कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई फिलहाल असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा पर अपने बेबुनियादी और निराधार आरोपों को लेकर चर्चा में हैं। इसी बीच अब वे अपने एक और झूठे दावे को लेकर घिर गए हैं।
गौरव गोगोई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कुछ फोटोज शेयर करते हुए दावा किया है कि यह तस्वीरें उनके दोस्त ने मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच दुबई से भेजी हैं। वह यह दिखाने की कोशिश कर रहे कि वहाँ के हालात सही नहीं है और लोगों के घर खाली पड़े हुए हैं।
Friends in the Middle East are sending me pictures of the Townhouse Address Atlantis The Royal Residences, Crescent Road, Palm Jumeirah, Dubai. pic.twitter.com/Hem5Z6kPhQ
उन्होंने फोटो शेयर करते हुए लिखा, “मिडिल ईस्ट में मेरे दोस्त मुझे टाउनहाउस एड्रेस अटलांटिस द रॉयल रेजिडेंसेस, क्रेसेंट रोड, पाम जुमेराह, दुबई की तस्वीरें भेज रहे हैं।” इन तस्वीरों की सच्चाई जानने के लिए जब हमने इन तस्वीरें को Google पर सर्च किया तो सच्चाई कुछ और निकली। दरअसल यह तस्वीरें ‘Knight Frank’ नाम की वेबसाइट से चुराई (दूसरों की तस्वीरों को अपने नाम से बताया) गई हैं।
इन तस्वीरों की पुष्टि के लिए जब हमने रिवर्स Image किया तो इस साइट पर यह फोटो अपलोड मिली, जिसके बाद सामने आया कि असल में गौरव गोगोई जो दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, असल में वह बात है ही नहीं। अब सोशल मीडिया पर भी यूजर्स के बीच भी गौरव गोगोई अपना तमाशा बनवा रहे हैं। यूजर्स स्क्रिनशॉट्स शेयर कर उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं।
किसी ने कहा ‘पाईजान’ तो कोई दोस्त का नाम बता रहा ‘हमजा’
एक यूजर ने स्क्रिनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “आप एक धोखेबाज हैं। आप इस वेबसाइट से तस्वीरें चुरा रहे हैं। क्या आप अपनी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न का पाकिस्तानी बैंक खाता साझा कर सकते हैं?”
You are fraud . You are stealing pictures from this website :. Can you share the Pakistani bank account of your compromised wife Elizabeth Coleburn pic.twitter.com/EPdsdcgu0D
एक ने कॉन्ग्रेस पार्टी और गौरव गोगोई को टैग करते हुए लिखा, ” कॉन्ग्रेस पार्टी, गौरव गोगोई और कॉन्ग्रेस के बाकी लोगों को लगता है कि हम अभी भी इंटरनेट से पहले के जमाने में जी रहे हैं।”
किसी ने लिखा कि ये ISI एजेंट है और फेक न्यूज फैलाता है तो किसी ने लिखा कि चुप रहो वर्ना पाकिस्तान भेज देंगे। किसी ने लिखा, “बस उसे नजरअंदाज कर दो, जैसे पूरे असम ने उसे नजरअंदाज कर दिया है (हमें कॉन्ग्रेस नहीं चाहिए)।”
Just ignore him like entire Aasam ignore him ( Nalage amak Congress) Entire life we don't want Congress
इसी तरह तमाम यूजर्स ने जमकर गौरव गोगोई की बेइज्जती की है। गौरतलब है कि पिछले कई दिनों से गौरव गोगोई अपने ऐसे ही झूठे दावों को लेकर सुर्खियाँ बटोरने का काम कर रहे हैं और फिर झूठे साबित हो रहे हैं।
गुजरात में स्थानीय निकाय चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक माहौल भी तेजी से गरमाता जा रहा है। इसी बीच आम आदमी पार्टी के विधायक गोपाल इटालिया के एक दावे ने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है।
उन्होंने गुजरात पुलिस पर आरोप लगाया कि वह उनके सूरत स्थित घर पर पहुँची और उनकी माँ के साथ दुर्व्यवहार किया। उन्होंने यह भी कहा कि यह सब राज्य के गृह मंत्री हर्ष संघवी के इशारे पर हुआ।
सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ विवाद
गोपाल इटालिया ने एक्स पर भावुक पोस्ट लिखते हुए सवाल उठाया कि क्या एक साधारण किसान परिवार से आने वाले व्यक्ति का राजनीति में आना अपराध है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनकी बुजुर्ग माँ को डराने-धमकाने की कोशिश की और सोसायटी के गार्ड से भी उनके आने-जाने के बारे में पूछताछ कर माहौल बनाने की कोशिश की गई।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरकार को उनसे कोई समस्या है तो उन्हें सीधे बुलाया जाए या गिरफ्तार किया जाए, लेकिन उनके परिवार को परेशान करना गलत है। इस दौरान उन्होंने खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जो राजनीति में बदलाव लाने आया है, लेकिन अब उनके परिवार को इसका खामियाजा उठाना पड़ रहा है।
दूरदराज के गाँव के एक साधारण किसान परिवार में पैदा हुए गोपाल इटालिया का राजनीति में आना गुनाह हो गया?
गुजरात के गृहमंत्री हर्ष संघवी ने निम्नता की सारी हदे आज पार कर दी। आज सुबह सूरत के मेरे घर पर हर्ष संघवी ने पुलिस भेज कर मेरी बूढ़ी माता को डराने धमकाने की कोशिश करी। पुलिस…
अहम बात ये भी है कि गोपाल इटालिया पहले भी विवादों में रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री और दूसरे नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की थीं। संतों और कथाकारों के बारे में भी अश्लील बयान दिए थे।
ऐसे में उनके साफ राजनीति वाले दावे पर भी सवाल उठने लगे। गोपाल के आरोपों को आम आदमी पार्टी के समर्थकों ने तेजी से वायरल किया। पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भी सोशल मीडिया के जरिए गुजरात पुलिस पर निशाना साधा और इसे राजनीतिक दबाव की कार्रवाई बताया। माहौल ऐसा बनाया गया कि चुनाव से पहले विपक्षी नेताओं को डराने की कोशिश की जा रही है।
कुछ ही घंटों में सामने आई सच्चाई
लेकिन यह पूरा नैरेटिव ज्यादा देर तक नहीं टिक पाया। कुछ ही घंटों में पुलिस ने घटना की जानकारी दी। दरअसल, गोपाल इटालिया के खिलाफ 2020 में मेहसाणा में एक FIR दर्ज हुई थी, जो अभी अदालत में लंबित है।
कोर्ट के बार-बार समन भेजे जाने के बावजूद वह पेश नहीं हुए, तो अदालत ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। ऐसे में पुलिस ने कोर्ट के ऑर्डर को मानते हुए उनको गिरफ्तार करने पहुँची थी।
पुलिस क्यों पहुँची थी घर?
पुलिस के अनुसार, गोपाल घर पर नहीं मिले, इसलिए उनकी माँ से सामान्य पूछताछ की गई। इसके बाद टीम ने रिकॉर्ड के लिए घर की तस्वीर ली और बिना किसी विवाद के वापस लौट गई।
पुलिस ने साफ कहा कि किसी को न तो धमकाया गया और न ही किसी तरह का दुर्व्यवहार किया गया। यह केवल कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा था।
वारंट की बात छुपाने पर सवाल
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि गोपाल इटालिया ने अपने पोस्ट में यह नहीं बताया कि पुलिस वारंट लेकर आई थी। उन्होंने पूरे मामले को भावनात्मक रूप देकर एकतरफा कहानी पेश की, जिससे लोगों में सहानुभूति पैदा हो सके।
वारंट काण्ड में अब @Gopal_Italia का एक नया ऑडियो वायरल हुआ है जिससे स्पष्ट पता चलता है की गोपाल को पता था की पुलिस कोर्ट का समन लेकर उसके सूरत निवास पर जाने वाली है और इस ऑडियो में गोपाल साफ़ ये कहते हुए सुनाई दे रहे हैं की आने दो पुलिस को कोर्ट का वारंट लेकर ताकि उन्हें इसका… https://t.co/PNqm1iYZ8Epic.twitter.com/cSRytww3rf
इस बीच सोशल मीडिया पर एक ऑडियो क्लिप भी वायरल हो गई, जिसमें कथित तौर पर गोपाल इटालिया की आवाज सुनी गई। बातचीत में सामने वाला व्यक्ति जीतू कहता है कि पुलिस वारंट लेकर आ सकती है।
इस पर गोपाल जवाब देते हैं कि चिंता की बात नहीं है। वह स्थिति संभाल लेंगे। बाद में ऑडियो के सामने आने के बाद गोपाल इटालिया ने एक और वीडियो जारी किया और दावा किया कि यह AI से बनाया गया है और इसके पीछे हर्ष संघवी का हाथ है। आम आदमी पार्टी ने भी इसे फर्जी बताया।
हालाँकि, यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि अगर ऑडियो फर्जी है, तो इसकी फॉरेंसिक जाँच (FSL) की माँग क्यों नहीं की गई? ऐसा करने से सच्चाई सामने आ सकती थी। लेकिन खबर लिखे जाने तक ऐसी कोई माँग नहीं की गई।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में लिखी हुई है। जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)
पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर बदलाव के बाद करीब 90 लाख वोटरों के नाम हटाए जाने के बाद राजनीतिक बहस छिड़ गई है। चुनाव आयोग ने मंगलवार (7 अप्रैल 2026) को ताजा डेटा शेयर किया है। उसके अनुसार, प्रक्रिया के आखिरी स्टेज में कुल 27,16,393 वोटर अयोग्य पाए गए।
A district-wise list of eligible and ineligible voters stated that of the 60.06 lakh voters marked under adjudication, 27,16,393 voters were found ineligiblehttps://t.co/p6J27fzE0npic.twitter.com/aP8TcvbCi0
शुरुआत में चुनाव ने 58.25 लाख वोटर्स के नाम हटा दिए। दिसंबर 2025 में प्रकाशित ड्राफ्ट में मरे हुए, गैर-मौजूद, शिफ्ट हुए या दो जगहों पर एंट्री वाले पाए गए थे। इनके नाम हटते ही कुल वोटरों की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ हो गया। 28 फरवरी 2026 को फाइनल सूची से और 5 लाख नाम हटा दिए गए। इसके बाद कुल हटाए गए नामों की संख्या 91 लाख से थोड़ी कम रह गई।
STORY | Nearly 91 lakh names deleted from Bengal electoral rolls after judicial scrutiny under SIR
Nearly 91 lakh voters' names have been deleted from the electoral rolls in West Bengal following the completion of the SIR exercise in the state, according to the Election… pic.twitter.com/kN5haeBhEs
शुरू में जिन 60.06 लाख वोटर्स के नाम पर सवाल उठे थे, उनमें से लगभग आधे अयोग्य पाए गए। सबसे ज्यादा नाम मुर्शिदाबाद में हटाए गए। यह जिला मुस्लिम बहुल है। यहाँ 11 लाख वोटर्स में से 4.55 लाख से ज्यादा वोटर्स अयोग्य पाए गए। यह जिला बांग्लादेश की सीमा से लगा हुआ है, इसलिए यहाँ सबसे ज्यादा घुसपैठिए हैं।
दूसरी तरफ, झारग्राम में सबसे कम नाम कटे। यहाँ सिर्फ 1240 नाम हटाए गए। कोलकाता में बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटे। कोलकाता नॉर्थ में 39164, कोलकाता साउथ में 28468 नाम हटाए गए। भवानीपुर इसी जिले में आता है, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बीजेपी से सुवेंदु अधिकारी आमने-सामने हैं।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और ‘टारगेट’ करने के आरोप
जैसे ही ये नंबर पब्लिक डोमेन में आए, तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार और अलग-अलग मीडिया संगठनों ने अपने तरीके से लिखना शुरू कर दिया। कहा गया कि चुनाव आयोग मुस्लिम वोटर्स को टारगेट कर रहा है। आरोप लगाने में सीएम ममता बनर्जी भी पीछे नहीं रही, उन्होंने EC और BJP की लीडरशिप वाली केंद्र सरकार पर ‘टारगेट करके नाम हटाने’ का आरोप लगाया।
नादिया में एक रैली के दौरान, उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारी जानबूझकर मतुआ, राजबंशी और अल्पसंख्यकों को बाहर कर रहे हैं, ताकि उनका वोटर बेस कमजोर हो सके। उन्होंने कहा कि यह ‘भेदभाव’ टीएमसी को नुकसान पहुँचाने की एक सोची-समझी चाल है।
कुछ मीडिया संगठनों ने इस खबर को हवा दी। देश भर की मीडिया में ‘लाखों मुस्लिम वोटर्स’ को हटाने को प्रमुखता से उठाया जाने लगा। पूरे एडमिनिस्ट्रेटिव काम को इस्लामोफोबिक प्रोजेक्ट के तौर पर पेश किया जाने लगा।
उदाहरण के लिए, हैदराबाद के एक उर्दू अखबार, द सियासत डेली ने 7 अप्रैल को एक रिपोर्ट छापी, जिसकी हेडलाइन थी: ‘पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में हटाए गए 95 प्रतिशत वोटर्स मुस्लिम हैं। “
कोलकाता की संस्था सबर इंस्टीट्यूट ने दावा किया कि नंदीग्राम के लिए 7 सप्लीमेंट्री लिस्ट में, 95.5% नाम हटाए गए। इसमें बताया गया कि नंदीग्राम की आबादी में मुस्लिम सिर्फ 25% हैं, लेकिन हटाए जाने का सबसे ज्यादा असर उन पर पड़ा। जबकि 75% गैर-मुस्लिम आबादी में सिर्फ 4.5% नाम हटाए गए। ये रिपोर्ट ‘टारगेट’ करने का एक ‘पैटर्न’ साबित करने के लिए बनाई गई थीं।
द स्क्रॉल जैसे दूसरे आउटलेट्स ने भी ऐसा ही किया, और सबर इंस्टीट्यूट के उसी डेटा का इस्तेमाल करके यह बताया कि SIR प्रोसेस असल में अल्पसंख्यकों के खिलाफ था।
हजारों हिन्दू वोटरों को हटाया गया
लेकिन, डेटा को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि ‘सिर्फ मुस्लिम’ वाली बात सच्चाई से परे है। असल में हजारों हिंदू नाम हटे हैं। इनमें मतुआ-नामशूद्र समुदाय से ज्यादा हैं। इससे बीजेपी के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। बोंगाँव लोकसभा सीट से सांसद बीजेपी के केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने इस पर जोर दिया है।
मतुआ इलाके के पाँच विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 1.38 लाख नाम हटाए गए हैं। चांदपारा ग्राम पंचायत में एक खास मामले में, एक सप्लीमेंट्री लिस्ट से 186 में से 183 नाम हटा दिए गए। इनमें से अधिकांश मतुआ समुदाय के हैं।
सबर इंस्टीट्यूट के अपने एनालिसिस में बताया है कि मतुआ क्षेत्र में 7.8% का कोई दस्तावेज नहीं था, जो राज्य में औसत से लगभग दोगुना है।
यहाँ तक कि बागदा, बनगांव उत्तर और गायघाटा जैसी बीजेपी की जीती हुई सीटों में हजारों वोटरों को हटा दिया गया। लोकल बीजेपी नेता अब अपने समर्थकों को जवाब नहीं दे पा रहे हैं। ये पूछ रहे हैं कि अगर पार्टी केंद्र में सत्ता में है, तो उनके नाम क्यों हटाए गए।
बड़ा मुद्दा: गैर-कानूनी प्रवास और नकली वोटर
इस पूरी कवायद के मूल में घुसपैठ और नकली वोटर एंट्री का मुद्दा है। भारत और बांग्लादेश के बीच 4095 K.M. लंबी बॉर्डर लाइन है, पश्चिम बंगाल 2216 किमी शेयर करता है, जो 54% से ज्यादा है। दोनों जगह के लोग भाषा और वेशभूषा के हिसाब से एक जैसे हैं। इसलिए पश्चिम बंगाल बांग्लादेशी घुसपैठियों से बहुत ज्यादा प्रभावित है।
पश्चिम बंगाल के दस जिले हैं जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं। ये हैं- नॉर्थ 24 परगना, नादिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, नॉर्थ दिनाजपुर, साउथ दिनाजपुर, दार्जिलिंग, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी। बॉर्डर के दोनों तरफ के लोग अक्सर भाषा और नस्ल के हिसाब से एक जैसे होते हैं, जिससे बॉर्डर पार आने-जाने वालों को ट्रैक करना मुश्किल काम है।
इस वजह से बांग्लादेश से घुसपैठ के मामले में पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में से एक बन गया है। माना जाता है कि पिछले कुछ सालों में इन 7 जिलों में रहने वाले ऐसे कई लोगों ने पहचान पत्र हासिल कर लिए और अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा दिया।
यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा गैर-कानूनी बांग्लादेशी प्रवासी हैं। पिछले तीन सालों में 2600 से बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़कर बांग्लादेश वापस भेजा गया।
ये समझा जा सकता है कि अगर कोई नकली दस्तावेजों के साथ भारत में गैर-कानूनी तरीके से रह रहा है और इसकी जाँच होगी, तो ज़ाहिर तौर पर हटाए गए नामों में से ज़्यादातर ऐसे लोगों के नाम होंगे।
यह किसी धर्म के खिलाफ़ कोई ‘साजिश’ नहीं है; यह एक पुरानी समस्या पर प्रशासनिक कार्रवाई है।
डर का फैक्टर: बॉर्डर से भाग रहे घुसपैठिए
SIR के काम करने का सबसे बड़ा सबूत किसी स्प्रेडशीट में नहीं, बल्कि बॉर्डर पर मिलता है। जब से चुनाव आयोग ने पिछले साल नवंबर में स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न के दूसरे फेज के लिए घर-घर जाकर गिनती की घोषणा की है, तब से गैर-कानूनी बस्तियों में डर का माहौल है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लोगों के ग्रुप बैग और सामान लेकर हकीमपुर (बशीरहाट) जैसे चेकपोस्ट पर बांग्लादेश बॉर्डर की ओर वापस जाते हुए दिख रहे हैं।
DD न्यूज और सोशल मीडिया क्लिप की रिपोर्ट में ऐसे लोग दिख रहे हैं जो 5, 7 या 10 साल से भारत में गैर-कानूनी तरीके से रह रहे थे, लेकिन अचानक उन्होंने जाने का फैसला कर लिया। उनमें से कुछ ने कैमरे पर खुलेआम माना कि उनके पास कोई डॉक्यूमेंट नहीं थे और वे यहाँ गैर-कानूनी तरीके से रह रहे थे। एक आदमी ने बताया कि वह कोलकाता एयरपोर्ट के पास बिराटी में रहता था, लेकिन उसके पास कोई पेपर नहीं था और वह सख्त वेरिफिकेशन प्रोसेस के डर से भाग रहा था। दूसरे लोग टैक्सी ड्राइवर या ईंट भट्टों में काम कर रहे थे, जो नकली ID की मदद से लोकल आबादी में घुल-मिल गए थे।
#NewsPunch | Following the SIR announcement, many illegal immigrants who have been living for years in West Bengal and other states are rushing to the border to return to Bangladesh.
ऐसे ही एक वीडियो में कुछ लोग मान रहे हैं कि वे बगैर कागजात के भारत में रह रहे हैं। एक महिला ने कहा उनके पास कोई डॉक्यूमेंट नहीं हैं, लेकिन वह भारत में काम कर रही है। एक पुरुष ने कहा कि हाँ हम अवैध तरीके से रह रहे हैं।
कहा जाता है कि उनमें से कई लोग कंस्ट्रक्शन, ट्रांसपोर्ट और छोटे बिज़नेस में काम कर रहे थे, और सालों से लोकल लोगों के साथ घुल-मिल गए थे।
यह अचानक पलायन साबित करता है कि घर-घर वेरिफिकेशन के दौरान पकड़े जाने का डर असली है। सालों तक राजनीतिक समर्थन और ‘सेक्युलर’ शील्ड ने इन गैर-कानूनी लोगों को रहने और वोट देने दिया। लेकिन EC के कड़ा स्टैंड लेने और 2002 से जुड़े डॉक्यूमेंट्री प्रूफ माँगने के बाद कई लोगों को भागना पड़ा।
नतीजा यह है कि जहाँ मीडिया ‘टारगेटेड डिलीशन’ पर फोकस करता है और राजनीतिक पार्टियाँ एसआईआर का इस्तेमाल पीड़ित बनने के लिए करती हैं, वहीं असलियत साफ दिख रहा है। पश्चिम बंगाल के वोटरों में घुसपैठिए बड़ी संख्या में शामिल थे।
अभी 91 लाख नामों को हटाना एक जरूरी सर्जरी है, ताकि सिर्फ भारतीय नागरिक ही राज्य का भविष्य तय कर सकें। चाहे मुर्शिदाबाद में कोई मुस्लिम हो या बोंगांव में कोई मतुआ, अगर आप अपना पहचान साबित नहीं कर सकते, तो आपका नाम लिस्ट में नहीं होना चाहिए।
(यह मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया लेख है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
लगातार तीन लोकसभा चुनाव में बुरी तरह मुँह की खाने वाली कॉन्ग्रेस अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। राज्यों की बात करें तो अब कॉन्ग्रेस की सरकार कुछ राज्यों जैसे- हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड, तमिलनाडु में रह गई है। एक के बाद एक राज्य उसकी हाथों से फिसलते रहे। इसमें नेताओं के बड़बोले बयान ने भी अहम भूमिका निभाई है।
पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इसमें कॉन्ग्रेस काफी आक्रामक दिखने का प्रयास कर रही है। खास कर असम और केरल में।
यहाँ पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बयान लगातार सीमाएँ लाँघ रहे हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने पहले केरल में क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाला बयान दिया, उसके बाद उन्होंने असम में इस्लामी तुष्टीकरण की कोशिश की।
असम में खरगे का मुस्लिम तुष्टिकरण वाला दाँव
असम विधानसभा चुनाव प्रचार थमने से चंद घंटे पहले मल्लिकार्जुन खरगे ने रैली के दौरान कहा कि ” यहाँ हिन्दू और मुस्लिम भाई बैठे हैं। अगर कोई जहरीला साँप आपके सामने से गुजर रहा है और नमाज भी पढ़ रहे हैं, तो नमाज छोड़कर पहले उस जहरीली साँप को मारना। ये कुरान में है और मैं यही कहूँगा। आप नमाज तोड़ने की परवाह ना करें। जहरीला साँप है बीजेपी और आरएसएस, इसको अगर आप नहीं मारेंगे, तो आप कभी नहीं बचेंगे।” असम जैसे संवेदनशील राज्य में, जहाँ घुसपैठियों और बांग्लादेशी मुस्लिम आबादी से जनता त्रस्त है। सरकारी जमीन पर बड़े पैमाने पर कब्जा कर चुके घुसपैठियों से असम के मूल निवासी परेशान हैं। इस चुनाव में घुसपैठियों को बाहर निकालने, एनआरसी, भूमि सुधार जैसे मुद्दे अहम बन गए हैं। ऐसे में मुस्लिमों की तुष्टिकरण के लिए कुरान और नमाज का नाम लेना और बीजेपी-आरएसएस को जहरीला साँप कहना, राजनीतिक के जबदस्त गिरते स्तर को दर्शाता है।
देश की सबसे पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस और उसके अध्यक्ष को यह इल्म भी नहीं है कि वह जिस पद पर हैं, उनकी बातें और बर्ताव देश के लोगों को रास्ता दिखाती है। इस तरह का बयान देकर देश को क्या संदेश देना चाहते हैं खरगे?
यही वजह है कि बीजेपी ने भी उन्हें चुनौती दे डाली है कि असम में चुनाव जीत कर दिखाएँ। गृहमंत्री शाह ने खरगे के बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि चुनाव में हार का डर सता रहा है इसलिए बीजेपी-आरएसएस पर इस तरह के बयान दे रहे हैं अध्यक्ष खरगे।
गुजरातियों को ‘अनपढ़’ कहा था खरगे ने
इससे पहले केरल के इडुक्की की एक रैली में उन्होंने गुजरातियों और उत्तर भारतीय राज्यों के लोगों को नीचा दिखाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि मोदी गुजरात और दूसरे इलाकों के लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं, क्योंकि वे अनपढ़ हैं, लेकिन केरल के लोग पढ़े-लिखे और समझदार हैं, वे बेवकूफ नहीं बनेंगे।
उन्होंने कहा, “केरल के लोग बहुत स्मार्ट हैं। वे बहुत पढ़े-लिखे हैं। मोदीजी… विजय (केरल के CM) आप दोनों गुजरात और दूसरी जगहों के अनपढ़ लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं, लेकिन आप केरल के लोगों को बेवकूफ नहीं बना सकते।”
केरल चुनाव में जाकर गुजरात और दूसरे राज्यों के लोगों को ‘बेवकूफ’ और ‘अनपढ़’ बताना क्या राज्यों में नफरत पैदा नहीं करता? क्या एक राज्य की तुलना में दूसरे राज्य को नीचा दिखाने की ये कोशिश नहीं है? गुजरात में पिछले दो दशक से ज्यादा वक्त से कॉन्ग्रेस सत्ता में नहीं लौटी है, तो अब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष जनता को ही ‘बेवकूफ’ समझने लगे हैं। हिन्दी राज्यों में भी पार्टी का बुरा हाल है। ऐसे में सत्ता से बेदखल होने पर जनता को ‘अनपढ़’ कहना, सिर्फ राज्यों का ही नहीं, देश का अपमान है।
हालाँकि उन्होने सोशल मीडिया पर इसके लिए खेद प्रकट कर दी और कहा कि उनके मन में गुजरातियों के लिए काफी सम्मान है। ऐसी टिप्पणियाँ रैली में कर उन्होंने जनता को ठेस पहुँचा दी और अब चुपके से खेद जता कर उसपर मरहम लगने की उम्मीद कर रहे हैं।
कर्नाटक चुनाव में पीएम मोदी को कहा था ‘साँप’
इससे पहले भी मल्लिकार्जुन खरगे ने ‘जहरीला साँप’ शब्द का इस्तेमाल किया था। वक्त था कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023। एक चुनावी रैली के दौरान उन्होने पीएम मोदी की तुलना ‘जहरीले साँप’ से की थी। उन्होंने कहा था कि मोदी जहरीला साँप की तरह हैं। आप इसे जहर समझें या न समझें, लेकिन अगर आप इसे चखेंगे, तो मर जाएँगे…आप सोच सकते हैं कि क्या ये जहर ठीक है। खरगे के खिलाफ कोर्ट में भी अर्जी दायर की गई थी।
महाकुंभ पर भी विवादित बयान
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष खरगे न सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण वाले बयान देते हैं, बल्कि सनातन को अपमानित करने का भी कोई मौका नहीं छोड़ते। प्रयागराज महाकुंभ 2025 में जब लाखों श्रद्धालु डुबकी लगाने के लिए त्रिवेदी के तट पर जुटे थे, उस वक्त खरगे ने कहा कि डुबकी लगाने से गरीबी दूर नहीं होगी और न ही किसी का पेट भरेगा।
मध्यप्रदेश के महू में रैली के दौरान उन्होंने गंगा स्नान को रोजी-रोटी से जोड़ा और तंज कसा। यह न सिर्फ उन करोड़ों लोगों का अपमान था, जो डुबकी लगाने के लिए देश के कोने-कोने से आए थे, बल्कि यह सनातन का भी अपमान था। क्या खरगे ऐसा ही बयान किसी दूसरे धर्म की परंपरा को लेकर दे सकते हैं?
इतना ही नहीं उन्होंने पीएम मोदी और गृहमंत्री शाह के लिए कहा था कि इनलोगों ने इतने पाप किए हैं कि उन्हें डुबकी लगाने से भी स्वर्ग नहीं मिलेगा। कॉन्ग्रेस का कोई नेता महाकुंभ में डुबकी लगाने तो नहीं गया था। अब शायद बगैर डुबकी लगाए ही उन्हें स्वर्ग मिलने का भान हो गया हो, तो बात अलग है।
RSS पर प्रतिबंध लगाने की खरगे ने की थी माँग
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 31 अक्टूबर 2025 को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती के मौके पर कहा था कि आरएसएस पर फिर से प्रतिबंध लगा देना चाहिए। उन्होंने कहा था कि देश में कानून व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं के लिए यही संगठन जिम्मेदार है। हालाँकि उन्होंने इसे व्यक्तिगत विचार कहा, लेकिन खरगे के बयान के बाद सियासी बवाल हुआ था।
आरएसएस दुनिया की सबसे बड़ी स्वंयसेवी संस्था है। 100 साल का स्वर्णिम इतिहास वाली इस संस्था ने देश को दो सबसे सफल प्रधानमंत्री दिए हैं। एक नरेन्द्र मोदी और दूसरे अटल बिहारी वाजपेयी। समाज को सही दिशा दिखाने वाली इस संस्था को जनता ने सिर आँखों पर बिठाया है। इस पर आरोप मढ़ कर खरगे जी कॉन्ग्रेस को कैसा मार्गदर्शन कर रहे हैं?
दरअसल कॉन्ग्रेस अपनी दयनीय हालत के लिए अपने कर्मों को नहीं, देश की जनता, आरएसएस, बीजेपी और पीएम मोदी को जिम्मेदार ठहराती है। 60 साल राज करने के बाद भी जनता एक के बाद एक तीन लोकसभा चुनावों और कई राज्यों में हरा चुकी है। सत्ता से बेदखल होने का दुख खरगे जी को इतना हो गया है कि अब जनता को ही बेवकूफ और अनपढ़ समझने लगे हैं।
कॉन्ग्रेस के नेताओं के विवादित बोल हमेशा चुनाव में बीजेपी को फायदा पहुँचाते रहे हैं। चाहे वह सोनिया गाँधी का पीएम मोदी पर दिया गया ‘मौत का सौदागर’ वाला बयान हो या राहुल गाँधी का बिहार चुनाव के दौरान दिया गया ‘नाचने वाला’ बयान। फिलहाल कॉन्ग्रेस अध्यक्ष खरगे की बारी है, जिन्होंने केरल से असम तक बीजेपी-आरएसएस पर आपत्तिजनक टिप्पणी की और मुस्लिम तुष्टिकरण वाला बयान दिया।
उनका बयान विभाजनकारी, वैमनस्यपूर्ण और नफरत से भरा था। हालाँकि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि वे व्यक्तिगत बयान नहीं देते और उनके कहने का मतलब विचारधारा साँप की तरह हैं, जिसे चाटते ही मौत हो जाएगी। लेकिन राजनीति में बयान काफी मायने रखते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि कॉन्ग्रेस ने 60 साल के शासनकाल में क्या बोया, जिसे काटते वक्त उसे जहर की याद आ रही है। भ्रष्टाचार, वंशवाद, परिवारवाद से लेकर देश के विभाजन का आरोप कॉन्ग्रेस पर लगते रहे हैं। ऐसे में अपने प्रतिद्वंदी पार्टी को निचले स्तर पर आकर गालियाँ देना उनके राजनीतिक दिवालिएपन को दर्शाता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब कॉन्ग्रेस ने व्यक्तिगत तौर पर पीएम मोदी, बीजेपी या आरएसएस पर आपत्तिजनक बयान दिया है, बुरी तरह हारी है।
गुजरात हाईकोर्ट ने 2021 में सामने आए धर्मांतरण मामले में दो मौलवियों की याचिका खारिज कर दी है। यह मामला भरूच जिले के आमोद तालुका से जुड़ा है। जस्टिस गीता गोपी की एकल पीठ ने 30 मार्च 2026 को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयान और रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से पहली नजर में धर्मांतरण की गतिविधियों के संकेत मिलते हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई जरूरत नहीं है।
यह मामला नवंबर 2021 का है, जब आमोद पुलिस स्टेशन में एक FIR दर्ज हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कंकड़िया गाँव और आसपास के आदिवासी इलाकों में करीब 37 हिंदू परिवारों के लगभग 100 लोगों का लालच देकर इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया। इस मामले में पुलिस अब तक कई आरोपियों के खिलाफ तीसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर चुकी है।
आरोपित मौलवी सरफराज उर्फ जावेद और रमिज राजा उर्फ औवेश अब्दुल गनी ने पहले सेशन कोर्ट में खुद को केस से हटाने की माँग की थी लेकिन वहाँ से उनकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दोनों के खिलाफ गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट और आईपीसी के तहत मामले दर्ज हैं।
कोर्ट में क्या दलील दी गई?
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील उमर फारूक एम. खराड़ी ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने गलत फैसला दिया है और आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों मौलवियों को झूठा फँसाया गया है और उन्हें काफी लंबे समय बाद तीसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट में आरोपित बनाया गया है।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि दोनों लोग पेशे से मौलवी हैं और मजहब का प्रचार करना उनका काम है। वकील ने कहा कि भारतीय संविधान के तहत धर्म का प्रचार करना एक मौलिक अधिकार है और इसलिए केवल धार्मिक गतिविधियाँ करने पर उनके खिलाफ आपराधिक मामला नहीं बनता।
सरकार ने किया साजिश का पर्दाफाश
सरकारी वकील भार्गव पंड्या ने बचाव पक्ष की दलीलों का विरोध करते हुए कोर्ट में कहा कि यह मामला सिर्फ धर्म प्रचार का नहीं बल्कि गरीब लोगों को लालच देकर धर्मांतरण कराने की एक सोची-समझी साजिश है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि आरोपित जावेद मुफ्ती पहले भी कई भोले-भाले ग्रामीणों के धर्मांतरण में सक्रिय रहा है।
जाँच में सामने आया है कि आरोपित लोगों को नकद पैसे, नए कपड़े और दवाइयाँ देते थे। इसके अलावा, आदिवासी परिवारों को एयर कूलर, वाटर कूलर, ठेले (हैंडकार्ट) और नमाज के लिए चटाई या चादर जैसी सुविधाओं का लालच देकर इस्लाम अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता था।
मुख्य शिकायतकर्ता प्रवीणभाई वसावा ने आरोप लगाया कि साल 2018 में उन्हें और अन्य परिवारों को लालच देकर धर्मांतरण कराया गया था और उनके आधार कार्ड तक बदल दिए गए थे। वहीं, अन्य गवाहों ने भी पुलिस को बयान देकर बताया कि आरोपित रमिज राजा लोगों को सुविधाएँ देने का वादा करके धर्मांतरण करवाता था।
पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने 2019 की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि आरोपी अक्सर लग्जरी कारों में कंकड़िया गाँव आते थे। गाँव का एक व्यक्ति वहाँ नियमित बैठकें आयोजित करता था, जहाँ नमाज पढ़ी जाती थी और इस्लाम की जानकारी देने के नाम पर भाषण होते थे। पुलिस ने कोर्ट को यह भी बताया कि इन बैठकों के वीडियो सबूत के तौर पर उनके पास मौजूद हैं।
सरकारी वकील ने कहा कि गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2003 की धारा 5 और 2008 के नियम 3, 4 और 5 के तहत धर्मांतरण के लिए जो कानूनी अनुमति जरूरी है, उसका इस मामले में कहीं पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि कानूनी प्रक्रिया का पालन न होना ही इस गतिविधि को अवैध और आपराधिक साबित करने के लिए पर्याप्त है और इसलिए आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
आखिरकार, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों को मान लिया और ट्रायल कोर्ट के आदेश में दखल देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में सबूतों और गवाहों के बयानों की जाँच करने के बाद ऐसा लगता है कि मामला बनता है। इसके अलावा, इस बात के भी सबूत हैं कि ये मौलवी सिर्फ धर्मांतरण करवाने के इरादे से ही बैठकें कर रहे थे। कोर्ट ने साफ किया कि ट्रायल कोर्ट ने सही फैसला लिया था और हाईकोर्ट इसमें कोई दखल नहीं देगा। इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई।
इसी मामले में गुजरात HC पहले भी अन्य आरोपितों की याचिकाएँ खारिज कर चुका है जिनमें FIR रद्द करने की माँग की गई थी। अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने ऐसी कुल सात याचिकाओं को खारिज कर दिया था। उस दौरान कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी भी की थी। कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति खुद धर्म परिवर्तन करने के बाद दूसरों को भी धर्म बदलने के लिए उकसाता या लालच देता है, तो उसे सिर्फ ‘पीड़ित’ नहीं माना जा सकता। ऐसे व्यक्ति को आरोपित भी माना जा सकता है और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
क्या था पूरा मामला?
भरूच जिले के आमोद तालुका में जनजातीय हिंदू समुदाय को निशाना बनाकर किया गया यह सामूहिक धर्मांतरण कोई एक-दो साल की घटना नहीं थी बल्कि 2006 से 2021 तक चलने वाली एक सुनियोजित साजिश थी।
पुलिस जाँच के मुताबिक, कंकड़िया गाँव के करीब 37 जनजातीय हिंदू परिवारों के 100 से ज्यादा लोगों को लालच देकर इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया। जाँच में यह भी सामने आया कि इसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था जिसमें विदेश से फंडिंग और स्थानीय स्तर पर सक्रिय गिरोह शामिल था। इनका मुख्य मकसद गरीब जनजातीय लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनका धर्म परिवर्तन कराना था।
इस मामले की शुरुआत शिकायतकर्ता प्रवीणभाई वसंतभाई वसावा से हुई। उन्होंने बताया कि 2018 में उन पर दबाव डालकर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया और उनका नाम बदलकर ‘सलमान पटेल’ कर दिया गया। बाद में उन्होंने पुलिस को बताया कि इलाके के लोग बेहद गरीब थे और आरोपितों ने इसी का फायदा उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि शुरुआत में उन्हें शरिया कानून के मुताबिक जीवन जीने के लिए कहा गया लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि यह सब लालच और धोखे का खेल था।
जाँच में सामने आया कि आरोपितों ने धर्मांतरण के लिए ‘इनाम, लालच और दबाव’ की नीति अपनाई थी। गरीब आदिवासियों को पैसे, अनाज, नौकरी, पक्के मकान और शादी जैसी झूठी उम्मीदें दी जाती थीं। उन्हें लगातार यह बताया जाता था कि हिंदू धर्म में कुछ नहीं है और इस्लाम ही बेहतर है। इस पूरे खेल में कानूनी धोखाधड़ी भी की गई। गाँव वालों को बहलाकर सूरत ले जाया जाता था और वहाँ उनसे गाड़ी में बैठाकर दस्तावेजों पर साइन करवाए जाते थे ताकि उनके आधार कार्ड और अन्य सरकारी पहचान पत्रों में नाम और धर्म बदल दिया जाए।
नवंबर 2021 में आमोद पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में कई स्थानीय और विदेशी लोगों को आरोपी बनाया गया। इसमें शब्बीर और समद बेकरीवाला जैसे नाम शामिल हैं। वहीं, लंदन में रहने वाले हाजी अब्दुल्ला फेफड़ावाला का नाम मुख्य साजिशकर्ता के तौर पर सामने आया जो विदेश में धर्मांतरण की संख्या दिखाकर फंडिंग जुटाता था।
जाँच एजेंसियों के अनुसार, आरोपित इस पूरी गतिविधि को एक ‘व्यवसाय की तरह चलाते थे जिसमें हर धर्मांतरण पर विदेश से पैसा मिलता था और उसी पैसे से आगे और लोगों को लालच दिया जाता था। धर्मांतरण के बाद जनजातीय बच्चों को जंबूसर और हजीरा के मदरसों में भेजा जाता था, जहाँ उनका ब्रेनवॉश किया जाता था।
इसके अलावा, उन्हें तबलीगी जमात के जरिए मालेगाँव और मुंबई जैसे शहरों में धार्मिक कार्यक्रमों में ले जाया जाता था ताकि उन्हें उनकी मूल संस्कृति से पूरी तरह अलग किया जा सके। गुजरात पुलिस ने इस मामले को सिर्फ एक स्थानीय अपराध नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर की रची गई एक साजिश के रूप में पेश किया है।
(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
गुजरात की आर्थिक राजधानी माने जाने वाला अहमदाबाद आज सिर्फ अपने विकास के लिए ही नहीं बल्कि अपने इतिहास को लेकर भी चर्चा में है। विश्व हिंदू परिषद द्वारा शहर का पुराना नाम ‘कर्णावती’ वापस करने की माँग के बाद अब इसकी प्राचीन पहचान, संस्कृति और इतिहास को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
खास तौर पर सुल्तान अहमद शाह के समय हुए बदलावों और शहर की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान में आए परिवर्तन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी संदर्भ में कर्णावती की नगरदेवी माता भद्रकाली से जुड़ा इतिहास एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कई ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि अहमदाबाद में कभी नगरदेवी माता भद्रकाली का एक भव्य मंदिर हुआ करता था लेकिन अब इसे मस्जिद में बदल दिया गया है।
बताया जाता है कि अहमद शाह ने इस मंदिर को तुड़वाकर उसकी जगह मस्जिद का निर्माण करवाया और इसे अपनी इस्लामी जीत का प्रतीक बनाया। इसे केवल एक मंदिर का टूटना नहीं बल्कि स्थानीय हिंदू पहचान, संस्कृति और नगरदेवी के सम्मान पर हमला माना जाता है। आज भी जामा मस्जिद के 100 से ज्यादा खंभों पर हिंदू शैली की नक्काशी साफ देखी जा सकती है। वहीं, भद्र किला का नाम भी इसी मंदिर के नाम पर रखा गया बताया जाता है। यह इतिहास केवल अहमदाबाद का ही नहीं बल्कि हिंदू विरासत पर हुए हमलों का इतिहास है।
भद्रकाली: अहमदाबाद की नगरदेवी और हिंदू विरासत का जीवंत प्रतीक
प्राचीन समय से हर गाँव और नगर में उस स्थान की रक्षा करने वाली देवी-देवता का मंदिर बनाने की परंपरा रही है। यह वैदिक काल से चली आ रही है। वैदिक संस्कृति में कई तरह के देवता बताए गए हैं जैसे इष्टदेवता, देवता, फिर नगरदेवता-नगरदेवी, ग्रामदेवता और लोकदेवता। यह परंपरा केवल आस्था तक सीमित नहीं थी बल्कि समाज की संस्कृति और सामूहिक पहचान से भी गहराई से जुड़ी थी।
जैसे आज भी काशी में कालभैरव को रक्षक देवता माना जाता है, वैसे ही कर्णावती में माता भद्रकाली को नगरदेवी का विशेष स्थान प्राप्त रहा है। आज के आधुनिक अहमदाबाद में भी माता भद्रकाली को नगरदेवी के रूप में माना जाता है।
सोलंकी-परमार काल में कर्णावती का माता भद्रकाली मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं था बल्कि पूरे नगर की पहचान और आस्था का केंद्र था। माना जाता है कि यह भव्य मंदिर 9वीं से 14वीं शताब्दी के बीच परमार वंश के समय बना था।
माता भद्रकाली को शक्ति स्वरूप में पूजा जाता था और स्थानीय हिंदुओं के लिए यह मंदिर आस्था, संस्कृति और एकता का प्रतीक बन गया था। यहाँ सिर्फ पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन के कई सांस्कृतिक पहलू भी फले-फूले। माता भद्रकाली का मंदिर कर्णावती की हिंदू पहचान और परंपरा का एक जीवंत प्रतीक था।
अहमद शाह का आक्रमण और मंदिर का विध्वंस
1411 में अहमद शाह ने कर्णावती पर हमला किया और उस पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उसने शहर का नाम बदलकर ‘अहमदाबाद’ कर दिया। इसी के साथ उसने पूरे शहर का इस्लामीकरण करने पर जोर दिया। कई मंदिरों और हिंदू इमारतों को या तो तोड़ा गया या उन्हें इस्लामी ढाँचे में बदल दिया गया।
इसी दौरान अहमद शाह ने माता भद्रकाली के मंदिर को भी निशाना बनाया। माना जाता है कि उसने हिंदू नगरदेवी के इस मंदिर को गिराकर अपनी जीत का प्रतीक स्थापित करने के लिए उसकी जगह नया इस्लामी ढाँचा खड़ा किया। इस कदम को इस रूप में देखा जाता है कि शहर की पहचान बदलने का स्पष्ट संदेश दिया गया।
कहा जाता है कि 1411 से 1442 के अपने शासनकाल में अहमद शाह ने 1424 के आसपास भद्रकाली माता के मंदिर को तुड़वाकर उसी स्थान पर जामा मस्जिद का निर्माण कराया और मंदिर के अवशेषों पत्थरों और खंभों का इस्तेमाल किया। ‘मीरात-ए-अहमदी’ में अहमदाबाद और भद्र किले के निर्माण के वर्णन में आसपास के हिंदू स्थलों का भी उल्लेख मिलता है।
यह भी कहा जाता है कि भद्र किले का नाम इसी मंदिर से पड़ा और आज भी यह इलाका ‘भद्र’ के नाम से जाना जाता है जो उस प्राचीन परंपरा की याद दिलाता है। इस घटना को केवल निर्माण कार्य नहीं बल्कि स्थानीय हिंदू पहचान को खत्म करने की एक सुनियोजित कोशिश के रूप में देखा जाता है।
वास्तुकला और साफ नजर आती हिंदू छाप
जामा मस्जिद की बनावट को ध्यान से देखने पर सबसे पहले उसके खंभे और उनकी संरचना ध्यान खींचती है। इन खंभों पर बनी नक्काशी, कमल की आकृतियाँ और अन्य चिह्न हिंदू और जैन मंदिरों की शैली से मिलते-जुलते हैं। यह समानता इतनी गहरी है कि इनके मूल स्रोत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मस्जिद के हॉल में 100 से ज्यादा खंभे हैं जिन पर हिंदू शैली की नक्काशी साफ दिखाई देती है। इनमें कमल, बेल-बूटे, मंडल, हाथी, कुंडलिनी सर्प, नृत्य करती अप्सराएँ, घंटियाँ और फूल जैसे कई पारंपरिक चिह्न बने हुए हैं। इस्लामी वास्तुकला में इन नक्काशियों को हराम माना जाता है और ये स्पष्ट रूप से यह साबित करती हैं कि यह मस्जिद कोई नई इमारत नहीं है बल्कि इसे एक प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेषों और खंभों से बनाया गया है।
ये खंभे मस्जिद के हॉल के बीच में स्थित हैं जो नमाज के लिहाज से भी सामान्य नहीं माने जाते। इसे पुराने ढाँचे के पुन: उपयोग का एक अहम संकेत माना जाता है। इन खंभों की तस्वीरें और दस्तावेज ‘Reclaim Temples’ और ‘Booksfact’ जैसे स्रोतों पर भी हैं जो इस दावे को और मजबूती देते हैं।
ब्रिटिश गैजेटियर और अन्य ऐतिहासिक संदर्भ
19वीं सदी के ब्रिटिश सर्वे में भी इस स्थान के हिंदू मूल का उल्लेख मिलता है। ‘गैजेटियर ऑफ बॉम्बे प्रेसिडेंसी: अहमदाबाद (1879)’ में साफ लिखा है कि यहाँ पहले माता भद्रकाली का मंदिर था जिसे अहमद शाह ने तुड़वाकर जामा मस्जिद बनवाई। ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने जाँच के दौरान हिंदू प्रतीकों को देखा और उन्हें दर्ज भी किया। ये विवरण बॉम्बे गैजेटियर के वॉल्यूम IV में दिए गए हैं।
ऐसा कहा जाता है कि यह देवी भद्रकाली का मंदिर था। अहमद शाह ने इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उसकी जगह एक मस्जिद का निर्माण करवाया। इसके अलावा, ‘मिरात-ए-अहमदी’ में भी जामा मस्जिद का जिक्र मिलता है जिसमें कहा गया है कि यह मस्जिद अहमद शाह और इस्लाम की विजय का प्रतीक है यानी इसे हिंदुओं की रक्षक देवी, माता भद्रकाली के मंदिर को तोड़कर बनाया गया था। ये सभी स्रोत इस बात को प्रमाणित करते हैं कि यह विध्वंस कोई आकस्मिक घटना नहीं थी बल्कि एक सुनियोजित हमला था।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अहमदाबाद के बीचों-बीच आज भी भद्र किला मौजूद है, जिसका नाम सीधे भद्रकाली मंदिर से जुड़ा माना जाता है। ब्रिटिश गजेटियर में यह भी लिखा है कि इस किले का नाम पाटन (अन्हिलवाड़) के प्राचीन भद्र किला और भद्रकाली मंदिर से प्रेरित है। कहा जाता है कि अहमद शाह ने इस किले का नाम नहीं बदला जबकि कई जगह यह भी उल्लेख मिलता है कि इस किले का निर्माण भी उसी के समय हुआ।
कुछ वामपंथी इतिहासकार सीधे यह नहीं कहते कि जामा मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई बल्कि यह कहते हैं कि अहमद शाह ने किसी पुराने हिंदू मंदिर के अवशेषों का इस्तेमाल किया। लेकिन सवाल वही रहता है कि ये अवशेष आए कहाँ से? इसका सीधा जवाब यही माना जाता है कि मंदिर को तोड़कर ही ये सामग्री ली गई होगी।
आज भी भद्र इलाके में माता भद्रकाली का मंदिर मौजूद है और ‘भद्र’ नाम लगातार चला आ रहा है। यह इस बात का संकेत माना जाता है कि इस जगह की पुरानी पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। स्थानीय मान्यताएँ और सांस्कृतिक यादें बताती हैं कि भले ही इमारतें बदल गई हों लेकिन पहचान पूरी तरह मिटती नहीं है।
इतिहास में यह एक आम प्रक्रिया मानी जाती है कि नई इस्लामी सत्ता पुराने हिंदू प्रतीकों की जगह ले लेती थी लेकिन वे किसी न किसी रूप में समाज की यादों में बने रहते हैं। भद्रकाली का संदर्भ भी ऐसी ही एक स्मृति का हिस्सा माना जाता है जो समय के साथ बदली जरूर है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
ईरान और अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद आखिरकार सीजफायर की घोषणा कर दी है। दो हफ्तों के लिए घोषित हुए इस सीजफायर के बाद युद्ध में अमेरिका अपनी जीत का दावा कर रहा है, वहीं ईरान भी इसे अपनी तरफ से जीत बता रहा है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि इस युद्ध में आखिरकार किसकी जीत हुई है?
BREAKING – Trump says in call with @AFP tonight that Iran ceasefire deal is 'total and complete victory' for United States
Trump says he believes China was involved in pushing Iran to the negotiating table.
Says Iran's uranium will be 'perfectly taken care of' under the deal,…
तो आईए इस जीत को जमीनी हकीकत के रूप में आँकते हैं। युद्ध में किसको-कितना नुकसान हुआ से लेकर किसको सीजफायर से फायदा हुआ के गणित से पता करते हैं कि आखिरकार किसकी जीत हुई? ये सब जानने के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण जानना बेहद जरूरी है।
ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण?
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान कहता है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा के लिए है। इसी वजह से पहले JCPOA न्यूक्लियर समझौता हुआ था, लेकिन बाद में अमेरिका उससे बाहर निकल गया जिससे तनाव और बढ़ गया।
दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान और अमेरिका दोनों अलग-अलग देशों और समूहों को सपोर्ट करते हैं। इस वजह से कई बार सीधे नहीं, बल्कि ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी दूसरों के जरिए लड़ाई जैसी स्थिति बनती रहती है।
तीसरा कारण है सैन्य घटनाएँ और हमले। पिछले कुछ सालों में कई बार अमेरिकी बेस पर हमले हुए या ईरान से जुड़े समूहों पर अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की। जैसे 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था। इसी तरह दिसंबर 2025 में ईरान में नागरिकों द्वारा प्रदर्शन को भी अमेरिका ने सपोर्ट किया और इस्लामी रिजीम का विरोध किया।
सैन्य ताकत में अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता ईरान
वैसे तो दोनों देशों की सेना की ताकत के नजर से देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बराबरी का है ही नहीं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य ताकत वाला देश है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी तरफ ईरान इस युद्ध में सिर्फ अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका को चुनौती देता रहा है।
अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना करें, तो जहाँ अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो कि ईरान के 9 अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है। अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं ईरान के पास उससे लगभग आधे 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं।
वायुसेना और नौसेना की ताकत की तुलना करें, तो अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि दुनिया के सबसे उन्नत विमानों में आते हैं। सिर्फ अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पाँचवी पीड़ी के विमान है। दूसरे ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं। वहीं अमेरिका की नौसेना के पास 464 पोत हैं, इसके मुकाबले ईरान के पास केवल 109 पोत मौजूद हैं।
इसी के साथ अमेरिका के पास 25 हजार से 30 हजार मिसाइले हैं। जबकि ईरान के पास लगभग 3 हजार बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही जखीरा है। थलसेना की बात करें तो अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं। वहीं ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं।
ताकत में फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे टिका ईरान?
अमेरिका के मुकाबले आधी से भी कम औसत में सैन्य ताकत होने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका रहा और अपनी शर्त मनवाने के बिना सीजफायर के लिए नहीं माना। क्योंकि ईरान ने युद्ध में अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित क्षमताओं का फायदा उठाया।
ईरान की सबसे बड़ी ताकत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के लिए कई क्षेत्रों के लिए इकलौता तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया जिससे, दुनिया भर में तेल की कीमतें उछली और पूरी दुनिया के साथ-साथ अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा।
इसके साथ ईरान ने अमेरिका से सीधे टकराने के बजाए अलग-अलग तरीकों से पलटवार किया। ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लिया, जैसे यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इजरायल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा लेबनान में हिज्बुल्लाह का साथ लिया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाया।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान की रणनीति अमेरिका को हराना नहीं, बल्कि खुद को बचाने की है। इसी को वह अपनी जीत मानता है। दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और राजनीतिक महकमे को निशाना तो बनाया लेकिन ईरान की असल ताकत हॉर्मुज और खर्ग द्वीप पर हमले के लिए सोचता रहा, क्योंकि उसे अपने सैनिक जाने का डर सताता रहा।
अमेरिका की जीत का दावा, पर ईरान की तरफ आए नतीजे
सीजफायर की घोषणा के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की जीत यह है कि उसने खुद को बचा लिया। ईरान ने अपने रणनीतिक, भौगोलिक स्थिति को ध्वस्त नहीं होने दिया। वहीं अमेरिका इसीलिए अपनी जीत का डंका बजा रहा है क्योंकि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर सेना के कई टॉप कमांडर और देश के भीतर भी तबाही मचाई, जैसा कि अमेरिका की सैन्य ताकत के लिए यह कोई बड़ा टास्क रहा भी नहीं।
लेकिन अमेरिका की जीत के दावे खोखले नजर आते हैं। क्योंकि ईरान की सरकार अब भी पूरी तरह कंट्रोल में है, वहाँ न तो सरकार गिरी और न ही कोई बड़ा अंदरूनी बदलाव हुआ। हॉर्मुज अभी भी ईरान के असर में है, यानी दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते पर उसका दबदबा बना हुआ है।
और अमेरिका के लिए जंग शुरू करने का सबसे बड़ा मुद्दा- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, वो भी अभी सुलझा नहीं है। ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उसके पास ही है, जिसे न तो खत्म किया गया और न ही कहीं हटाया गया।
सैन्य ताकत की बात करें तो ईरान को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन उसकी सेना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसकी मिसाइलें, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम अब भी काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं ईरान ने ये भी दिखाया कि वह दूर-दूर तक हले करने की क्षमता रखता है और खाड़ी क्षेत्र में कई जगह निशाना साध सकता है।
इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के बीच भी युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए, जिसका फायदा ईरान ने उठाया। इस लड़ाई में अमेरिका को अपने एयर डिफेंस सिस्टम का काफी इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे उसके संसाधनों पर दबाव पड़ा। और सबसे अहम बात, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कई बड़े सैन्य ठिकानों और सिस्टम्स को नुकसान पहुँचाया। इससे साफ होता है कि अमेरिका की जीत के दावे खोखले तो हैं। वहीं ईरान को भी युद्ध में काफी नुकसान पहुँचा है।
ईरान और अमेरिका के बीच 38 दिन से जारी युद्ध के बाद अब दोनों देशों ने सीजफायर की घोषणा कर दी है। ईरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खोलने के लिए राजी हो गया है। इससे सहमत होते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्तों तक हमला रोकने का ऐलान किया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और वहाँ के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने अनुरोध किया कि आज रात ईरान पर होने वाले हमले को रोक दिया जाए। इस शर्त कि ईऱान तुरंत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खोलने के लिए तैयार हो गया है, इसीलिए मैं दो हफ्तों के लिए हमले और बमबारी को रोकने के लिए सहमत हूँ। यह दोनों तरफ से युद्धविराम (सीजफायर) होगा।”
Based on conversations with Prime Minister Shehbaz Sharif and Field Marshal Asim Munir, of Pakistan, and wherein they requested that I hold off the destructive force being sent…
— Commentary Donald J. Trump Posts From Truth Social (@TrumpDailyPosts) April 8, 2026
बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खुलवाने की डेडलाइन मंगलवार (07 अप्रैल 2026) को खत्म हो गई, जिसके बाद उम्मीद थी कि अमेरिका कोई बड़ा हमला करेगा। लेकिन डेडलाइन खत्म होने से कुछ घंटों पहले ही दोनों देशों के बीच सीजफायर पर बात बन गई। लेकिन इस सीजफायर की भी कुछ शर्ते हैं। ईरान ने 10 प्रस्ताव दिए, जिसे अमेरिका मानने को तैयार हुआ। तब जाकर यह युद्ध खत्म हुआ।
क्या हैं ईरान के वो 10 प्रस्ताव?
ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, अमेरिका ने इन 10 प्रस्तावों को स्वीकार किया है:
अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता होगा कि दोनों एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर ईरान का नियंत्रण बना रहेगा
ईरान को परमाणु कार्यक्रम के अधिकार को मान्यता
अमेरिका द्वारा लगाए गए सभी मुख्य प्रतिबंध हटा दिए जाएँगे
दूसरे देशों पर असर डालने वाले सभी प्रतिबंध भी खत्म किए जाएँगे
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के ईरान के खिलाफ सभी फैसले खत्म किए जाएँगे
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के ईरान के खिलाफ सभी फैसले खत्म किए जाएँगे
ईरान को हुए नुकसान के लिए उसे मुआवजा दिया जाएगा
अमेरिका अपने सैनिकों को इस क्षेत्र से वापस बुलाएगा
हर जगह चल रही लड़ाई बंद होगी, जिसमें ईरान से जुड़े समूह जैसे लेबनान का हिज्बुल्लाह भी शामिल है
सीजफायर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को खोलने से जुड़ा होगा
इन प्रस्तावों को मानते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते तक अस्थायी तनाव कम करने के लिए समझौता किया है। इस समझौते में सबसे महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, क्योंकि दुनिया का 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। इसीलिए इस रास्ते को खोलना दुनिया की तेल सप्लाई के लिए बेहद जरूरी रहा। ईरान ने माना कि वह दो हफ्ते तक जहाजों को सीमित और नियंत्रित तरीके से गुजरने देगा।
जंग अभी खत्म नहीं हुई
अमेरिका के साथ सीजफायर पर बनी सहमति के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने अपनी मिलिट्री को गोलीबारी रोकने का आदेश दिया है। मोजतबा खामेनेई का यह निर्देश ईरान के सरकारी चैनल IRIB पर सीजफायर के ऐलान के दो घंटे बाद पढ़ा गया।
मोजतबा खामेनेई के बयान में कहा गया, “यह युद्ध का अंत नहीं है, लेकिन सभी सेना के हिस्सों को सुप्रीम लीडर के आदेश का पालन करते हुए गोलीबारी रोकनी चाहिए।” बयान में यह भी कहा गया कि लड़ाई रोकना पूरी तरह स्थायी नहीं है, बल्कि यह शर्तों पर आधारित है और आगे चल रही बातचीत से जुड़ा हुआ है।
जंग में जीत का ईरान-अमेरिका का दावा
बेशक युद्ध सिर्फ दो हफ्तों के लिए ही टाला गया हो, लेकिन ईरान और अमेरिका दोनों अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ईरान ने कहा कि युद्ध के लगभग सभी लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं। वहीं अमेरिका ने कहा कि यह उनकी जीत है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी सेना ने संभव बनाया है।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के बयान के अनुसार, तेहरान इस मौजूदा संघर्ष को एक बड़ी रणनीतिक सफलता मान रहा है और उनका कहना है कि युद्ध के लगभग सभी लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं। ईरानी अधिकारियों ने कहा कि यह संघर्ष करीब 40 दिनों तक चला, जिसका मकसद जरूरी राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े लक्ष्यों को पूरा करना था, जिनमें उनके बड़े क्षेत्रीय माँगों को मनवाना भी शामिल था।
इतना ही नहीं ईरान ने युद्ध आगे जारी रखने के भी संकेत दिए। काउंसिल ने यह भी कहा कि ईरान ने पहले अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा तय की गई समय-सीमा को मानने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वह दुश्मनों द्वारा तय किए गए समय के अनुसार चलने को तैयार नहीं था। उनका कहना था कि जब तक सभी लक्ष्य पूरे नहीं हो जाते, तब तक सैन्य कार्रवाई जारी रखी जाएगी।
This is a victory for the United States that President Trump and our incredible military made happen.
From the very beginning of Operation Epic Fury, President Trump estimated this would be a 4-6 week operation.
Thanks to the unbelievable capabilities of our warriors, we have…
वहीं दूसरी तरफ व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, “यह अमेरिका की जीत है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और हमारी अविश्वसनीय सेना ने संभव बनाया है।” उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रपति ने हॉर्मुज को फिर से खुलवा दिया है। लीविट ने बताया कि राष्ट्रपति ने शुरू से ही कहा था कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 4 से 6 हफ्ते का अभियान होगा और अमेरिका ने 38 दिनों में अपने प्रमुख सैन्य उद्देश्यों को हासिल कर लिया और उनसे कहीं आगे निकल गया।
सीजफायर के बाद तेल की कीमतों में राहत, शेयर बाजार में उछाल
ईरान-अमेरिका के बीच सीजफायर की घोषणा का सीधा असर तेल और शेयर बाजार दोनों पर देखने को मिला है। युद्ध के दौरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने से दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल सप्लाई प्रभावित हुई थी, जिससे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई थीं और वैश्विक बाजारों में डर और अस्थिरता फैल गई थी। लेकिन जैसे ही सीजफायर की घोषणा हुई और हॉर्मुज को दोबारा खोलने पर सहमित बनी, कच्चे तेल की कीमतों में अचानक गिरावट आई। रिपोर्ट्स के अनुसार, कीमतें 13 प्रतिशथ से 16 प्रतिशत तक नीचे आ गईं।
तेल सस्ता होने और तनाव कम होने की वजह से शेयर बाजार में तेजी देखने को मिली। भारत में सेंसेक्स 2600 प्वाइंट के ऊपर रहा और 23,800 के साथ निफ्टी में भी जोरदार उछाल आया, जबकि अमेरिका और अन्य देशों के बाजार भी सकारात्मक संकेत दिखाने लगे। खासकर तेल पर निर्भर कंपनियों और रिफाइनरी सेक्टर को इससे फायदा होने की उम्मीद है, क्योंकि उनका खर्च कम होगा।
हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह राहत अभी अस्थायी है, क्योंकि जमीन पर तेल सप्लाई पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है और जहाजों की आवाजाही अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही। इसलिए आने वाले समय में बाजार का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि यह सीजफायर स्थायी शांति में बदलता है या नहीं।
ईरान-अमेरिका युद्ध में अब तक क्या-क्या हुआ?
ईरान और अमेरिका के बीच 38 दिन का संघर्ष चला। यह संघर्ष अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान रहा। इसकी शुरुआत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका के हमले से हुई, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने का दावा किया गया, हालाँकि ईरान ने भी इसकी पुष्टि की, तभी ईरान का नया सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह के बड़े बेटे मोजतबा खामेनेई को चुना गया।
अयातुल्लाह खामेनेई के मारे जाने के बाद ईरान युद्ध के रण में उतरा और सबसे पहले खाड़ी देशों को निशाना बनाना शुरू किया। ईरान ने कुवैत, बहराइन से लेकर UAE को निशाना बनाया। इन खाड़ी देशों को अमेरिका का साथ देने की सजा दी गई। इस बीच ईरान के क्षेत्र में तेल का सबसे बड़ा मार्ग स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने की कगार पर आ गया, जिसके चलते दुनिया में तेल का संकट आ गया। इस दौरान भारत की रणनीतिक साझेदारी दुनियाभर में तारीफ के काबिल रही, हॉर्मुज बंद होने के बावजूद भारत के कई जहाजों की आवाजाही चालू रही।
इसके बाद अमेरिका और इजरायल ने एक के बाद एक ईरान के टॉप सैन्य कमांडर को निशाना बनाना शुरू कर दिया। 38 दिन के युद्ध में ईरान के सभी टॉप कमांडर को ढेर कर दिया गया। इसके बावजूद ईरान सीजफायर समझौते के लिए तैयार नहीं हुआ, जिससे दुनियाभर के देशों का तेल संकट बढ़ता गया। तब जाकर ट्रंप ने ईरान को 07 अप्रैल 2026 तक की डेडलाइन दी कि अगर ईरान हॉर्मुज नहीं खोलता, तो इसका बहुत बुरा अंजाम खोलना होगा।
हालाँकि, डेडलाइन से दो घंटे पहले दोनों देशों के बीच सीजफायर समझौते पर सहमति बनी और युद्ध विराम की घोषण की गई। लेकिन यह सीजफायर केवल 2 हफ्तों के लिए ही है। ईरान का दावा है कि इन दो हफ्तों में दोनों देशों के बीच बातचीत होगी और युद्ध को स्थायी तौर पर रोकने पर भी सहमित बनेगी।
असम में 9 अप्रैल 2026 को चुनाव को देखते हुए 7 अप्रैल की शाम 5 बजे चुनाव प्रचार थम गया। राज्य की सभी 126 सीटों पर गुरुवार को एक ही चरण में मतदान होगा। इस चुनाव में असमिया पहचान से लेकर मियाँ तक का मुद्दा राजनीति के केन्द्र में रहा।
Over the last one month, the karyakartas of @BJP4Assam and NDA partners, AGP, BPF and Gana Shakti under the leadership of Adarniya @narendramodi ji have been visiting each door to spread the word about the… pic.twitter.com/o9zvuo8dCV
राज्य में 2023 में हुए परिसीमन के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहा है। परिसीमन के बाद मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 29 से घट कर 22 रह गई है। इसका असर भी चुनाव में दिखेगा।
2021 विधानसभा चुनाव में एनडीए को 75 और कॉन्ग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थी। उस वक्त बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट कॉन्ग्रेस गठबंधन में शामिल थी, लेकिन इस बार अलग चुनाव लड़ रही है।
असम चुनाव में ‘मियाँ’ बना मुद्दा
असम चुनाव में मियाँ शब्द को लेकर जबरदस्त घमासान मचा। इस शब्द की गूँज कोर्ट में भी सुनाई दी। मुस्लिमों के खिलाफ अभियान चलाने का आरोप लगा कर सीएम हिमंता बिस्वा सरमा को कोर्ट में घसीटा गया। दिल्ली से लेकर असम तक एफआईआर दर्ज करवाई गई।
असम में मियाँ बंगाली मुस्लिम को कहते हैं, जो 150-200 साल पहले अंग्रेजों द्वारा लाकर यहाँ बसाए गए। ये लोग हिन्दू बहुल क्षेत्रों में बस गए और वहाँ की डेमोग्राफी बदल दी। सीएम हिमंता ने चुनाव में मियाँ को बाहर निकालने की अपील की। उन्होंने साफ कहा कि मियाँ लोगों को राज्य से बाहर करना उनका मकसद है। इस पर विपक्ष ने कड़ा विरोध जताया।
घुसपैठ और पहचान का मुद्दा
असम में बांग्लादेश से अवैध घुसपैठियों का मुद्दा भी अहम रहा है। यह राज्य में सबसे अधिक भावनात्मक रूप से संवेदनशील और राजनीतिक मुद्दों में से एक है। पीएम मोदी, गृहमंत्री शाह, सीएम हिमंता के साथ-साथ बीजेपी के दूसरे नेताओं ने चुनाव में घुसपैठियों के खिलाफ आवाज बुलंद की। बांग्लादेश से सीमा पार कर आने वाले लोगों की पहचान करना और उन्हें वापस भेजना बहुत बड़ा मुद्दा है। इसके कारण ही 1985 में असम समझौता हुआ था।
डेमोग्राफी में बदलाव के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहे असम के मूलनिवासियों को इस मुद्दे ने आकर्षित किया है। जमीन पर इसका असर दिख रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी असम में ये मुद्दा बना था।
एनआरसी और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा
असम के मूल निवासियों का सबसे बड़ा डर भाषाई और सांस्कृतिक अस्तित्व को बचाना है। इसके लिए एनआरसी को अंतिम रूप देना और अवैध प्रवासियों को बाहर निकालना जरूरी है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 2025 में विधानसभा में बताया था कि राज्य में 2017 के बाद से 40 हजार से अधिक विदेशी नागरिकों की पहचान हुई है।
इसी पहचान के सवाल को सुलझाने के लिए असम में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू हुई जो अभी तक पूरी नहीं हुई है।नागरिकता का सवाल भी सिर्फ कानूनी नहीं रह गया है, यह असम की राजनीति की धुरी बन गया।
भौगोलिक रूप से ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर और दक्षिण में बँटा असम राजनीतिक रूप से अपर असम, मिडिल असम, लोअर असम और बराक घाटी में विभाजित है।
बराक घाटी के मुसलमान, असमिया मुसलमान और लोअर असम के बांग्लाभाषी मुसलमानों की सामाजिक और राजनीतिक पहचान अलग-अलग है। बीजेपी ने मियाँ शब्द का इस्तेमाल कर बांग्लाभाषी मुसलमानों पर जमकर हमला किया है।
असम में सरकारी जमीनों से मुस्लिम प्रवासियों को बड़े पैमाने पर बेदखल किया गया है। इनमें से ज्यादातर बांग्लादेशी मुस्लिम बताए जाते हैं। इसका असर भी चुनाव में दिखेगा।
विकास का मुद्दा
असम चुनाव में विकास अहम मुद्दा है। केन्द्र की सहायता से राज्य में डबल इंजन सरकार काम कर रही है। विकसित असम के विजन को सरकार ने पेश किया है। राज्य की अर्थव्यवस्था काफी तेजी से आगे बढ़ी है। राज्य में सड़कों, पूलों, बुनियादी परियोजनाओं पर काफी खर्च किया गया है। जागीरोड में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स द्वारा लगभग ₹27,000 करोड़ के निवेश से सेमीकंडक्टर परियोजना शुरू की गई है यानी राज्य में सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह की परियोजनाएँ वोटरों को आकर्षित करेंगी।
असम की पारंपरिक ‘गमोचा’ को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलवाई। अहोम सेनापति लचित बोरफुकन की विरासत का सम्मान किया। राज्य में शिक्षा सुधार के तहत 402 मदरसों को प्राथमिक स्कूल में बदला गया और राज्य में बहुविवाह पर रोक लगाया गया
सीएम हिमंता और सीएम चेहरा गौरव गोगोई और उनकी पत्नियों से जुड़ा मुद्दा
कॉन्ग्रेस के सीएम पद का चेहरा और सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी पर बीजेपी ने पाकिस्तान से कनेक्शन के आरोप लगाए। गौरव गोगोई के पाकिस्तान यात्रा पर बीजेपी ने सवाल पूछे और उनकी पत्नी के पाकिस्तानी फर्म में काम करने और आईएसआई से कनेक्शन का आरोप भी लगाया।
इसके जवाब में चुनाव की तारीख नजदीक आते-आते कॉन्ग्रेस के नेता सीएम हिमंता सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयाँ सरमा पर तीन पासपोर्ट रखने का आरोप लगा दिया। कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तीन देशों का पासपोर्ट रखने की बात कही। इसको लेकर हिमंता दंपति ने शिकायत दर्ज कराई। इसपर पवन खेड़ा के दिल्ली स्थित आवास पर असम पुलिस पूछताछ के लिए पहुँची। लेकिन पवन खेड़ा घर पर मौजूद नहीं थे।
चुनाव प्रचार थमने तक निजी आरोपों की झड़ी लग गई और कॉन्ग्रेस-बीजेपी के नेता एक-दूसरे पर आरोप लगाते दिखे। पिछले साल सिंगापुर में राज्य के मशहूर गायक जुबीन गर्ग की रहस्यमय हालात में मौत भी इस बार प्रमुख मुद्दा है।
ऑपिनियन पोल में बीजेपी को प्रचंड जीत
असम चुनाव को लेकर दो सर्वे की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है। इसमें मैट्रिज और चाणक्य स्ट्रैटजी शामिल हैं। मैट्रिज सर्वे के अनुसार, बीजेपी गठबंधन को वोट शेयर और सीटों दोनों बढ़त मिल रही है। वहीं कॉन्ग्रेस गठबंधन पीछे है, जबकि छोटे दलों का वोट कम है।
वोट शेयर
BJP: 46% कॉन्ग्रेस: 36% अन्य: 18%
सीट
BJP: 92-102 कॉन्ग्रेस: 22-32 अन्य: 4-7
चाणक्य के सर्वे के अनुसार, BJP गठबंधन बढ़त बनाता दिख रहा है। वहीं BJP गठबंधन के मुकाबले कॉन्ग्रेस आधी सीटें भी नहीं जीत पा रही है, जबकि छोटे दलों की सीटें इस सर्वे में भी कम ही हैं।
इसके आधार पर कहा जा सकता है कि असम में सीएम हिमंता के नेतृत्व में तीसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी गठबंधन सरकार बनाने जा रही है, लेकिन इसका पता 5 मई 2026 को चलेगा, जब नतीजे आएँगे।
तमिलनाडु की राजनीति में आज एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। यहाँ के चुनाव में एक पूरा समुदाय यानी ब्राह्मण समाज पूरी तरह किनारे कर दिया गया है। 2026 के विधानसभा चुनाव (23 अप्रैल) के लिए जब पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की, तो एक हैरान करने वाली बात सामने आई। राज्य की बड़ी पार्टियाँ जैसे DMK और AIADMK, कॉन्ग्रेस तो छोड़िए, खुद को हिंदू धर्म का रक्षक बताने वाली भाजपा ने भी एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है।
यह सिर्फ चुनाव जीतने की कोई चाल नहीं है, बल्कि उस ‘द्रविड़ विचारधारा’ का असर है जो पिछले 100 सालों से तमिलनाडु में चल रही है। इस सोच ने वहाँ के समाज और राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है, जिससे अब ब्राह्मणों के लिए चुनाव लड़ना लगभग नामुमकिन सा हो गया है।
खत्म होती भागीदारी: राजनीति से क्यों गायब हुए ब्राह्मण?
तमिलनाडु की कुल आबादी में ब्राह्मणों का हिस्सा मात्र 3% के करीब है। भले ही इनकी संख्या कम रही हो, लेकिन आजादी के बाद के शुरुआती सालों में सरकारी दफ्तरों, अदालतों और राजनीति में इनका काफी दबदबा हुआ करता था। साल 1952 में मद्रास प्रेसीडेंसी के पहले मुख्यमंत्री सी राजगोपालाचारी (राजाजी) खुद एक ब्राह्मण थे। लेकिन धीरे-धीरे कामराज जैसे पिछड़े वर्गों के बड़े नेताओं के आने से राजनीति का रुख बदल गया और ब्राह्मणों का असर कम होने लगा।
एआईएडीएमके (AIADMK) की कमान जब तक जयललिता के हाथों में थी, तब तक ब्राह्मण समाज को राजनीति में अपनी जगह की उम्मीद रहती थी। जयललिता खुद एक तमिल ब्राह्मण परिवार से थीं। हालाँकि, उन्होंने अपनी पार्टी को पिछड़ी जातियों (OBC) के सहारे खड़ा किया, लेकिन वे समय-समय पर अपनी टीम में ब्राह्मण चेहरों को भी जगह देती थीं। वे कभी उन्हें चुनाव लड़ाती थीं तो कभी राज्यसभा भेजती थीं, जिससे इस समाज का प्रतिनिधित्व बना रहता था।
जयललिता के निधन के बाद अब समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। पिछले 35 सालों में यह पहली बार हुआ है कि AIADMK ने एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि भाजपा, जिसे आमतौर पर ब्राह्मणों की समर्थक पार्टी माना जाता है, उसने भी अपने हिस्से की 27 सीटों में से किसी पर भी इस समुदाय के व्यक्ति को मौका नहीं दिया। आज स्थिति यह है कि तमिलनाडु की मुख्य राजनीति में ब्राह्मण समाज का दखल लगभग खत्म हो गया है।
टिकट कटने की बड़ी वजह: पेरियार की ‘द्रविड़’ राजनीति का असर
तमिलनाडु की राजनीति से ब्राह्मणों के बाहर होने के पीछे कोई एक वजह नहीं है, बल्कि यह दशकों से चली आ रही एक सोच का नतीजा है। इसकी शुरुआत ईवी रामास्वामी ‘पेरियार’ के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ से हुई थी। पेरियार ने ब्राह्मणवाद और उत्तर भारत के प्रभाव को तमिल पहचान का दुश्मन बताया। उनकी इस सोच ने पिछड़ी जातियों (OBC) और दलित समाज में एक नई राजनीतिक चेतना पैदा कर दी, जिससे धीरे-धीरे सत्ता की चाबी इन वर्गों के हाथ में चली गई।
तमिलनाडु में आज 69% आरक्षण लागू है, जो देश में सबसे ज्यादा है। यहाँ की बड़ी पार्टियों (DMK और AIADMK) ने अपनी पूरी राजनीति पिछड़ी जातियों (जैसे वन्नियार, थेवर और गौंडर) को मजबूत करने पर टिका दी है। आज हालत यह है कि कोई भी पार्टी किसी ब्राह्मण को टिकट देने का रिस्क नहीं लेना चाहती। उन्हें डर लगता है कि अगर उन्होंने ऐसा किया, तो उनका मुख्य वोट बैंक (OBC और SC) नाराज हो जाएगा और संदेश जाएगा कि वे फिर से ‘ऊँची जाति’ को बढ़ावा दे रहे हैं।
जब राजनीति में जगह मिलना बंद हो गई, तो पिछले 30 सालों में बड़ी संख्या में ब्राह्मणों ने तमिलनाडु छोड़ दिया। इस समाज के लोग अब राजनीति के बजाय आईटी (IT), बैंकिंग और बड़े बिजनेस की ओर मुड़ गए हैं। बहुत से लोग बेंगलुरु, मुंबई या सीधे अमेरिका और यूरोप चले गए। उनके पुराने घर और इलाके (जिन्हें अग्रहारम कहा जाता था) अब बदल चुके हैं। आबादी कम होने और लोगों के बाहर चले जाने से अब वे एक बड़े ‘वोट बैंक’ के रूप में भी नहीं देखे जाते, जिससे पार्टियों के लिए उन्हें नजरअंदाज करना और आसान हो गया है।
‘सनातन’ पर छिड़ा संग्राम: ब्राह्मणों को ‘बाहरी’ बताने का खेल
तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मणों को अक्सर ‘आर्य’ या ‘बाहरी’ बताकर पेश किया जाता है, जबकि बाकी समुदायों को ‘असली द्रविड़’ (वहाँ का मूल निवासी) कहा जाता है। यह सोच वहाँ इतनी गहरी हो चुकी है कि ‘सनातन धर्म’ के खिलाफ बोलना अब राजनीति में एक बड़े हथियार की तरह इस्तेमाल होता है। पिछले कुछ सालों में डीएमके (DMK) के बड़े नेताओं ने सनातन धर्म को लेकर जो तीखे बयान दिए, उसने समाज के बीच की दूरी को और ज्यादा बढ़ा दिया है। द्रविड़ पार्टियाँ चाहती हैं कि लोग खुद को ‘हिंदू’ से ज्यादा अपनी ‘जाति’ (जैसे वन्नियार या थेवर) से जोड़कर देखें, ताकि भाजपा की हिंदुत्व वाली राजनीति वहाँ काम न कर सके।
तमिलनाडु में भाजपा ने भी एक कड़वी हकीकत को स्वीकार कर लिया है। उन्हें समझ आ गया है कि अगर वे केवल ‘ब्राह्मणों की पार्टी’ बनकर रहे, तो वहाँ कभी चुनाव नहीं जीत पाएँगे। इसीलिए भाजपा ने अब अन्नामलाई (जो पिछड़ी जाति गौंडर से आते हैं) जैसे नेताओं को आगे कर दिया है। पार्टी अब ब्राह्मणों को टिकट देने से परहेज कर रही है ताकि वह खुद को ‘द्रविड़ पहचान’ और पिछड़ों के करीब दिखा सके।
आज के दौर में तमिलनाडु का ब्राह्मण समाज एक अजीब और मुश्किल स्थिति में फँस गया है। उनके लिए यह ‘दोहरी मार’ जैसा है। एक तरफ DMK जैसी द्रविड़ पार्टियाँ उन्हें अपना पुराना ‘वैचारिक दुश्मन’ मानती हैं और उन्हें मुख्यधारा से बाहर रखना चाहती हैं। दूसरी तरफ BJP, जो कभी उनकी सबसे बड़ी समर्थक मानी जाती थी, अब उन्हें ‘चुनावी बोझ’ समझने लगी है। BJP को लगता है कि ब्राह्मणों को ज्यादा तवज्जो देने से उनका पिछड़ी जातियों का वोट बैंक खिसक सकता है। नतीजा यह है कि आज कोई भी बड़ी पार्टी उनके साथ खड़ी होने को तैयार नहीं है।
छोटी पार्टियों की ‘ब्राह्मण’ रणनीति
जहाँ तमिलनाडु की बड़ी पार्टियाँ जैसे DMK, AIADMK और यहाँ तक कि BJP ने भी ब्राह्मणों से दूरी बना ली है, वहीं कुछ नई और छोटी पार्टियाँ एक अलग रास्ता चुन रही हैं। इन पार्टियों को लगता है कि अगर बड़े दल ब्राह्मणों को टिकट नहीं दे रहे, तो वे इस समाज को अपने पाले में लाकर एक नया समीकरण बना सकते हैं। इसी सोच के साथ अभिनेता विजय और नेता सीमन ने अपनी-अपनी पार्टियों से ब्राह्मणों को चुनावी मैदान में उतारा है।
राजनीति में आए सुपरस्टार विजय की पार्टी ‘TVK’ ने दो ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाया है। विजय का मकसद यह संदेश देना है कि उनकी पार्टी किसी खास समुदाय के खिलाफ नहीं है, भले ही वे पेरियार की विचारधारा को मानते हों। दूसरी तरफ, तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमन की पार्टी ‘NTK’ ने सबको चौंकाते हुए 6 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है। सीमन ने श्रीरंगम और मायलापुर जैसी जगहों को चुना है जहाँ ब्राह्मण वोट काफी मायने रखते हैं।
सीमन की राजनीति पेरियार की ‘द्रविड़’ सोच के खिलाफ है। उनका कहना है कि वे ‘द्रविड़ दीवार’ को गिराने के लिए ‘ब्राह्मण कडाप्परई’ (यानी लोहे की एक मजबूत छड़ या सब्बल) का इस्तेमाल करेंगे। सीमन का मानना है कि तमिलनाडु में रहने वाला हर व्यक्ति पहले ‘तमिल’ है, चाहे उसकी जाति कुछ भी हो। यह राज्य की राजनीति में एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि जिस ब्राह्मण समुदाय को द्रविड़ आंदोलन ने दशकों पहले किनारे कर दिया था, आज एक तमिल राष्ट्रवादी नेता उन्हें अपनी पहचान का हिस्सा बताकर गले लगा रहा है।
क्या ब्राह्मण केवल ‘वोटर’ बनकर रह जाएँगे?
तमिलनाडु की आज की राजनीति को देखकर साफ लगता है कि 3% आबादी वाला ब्राह्मण समाज अब ‘सत्ता चलाने’ के बजाय केवल एक ‘खामोश वोटर’ बनकर रह गया है। जहाँ कभी इस समाज के बड़े नेता राज्य की किस्मत तय करते थे, वहीं आज 160 से ज्यादा बड़े उम्मीदवारों में से केवल 3-4 ब्राह्मणों का होना यह बताता है कि उन्हें चुनावी रेस से लगभग बाहर कर दिया गया है। यह एक तरह का ‘राजनीतिक वनवास’ है, जहाँ उनकी आवाज अब विधानसभा में सुनाई देना बहुत मुश्किल हो गया है।
राज्य की बड़ी पार्टियों का यह रवैया साफ कर देता है कि अब तमिलनाडु में चुनाव जीतने के लिए योग्यता से ज्यादा ‘जाति की संख्या’ और ‘द्रविड़ पहचान’ मायने रखती है। वन्नियार, थेवर और गौंडर जैसी बड़ी जातियों के भारी वोट बैंक के सामने ब्राह्मणों की कम संख्या उन्हें राजनीतिक रूप से ‘कमजोर’ बना देती है। पार्टियों को लगता है कि इन्हें टिकट देने से कोई बड़ा फायदा नहीं होगा, बल्कि दूसरी बड़ी और प्रभावशाली जातियाँ नाराज हो सकती हैं।
तमिलनाडु का यह ‘ब्राह्मण मुक्त’ चुनावी मॉडल भारत के बाकी राज्यों के लिए भी एक बहुत बड़ा उदाहरण या चेतावनी है। यह दिखाता है कि कैसे जातियों को एकजुट करके किसी एक वर्ग को पूरी तरह किनारे लगाया जा सकता है। अगर यही तरीका देश के दूसरे राज्यों में भी फैल गया, तो भविष्य में चुनाव विकास या काम पर नहीं, बल्कि केवल जातियों के सिर गिनने और एक-दूसरे के विरोध पर टिक जाएँगे।