिन मेलों और खेल के मैदानों में वे लोगों के बिल्कुल करीब आ गए। इससे जनता को लगा कि पार्टी उनकी भावनाओं को समझती है। इसी जमीनी जुड़ाव ने BJP को बंगाल के हर घर और हर दिल तक पहुँचने में मदद की, जिसका सीधा फायदा उन्हें चुनावी नतीजों में देखने को मिल रहा है।

आंगन बैठक और माइक्रो-मैनेजमेंट का कमाल

बीजेपी की जीत की सबसे बड़ी इनसाइड स्टोरी उनके ‘आंगन बैठक’ मॉडल में छिपी है। जब परीक्षाओं के कारण लाउडस्पीकर पर रोक लगी तो सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव की टीम ने इसे अवसर में बदल दिया। पार्टी कार्यकर्ताओं ने एक ही महीने में 1 लाख 65 हजार से ज्यादा छोटी-छोटी बैठकें लोगों के घरों और आंगनों में कीं।

इन बैठकों में 10 से 15 लोगों के समूह होते थे जिनसे सीधी बातचीत की गई और उनके मन की शंकाओं को दूर किया गया। इस ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ ने चुनाव को बड़ी-बड़ी रैलियों के शोर से निकालकर लोगों के ड्राइंग रूम तक पहुँचा दिया। हर बैठक के बाद व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए जिससे पार्टी का संदेश सीधे मतदाता की जेब तक पहुँच गया।

साख और स्थानीय चेहरे: बाहरी बनाम भीतरी का अंत

2021 के चुनाव में ममता बनर्जी बीजेपी को ‘बाहरी’ पार्टी बताकर वोट बटोरने में सफल रही थीं। लेकिन 2026 तक आते-आते BJP ने इस चुनौती का डटकर मुकाबला किया। पार्टी ने सुवेंदु अधिकारी जैसे कद्दावर स्थानीय नेताओं को पूरी कमान दी और उम्मीदवारों के चयन में भारी बदलाव किया।

इस बार BJP ने केवल दलबदलुओं पर भरोसा नहीं किया बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रतिष्ठित डॉक्टरों, वकीलों, खिलाड़ियों और कलाकारों को टिकट दिया। इससे जनता के बीच यह संदेश गया कि BJP के पास बंगाल को चलाने के लिए अपने खुद के काबिल चेहरे हैं। इस रणनीति ने ‘बाहरी’ होने के नैरेटिव को पूरी तरह कुंद कर दिया।

RG कर और संदेशखाली का प्रभाव

बंगाल के चुनाव में करीब 70 फीसदी ‘स्विंग वोटर्स’ होते हैं जो आखिरी समय में अपना मन बदलते हैं। इस बार दो बड़ी घटनाओं ने इन मतदाताओं को हिलाकर रख दिया। RG कर मेडिकल कॉलेज की घटना ने शहरी मध्यम वर्ग और विशेष रूप से महिलाओं को ममता सरकार के खिलाफ कर दिया।

वहीं संदेशखाली में महिलाओं के साथ हुए अत्याचार ने ग्रामीण इलाकों में TMC के ‘सिंडिकेट राज’ के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा पैदा किया। जो महिलाएँ पहले ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी सरकारी योजनाओं के कारण TMC की समर्थक थीं, वे सुरक्षा के मुद्दे पर BJP की ओर झुक गईं। इस ‘मूक क्रांति’ ने वोटिंग के दिन TMC के सारे गणित बिगाड़ दिए।

भ्रष्टाचार पर किया सीधा प्रहार: सिंडिकेट राज का खात्मा

मोदी-शाह की जोड़ी ने इस बार भ्रष्टाचार को केवल चुनावी मुद्दा नहीं बनाया बल्कि इसे एक भावनात्मक मुद्दा बना दिया। रैलियों में शिक्षक भर्ती घोटाले और राशन घोटाले का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने सीधे तौर पर बंगाल के युवाओं से पूछा कि क्या उन्हें उनका हक मिल रहा है?

ED और CBI की कार्रवाई में मिले नोटों के पहाड़ों की तस्वीरों ने जनता के मन में यह बात बैठा दी कि उनका पैसा TMC के नेताओं की तिजोरियों में जा रहा है। BJP का वादा कि वह एक विशेष टास्क फोर्स बनाकर भ्रष्ट नेताओं की संपत्ति कुर्क करेगी और गरीबों में बाँटेगी, बेहद असरदार रहा।

घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा: ध्रुवीकरण का नया मॉडल

BJP ने सीमावर्ती जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे को इस बार राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय संसाधनों से जोड़कर पेश किया। पार्टी ने यह नैरेटिव सेट किया कि घुसपैठिए बंगाल के युवाओं की नौकरियाँ और राशन छीन रहे हैं। सीएए (CAA) के लागू होने से मतुआ समुदाय जैसे शरणार्थी समूहों ने BJP को एकतरफा वोट दिया।

अमित शाह का यह बयान कि ‘बीजेपी सरकार आने पर परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा‘ ने सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले उन लोगों को सुरक्षा का भरोसा दिया जो तस्करी और अपराध से परेशान थे। इस ध्रुवीकरण ने बीजेपी के कोर वोट बैंक को एकजुट कर दिया।

अमित शाह का ‘बंगाल प्रवास’ और मोदी की 15 गारंटी

गृह मंत्री अमित शाह का चुनाव के दौरान 15 दिनों तक बंगाल में ही रुक जाना BJP की गंभीरता को दर्शाता है। उन्होंने कोलकाता को अपना कंट्रोल रूम बनाया और हर जिले की पल-पल की रिपोर्ट ली। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं के लिए ’15 गारंटी’ का ऐलान किया जिसने TMC की योजनाओं की हवा निकाल दी।

3000 रुपए की आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण के वादे ने महिलाओं के बीच एक मजबूत विकल्प पेश किया। PM मोदी के प्रति लोगों का अटूट भरोसा और शाह की संगठन क्षमता ने मिलकर बंगाल में ‘डबल इंजन’ की रफ्तार पकड़ ली।

असम के नतीजों से धुआँ-धुआँ हुआ लिबरल गैंग, आरफा से लेकर ऋचा चड्ढा का दुख नहीं हुआ खत्म: राहत के लिए वीर दास ने भेजा Burnol

बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के शुरुआती रुझान सामने आ गए हैं, कई सीटों पर 5 से 6 राउंड की काउंटिंग के बाद BJP की भारी बहुमत हासिल हो रही है। चुनाव आयोग के आधिकारिक जानकारी के अनुसार, बंगाल में BJP 195 सीटों पर बढ़त बना रही है, जबकि TMC केवल 92 सीटों पर आगे चल रही है। उधर असम में BJP बहुमत के साथ सरकार बना रही है।

इन रुझानों के बाद हर कोई BJP को बधाई दे रहा है। वहीं देश का लिबरल-वामपंथी गैंग रोना रो रहा है। इनमें अव्वल नंबर पर हैं आरफा खानुम शेरवानी, जिन्होंने बंगाल में ग्राउंड रिपोर्टिंग कर यह बताने की कोशिश की कैसे मतदाता BJP की सरकार बनना नहीं देना चाहते हैं और शुरुआती रुझानों के अनुसार उनकी यह रिपोर्टिंग फेल साबित हो रही है।

अब BJP को बढ़त मिलते देख वह कह रही हैं, “चलिए BJP के कसीदे पढ़ने शुरू करते हैं। क्या जबरदस्त पार्टी है, BJP जैसा चुनाव लड़ने का माद्दा विपक्ष की किसी पार्टी में नहीं हैं, जितनी मेहनत मोदी जी करते है, उसका आधा भी अगर ममता बैनर्जी करतीं तो जीत जातीं… शानदार, जानदार, ईमानदार, होशियार… तालियाँ, तालियाँ, तालियाँ..।”

ऐसे ही एक और वीडियो में आरफा खानुम BJP की जीत पर रोना रोते हुए कह रही हैं, “ये बहुत ही झटके और धक्के वाली बात है। खासकर उन लोगों के लिए जो अभी भी निष्पक्ष चुनाव पर यकीन करते हैं।”

उधर, गलवान घाटी में बलिदान हुए सैनिकों का मजाक उड़ाने वाली लिबरल गैंग की ऋचा चड्डा ने कहा, “कायर लोग कभी भी ईमानदारी से नहीं खेलते।”

लिबरल गैंग के ही कॉमेडियन कुणाल कामरा ने कहा, “संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ स्पष्ट जनादेश”

ऐसे ही कुछ लिबरल ‘एक्स’ अकाउंट्स ने भी BJP की बढ़त पर रोना रोया है। इनमें ‘नेहर हू’ नाम से एक्स हैंडल ने लिखा, “बंगाल को अब शुभकामनाएँ! और भी नफरत भरे अपराधों के लिए तैयार हो जाइए! महिलाओं की सुरक्षा मजाक बन जाएगी! सांप्रदायिकता अपने चरम पर पहुँच जाएगी! कम खर्च वाली जीवनशैली खत्म हो जाएगी! क्रिसमस पर बजरंग दल आपसे मिलेगा! अगले 5 साल के लिए RIP।”

डॉ. अरात्रिका गांगुली नाम की ‘एक्स’ यूजर लिखती हैं, “वह दिन आ गया है जब BJP सुबह 10 बजे जश्न मनाएगी, दोपहर 2 बजे घबराएगी और शाम 4 बजे बंगाल की जनता को दोषी ठहराएगी!”

वहीं लिबरल गैंग के इस रोने पर कॉमेडियन वीर दास ने तंज कसा है। वीर दास ने लिखा कि चुनाव में कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन-सी पार्टी जीत रही है, लेकिन ‘बर्नोल’ की फ्री मार्केटिंग होती ही है।

देश का लिबरल गैंग को बंगाल और असम के नतीजों के बाद दुख हो रहा है। ये वही लोग हैं, जो खुद को किसी भी सरकार का हितैषी नहीं मानते हैं। लेकिन इनका एकतरफा झुकाव BJP के खिलाफ ही रहता है। ये वही लोग हैं जिन्होंने TMC की सरकार में हिंसा पर कभी बात नहीं की। अब बंगाल में BJP की जीत के बाद भी इन्होंने रोना रोया है। किसी को संविधान की चिंता हो रही है, तो कोई बंगाल में BJP की सरकार बनने के बाद हिंसा की बात कर रहा है। इनके रोने पर क्या अब ‘बर्नोल’ काम आएगी? अब जहाँ BJP बंगाल में विकास यात्रा की प्लानिंग बनाएगी, वहीं ये लिबरल गैंग उनमें खामियाँ निकालकर कसीदे पढ़ेंगे।

बंगाल विधानसभा चुनाव: वो 5 ‘M फैक्टर्स’ जिनके सहारे सत्ता के शिखर की ओर बढ़ रही BJP

15 साल से बंगाल की सत्ता पर काबिज रहने वाली ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के दिन अब लद गए हैं। बीजेपी ने जबरदस्त पटखनी देते हुए न सिर्फ टीएमसी को हराने जा रही है, बल्कि कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों की लुटिया डुबो दी है। ममता से पहले 34 साल तक सीपीएम के नेतृत्व में वामपंथी दलों का शासन यहाँ रहा है। उससे पहले कॉन्ग्रेस का शासन था। बीजेपी पहली बार बंगाल में इतिहास रचने जा रही है।

पीएम मोदी के चेहरे पर जनता को भरोसा

बीजेपी के जबरदस्त सफलता का श्रेय पीएम मोदी और अमित शाह की मजबूत रणनीति को जाता है। उन्होंने राज्य की कमान सीधे संभाल कर चुनावी फिजा बदल दी । राज्य बनाम केन्द्र की पॉलिटिक्स करने वाली ममता बनर्जी को मात दी और जनता को बताने में सफल रहे कि केन्द्रीय योजनाओं को ममता बनर्जी सरकार ने लागू नहीं कर राज्य की जनता का नुकसान किया। पीएम मोदी का मजबूत चेहरा आगे कर बीजेपी ने जमीन पर जमकर पसीना बहाया।

संगठन को मजबूत कर एक-एक बूथ पर अलग रणनीति बनाई गई। बूथ मैनेजमेंट से लेकर वॉर रूम तक पर गृहमंत्री अमित शाह की नजर रही। पार्टी के कैडर तक को यह विश्वास दिलाया कि ममता बनर्जी की सरकार को बदला जा सकता है। ममता के खौफ का यह आलम था कि जनता उनके खिलाफ बोलने से कतराती थी। उस जनता ने इस बार टीएमसी के गुंडों को हराने का निश्चय किया और ममता की पार्टी के खिलाफ वोट डाला। हालाँकि टीएमसी का जमीन पर नेटवर्क हमेशा मजबूत रहा है। इसलिए चुनाव में टक्कर देखने लायक रही।

हर बार जनता को डराया धमकाया जाता था। इस बार चुनावों में बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती, सीसीटीवी कैमरे लगाए गए। चुनाव को अपेक्षाकृत शांतिपूर्वक और निर्भय मतदान का संकल्प चुनाव आयोग ने पूरा किया।

SIR के माध्यम से वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण को लेकर माइग्रेंट यानी प्रवासी बड़ी संख्या में बंगाल पहुँचे। लाखों प्रवासी बंगालियों ने वोट डाला। दिल्ली-एनसीआर ही नहीं कई शहरों से प्रवासी बंगाली नागरिक वापस लौटे। इसकी वजह से कई राज्यों में मजदूरों और घरेलू काम करने वाली महिलाओं की कमी देखी गई।

दो चरणों में मतदान के चुनाव आयोग के फैसले ने टीएमसी के फर्जीवाड़े को रोकने में काफी हद तक सफलता पाई। फर्जी नामों के हटने का असर चुनाव के परिणाम पर पड़ा। इसके अलावा पहले के चुनावों में टीएमसी के कैडर एक क्षेत्र से चुनाव होने के बाद दूसरे क्षेत्र में जाकर लोगों को डराते-धमकाते थे और खून खराबा करते थे, लेकिन इस बार यह मौका नहीं मिला।

महिलाओं ने बीजेपी को चुना

बीजेपी की जीत में महिला वोटरों का अहम रोल रहा है। महिला सुरक्षा बंगाल में अहम मुद्दा रहा। बीजेपी ने संदेशखाली और आरजीकर जैसी घटनाओं को टीएमसी के खिलाफ चुनाव में हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। महिला सम्मान की बात की।

इसके अलावा केन्द्रीय योजनाओं को लागू करने और बीजेपी द्वारा 3000 रुपए हर महीना महिलाओं को देने का वादा रंग लाया। हालाँकि ममता बनर्जी ने लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के माध्यम से 1500 रुपए हर महीना महिलाओं को दे रही है। लेकिन, महिला सम्मान और सुरक्षा के साथ-साथ महिला आरक्षण को लेकर टीएमसी का मुखर विरोध महिलाओ को बीजेपी के पक्ष में खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। कुल मिलाकर महिलाओं का आशीर्वाद बीजेपी को मिला।

‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ से त्रस्त थी जनता

मुस्लिम तुष्टिकरण की टीएमसी की राजनीति ने इस बार हिन्दुओं को जोड़ा। बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है। परंपरागत रूप से ये टीएमसी के वोटर हैं। लेकिन इस बार कई नए दावेदार मैदान में उतरे थे। एआईएमआईएम और हुमायूँ कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी ने मुस्लिम वोटों में सेंधमारी की। कॉन्ग्रेस और लेफ्ट तो पहले से मौजूद ही थी।

चुनाव में हिन्दू वोटरों को एकजुट करने में बीजेपी काफी हद तक सफल रही और आक्रामक रणनीति बना कर नए समीकरण पैदा किए। राज्य में करीब 68 फीसदी हिन्दू आबादी है। पिछले 15 साल से टीएमसी के राज में इन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

बांग्लादेशी घुसपैठियों को एसआईआर के माध्यम से वोट डालने से रोका गया। इनमें कई वापस बांग्लादेश गए। वहीं राज्य के बाहर रहने वाले बंगाल के नागरिकों ने आकर वोट डाला। इसका फायदा बीजेपी को मिला।

15 सालों से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी की सरकार को जनता बदलना चाहती थी। यही वजह है कि ‘परिवर्तन’ चाहने वाली बड़ी आबादी ने बाहर आकर चुपचाप बीजेपी को वोट डाला। खराब कानून व्यवस्था, बेरोजगारी से परेशान लोगों ने विकास को चुना।

माछ और मतुआ फैक्टर

ममता के खिलाफ कौन। जाहिर है बंगाल चुनाव में इस बार न तो कॉन्ग्रेस और न ही लेफ्ट विकल्प देने की स्थिति में थी। इसलिए जानकार मान रहे हैं कि ममता राज को उखाड़ फेंकने के लिए कॉन्ग्रेस और लेफ्ट के समर्थकों ने भी बीजेपी को वोट किया।

24 परगना और उसके आसपास के क्षेत्रों में मतुआ फैक्टर काफी कारगर रहा। सीएए को लेकर इस समुदाय को बीजेपी से काफी उम्मीदें हैं। ये लोग बीजेपी के वोटर हैं और इनलोगों ने अपने इलाके में बीजेपी के पक्ष में हवा बनाने में अहम भूमिका निभाई। स्थानीय मुद्दों के साथ साथ पीएम मोदी के चेहरे पर भरोसे का असर इस बार दिखा।

बंगाल में माछ यानी मछली सबसे अहम खाया जाता है। ममता बनर्जी ने बीजेपी को माछ विरोधी बताने की नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की। इसको लेकर बीजेपी के नेताओं ने चुनाव में मछली खाकर जनता को बताया कि बीजेपी ‘माछ विरोधी’ नहीं है।
हर चुनाव में बंगाली अस्मिता का मुद्दा उठा कर बीजेपी को बाहरी साबित करने की कोशिश करती रही है। इस बार विधानसभा चुनाव ने बीजेपी ने स्थानीय नेताओं को मीडिया में आने और जनता से जुड़ने की रणनीति बनाई। इसका फायदा चुनाव में मिला।

ग्रेट निकोबार परियोजना पर हर सवाल का जवाब: जानिए कैसे यह प्रोजेक्ट रक्षा, व्यापार और पर्यावरणीय संतुलन को जोड़कर भारत को बनाने जा रहा है महाशक्ति

ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार इसे भारत की समुद्री सुरक्षा, इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक मजबूती और वैश्विक व्यापार में बड़ी भूमिका के लिए जरूरी बता रही है जबकि कॉन्ग्रेस इसका लगातार विरोध कर रही है। सोनिया गाँधी ने पहले एक लेख लिखा था और फिर अब राहुल गाँधी ने अंडमान का दौरा किया है। लोगों में फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने के लिए सरकार ने परियोजना से जुड़े विस्तृत FAQ जारी किए हैं। पढ़ें- सरकार ने इस परियोजना को लेकर क्या बताया है?

सवाल 1 :- क्या ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना एक स्पष्ट रणनीतिक और राष्ट्रीय उद्देश्य की पूर्ति करती है?

जवाब :- ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना रणनीतिक, रक्षा और राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है, जिसे गहन जाँच और विचार-विमर्श के बाद शुरू किया गया है। यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है। परियोजना अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की मौजूदगी को मजबूत करेगी, समुद्री और रक्षा क्षमताओं को विकसित करेगी तथा द्वीप को वैश्विक व्यापार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के साथ जोड़ेगी। यह एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल भी स्थापित करेगी, जिसे बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के प्रतिस्पर्धी बंदरगाहों की तुलना में विशिष्ट लाभ प्राप्त होगा, जो भारत को एक प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक केंद्र के रूप में स्थापित करेगा।

सवाल 2 :- क्या परियोजना में विकास उद्देश्यों के साथ-साथ मजबूत पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय शामिल हैं?

जवाब :- परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की व्यापक रूप से पहचान कर मूल्यांकन किया गया है और एक मजबूत ‘पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन’ (EIA) प्रक्रिया और एक विस्तृत ‘पर्यावरण प्रबंधन योजना’ (EMP) के माध्यम से उन्हें प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा रहा है।

यह मूल्यांकन EIA अधिसूचना, 2006 और ICRZ अधिसूचना, 2019 के अनुसार किया गया है। NGT के 3 अप्रैल, 2023 के आदेश, जिसमें NGT ने यह माना है कि इस परियोजना का महत्व न केवल द्वीप और उसके आस-पास के रणनीतिक महत्व वाले क्षेत्रों के आर्थिक विकास से है बल्कि यह रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बहुत मायने रखता है। यहाँ तक कि अपीलकर्ताओं ने भी इन पहलुओं पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। हालाँकि ट्रिब्यूनल का विचार-विमर्श केवल रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री तक ही सीमित है, फिर भी हमने (बिना किसी टिप्पणी के) मीडिया रिपोर्टों पर भी गौर किया है, जिनमें यह बताया गया है कि यह क्षेत्र चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के अंतर्गत आता है, जिसका मुकाबला भारतीय अधिकारी भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के तहत करने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), और सलीम अली पक्षी विज्ञान और प्राकृतिक इतिहास केंद्र (एसएसीओएन) जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थानों के साथ-साथ आईआईटी, एनआईओटी, एनसीसीआर और एनआईओ जैसे प्रमुख तकनीकी निकाय शामिल रहे। इस दौरान वैज्ञानिक रूप से कठोर और बहु-विषयक मूल्यांकन सुनिश्चित किया गया। हिंद महासागर, भारत और चीन के रणनीतिक हितों के एक प्रमुख मिलन-बिंदु के रूप में उभरा है। इसके अलावा म्यांमार के शिकारियों द्वारा अंडमान के पर्यावरणीय समुद्री संसाधनों के बड़े पैमाने पर शिकार किया जा रहा है जिसके लिए कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है। अवैध शिकार की इन गतिविधियों में मूँगों को नष्ट करना, शार्क मछलियों को मारना और कीमती मछलियों को पकड़कर ले जाना शामिल है। यह परियोजना द्वीप में बुनियादी ढाँचे की कमी को दूर करने में मदद करेगी और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देगी, जिससे ट्रांसशिपमेंट कार्गो (माल के हस्तांतरण) पर होने वाली भारी राशि की बचत होगी।

ग्रेट निकोबार में मजबूत और स्थायी रक्षा उपस्थिति की उपलब्धता भारत को समुद्री मार्गों की प्रभावी निगरानी और सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम बनाती है तथा हिंद महासागर में विदेशी शक्तियों की बढ़ती मौजूदगी का मुकाबला करने में मदद करती है।

उपरोक्त विवरण से पता चलता है कि ग्रेट निकोबार परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय महत्व की है। यह आर्थिक विकास, अवसंरचना निर्माण और रोजगार सृजन के उद्देश्यों को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं के साथ जोड़ती है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक और विकासात्मक हितों को मजबूती मिलती है।

सवाल 3 :- क्या इस परियोजना में द्वीप के वनों और वृक्षों के आवरण को पर्याप्त रूप से संरक्षित और क्षतिपूर्ति दी जाएगी?

जवाब :- इस परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की पूरी तरह से पहचान की गई है। एक मजबूत ‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन’ (ईआईए) प्रक्रिया तथा एक विस्तृत ‘पर्यावरण प्रबंधन योजना’ (ईएमपी) के जरिए उनका प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया जा रहा है। यह मूल्यांकन ईआईए अधिसूचना, 2006 और आईसीआरजेड अधिसूचना,2019 के अनुसार किया गया था। इसमें भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), और सलीम अली पक्षी विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र (एसएसीओएन) जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थानों के साथ-साथ आईटीटी, एनआईओटी, एनसीसीआर और एनआईओ जैसे प्रमुख तकनीकी निकाय शामिल थे। इसने वैज्ञानिक रूप से सख्त और बहु-विषयक मूल्यांकन सुनिश्चित किया।

उनके निष्कर्षों के आधार पर, पर्यावरणीय मंजूरी में कड़े शमन और संरक्षण उपायों को शामिल किया गया है। इनमें जैव विविधता संरक्षण योजनाएं, कोरल संरक्षण और स्थानांतरण, वन्यजीव प्रबंधन रणनीतियां तथा दीर्घकालिक पारिस्थितिक निगरानी शामिल हैं। पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) को पर्याप्त वित्तीय आवंटन और संस्थागत निगरानी का समर्थन प्राप्त है। यह निर्माण और संचालन दोनों चरणों के दौरान शमन उपायों के निरंतर क्रियान्वयन का प्रावधान करती है, जिससे पारिस्थितिक प्रभावों को न्यूनतम, निगरानी में और प्रभावी ढंग से जवाबदेह तरीके से प्रबंधित किया जा सके।

सवाल 4 :- क्या द्वीप के जंगलों और पेड़ों के आवरण को पर्याप्त रूप से संरक्षित और क्षतिपूर्ति दी जाएगी?

जवाब :- विकास के लिए केवल 166.1 वर्ग किमी क्षेत्र प्रस्तावित है, जो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कुल क्षेत्रफल का लगभग 2% है। इसके अतिरिक्त, परियोजना के लिए 130.75 वर्ग किमी वन क्षेत्र को डायवर्ट करने का प्रस्ताव है, जो कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82% है।

डायवर्ट की जाने वाली 130.75 वर्ग किमी वन भूमि में पेड़ों की कुल अनुमानित संख्या 18.65 लाख है। इनमें से, 49.86 वर्ग किमी वन क्षेत्र में अधिकतम 7.11 लाख पेड़ों को काटे जाने का अनुमान है। पेड़ों की कटाई चरणबद्ध तरीके से की जाएगी: चरण I (2025–2035) में 2.79 लाख पेड़, चरण II (2036–2041) में 3.41 लाख पेड़ और चरण III (2042–2047) में 0.91 लाख पेड़ काटे जाएंगे। इसके अलावा, ईसी (ईसी) और एफसी (एफसी) की शर्त के अनुसार, 65.99 वर्ग किमी क्षेत्र को बिना किसी पेड़ की कटाई के हरित क्षेत्र के रूप में रखा जाएगा।

वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत 22.05.2019 के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, 75% से अधिक वन आवरण वाले राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को प्रतिपूरक वनीकरण (सीए) के लिए गैर-वन भूमि प्रदान करने से छूट दी गई है और ऐसा प्रतिपूरक वनीकरण इसके बजाय उपलब्ध लैंड बैंक वाले अन्य राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में किया जा सकता है।

चूँकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 75% से अधिक वन आवरण है, इसलिए प्रतिपूरक वनीकरण (सीए) केंद्र शासित प्रदेश के बाहर प्रस्तावित है। 130.75 वर्ग किमी वन भूमि के डायवर्जन की भरपाई एक व्यापक क्षतिपूरक वनीकरण योजना के माध्यम से की गई है। कुल 24,750.93 हेक्टेयर भूमि वनीकरण के लिए चिन्हित की गई है, जिसमें 1,414.95 हेक्टेयर गैर-वन भूमि (डायवर्ट किए गए क्षेत्र के बराबर) और उससे दोगुना से अधिक क्षेत्र क्षतिग्रस्त वन भूमि शामिल है। इसमें लगभग 17,000 हेक्टेयर हरियाणा में और 6,320.10 हेक्टेयर मध्य प्रदेश में है, जिससे पर्याप्त पारिस्थितिक प्रतिपूरण सुनिश्चित होता है।

हरियाणा में प्रतिपूरक वनीकरण के के लिए जिस जमीन का चिह्नीकरण किया गया है उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा नष्ट हो चुके वन क्षेत्रों से बना है, जिसमें पीएलपीए भूमि भी शामिल है, जो काफी हद तक अरावली क्षेत्र के भीतर स्थित हैं। इन क्षेत्रों को प्रचलित दिशा-निर्देशों के अनुसार पारिस्थितिक बहाली के लिए निर्धारित किया गया है।

सवाल 5 :- क्या जनजातीय समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी, ताकि उनकी संस्कृति और अधिकारों की निरंतरता बनी रहे?

जवाब :- ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना में जनजातीय समुदायों के संरक्षण के लिए सभी वैधानिक प्रक्रियाओं और नीतिगत सुरक्षा उपायों का विधिवत पालन किया गया है। आवश्यक परामर्श सक्षम प्राधिकरणों और क्षेत्र विशेषज्ञों, जैसे कि भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण, जनजातीय कार्य मंत्रालय तथा अन्य हितधारकों के साथ, जारवा नीति 2004 और शॉम्पेन नीति 2015 के अनुरूप किया गया है। वरिष्ठ अधिकारियों और प्रतिष्ठित मानवविज्ञानियों से गठित सशक्त समिति ने स्पष्ट रूप से सुनिश्चित किया है कि विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहों (पीवीटीजीएस), खासकर शॉम्पेन समुदाय के हितों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। जनजातीय आबादी के किसी भी विस्थापन की अनुमति नहीं दी जाएगी। परियोजना को वन अधिकार अधिनियम, 2006 का पालन करते हुए जनजातीय कार्य मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) भी प्राप्त कर लिया है।

वर्तमान में, ग्रेट निकोबार द्वीप में 751.070 वर्ग किमी भूमि को आधिकारिक रूप से जनजातीय आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। प्रस्तावित 166.10 वर्ग किमी विकास क्षेत्र में से 84.10 वर्ग किमी जनजातीय आरक्षित क्षेत्र के साथ ओवरलैप करता है। इस हिस्से में से 11.032 वर्ग किमी भूमि 1972 से राजस्व भूमि के रूप में पहले से ही उपयोग में है। शेष 73.07 वर्ग किमी क्षेत्र को परियोजना उद्देश्यों के लिए अधिसूचना से मुक्त किया जा रहा है। इसके प्रतिपूरण के लिए 76.98 वर्ग किमी क्षेत्र को पुनः जनजातीय आरक्षित क्षेत्र घोषित किया जा रहा है, जिससे कुल मिलाकर 3.912 वर्ग किमी की शुद्ध वृद्धि होती है। चरण-I में केवल 40.01 वर्ग किमी जनजातीय क्षेत्र शामिल है, जिसमें से 11.032 वर्ग किमी 1972 से राजस्व उपयोग में है।

सवाल 6 :- क्या यह परियोजना प्राकृतिक विरासत की रक्षा और राष्ट्रीय विकास को आगे बढ़ाने के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाती है?

इस परियोजना का व्यापक वैज्ञानिक और नियामक मूल्यांकन किया गया है, जिसमें द्वीप की जैव विविधता की विशिष्टता को ध्यान में रखा गया है। परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत और बहु-स्तरीय आकलन पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 के अनुरूप किया गया है, जिसमें द्वीप की पारिस्थितिक संवेदनशीलता और जैव विविधता के महत्व को उचित महत्व दिया गया है। इस मूल्यांकन के आधार पर, किसी भी संभावित प्रभाव से बचने, उसे कम करने और नियंत्रित करने के लिए सख्त और प्रवर्तनीय शर्तों के साथ एक मजबूत ‘पर्यावरण प्रबंधन योजना’ निर्धारित की गई है।

परियोजना को एक संतुलित दृष्टिकोण के साथ तैयार किया गया है, जिसमें पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को रणनीतिक और राष्ट्रीय विकास के उद्देश्यों के साथ जोड़ा गया है। जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक शमन उपाय, निरंतर निगरानी तंत्र और संस्थागत पर्यवेक्षण की व्यवस्था की गई है। इस प्रकार, यह परियोजना एक सुविचारित पहल है, जिसमें पर्यावरणीय चिंताओं का समाधान करते हुए राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय शामिल हैं।

सवाल 7 :- क्या यह परियोजना सुव्यवस्थित रूप से नियोजित, व्यवहार्य और दीर्घकालिक प्रभाव को ध्यान में रखकर तैयार की गई है?

जवाब :- परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत और बहु-स्तरीय आकलन पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 के अनुरूप किया गया है। इसमें द्वीप की पारिस्थितिक संवेदनशीलता और जैव विविधता के महत्व को उचित महत्व दिया गया है। इस आकलन के आधार पर संभावित प्रभावों से बचने, उन्हें कम करने और नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) तथा सख्त और लागू करने योग्य शर्तें निर्धारित की गई हैं।

सवाल 8 :- क्या पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया पूरी तरह से हुई है और क्या इसकी स्वतंत्र न्यायिक जाँच हुई है?

जवाब :- परियोजना का मूल्यांकन पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 के अनुरूप व्यापक रूप से किया गया है। सभी संबंधित पर्यावरणीय पहलुओं की विशेषज्ञ संस्थाओं द्वारा गहन जाँच की गई। पर्यावरणीय मंजूरी में विस्तृत और लागू करने योग्य शर्तें शामिल हैं, जिन्हें एक मजबूत पर्यावरण प्रबंधन योजना और निरंतर निगरानी तंत्र का समर्थन प्राप्त है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सभी पहचानी गई पर्यावरणीय चिंताओं का उचित समाधान किया गया है।

इसके अलावा, यह भी प्रस्तुत किया जाता है कि इस परियोजना ने पर्यावरणीय मामलों के निपटारे के लिए स्थापित विशेष वैधानिक निकाय, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के समक्ष न्यायिक जाँच का सामना किया है। माननीय अधिकरण ने याचिकाओं, अभिलेखों और विशेषज्ञों के सुझावों पर विचार करने के बाद निर्णय प्रक्रिया को बरकरार रखा। इससे यह पुष्टि होती है कि पर्यावरणीय चिंताओं की कानून के अनुसार विधिवत जांच की गई है और समाधान किया गया है।